'अखियासल': भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आ विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से विस्तृत आलोचनात्मक आस्वाद
-गजेन्द्र ठाकुर
प्रस्तावना: कृति, कृतिकार आ समीक्षा के प्रस्थान-बिन्दु
डा॰ रमानन्द झा 'रमण' के 'अखियासल' मैथिली साहित्य के इतिहास, कथा-विकास, आरम्भिक उपन्यास, विस्मृत साहित्यसेवी, राष्ट्रीय चेतना, गीत-काव्य, पत्रकारिता, स्तम्भ-लेखन आ आधुनिक कथा के सामाजिक सरोकार के पुनर्मूल्याङ्कन करयवला आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह हय। ई संग्रह भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर से सन् १९९५ ई॰ में प्रकाशित भेल आ एमें पचीसगो स्वतन्त्र आलोचनात्मक निबन्ध संकलित हय। ई सब निबन्ध के मूल प्रकाशन-स्रोत 'मिथिला मिहिर', 'मिथिलामोद', 'भाखा', 'मैथिली अकादमी पत्रिका', 'बसात', 'हालचाल', 'मैथिली प्रकाश' जइसन पत्र-पत्रिका आ अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलन के स्मारिका हय। तात्पर्य ई जे ई कोनो एके बेर योजनाबद्ध रूप में लिखल गेल ग्रन्थ न, बल्कि सन् १९७२ से लेके १९८९ तक लगभग दू दशक के पत्रकारीय-आलोचनात्मक श्रम के संचयन हय। ई संकलनात्मक स्वरूप के ध्यान में रखने बिना एकर उचित मूल्याङ्कन सम्भव न।
पोथी के आरम्भ पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा' के मैथिली के आरम्भिक कथाकारिता आ कथा-संग्रह के परम्परा में प्रतिष्ठित करे के प्रयास से होय हय आ समापन आधुनिकतम कथाकार प्रभास कुमार चौधरी पर — अर्थात् मैथिली के पहिल कथाकार से लेके समकालीन कथाकार तक, प्रायः दुइ शताब्दी के विस्तार ई पचीस निबन्ध में समाहित हय। ई दीर्घ पटल के कारणेँ 'अखियासल' खाली समीक्षा न, बल्कि एक प्रकार के समान्तर साहित्येतिहास के आधारशिला-प्रस्तर बन जाय हय — आ इहे ओकर सबसे बड़ मौलिकता आ सबसे बड़ सीमा दुनू के स्रोत हय।
ई पोथी साहित्य के स्थापित शिखर-पुरुष सब के प्रशस्ति खाली न करै हय। एकर मूल प्रश्न हय — मैथिली साहित्य के इतिहास में के स्मरणीय बनावल गेल, के विस्मृत भेल, कोन रचना 'प्रथम' कहल गेल, कोन पाण्डुलिपि पाठक तक न पहुँचल, आ साहित्यिक मान्यता निर्माण में संस्था, पत्रिका, सम्पादक, प्रकाशक, प्रवासी केन्द्र आ सामाजिक सत्ता केहन भूमिका निभावै रहल। कृति के केन्द्रीय अभिप्राय साफ हय — मैथिली गद्य आ पद्य के ओ प्रारम्भिक आ उपेक्षित रचनाकार लोक के प्रकाश में अनब, जिनका मुख्यधारा के साहित्येतिहास बिसर गेल वा जिनका सम्बन्धी सामग्री 'अनुपलब्ध' रह गेल।
'अखियासल' के पचीस अध्याय एकरेखीय इतिहास के बदला अनेक समान्तर धारा के उद्घाटन करै हय —
मैथिली के आरम्भिक कथा आ उपन्यास के खोज,
विस्मृत रचनाकार के पुनर्प्रतिष्ठा,
स्वतन्त्रता-सङ्ग्राम आ मातृभाषा-जागरण,
कथा, गीत, गप्प, स्तम्भ आ पत्रकारिता के विधागत विवेचन,
नारी, गरीब, किसान, बेरोजगार युवक आ शोषित वर्ग के अनुभव,
स्वतन्त्रता के बाद के राजनीतिक विडम्बना,
सामाजिक संक्रमण, अस्तित्व-संकट आ नैतिक अवमूल्यन।
ई अर्थ में 'अखियासल' आलोचना खाली न, मैथिली साहित्य के अभिलेखीय पुनरुद्धार आ समान्तर इतिहास-लेखन के महत्त्वपूर्ण उपक्रम हय।
प्रस्तुत मूल्याङ्कन में तीन दृष्टि-प्रतिमान के एकसाथ प्रयोग कैल गेल हय — (क) भारतीय काव्यशास्त्रीय प्रतिमान (रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, औचित्य, रीति, अलङ्कार, साधारणीकरण, लोकमङ्गल); (ख) पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त (ऐतिहासिकतावाद आ नव-ऐतिहासिकतावाद, मार्क्सवादी समाजशास्त्रीय समीक्षा, रूपवाद, नारीवादी विमर्श, उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, अस्तित्ववादी-मनोविश्लेषणवादी दृष्टि, पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धान्त, विखण्डनवाद के हाशिया-पुनरुद्धार आ कैनन के राजनीति); आ (ग) विदेह समान्तर साहित्य-आन्दोलन के समान्तर इतिहास-प्रतिमान आ गङ्गेश उपाध्याय-मूलक नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा, जे मुख्यधारा के कैनन-निर्माण के विरुद्ध लुप्तप्राय, हाशियाकृत आ अभिलेखहीन रचनाकार के पुनःस्थापना के अपन घोषित लक्ष्य मानै हय, आ जे नव्य-न्याय के 'हेत्वाभास' आ 'शब्द-प्रमाण' के उपयोग के साहित्य में निहित वैचारिक छल के अनावृत करै हय। ई तेसर प्रतिमान के दृष्टि से 'अखियासल' एक अग्रगामी पूर्व-रूप (प्रोटो-पाठ) हय — काहे कि रमानन्द झा जे काज १९७० से ८० दशक में व्यक्तिगत श्रम से कैलथिन, विदेह-आन्दोलन ओकरे संस्थागत, अभिलेखीय आ जनतान्त्रिक विस्तार दे हय।
ई समीक्षा के संरचना दू भाग में विभक्त हय। पूर्वार्ध में हरेक अध्याय के विशिष्ट गुण, उपलब्धि आ सैद्धान्तिक महत्त्व के विवेचन हय; उत्तरार्ध पूरा तरह से सीमा, दुर्बलता आ पद्धतिगत संकट के समर्पित हय।
आलोचनात्मक प्रतिमान
भारतीय साहित्यशास्त्रीय दृष्टि
रस — पोथी के विभिन्न अध्याय में करुण, वीर, हास्य, शृंगार, भक्ति आ रौद्र रस के विवेचन भेटै हय। 'रामेश्वर' के भूख आ पारिवारिक विघटन करुण रस पैदा करै हय; द्विजवर के राष्ट्रीय कविता वीर आ रौद्र रस जगावै हय; हरिमोहन झा के गप्प हास्य-व्यङ्ग्य के भूमि रचै हय; हरिलता के भजन भक्ति आ मधुर रस के धारा बहावै हय; आरसी आ मोहन के गीत शृंगार, प्रकृति आ भावमाधुर्य के अनुभव दे हय।
ध्वनि — अनेक रचना के प्रत्यक्ष कथा पाछाँ अप्रत्यक्ष सामाजिक अर्थ हय। भूख खाली भोजन के अभाव न, आर्थिक संरचना के अन्याय हय। विवाह खाली घरेलू संस्कार न, स्त्री के सामाजिक स्थिति आ जातिगत प्रतिष्ठा के क्षेत्र हय। भाषा खाली सम्प्रेषण के साधन न, सांस्कृतिक स्वाधीनता के प्रतीक हय।
वक्रोक्ति — यात्री के स्तम्भ, हरिमोहन झा के गप्प, श्यामानन्द झा के व्यङ्ग्य, ललित आ धीरेन्द्र के कथा आ आरसी के राजनीतिक कविता वक्र कथन, विडम्बना, व्यङ्ग्य आ प्रतीक के माध्यम से अपन अर्थ पैदा करै हय।
औचित्य — रमणजी बेर-बेर ई प्रश्न उठावै हथिन कि रचना के विषय, पात्र, भाषा, शैली, काल आ विधा के बीच औचित्य हय कि न। कथा के उपन्यास, गप्प के कथा, अनुवाद के मौलिक कृति वा प्रभाव के अनुवाद कहब उचित हय कि न — ई सब औचित्य के प्रश्न हय।
साधारणीकरण — एक व्यक्ति के भूख, बेरोजगारी, विवाह-दुःख वा सांस्कृतिक क्षोभ तब साहित्यिक मूल्य ग्रहण करै हय जब ओ पूरा समुदाय वा युग के अनुभव बन जाय हय। धीरेन्द्र के कथा-विवेचन में लेखक साफ करै हथिन कि वैयक्तिक अनुभव सामाजिक मन के अभिव्यक्ति बनला पर साहित्य सामाजिक सन्दर्भ ग्रहण करै हय।
लोकमङ्गल — अखियासल के आलोचना साहित्य के समाज से पृथक न मानै हय। मातृभाषा-सेवा, स्त्रीशिक्षा, जातिविरोध, श्रम के प्रतिष्ठा, गरीब के अधिकार आ राष्ट्रीय स्वाधीनता साहित्यिक मूल्याङ्कन के महत्त्वपूर्ण आधार बनै हय।
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त के आधार
रूपवादी दृष्टि — कथानक, चरित्र-निर्माण, संवाद, वातावरण, कथा-गति, प्रतीक, पुनरावृत्ति, गीतात्मकता आ विधागत संरचना के परीक्षण रूपवादी दृष्टि से कैल जा सकै हय।
नव-इतिहासवादी दृष्टि — हरेक रचना के ओकर समय के सत्ता, संस्था, भाषा-राजनीति, स्वतन्त्रता-आन्दोलन, सामाजिक सुधार, सामन्तवाद आ आर्थिक परिवर्तन से जोड़के पढ़ल गेल हय।
मार्क्सवादी दृष्टि — भूख, निर्धनता, श्रम, सामन्ती शोषण, पुलिस-प्रशासन, पूँजी, चुनाव, बेरोजगारी आ वर्ग-विभाजन अनेक अध्याय के मूल प्रश्न हय।
नारीवादी दृष्टि — 'निर्दयी सासु', 'सुमति', 'चन्द्रग्रहण', हरिलता के भजन, कुमार गंगानन्द सिंह के कथा आ ललित के कथा-विवेचन स्त्री के शिक्षा, विवाह, देह, इच्छा, घरेलू श्रम, विधवापन आ सामाजिक नियन्त्रण के प्रश्न उठावै हय।
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि — मैथिली पर हिन्दी आ अंग्रेजी के दबाव, मातृभाषा के उपेक्षा, देवनागरी के प्रसार के राजनीति, स्थानीय भाषा-साहित्य के अधिकार आ राष्ट्रीयता के भीतर भाषिक बहुलता — ई सब उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श के विषय हय।
अस्तित्ववादी आ मनोविश्लेषणवादी दृष्टि — ललित आ धीरेन्द्र के कथा-विवेचन में निरर्थकता, एकाकीपन, बेरोजगारी, दायित्व के असह्य भार, यौनिक इच्छा, आत्मपरायापन आ सामाजिक असंगति के विश्लेषण भेटै हय।
पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि — हरिमोहन झा के गप्प आ यात्री के स्तम्भ-लेखन के अध्याय पाठक-समुदाय, पत्रिका के संवादात्मकता, हास्य के लोकप्रियता आ पाठकीय रुचि के निर्माण पर ध्यान दे हय।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि आ नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा
विदेह समान्तर इतिहास के मूल धारणा हय कि साहित्यिक इतिहास खाली राजकीय मान्यता, पुरस्कार, विश्वविद्यालय आ प्रसिद्ध लेखक के इतिहास न होय हय। ओ इतिहास में निम्न सब के समान अधिकार हय —
दुर्लभ पाण्डुलिपि,
अप्रसारित पोथी,
स्थानीय पत्र-पत्रिका,
ग्रामीण रचनाकार,
मातृभाषा-सेवी,
विस्मृत सम्पादक,
आर्थिक अभाव में लिखै कवि,
स्त्री-पात्र के मौन,
किसान आ मजदूर के पीड़ा,
भाषिक पराधीनता,
मिथिला आ प्रवास के सांस्कृतिक सम्बन्ध।
मैथिली साहित्य के इतिहास सदिखन एकगो वैचारिक संघर्ष के क्षेत्र रहल हय। एक ओर 'मुख्यधारा के परम्परा' हय, जे शास्त्रीय सन्तुलन, संस्थागत मान्यता, ब्राह्मणवादी आभिजात्य आ अतीत के परिमार्जित के प्रस्तुत करबा पर केन्द्रित रहल हय, त दोसर ओर 'विदेह समान्तर परम्परा' हय, जे जनमानस के धड़कै हृदय, शोषित-वञ्चित के प्रतिरोध आ यथार्थवादी चित्रण से जुड़ल हय। नव्य-न्याय के 'शब्द-प्रमाण' सिद्धान्त के अनुसार सत्य उहाँ खण्डित होय हय जहाँ प्रमाण के दबा देल जाय हय — जइसन दूषण पञ्जी के छुपायब; आ 'हेत्वाभास'-विवेचन से साहित्य में निहित तार्किक दोष आ वैचारिक छल अनावृत होय हय। 'अखियासल' के प्रधान उपलब्धि ई हय कि ओ मैथिली साहित्य के मुख्य सड़क के बगल में दबाओल अनेक पदचिह्न के फेर दृश्य बनावै हय।
पूर्वार्ध: अध्यायवार उपलब्धि आ आलोचनात्मक आस्वाद
१. मैथिली के पहिल कथाकार पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा'
संग्रह के प्रथम निबन्ध एक प्रकार से समस्त कृति के बीजाध्याय हय। ई अध्याय मैथिली कथा-साहित्य के आरम्भ-बिन्दु सम्बन्धी प्रचलित धारणा के संशोधित करै हय। रमानन्द झा इहाँ 'प्रथम' के अन्वेषण के आलोचनात्मक कर्म के रूप में प्रतिष्ठित करै हथिन — "कथा विकास के मार्ग पर सबसे पहिने कोन मैथिली सेवी अग्रसर भेलथिन, ओकर अनुसंधान।" ई घोषणा-वाक्य पूरा संग्रह के पद्धतिगत घोषणापत्र हय।
पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर के जन्म १७५० ई॰ में खण्डवलाकुल में भेल हल; ओ सर्वसीमा निवासी पं॰ महेश्वर ठाकुर के पुत्र हलथिन आ हुनकर निधन १८२२ ई॰ में भेल। हुनकर ग्रन्थ सब में 'मिथिला तीर्थप्रकाश', 'नारी धर्मप्रकाश', 'शूद्र विवाह पद्धति', 'वैतरणीदानम्', 'शुद्ध निर्णय' आ 'शिवपूजा प्रदीपिका' प्रमुख हय। हुनका मैथिली के पहिल कथाकार आ 'चन्द्रप्रभा' के पहिल कथाकृति सिद्ध करे के हेतु समीक्षक वंशावली, तिथि, गुरु-शिष्य-परम्परा आ खण्डनात्मक प्रमाण — जयकान्त मिश्र के 'चन्द्रभागा' नामकरण के भ्रम-निवारण — सब के सहारा ले हथिन। 'चन्द्रभागा' के बदला 'चन्द्रप्रभा' नाम के ई शुद्धिकरण आलोचना के अभिलेखीय सावधानी देखाबै हय।
लेखक 'चन्द्रप्रभा' के उन्नैसम शताब्दी के मैथिली गद्य के नमूना आ आरम्भिक कथा-संग्रह के रूप में स्थापित करै हथिन। पाण्डुलिपि जीर्ण हल, कृति के किछुए अंश उपलब्ध रहल आ एकर प्रकाशन लेखक के निधन के बहुत वर्ष बाद सन् १९३९ में भेल। 'चन्द्रप्रभा' के संरचना गुरु-शिष्य संवाद आ एक कथा से दोसर कथा निकले के पद्धति पर आधारित हय; एमें गुरु-शिष्या संवाद के माध्यम से नीतिवचन के समर्थन कैल गेल हय, जे में प्राचीन गद्य-शैली के उत्कृष्ट निदर्शन भेटै हय। ई दृष्टि से एकर सम्बन्ध पञ्चतन्त्र, विद्यापति के 'पुरुष-परीक्षा' आ संस्कृत के आख्यान-उपाख्यान-परम्परा से जुड़ै हय — ई शुद्ध शास्त्रीय परम्परा-अन्विति के दृष्टि हय। कथा सब शिक्षाप्रद, घटनाप्रधान आ नैतिक निष्कर्षवाली हय।
