‘हिआओल’: भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त आ विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से विस्तृत आलोचनात्मक आस्वाद
-गजेन्द्र ठाकुर
(डा. रमानन्द झा ‘रमण’, मैथिली आलोचना, अखियासल प्रकाशन, लालगंज, सरिसब-पाही, मधुबनी, २०१२)
१. उपक्रम: पोथी-परिचय आ’हिआओल’ के अर्थ-गरिमा
‘अखियासल’, ‘बेसाहल’ आ ‘भजारल’ के बाद डा. रमानन्द झा’रमण’ के ई चारिम आलोचना-संग्रह’हिआओल’ (२०१२) मैथिली आलोचना के ओ विरल परम्परा के कड़ी हय जेमें आलोचना गुटबन्दी के चपेट से मुक्त होके पाठ, पत्र-पत्रिका आ अभिलेख के प्रमाण मानके चलै हय। पोथी के नामकरणे में लेखक के विनम्र प्रविधिक घोषणा हय — ‘हिआओल’ अर्थात् थाहल, अन्दाजल। ई शब्द-चयन आत्मश्लाघा के स्थान पर अनुसन्धान के अनन्त सम्भावना के स्वीकार हय; क्षेमेन्द्र के औचित्य-सिद्धान्त के भाषा में कही त शीर्षकहि में प्रबन्धौचित्य के बीज रोपल हय। लेखकीय में खुद स्वीकारल गेल हय कि ई सब आलेख मनोरंजक साहित्य के कोटि के न हय, ‘अरबेधि-अरबेधि’ अइसन विषय के चयन कैल गेल हय जकर अध्ययन अपेक्षित हय मुदा लोक-दृष्टि जहाँ प्रायः न जाय हय। पण्डित गोविन्द झा आवरण-टिप्पणी में मार्मिक शब्द में लिखने हथिन कि मैथिली-जगत के अउरी नामी आलोचक के पूर्वज-साहित्य आ परम्परा में सड़ाइन गन्ध लगै हय, मुदा रमणजी के ‘पुरान चाउर के भात टटका दही के संग’ प्रिय हय — अर्थात् परम्परा के संरक्षण आ नव मूल्याङ्कन दुनो काज ई पूर्वज-पूजा बूझि करै हथिन। फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण’ पुरोवाक्मे उचिते लिखने हथिन कि ई निबन्ध-संग्रह में आलोचना-प्रत्यालोचना के संगम हय आ लेखक के उद्देश्य ककरो प्रतिष्ठा के धूमिल करब न, विमर्श हेतु बिन्दु सब उपस्थित करब हय — ‘वादे वादे जायते तत्त्वबोधः’।
ई पोथी में भाषा-विज्ञान, साहित्येतिहास, प्रत्यालोचना, कथा, कविता, महाकाव्य, लोकगाथा, लोकगीत, पत्रकारिता, प्राकृतिक विपत्ति, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आ भाषिक उपनिवेशवाद से सम्बन्धित सत्रह अध्याय समाहित हय। विषय-सूची से साफ होय हय कि संग्रह के विस्तार ग्रियर्सन के भाषा-अध्ययन से आरम्भ होके उपनिवेशवाद के नव चालि तक जाय हय। सत्रह निबन्ध के ई संग्रह तीन वर्ग में सहजहिं बँटि जाय हय। पहिल, भाषा-चिन्तन आ भाषा-राजनीति: मैथिली आ मिथिला भाषा के अध्ययन; रमानाथ झा आ मिथिला भाषा; मैथिली लोकगीत — अवस्था आ संरक्षण; उपनिवेशवाद के नऽव चालि। दोसर, व्यक्ति ओ कृति-केन्द्रित प्रत्यालोचना: प्रत्यालोचक किरणजी; उपेक्षित के आँखि से कन्यादान; अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह; यात्री के भाषा; मनमोहन झा के कथा के अनालोचित पक्ष। तेसर, विधा ओ प्रवृत्ति-केन्द्रित इतिहास-दृष्टि: पत्रकारिता के विकास में प्रवासी के योगदान; लोकगाथा में दीनाभद्री; मैथिली कथा के विकास — किछु नव तथ्य; कविता में मिथिला के भूकम्प; कथी ले लगेलिऐ हे कोसी माइ; महाकाव्य में युग-सन्दर्भ; नऽव गीत में समाज-चेतना; मैथिली कविता के वर्तमान धारा। ई त्रिवर्गीय संरचना में लेखक के समग्र आलोचकीय व्यक्तित्व — भाषाशास्त्री, पाठालोच के, इतिहासकार आ प्रत्यालोचक — के चारू रूप एके ठाम भेटै हय।
ई पोथी एकरेखीय साहित्येतिहास न, बल्कि प्रचलित निष्कर्ष सब के प्रश्नांकित करै अनेक समान्तर आख्यान के संकलन हय। लेखक के मुख्य प्रवृत्ति हय — विस्मृत लेखक आ रचना के फेर प्रतिष्ठित करब, पूर्ववर्ती आलोचना के अधूरापन देखायब, लोक आ शिष्ट के कृत्रिम विभाजन तोड़ब, मैथिली भाषा-साहित्य के विकास के सत्ता, समाज, भूगोल आ इतिहास से जोड़ब, आ मुख्य इतिहास के पार्श्व में दबावल स्त्री, दलित, श्रमिक, प्रवासी, ग्रामीण, बाढ़िपीड़ित आ भाषिक समुदाय के दृश्य बनायब। लेखक खुद आलोचना के रचना के भाषा, शिल्प, तथ्य, कथ्य, पात्र आ चरित्र के गुण-दोष के सूक्ष्म विवेचन मानै हथिन। हुनका खातिर आलोचना दोषान्वेषण खाली न, गुण के आलोकन भी हय, आ साहित्य के सृजन से बेसी ओकर संरक्षण ओ मूल्याङ्कन के ओ महत्त्व दे हथिन।
२. समीक्षा-पद्धति: त्रिविध कसौटी
प्रस्तुत मूल्याङ्कन तीन कसौटी पर आधारित हय।
भारतीय काव्यशास्त्र के आधार
पहिल कसौटी भारतीय काव्यशास्त्र हय — भरत के रस-निष्पत्ति, आनन्दवर्धन के ध्वनि-सिद्धान्त, कुन्तक के वक्रोक्ति, क्षेमेन्द्र के औचित्य-विचार, साधारणीकरण, लोकमंगल-दृष्टि आ न्यायदर्शन के प्रमाण-मीमांसा (विशेषतः अभाव-प्रमाण के प्रश्न, जे खुद रमणजी के तर्क-पद्धति में बेरि-बेरि झलकै हय)। रस-सिद्धान्त रचना में अन्त में पैदा भावानुभूति के परीक्षा करै हय। ध्वनि-सिद्धान्त प्रत्यक्ष कथन के पीछे निहित सामाजिक, राजनीतिक आ सांस्कृतिक अर्थ खोलै हय। वक्रोक्ति-सिद्धान्त सामान्य कथन से हटिकऽ रचनात्मक भाषा, प्रतीक, व्यङ्ग्य आ विचलन के सौन्दर्य देखै हय। औचित्य-सिद्धान्त विषय, भाषा, पात्र, प्रसंग आ निष्कर्ष के परस् पर संगति के जाँच करै हय। साधारणीकरण देखै हय कि व्यक्तिगत अनुभव कइसे सामूहिक अनुभव बनै हय। लोकमंगल-दृष्टि साहित्य के सामाजिक उपयोगिता, अन्याय-विरोध आ जनहित के मूल्याङ्कन करै हय।
पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त के आधार
दोसर कसौटी पाश्चात्य सिद्धान्त हय — उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, नव-इतिहासवाद, समाजभाषाविज्ञान, शैलीविज्ञान, पाठालोचन-शास्त्र, अभिग्रहण-सौन्दर्यशास्त्र (पाठक-अनुक्रिया), मार्क्सवादी ओ निम्नवर्गीय (अधीनस्थ) विमर्श, नारीवाद, दलित-विमर्श आ पर्यावरणीय आलोचना। रूपवादी दृष्टि भाषिक विन्यास, संरचना, प्रतीक, पुनरावृत्ति आ कथन-पद्धति के विश्लेषण करै हय। पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि अर्थ के स्थिर न मानके पाठक के अनुभव से निर्मित मानै हय। मार्क्सवादी दृष्टि वर्ग, श्रम, उत्पादन, शोषण आ सत्ता-संरचना केन्द्र में रखै हय। नारीवादी दृष्टि स्त्री के मौन, देह, श्रम, शिक्षा, अधिकार आ प्रतिनिधित्व के परीक्षण करै हय। दलित आ अधीनस्थ दृष्टि इतिहास में दबावल समुदाय के स्वर आ आत्मप्रतिनिधित्व खोजै हय। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि भाषा, शिक्षा, ज्ञान आ संस्कृति पर औपनिवेशिक प्रभुत्व के निरन्तरता के उद्घाटित करै हय। नव-इतिहासवादी दृष्टि साहित्यिक कृति के अपन समय के सत्ता, संस्था, अर्थव्यवस्था आ सामाजिक संघर्ष से जोड़ै हय। पर्यावरणीय आलोचना मनुष्य, नदी, वनस्पति, पशु-पक्षी, भूमि आ विपत्ति के परस् पर सम्बन्ध देखै हय।
विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि
तेसर कसौटी विदेह समान्तर साहित्य-इतिहास के दृष्टि हय, जे राजवंश, दरबार, शास्त्र, प्रतिष्ठित लेखक आ संस्था के इतिहास के समानान्तर लोकजीवन के इतिहास लिखै हय आ प्रतिष्ठान-पोषित प्रतिमान के स्थान पर अनालोचित, उपेक्षित, लोकधर्मी आ अभिलेख-सिद्ध धारा केन्द्र में आनै हय। ई दृष्टि में मिथिला खाली राजनीतिक सीमा न, सांस्कृतिक भूगोल हय; भारत आ नेपाल के मैथिली क्षेत्र एक दीर्घ सांस्कृतिक प्रवाह के अङ्ग हय; इतिहास राजा के संग किसान, स्त्री, दलित, मुसहर, श्रमिक, गायक, पत्रकार, प्रवासी आ विपत्तिग्रस्त जन के भी होय हय; साहित्यिक इतिहास खाली प्रकाशित पोथी के न, लोककण्ठ, व्रतकथा, गीत, अप्रकाशित पाण्डुलिपि आ विस्मृत रचनाकार के भी होय हय; आ नदी, बाढ़ि, भूकम्प, पलायन आ भाषिक विस्थापन ऐतिहासिक शक्ति बनि उठै हय। ई तेसर कसौटी ई पोथी के खातिर विशेष सार्थक हय, कारण ‘हिआओल’ के अनेक अध्याय —’अनालोचित कवि’, ‘अनालोचित पक्ष’, ‘उपेक्षित के आँखि से’, ‘किछु नव तथ्य’ — खुद प्रति-प्रतिमान निर्माण के, अर्थात् समान्तर इतिहास-लेखन के पूर्वाभ्यास हय।’हिआओल’ के मूल उपलब्धि एही समान्तर इतिहास-बोध में निहित हय। ई मूल्याङ्कन के लगभग आधा भाग अध्याय सभ के सीमा-विवेचन पर केन्द्रित हय — ई खुद रमणजी के घोषित सिद्धान्त के अनुकूल हय कि आलोचना अभिनन्दन-पत्र न हय आ प्रीतिकर होएब ओकरा खातिर आवश्यक न हय।
३. अध्यायवार उपलब्धि आ आलोचनात्मक आस्वाद
३.१ मैथिली आ मिथिला भाषा के अध्ययन
उद्घाटक निबन्ध कोलब्रुक (१८०१)से ग्रियर्सन तक के पश्चिमी भाषा-अध्ययन के कालक्रम प्रस्तुत करै ई मार्मिक प्रश्न उठावै हय कि साहित्य-सर्जना के सुदीर्घ अविच्छिन्न परम्परा रहितो मैथिली के व्याकरण सबसे पछाति काहे लिखल गेल। कोलब्रुक के ई संकीर्ण स्थापना जे मैथिली कोनो समृद्ध भाषा न हय आ एकर कोनो विशिष्ट कवि न हय, तकरा विखण्डित करै बीम्स (१८७२), केलौग, हार्नले (१८८०) आ अन्त में ग्रियर्सन (१८८१) कइसे मैथिली के स्वतन्त्र भाषा के रूप में प्रतिष्ठित कैलथिन, ओकर मूल अंग्रेजी साक्ष्य सोझाँ रखके लेखक देखाबै हथिन कि प्रारम्भिक पश्चिमी अध्ययन मैथिली के अध्ययन न, प्रशासनिक सुविधार्थ ‘नमूना-संकलन’ खाली हल। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से ई अध्याय बहुत महत्त्वपूर्ण हय — मैकाले के १८३५ के टिप्पणी (‘जे भाषा केओ बिना सरकारी पाइ के पढ़बा खातिर तैयार न, ओ पर खर्च काहे’) आ १८६४ के ट्रेवेलियन-टिप्पणी के उद्धरण से साफ होय हय कि भाषा-नीति उपनिवेश के उपयोगिता के दासी हल। ‘बिहारी अस्मिता के पहिल उद्भावक जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन हलथिन’ — ई व्यंग्य-गर्भित स्थापना नव-इतिहासवादी सूझ के उदाहरण हय, जे नामकरण के राजनीति के अस्मिता के राजनीति से जोड़ै हय। ग्रियर्सन इहाँ द्वैध व्यक्तित्व के रूप में उपस्थित होय हथिन: एक ओर हुनकर सर्वेक्षण मैथिली के स्वतन्त्र पहचान दे हय आ हिन्दी के छाया से मुक्त करे के दिशा में मैथिली के स्वतन्त्र ध्वनि-संरचना ओ क्रिया-रूपावली के प्रामाणिकता दे हय; दोसर ओर ‘बिहारी’ जइसन सामूहिक नाम औपनिवेशिक प्रशासन के सुविधानुसार भाषिक विविधता के एक खाँचा में राखैत हय।
अध्याय के प्रमुख उपलब्धि ई हय कि लेखक भाषा-विकास के खाली व्याकरण-लेखन के इतिहास न मानै हथिन। ओ कार्यभार आ कार्य-पारदर्शिता के समाजभाषावैज्ञानिक कसौटी से मैथिली के ह्रास के व्याख्या करै हथिन — जे भाषा के प्रयोग प्रशासन, शिक्षा, न्याय, व्यापार आ सार्वजनिक जीवन में घटै हय, ओकर सामाजिक सामर्थ्य भी घटै हय। कर्णाट-शासन में मैथिली के राजकाज के भाषा रहे के अभिलेखीय प्रमाण, नेपाल के राजकीय अभिलेख, आ भोलालाल दास के कहल गेल ओ प्रसिद्ध वाक्य (‘मैथिली के स्वीकृत कैने मिथिला जीबि उठत…’) — ई सब बिहार-निर्माण के राजनीतिक अन्तर्कथा के उघारै हय। पारम्परिक आ शिक्षाशास्त्रीय व्याकरण के भेद आ शिक्षाशास्त्रीय व्याकरण के पाँच स्तर के विवेचन मैथिली में प्रायः पहिल बेर एतना व्यवस्थित रूप में आएल हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से ई अध्याय विशेष महत्त्वपूर्ण हय, कारण भाषा-इतिहास के राजकीय मान्यता से न, शिलालेख, लोकव्यवहार, व्याकरण-लेखन आ सांस्कृतिक विस्तार से जोड़ल गेल हय — भाषा राजनीतिक सीमा पार करै एक सभ्यतागत प्रवाह बन जाय हय।
३.२ रमानाथ झा आ मिथिला भाषा
संग्रह के मेरुदण्ड ई दीर्घतम निबन्ध प्रत्यालोचना के प्रतिमान हय। आचार्य रमानाथ झा के जन्मशतवार्षिकी (१९०६–२००६)के बहन्ने हुनका पर जीवन-काल आ मरणोपरान्त लगावल गेल आरोप के ‘टाल’ के अभिलेखीय परीक्षण कैल गेल हय। शशिनाथ चौधरी के १९३२ के परिषद्-प्रतिवेदन जइसन दुर्लभ साक्ष्य से ई सिद्ध कैल गेल जे पटना विश्वविद्यालय में मैथिली के स्वीकृति-सम्बन्धी षड्यन्त्र के आरोप तथ्य-सम्मत न हय। चन्दा झा के मिथिला भाषा रामायण के चारिम संस्करण से रमानाथ झा के आधा पृष्ठ के’ के्षमा-प्रार्थना’ छाँटि देवे के प्रसंग, आ ओकर तुलना सोवियत’व्यक्तिपूजा’ के आरोप में नेता के शव के समाधि से उपाड़बा के घटना से — ई प्रत्यालोचना के तीक्ष्णतम क्षण हय, जहाँ स्थानीय साहित्यिक राजनीति विश्व-इतिहास के आलोक में अर्थवान हो जाय हय।
