विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

डा. रमानंद झा रमण केर महत्व

अशोक · 2026-08-15 · अंक 448

Keywords: Ramanand Jha Raman, Maithili literary history, Mithila studies

अशोक (संपर्क-8986269001)

डा॰ रमानन्द झा ‘रमण’क महत्व

मैथिली साहित्यमे डा॰ रमानन्द झा ‘रमण’क योगदान बहुत व्यापक अछि। एहन योगदान समाज, साहित्य, संस्कृति के क्षेत्रमे विरल होइत अछि। खोज आ अनुसन्धान, आलोचना, सम्पादन के क्षेत्रमे जे काज सभ ओ केलनि से अध्येता लोकनिक हेतु, सामान्य पाठक सभ लेल बहुत उपयोगी अछि। हिनक पोथी ‘बेसाहल’ (2003) मे प्रो॰ आनन्द मिश्र लिखने छथि जे, ‘मैथिली साहित्यक अनेक रचना पत्र-पत्रिकाक ढेर मे भोतिआएल अछि। बहुत लेखकक नाम तँ पाठक सुनने छथि किन्तु रचनाक दर्शन नहि होइत छैन्हि। ओहन रचना के प्रकाशमे आनि महत्वक चर्चा कए पाठककेँ परिचित करबैत छथि।’

वस्तुतः विशेष कऽ मैथिलीक आरम्भिक कथा आ उपन्यास सभ के ताकि कऽ ओकर सम्पादन आ पोथी रूपमे प्रकाशन मैथिली साहित्यमे हुनक महत्वपूर्ण योगदान मानल जा सकैत अछि। जँ ताकि-हेरि कऽ रमणजी ओकरा सभ के प्रकाशमे नहि अनितथि तँ मैथिलीक पाठक ओकरा सुलभतया नहि पढ़ि सकैत छलथि, आ ने पाठक आ आलोचक ओकर आलोचनात्मक विश्लेषण कऽ सकैत छलाह।

ओ ‘मैथिलीक आरम्भिक कथा’ (1978) आ ‘मैथिली कथाक धाप’ (2020) के सम्पादन-प्रकाशन केलनि। ‘मैथिली कथाक धाप’ मे 1940 सँ पूर्वक मैथिली कथा संग्रहित कएल गेल अछि। ओ आरम्भिक उपन्यास ‘निर्दयी सासु’ आ ‘पुनर्विवाह (1984) के पोथी रूपमे प्रकाशमे अनलनि, जकर लेखक छथि जनार्दन झा ‘जनसीदन। ‘निर्दयी सासु’ (1914)क प्रकाशन धारावाहिक रूपसँ मिथिला-मिहिरमे अक्टूबर 1914 सँ 28 नवम्बर 1914 धरि भेल रहए। ‘पुनर्विवाह’क प्रकाशन 1926 मे भेल रहए। रमणजी जीबछ मिश्रक ‘रामेश्वर’ (1916) के सम्पादित कऽ 1996 मे प्रकाशित केलनि। तहिना रासबिहारी लाल दासक ‘सुमति’ (1918) के वर्ष 1996 मे प्रकाशित केलनि। आ पुण्यानन्द झाक ‘मिथिला दर्पण’ उपन्यास, जे 1925 ई. मे पूर्णिया सँ प्रकाशित भेल छल, तकरा वर्ष 2001 ई. मे पुनर्मुद्रित केलनि।

एहि प्रकारक पुनर्मुद्रण सभमे हुनक सम्पादकीय सेहो बहुत महत्वपूर्ण होइत अछि। ओहि सँ उपन्यासकार आ उपन्यासक विषय-वस्तु पर ऐतिहासिक-सामाजिक दृष्टि सँ प्रकाश पड़ैत अछि। ‘मिथिला दर्पण’क उपन्यासकार पुण्यानन्द झाक सम्बन्धमे रमणजी लिखलनि अछि जे, ‘हिनक आरम्भिक शिक्षा अररिया हाई स्कूलमे भेल। प्रयाग कायस्थ पाठशालासँ इन्ट्रेन्स एवं क्रिश्चियन कॉलेज सँ आइ॰ ए॰ पास केलनि।