भारतीय औचित्य-दृष्टि से एकर महत्त्व कथानक के जटिलता में न, आरम्भिक मैथिली गद्य के ऐतिहासिक भूमिका में हय। पाश्चात्य दृष्टि से ई उद्गम-अन्वेषण हय, जे ऐतिहासिकतावादी समीक्षा के केन्द्रीय प्रवृत्ति छी। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से ई अध्याय सबसे महत्त्वपूर्ण हय — काहे कि 'चन्द्रप्रभा' के "अनुपलब्धता" के समीक्षक खुद रेखाङ्कित करै हथिन, आ दुर्लभ पाण्डुलिपि, सम्पादक आ प्रकाशक के श्रम के साहित्यिक इतिहास के अंग बनावै हथिन। हाशियाकृत, अभिलेखहीन, लुप्त-पाठक पुनःस्थापना — इहे समान्तर इतिहास के मूल-मन्त्र हय, आ रमानन्द झा एकर पहिल घोष इहाँ करै हथिन।
२. मैथिली के प्रथम उपन्यासकार पं॰ जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर'
लेखक 'रामेश्वर' के सन् १९१६ में मिथिला प्रिंटिंग वर्क्स, मधुबनी से प्रकाशित मैथिली के प्रथम मौलिक उपन्यास मानै हथिन। पं॰ जीवछ मिश्र के जन्म १८६३ ई॰ में भेल हल; पिता के असामयिक निधन के कारणेँ हुनकर शिक्षा बाधित भेल, तबो ओ संस्कृत, मैथिली, हिन्दी आ उर्दू के गहन अध्ययन कैलथिन। हुनकर जीवन, साहित्यिक प्रेरणा आ मातृभाषा के प्रति प्रतिबद्धता के विस्तार से प्रस्तुत कैल गेल हय — हिन्दी-विस्तारवाद के विरुद्ध प्रतिरोध आ 'मैथिल महासभा' के वंशानुगत नेतृत्व के विरोध, ई सब असल में औपनिवेशिक-कालीन भाषिक अस्मिता-संघर्ष के जीवन्त दस्तावेज हय।
उपन्यास के केन्द्र में भूख, श्राद्ध के आडम्बर, ऋण, पुलिस-प्रशासन के अत्याचार, झूठ अभियोग, कारावास, पारिवारिक विघटन आ अपराध के सामाजिक उत्पत्ति हय। रामेश्वर अपन पिता के श्राद्ध के खातिर कर्ज ले हय, घर-घराड़ी बेचय पर विवश होय हय, आ अन्त में पुलिस के प्रताड़ना से क्षुब्ध होके डकैत बन जाय हय; ओकर पत्नी पार्वती कमला में कूदके आत्महत्या के प्रयास करै हय। रामेश्वर जन्मजात अपराधी न; आर्थिक विवशता, सामन्ती सत्ता आ प्रशासनिक छल हुनका अपराध के बाट पर धकेलै हय। मार्क्सवादी दृष्टि से रामेश्वर के अपराध वास्तव में वर्गीय शोषण के परिणाम हय। करुण रस के निर्माण उपन्यास के आरम्भिक दृश्य से होय हय — श्राद्ध के बाद फेकल भोजन पर कुकुर सब टूट पड़ै हय आ भूखल बालक दूर से देखै रहै हय। लेखक के अनुसार संवाद सरल आ स्वाभाविक हय आ वातावरण-निर्माण प्रभावकारी।
मार्क्सवादी-नवऐतिहासिकतावादी दृष्टि से ई निबन्ध कृति के सर्वश्रेष्ठ अध्याय-मध्ये एक हय। समीक्षक 'रामेश्वर' के खाली सौन्दर्यशास्त्रीय वस्तु न, बल्कि सत्ता-संरचना — राज दरभंगा, मैथिल महासभा, हिन्दी साहित्य परिषद — के विरुद्ध ठाढ़ भेल प्रतिरोधी पाठक रूप में व्याख्यायित करै हथिन। जीवछ मिश्र के निर्भीकता आ 'मठाधीश के षड्यन्त्र के भण्डाफोड़' — ई नव-ऐतिहासिकतावाद के शक्ति-प्रवचन-विश्लेषण से अद्भुत रूप में मेल खाय हय। विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि से 'रामेश्वर' राजदरबार के न, भूखल ग्रामीण परिवार के इतिहास लिखै हय — यथार्थवाद के ई विदारक प्रस्तुति मैथिली गद्य के स्वर्ण-शिखर हय।
३. रासबिहारी लाल दास आ उपन्यास 'सुमति'
'सुमति' (१९१८ ई॰) मैथिली में आधुनिक उपन्यास के विधा स्थापित करे के आरम्भिक प्रयास हय। लेखक रासबिहारी लाल दास के साहित्यिक अभाव-बोध, 'मिथिला दर्पण' से सम्बन्ध आ मातृभाषा में उपन्यास देवे के संकल्प के रेखाङ्कित करै हथिन। समाज में व्याप्त अपव्यय, दहेज आ प्रदर्शनकारी प्रवृत्ति के कारणेँ परिवार के कोना पतन होय हय, आ एक सुशिक्षिता नारी सुमति कोना अपन बुद्धि से खसै घर के सम्हारै हय, ई ई उपन्यास के मूल स्वर हय। सहेलोला बाबू आ मनोरथ लाभ के बीच सिद्धान्त-विवाह के प्रसङ्ग, कर्ज लेके बरियाती के स्वागत, आ अन्त में पूरा सम्पत्ति के विनाश के जे सजीव चित्रण हय, ओ सामाजिक यथार्थवाद के प्रखर उदाहरण हय। सुमति सासुर अबितहि अपन गहना बेचि परिवार के ऋणमुक्त करै हय आ समाज के खातिर एकगो आदर्श स्थापित करै हय।
अध्याय पूर्ववर्ती इतिहासकार के मत के भी समाहित करै हय। जयकान्त मिश्र कथानक-विन्यास, चरित्र-निर्माण आ कथन-कौशल के अपरिपक्व मानै हथिन, मुदा विषय के मैथिली उपन्यास खातिर उपयुक्त स्वीकारै हथिन; राधाकृष्ण चौधरी एकरा आधुनिक मैथिली उपन्यास-लेखन के पहिल सफल प्रयास कहै हथिन। ई निबन्ध के एकगो विशेष शक्ति अन्तर्पाठीयता के सूक्ष्म बोध में हय — 'सुमति'में हिन्दी कविता के प्रयोग के जीवछ मिश्र 'मैथिली भाषा आ कवि के अक्षमता के द्योतक' मानने रहथिन, आ रमानन्द झा ई समकालीन आलोचनात्मक संवाद के उद्घाटित करै हथिन। इहे आलोचना- के-आलोचना ई निबन्ध के सैद्धान्तिक गहराइ दे हय। भारतीय औचित्य-सिद्धान्त के दृष्टि से हिन्दी-पद्य के मैथिली-गद्य में प्रयोग भाषा-औचित्य-भङ्ग हय — रमानन्द झा ई दोष के 'शैलीजन्य शिथिलता' कहके स्वीकार करै हथिन, तबो सामाजिक जागरण के युग-स्वर के प्रधान मानके कृति के महत्त्वपूर्ण घोषित करै हथिन। ई मूल्याङ्कन-सन्तुलन — दोष-स्वीकृति साथे ऐतिहासिक-सामाजिक महत्त्व के रक्षा — समीक्षक के परिपक्वता के परिचायक हय।
औचित्य-दृष्टि से अध्याय ऐतिहासिक महत्त्व आ कलात्मक सिद्धि बीच भेद करै हय। कोनो कृति 'प्रथम' हो सकै हय, मुदा खाली प्रथम होय के कारण कलात्मक रूप से पूर्ण न बन जाय हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से 'सुमति' विधागत संक्रमण के दस्तावेज हय — नीति-आख्यान से आधुनिक सामाजिक उपन्यास तक बढ़ै मैथिली गद्य के अस्थिर, मुदा महत्त्वपूर्ण डेग।
४. जनार्दन झा 'जनसीदन' आ 'निर्दयी सासु'
ई अध्याय विवाह-व्यवस्था, घटक, कन्यापक्ष, सासु-पुतोहु सम्बन्ध आ घरेलू स्त्री-उत्पीड़न के कथा-विवेचन के केन्द्र में आनै हय। जनसीदन (१८७२–१९५१) के 'निर्दयी सासु' सन् १९१४ ई॰ में 'मिथिला मिहिर' में धारावाहिक रूप में प्रकाशित भेल; एकर कथावस्तु सामाजिक घटना पर आधारित हय आ चित्रण एतना स्वाभाविक हय कि घटना पाठक के सोझा घटै प्रतीत होय हय। एमें सासु अनूपरानी आ ननदि के अत्याचार सहै मूक नारी शारदा के कारुणिक चित्रण भेल हय, जे तत्कालीन समाज में स्त्री-शिक्षा के विरोध आ पितृसत्तात्मक क्रूरता के प्रमाणित करै हय। ज्योतिषी चिन्तामणि झा द्वारा शारदा के शिक्षित करब आ परिपाटी-विरोधी कन्यादान, आ अनूपरानी द्वारा ओकर विरोध — असल में प्राचीन आ नवीन जीवन-मूल्य के द्वन्द्व हय, जकरा समीक्षक 'प्रखर सामाजिक चेतना के प्रतिफल' कहै हथिन।
जनसीदन के 'शशिकला', 'कलियुगी संन्यासी' आदि के विवेचन में समीक्षक विधा-विवाद के — हरिमोहन झा 'निर्दयी सासु' के 'प्रहसन' कहलथिन, आन 'उपन्यास' — सुन्दर ढंगेँ प्रस्तुत करै हथिन। मुख्य उपलब्धि ई जे रमानन्द झा जनसीदन के व्यक्तित्व के प्रखरता-सम्बन्धी अपन प्रारम्भिक सन्देह के उपलब्ध साहित्य के विश्लेषण से खुद संशोधित करै हथिन — सामाजिक-सुधारवादी चेतना के आलोक में व्यक्तित्व प्रखर भेटै छनि। ई आत्म-संशोधनकारी आलोचना-पद्धति कृति के बौद्धिक ईमानदारी के प्रमाण हय।
नारीवादी दृष्टि से कथा घरेलू सत्ता के जटिल रूप उद्घाटित करै हय। स्त्री खाली पुरुषद्वारा न, पितृसत्तात्मक संस्कार ग्रहण कइले दोसर स्त्रीद्वारा भी प्रताड़ित होय हय; सासु खुद व्यवस्था के उत्पाद रहितो पुतोहु पर व्यवस्था के प्रतिनिधि बन जाय हथिन। करुण रस के स्रोत नवविवाहिता के असहायता हय। ध्वनि-सिद्धान्त से देखे पर विवाह के उत्सव के पाछाँ कन्या के आर्थिक मूल्याङ्कन, परिवार के प्रतिष्ठा आ पितृसत्तात्मक नियन्त्रण के कठोर इतिहास सुनाय हय। मार्क्सवादी दृष्टि से 'मिथिला के समाज के कोला-कोला में बाँटके शोषण करै' व्यवस्था के विरुद्ध शंखनाद के रूप में एकर पाठ वर्ग-चेतना आ सामाजिक अन्तर्विरोध के साहित्यिक अभिव्यक्ति के उत्तम उदाहरण हय।
५. पं॰ जनार्दन झा — एक बिसरल साहित्यसेवी
ई लघु मुदा सैद्धान्तिक दृष्टि से सबसे बेसी महत्त्वपूर्ण निबन्ध में रमानन्द झा अपन समस्त आलोचनात्मक परियोजना के सैद्धान्तिक आधार प्रस्तुत करै हथिन — 'दू कोटि के साहित्यकार' के सिद्धान्त। पहिल कोटि के (विद्यापति जइसन) रचनाकार एतना व्यापक होय हथिन कि दोसर कोटि के रचनाकार के आच्छादित कर दे हथिन, आ कालान्तर में लोक हुनका बिसर जाय हय। गङ्गा-कोशी के विशाल जल आ गाम-गाम के जोड़निहार छोट धार के स्थानीय महत्त्व के रूपक ई सिद्धान्त के अविस्मरणीय बनावै हय — इतिहास के वास्तविक नदी में खाली विशाल प्रवाह न, छोट-छोट धार भी जल दे हय, आ पं॰ जनार्दन झा ओ अदृश्य धारा के प्रतिनिधि हथिन।
लेखक के तर्क हय कि साहित्य के मुख्य धारा खाली प्रसिद्ध लेखक से न, अनेक स्थानीय आ 'दोसरा पाँति' के साहित्यसेवी के निरन्तर श्रम से बनै हय। पं॰ जनार्दन झा के रचना दुर्लभ भेला कारण हुनकर नाम इतिहास से लगभग लुप्त हो गेल। 'जानकी परिणय' जइसन खण्डकाव्य में अकाल, जनकपुर, सीताजन्म, धनुषभङ्ग आ विवाह-संस्कार के चित्रण हय; भाषिक सरलता, मौलिकता आ सांस्कृतिक विवरण एकरा साहित्येतिहास के उपयोगी सामग्री बनावै हय।
ई सिद्धान्त पाश्चात्य कैनन-निर्माण आ साहित्यिक-आर्थिकी के सिद्धान्त से आश्चर्यजनक रूप में साम्य रखै हय। रमानन्द झा जे कहै हथिन — प्रकाशन के अभाव, अनियतकालीन पत्रिका आ सर्वसुलभता के अभाव बहुतो रचनाकार के प्रकाश से वञ्चित कर देलक — ई विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमान के केन्द्रीय अभिकल्पना हय। सत्य कहल जाय त ई पूरा निबन्ध विदेह-आन्दोलन के पूर्व-घोषणापत्र हय।
६. पं॰ त्रिलोचन झा, बेतिया — बिसरल मातृभाषानुरागी
त्रिलोचन झा (१८७८–१९३८ ई॰) अनुवादक, कवि, कथाकार-आख्यानलेखक, जीवनीकार, निबन्धकार, सामाजिक कार्यकर्ता आ संस्थापक व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत हथिन। हुनका में अपूर्व संगठन-शक्ति हल; 'सुबोधिनी सभा' आ मैथिली-आन्दोलन के संगठनात्मक इतिहास के ई निबन्ध उद्घाटित करै हय। ओ मातृभूमि-वन्दना आ अतीत-गान के माध्यम से सुप्त मैथिल समाज के जगावे चाहलथिन — "चण्डि तोहर मिथीला देश" जइसन हुनकर पङ्क्ति सब जनमानस में ऊर्जा के सञ्चार कैलक। ओ 'श्रीमद्भगवद्गीतादर्श' नाम से गीता के मैथिली पद्यानुवाद भी कैलथिन, जे हुनकर प्रखर गवेषणात्मक दृष्टि के परिचायक हय।
हुनकर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिका में बिखरल रहने समग्र मूल्याङ्कन कठिन भेल — 'बड़ कम सामग्री उपलब्ध हय', ई समीक्षक खुद बेर-बेर स्वीकार करै हथिन — मुदा उपलब्ध सामग्री मातृभाषा आ साहित्य के प्रति गाढ़ अनुराग प्रमाणित करै हय। हुनकर दृष्टि में भाषा आ साहित्य समाज के प्रगति के आधार हल। ओ मैथिल समाज के आलस्य, आत्मकेन्द्रितता आ सांस्कृतिक उदासीनता के ललकारै हलथिन आ मिथिला के प्रतिष्ठा फेर प्राप्त करे के सामूहिक दायित्व के बोध करावै हलथिन। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से मातृभाषा-सेवा राजनीतिक स्वाधीनता के विस्तार हय — भाषा-विहीन स्वराज अधूरा स्वराज हय। इहाँ सामग्री के अभाव के स्वीकृति में समान्तर इतिहास-लेखन के मूल संकट — अभिलेख-दारिद्र्य — प्रत्यक्ष होय हय।
७. राष्ट्रीय चेतना के पुरोधा कवि यदुनाथ झा 'यदुवर'
यदुवर (१८८८–१९३५ ई॰) 'मिथिला गीताञ्जलि' (१९२३) के माध्यम से राष्ट्रीय स्वाधीनता-संग्राम के चेतना के मैथिली काव्य में स्थापित कैलथिन। हुनकर कविता मिथिला, मैथिली आ भारतीय राष्ट्रीयता के संयुक्त स्वर हय। ओ पुरान परम्परा के तोड़ि राष्ट्रीय कार्य के सूत्रपात कैलथिन आ संगीत के रागपाश से मैथिली कविता के सबसे पहिने मुक्त कैलथिन। हुनकर 'मैथिली साहित्य दिग्दर्शन' मैथिली के प्रथम अनुसन्धानपरक निबन्ध मानल जाय हय, जे में ओ साहित्य के समग्र लेखा-जोखा प्रस्तुत कैलथिन हय।
यदुवर के 'राष्ट्रीय चेतना के पुरोधा' घोषित करै रमानन्द झा एक विशिष्ट स्थापना करै हथिन — 'कवीश्वर चन्दा झा से चलल देश-काल से जुड़बा के प्रवृत्ति पर से धार्मिक लेप पोछि राष्ट्रीय आ देशोत्थान-विषय के रचना के सुदृढ़ परिपाटी यदुवर के रचना से प्रारम्भ भेल।' 'धार्मिक लेप पोछब' — ई पदावली साहित्यिक प्रवृत्ति के धर्मनिरपेक्षीकरण के सूक्ष्म ऐतिहासिक बोध के प्रकट करै हय आ नव-ऐतिहासिकतावादी प्रवृत्ति-रेखाङ्कन के उत्तम नमूना हय।