निबन्ध के उत्तरार्ध में रमानाथ झा के अवदान के — अध्यापन, पाठ्यक्रम-निर्माण, अनुसन्धान, भाषा-मान्यता, सम्पादन आ साहित्येतिहास — के व्यवस्थित पुनर्पाठ हय। रमानाथ झा के मैथिली आलोचना केन्द्र-स्तम्भ मानै रमणजी मिथिला भाषा के प्राचीनता के पाँच ऐतिहासिक साक्ष्य के उल्लेख करै हथिन: कालिदास के विक्रमोर्वशीय के दोहा, प्राकृत पैंगल के वर्णवृत्त, नेपाल से प्राप्त सहजपन्थी सिद्ध लोग के चर्यापद, डाकवचन, आ अवहट्ट में विद्यापति के रचना। बुद्धवचन-महावीरवचन-अर्धमागधी के विवेचन से विदेह जनपद के भाषा के सातत्य, तिरहुता लिपि के व्याप्ति, मानकीकरण के इतिहास में पण्डित जीवनाथ राय के चिन्ता आ महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह के १८८० के ओ ऐतिहासिक आदेश जेसे देवनागरी आ हिन्दी के राजकाज में प्रवेश भेटलै के आ अन्त में तिरहुता (मिथिलाक्षर) लिपि के विस्थापन भेल — ई सब प्रसंग अध्याय के भाषा-राजनीतिक दस्तावेज बना दे हय। सबसे मौलिक हय हाउगेन आ फर्गुसन के भाषा-प्रबन्धन सिद्धान्त के चारि चरण (चयन, संहिताकरण, प्रकार्य-विस्तार, ग्राह्यता)के कसौटी पर रमानाथ झा के कार्य के पुनर्मूल्याङ्कन — ई देखाएब जे जे शास्त्र के जन्महुँ न भेल हल, ओ शास्त्र के प्रक्रिया के अनुरूप रमानाथ झा मैथिली के भाषा-नियोजन के गेलथिन। बहुवाचिकता (द्विभाषिक स्तर-भेद)के अवधारणा से मैथिल समाज के भाषिक यथार्थ के व्याख्या समाजभाषाविज्ञान के मैथिली में सफल अवतरण हय।
भारतीय परम्परा में आलोचक के ‘सहृदय’ कहल गेल हय; ई अध्याय में रमणजी सहृदयता के अर्थ अन्धप्रशंसा न, ऐतिहासिक न्याय मानै हथिन। हुनकर आग्रह हय कि व्यक्ति के योगदान के मूल्याङ्कन ओकर समय, संस्थागत कठिनाइ आ उपलब्ध साधन के आधार पर हो। पाठक-प्रतिक्रिया दृष्टि से ई अध्याय देखाबै हय कि एके व्यक्तित्व के मूल्याङ्कन अलग-अलग पीढ़ी अलग-अलग ढङ्ग से करै हय — संस्थापक पीढ़ी के श्रम पछिला पीढ़ी के खातिर सामान्य सुविधा बन जाय हय, फलतः मूल संघर्ष विस्मृत हो जाय हय। विदेह समान्तर इतिहास के स्तर पर अध्याय ई प्रश्न उठावै हय कि मैथिली भाषा-साहित्य के संस्थागत निर्माण केना भेल: विश्वविद्यालय, पाठ्यक्रम, साहित्यिक संस्था आ व्यक्तिगत विद्वत्ता एक-दोसर से जुड़ल हल; अतः साहित्यिक इतिहास खाली प्रकाशित रचना के इतिहास न, संस्था-निर्माण के इतिहास भी हय।
३.३ प्रत्यालोचक किरणजी
ई निबन्ध ‘प्रत्यालोचना’ पद के मैथिली आलोचना-शास्त्र में सैद्धान्तिक प्रतिष्ठा दे हय — आलोचना के आलोचना, जे लेखक के अनुसार समाज के वैचारिक गतिशीलता आ जीवन्तता के लक्षण हय। डा. काञ्चीनाथ झा’ केिरण’ के आलोचकीय व्यक्तित्व के त्रिविध विश्लेषण (लोक आलोचक, साहित्यिक आलोचक, प्रत्यालोचक) आ रचनाकार के तीन कोटि के वर्गीकरण (युगातीत, युगानुगामी, सचेत विपक्षी) पद्धति-सजग आलोचना के परिचायक हय। किरणजी के नव स्थापना सभ के — वर्णरत्नाकर काव्य-ग्रन्थ हय, लोकसाहित्य शिष्ट-साहित्य से बड़, विद्यापति स्वाधीनताकामी सेनानी, आ चन्दा झा के स्थान पर अकाली कवि फतूर लाल नवयुग के प्रवर्तक — सहृदय प्रस्तुति के साथे हुन के अन्तर्विरोध के निर्मम उद्घाटन भी हय: जे किरणजी रमानाथ झा के राधाकृष्ण-विषय के मत के तीव्र खण्डन करै हथिन, ओहे अन्यत्र विद्यापति के नायिका के राजदरबारी संस्कार के कल्पित पात्र कहके प्रकारान्तर से ओही मत के समर्थन के दे हथिन। कुलानन्द मिश्र के चन्द्रग्रहण-टिप्पणी के प्रसंग में लेखक के ई सूत्र-वाक्य आलोचना-नीतिशास्त्र के निष्कर्ष जइसन हय कि कृति में व्यक्त विचार के विवेचन ने भक्त जइसन हो, ने अपन मतवाद के रचनाकार पर आरोपित करै।
किरणजी जाति, रूढ़ि, अन्धविश्वास, श्रम के अवमानना आ सामाजिक विषमता के विरुद्ध आलोचनात्मक स्वर उठावै हथिन;’पराशर’ के माध्यम से श्रम, भूख, जातीय विभाजन, धार्मिक आडम्बर आ स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के प्रश्न उठावल गेल हय, जे आभिजात्य पण्डित-समाज के कौलीनता आ पाँजि-व्यवस्था पर कठोर प्रहार हय। भारतीय दृष्टि से किरणजी के आलोचना लोकमंगलवादी हय — हुनका खातिर साहित्य के श्रेष्ठता ओकर सामाजिक उत्तरदायित्व से अलग न। पाश्चात्य मार्क्सवादी दृष्टि से हुनकर विचार सामाजिक उत्पादन, श्रम आ प्रभुत्वशाली वर्ग के आलोचना से जुड़ैत हय; दलित दृष्टि से ओ शास्त्रीय पात्र के निम्नवर्गीय अनुभव के आलोक में फेर लिखै हथिन।’मैथिल आँखि’ के अवधारणा ई अध्याय के मौलिक सूत्र हय, जकरा’गुलामी नजरि’ के विरुद्ध संघर्ष के रूप में राखल गेल हय — एकर अर्थ संकीर्ण प्रादेशिकता न, अपन भाषिक-सांस्कृतिक अनुभव के आधार पर विश्व के देखब। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि में ई स्थानीय ज्ञान के पुनर्प्रतिष्ठा आ स्थापित संभ्रान्तवादी इतिहास-लेखन के विरुद्ध निम्नवर्गीय प्रतिरोध के स्वर हय।
३.४ अपेक्षिता के आँखि छोड़के, उपेक्षित के आँखि से कन्यादान पढ़ल जाए
ई संग्रह के सबसे बेसी चुनौतीपूर्ण अध्याय में से एक हय आ अभिग्रहण-सौन्दर्यशास्त्र (पाठक-अनुक्रिया सिद्धान्त)के मैथिली में विरल प्रयोग। हरिमोहन झा के पाठक के तीन श्रेणी — मनोरंजनार्थी, हनुमान-चालीसा-भक्त, आ समाज-कथा बूझि पढ़निहार — के विभाजन के लेखक ई देखाबै हथिन कि कृति के अर्थ पाठक-दृष्टि से निर्मित होय हय। तब दृष्टि-परिवर्तन के प्रस्ताव आबै हय: अपेक्षिता (सी. सी. मिश्र जइसन शिक्षित वर)के आँखि छोड़के उपेक्षिता बुच्ची दाइ के आँखि से उपन्यास पढ़ल जाए। ई नारी-विमर्श के ओ पद्धति हय कि केन्द्र के हटा हाशिया केन्द्र बनावै हय। प्रचलित हास्यप्रधान पाठ के छोड़के लेखक बुच्ची दाइ के मौन, अशिक्षा, भय आ सांस्कृतिक विस्थापन केन्द्र बनावै हथिन — प्रश्न ई हय कि बुच्ची दाइ बाजै काहे न हथिन, हुनकर जीवन के निर्णय दोसर लोक काहे करै हय, आ शिक्षित समाज हुनकर मौन के खातिर कतना उत्तरदायी हय। बुच्ची दाइ के निरक्षरता खातिर ओ व्यक्ति के न, समाज के’संरचनात्मक निर्माण के दोष’ के उत्तरदायी मानै हथिन।
