विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-७

कल्पना झा · 2026-08-01 · अंक 447 · पृष्ठ 33–38

'मिथिला मिहिर'क संवर्द्धक-संरक्षक विद्यालंकार
श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'क पत्रकारिताक दीर्घ अनुभव सँ मिथिला मिहिर मैथिली साप्ताहिक प्रचूर मात्रा मे लाभान्वित भेल छलए, एहन कहब छनि सुरेश्वर झाक। सुनियोजित तरीका सँ 1960 सँ 1984 धरि नियमित मिथिला मिहिरक प्रकाशन होइत रहल, तकर पूरा-पूरा श्रेय 'विद्यालंकार' केँ देल जाइत छनि। आ से ओहिना नहि देल जाइत अछि। मैथिली भाषा ओ साहित्यक लेल हुनकर श्रम आ समर्पण 'नोटिस' कएल गेल विद्वत समाज द्वारा, तखन ई श्रेय देल गेलनि हुनका। मैथिली भाषा ओ साहित्यक लेल हुनक एहि अवदान केँ मैथिली साहित्यक इतिहास मे स्वर्णाक्षर मे लिखल गेल अछि। कथा-साहित्य, उपन्यास, नाटक, एकांकी, निबन्ध, बाल-साहित्य, कविता, संस्मरण , आत्मकथा, साक्षात्कार ओ यात्रा साहित्यक संग क्रीड़ा जगतक गतिविधि आ मैथिल ललना द्वारा लिखल मिथिलाक व्यंजन-विधि, सिलाइ-कढ़ाइक नमूना पर्यन्त, सभ किछुक समावेश सँ मिथिला मिहिरक लोकप्रियता अप्रत्याशित रूप सँ बढ़ैत गेल। मैथिली भाषा, साहित्य सँ लऽ कऽ संस्कृति ओ कला पक्ष पर ध्यान दैत मिथिला मिहिर मे चित्रकला, हस्तकला एवं संगीत पर सेहो आलेख सभ निरन्तर प्रकाशित होइत रहल। मैथिली भाषाक वर्तनी सम्बन्धी जटिल समस्याक समाधान करबा मे सेहो सफल रहल मिथिला मिहिर। मिथिला मिहिर जे लेखन शैली एवं वर्तनी स्थिर कएलक से आइ धरि सर्वाधिक मान्य ओ प्रचलित अछि। आ मिथिला मिहिरक एहि सर्वाधिक मान्य ओ प्रचलित वर्तनीक निर्धारण 'विद्यालंकार' जीक प्रयासे सँ सम्भव भऽ सकल छलए। कारण "मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना" बला स्थिति तँ छलएहे। मिथिला मे तँ कने बेसीए चरितार्थ होइत अछि ने "मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना।" एहन स्थिति मे कोनो निर्णय लेब, कोनो प्वाइंट पर सभक सहमति प्राप्त करब कतेक कठिन छल होएत, तकर अनुमान लगाओल जा सकैत अछि। आर्यावर्त आ मिथिला मिहिर, दुनूक प्रति 'विद्यालंकार'क ममत्व एवं मात्सर्य जग-जाहिर छलनि। एहि दुनूक उन्नयन, संवर्द्धन ओ लोकप्रियता मे हुनकर योगदान बिसरल नहि जा सकैत अछि।
साहित्य अकादमी द्वारा 'विद्यालंकार'क जीवन-यात्रा पर आधारित 72 पृष्ठक मोनोग्राफ प्रकाशित कएल गेल अछि। लेखक छथि सुरेश्वर झा। सन् 2013 मे प्रकाशित ई मोनोग्राफ 'विद्यालंकार'क व्यक्तित्वक सामाजिक पक्ष सँ पाठक केँ परिचित करएबा मे पूर्णतया सक्षम अछि। राजनीति शास्त्रक विद्वान, मैथिलीक ख्यातिलब्ध लेखक, कथाकार, निबंधकार एवं अनुवादक सुरेश्वर झा "भारतीय साहित्यक निर्माता श्रीकान्त ठाकुर विद्यालंकार" शीर्षक सँ अपन लिखल एहि मोनोग्राफ मे पत्रकार 'विद्यालंकार'क साहित्यिक अवदान पर विशेष रूप सँ प्रकाश देलनि अछि। आ से पोथीक नामहि सँ स्पष्ट