ओ शिक्षित मैथिल समाज के मातृभाषा-विमुखता, आलस्य आ बाह्य भाषिक प्रभुत्व के विरुद्ध जागरण के आह्वान करै हथिन। हुनकर काव्य के वीर रस युद्धक्षेत्र के खाली न, भाषिक-सांस्कृतिक संघर्ष के वीर रस हय। मातृभाषा में लिखब, साहित्य प्रकाशित करब आ मैथिल समाज के जगायब हुनका खातिर राष्ट्रसेवा हल। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से यदुवर भाषा के हीनताबोध के औपनिवेशिक मानसिकता के परिणाम मानै हथिन। विदेह समान्तर इतिहास में हुनकर कविता राजनीतिक आन्दोलन के समानान्तर चलै भाषिक स्वाधीनता-आन्दोलन के दस्तावेज बनै हय।
८. कवि-सेनानी छेदी झा 'द्विजवर'
अध्याय — मैथिली साहित्यकार सब राष्ट्रीय चेतना से पृथक हलथिन — ई सामान्य आरोप के खण्डन करै हय। द्विजवर के जन्म १८९३ ई॰ में सहरसा के वनगाँव में भेल हल। ओ खाली राष्ट्रीय कविता लिखनिहार न, गान्धीजी के आह्वान पर सरकारी सेवा छोड़के स्वतन्त्रता-सङ्ग्राम में सक्रिय भाग लेनिहार कवि-सेनानी हलथिन आ चारि बेर जेल गेलथिन। यदुवर आ द्विजवर के तुलना करै समीक्षक एक सूक्ष्म भेद स्थापित करै हथिन — यदुवर सरकारी सेव के रहे के कारणेँ खाली साहित्यिक स्तर पर सक्रिय, जब कि द्विजवर सरकारी सेवा के त्यागि राजनीति आ साहित्य दुनो स्तर पर सक्रिय। 'एके व्यक्ति में सर्जनात्मक प्रतिभा आ आन्दोलनात्मक क्षमता के संगम' के 'बिरल घटना' कहब — ई मूल्याङ्कन साहित्य आ कर्म के अद्वैत के प्रतिष्ठित करै हय, जे प्रतिबद्ध-साहित्य के अवधारणा से मेल खाय हय।
स्वदेशी, चरखा, आर्थिक स्वतन्त्रता आ ग्रामजीवन हुनकर राष्ट्रीयता के आधार हय — 'चरखा चौमासा' जइसन कविता में स्वदेशी आन्दोलन के गूँज साफ सुनल जा सकै हय। राष्ट्र हुनका खातिर अमूर्त सत्ता न, गाम-घर, नदी, खेत, मनुष्य आ प्रकृति के संयुक्त जीवन हय। हुनकर रचना 'छूतहर' समाज के अस्पृश्यता आ सामन्ती क्रूरता के विरुद्ध प्रहार हय — "अस्पृश्य भेलहुँ कै कोन पाप? मृतिका एक एके कुम्हार" — ई पङ्क्ति सामाजिक विषमता पर प्रखर प्रहार करै हय आ हुनकर कविता में वञ्चित वर्ग के स्वर साफ हय। वीर रस के संग करुण आ रौद्र रस के मेल हुनकर कविता के प्रचार-पद से ऊपर उठावै हय। विदेह समान्तर इतिहास में द्विजवर साहित्य आ राजनीतिक कर्म के मध्य के कृत्रिम विभाजन तोड़ै हथिन।
९. कुमार गंगानन्द सिंह के कथा-संवेदना
कुमार गंगानन्द सिंह के कथा-यात्रा दीर्घ काल (१९२४–१९६५) तक पसरल हय। 'मनुष्य के मोल', 'विवाह', 'बिहाड़ि', 'पण्डितपुत्र', 'पञ्च परमेश्वर', 'आम के गाछी' आदि कथा में सामाजिक सुधार, विवाह-कुरीति, अस्पृश्यता, शिक्षा आ ग्रामजीवन के समस्या उठाओल गेल हय। 'मनुष्य के मोल'में एक बाल-विधवा के आत्महत्या के कारुणिक यथार्थ हय; 'बिहाड़ि'में अछूतोद्धार के चेतना हय, जहाँ शोषित वर्ग बाबू-भैया के बेगारी करबा से मना के हड़ताल करै हय। लेखक हुनकर कथा-विधि के महत्त्व ई बात में देखै हथिन कि ओ पुराण वा धर्मग्रन्थ से कथावस्तु न ले, अपन समकालीन समाज से ले हथिन — उपाख्यान के उपदेशात्मक परम्परा से हटि समाज के जीवित विकृति पर प्रहार करब हुनकर उपलब्धि हय।
ई निबन्ध में रमानन्द झा 'अनुभूति-अभिव्यक्ति-सत्य-सम्प्रेषण' के शृङ्खला स्थापित करै हथिन — 'अनुभूति के अभिव्यक्ति में सत्य के सम्प्रेषण रहै हय, सत्य के सम्प्रेषण में जीवन आ परिवेश के यथार्थ व्यञ्जित रहै हय।' ई 'व्यञ्जना'-पद प्रत्यक्षतः आनन्दवर्धन के ध्वनि-सिद्धान्त के स्मरण करावै हय — साहित्य के सार्थकता वाच्यार्थ में न, व्यङ्ग्यार्थ में हय। साथे 'काल-प्रवाह में प्रमाणित होएब' के कसौटी कालातीत-मूल्य के अवधारणा से मेल खाय हय। 'मनुष्य के मोल' आ 'विवाह' के कर्तृत्व-विवाद (जयकान्त मिश्र आ श्रीश एकरा 'भोल' के रचना मानने रहथिन) के समाधान करै रमानन्द झा भाषा-प्रयोग के समाजशास्त्रीय पाठ प्रस्तुत करै हथिन — 'बिहाड़ि' कथा में रौदी-कामाति के हिन्दी-मिश्रित बोली 'अशिक्षित पर आन भाषा के प्रभाव' के व्यञ्जित करै हय। ई भाषिक-यथार्थवाद के सूक्ष्म आलोचनात्मक बोध हय।
स्त्री-पात्र, बालविवाह, विधवापन आ घरेलू उत्पीड़न के चित्रण करुण रस पैदा करै हय। कथा-भाषा सरल, लोकानुकूल आ विनोदपूर्ण हय। 'आम के गाछी' जइसन छोट कथा में अनावश्यक विस्तार के अभाव आ रहस्यपूर्ण अन्त आधुनिक कथा के निकट ले हय।
१०. कवीश्वरी हरिलता के वैष्णवता
ई निबन्ध के विशिष्टता ई जे रमानन्द झा एक स्त्री-रचनाकार — कवीश्वरी हरिलता (मोदवती, जन्म १९०३ ई॰) — क साहित्य-साधना के प्रकाश में आनै हथिन, जे विदेह समान्तर इतिहास के लैङ्गिक पुनरुद्धार के अग्रगामी संकेत हय। हरिलता के जीवन-वृत्त — खाली चारि वर्ष के अवस्था में विवाह, अल्पवय में वैधव्य आ पति के विक्षिप्तता, 'स्त्रीगण खातिर पढ़ब निषिद्ध हल' तबो 'सासु आदि से चोरा के अक्षर सीखब' — ई सब नारी-अस्मिता के संघर्ष-गाथा हय।
हुनकर 'भजनमालिका' (१९३७ ई॰) वैष्णव सगुण भक्ति के उत्कृष्ट निदर्शन हय। भक्ति-काव्यशास्त्रीय दृष्टि से रमानन्द झा हरिलता के 'निराकार के अप्राप्त मानके सगुण-आराधना' के वैष्णव-परम्परा के अनुरूप सिद्ध करै हथिन — पलना में झूलै, अँगना में ठुमुकै, वृन्दावन में गाय चरावै सगुण-कृष्ण के चित्रण 'श्रुति-मधुरता आ रस-प्रचुरता' से युक्त। हुनकर गीत में भक्ति के छओ अंग — आनुकूल्य-संकल्प, प्रातिकूल्य-वर्जन, रक्षण-विश्वास, गोप्तृत्व-वरण, आत्मनिक्षेप, कार्पण्य — आ माधुर्य रस प्रवाहित हय। बाल-वैधव्य के असह्य पीड़ा के ओ कृष्ण-भक्ति के मधुर रस में रूपान्तरित के देलथिन। ई भक्ति-रस आ वात्सल्य-रस के शास्त्रीय विवेचन हय।
११. कविवर श्यामानन्द झा के काव्य-वस्तु
लेखक श्यामानन्द झा के काव्य के राष्ट्रीय, सामाजिक, सांस्कृतिक आ व्यावहारिक चारि वर्ग में पढ़ै हथिन आ 'युग-सचेत कवि' के अवधारणा प्रस्तुत करै हथिन। कवि के आक्रोश व्यक्तिगत न, तत्कालीन राजनीतिक पराधीनता, आर्थिक असमानता, भाषिक अपमान आ सामाजिक उदासीनता से उत्पन्न हय — 'जरि जाय जेँ जजाते करिते पटाय की हो' जइसन आक्रोश के पाछाँ तात्कालिक परिवेश के कारुणिक स्थिति हय। गान्धी-युगीन राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक पतन के विरुद्ध सामन्ती वर्ग के उदासीनता — 'कोउ नृप होहिं ह में का हानी' — क तीक्ष्ण व्यङ्ग्यात्मक चित्रण भेटै हय।
हुनकर कविता भारतीय स्वाधीनता, मैथिली के रक्षा, आर्थिक समानता, सामाजिक जागरण आ सांस्कृतिक पुनरुत्थान के आह्वान करै हय। ओ अंग्रेजी आ हिन्दी के अन्धभक्त उच्च वर्ग पर व्यङ्ग्य करै आ लिखै हथिन कि लोक अपन भूषण-वसन के छोड़के विद्यापति के नाम से कान छिपावै हय आ "टोप ओ नेकटाय"पर लोट-पोट रहै हय — ई सांस्कृतिक दासता के विरुद्ध उद्घोष हय। 'देश सेवा हित छदामो बाहर होएब दुर्लभ ... सोम होथिन छदाम लय' — ई विदग्ध व्यङ्ग्य कुन्तक के वक्रोक्ति-सिद्धान्त के वाक्य-वक्रता के प्रमाण हय। रस-दृष्टि से एमें करुण आ वीर के संग सामन्ती वृत्ति के प्रति बीभत्स-भाव के सामञ्जस्य हय; मार्क्सवादी दृष्टि से ई पूँजी-केन्द्रीकरण आ वर्ग-विषमता के प्रत्यक्ष साहित्यिक आलोचना हय। गरीबी, वस्त्र, भोजन, आवास आ पारिवारिक भार के वर्णन हुनकर सामाजिक दृष्टि के प्रमाण हय।
हुनकर 'मैथिल सन्देश' आ 'मैथिली गीत-चन्द्रिका'में राष्ट्रप्रेम आ लोक-संस्कृति के समन्वय हय। व्यावहारिक गीत में सोहर, नामकरण, उपनयन, विवाह, कोबर, समदाउन आ आन संस्कार के समावेश लोकजीवन के काव्यात्मक अभिलेख रचै हय। शृंगार, हास्य, भक्ति आ लोकरीति के समन्वय हुनकर काव्य-वस्तु के व्यापक बनावै हय।
१२. बाबू लक्ष्मीपति सिंह आ मैथिली पत्रकारिता
ई निबन्ध में रमानन्द झा साहित्य-समीक्षा के सीमा लाँघि पत्रकारिता-इतिहास के क्षेत्र में प्रवेश करै हथिन। लक्ष्मीपति सिंह (१९०७–१९७२) के लेखक साहित्यकार, सम्पादक, प्रकाशक, संस्कृतिकर्मी आ मैथिली पत्रकारिता के संस्थापक-पुरुष के रूप में देखै हथिन — 'एक विधा में बान्हल न, एक भाषा में न'। पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर के शिष्यत्व से प्राप्त साहित्य-सर्जना के मन्त्र के ओ जीवनभरि मातृभाषा-सेवा में लगौलनि आ प्रवासी-मैथिल के मिथिला से जोड़े के आजीवन प्रयास कैलथिन।
हुनकर योगदान खाली अपन लेखन तक सीमित न। दुर्लभ रचना के सम्पादन, प्रकाशन, लेखक के प्रोत्साहन आ पत्रिका के माध्यम से पाठक-समुदाय के निर्माण मैथिली सार्वजनिक क्षेत्र के विकास के आधार बनल। ओ मैथिली पत्रकारिता के राजनीतिक आ आर्थिक दासता से मुक्त कर आत्मनिर्भर बनावे के वकालत कैलथिन आ साफ कैलथिन जे मैथिली के पत्र-पत्रिका खाली साहित्यिक एकाधिकार न, बल्कि समाचार आ जन-सरोकार के माध्यम होय के चाही। निबन्ध के अन्तिम अंश मैथिली समाचार-पत्र के भविष्य-सम्बन्धी दूरदर्शी विश्लेषण हय — विज्ञापन, संवाददाता-प्रतिनिधित्व, सम्पादकीय नीति आ पाठक-आधार के अभाव में मैथिलहु के आन भाषा के पत्र पर निर्भर रहे के विवशता। ई मीडिया-समाजशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि अपन युग से आगाँ हय।
पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि से पत्रकारिता लेखक आ पाठक के बीच जीवित संवाद स्थापित करै हय। विदेह समान्तर इतिहास में सम्पादक साहित्य के पार्श्व-पात्र न, स्मृति आ पाठकत्व के निर्माता हथिन।
१३. कविचूड़ामणि मधुप के गीत-साहित्य
काशीकान्त मिश्र 'मधुप' के गीति-साहित्य के विवेचन ई संग्रह के सबसे बेसी रसशास्त्रीय निबन्ध हय। 'गीत भावाश्रित होय हय, हृदय पर ओकर प्रभाव तत्काल पड़ै हय, रागात्मिका वृत्ति के तार झनझना उठै हय' — ई विवेचन प्रत्यक्षतः भरतमुनि के रस-निष्पत्ति आ अभिनवगुप्त के रस-चर्वणा के मैथिली पुनराख्यान हय; 'नादब्रह्म के जगावै' गीत-साधना के अवधारणा भारतीय संगीत-दर्शन के नादब्रह्म-सिद्धान्त से जुड़ै हय। मधुप के 'घसल अठन्नी सोना के घसि के हीरा' बनौनिहार आ 'विद्यापति ओ मीरा' के स्वर में बजनिहार कहके (मणिपद्म के शब्द में) रमानन्द झा गीति-परम्परा के शीर्ष-स्थान दे हथिन।
मधुप के गीत-संसार में शृंगार, भक्ति, गृहस्थजीवन, नारी-आदर्श, सामाजिक शिक्षा आ सांस्कृतिक संस्कार के मेल हय। गीत खाली पढ़े के वस्तु न, कण्ठस्थ करे के, गावे के आ सामुदायिक रूप से अनुभव करे के रचना हय — 'लोक-जीवन में गीत के अत्याज्यता' (आँगन, दलान, खेत, खरिहान, कोबर, सिमरिया-घाट) के ई मूल्याङ्कन भट्टनायक के साधारणीकरण-सिद्धान्त के उत्तम प्रयोग हय। जब मैथिल युवा वर्ग सिनेमा के गीत के धुन पर पागल हल, तब मधुपजी मैथिली भाषा के विलुप्त होएबा से बचावे के खातिर सिनेमा के तर्ज पर मैथिली गीत लिखलथिन — विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि से ई जनभाषा के जीवित रखे के एकगो लोकतन्त्रवादी, जमीनी प्रयास हल। 'वट-सावित्री' जइसन पावनि के कथा के ओ गीत के रूप देलथिन जे से नीरसता समाप्त भेल, स्त्री आ बालक तक कथा पहुँचल आ लोक-कण्ठ में मैथिली स्थापित भेल — ई गीत के सामाजिक प्रयोगशीलता देखाबै हय।
रस-दृष्टि से मधुप के गीत में भक्ति, विप्रलम्भ शृंगार आ करुणा के समन्वय हय। ध्वनि-दृष्टि से गृहस्थ आदर्श के भीतर स्त्री के सामाजिक भूमिका, परिवार के नैतिक अनुशासन आ लोकपरम्परा के संरक्षण निहित हय।
१४. भट्टीकाव्य के परम्परा आ मधुपजी
ई निबन्ध कृति के सबसे साहसी सैद्धान्तिक अध्याय हय आ संस्कृत के शिक्षाप्रद काव्यपरम्परा आ मैथिली काव्य के अन्तर्सम्बन्ध के खोज करै हय। भट्टीकाव्य में कथा खाली रसास्वाद खातिर न, व्याकरण, अलङ्कार, छन्द आ भाषाज्ञान के शिक्षण खातिर भी प्रयुक्त हय; मधुपजी के काव्य में ई शिक्षणपरक परम्परा के आधुनिक मैथिली रूप देखल गेल हय। भारतीय काव्यशास्त्र के दृष्टि से ज्ञान आ आनन्द के एकता ई अध्याय के प्रमुख सूत्र हय — काव्य नितान्त उपदेश होय त रसहीन होके जाय; नितान्त मनोरञ्जन होय त शैक्षिक प्रयोजन लुप्त होके जाय। मधुप के उपलब्धि ई द्वन्द्व में समन्वय स्थापित करब हय।