सबसे बलगर पक्ष हय अभिलेख-प्रथम प्रमाण: जनसीदन के यशोदा (जे रामायण बाँचि ले हय), रासबिहारी लाल दास के सुमति, पुण्यानन्द झा के योगमाया, पुलकित मिश्र के मोहिनी — कन्यादान से पहिले के मैथिली उपन्यास के नारी-पात्र निरक्षर न, साक्षर हली। ई तथ्य-शृंखला से ई क्रान्तिकारी स्थापना निकलैत हय कि स्त्री-शिक्षा के प्रश्न पर हरिमोहन झा अपन पूर्ववर्ती औपन्यासिक परम्परा से आगू न, पीछे हथिन। मिथिला दर्पण के योगानन्द आ कन्यादान के सी. सी. मिश्र के तुलना, आ’अबोध के अपंगता के दोषी अबोध खुद की ओकर समाज?’ के प्रश्न मानवीय गरिमा के कसौटी पर हास्य के औचित्य-परीक्षा हय। भाषिक दृष्टि से अध्याय के सूक्ष्म निष्कर्ष ई हय कि शहराती पति आ ग्रामीण पत्नी एके सांस्कृतिक-भाषिक धरातल पर न हथिन — पतिद्वारा हिन्दी में संवाद करब स्त्री के मौन के आरो गाढ़ करै हय। नारीवादी आलोचना से ई पुनर्पाठ बहुत महत्त्वपूर्ण हय: विवाह के हास्य के आवरण के भीतर स्त्री के वस्तुकरण, भाषिक असमानता, शिक्षा-वञ्चना आ पितृसत्तात्मक नियन्त्रण हय; बुच्ची दाइ खाली पात्र न, अशिक्षित मैथिल कन्या के प्रतीक बन जाय हथिन। ध्वनि-सिद्धान्त के आलोक में उपन्यास के हास्य के पीछे करुण ध्वनि सुनाइत हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से ई अध्याय प्रतिष्ठित हास्यकृति के भीतर दबावल स्त्री-इतिहास के फेर दृश्य बनावै हय।
३.५ अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह
ई अध्याय विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि के बीज-पद्धति के श्रेष्ठ उदाहरण हय — ‘अनालोचित’ के पुनर्वास। पत्र-पत्रिका में छिड़िआएल कविता के’झोड़ि’ के लेखक एक विस्मृत कवि के काव्य-संसार के पुनर्निर्माण करै हथिन आ हुनका राष्ट्रीय चेतना, मिथिला-बोध, सामाजिक सुधार, स्त्री-दुःख, बाढ़ि, शोषण आ सांस्कृतिक संकट के कवि के रूप में प्रस्तुत करै हथिन। खुद लेखक स्वीकार करै हथिन कि पूरा रचनावली उपलब्ध न रहने ई आरम्भिक अनुसन्धान हय। ‘शरदागम’ के व्याख्या ध्वनि-सिद्धान्त के व्यावहारिक प्रयोग हय — पावस के प्रयाण, फुलाएल कास, थीर सरोवर आ विवश पुरन्दर में १९३५ के शासन-सुधार आ जन-आक्रोश के व्यंग्यार्थ के उद्घाटन; प्रकृति-वर्णन के अभिधा के भीतर राजनीतिक व्यञ्जना के ई पाठ आनन्दवर्धन के’अर्थान्तर-संक्रमित’ ध्वनि के जीवन्त निदर्शन हय। ‘पछबा’ कविता के विश्लेषण में पश्चिमी भाषा-संस्कृति के धुक्कड़ से भारतीय शब्द-सम्पदा के झड़बा के जे प्रतीक-योजना देखावल गेल हय, से सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के पूर्वाभास जइसन हय आ अन्तिम अध्याय से ई निबन्ध के जोड़के दे हय — ‘पछबा’ खाली हवा न, पाश्चात्य सांस्कृतिक दबाव के प्रतीक बनै हय, आ शरदागमन औपनिवेशिक शासन के क्षीणता के सङ्केत। ‘नोत पूरब’ जइसन सांस्कृतिक सन्दर्भ-गर्भित शब्द के टीका, विधवा-विलाप के करुण चित्र, आ बाढ़ि-भूकम्प के द्वैध त्रासदी के कवि-साक्ष्य — सब मिलि एक ‘निरपेक्ष’ मुदा मैथिली-पक्षधर कवि के मूर्ति गढ़ैत हय। नव-इतिहासवादी दृष्टि से कविता के स्वतन्त्र सौन्दर्य-वस्तु न, स्वतन्त्रता आन्दोलन, विभाजन, सामाजिक सुधार, बाढ़ि आ सांस्कृतिक संस्था के गतिविधि से जोड़ल गेल हय; करुण रस विधवा, बाढ़िपीड़ित आ उपेक्षित मिथिला के चित्रण में प्रखर होय हय। प्रतिष्ठित साहित्येतिहास जे कवि के पोथी उपलब्ध न रहने हुनका पार्श्व में छोड़के दे हय, रमणजी पत्र-पत्रिका में बिखरल सामग्री के आधार पर हुनकर वैकल्पिक साहित्यिक जीवनचरित निर्मित करै हथिन — विस्मृत लेखक के पुनरुद्धार के आदर्श उदाहरण।
३.६ यात्री के भाषा: शब्दचयन आ शब्दनिर्माण
शैलीविज्ञान के चारि उपकरण — चयन, विचलन, समानान्तरता आ अप्रस्तुत-विधान — के सहारे वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्री’ (नागार्जुन)के काव्य-भाषा के ई विश्लेषण संग्रह के सबसे बेसी शास्त्र-सम्पन्न आ व्यवस्थित भाषिक अध्याय हय। यात्री के काव्यभाषा में देशज, तत्सम, तद्भव आ आगन्तुक शब्द के सर्जनात्मक मेल देखावल गेल हय — ‘अपरोजक’ (नाभिपद्मसम्भूत विधाता खातिर), ‘ऊत्तुंग खोपा’, ‘तपोवनी’ जइसन देशी-अनदेशी शब्द के संकर-निर्माण, आ ‘दलकब’ क्रिया के अर्थ-व्यञ्जकता के पद-परीक्षा। हरेक स्थल पर लेखक देखाबै हथिन कि पर्यायवाची में से एके शब्द काहे अनिवार्य हय: एक शब्द के चयन खाली अर्थ न, पात्र के सामाजिक स्थिति, वक्ता के मनोदशा, व्यङ्ग्य आ सांस्कृतिक स्मृति के व्यक्त करै हय। ई विवेचन कुन्तक के वर्ण-विन्यास-वक्रता आ पद-पूर्वार्ध-वक्रता के आधुनिक रूपान्तर जइसन हय, आ’विचलन’ के अवधारणा’निरंकुशाः कवयः’ के शास्त्रीय अनुमति से जोड़ल गेल हय — पूर्व-पश्चिम के ई सेतु-बन्ध दुर्लभ हय। वक्रोक्ति-सिद्धान्त के दृष्टि से व्याकरणिक क्रम के विचलन, असामान्य संयोग आ नूतन शब्दनिर्माण भाषा के सामान्य सूचना-साधन से काव्यात्मक अनुभव में बदलै हय; ध्वनि-सिद्धान्त के अनुसार शब्द के कोशगत अर्थ से अधिक ओकर प्रसङ्गगत व्यञ्जना महत्त्वपूर्ण होय हय। गौरी, कार्तिक, गणेश, लक्ष्मी जइसन पौराणिक पात्र के कोश-स्वीकृत अर्थ से फराक नव-सन्दर्भीकरण के विश्लेषण, कंकाल-शृंखला आ मामा-गीत में समानान्तरता के प्रयोग, अप्रस्तुत विधान में सादृश्य, मानवीकरण आ इन्द्रियबोध के चित्र — सब यात्री-काव्य के भाषिक वैलक्षण्य के प्रामाणिक कुंजी हय। यात्री के’भाषा के भूगोल’ के अवधारणा उल्लेखनीय हय — कवि अपन भाषा-क्षेत्र के वस्तु, श्रम, रीति, मिथक आ बोलचाल से परिचित हथिन, तेँ हुनकर शब्द खाली सजावट न, जीवित जनजीवन के वाहक हय। यात्री के भाषा आभिजात्य संस्कृतनिष्ठ मैथिली के विरुद्ध जनपदीय बहुस्वरता के प्रकटीकरण भी हय।
३.७ मनमोहन झा के कथा के अनालोचित पक्ष
करुणा के कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित मनमोहन झा के कथा-साहित्य के पूरा तरह से अनालोचित पक्ष — भारतीय राष्ट्रीयता आ मैथिल उपराष्ट्रीयता — के उद्घाटन ई लघु निबन्ध के उपलब्धि हय। पटना सचिवालय-गोलीकाण्ड (१९४२)के पृष्ठभूमि पर लिखल ‘आहत आत्मा’ के नरेन्द्र बाबू, ताजमहल के वैभव के नीचे दबल श्रमिक-वेदना के कथा,’वीरभोग्या’,’सप्तपदी’ के महाश्वेता आ’मीनाक्षी’ के बलिदान — ई सब देखाबै हय कि करुणा के अन्तःसलिला धार के भीतर राष्ट्र-प्रेम आ मिथिला-संस्कृति के रक्षा के दृढ़ स्वर बहैत हय। रस-दृष्टि से करुण आ वीर रस के समन्वय ई कथा के मूल शक्ति हय — पात्र के व्यक्तिगत प्रेम राष्ट्र, मातृभूमि वा सांस्कृतिक अस्मिता के खातिर त्याग में परिणत होय हय। नव-इतिहासवादी दृष्टि से कथा के भावभूमि स्वतन्त्रता आन्दोलन, विदेशी आक्रमण आ मिथिला के सांस्कृतिक स्मृति से निर्मित हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से मिथिला भारतीय राष्ट्र के विरोधी न, ओकर भीतर विशिष्ट सांस्कृतिक इकाई हय — ई कारण मैथिल उपराष्ट्रीयता विखण्डन न, बहुस्तरीय भारतीयता के रूप बनै हय। मनमोहन झा के निधन (२००९)के दसम दिन के भीतर लिखल ई आलेख श्रद्धांजलि आ आलोचना के मर्यादित संगम हय।