अछि। भारतीय साहित्यक निर्माता कहलनि अछि ओ श्रीकान्त ठाकुर केँ। एकटा पत्रकार साहित्यक उत्थान मे कोन तरहेँ सहयोग कऽ सकैत अछि, से सिखबा लेल सुरेश्वर झाक उक्त मोनोग्राफ पढ़बाक चाही आजुक युवावर्ग केँ, जे पत्रकारिता मे रुचि राखैत छथि। ओहुना एखन सोशल मीडियाक चलती भेने आ असंख्य 'न्यूज चैनल'क प्रकोप सँ पत्रकारिताक 'क्रेज' कनि बेसीए देखाइत अछि‌। गरिमामय भाषा-शैली-युक्त 'पत्रकारिता'क बल पर 'विद्यालंकार'क एतेक ख्याति पाएब हुनका सभ लेल प्रेरक भऽ सकैत छनि।
अरे, गप्प करबाक छलए मिथिला मिहिरक आ हम राग अलापए लगलहुँ पत्रकारिताक। ओना दुनू एक-दोसर सँ 'कनेक्टेडे' विषय अछि, तथापि....! मैथिली मे सभ सँ अधिक दिन धरि प्रकाशित होबए बला 'मिथिला मिहिर'क अवदान केँ रेखांकित करैत सुरेश्वर झा कहैत छथि, "मिथिला मिहिरक पटना सँ प्रकाशनक कथा एना अछि। एक दिन 'आर्यावर्त इंडियन नेशन'क प्रेसक बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्सक बैसार मे दरभंगा महाराज डॉ. कामेश्वर सिंह ''विद्यालंकार' केँ कहलथिन जे मिहिरक प्रकाशनक लेल एकटा ठोस योजना बना कऽ प्रस्तुत करथि। ठाकुर जी अत्यन्त उत्साह सँ ओकर प्रकाशनक हेतु नवढंग सँ योजना बनौलनि। ओकर पृष्ठ संख्या, विभिन्न विधाक आलेख, मैथिली मिथिलाक सम्बन्ध मे सूचना एवं विचार तथा लेखक केँ उचित पारिश्रमिक, आदि विषयक योजना बना कऽ महाराज केँ देलथिन, जकरा महाराज सहर्ष स्वीकार कऽ लेलथिन।"
मिथिला मिहिरक 1960 सँ 1984 धरि पटना सँ जे नियमित प्रकाशन होइत रहल, तकर पूरा-पूरा श्रेय 'विद्यालंकार' केँ प्राप्त छनि। मैथिली भाषा ओ साहित्यक विकास मे हुनक ई अवदान स्वर्णाक्षर मे लिखल जाए बला एक टा अध्याय अछि। एहि मैथिली साप्ताहिकक प्रकाशनक पाछाँ श्रीकान्त ठाकुरक चिंतन, दर्शन, योजना आ संचालनक दायित्व छलनि आ तकर निर्वाह ओ कुशलता पूर्वक करैत रहलाह।
1960 सँ 1984क अभ्यन्तर पटना सँ मिथिला मिहिरक प्रकाशनक जे चर्चा कएलहुँ अछि, से दोसर खेपक खिस्सा अछि। मिथिला मिहिरक इतिहासक प्रारम्भ 1909 ई. मे दरभंगा भेल छल। 1909 ई.क मकर संक्रान्तिक दिन तत्कालीन महाराजाधिराजक संरक्षकत्व मे दरभंगा सँ मिथिला मिहिरक प्रकाशन प्रारम्भ भेल छलए। 1909 सँ 1911 धरि मासिक आ तकर बाद साप्ताहिक रूप मे एकर प्रकाशन 1954 ई. धरि निर्बाध रूप मे दरभंगा सँ होइत रहल। 13 नवम्बर 1954क अंकक बाद एकर प्रकाशन हठात् बन्द भऽ गेल छलैक।
दरभंगा सँ प्रकाशित मिथिला मिहिरक पाँच गोट सम्पादक रहलाह - विष्णु कान्त झा शास्त्री (1909-1912), योगानन्द कुमार (1912-1919), जनार्दन झा 'जनसीदन' (1919-1921), कपिलेश्वर झा शास्त्री (1922-1935) तथा आचार्य सुरेन्द्र झा 'सुमन' (1935-1954)।