'कोबर-गीत' के रचना के आधार बनाके रमानन्द झा एक निर्भीक प्रश्न उठावै हथिन — 'कविता काहे खातिर लिखल जाय हय?' आ साफ उत्तर दे हथिन — 'यश' आ 'अर्थ'; कोनो कवि ई दुनो शर्त के सीमा से बाहर न। ई घोषणा साहित्य के शुद्धतावादी आदर्शवाद के चुनौती दे ओकर भौतिक-आर्थिक आधार के उद्घाटित करै हय — जे स्पष्टतः मार्क्सवादी साहित्य-समाजशास्त्र के अन्तर्दृष्टि हय। प्रसङ्ग ई जे विद्यालय के अनुदान बचावे के विवशता में — कुमार गंगानन्द सिंह आ राजपण्डित बलदेव मिश्र के दबाव में — मधुपजी के महाराज कामेश्वर सिंह के 'कोबर गीत' लिखय पड़लथिन। 'कोबर-गीत' के 'युगीन विवशता के द्योतक' कहके रमानन्द झा एक जटिल नैतिक-सौन्दर्यशास्त्रीय प्रश्न के सामना करै हथिन — कवि अपन आत्मा के प्रतिकूल काहे लिखै हथिन? ओ स्वीकार करै हथिन कि मधुप के 'कवित्व-शक्ति एतना प्रखर हल जे अनिश्चित विषयो पर भी दिव्य-मार्मिकता आबि जाय हल।' ई प्रयोजन आ प्रतिभा के द्वन्द्व के ईमानदार विवेचन हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से ई अध्याय संस्कृत आ मैथिली के स्वामी-दास सम्बन्ध में न, संवादशील परम्परा में रखै हय।
१५. काञ्चीनाथ झा 'किरण' के कथा-जगत
किरण (१९०६–१९८९) के रमानन्द झा तृतीय दशक के संक्रान्ति-काल के प्रतिनिधि कथाकार मानै हथिन — विद्यापतीय कल्पनालो के से हटि 'देसिल वयना' के यथार्थ ओर उन्मुख। हुनकर कथा-जगत ('चन्द्रग्रहण', 'धर्मरत्नाकर', 'समाज के चित्र') सामाजिक विषमता, जाति, श्रम, धर्मान्धता, सत्ता, स्त्री आ मनुष्य के नैतिक सङ्घर्ष के कथा-जगत हय। लेखक हुनकर रचना में समाज के अँधार परत के भेदयवला आलोचनात्मक प्रकाश देखै हथिन। 'चन्द्रग्रहण'में प्राकृतिक घटना पर अन्धविश्वास के आड़ में होय व्यभिचार आ ठगी उजागर हय; 'धर्मरत्नाकर'में राम किसन जइसन शोषित रैयत के हाहाकार आ धर्मरत्नाकर बाबू साहेब के पाखण्ड बेनकाब कैल गेल हय।
'जाड़ के पाला में ठिठुरै नाङट नेना', 'लाज झँपबा खातिर व्याकुल तरुणी', 'स्कूल के फीस खातिर दौड़ करै देश के भविष्य' — ई सब बिम्ब यथार्थवादी करुण-रस के तीव्र सम्प्रेषण हय। पाठक-प्रतिक्रिया-सिद्धान्त के दृष्टि से किरण के कथा के विस्फोट-क्षण — 'कल्पना के मचकी पर आस लगै काल यथार्थ से सरोकार छूटि जाएब' — के रमानन्द झा जे सूक्ष्मता से पकड़ै हथिन, ओ रूपवादी अपरिचितीकरण के बोध के परिचायक हय।
मार्क्सवादी दृष्टि से किरण सुविधा-सम्पन्न वर्ग आ श्रमजीवी वर्ग के अन्तर उजागर करै हथिन; दलित दृष्टि से सामाजिक प्रतिष्ठा के ब्राह्मणवादी निर्धारण प्रश्नाङ्कित होय हय; नारीवादी दृष्टि से स्त्री के जीवन खाली गृहस्थ आदर्श के उदाहरण न, स्वतन्त्र सामाजिक अनुभव के क्षेत्र बनै हय। किरण के कथा लोकमङ्गलवादी हय, मुदा उपदेश खाली न — पात्र के अन्तर्विरोध, विडम्बना आ सामाजिक असंगति कथा के जीवित बनावै हय। विदेह समान्तर इतिहास में किरण मिथिला के गौरवगान के बदला मिथिला के भीतर के विषमता देखाबै हथिन।
१६. मैथिली उपन्यास के आलोक में 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र
ई निबन्ध कृति के सबसे बेसी आधुनिक-आलोचनात्मक अध्याय हय आ मैथिली उपन्यास में स्त्री-पात्र के परिवर्तनशील रूपक अध्ययन करै हय। किरण के 'चन्द्रग्रहण' (१९३२) के रजनी आ सुषमा से लेके 'रूपा' (१९८८) तक नारी-पात्र के विकास-रेखा के रमानन्द झा समाज-सुधार-आन्दोलन के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जोड़के विश्लेषित करै हथिन — 'जइसन-जइसन परिवेश में सुधारात्मक-आन्दोलनात्मक चेतना प्रखर होय गेल, उपन्यास के चरित्र-निर्माण में ओकर प्रभाव पड़ै रहल।' ई साहित्य आ समाज के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध के उत्कृष्ट नव-ऐतिहासिकतावादी पाठ हय।
सामाजिक सुधार-आन्दोलन, शिक्षा आ आधुनिक चेतना के प्रभाव से 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र पारम्परिक मौनता छोड़के नूतन व्यक्तित्व ग्रहण करै हय। नारी के अन्तःकामना, प्रेम, विरह, देहबोध, निर्णय आ सामाजिक दायित्व कथा के सक्रिय अंग बनै हय; वातावरण आ नायिका के अन्तःस्थिति के समान्तर विन्यास मनोवैज्ञानिक गहराई पैदा करै हय। नारीवादी समीक्षा के दृष्टि से ई निबन्ध कृति के सबसे बेसी अग्रगामी हय — काहे कि रमानन्द झा पण्डित-वर्ग के ओ पाखण्ड के उघारै हथिन जकर 'समस्त उपदेश अनके खातिर' होय हय, आ जे मेला-ठेला में अपहृत नारी के भी शिक्षा से वञ्चित रखै हय। 'रचनाकार के व्यक्तित्व के आक्रामकता' के चरित्र-निर्माण में देखब — ई अभिव्यञ्जनावादी आलोचना हय। स्त्री के खाली त्यागमूर्ति वा कुलरक्षिका न, इच्छाशील आ विचारशील मनुष्य के रूप में देखे के ई प्रयास महत्त्वपूर्ण हय।
१७. प्रो॰ हरिमोहन झा आ हुनकर 'चर्चरी'
मैथिली के सबसे बेसी लोकप्रिय हास्य-व्यङ्ग्यकार हरिमोहन झा (१९०८–१९८४) के 'चर्चरी' एक विधा के पोथी न — ई संग्रह में कथा, एकाङ्की, छायारूपक, पत्र, दलान के गप्प, पोखरि के गप्प, प्रहसन आ सांस्कृतिक निबन्ध सम्मिलित हय। 'चर्चरी' के ई विविध-विधात्मक स्वरूप के व्यञ्जन-सम्मिलित 'चर्चरी' (भोज्य-पदार्थ) के रूपक से उद्घाटित करब — ई नामकरण-मूलक विश्लेषण चतुर हय। लेखक एकरा पारम्परिक कथा वा निबन्ध न, स्वतन्त्र गप्प-विधा के रूप में पहचानै हथिन — हुनकर रचना-संसार ('चर्चरी', 'खट्टर कका के तरंग', 'प्रणम्य देवता') मैथिली में गप्प-विधा के प्रवर्तन कैलक। हास्य-व्यङ्ग्य आ वक्रोक्ति के माध्यम से ओ थोथा पाण्डित्य, रूढ़िवाद आ सामाजिक पाखण्ड पर प्रहार कैलथिन। हुनकर 'पाँच पत्र' जइसन रचना रस-सिद्धान्त के दृष्टि से करुण रस के उत्कृष्ट निदर्शन हय, जे पति-पत्नी के बदलै रागात्मक सम्बन्ध आ युग-बोध के मार्मिक रूप में प्रस्तुत करै हय; 'रेल के झगड़ा' जइसन प्रहसन में आधुनिक शिक्षा के वायु से सिहकल परिवार के हास्यपूर्ण चित्रण हय।
हरिमोहन झा के सबसे बड़ उपलब्धि मैथिली में विशाल पाठक-समुदाय के निर्माण हय। मैथिल समाज के हास्यप्रिय संस्कार के ओ साहित्यिक रूप देलथिन आ पाठक के साहित्य दिस आकर्षित कैलथिन। भारतीय हास्यरस आ पाश्चात्य व्यङ्ग्य-दृष्टि ई रचना में एकत्र होय हय; गप्प के मिश्रित विधागत स्वरूप लोक के मौखिक कथन, शास्त्रीय विनोद आ आधुनिक मुद्रित साहित्य के बीच सेतु बनावै हय।
साथे ई निबन्ध संग्रह के सबसे बेसी असहमति-प्रधान निबन्ध में एक हय। रमानन्द झा हरिमोहन झा-जइसन कैननी लेखक के सीमा के निर्भीकता से रेखाङ्कित करै हथिन — 'अधिकांश रचना पढ़ला पर विचार के उन्मेष न होय हय, वैचारिक मन्थन न होय हय, खाली गुदगुदी लगै हय, एक बेर हँसा गेला पर ओकर प्रभाव बिला जाय हय।' ई कैनन-केन्द्रित मूल्याङ्कन के विरुद्ध विदेह-प्रतिमान के पुनर्मूल्याङ्कन-साहस के अग्रदूत हय — लोकप्रियता के साहित्यिक श्रेष्ठता के पर्याय न मानब।
१८. कविवर यात्री के स्तम्भ-लेखन
यात्री (नागार्जुन) के स्तम्भ-लेखन के साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित करै रमानन्द झा मैथिली पत्रकारिता आ साहित्य के अन्तःसम्बन्ध के उद्घाटित करै हथिन। प्रारम्भिक पत्र-पत्रिका के उद्देश्य मातृभाषा-सेवा आ सामाजिक कुरीति के निदान हल; पाठकीय स्तम्भ लेखक, सम्पादक आ पाठक के बीच वैचारिक संवाद स्थापित करै हल। 'यत्र तत्र सर्वत्र', 'यत्किंचित' आ 'चिन्तन-अनुचिन्तन' जइसन स्तम्भ में यात्री राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था, भाषा आ संस्कृति पर तात्कालिक टिप्पणी करै हथिन; 'चोआ-काका' जइसन व्यङ्ग्य-पात्र के विकास तक विश्लेषण ई निबन्ध में हय। यात्री के 'तेज दृष्टि के सीमा-रेखा से छोट से छोट घटना के बाहर न रहब' — ई व्यङ्ग्यकार के सर्वग्राही दृष्टि के स्वीकृति हय।
यात्री अपन स्तम्भ के माध्यम से शासक वर्ग के वाक्जाल, मिथिलाञ्चल के आर्थिक उपेक्षा आ भाषा-साम्राज्यवाद के तीक्ष्ण आलोचना कैलथिन। ओ हिन्दी के सम्पर्कभाषा के सम्मान देतो ओकर नाम पर मैथिली आ आन भाषा के अधिकार छीने के विरोध करै हथिन। स्तम्भ के भाषा तीक्ष्ण, व्यङ्ग्यपूर्ण, संवादात्मक आ पात्रप्रधान हय। विधा-विस्तार के दृष्टि से ई निबन्ध साहित्येतिहास के अखबारी गद्य दिस उन्मुख करै हय आ मैथिली गद्य में राजनीतिक व्यङ्ग्य आ सामाजिक चिन्तन के एकगो नव प्रतिमान रेखाङ्कित करै हय।
१९. कविवर आरसी
आरसी प्रसाद सिंह (जन्म १९११ ई॰) मैथिली आ हिन्दी दुनो भाषा में सर्जन करै हलथिन, मुदा मैथिली में हुनकर मुख्य परिचय गीतकार के हय। 'शेफालिका', 'माटि के दीप', 'पूजा के फूल' आ 'सूर्यमुखी' के माध्यम से हुनकर काव्य-यात्रा राष्ट्रीयता, प्रकृति, प्रेम, सामाजिक चेतना आ जन-अधिकार तक विस्तृत होय हय। हुनकर प्रारम्भिक गीत में राष्ट्रीय एकता, स्वाधीनता, त्याग आ भारतीय समन्वित संस्कृति के स्वर हय — ओ नव युग के नव निर्माण आ कोटि-कोटि भारतवासी के ऐक्य-सूत्र में बाँधे के आह्वान करै हथिन; बाद के कविता में मिथिला के शोषण, भाषिक अधिकार, बाढ़, राजनीतिक भ्रष्टाचार आ जनाक्रोश मुखर होय हय।
रूपवादी दृष्टि से आरसी के विशेषता गीतात्मकता, बिम्ब, अनुप्रास, इन्द्रियबोध आ कोमल भावप्रवाह हय। ई निबन्ध के विशेष शक्ति इन्द्रियबोध-विश्लेषण में हय — हरसिंगार आ सुमन में रस-गन्ध, पवन में स्पर्श, सुरभि-धार में रस-गन्ध-नाद के सम्मिश्रण — ई विभिन्न इन्द्रियबोध के सम्मिश्रण-विश्लेषण पाश्चात्य आधुनिक काव्य-समीक्षा के परिष्कृत उपकरण छी; भारतीय दृष्टि से ई गुण-रीति (माधुर्य-गुण) आ अलङ्कार-विवेचन के क्षेत्र हय। 'शेफालिका' से 'सूर्यमुखी' तक यात्रा वैयक्तिक सौन्दर्यचेतना से सामाजिक चेतना ओर बढ़ै कवि के विकास हय।
२०. उपेन्द्र ठाकुर 'मोहन' आ हुनकर कविता
संग्रह के बहुत विस्तृत निबन्ध में से ई एक 'आयल वसन्त' के अमर गीतकार मोहन के समर्पित हय। मोहनजी के कविता स्मृति, प्रकृति, वसन्त, गीतात्मकता आ जीवन-सङ्घर्ष के सम्मिलित संसार हय। 'आयल वसन्त' जइसन गीत पीढ़ी-दर-पीढ़ी कण्ठस्थ रहल, जे से कविता पाठ्यपुस्तक के बाहर जीवित सामुदायिक स्मृति बनल। रमानन्द झा इहाँ आत्मकथात्मक शैली — छात्र-जीवन में श्रीरामचन्द्र बाबू के कक्षा में गीत-श्रवण, 'मिहिर'-कार्यालय में मोहन के अनवरत कर्मशीलता के स्मरण — अपनावै हथिन, जे समीक्षा के संस्मरणात्मक आत्मीयता दे हय।
मोहन के मातृभाषा-प्रेम — 'घर के गोसाउनि झँखथि अन्हारेँ, मन्दिर बारब दीप?', 'गाम नोत न, नोत बेलाही' — क माध्यम से भाषिक अस्मिता के तीक्ष्ण चेतना उद्घाटित होय हय। 'जब मैथिली सूप के भाँटा भेल संकटापन्न, की राष्ट्रीयता? देश-भक्ति की?' — ई पदावली भाषा आ राष्ट्रीयता के अन्तःसम्बन्ध के प्रश्नाङ्कित करै हय।
मोहनजी के जीवन आर्थिक अभाव, शिक्षा के संघर्ष, प्रवास, रोजगार-अभाव आ मुद्रणालय के श्रम से बनल। ई कारण हुनकर कविता खाली प्रकृति के माधुर्य न, श्रमशील जीवन के भीतर सौन्दर्य बचावे के प्रयत्न हय। विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि से मुद्रणालय के प्रूफ-संशोधक भी साहित्येतिहास के निर्माता हथिन — ओ खाली दोसर के पोथी सुधारै न, अपन समय के भाषिक रूप, वर्तनी आ साहित्यिक संस्कृति के संरक्षक बनै हथिन।
२१. शुद्धतावादी कथाकार उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास'
उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' (जन्म १९१७ ई॰) मैथिली भाषा के शुद्ध, देशज आ स्वाभाविक रूपक पक्षधर कथाकार हथिन। 'विडम्बना' आ 'भजना भजले' के विवेचन में रमानन्द झा मात्रा बनाम गुणवत्ता के सैद्धान्तिक प्रश्न उठावै हथिन — 'ढाकी के-ढाकी लिखेले पर अगर कोनो जीवन-मूल्य स्वीकृत न होके सकल ... त जीवन-कालहि में रचनाकार अप्रासङ्गिक घोषित हो जाय हय।' ई रूपवादी गुणवत्ता-केन्द्रित मूल्याङ्कन हय; व्यास के कथा के 'बासितेवासि न, टटका बनल रहब' — कालातीत ताजगी — क कसौटी कालातीत-मूल्य के अवधारणा से मेल खाय हय।