३.८ मैथिली पत्रकारिता के विकास में प्रवासी के योगदान
पत्रकारिता के परिभाषा (निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप पाठ्य-सामग्री के निष्पक्ष प्रसार)से आरम्भ के लेखक पत्र, पत्रकार आ पत्रकारिता के बीच अन्तर साफ करै हथिन। हुनकर प्रश्न हय — मैथिली में नियमित, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर समाचार-पत्र परम्परा सीमित रहने ‘पत्रकारिता’ शब्द के अर्थ कइसे निर्धारित हो? प्रवासी-निवासी के विधिक कसौटी (विदेशी मुद्रा विनिमय अधिनियम)के सोझाँ ओ सांस्कृतिक मिथिला के अखण्डता के तर्क रखै हथिन — नेपाल-तराइ आ भारतीय मिथिला के बीच युग-युग के अविच्छिन्न सांस्कृतिक एकसूत्रता के आगू राजनीतिक सीमा गौण। प्रवासी मैथिल लोग द्वारा जयपुर से प्रकाशित ‘मैथिल-हितसाधन’ (१९०५) आ बनारस से प्रकाशित ‘मिथिलामोद’ (१९०५) सामाजिक शिक्षा, स्त्रीशिक्षा, रूढ़िविरोध, भाषा-संवर्धन आ निर्भीक सम्पादकीय दृष्टि के वाहक बनल; ई पत्रिका सभ के उद्गार-उद्धरण सहित विवेचन ऐतिहासिक दृष्टि से बहुमूल्य हय। सबसे सूक्ष्म हय ज्ञान-समाजशास्त्रीय ई विश्लेषण जे सम्पादकीय निर्भीकता के सामाजिक आधार की हल — विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा आ मम मुरलीधर झा तत्कालीन सत्ता-केन्द्र दरभंगा पर आश्रित न हलथिन, तेँ स्पष्टवादिता सम्भव भेल। सार्वजनिक क्षेत्र के सिद्धान्त से ई पत्र-पत्रिका समाज के वैचारिक संवाद-मञ्च बनै हय — मिथिला के भीतर जे प्रश्न उठाएब कठिन हल, प्रवास के अपेक्षाकृत स्वतन्त्र वातावरण में ओ प्रश्न निर्भीकता से उठल। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से प्रवास सीमा-बाहर के अवस्था न, मिथिला के विस्तृत सांस्कृतिक परिधि हय — जयपुर, बनारस, अजमेर, कलकत्ता, दिल्ली, नेपाल आदि स्थान मैथिली चेतना के वैकल्पिक केन्द्र बनै हय। पत्रकारिता के आजीविका आ व्यवसाय के कसौटी से फराक के देखे के प्रस्ताव मैथिली पत्रकारिता के इतिहास-लेखन खातिर एक वैकल्पिक (समान्तर) ढाँचा प्रस्तुत करै हय।
३.९ मैथिली लोकगाथा में दीनाभद्री
ई अध्याय पाठालोचन-शास्त्र आ निम्नवर्गीय विमर्श के संगम-स्थल हय। ग्रियर्सन-संकलित गीत दीनाभद्री (१८८५)के मूल-स्रोत के प्रतिष्ठा दे लेखक ई मार्मिक प्रश्न उठावै हथिन कि परवर्ती विद्वान् अपन-अपन व्यक्तिगत संकलन के आधार बना लिखै गेलथिन, मुदा मूल पाठ आ अपन पाठ के अन्तर के हिसाब केओ न देलथिन — ई साहित्यिक अराजकता हय; ग्रियर्सन के संकलन के उपेक्षित रखके ‘मूल गाथा अप्रकाशित’ कहब ऐतिहासिक रूप से अनुचित हय। दुनो पाठ के तुलनात्मक अध्ययन (सात बनाम तेरह अध्याय, गुलामी जट के भूमिका-भेद, स्वाधीनता के बाद दीनाभद्री के मुह में अंग्रेजी शब्द के प्रवेश) लोकगाथा के ‘लोच’-सिद्धान्त के प्रामाणिक निदर्शन हय — लोककण्ठ में रहै गाथा वाचक, काल आ श्रोता के अनुसार बदलै रहै हय, आ इहे लोच ओकर जीवनी-शक्ति हय।
दीना आ भद्री मुसहर जाति के वीर भ्रातृद्वय हथिन; जोरावर सिंह के सामन्ती अत्याचार के विरुद्ध हुन के विद्रोह, शौर्य, भ्रातृ-प्रेम, पंचायती लोकतन्त्र में आस्था (‘पंच से निसाफ’) आ शोष के-प्रतिकारक विश्लेषण देखाबै हय कि नायकत्व के समस्त शास्त्रीय गुण दलित समाजो में वर्तमान हल — ई स्थापना राजकुल-केन्द्रित नायकत्व-सिद्धान्त के प्रति-कथन हय। लोकगाथा में जातीय उत्पीड़न, सामाजिक विषमता, साहस, न्याय आ सामुदायिक स्मृति संरक्षित हय; लोकनायक के महत्ता राजकीय पद से न, पीड़ित समुदाय के रक्षा आ आत्मसम्मान से निर्धारित होय हय। दलित आलोचना से ई अध्याय विशेष उल्लेखनीय हय — मुख्य इतिहास जे समुदाय के इतिहासहीन मानै हय, ओकर लोकगाथा खुद इतिहास के वैकल्पिक अभिलेख बन जाय हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि में दीनाभद्री राजदरबार के नायक न, लोककण्ठ के नायक हथिन — ई परिवर्तन से साहित्यिक आ राजनीतिक स्थान के पुनर्वितरण होय हय, आ लोकगाथा के वर्तमान राजनीतिक अवकाश-निर्माण में भूमिका के संकेत एकरा समकालीन विमर्श से जोड़ै हय।
३.१० मैथिली कथा के विकास: किछु नव तथ्य
नव-इतिहासवादी पुनर्लेखन के ई श्रेष्ठ उदाहरण हय। स्थापित मान्यता — चन्दा झाकृत पुरुषपरीक्षा के अनुवाद (१८८९) मैथिली कथा के प्रस्थान-बिन्दु — के खण्डन तीन कसौटी पर कैल गेल हय: अनुवादक प्रचार-प्रसार के तत्कालीन असम्भाव्यता, शब्दानुवाद के अनाकर्षक भाषा (जयकान्त मिश्र आ रमानाथ झा के साक्ष्य सहित), आ प्रभावित वर्ग के अव्यावहारिकता (संस्कृत के अधीत विद्वान् अनुवाद से प्रेरित काहे होएताह?)। ओकर विकल्प में लेखक मैथिली कथा के आरम्भ खाली मुद्रित आधुनिक कथा से माने के विरोध करै हथिन: ज्योतिरीश्वर के वर्णरत्नाकर में चौंसठि कला में परिगणित ‘कथाकौशल’, व्रतकथा के तेसर धारा (मधुश्रावणी, सिरता-बिसता)के वाचिक परम्परा, लोककथा, हास्य-व्यङ्ग्य आ मौखिक आख्यान के दीर्घ परम्परा के आधुनिक कथा के पूर्वपीठिका मानल गेल हय। रचनात्मक उपलब्धि ई हय कि लेखक कथा आ कथाकौशल में भेद करै हथिन — कथ्य एक वस्तु हय; श्रोता के बान्हि रखे के भाषा, गति, स्वर, संवाद आ प्रस्तुति दोसर। ई दृष्टि से मौखिक साहित्य अपरिपक्व न, अपन स्वतन्त्र सौन्दर्यशास्त्रवाला विधा हय।