1954 ई. मे मिथिला मिहिरक प्रकाशन जे ठप्प पड़ल से छओ वर्ष धरि ठप्पे रहल। पुनः पटना सँ मिथिला मिहिरक साप्ताहिक 11 सितम्बर 1960 ई. कऽ बहराएल। एकर पाछाँ श्रीकान्त ठाकुरक भूमिका अविस्मरणीय अछि। मिथिला मिहिरक पुनर्प्रकाशन सँ एक टा नब आशाक उदय मैथिली साहित्य आ ओकर भाषा शैली मे भेल छलैक। भाषाक प्रसंग मे एक टा जटिल प्रश्न रहैत छै वर्तनीक। एहि सन्दर्भ मे कतेको बेर विद्वान लोकनि द्वारा प्रयास कएल गेल। मुदा कोनो सर्वमान्य वर्तनी मिथिला मिहिरक पटना सँ प्रकाशनक पूर्व स्थिर नहि भऽ सकल छलए। एहि लेल श्रीकान्त ठाकुरक प्रयास प्रशंसनीय रहलनि। हुनकर मार्गदर्शन मे मिथिला मिहिर एहि बिन्दु पर विस्तार सँ विचार-विमर्श कएलक आ तखन जा कऽ वर्तनीक एक गोट निश्चित स्वरूप केँ मान्यता भेटल। कालान्तर मे एकरा 'मिथिला मिहिरक वर्तनी'क नाम देल गेल। ओना एहू वर्तनीक पक्ष-विपक्ष मे बहुत किछु तर्क देल गेलैक मुदा एतेक निश्चित
रूप सँ कहल जा सकैछ जे मिथिला मिहिर मे मैथिली लिखबाक लेल जे लेखन शैली आ वर्तनी अपनाओल गेल, सएह आइ धरि सभ सँ अधिक मान्य अछि, प्रचलित अछि।
सुरेश्वर झाक कहब छनि जे वर्तनीक एहि स्थिरताक लेल श्रीकान्त ठाकुरक बहुत पैघ अवदान छनि। वर्तनीक स्तर पर मिथिला मिहिर ठाकुर जीक नेतृत्व मे एक गोट मापदण्ड स्थापित कऽ मैथिली भाषाक स्वरूप केँ दृढ़ता प्रदान कएलक।
'विद्यालंकार'क कथन छलनि, "पटना सँ साप्ताहिक मिथिला मिहिरक संस्करण प्रकाशित होएबा सँ पूर्व धरि वर्थनीक कोनो एक शैली स्थिर नहि भऽ सकल छल‌‌‌। जखन कि शैली स्थिर करबाक प्रयास ओहि सँ चारि दशक पहिनहि सँ होइत आएल छलए। यद्यपि पहिने जकाँ शैली-सम्बन्धी अराजकता नहि रहि गेल छलए तथापि प्रायः दू शैली व्यापक रूप सँ प्रचलित छलए। मिथिला मिहिरक पूर्व सम्पादक पं. सुरेन्द्र झा 'सुमन' तथा 'अमर' जी, 'मधुप' जी आदि साहित्यकार लोकनिक एक शैली छलनि आ दोसर शैली छलनि प्रो. रमानाथ झा, प्रो. तन्त्रनाथ झा, आदि लोकनिक। पटना सँ जखन साप्ताहिक मिथिला मिहिरक प्रकाशन प्रारम्भ भेल तखन ओहि मे 'सुमन' जी, 'अमर' जी जाहि शैली मे लिखैत छलाह, ओकरे आधार बनाओल गेल। एहि सँ नब लेखक लोकनि केँ मार्गदर्शन भेटैत रहलनि। वर्तनीक सन्दर्भ मे गौर करए बला बात ई अछि जे मिथिला मिहिर एतबा उदारता देखओलक जे प्रो. रमानाथ झा, डॉ. सुभद्र झा सन विद्वानक लेख केँ हुनकहि शैली मे यथावत प्रकाशित करैत रहल। हुनका लोकनिक सम्मानक रक्षार्थ ई उदारता देखाओल जाइत छलए। मैथिली अकादमी द्वारा प्रकाशित पोथी सभ मे सेहो मिथिला मिहिर द्वारा स्वीकृत शैली केँ अपनाओल गेल अछि। एहि सँ स्पष्ट अछि जे मिथिला मिहिर मे मैथिली लिखबाक लेल जे लेखन शैली आ वर्तनी अपनाओल गेल, निस्सन्देह सएह सर्वमान्य सिद्ध भेल।