हुनकर कथा भाषा-प्रयोग, सामाजिक व्यङ्ग्य, नैतिक विडम्बना आ ग्रामजीवन के जीवित संवाद के कारण विशिष्ट हय। शुद्धतावाद हुनका खातिर खाली शब्द के छनोट न, सांस्कृतिक प्रतिरोध हय — बाहरी भाषिक प्रभाव के बीच मैथिली के अपन वाक्य-विन्यास, लोकोक्ति, उच्चारण आ भावभूमि बचायब मातृभाषा के अस्मिता बचायब हल। रूपवादी दृष्टि से हुनकर कथा-भाषा पात्र के सामाजिक स्तर आ मानसिकता निर्माण करै हय; उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से भाषिक शुद्धता के आग्रह स्वाभिमान के प्रतीक हय।
२२. पं॰ राजेश्वर झा: व्यक्तित्व ओ कृतित्व
राजेश्वर झा (१९२२–१९७७) शोधकर्ता, नाटककार, कथाकार, सम्पादक, प्रकाशक आ संस्थापक के रूप में बहुत सक्रिय हलथिन। हुनकर कृति के अनुसन्धानपरक, ऐतिहासिक-पौराणिक आ सर्जनात्मक तीन वर्ग में बाँटल गेल हय — 'मिथिलाक्षर के उद्भव ओ विकास', 'मैथिली साहित्य के आदिकाल', 'अवहट्ट के उद्भव ओ विकास' आदि हुनकर शोधपरक कृति हय। ई विवेचन में रमानन्द झा एक गम्भीर पद्धतिगत घोषणा करै हथिन — 'साहित्यकार के व्यक्तित्व के बूझब सबसे पहिने जरूरी हय, बिना व्यक्तित्व बूझने कृतित्व के तह में जाएब सम्भव न।' ई जीवनीमूलक समीक्षा के साफ प्रतिपादन हय। राजेश्वर बाबू के आर्थिक विपन्नता के रहतो प्रतिवर्ष पोथी-प्रकाशन आ लोक के लिखे के खातिर प्रेरित करब — ई प्रेरक भूमिका के रमानन्द झा कृतित्व से बेसी मूल्यवान् मानै हथिन ('तराजू के पलरा पर व्यक्तित्व भरिगर होके जएतनि')। संस्था-निर्माता के ई मूल्याङ्कन विदेह-आन्दोलन के संस्था-केन्द्रित दृष्टि के पूर्वाभास हय।
अध्याय के विशेषता ई हय कि लेखक प्रशंसा पर रुकै न। राजेश्वर झा के साहित्येतिहास के काल-विभाजन, ईसापूर्व सहस्राब्दी से मैथिली साहित्य के आरम्भ आ अवहट्टसम्बन्धी अनेक निष्कर्ष के प्रमाणहीन कहै हथिन। औचित्य आ ऐतिहासिक पद्धति के दृष्टि से ई अध्याय 'अखियासल' के सबसे बेसी सन्तुलित आलोचना में से एक हय — व्यक्ति के श्रम के सम्मान आ हुनकर निष्कर्ष के कठोर परीक्षण एकसाथ सम्भव हय।
२३. ललित के कथा में परिवेश के संक्रान्त जीवन
ललित के कथा के रमानन्द झा स्वातन्त्र्योत्तर मोहभङ्ग के साहित्यिक दस्तावेज के रूप में व्याख्यायित करै हथिन — स्वतन्त्रतापूर्व आशा आ स्वतन्त्रतापरान्त मोहभङ्ग के बीच के संक्रमण: 'आशा के किरण निराशा में बदलि गेलै के, लाबनि टूटि के खसि पड़लै के।' प्रथम निर्वाचन में धुरफन्दी, स्वार्थान्धता, धन, जाति आ जातिवाद के नग्न-नाच, नकली नेता, गरीब मतदाता आ भ्रष्ट विकास-योजना — ई सब सामाजिक परिवेश के यथार्थ बनै हय। ई मार्क्सवादी-यथार्थवादी समीक्षा के उत्कृष्ट प्रयोग हय, जे साहित्य के राष्ट्रीय-राजनीतिक यथार्थ के संक्रमणशील प्रतिबिम्ब मानै हय।
मार्क्सवादी दृष्टि से 'प्रतिनिधि' जइसन कथा सुविधा-भोगी शासक वर्ग आ अधिकार-विहीन गरीब के द्वन्द्व उद्घाटित करै हय — श्रम के हीन बुझनिहार शिक्षित युवक अन्त में शारीरिक श्रम के महत्त्व स्वीकारै हय। 'लड़ाइ'-कथा में द्वैध-मानसिकता आ दू पीढ़ी के वैचारिक स्तर आ दायित्वबोध के विश्लेषण हय। 'रमजानी', 'मृत्युञ्जय', 'ओभरलोड', 'दू चित्र' आदि कथा में परम्परा-विघटन, रोजगार-संकट, धार्मिक पाखण्ड, देहगत आवश्यकता, अस्तित्वगत भार आ सामन्ती मानसिकता के अवशेष हय।
२४. धीरेन्द्र के कथा के सामाजिक सन्दर्भ
अध्याय सामाजिक सन्दर्भ के सैद्धान्तिक व्याख्या से आरम्भ होय हय आ एमें रमानन्द झा अपन सबसे बेसी परिष्कृत सैद्धान्तिक प्रतिपादन प्रस्तुत करै हथिन — 'सामाजिकता हय समाजरूपी नेहाइ पर पीटि तैयार रूपाकृति; नेहाइ हय व्यक्ति-मन आ सामाजिक-मन के द्वन्द्व।' ई व्यक्ति-मन बनाम सामाजिक-मन के द्वन्द्वात्मक सिद्धान्त कृति के बौद्धिक शिखर हय — जे मार्क्सवादी द्वन्द्ववाद आ मनोविश्लेषणात्मक समीक्षा के संगम से निर्मित हय। लेखक के वैयक्तिक अनुभव तब सामाजिक बनै हय जब पाठक के सुप्त अनुभव के जागृत के सामूहिक मन के प्रतिनिधित्व करय — रचनाकार के अनुभव के 'समाज के अनुभव होके पएब, समाज के दर्पण होके पएब' कला के प्रतिबिम्ब-सिद्धान्त के सुस्पष्ट मैथिली अभिव्यक्ति हय।
धीरेन्द्र के कथा में शिक्षित बेरोजगारी, सिफारिश, भ्रष्ट नियुक्ति, सत्य के अवमूल्यन, गरीब के श्रम के अपहरण आ वर्गीय शोषण के चित्र हय। 'मनुख बिकाय' आ 'गीध' के प्रतीक आधुनिक समाज में मनुष्य के वस्तुकरण आ शक्तिशाली द्वारा निर्बल के भक्षण व्यक्त करै हय — मार्क्सवादी दृष्टि से 'गीध' पूँजी आ सत्ता द्वारा श्रमजीवी शरीर के उपभोग के रूपक हय। साधारणीकरण के दृष्टि से बेरोजगार युवक के निजी वेदना देश के लाखों युवक के वेदना बनै हय। धीरेन्द्र के कथा के 'आँखि के डबडबाएब' के समान-तत्त्व आ शिल्प के रूप में विवेचित करब सूक्ष्म रूपवादी अवलोकन हय, यद्यपि इहाँ समीक्षक भावुकता आ शिल्प के भेद-रेखा पर अपन असमंजस खुद स्वीकार करै हथिन।
२५. प्रभास के कथा-यात्रा
संग्रह के अन्तिम आ सबसे बेसी दीर्घ निबन्ध प्रभास कुमार चौधरी (जन्म १९४१ ई॰) के समर्पित हय। रमानन्द झा इहाँ एक व्यापक प्रभाव-अध्ययन करै हथिन — मैथिली कथा पर संस्कृत, अंग्रेजी आ बङ्गला, तीन साहित्य के प्रभाव के विश्लेषण। ई तुलनात्मक साहित्य के पद्धतिगत प्रयोग हय, जे संग्रह के ऐतिहासिक वर्णन से उठाय सैद्धान्तिक तुलना के स्तर पर ले जाय हय।
प्रभास के दू दशक के कथा-यात्रा के क्रमिक यात्रा मानके लेखक हुनकर जीवन-दृष्टि, सामाजिक चेतना आ कथन-पद्धति में भेल परिवर्तन के परीक्षण करै हथिन — कथाकार के 'घर से चलके, गाम में घूमके, क्रमशः भावगत निर्लिप्तता आ निष्क्रियता-बोध तक पहुँचब' के विकास-रेखा। आर्थिक विपन्नता, समाज के स्वार्थ, गरीब के उपेक्षा आ तथाकथित सम्भ्रान्त वर्ग के अमानवीयता हुनकर कथा के मुख्य विषय बनै हय। प्रभास के कथा-यात्रा व्यक्ति-केन्द्रित अनुभव से व्यापक सामाजिक संरचना दिस बढ़ै हय — पात्र प्रारम्भ में परिस्थिति के शिकार बुझाय हय, मुदा धीरे-धीरे शोषण के संरचना के पहचानय लगै हय। ई लेखकीय चेतना के विकासात्मक अध्ययन समीक्षक के परिपक्व दृष्टि के द्योतक हय। संग्रह के समापन ई आधुनिकतम कथाकार पर होएब 'प्रथम' से 'समकालीन' तक यात्रा के पूर्ण करै हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से प्रभास के कथा इतिहास के विजय-घोष न, उपेक्षित मनुष्य के दैनिक पराजय, संघर्ष आ आत्मरक्षा के इतिहास लिखै हय।
उत्तरार्ध: अध्यायवार सीमा, अन्तर्विरोध आ अपूर्णता
ई मूल्याङ्कन के दोसर आधा भाग पूरा तरह से 'अखियासल' के सीमा, दुर्बलता आ पद्धतिगत संकट के समर्पित हय। ई आलोचनात्मक कठोरता कोनो अवमूल्यन न, बल्कि कृति के ऐतिहासिक महत्त्व के गम्भीर स्वीकृति के अनिवार्य अंग हय — एक अग्रगामी ग्रन्थ के सीमा के निर्मम विवेचन उपरान्तहि ओकर उत्तराधिकारी प्रयास अपन दिशा निर्धारित के सकै हय।
१. श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा' अध्याय के सीमा
'चन्द्रप्रभा' के प्रथम कथा-संग्रह माने के तर्क महत्त्वपूर्ण हय, मुदा उपलब्ध पाण्डुलिपि अपूर्ण हय। पूरा पाठ, रचनाकाल, पाठान्तर आ लेखक के अन्तिम रूपक अभाव में 'प्रथम' पद सावधानी से देल जाएबा के चाही। अध्याय ऐतिहासिक महत्त्व पर बेसी केन्द्रित हय; कथा सब के पृथक कथानक, चरित्र, कथावाचक, समय-विन्यास आ भाषिक संरचना के निकट परीक्षण कम हय। संस्कृत नीति-कथा परम्परा से समानता देखावल गेल हय, मुदा समानता, प्रभाव, रूपान्तरण आ मौलिकता के साफ भेद सर्वत्र न राखल गेल। साथे, विदेह-दृष्टि से ई भी कहल जा सकै हय कि 'चन्द्रप्रभा' के कथा-संसार मुख्य रूप से संस्कृत ग्रन्थ के छाया में पलल-बढ़ल हय; एमें जमीनी लोक-जीवन आ वञ्चित वर्ग के यथार्थवादी चित्रण के अभाव हय, आ नीति-उपदेश के प्राधान्य रस-निष्पत्ति में बाधक बनै हय। आरम्भिक होय के गौरव कृति के कलात्मक सीमा के ओझल न करे के चाही।
२. जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर' अध्याय के सीमा
अध्याय 'रामेश्वर' के प्रथम मौलिक उपन्यास सिद्ध करे के दिशा में प्रबल हय, मुदा 'प्रथम' के प्रमाण खातिर समकालीन प्रकाशन-सूची, विज्ञापन, पाण्डुलिपि आ आन सम्भावित उपन्यास के व्यवस्थित तुलना अपेक्षित हल। रामेश्वर के अपराध के सामाजिक विवशता से व्याख्यायित करब युक्तिसंगत हय, मुदा पत्नी पर अविश्वास, हिंसक प्रवृत्ति आ डकैती में सक्रिय सहभागिता के नैतिक उत्तरदायित्व कम प्रश्नाङ्कित भेल हय। अन्त में पुत्र से पुनर्मिलन आ चरित्र-परिवर्तन बहुत आकस्मिक हय — मनोवैज्ञानिक रूपान्तरण के क्रमिक प्रक्रिया अनुपस्थित रहने समाधान अतिनाटकीय बुझाय हय। मार्क्सवादी निकष पर भी ई कहल जा सकै हय कि अन्त में उपन्यासकार रामेश्वर के हृदय-परिवर्तन करा के वर्ग-संघर्ष के एकगो नैतिक आदर्शवाद में बदल दे हथिन — क्रान्ति के सम्भावना के सुधारवाद के पानि से निझा देल जाय हय। स्त्री-पात्र पार्वती के पीड़ा हय, मुदा हुनकर स्वाधीन दृष्टि सीमित हय।
३. 'सुमति' अध्याय के सीमा
अध्याय पूर्ववर्ती आलोचक के मत के संग संवाद करै हय, मुदा 'सुमति' के पूरा कथानक, पात्र-संरचना, दृष्टिबिन्दु आ भाषा-विन्यास के पर्याप्त प्रत्यक्ष विश्लेषण न करै हय। ऐतिहासिक महत्त्व आ 'सफल आधुनिक उपन्यास' होय के दावा बीच तनाव हय — जब कथानक असंगठित, चरित्र अस्पष्ट आ प्रस्तुति अपरिपक्व हय, तब 'सफलता' के कसौटी साफ होय के चाही। नारीवादी दृष्टि से एकगो गम्भीर प्रश्न ई जे सुमति के शिक्षा के एकमात्र उद्देश्य देखावल गेल हय — खसै सासुर के सम्हारब आ परिवार के कर्ज से मुक्त करब; इहाँ नारी के अपन कोनो स्वतन्त्र सत्ता वा आकाङ्क्षा न हय, ओ पितृसत्तात्मक परिवार के उद्धारक के भूमिका तक सीमित हय। 'उचित वक्ता' रूप में कथावाचक के बेर-बेर हस्तक्षेप उपन्यास के संरचनात्मक स्वायत्तते के खण्डित करै हय, जकरा जयकान्त मिश्र 'अपरिपक्व शिल्प' कहने हथिन; भाषा निबन्धात्मक हय, जे में तुलसीदास के चौपाइ के भरमार हय — ई काव्य-दोष हय। सामाजिक सुधार के विषय अपनहीं कलात्मक श्रेष्ठता के प्रमाण न — कथा-वस्तु महत्त्वपूर्ण रहितो ओकर प्रस्तुति, चरित्रगत जटिलता आ आन्तरिक अनिवार्यता समान रूप से जरूरी हय।
४. 'निर्दयी सासु' अध्याय के सीमा
कथा स्त्री-उत्पीड़न के प्रश्न उठावै हय, मुदा सासु के 'निर्दयी' खलपात्र बनाओला पर पितृसत्ता के व्यापक संरचना व्यक्तिगत क्रूरता में सीमित हो सकै हय। सासु खुद कोन सामाजिक दबाव, आर्थिक भय, विवाह-व्यवस्था आ प्रतिष्ठा-बोध के उत्पाद हथिन — ई प्रश्न के पर्याप्त विवेचन न हय। पुतोहु के चरित्र करुणा के पात्र बनै हय, मुदा ओकर प्रतिरोध, इच्छाशक्ति, स्त्री-समुदाय के सहयोग आ वैकल्पिक जीवन-सम्भावना कम विकसित हय — नायिका शारदा पूरा कथा में प्रायः मूक हय, आ वञ्चित-विमर्श के यक्ष प्रश्न — की उपाश्रित बाज सकै हय? — इहाँ पूरा तरह से प्रासङ्गिक हय। एकाङ्गी आ सपाट चरित्र-निर्माण संरचनावादी दृष्टि से भी सीमा हय। नारीवादी दृष्टि से स्त्री के खाली पीड़िता बनाके भी प्रतिनिधित्व के सीमा हय।
५. बिसरल साहित्यसेवी जनार्दन झासम्बन्धी सीमा
अध्याय के अभिलेखीय उद्देश्य प्रशंसनीय हय, मुदा सीमित सामग्री पर आधारित जीवन-विवेचन कतको स्थान पर अनुमान पर निर्भर हय। 'जानकी परिणय' के सांस्कृतिक विवरण के चर्चा हय, मुदा काव्य के छन्द, भाषा, अलङ्कार, कथन-गति आ पात्र-निर्माण के विस्तार कम हय। विस्मृत लेखक के फेर प्रतिष्ठित करे के उत्साह में कृति के वास्तविक कलात्मक सीमा कहियो-कहियो गौण हो जाय हय — इतिहास में स्थान देब आ उच्च साहित्यिक मूल्य देब एके बात न।
६. त्रिलोचन झासम्बन्धी अध्याय के सीमा
लेखक खुद स्वीकार करै हथिन कि त्रिलोचन झा के सामग्री बिखरल आ कम उपलब्ध हय। ई कारण अध्याय जीवनीपरक पुनर्निर्माण बेसी, कृति-आधारित आलोचना कम बन जाय हय। मातृभाषा-प्रेम, संगठन आ समाजसेवा के प्रशंसा पर्याप्त हय, मुदा हुनकर विशिष्ट साहित्यिक शैली, भाषिक प्रयोग, विधागत क्षमता आ विचार के अन्तर्विरोध कम साफ हय। मिथिला के गौरव फेर प्राप्त करे के आह्वान कहियो-कहियो रोमानी अतीतवाद ओर जा सकै हय — समाज के वर्ग-भेद आ जाति-भेद के ओझरा खाली भावनात्मक एकता के आह्वान अव्यावहारिक बन सकै हय। प्राचीन गौरव के संग जातिगत विषमता, स्त्री-बहिष्कार आ सामाजिक रूढ़ि के आलोचना भी समान रूप से जरूरी हल।
७. यदुवरसम्बन्धी अध्याय के सीमा