श्रीकृष्ण ठाकुर के चन्द्रप्रभा (रचना १८८० के दश के तक, प्रकाशन १९३९)के मैथिली के पहिल मौलिक कथा के प्रस्थान-बिन्दु माने के प्रस्ताव, ‘चन्द्रभागा’ के स्थान पर’चन्द्रप्रभा’ नाम के शुद्धि,’विलक्षण दाम्पत्य’ के विधागत पुनर्निर्धारण आ’मदनराज चरित’ के काल-सम्बन्धी प्रश्न अध्याय के शोधपरक उपलब्धि हय। चन्द्रप्रभा के रसधज-राजा के कथा के व्याख्या — प्रजापीड़ के शासक के विरुद्ध प्रजा के असहयोग आ पलायन — मे १८५७ के असफलता के बाद के जन-आक्रोश के प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति देखब, फूलबाड़ी आ माली के प्रतीक के माध्यम से प्रजा आ शासन के सम्बन्ध पढ़ब, आ विद्यासिन्धु के बेंग-कथा (इन्द्र-पृथ्वी-बेंग)मे औपनिवेशिक शोषण आ सत्याग्रही प्रतिरोध के रूपक पढ़ब — ई साहित्य आ इतिहास के पारस्परिक पाठक (नव-इतिहासवाद के मूल प्रविधिक) सुन्दर प्रयोग हय; ध्वनि-दृष्टि से राजकथा औपनिवेशिक आ सामन्ती अत्याचार के आलोचना बन जाय हय।
३.११ मैथिली कविता में मिथिला के भूकम्प
प्रकृति के उद्दीपक रूपक वर्णन-बहुल मैथिली काव्य-परम्परा में ध्वंस के रूपक उपेक्षा के सैद्धान्तिक प्रश्न से ई निबन्ध खुजैत हय। ई में सन् १९३४ आ १९८८ के भूकम्प के काव्यात्मक अभिलेख के अध्ययन हय। कविवर सीताराम झा के ‘भूकम्प वर्णन’ आ कृष्णनन्दन सिंह के’ केम्पकारिका’ के तुलनात्मक अध्ययन में कम्पकारिका के ऐतिहासिक प्रलेख-मूल्य (भूकम्प-पूर्व मिथिला के राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक स्थिति सहित) रेखांकित कैल गेल हय — ई खाली विनाश-वर्णन न, तत्कालीन मिथिला के राजनीति, अर्थव्यवस्था, भ्रष्टाचार, वस्तु-मूल्य आ पुनर्निर्माण के काव्यात्मक दस्तावेज हय। अठारह वर्ष के वयस में भोगल त्रास के अड़तीस वर्ष तक स्मृति में जिआ के काव्यबद्ध करे के मनोवैज्ञानिक टिप्पणी, दरभंगा अस्पताल आ चतुर्भुज स्थान के करुण-व्यंग्य-मिश्रित चित्र, आ १९८८ के भूकम्प-काव्य-संकलन से यात्री, चन्द्रभानु सिंह, धीरेन्द्र आ जीवकान्त के साक्ष्य — सब मिलि आपदा-साहित्य के एक लघु इतिहास बन जाय हय। धीरेन्द्र के पाँती में विपत्ति में मनुजता के एक होके जाय के निरीक्षण करुण-रस के सामाजिक परिणति के सूचक हय।
करुण आ भयान के रस के संयोजन ई अध्याय केन्द्र हय। घर, अस्पताल, मन्दिर, बाजार, राजभवन, गरीब के झोपड़ी — सब विनाश के समान परिधि में आबि जाय हय, मुदा समान प्राकृतिक आघात के सामाजिक परिणाम असमान होय हय। पर्यावरणीय आलोचना से प्राकृतिक घटना आ सामाजिक निर्मिति के अन्तर साफ होय हय — भूकम्प प्राकृतिक हय, मुदा कमजोर भवन, सरकारी उपेक्षा, असमान संसाधन आ राहत के राजनीति मानवीय निर्णय के परिणाम हय। विदेह समान्तर इतिहास में विपत्ति साहित्यिक इतिहास के वैध विषय बनै हय।
३.१२ कथी ले लगेलिऐ हे कोसी माइ
बाढ़ि-साहित्य के ई प्रवृत्ति-सर्वेक्षण आरसी प्रसाद सिंह के हाकरोस से आरम्भ होके चन्दा झा, यात्री (कौशिकी के धार), लक्ष्मीपति सिंह, चन्द्रभानु सिंह, सियाराम झा ‘सरस’ आ सुकान्त सोम तक पसरल हय। ई अध्याय में कोसी आ मिथिला के आन नदी सब के मातृरूप, जीवनदायिनी शक्ति आ विनाशकारी बाढ़ि — तीनू रूप में देखल गेल हय। ‘नदी मातृ के क्षेत्र’ के शास्त्रीय गौरव आ प्रतिवर्ष के जल-प्रलय, भूख, विस्थापन, ऋण आ पलायन के यथार्थ के बीच के विडम्बना के लेखक कोसी-माइ के लोकगीतीय उपराग से जोड़के दे हथिन — माइ के प्रकोप मानके मनौती करै लोक-मानस के चित्रण सांस्कृतिक अध्ययन के सामग्री हय। कोसी के’माइ’ रूप सांस्कृतिक आत्मीयता पैदा करै हय, मुदा कविता में ई माइ से प्रश्न भी कैल जाय हय — भक्ति आ प्रतिरोध एकसाथ उपस्थित हय। सुकान्त सोम के कविता में मन्त्री के हवाई-सर्वेक्षण के व्यंग्य — सुखाएल बाँस के फट्ठी जइसन आकृति सभ के ऊपर उड़ैत विमान आ अखबार में एकगो हरियर मुस्काइत चेहरा — सत्ता-आलोचना के तीक्ष्णतम उदाहरण के रूप में उद्धृत हय। राहत-सामग्री के लूट, साँप-मूस के मिलन आ पारिस्थितिकीय क्षति के प्रसंग बाढ़ि के प्राकृतिक आपदा से आगू राजनीतिक-नैतिक प्रश्न बना दे हय। पर्यावरणीय आलोचना के दृष्टि से ई अध्याय मनुष्यकेन्द्रित सीमा पार करै पशु-पक्षी, बगुला, खेत, पोखरि, वनस्पति आ पूरा जीव-मण्डल के त्रासदी देखाबै हय; नदी के प्राकृतिक प्रवाह, बान्ह, तटबन्ध, राहत-व्यवस्था, सरकारी सर्वेक्षण आ भ्रष्टाचार एक जटिल राजनीतिक पर्यावरण बनावै हय। विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि से बाढ़ि मिथिला के बाहरी दुर्घटना न, ओकर सामाजिक संरचना, लोकगीत, स्मृति, अर्थव्यवस्था आ पलायन के निर्णायक इतिहास हय।
३.१३ मैथिली महाकाव्य में युग-सन्दर्भ
पाँच महाकाव्य — सुभद्राहरण (मुंशी रघुनन्दन दास), राधाविरह (मधुप), अगस्त्यायनी (मार्कण्डेय प्रवासी), त्रिपुण्ड (धीरेन्द्र) आ पराशर (किरण) — के चयन पाँच युगीन प्रयोजन के आधार पर कैल गेल हय: स्वाधीनता-संघर्ष, नारी-सशक्तीकरण, राष्ट्रीय भावात्मक एकता, श्रम-निष्ठ युवा-शक्ति आ मैथिल उपराष्ट्रीयता। पौराणिक कथानक के भीतर समकालीन इतिहास पढ़े के ई पद्धति — जहल से पुत्र के पत्र पाबि लिखल सुभद्राहरण में असहयोग आन्दोलन के कर-बहिष्कार, अगस्त्यायनी में भाषा-विवाद के समाधान रूप में शिव के डमरू से तमिल-संस्कृत के युगपत् जन्म, पराशर में’अन्न हय प्राण’ के श्रम-घोष आ सीता के मुहेँ मिथिला के लोकतन्त्री गौरव — रूपक-पाठ (अन्योक्ति-व्याख्या)के सफल प्रयोग हय। नव-इतिहासवादी सिद्धान्त के अनुरूप पुराण के पात्र अपन प्राचीन समय में बन्द न रहै हथिन: अर्जुन स्वतन्त्रता सेनानी के कर्तव्यबोध के प्रतीक बनै हथिन; राधा राष्ट्र आ समाज-सुधार में स्त्री के सहभागिता के स्वर बनै हथिन; अगस्त्य उत्तर-दक्षिण समन्वयक वाहक बनै हथिन; त्रिपुण्ड में शिव कृषक आ श्रमिक बनै हथिन; पराशर में श्रम-प्रतिष्ठा, वर्णभेद-विरोध, भूख के समक्ष कर्मकाण्ड के निरर्थकता आ मैथिली अस्मिता व्यक्त हय। भारतीय काव्यशास्त्र के साधारणीकरण प्रक्रिया इहाँ साफ हय — पुराण के विशिष्ट पात्र आधुनिक जन के सामूहिक आकांक्षा के प्रतिनिधि बनै हथिन। रचना-काल आ प्रकाशन-काल के सावधान अभिलेखन ई अध्याय के इतिहास-लेखन के दृष्टि से भी प्रामाणिक बनावै हय।
३.१४ नऽव गीत में समाज-चेतना