पण्डित पुण्यानन्द झा. छेदी झा 'द्विजवर'हि जकाँ एक स्वतन्त्रता सेनानी छलाह। स्वदेशी आन्दोलनक सक्रिय कार्यकर्ता छलाह। मातृभाषाक प्रबल उन्नायक ओ सेवक छलाह। ओ एम॰एल॰ए॰ सेहो भेल छलाह। ओ पूर्णिया समाचार पत्रक संपादन कएल। ओ पूर्णिया जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलनक सभापति छलाह। ओहिठामक 'कला भवन'क निर्माणमे पूर्ण सक्रिय छलाह। भाषा एवं राजनीति हेतु ओ अपन सर्वस्व स्वाहा कए देल"

एहिना लक्ष्मीपति सिंहक 'चामुण्डा' उपन्यास मिथिला-मिहिरमे 1933-34 मे प्रकाशित भेल छल। ओहि उपन्यास के रमणजी साहित्य अकादेमी सँ प्रकाशित 'लक्ष्मीपति सिंह रचना संचयन’ (2012) मे संकलित केलनि अछि।

मैथिलीक आरम्भिक कथाकार सभमे हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’क नाम प्रमुखता सँ अबैत अछि। सरोजजी 1930 ई. सँ लऽ कऽ 1945 ई. धरि प्रकाशित सैंतीस टा कथा लीखि सभसँ बेसी कथा लिखनिहार कथाकार छथि। हिनकर कथा सभक संग्रह डा॰ रमानन्द झा ‘रमण’क सम्पादनमे 2014 मे प्रकाशित भेल अछि। कथा-संग्रहक नाम छी 'अगिलेसुआ'। एहि मे हुनक पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित सैंतीसो टा कथा संग्रहीत भेल अछि। हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’क देहावसान मात्र सैंतीस वर्षक अवस्थामे 1945 ई. मे भेलनि। रमणजी लिखलनि अछि जे, ‘सरोजजीक उपलब्ध साहित्यक अवलोकनसँ स्पष्ट अछि जे हिनक साहित्यिक अभिव्यक्तिक मूल विधा कथा, उपन्यास एवं आलोचना थिकनि। ओ ‘माधवी-माधव’ (1935 ई.) उपन्यास लिखल एवं अनेकशः कथा लिखल। 'विद्यापति' नाटक एवं एक प्रहसन लिखल। सीता नवमी (जनकपुर यात्रा वर्णन) लिखल। किछु निबन्ध सेहो प्रकाशित छनि, जेना 'दीपावली', 'भौजीक प्रति वर्ताव केहेन होबक चाही', 'कुप्रथाक बहिष्कार' अछि।

रमणजी जँ सरोजजीक साहित्य के ताकि-हेरि ओकरा अपन सम्पादनमे प्रकाशित नहि करितथि तँ वर्तमान आ भविष्यहुँमे सरोजक अवदानसँ, हुनक साहित्यसँ परिचय हमरालोकनिकेँ संभव नहि छल। एहन स्थितिमे जखन पुरना पत्र-पत्रिका सभ नष्ट भऽ गेल अछि आ नष्ट भऽ रहल अछि तखन अपन पूर्वक साहित्यकार सभक अवदानसँ परिचिति करयबा लेल रमणजीक योगदानक महत्व के बूझल जा सकैत अछि। ‘माधवी-माधव’ (1935) उपन्यासमे सर्वप्रथम कोनो नवयुवक-नवयुवतीक बीच प्रेम के संग वार्तालाप सेहो भेल अछि। एहि सँ पूर्व ‘मोहिनी-मोहन’(1907-08) मे खाली पत्र-व्यवहार भेल छल।