यदुवर के राष्ट्रीय आ भाषिक चेतना पर बेसी बल देल गेल हय; काव्य के रूप, छन्द, ध्वनि, बिम्ब, वक्रोक्ति आ वैयक्तिक स्वर के विश्लेषण अपेक्षाकृत कम हय। मातृभाषा-जागरण के कविता कतको स्थान पर घोषणात्मक आ उपदेशात्मक हो सकै हय — 'जय जय जयति मैथिल जाति' जइसन पङ्क्ति में अभिधा के प्राधान्य हय, ध्वन्यार्थ कम — आ अध्याय प्रचारात्मकता आ काव्यात्मकता के अन्तर साफ न करै हय। 'मैथिल' समुदाय के एकरूप मानल गेल हय; जाति, वर्ग, लिङ्ग आ क्षेत्रानुसार मैथिल अनुभव के भिन्नता पर विचार कम हय। भाषिक अस्मिता सब मैथिल खातिर एके रूप में अनुभवित होय हय — ई मान्यता प्रश्नास्पद हय। आदर्शवाद के अतिरेक में मिथिला के सामन्ती व्यवस्था के ठोस आलोचना के अभाव भी एकगो सीमा हय।
८. द्विजवरसम्बन्धी अध्याय के सीमा
कवि-सेनानी के सक्रिय जीवन निश्चय महत्त्वपूर्ण हय, मुदा जीवनी के वीरता काव्य के स्वतन्त्र आलोचना पर भारी पड़ै हय। राजनीतिक सक्रियता अपनहीं उत्कृष्ट काव्य के प्रमाण न — कविता सब के भाषा, छन्द, प्रतीक, वैचारिक जटिलता आ कलात्मक स्थायित्व के बेसी निकट विश्लेषण जरूरी हल। राष्ट्रीयता के निर्विवाद लोकमङ्गल के मूल्य मानके खातिर गेल हय; राष्ट्रवाद के भीतर वर्ग, जाति, धर्म आ लैङ्गिक असमानता भी रह सकै हय। स्वदेशी आ चरखा के सामाजिक अर्थ हय, मुदा आधुनिक आर्थिक संरचना से ओकर सम्बन्ध आलोचनात्मक रूप से न खोलल गेल। 'छूतहर'में शोषित के बात हय, मुदा ई क्रान्तिकारी चेतना के बदला गान्धीवादी सुधारवादी परिधि तक सीमित रह जाय हय आ छन्द-बद्धता कहीं-कहीं यथार्थ के कुण्ठित करै हय।
९. कुमार गंगानन्द सिंहसम्बन्धी सीमा
लेखक खुद देखाबै हथिन कि कथाकार के कतको कथा लक्ष्य-प्रधान हय — पहिने नैतिक निष्कर्ष स्थिर होय हय, ओकर बाद पात्र आ घटना जोड़ल जाय हय। ई कारण कथा जीवन के स्वाभाविक जटिलता के बदला उदाहरण बन जाय हय। अनेक कथा में दीर्घ कालखण्ड, अनावश्यक मोड़, घटना के विस्तार आ अन्त में पूरा समाधान कथा-प्रभाव के कमजोर करै हय — लेखक भी 'विवाह' आ 'बिहाड़ि' के तन्तुवाय फलकि जाएब स्वीकारै हथिन। सामाजिक सुधार के आग्रह रहितो जाति-उन्मूलन आधा बाट पर रुक जाय हय — अस्पृश्यताविरोधी कथा दलित पात्र के पूर्ण सामाजिक समानता तक न ले जाय हय आ 'बिहाड़ि' के सुधार अन्त में उच्च वर्ग के अनुकम्पा पर निर्भर रहै हय। नव्य-न्याय के दृष्टि से 'पञ्च परमेश्वर'में विरुद्ध हेत्वाभास के स्थिति हय — एक ओर सुधार के बात आ दोसर ओर ग्राम-पञ्चायत के ई उपदेश जे "सामन्त आ जमीन्दार के आमोद-प्रमोद में व्याघात न करे के चाही" — सुधार के गप्प करै शोषक वर्ग के सुख-शान्ति के वकालत। स्त्री-पात्र के संख्या भी कम हय।
१०. हरिलतासम्बन्धी अध्याय के सीमा
ई निबन्ध के सीमा ई जे समीक्षक हरिलता के वैधव्य-जनित वेदना के खाली 'ईश्वरोन्मुखता' के कारण मानके ले हथिन, ओकर सामाजिक-आलोचनात्मक सम्भावना के अनदेखा के दे हथिन। एक सशक्त नारीवादी पाठ इहाँ सम्भव हल — बाल-विवाह, वैधव्य, स्त्री-शिक्षा के निषेध के विरुद्ध चोरा के अक्षर सीखे के संघर्ष — मुदा विवेचन मुख्य रूप से वैष्णव भक्ति तक सीमित रह गेल। मनोविश्लेषण के दृष्टि से ई प्रश्न भी उठै हय कि भक्ति इहाँ सामाजिक यथार्थ से पलायन के साधन त न बनल — भौतिक यन्त्रणा के आध्यात्मिक रहस्यवाद में रूपान्तरित के सामाजिक अधिकार के प्रश्न के स्थगित के देब। ई दुनो सम्भावित पाठ — भक्ति-रस के शास्त्रीय आस्वाद आ सामाजिक प्रतिरोध के अपठित सम्भावना — क बीच के तनाव के निबन्ध न खोलै हय।
११. श्यामानन्द झासम्बन्धी अध्याय के सीमा
अध्याय के शीर्ष के 'काव्य-वस्तु' हय आ लेखक साफ करै हथिन कि ओ कला-पक्ष के बदला वस्तु-पक्ष के अध्ययन करै हथिन। ई कारण छन्द, बिम्ब, ध्वनि, वाक्य-विन्यास, अलङ्कार आ शैली के उचित मूल्याङ्कन छूटि जाय हय। सांस्कृतिक पुनरुत्थान के विचार में 'आर्य संस्कृति' के आदर्शीकरण हय; ई संस्कृति के भीतर जाति, स्त्री-अधिकार आ सामाजिक बहिष्कार के प्रश्न कम उठै हय। विदेशी प्रभाव वा देवनागरी के प्रयोग के कतको स्थान पर षड्यन्त्र के रूप में देखल गेल हय — भाषिक परिवर्तन के जटिल सामाजिक, मुद्रणगत आ शैक्षिक कारण भी विचारणीय हल। व्यङ्ग्य कहीं-कहीं व्यक्तिगत आक्रोश आ नारा में बदलि जाय हय, जे से ध्वनि क्षीण होके जाय हय।
१२. लक्ष्मीपति सिंह आ पत्रकारितासम्बन्धी सीमा
अध्याय व्यक्तित्व के स्नेहपूर्ण स्मरण बेसी हय, पत्रकारिता के संस्थागत इतिहास कम। पत्रिका के प्रसार-सङ्ख्या, आर्थिक आधार, ग्राहक-वर्ग, वितरण-क्षेत्र, सम्पादकीय नीति आ पाठकीय प्रतिक्रिया सम्बन्धी तथ्य सीमित हय। महिला पाठिका, ग्रामीण ग्राहक, मुद्रक, वितरक आ सहयोगी लेखक के भूमिका साफ न होय हय। पत्रकारिता आ साहित्यिक सम्पादन के सीमा भी बेसी साफ होय के चाही — समाचार, विचार, साहित्य, संस्था-सूचना आ सामाजिक अभियान के पृथक कार्यप्रणाली के विश्लेषण कैल जा सकै हल। साथे, मैथिली पत्रकारिता के 'वैसाखी'पर ठाढ़ रहे के जे स्वीकृति हय, ओकर विश्लेषण में आर्थिक संकट पर जतना जोर हय, वैचारिक शून्यता आ सत्ता से प्रश्न करे के साहस के अभाव पर ओतना न।
१३. मधुप के गीत-साहित्य के सीमा
अध्याय मधुप के गीत के सामाजिक आ सांस्कृतिक उपयोगिता पर बल दे हय, मुदा धुन, मात्रा, ताल, गायन-परम्परा आ प्रदर्शन-सन्दर्भ के विस्तृत विश्लेषण कम हय। सावित्री, पतिव्रता आ गृहस्थ आदर्श के स्त्री-छवि पितृसत्तात्मक आदर्श के पुष्ट कर सकै हय — स्त्री के शिक्षा आ नैतिक सामर्थ्य के प्रशंसा हय, मुदा ओकर आत्मनिर्णय, इच्छा आ वैकल्पिक जीवन के प्रश्न सीमित हय। गीत के लोकप्रियता आ साहित्यिक स्थायित्व अलग-अलग कसौटी हय — कण्ठस्थता काव्य-मूल्य के महत्त्वपूर्ण संकेत हय, मुदा एकमात्र प्रमाण न।
१४. भट्टीकाव्य परम्परासम्बन्धी सीमा
संस्कृत भट्टीकाव्य आ मधुप के काव्य के बीच सम्बन्ध रोचक हय, मुदा प्रत्यक्ष पाठगत समानता, अनुकरण, रूपान्तरण आ स्वतन्त्र विकास के साफ प्रमाण बेसी चाही। शिक्षणपरक काव्य के परम्परागत निरन्तरता के रूप में देखब कतको भिन्न काल, भाषा आ पाठक-समुदाय के एकरूप बना सकै हय। व्याकरण वा अलङ्कार सिखावे के प्रयोजन कहियो काव्य के रसात्मक स्वतन्त्रता के सीमित करै हय — अध्याय ई तनाव के पर्याप्त कठोरता से न परखै हय। सबसे गम्भीर प्रश्न औचित्य-सिद्धान्त के — 'आत्मा के प्रतिकूल' रचना के 'व्यक्ति से बड़ समाज' के तर्क से उचित ठहराएब भाव-औचित्य के मूल-भङ्ग के प्रश्न अनुत्तरित छोड़के दे हय; प्रयोजन-प्रेरित रचना के सौन्दर्यशास्त्रीय स्थिति की हएत, ओ पर सैद्धान्तिक स्पष्टता न भेटै हय। विदेह ज्ञानमीमांसा के कठोरतम निकष पर त राज्याश्रय में लिखल 'कोबर गीत' दरबारी विवशता के द्योतक हय — जनभाषा के गीतकार जब राजस्तुति लिखय खातिर बाध्य कैल जाय हथिन, तब ज्ञानमीमांसीय साहस आ शब्द-प्रमाण दुनो आहत होय हय — यद्यपि रमानन्द झा के 'युगीन विवशता' के सहानुभूतिपूर्ण व्याख्या ई प्रकरण के ऐतिहासिक जटिलता के भी रेखाङ्कित करै हय।
१५. किरण के कथा-जगतसम्बन्धी सीमा
किरण के सामाजिक प्रगतिशीलता के प्रशंसा कतको स्थान पर कथा के औपचारिक विश्लेषण के पाछाँ छोड़के दे हय। कथानक, कथावाचक, दृष्टिबिन्दु, समय, मौन आ प्रतीक के विस्तार अपेक्षित हय। मार्क्सवादी वा सुधारवादी निष्कर्ष सब कथा पर समान रूप से लागू कइला पर रचना के अन्तर्विरोध, अस्पष्टता आ बहुअर्थकता घट सकै हय। किरण के 'मैथिल दृष्टि' कोन सामाजिक स्थान से बनै हय — ब्राह्मण, दलित, स्त्री, किसान वा नगरवासी सब के दृष्टि एक होय हय कि न — ई प्रश्न कम उठै हय। नव्य-न्याय के दृष्टि से 'चन्द्रग्रहण' के तर्क-पद्धति में सव्यभिचार हेत्वाभास के स्थिति देखल जा सकै हय — अन्धविश्वास के खण्डन खातिर 'विधर्मी द्वारा अपहरण' जइसन अतिनाटकीय आ साम्प्रदायिक रंगवला तर्क के सहारा — अगर अपहरण न होय, त की गङ्गा-स्नान-सम्बन्धी अन्धविश्वास उचित हल? तर्क के ई शिथिलता कथा के प्रगतिशील अभिप्राय के कमजोर करै हय।
१६. 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्रसम्बन्धी सीमा
स्त्री-पात्र के नूतनता पहचानल गेल हय, मुदा स्त्री के मूल्याङ्कन कतको स्थान पर त्याग, शील, प्रेम आ पारिवारिक दायित्व के परम्परागत कसौटी से होय हय। नायिका के कामना आ देहबोध के चर्चा हय, मुदा स्त्री के आर्थिक स्वतन्त्रता, सम्पत्ति-अधिकार, शिक्षा, श्रम आ सार्वजनिक जीवन में सहभागिता के प्रश्न सीमित हय। कथा-वाचक के पुरुष-दृष्टि आ पात्र के अपन स्वर में साफ अन्तर करब जरूरी हल — लेखकद्वारा स्त्री के बजाओल जाएब आ स्त्री के स्वतन्त्र आत्मकथन समान न।
१७. 'चर्चरी' अध्याय के सीमा
गप्प के स्वतन्त्र विधा माने के तर्क सर्जनात्मक हय, मुदा विधा के अनिवार्य लक्षण, सीमा, संरचना आ कथा-निबन्ध-प्रहसन से भेद व्यवस्थित रूप से निर्धारित न हय। हरिमोहन झा के हास्य कहियो सामाजिक विद्रूपता के सूक्ष्म परीक्षण के बदला पात्र के उपहास बन जाय हय — हास्य के लक्ष्य प्रायः कमजोर, ग्रामीण, स्त्री वा रूढ़िवादी पात्र बनला पर सत्ता-विरोधी व्यङ्ग्य के धार मन्द हो सकै हय। मार्क्सवादी दृष्टि से ई भी कहल गेल हय कि हरिमोहन झा समाज के ऊपरी सतह पर चोट करै हथिन — कर्मकाण्ड आ पण्डिताइ पर — मुदा सामन्ती आर्थिक आधार पर प्रहार न करै हथिन; खाली हँसी-ठट्ठा से समाज के गम्भीर घाउ के चिकित्सा असम्भव। लेखक खुद पूर्ववर्ती आलोचक के — प्रो॰ जयदेव मिश्र आ डा॰ जयकान्त मिश्र के — ई मत उद्धृत करै हथिन कि हरिमोहन बाबू पुरान मूल्य के त तोड़ देलथिन, मुदा कोनो नव आ रचनात्मक जीवन-मूल्य स्थापित न कर सकलथिन — ई वैचारिक शून्यता के प्रश्न उठावै हय, आ ई भी जे दोष खोजे के अत्यधिक आग्रह उदात्त सांस्कृतिक मूल्य के क्षति पहुँचावै हय आ विकल्प प्रस्तुत न करै।
१८. यात्री के स्तम्भ-लेखन के सीमा
स्तम्भ तात्कालिक घटना पर लिखल जाय हय, तेँ ओकर अनेक सन्दर्भ समय बीतला पर अस्पष्ट हो जाय हय; पूरा पत्रिका, समाचार आ पाठकीय प्रतिक्रिया बिना टिप्पणी के आशय अधूरा रह सकै हय। यात्री के प्रथम पुरुष के तीक्ष्ण स्वर स्तम्भ के जीवन्त बनावै हय, मुदा कतको स्थान पर व्यक्तिगत निर्णय, व्यङ्ग्य वा आक्रोश विश्लेषण पर भारी पड़ि सकै हय। स्तम्भ-लेखन के विधागत सीमा भी हय — तात्कालिक प्रतिक्रिया से आगाँ बढ़ि ई कोनो दीर्घकालीन सैद्धान्तिक विकल्प न दऽ पावै हय। तीनू स्तम्भ कम अवधि के खातिर चलल; ई कारण यात्री के स्तम्भ-चिन्तन के दीर्घकालीन विकासक्रम निर्धारित करब कठिन हय। उपलब्ध सामग्री के आलोचनात्मक सम्पादन आ कालानुक्रमिक प्रकाशन जरूरी हय।
१९. आरसीसम्बन्धी अध्याय के सीमा
आरसी के विशाल काव्ययात्रा के राष्ट्रीयता, मिथिला-प्रेम, सामाजिकता आ गीतात्मकता के प्रमुख सूत्र में समेटल गेल हय, मुदा चरणानुसार वैचारिक परिवर्तन के बेसी सूक्ष्म विश्लेषण सम्भव हल। प्रारम्भिक राष्ट्रीय कविता कहियो घोषणात्मक हय — प्रखर राष्ट्रवाद के शोर में कहीं-कहीं मिथिला के आन्तरिक वर्ग-संघर्ष आ सीमान्तकृत समाज के सूक्ष्म यथार्थ दबा जाय हय आ कविता प्रचार ओर झुकि जाय हय। मिथिला के प्राकृतिक सौन्दर्य के वर्णन आदर्शीकृत हय, जब यथार्थ में बाढ़, गरीबी आ पलायन भी समान रूप से वर्तमान हल। छायावाद आ रहस्यवाद के प्रभाव उल्लेखित हय, मुदा आरसी ई प्रभाव के कोना मैथिली अनुभव में रूपान्तरित करै हथिन, ओकर तुलनात्मक परीक्षण कम हय।
२०. मोहनजीसम्बन्धी अध्याय के सीमा
अध्याय संस्मरणात्मक आत्मीयता से भरल हय। ई आत्मीयता से व्यक्तित्व जीवन्त बनै हय, मुदा आलोचनात्मक दूरी घटै हय। जीवन-सङ्घर्ष, गरीबी आ उदार स्वभाव के वर्णन विस्तृत हय; काव्य-संग्रह, पाठान्तर, छन्द, बिम्ब, भाषा आ विचार-विकास के व्यवस्थित विश्लेषण अपेक्षाकृत कम। 'आयल वसन्त' के लोकप्रियता पूरा काव्य-व्यक्तित्व के प्रतिनिधि न हो सकै हय — कम प्रसिद्ध, कमजोर वा विचारात्मक कविता सब के परीक्षण रहितए मूल्याङ्कन बेसी सन्तुलित होय।
२१. उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास'सम्बन्धी सीमा