‘नऽव गीत’ पद के प्रवर्तन आ परिभाषा ई निबन्ध के सैद्धान्तिक योगदान हय — ई वयोवर्ग के न, मूल्यबोध के द्योतक; नवीन गीत के उपरान्त रचल सब गीत नऽव गीत न। नऽव गीत पारम्परिक रूढ़ कथ्य, मिथ्या गौरव, उपदेशात्मकता आ भावु के विलाप से हटि आधुनिक सामाजिक विसङ्गति, औद्योगीकरण, महानगरीय त्रास, भूख, बेरोजगारी आ संघर्ष के लयात्मक रूप दे हय। यन्त्र-युग के उपज मानके ई में बुद्धि-तत्त्व आ भाव-तत्त्व के लयात्मक सम्मिश्रण के लक्षण-निर्धारण, आ प्राचीन गीत के गार्हस्थ्य शृंगार, चन्दा झा के भाव-विह्वलता, राष्ट्रीय चेतनावादी अतीत-गान आ मंचीय तुकबन्दी — चारू से एकर सीमा-रेखा खीचब वर्गीकरण-शास्त्र के सुन्दर अभ्यास हय। नऽव गीत में बुद्धि आ भावना विरोधी न, परस् पर पूरक हय; निजी दुःख सामूहिक सामाजिक संकट में साधारणीकृत होय हय। गंगेश गुंजन के’दूभि के पेंपी पर बड़ के गाछ पतरब’ के प्रतीक-व्याख्या — दलित-शोषित के नव चेतना पर प्रभु-वर्ग के पसरब — मार्क्सवादी पाठक संयत प्रयोग हय; बुद्धिनाथ मिश्र के जेठुआ मकइ आ मार्कण्डेय प्रवासी के फागुन-आह्वान के विश्लेषण नऽव गीत के वैविध्य के प्रमाणित करै हय। बालु पर लिखल इतिहास, माटि के डिबिया जइसन जरैत गाम — ई प्रतीक आधुनिक असमानता के तीव्र ध्वनि पैदा करै हय। मार्क्सवादी दृष्टि से सुविधा-भोगी वर्ग, विफल विकास-योजना, महानगर के प्रभुत्व आ ग्रामीण दण्ड के आलोचना हय; रूपवादी दृष्टि से नूतन प्रतीक, खण्डित बिम्ब आ बोलचाल के लय नऽव गीत के वैशिष्ट्य हय। अध्याय नऽव गीत के विविधता के कमजोरी न, जीवित विकास के प्रमाण मानै हय।
३.१५ मैथिली कविता के वर्तमान धारा
भुवनेश्वर-संगोष्ठी (२०१२)मे पठित ई आलेख रवीन्द्रनाथ आ सुब्रह्मण्यम भारती के साक्ष्य से भारतीय सामासिक संस्कृति के पट पर मागधी-प्राच्य परिवार के चारू सहोदरा (असमिया, ओड़िआ, बंगला, मैथिली)के साझा विरासत, विद्यापति के प्रभाव आ औपनिवेशिक भाषा-सत्ता के इतिहास के स्मरण करै मैथिली कविता के चारि वर्तमान धारा के निर्धारण करै हय: मानवजाति पर आएल संकट के चिन्ता (जीवकान्त के युद्ध-जर्जर शताब्दी के विदाइ), उपभोक्तावादी संस्कृति के विरोध, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के प्रतिरोध (सूचना-महापथ पर एकरेखीय विकास के मत्स्यन्याय), आ जैविक-सांस्कृतिक वैविध्य के क्षरण-चिन्ता (छओ बिगहा आठ कट्ठा के कलम-उजाड़ि, बगुला के पलायन)। जीवकान्त आ उदयनारायण सिंह’नचिकेता’ के कविता के आलोक में उपभोक्तावादी दानवता के विरुद्ध मानव के अस्तित्व आ सांस्कृतिक स्वायत्तता के संघर्ष विश्लेषित हय। उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से सूचना-साधन, बजार, उच्च प्रौद्योगिकी आ सांस्कृतिक प्रभुत्व के सम्बन्ध उद्घाटित होय हय — एकर आशय ई न जे बाहरी संस्कृति से सम्पर् के वर्जित हो, बल्कि एकतरफा प्रभुत्व स्थानीय भाषा, लिपि, जीवन-पद्धति आ कल्पनाशक्ति के समाप्त न करए। पर्यावरणीय दृष्टि से जैवविविधता, स्थानीय धान, आम के प्रजाति, पोखरि, बगुला आ प्राकृतिक आवास के विनाश आधुनिक कविता के चिन्ता बनै हय। आशबी के’अपेक्षित बहुमुखता’ के नियम — परिवेश से लड़बा खातिर कम से कम ओतने आन्तरिक वैविध्य चाही जतना परिवेश में हय — के प्रयोग मैथिली आलोचना में व्यवस्था-चिन्तन के प्रवेश हय, आ ई अस्तित्व-रक्षा के प्रश्न के भावुकता से निकालि विज्ञान के धरातल पर लाके दे हय। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से मैथिली कविता भारत आ नेपाल के साझा भाषिक जीवन, लोकज्ञान आ सांस्कृतिक बहुलता के रक्षा करै प्रतिरोध के काव्य बनै हय।
३.१६ मैथिली लोकगीत: अवस्था आ संरक्षण
जनकपुरधाम के राष्ट्रीय संगोष्ठी में कार्यपत्र पर टिप्पणी-रूप में प्रस्तुत ई आलेख’लोके च वेदे च’ के शास्त्रीय समानान्तरता से लोक-प्रतिष्ठा के भारतीय आधार जोड़ै हय। आरम्भ में लेखक प्रस्तुत आलेख के परिचयात्मक प्रवृत्ति के आलोचना करै हथिन आ माँग करै हथिन कि लोकगीत के खाली सूची न, ओकर सामाजिक कार्य, परिवर्तन आ विलुप्ति के कारण के विश्लेषण हो — जाँत के स्थान पर यन्त्र आ ढेकी के स्थान पर मिल आबि गेला पर श्रमगीत के भविष्य की होयत, ई प्रश्न बहुत सार्थक हय। लोकगीत के लेखक सामूहिक भावात्मक अभिलेख, परम्परागत ज्ञान, औषधीय अनुभव, कृषि-संस्कृति, पारिवारिक सम्बन्ध आ जीवन-संस्कार के भण्डार मानै हथिन — मेथी-हरदि के औषधीय गुण,’नानी के पीसल मेथी’ के सामाजिक अर्थशास्त्र, धोबिनियाँ के सोहाग के पौराणिक कथा-गुम्फन, तुलसी, बेल, बाँस जइसन प्रतीक अनुभवसिद्ध लोकज्ञान के अङ्ग हय। नारीवादी दृष्टि से अध्याय विशेष प्रखर हय: बेटी-जन्म के अवसाद आ भ्रूण-परीक्षा-पहिले के मरीच-प्रयोग के साक्ष्य, कन्या के सामाजिक अवमूल्यन, पतिद्वारा श्रम-शोषण, दहेज, सासु-ननद के नियन्त्रण आ नवविवाहिता के देहगत आकांक्षा लोकगीत में सुरक्षित हय। लगनी के अप्रस्तुत-विधान (लौंग के फूल, यमुना में जाल)के रस-सजग व्याख्या शिष्ट-लोक के कृत्रिम भेद के खण्डन हय। संरक्षण खातिर यूनेस्को के अमूर्त सांस्कृतिक सम्पदा-ढाँचा से चिन्हे के तीन आ संरक्षण के सात उपाय के प्रस्ताव — अभिलेखागार, सङ्ग्रहालय, क्षेत्रीय वर्गीकरण, प्रशिक्षित सङ्कलक, ध्वनि-अभिलेखन आ समुदाय के प्रति उपलब्ध करायब — आ समष्टि-चेतना आ ओगबर्न के सांस्कृतिक-तत्त्व-वैविध्य के सूत्र से नेपाल के नव लोकतन्त्र में लोकशक्ति के सांस्कृतिक आधार के तर्क व्यावहारिक नीति-प्रस्ताव के स्तर तक जाय हय, जे मैथिली आलोचना में दुर्लभ हय। विदेह समान्तर इतिहास में लोकगीत अशिक्षित समुदाय के मनोरञ्जन न, समाज के जीवित इतिहास हय।
३.१७ उपनिवेशवाद के नऽव चालि
समापन-निबन्ध उत्तर-औपनिवेशिक चिन्तन के व्यावहारिक शिखर हय आ राजनीतिक स्वतन्त्रता के बादो भाषिक उपनिवेशवाद के निरन्तरता उद्घाटित करै हय। तंजानिया के किस्वाहिली-प्रकरण के विस्तृत अध्ययन — स्वाधीनता (१९६२)के बाद शिक्षा के माध्यम बनावे के संकल्प, आर्थिक संकट, विश्व बैंक आ अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष के शर्त, निजीकरण, आ ब्रिटिश सहायता-योजना के माध्य में अंग्रेजी के पुनःस्थापन — से ई सूत्र निकालल गेल हय कि राजनीतिक उपनिवेश गेला के बाद भाषिक-सांस्कृतिक उपनिवेश आर्थिक सहायता के नव चालि से चलै हय। मेडागास्कर, जाम्बिया, मलेशिया आ भारत के (कर्पूरी ठाकुर-प्रसंग सहित) समान्तर दृष्टान्त, आ एके दिन (१९ नवम्बर २००८) पटना में ब्रिटिश मन्त्री के बालिका-विद्यालय आ अमेरिकी दूतावास के महिला-महाविद्यालय गमन के सूक्ष्म पाठ — जे स्त्री-शिक्षा के नव-विकसित क्षेत्र के औपनिवेशिक भाषा के प्रभाव-क्षेत्र बनावे के सुनियोजित चालि हय — विचारोत्तेजक हय।