संगहि एहि उपन्यासमे सर्वप्रथम कोनो नवयुवक विवाह लेल तिलक स्वरूप व्यवस्था गना कऽ विवाह नहि करबाक बात सेहो कहलनि अछि। ओ नवयुवक मैथिल-महासभाक अवसरपर अपन सहपाठी सभ संग मीलि शपथपूर्वक प्रतिज्ञा-पत्रपर हस्ताक्षर केने रहथि जे तिलक स्वरूप व्यवस्था गना कऽ विवाह नहि करब। रमणजीक अतीतक खानिसँ बाहरक कऽ वर्तमानमे पाठक-अध्येता सभहक समक्ष मैथिलीक साहित्यकार सभकेँ प्रस्तुत करबाक महत्वपूर्ण योगदानपर टिप्पणी करैत पं. गोविन्द झा कहैत छथि "आजुक लोक वर्तमानमे ततेक ओझराएल अछि जे अतीतक खोज-खबरि लेनिहार बड़ दुर्लभ। वास्तवमे जीवनहिमे नहि, साहित्यहुमे इएह हाल अछि। अतीतक साहित्यकार दिस हुलकियो देनिहार बिरलके भेटताह। एहने बिरलैकमे एक छथि डा. रमानंद झा 'रमण'। ई एखन धरि अतीतक अन्हार खानिसँ बहुतो साहित्यकार ओ साहित्यकेँ इजोतमे आनि मैथिलीक प्रशंसनीय देवा कए रहल छथि।"

रमणजीक काज सभक प्रसंग मैथिलीक प्रसिद्ध लेखिका लिली रे केर कथा सभक, हुनक उपन्यास सभक, आत्मकथा, दीर्घकथाक संपादन-प्रकाशनकेँ सेहो देखल-परेखल जा सकैत अछि। 2014-15 ई. सँ पूर्व हुनक कथा सभक संग्रह नहि प्रकाशित भेल छल। मात्र मरीचिका उपन्यासक दूनू भाग 1981-82 मे प्रकाशित भेल रहय। उपसंहार वैदेही पत्रिका मे 1991 मे प्रकाशित रहए आ प्रख्यात लेखिका विभा हुनक कथा सभक अनुवाद हिन्दीमे 'विल टेलर की डायरी' नामसँ तथा 'पटाक्षेप' उपन्यासक अनुवाद प्रकाशित करौने रहथि।

2014-15 मे आबि कऽ रमण जी द्वारा हुनक ‘रंगीन परदा’ (2014), 'लाली गुरास' (2014), ‘विशाखन’ (2015) कथा-संग्रह, पटाक्षेप उपन्यास (2015), 'एकटा बड्ड पुरान गप्प' उपन्यास (2015), 'समय के धङैत' आत्मकथा (2015), 'नीक लोक' दीर्घकथा (2017) ई. मे सम्पादन-प्रकाशन सम्भव भेल। हँ, एक लघु उपन्यास ‘जिजीविषा' नाम सँ 2005 मे प्रकाशित भेल रहय। यदि रमणजी द्वारा एहि प्रख्यात लेखिकाक कथा, उपन्यास, आत्मकथा सभक योजनाबद्ध रूपें सम्पादन-प्रकाशन नहि कएल गेल रहैत तँ वर्तमानमे लिली रे क रचना सभक अध्य्यन-पठन ओ आलोचना व्यवस्थित रूपें संभव नहि भऽ सकैत छल।

रमणजी द्वारा सम्पादनक आरो कीर्तिमान सभ अछि जाहिमे पण्डित चेतनाथ झा कृत श्री जगन्नाथ पुरी यात्रा, पं तेजनाथ झा रचनावली, ‘सुरराजविजय नाटक’, रूचए तऽ सत्त ने तऽ फूसि, यदुवर रचनावली, ‘विद्यापति विवरण’ )श्री वल्लभ झा), ग्रिअर्सन कृत मैथिली व्याकरण आदि प्रमुख मानल जा सकैत अछि।