भाषिक शुद्धतावाद मातृभाषा-स्वाभिमान के साधन हो सकै हय, मुदा कठोर रूप में ओ भाषा-संकरता, नवशब्द, शहरी अनुभव आ बदलै बोलचाल के अस्वीकार कर सकै हय। भाषा जीवित समाज के संग बदलै हय — हरेक बाहरी शब्द अपवित्र आ हरेक पुरान शब्द शुद्ध न होय हय; शुद्धता के कसौटी के निर्धारित करत — ई प्रश्न जरूरी हय। कथाकार के भाषा-साधना के प्रशंसा हय, मुदा कथानक, चरित्र, मनोविज्ञान आ सामाजिक दृष्टि के सीमा पर समान विस्तार न — भाषा कथा-साहित्य के प्रमुख तत्त्व हय, मुदा एकमात्र तत्त्व न। साथे इहाँ एक आलोचनात्मक अन्तर्विरोध भी हय — रमानन्द झा व्यास के कथा के 'समसामयिक जीवन से विशेष प्रभावित न होएब' आ 'परिवर्तित युग-जीवन के विकृति से अप्रभावित रहब' के गुण मानै हथिन, जब कि अन्यत्र (गंगानन्द सिंह, चन्द्रग्रहण, ललित, धीरेन्द्र के विवेचन में) ओ यथार्थ-संवेदना आ परिवेश-सम्पृक्ति के सर्वोच्च मूल्य मानै हथिन — मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता के ई साफ प्रमाण हय, जकर विस्तृत विवेचन आगाँ पद्धतिगत सीमा में कैल गेल हय।
२२. राजेश्वर झासम्बन्धी अध्याय के सीमा
ई अध्याय खुद बहुत आलोचनात्मक हय, मुदा कतको स्थान पर खण्डन के स्वर अत्यधिक कठोर बन जाय हय। शोधकर्ता के ऐतिहासिक परिस्थिति, उपलब्ध स्रोत आ समय के पद्धतिगत सीमा भी ध्यान में राखल जा सकै हल। राजेश्वर झा के निष्कर्ष प्रमाणहीन हय — ई देखावल गेल, मुदा वैकल्पिक काल-विभाजन वा अवहट्ट-विकास के पूर्ण प्रतिमान प्रस्तुत न कैल गेल। व्यक्तित्व आ कृतित्व के परिचय के बाद त्रुटि-सूची विस्तृत हय; श्रेष्ठ शोध, उपयोगी सङ्कलन वा सफल नाटक के निकट पाठ कम हय। आलोचना खाली असहमति न, उपयोगी अंश के पुनर्स्थापन भी होय के चाही। साथे राजेश्वर झा के निधन के शोक-प्रसङ्ग में आत्मीयता-जनित भावुकता आलोचनात्मक दूरी के प्रभावित करै हय।
२३. ललित के कथासम्बन्धी अध्याय के सीमा
अध्याय सामाजिक, राजनीतिक, अस्तित्ववादी, लैङ्गिक आ धार्मिक अनेक प्रश्न एकत्र करै हय। ई विस्तार से कतको कथा के विशिष्ट रूप आ सौन्दर्य पाछाँ पड़ि जाय हय। यौनिक इच्छा के जैविक आवश्यकता कहके धार्मिक-नैतिक बन्धन से मुक्त करे के व्याख्या एकाङ्गी हो सकै हय — इच्छा सत्ता, सहमति, लैङ्गिक असमानता आ भावात्मक सम्बन्ध से भी जुड़ल हय। कथा सभ के युग के प्रत्यक्ष दस्तावेज मानल गेल हय; साहित्य यथार्थ के प्रतिलिपि न — चयन, कल्पना, प्रतीक आ कथन-दृष्टिद्वारा निर्मित रूप हय। लेखक आ पात्र के विचार में भेद जरूरी हय।
२४. धीरेन्द्र के कथासम्बन्धी सीमा
सामाजिक सन्दर्भ के सैद्धान्तिक प्रस्ताव महत्त्वपूर्ण हय, मुदा हरेक कथा के वर्ग-शोषण, बेरोजगारी आ सामाजिक अन्याय में सीमित करला पर रचना के मनोवैज्ञानिक, भाषिक आ प्रतीकात्मक स्तर घट सकै हय। 'गीध' के प्रतीक प्रभावशाली हय, मुदा प्रतीक के अनेक सम्भावित अर्थ के बदला एक निश्चित वर्गीय अर्थ पर बल देल गेल हय। कथा के भाषा, संवाद, मौन, कथा-वाचक के दूरी, अन्त के अनिश्चितता आ पाठकीय सहभागिता के बेसी विश्लेषण अपेक्षित हल। सामाजिक विषय के प्रासङ्गिकता स्वतः कलात्मक सिद्धि के प्रमाण न।
२५. प्रभास के कथा-यात्रा के सीमा
'यात्रा' शब्द क्रमिक विकास के भाव पैदा करै हय, मुदा हरेक लेखक के सर्जना सरल रेखा में आरम्भिक से परिपक्व ओर न बढ़ै हय — बाद के रचना सदैव पहिल से श्रेष्ठ हो, ई जरूरी न। जीवनी आ सामाजिक परिवेश के कथा-विकास के प्रमुख कारण मानल गेल हय; साहित्यिक प्रभाव, पत्रिका के सम्पादकीय नीति, पाठक-वर्ग, विधागत प्रयोग आ आत्मसमीक्षा के भूमिका कम साफ हय। प्रभास के चुनल कथा सब के आधार पर पूरा कथा-दृष्टि निर्धारित करब सीमित निष्कर्ष हो सकै हय — अप्रकाशित, दुर्लभ वा कम सफल कथा भी समग्र मूल्याङ्कन खातिर जरूरी हय।
पद्धतिगत संकट: समग्र सीमा के विस्तृत विवेचन
सीमा १: संकलनात्मक असंगति आ संरचनात्मक एकसूत्रता के अभाव
कृति के सबसे पहिने आ सबसे बेसी मौलिक सीमा ओकर उत्पत्ति-प्रक्रिया में निहित हय। ई पचीस निबन्ध सन् १९७२ से १९८९ तक विभिन्न पत्र-पत्रिका में विभिन्न अवसर पर, विभिन्न पाठक-वर्ग के ध्यान में रखके, स्वतन्त्र रूप में लिखल गेल हल। एकरा एकठाम रखके 'ग्रन्थ' बना देला से एक अन्तर्निहित असंगति पैदा होय हय — कहीं व्यक्तित्व-प्रधान (त्रिलोचन झा, राजेश्वर झा), कहीं कृति-प्रधान ('सुमति', 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र), कहीं विधा-प्रधान (स्तम्भ-लेखन), कहीं प्रवृत्ति-प्रधान (यदुवर, द्विजवर) समीक्षा। कोनो एकसमान सैद्धान्तिक ढाँचा समस्त निबन्ध के न बाँधै हय। फलतः पाठक के बेर-बेर सन्दर्भ-परिवर्तन करय पड़ै हय। रूपवादी दृष्टि से ई संरचनात्मक शिथिलता हय — ग्रन्थ में कोनो आरोह-अवरोह-युक्त तार्किक प्रगति न। अध्याय-क्रम प्रायः लेखक-जन्म के कालक्रम पर आधारित बुझाय हय, मुदा ई क्रम भी असंगत हय — किछु निबन्ध बहुत लघु, किछु बहुत दीर्घ, बिना कोनो घोषित तर्क के। एक सुनियोजित ग्रन्थ में जे भूमिका, पद्धति-कथन आ उपसंहार अपेक्षित होय हय, से एमें अनुपस्थित हय — हरेक निबन्ध के अन्त में खाली मूल प्रकाशन-स्रोत आ तिथि देल हय, जे संकलन के जोड़ा-जाड़ी प्रकृति के उघारि दे हय। अध्याय सब के विस्तार, पद्धति आ आलोचनात्मक गहराई समान न।
सीमा २: 'अनुपलब्धता' के आवर्ती स्वीकृति — समीक्षा के आधारभूत दुर्बलता
कृति के सबसे बेसी गम्भीर पद्धतिगत संकट ई जे लगभग हरेक प्रारम्भिक निबन्ध में समीक्षक खुद मूल रचना के 'अनुपलब्धता' के स्वीकार करै हथिन। 'चन्द्रप्रभा' के प्रसङ्ग में — 'चन्द्रप्रभा के अध्ययन-विश्लेषण नीक जइसन न कैल जा सकल हय, एकर प्रमुख कारण हय अनुपलब्धता'; त्रिलोचन झा के प्रसङ्ग में — 'बड़ कम सामग्री उपलब्ध हय'; यदुवर के प्रसङ्ग में — 'यदुवर के प्रसंग अद्यावधि बड़ कम अनुसन्धान भेल हय'; बिसरल जनार्दन झा के प्रसङ्ग में — 'पत्र-पत्रिको में जे रचना प्रकाशित भेल होयत, अब सर्वसुलभ न हय।'
इहाँ एक गहन विरोधाभास पैदा होय हय — अगर मूल कृति समीक्षक के खुद उपलब्ध न हल, त ओकर सौन्दर्यशास्त्रीय मूल्याङ्कन कोन आधार पर सम्भव? बहुत ठाम समीक्षा असल में द्वितीय के स्रोत पर — जयकान्त मिश्र के मैथिली साहित्येतिहास, करुणाकान्त झा के शोध-प्रबन्ध, आन समीक्षक के उद्धरण पर — आश्रित हो जाय हय। रमानन्द झा खुद स्वीकार करै हथिन कि अधिकांश परवर्ती समीक्षक के 'सामग्री के सीमा जयकान्त मिश्र के इतिहासे हय' — मुदा ई आरोप खुद हुनकहु पर आंशिक रूप में लागू होय हय। पाठ-केन्द्रित समीक्षा के दृष्टि से ई एक मौलिक दुर्बलता हय — पाठ बिना समीक्षा।
विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमान के दृष्टि से ई सीमा बहुत शिक्षाप्रद हय। समान्तर इतिहास के पहिल दायित्व अभिलेखीकरण आ पाठ-सुलभीकरण हय — मूल पाठ के डिजिटल/मुद्रित रूप में सर्वसुलभ केने बिना ओकर पुनर्मूल्याङ्कन असम्भव। रमानन्द झा ई आवश्यकता के बेर-बेर रेखाङ्कित त करै हथिन ('सर्वसुलभ भेले पर विशेष प्रकाश पड़ि सकत'), मुदा ओ खुद ओ अभिलेखीय कार्य के सम्पन्न न के पावै हथिन — काहे कि ओ डिजिटल-पूर्व युग में ई व्यक्तिगत श्रम से असम्भव-प्राय हल। इहे अभिलेखीय रिक्तता के विदेह-आन्दोलन अपन ई-पत्रिका, पोथी-संग्रह आ पञ्जी-अभिलेखीकरण से भरे के प्रयास करै हय। तात्पर्य — 'अखियासल' के सबसे बड़ सीमा इहे ओकर सबसे बड़ ऐतिहासिक सार्थकता हय: ई ओ रिक्तता के नामाङ्कित करै हय जकरा भरब परवर्ती पीढ़ी के दायित्व बन जाय हय।
सीमा ३: मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता आ आन्तरिक अन्तर्विरोध
गम्भीर सैद्धान्तिक दृष्टि से कृति के सबसे बेसी विचारणीय दोष ओकर मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता हय। रमानन्द झा एक निबन्ध में जे गुण के सर्वोच्च मानै हथिन, दोसर में ओकरे विपरीत के प्रशंसित करै हथिन —
(क) गंगानन्द सिंह, 'चन्द्रग्रहण' के नारी-पात्र, ललित आ धीरेन्द्र के विवेचन में समसामयिक यथार्थ-संवेदना, परिवेश-सम्पृक्ति आ युग-जीवन के प्रतिबिम्बन के सर्वोच्च मूल्य मानल गेल हय; मुदा व्यास के कथा के ठीक एही कारण से प्रशंसित कैल गेल जे ओ समसामयिक जीवन से विशेष प्रभावित न होय हय आ परिवर्तित युग-जीवन के विकृति से अप्रभावित रहै हय। ई प्रत्यक्ष आत्मविरोध हय — यथार्थ-सम्पृक्ति कखनियो गुण, कखनियो ओकर अभाव गुण।
(ख) हरिमोहन झा के हास्य के 'विचार के उन्मेष न करब' के कारणेँ न्यून मूल्य देल गेल, मुदा मधुप के गीत के 'तत्काल हृदय-प्रभाव' आ आनन्द के कारणेँ उच्च मूल्य देल गेल — जब कि गीत भी प्रायः वैचारिक मन्थन न, बल्कि भाव-तात्कालिकता पर आश्रित होय हय। तत्काल-प्रभाव कखनियो गुण (गीत), कखनियो दोष (हास्य)।
(ग) 'कोबर-गीत' जइसन आत्म-विरोधी, प्रयोजन-प्रेरित रचना के 'व्यक्ति से बड़ समाज' के तर्क से उचित ठहरावल गेल, मुदा क्षेमेन्द्र के औचित्य-विचार के दृष्टि से आत्मा के प्रतिकूल रचना भाव-औचित्य के मूल-भङ्ग हय — समीक्षक इहाँ सैद्धान्तिक स्पष्टता प्रदान न के पावै हथिन।
ई अस्थिरता एही कारण से हय कि रमानन्द झा कोनो एक घोषित सैद्धान्तिक प्रतिबद्धता न अपनावै हथिन। ओ प्रसङ्गानुसार कखनियो प्रभाववादी, कखनियो समाजशास्त्रीय, कखनियो जीवनीमूलक, कखनियो रूपवादी दृष्टि अपनावै हथिन। ई पद्धतिगत सारसंग्रहवाद एक ओर लचीलापन दे हय, त दोसर ओर मूल्याङ्कन के अप्रत्याशित आ असंगत बना दे हय।
सीमा ४: सैद्धान्तिक अनुशीलन के अभाव — शास्त्रीय शब्दावली के अनुपस्थिति
यद्यपि रमानन्द झा के समीक्षा में रस, ध्वनि, व्यञ्जना, औचित्य आदि भारतीय काव्यशास्त्रीय अवधारणा अन्तर्निहित रूप में विद्यमान हय, तबो ओ ई शास्त्रीय प्रतिमान के कहीं सुस्पष्ट सैद्धान्तिक उपकरण के रूप में प्रयोग न करै हथिन। 'व्यञ्जित', 'सम्प्रेषण', 'भावाश्रित' जइसन शब्द त आवै हय, मुदा आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, कुन्तक, क्षेमेन्द्र, भट्टनायक आदि आचार्य के नाम आ हुनकर सिद्धान्त के व्यवस्थित अनुप्रयोग अनुपस्थित हय। ओहिने, पाश्चात्य सिद्धान्त के कहीं नामोल्लेख वा सुविचारित प्रयोग न भेटै हय। एही से एक द्वैध स्थिति पैदा होय हय। एक ओर ई सैद्धान्तिक लाघव समीक्षा के सुपाठ्य, सम्प्रेषणीय आ पत्रकारीय-सुलभ बनावै हय — जे ओकर मूल प्रकाशन-सन्दर्भ (पत्रिका) के अनुकूल हल। मुदा दोसर ओर ई अकादमिक गहनता के अभाव पैदा करै हय। समीक्षा विवरणात्मक आ मूल्याङ्कनात्मक त हय, मुदा सैद्धान्तिक-विश्लेषणात्मक कम हय। एक समान्तर इतिहास के दीर्घकालिक वैधता प्रदान करबा खातिर जे सुदृढ़ सैद्धान्तिक आधार जरूरी होय हय, से एमें अविकसित रह जाय हय।
सीमा ५: परिप्रेक्ष्य के सीमा — पुरुष-केन्द्रिकता आ वर्ण-केन्द्रिकता
समाजशास्त्रीय आ उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से कृति के एक गम्भीर सीमा ओकर सामाजिक परिप्रेक्ष्य के संकीर्णता में हय। पचीस निबन्ध में चौबीस पुरुष-रचनाकार के समर्पित हय; खाली एक (हरिलता) स्त्री-रचनाकार के। ओहू में हरिलता के विवेचन मुख्य रूप से वैष्णव भक्ति तक सीमित रह जाय हय। स्त्री जादेकर पात्र वा प्रेरणा के रूप में उपस्थित हथिन, स्वतन्त्र लेखिका, सम्पादिका आ आलोचक के रूप में कम — स्त्री-लेखिका के स्वतन्त्र साहित्यिक इतिहास पर्याप्त विकसित न।
ओहिने, विवेचित प्रायः समस्त रचनाकार एक विशिष्ट सामाजिक स्तर से आवै हथिन। मिथिला के दलित, अतिपिछड़ा, अल्पसंख्यक आ लोक-परम्परा के — मौखिक साहित्य, गीत-नाद-परम्परा के अनाम रचयिता — रचनाकार ई समान्तर इतिहास से प्रायः अनुपस्थित रह जाय हथिन; जाति आ वर्ग के प्रश्न उठै हय, मुदा दलित समुदाय के आत्मस्वर सीमित हय। ई सीमा युग-सापेक्ष हय (जे उपलब्ध अभिलेख प्रायः उच्च-वर्ण के हल), तबो विदेह समान्तर-प्रतिमान के पूर्ण जनतान्त्रिक समावेशिता के कसौटी पर 'अखियासल' आंशिक रूप में अपूर्ण रह जाय हय। समान्तर इतिहास के अर्थ खाली बिसरल उच्चवर्णीय रचनाकार के पुनरुद्धार न, बल्कि समग्र हाशिया के — दलित, स्त्री, लोक, मौखिक — पुनःस्थापना हय; ई व्यापक अर्थ में रमानन्द झा के परियोजना एक आरम्भ खाली हय, पूर्णता न।
सीमा ६: पाठ-प्रामाणिकता आ सम्पादकीय अशुद्धि के प्रश्न