मिथिला मिहिरक 'अन्त'क चर्चा करैत एहि आलेखक समापन करब हम। सन् 1984 मे गजेन्द्र नारायण चौधरीक सम्पादकत्व मे दैनिक रूप मे मिथिला मिहिरक प्रकाशन प्रारम्भ भेल जे दीर्घजीवी नहि भऽ सकल। मैथिली पत्रकारिताक ई दुर्भाग्य रहल जे मिथिला मिहिरक प्रकाशनक 'दैनिक रूप'क जे सपना देखने छलाह बुद्धिजीवी वर्ग, से ओकर साप्ताहिको रूप सदाक लेल बन्द भऽ गेल। संयोग एहन जे मिथिला मिहिरक प्रकाशनक बन्द होएबाक पाँच बर्खक अभ्यन्तरहि 20 मइ, 1989 ई. मे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार' इहलोक त्यागि देलनि। अठासी बर्खक हुनकर जीवनकाल (17जुलाइ, 1901 ई. सँ 20मइ, 1989 ई.) रहलनि, जाहि मे 'विद्यालंकार' जी मिथिला मैथिली लेल बहुत किछु कऽ गेलाह, ई तऽ स्वीकारहि पड़तनि हुनको सभ केँ जे 'विद्यालंकार' केँ मात्र हिन्दीक अनन्य पुजारी मानैत आबि रहल छथि।
संपादकीय सूचना- एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-6
विद्यालंकारजीसँ पहिने विदेहपर व्यासजीक कृतित्वपर कल्पनाजी लीखि रहल छथि। पाठक व्यासजीपर प्रकाशित एखन धरिक सभ खंड निच्चा केर लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकै छथि-
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-1
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-2
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-3
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-4
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-5
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-6
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-7
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-8
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-9
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-10
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-11
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-12
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-13
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-14
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-15
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-16
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-17
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-18
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-19
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-20
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-21
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-22
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-23
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-24
मैथिली साहित्यमे उपेन्द्र नाथ झा 'व्यास' एवं हुनक परिवारक योगदान-25

Suggested citation: कल्पना झा. “मैथिली साहित्यमे श्रीकान्त ठाकुर 'विद्यालंकार'एवं हुनक परिवारक योगदान-७.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 447, pp. 33–38, 2026-08-01. https://www.videha.co.in/research/2026/447/मैथिली-साहित्यमे-श्रीकान्त-ठाकुर-विद्यालंकार-एवं-हुनक-परिव-6cd5db96e7.htm

मूल विदेह अंक / Original issue