पूर्वमे पत्र-पत्रिकामे प्रकाशित आ पोथीक रूपमे अप्रकाशित होइतो अनुलब्ध महत्वपूर्ण रचना सभ के ताकि-हेरि ओकर महत्तापर अपन सम्पादकीय लिखैत रमणजी बहुतो पोथीक प्रकाशन संभव केलनि। एकर अतिरिक्त विभिन्न विषय आ विधा पर हुनक आलोचनात्मक निबन्ध सभ अनेक पोथीमे प्रकाशित अछि। एहन पोथी सभमे ‘मैथिली साहित्य ओ राजनीति’, ‘अखियासल’, ‘बेसाहल’, ‘भजारल’, हिआओल, चितिर-बितिर, विवर्त आदि पोथीकेँ देखल आ पढ़ल जा सकैत अछि। मैथिली कथा आ उपन्यास पर काज करैत हमरा ई अनुभव भेल जे बिना रमणजीक सम्पादित पोथी ओ हुनक प्रासंगिक आलोचनात्मक निबन्ध के पढ़ने आ यथास्थान ओकर उल्लेख के बिना अहाँक बात-विचार, लेखन पूर्ण नहि भऽ सकैत अछि।

एही संग एहन अनेक विषय अछि जाहिपर व्यवस्थित रूपें मात्र रमणजी लिखने छथि। जेना 'मैथिली कथा साहित्यमे शिल्पक विकास'। ओ विभिन्न कथा सभ के उदाहरणस्वरूप उपास्थापन कऽ ओहि शिल्प सभक विस्तार सँ वर्णन केलनि अछि जेना- प्रलापाय शिल्प, आवर्तक शिल्प, सांकेतिक शिल्प, प्रतीकात्मक शिल्प, बिंबात्मक शिल्प आदि। एही संग ओ विभिन्न कथाकारक कथा सभपर सेहो आलोचनात्मक निबंध लिखने छथि। मैथिलीक लगभग सभ विधापर अपन आलोचनात्मक निबंध सभसँ मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध केलनि अछि। ओ विभिन्न विधाक संग विभिन्न नव-नव विषयकेँ अपन निबंधक लेखनमे प्रयोग करैत छथि जेना- मैथिली कवितामे नेताक चरित्र, मैथिली साहित्यमे मिथिला सांस्कृतिक चेतना ओ साहित्य सर्जना, मैथिली संस्कृतिपर सञ्चार माध्यमक प्रभाव, मैथिली साहित्य प्रबंधन एवं कृष्णकांत मिश्र आदि अछि। एहन अनेक बेछप ओ विशिष्ट निबंध सभ लीखि एक आलोचक रूपमे रमणजी अपनाकेँ अनेक मान्य आलोचक सभसँ फराक सिद्ध करैत छथि। एहि सभकेँ अतिरिक्त हुनकर एक आर विशिष्ट अवदान अछि- मैथिलीः कथा नेपाल के संपादन ओ प्रकाशन। नेपालक विभिन्न कथाकारक कथाक प्रकाशन के अतिरिक्त ओकर संपादकीय बहुत विशिष्ट अछि। मैथिली" कथा नेपालमे मैथिली कथा शीर्षकसँ ओहिमे ओ नेपालमे मैथिलीसँ लऽ कऽ कथाक आरंभ, विकास ओ प्रवृति आदिपर विस्तारसँ प्रकाश देलनि अछि।

रमणजीक मैथिली साहित्यमे एक विशिष्ट योगदान ‘मैथिली नव कविता’ (1993 ई.) पोथी सेहो अछि। मैथिली नव कविता पर एहि तरहक व्यवस्थित पोथी दोसर नहि देखबामे आयल अछि। एहिमे नव कविताक पृष्ठिभूमि, उन्मेष, प्रवृत्ति, शिल्प, पाठकीय संकट आ किछु प्रमुख कवि सभ पर सुविचारित आलोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कएल गेल अछि। एहि पोथीक बाद मैथिली कविता पर समग्र रूपमे कोनो पोथी नहि आएल अछि। खास कऽ आठम दशक के आ ओकर बाद के मैथिलीक समकालीन कवितापर।

एहि प्रकारें डा॰ रमानन्द झा ‘रमण’क योगदान सँ मैथिली साहित्य समृद्ध भेल अछि, से कहल जा सकैत अछि।

Suggested citation: अशोक. “डा. रमानंद झा रमण केर महत्व.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 448, 2026-08-15. https://www.videha.co.in/research/2026/448/डा-रमानंद-झा-रमण-केर-महत्व.htm

मूल विदेह अंक / Original issue