कृति में उद्धृत पद्यांश आ गद्यांश के पाठ-प्रामाणिकता सन्दिग्ध रह जाय हय। काहे कि खुद समीक्षक स्वीकार करै हथिन कि बहुतो रचना पत्र-पत्रिका में छितरायल आ अनुपलब्ध हय, तेँ उद्धृत अंश के मूल पाठ से तुलना-सत्यापन प्रायः असम्भव हल। परवर्ती सम्पादन आ मुद्रण-प्रक्रिया में ई पाठक शुद्धता आओर संकटग्रस्त हो सकै हय — उपलब्ध प्रति में वर्तनी-अस्थिरता आ मुद्रण-दोष भी विद्यमान हय। एक विश्वसनीय समान्तर इतिहास खातिर पाठ-समीक्षा आ आलोचनात्मक संस्करण के अनुशासन अनिवार्य हय, जकर अभाव ई आरम्भिक कृति में स्वाभाविक हय। 'प्रथम' आ 'मौलिक' जइसन पद खातिर बेसी कठोर पाठालोचन, पाण्डुलिपि-अध्ययन आ प्रकाशन-इतिहास जरूरी हय; निष्कर्ष अगर सीमित सामग्री पर आधारित हो, त अनुमान के प्रमाण के स्थान न लेवे के चाही।
सीमा ७: आत्मीयता-जनित प्रशंसा के अतिरेक आ आलोचनात्मक दूरी के अभाव
अनेक निबन्ध में — विशेषतः लक्ष्मीपति सिंह, मोहन आ राजेश्वर झा-सम्बन्धी अध्याय में — समीक्षक आ विवेच्य रचनाकार के बीच व्यक्तिगत आत्मीयता समीक्षा के संस्मरणात्मक श्रद्धाञ्जलि के रूप दऽ दे हय। मोहन के स्मरण, लक्ष्मीपति सिंह के विहुँसै आकृति के भावुक चित्रण, राजेश्वर झा के निधन के शोक — ई सब भावनात्मक रूप में मार्मिक त हय, मुदा एही से आलोचनात्मक दूरी भङ्ग होय हय। वस्तुनिष्ठ समीक्षा के दृष्टि से ई प्रशंसा-पूर्वाग्रह हय, जे मूल्याङ्कन के निष्पक्षता के प्रभावित करै हय। अपवाद-स्वरूप हरिमोहन झा-सम्बन्धी निबन्ध में समीक्षक जे आलोचनात्मक साहस देखाबै हथिन, से समस्त संग्रह में समान रूप में उपस्थित न हय। जीवनी कहीं-कहीं कृति के विश्लेषण पर आ विषयवस्तु रूप-सौन्दर्य पर भारी पड़ै हय।
सीमा ८: समान्तर इतिहास-प्रतिमान के अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण
अन्त में, विदेह समान्तर इतिहास-प्रतिमान के दृष्टि से सबसे बेसी मौलिक सीमा ई जे रमानन्द झा समान्तर इतिहास के अवधारणा के व्यवहार में त जीयै हथिन, मुदा ओकरा सिद्धान्त के रूप में स्पष्टतः प्रतिपादित न करै हथिन। 'दू कोटि के साहित्यकार' के सिद्धान्त एकर सबसे बेसी निकट हय, मुदा ओ मुख्यधारा के कैनन के — जयकान्त मिश्र के इतिहास के — विकल्प वा विरोध न, बल्कि ओकर पूरक बनि रह जाय हय। समीक्षक बेर-बेर जयकान्त मिश्र के प्रामाणिक आधार मानके हुनकहि सूचना पर आश्रित रहै हथिन, जब कि समान्तर इतिहास के असली दायित्व मुख्यधारा के कैनन के आधार-मान्यता के खुद प्रश्नाङ्कित करब हय। तात्पर्य — 'अखियासल' समान्तर इतिहास के सामग्री त प्रस्तुत करै हय, मुदा ओकर सैद्धान्तिकी अविकसित छोड़के दे हय। ई कैनन के विस्तारित करै हय, मुदा कैनन-निर्माण के शक्ति-संरचना के विखण्डित न करै हय। इहे ओ कार्य के रिक्तता हय जकरा विदेह-आन्दोलन अपन घोषित सैद्धान्तिकी, संस्थागत अभिलेखीकरण आ जनतान्त्रिक समावेशिता से पूर्ण करे के प्रयास करै हय।
साथे ई भी कहे के चाही जे मातृभाषा-प्रेम पोथी के ऊर्जा हय, मुदा कतको स्थान पर ई प्रेम सांस्कृतिक गौरववाद वा बाहरी प्रभाव के प्रति अत्यधिक संशय में बदलि जाय हय — जब कि भाषा सदैव सम्पर् के, मिश्रण आ परिवर्तन से विकसित होय हय; आ राष्ट्रीय वा सांस्कृतिक आस्था कहीं-कहीं प्रश्नरहित मूल्य बन जाय हय।
समग्र आलोचनात्मक निर्णय
पोथी के प्रमुख उपलब्धि
'अखियासल' के सबसे बेसी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हय — साहित्यिक इतिहास के विस्मृत स्थान सभ पर प्रकाश देब। ई पोथी पूछै हय —
मैथिली कथा के वास्तविक आरम्भ कतय से मानल जाय?
प्रभाव आ अनुवाद में की अन्तर हय?
'प्रथम' कृति निर्धारित करे के प्रमाण की हो?
दुर्लभ पाण्डुलिपि इतिहास से कोना बाहर हो जाय हय?
पत्रिका, सम्पादक आ प्रकाशक साहित्य निर्माण में की भूमिका निभावै हथिन?
राष्ट्रीय आन्दोलन में मैथिली साहित्यकार के योगदान काहे विस्मृत भेल?
हास्य के लोकप्रियता के भीतर सामाजिक अन्याय ओझल त न?
भाषिक शुद्धता आ भाषिक विकास के बीच कोन सम्बन्ध हय?
स्वतन्त्रता के बाद गरीब, बेरोजगार आ श्रमिक के जीवन काहे न बदलल?
साहित्यकार के वैयक्तिक अनुभव कोना सामाजिक अनुभव बनै हय?
ई प्रश्न पोथी के साधारण व्यक्तित्व-कृतित्व सङ्ग्रह से ऊपर उठावै हय।
भारतीय साहित्यशास्त्र के दृष्टि से
पोथी रस के सामाजिक विस्तार करै हय। करुणा खाली पात्र के दुःख पर आँसू बहायब न, दुःख के सामाजिक कारण खोजब हय। वीरता खाली रणभूमि में न, मातृभाषा-रक्षा, सत्य के पक्ष आ शोषण-विरोध में हय। हास्य खाली मनोरञ्जन न, सत्ता आ रूढ़ि के मुखौटा उतारे के साधन हय। ध्वनि-सिद्धान्त के अनुसार अनेक कृति के भीतर प्रत्यक्ष कथा से बेसी महत्त्वपूर्ण अप्रत्यक्ष सामाजिक अर्थ हय। औचित्य-सिद्धान्त लेखक के इतिहास के दावा, विधागत नामकरण आ चरित्र के विश्वसनीयता परखबा के आधार दे हय। मुदा शास्त्रीय निकष पर मुख्यधारा के अनेक आरम्भिक रचना के सीमा भी साफ होय हय — नीति आ उपदेशक भरमार से रसभङ्ग, अभिधा के प्राधान्य से ध्वनि के क्षय, आ नारा बनै कविता में वक्रोक्ति के विनाश।
पाश्चात्य सिद्धान्त के दृष्टि से
'अखियासल'में नव-इतिहासवादी आ मार्क्सवादी प्रवृत्ति विशेष प्रखर हय। साहित्य सत्ता, धन, जाति, भाषा, संस्था आ सामाजिक आन्दोलन से जुड़ल हय। ललित आ धीरेन्द्र के कथा-विवेचन अस्तित्वगत संकट, वर्गीय शोषण आ आधुनिक मनुष्य के निरर्थकता उद्घाटित करै हय। नारीवादी दृष्टि उपस्थित हय — विशेषतः 'निर्दयी सासु', 'सुमति' आ 'चन्द्रग्रहण' के विवेचन में — मुदा ओकर पूर्ण सम्भावना (जइसन हरिलता के प्रतिरोधी पाठ) अविकसित रह जाय हय। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से मातृभाषा-विमुखता, हिन्दी-अंग्रेजी के प्रभुत्व आ मैथिली के सार्वजनिक क्षेत्र से निष्कासन पोथी के स्थायी चिन्ता हय।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से
'अखियासल' मैथिली साहित्य के वैकल्पिक वंशावली बनावै हय। ई वंशावली में —
श्रीकृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्रप्रभा',
जीवछ मिश्र आ 'रामेश्वर',
रासबिहारी लाल दास आ 'सुमति',
जनसीदन आ बिसरल जनार्दन झा जइसन साहित्यसेवी,
त्रिलोचन झा जइसन मातृभाषानुरागी,
यदुवर आ द्विजवर जइसन जागरणकारी कवि,
हरिलता जइसन संघर्षशील कवीश्वरी,
लक्ष्मीपति सिंह जइसन सम्पादक,
मधुप आ मोहन जइसन गीतकार,
यात्री जइसन स्तम्भकार,
व्यास जइसन भाषिक शुद्धतावादी,
राजेश्वर झा जइसन संस्था-निर्माता,
किरण, ललित, धीरेन्द्र आ प्रभास जइसन सामाजिक कथाकार
— एके विस्तृत इतिहास में स्थान पावै हथिन। ई इतिहास मिथिला के राजवंश वा पाण्डित्य के केन्द्र खाली न मानै हय। ई मिथिला में भूखल बालक, अत्याचारित पुतोहु, बेरोजगार युवक, शोषित किसान, मातृभाषा-विहीन शिक्षित वर्ग, मुद्रणालय के श्रमिक आ विस्मृत सम्पादक सब उपस्थित हथिन।
उपसंहार: आरम्भ के गरिमा आ रिक्तता के उत्तराधिकार
'अखियासल' के महत्त्व अन्तिम निर्णय देबा में न, मैथिली साहित्य के इतिहास पर पुनर्विचार करबा में हय। ई पोथी प्रतिष्ठित इतिहास के सामने वैकल्पिक प्रश्न रखै हय। लेखक साहित्य के चमकै शिखर खाली न देखै हथिन; ओ नीचे दबाओल ईंट, टूटल पाण्डुलिपि, पुरान पत्रिका, भूखल पात्र, उपेक्षित भाषा आ विस्मृत साहित्यसेवी के भी देखै हथिन। पं॰ श्रीकृष्ण ठाकुर से लेके प्रभास कुमार चौधरी तक साहित्य में यथार्थवाद, राष्ट्रवाद आ समाज-सुधार के क्रमिक विकास दृष्टिगोचर होय हय, आ साथे — जब ई पूरा रचना-संसार के समान्तर इतिहास-दृष्टि, नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा आ पाश्चात्य-भारतीय काव्यशास्त्र के कठोर निकष पर कसल जाय हय — तब एकर ढाँचागत, वैचारिक आ सैद्धान्तिक सीमा भी उजागर होय हय: सामन्ती मानसिकता के अवशेष, सुधारवाद के सीमा, पितृसत्तात्मक पूर्वाग्रह आ वञ्चित वर्ग के प्रामाणिक स्वर के अभाव। साहित्य तखनहि पूरा तरह से समान्तर आ प्रामाणिक बन सकै हय जब ओ राज्याश्रय आ सामन्ती वर्चस्व से मुक्त होके, शोषित के यथार्थ के बिना कोनो हेत्वाभास के, पूर्ण ज्ञानमीमांसीय साहस के संग प्रस्तुत करय।
एकर श्रेष्ठता उहाँ हय जहाँ —
लेखक अभिलेख खोजै हथिन,
प्रचलित भूल सुधारै हथिन,
विस्मृत लेखक के फेर उपस्थित करै हथिन,
सामाजिक जीवन आ साहित्य के सम्बन्ध खोलै हथिन,
प्रशंसा करितो आलोचनात्मक दूरी रखै हथिन,
मातृभाषा आ जनजीवन के साहित्येतिहास के केन्द्र बनावै हथिन।
एकर सीमा उहाँ हय जहाँ —
अनुमान प्रमाण के स्थान ले हय,
जीवनी कृति के विश्लेषण पर भारी पड़ै हय,
विषयवस्तु रूप-सौन्दर्य के ढाँकि दे हय,
मूल्य-मानदण्ड अस्थिर हो जाय हय,
राष्ट्रीय वा सांस्कृतिक आस्था प्रश्नरहित मूल्य बन जाय हय,
स्त्री, दलित आ निम्नवर्ग के आत्मस्वर पर्याप्त स्वतन्त्रता न पावै हय।
समग्र मूल्याङ्कन के निष्कर्ष ई जे 'अखियासल' अपन युग के एक अग्रगामी, साहसी आ ऐतिहासिक दृष्टि से अपरिहार्य कृति हय, जकर मौलिकता ओकर सीमा से अभिन्न रूप में जुड़ल हय। एकर गुण — प्रथम-अन्वेषण के साहस, बिसरल रचनाकार के पुनरुद्धार, समाजशास्त्रीय अन्तर्दृष्टि, 'दू कोटि के साहित्यकार' के मौलिक सिद्धान्त, आ मैथिली साहित्येतिहास के व्यक्ति-केन्द्रित कैनन से मुक्त के जन-केन्द्रित बनावे के प्रयास — ई सब एकरा मैथिली आलोचना के एक कोसिला-प्रस्तर बनावै हय। साथे एकर सीमा — संकलनात्मक असंगति, मूल पाठक अनुपलब्धता, मूल्य-मानदण्ड के अस्थिरता, सैद्धान्तिक अनुशीलन के अभाव, परिप्रेक्ष्य के संकीर्णता, पाठ-प्रामाणिकता के संकट, आत्मीयता-जनित पूर्वाग्रह आ समान्तर इतिहास के अपूर्ण सैद्धान्तिकीकरण — ई सब कोनो व्यक्तिगत न्यूनता न, बल्कि ओ मुद्रण-सीमित, डिजिटल-पूर्व, संस्था-विहीन युग के संरचनात्मक बाध्यता के प्रतिफल हय।
इहे द्वैध — गुण आ सीमा के अभिन्नता — 'अखियासल' के विदेह समान्तर इतिहास-आन्दोलन के एक पूर्व-रूप बनावै हय। जे रिक्तता के रमानन्द झा नामाङ्कित करै हथिन — सर्वसुलभता, अभिलेखीकरण, पुनर्मूल्याङ्कन — ओ रिक्तता के भरब परवर्ती पीढ़ी के ऐतिहासिक दायित्व बन जाय हय। ई अर्थ में, कृति के सबसे बड़ सीमा इहे ओकर सबसे बड़ उत्तराधिकार हय। 'आँखि' ओ दृष्टि के हय कि बिसरल पाठ के देखे के साहस कैलक, आ 'साल' ओ युग के हय कि में ओ दृष्टि के पूर्ण करे के साधन अनुपलब्ध हल — 'अखियासल' नाम खुद ई द्वैध के व्यञ्जना करै हय। तबो मैथिली आलोचना आ साहित्येतिहास में 'अखियासल' के स्थान महत्त्वपूर्ण हय। ई पोथी इतिहास के बन्द कपाट खोलि कहै हय कि साहित्य के वास्तविक परम्परा खाली प्रसिद्ध नाम के सूची न — ओ स्मृति, विस्मृति, संघर्ष, भाषा, संस्था, पाठक आ जनजीवन के संयुक्त समान्तर इतिहास हय।
परिशिष्ट: संग्रह के अध्याय-सूची (मूल प्रकाशन-स्रोत सहित)
सन्दर्भ-ग्रन्थ-सूची
1. रमानन्द झा 'रमण', अखियासल, भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.), मैसूर, १९९५।
2. जयकान्त मिश्र, अ हिस्ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचर (मैथिली साहित्य के इतिहास)।
3. करुणाकान्त झा, शोध-प्रबन्ध (मैथिली साहित्य-सम्बन्धी), 'अखियासल'में उद्धृत।
4. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग १, https://www.videha.co.in/new_page_1.htm
5. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग २७, https://www.videha.co.in/new_page_27.htm
6. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग २८, https://www.videha.co.in/new_page_28.htm
7. गजेन्द्र ठाकुर, अ पैरेलल हिस्ट्री ऑफ मिथिला एण्ड मैथिली लिटरेचर, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, भाग ९०, https://www.videha.co.in/new_page_90.htm
8. गजेन्द्र ठाकुर, रचना-सङ्कलन, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका, https://www.videha.co.in/gajenthakur.htm
9. मूल निबन्ध सब के प्रथम-प्रकाशन पत्र-पत्रिका: मिथिला मिहिर, मिथिलामोद, भाखा, मैथिली अकादमी पत्रिका, बसात, हालचाल, मैथिली प्रकाश आ अखिल भारतीय मैथिली साहित्य सम्मेलन/परिषद् के स्मारिका (१९७२–१९८९)।