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टि से लेखक के प्रमुख स्थापना हय — राज्यसत्ता छोड़के देब खाली उपनिवेशवाद के अन्त न; शासन के भाषा, ज्ञान के मानदण्ड, शिक्षा के माध्यम आ रोजगार के प्रवेश-द्वार पर अधिकार बनल रहला तक औपनिवेशिक सत्ता नव रूप में जीवित रहै हय। भारत में अंग्रेजी माध्यम के निजी विद्यालय के विस्तार, स्थानीय भाषा के प्रति शिक्षित वर्ग के हीनताबोध आ घर में पीढ़ीगत भाषा-संक्रमण के टूटन मैथिली के खातिर दूतरफा संकट पैदा करै हय। फिशमैन के भाषा-संक्रमण सिद्धान्त के सूत्र — अन्तरपुस्तीय मातृभाषा-संक्रमण के बिना भाषा-रक्षा असम्भव; जे भाषा अन्तर-पीढ़ीगत रूप से संक्रमित न होय हय, ओकर मृत्यु सुनिश्चित हय — आ मैथिल परिवारसभ से पारिवारिक भाषा के रूप में मैथिली के उठि जाय के दृष्टान्त ई निबन्ध के’मैथिली पर दू तरफा मारि’ के चेतावनी-पत्र बना दे हय। विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि से अध्याय के सबसे बेसी मार्मिक पक्ष पारिवारिक भाषा-विच्छेद हय — जब दादा-दादी पोता-पोती से संवाद न के पावै हथिन, तब खाली शब्द न, कथा, गीत, संस्कार, लोकज्ञान आ सामूहिक स्मृति भी टूटैत हय।
४. अध्यायवार सीमा, अन्तर्विरोध आ अपूर्णता
रमणजी के अपन घोषित सिद्धान्त हय कि आलोचना अभिनन्दन-पत्र न हय; व्यक्त विचार के सप्रमाण खण्डित करब वा वैमत्य राखब अवमानना न। समीक्षाशास्त्र में खाली प्रशंसा करब गुटबन्दी आ मित्र-मण्डली के संकीर्ण दायरा के पोसे के समान हय। तेँ ओही कसौटी पर, आ ओही आदर-भाव से, हरेक अध्याय के सीमा, वर्गीय विलोपन आ सैद्धान्तिक अपूर्णता के विवेचन नीचे प्रस्तुत हय। ई सीमा सब पोथी के मूल्य के घटबैत न हय, बल्कि आगाँ के अनुसन्धान खातिर’वादे वादे जायते’ के द्वार खोलै हय।
४.१ मैथिली आ मिथिला भाषा के अध्ययन: सीमा
पहिल सीमा स्रोत-केन्द्र के हय। अध्याय मुख्य रूप से पश्चिमी विद्वान् के (कोलब्रुक, बीम्स, हार्नले, ग्रियर्सन) साक्ष्य पर ठाढ़ हय; दीनबन्धु झा से पहिले के देशी वैयाकरण-चेतना — पाँजि-प्रबन्ध के भाषिक अभिलेख, ज्योतिरीश्वर-काल के शब्द-संग्रह-प्रवृत्ति, संस्कृत-टीका-परम्परा में मैथिली-प्रयोग के साक्ष्य — प्रायः अस्पर्शित रहि गेल। फलतः जे औपनिवेशिक ज्ञान-मीमांसा के आलोचना निबन्ध करै हय, तकरहि स्रोत-सामग्री पर ओ खुद आश्रित हो जाय हय — ई उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श के चिर-परिचित आत्म-विरोध हय। दोसर, औपनिवेशिक ज्ञान-निर्माण के अन्तर्विरोध के पर्याप्त विश्लेषण न हय: ग्रियर्सन के कार्य मैथिली के पहचान के साधन भी हल आ औपनिवेशिक जनगणना, वर्गीकरण आ प्रशासन के उपकरण भी; कैम्पबेल (१८७४)के शब्द-संग्रह के खाली प्रशासनिक सुविधा मानब, आ ग्रियर्सन द्वारा कैल गेल औपभाषिक विभाजन — पूर्वी रूप के ‘गँवारी’ आ निम्नवर्ग के भाषिका के ‘जोलहा बोली’ कहब — के वर्ग-विभेदी पक्ष के न चिन्हब, प्राच्यवादी ज्ञान-संचय के ओ आलोचना से वञ्चित रह जाय हय कि ई द्वैधता के अधिक गम्भीरता से खोलि सकै हल। तेसर, कार्यभार आ कार्य-पारदर्शिता के सिद्धान्त के प्रयोग आरम्भ त भेल, मुदा मैथिली के अलग-अलग प्रक्षेत्र (शिक्षा, प्रशासन, व्यापार, धर्म, संचार)मे प्रयोग के कोनो क्षेत्रवार विवरण वा तुलनात्मक आकलन न — सिद्धान्त उदाहरण के (अंग्रेजी, संस्कृत) स्तरहि पर रहि गेल, मैथिली के मापन न भेल। चारिम,’मान के मैथिली’ के निर्धारण में आन उपभाषा-रूपक सामाजिक अधिकार के प्रश्न — मान के कोन शक्ति-संरचना से बनै हय — अनुत्तरित हय; भाषा के अवनति के कारण बाहरी आक्रमण आ प्रशासनिक उपेक्षा में केन्द्रित हय, मैथिल समाज के आन्तरिक जातिगत विभाजन, शिक्षित वर्ग के भाषिक उदासीनता, स्त्रीशिक्षा के अभाव आ आर्थिक संरचना के भूमिका तुलनात्मक रूप से कम विश्लेषित हय। पाँचम, अंग्रेजी पाद-टिप्पणी के बाहुल्य बिना अनुवादक हय, आ निबन्ध के समापन प्रश्न-शृंखला में विसर्जित हो जाय हय — व्याकरण-लेखन के विलम्ब के जे कारण-मीमांसा आरम्भ भेल हल, ओकर सुगठित निष्कर्ष-सूत्र पाठक के खुद जोड़ऽ पड़ै हय।
४.२ रमानाथ झा आ मिथिला भाषा: सीमा
संग्रह के ई दीर्घतम अध्याय संरचना के दृष्टि से शिथिल हय — प्रत्यालोचना, जीवनी, भाषा-प्राचीनता, लिपि-विमर्श, मानकीकरण आ भाषा-प्रबन्धन: छह स्वतन्त्र निबन्ध के सामग्री एके छत्र में अटकावल गेल हय, जेसे तर्क के धार ठाम-ठाम मोथरा जाय हय। दोसर, सन्तुलन के घोषित प्रतिज्ञा के बादो स्वर कतको स्थान पर आलोचनात्मक जीवन-विवेचन से अधिक प्रतिरक्षात्मक श्रद्धाञ्जलि बन जाय हय: किरणजी के मत-खण्डन के ‘आवेगात्मक’ आ ‘सुविचारित न’ कहल गेल, मुदा विरोधी पक्ष खातिर प्रयुक्त लेखक के अपन शब्दावली (‘कौचर्य-प्रवीण’, ‘खिधांस’, ‘लटुआएल-दबकल’) भी आवेग से पूरा तरह से मुक्त न — प्रत्यालोचक जे तटस्थता के माँग करै हथिन, से खुद हुन के भाषा में कहीं-कहीं भंग होय हय; विरोधी मत के तर्क के निष्पक्ष पुनर्निर्माण न कैल गेला पर प्रत्युत्तर के विश्वसनीयता घटै हय। तेसर, हाउगेन-फर्गुसन के परवर्ती सिद्धान्त से रमानाथ झा के पूर्ववर्ती कार्य के संगति देखाएब जतना आकर्षक हय, ततबे कालदोष के जोखिम से भरल — ई संगति सप्रयोजन नियोजन हल की आकस्मिक समान्तरता, एकर विवेचन न भेल। चारिम, मैथिली के बहुत प्राचीन अस्तित्व सिद्ध करे के उत्साह में महाकाव्य, बौद्धकाल वा प्राचीन जनपद से सम्बन्धित किछु निष्कर्ष भाषावैज्ञानिक प्रमाण के अपेक्षा सांस्कृतिक अनुमान पर अधिक आधारित बुझाय हय — ‘मिथिला’ नाम के प्राचीनता स्वतः वर्तमान मैथिली भाषा के अखण्ड रूपक प्रमाण न बनै हय। पाँचम, रमानाथ झा के अपन सीमा — जेना हुन के शब्दानुवाद के नीरसता जकर चर्च दसम अध्याय में खुद लेखक करै हथिन, हुन के मानकीकरण-प्रतिरूप के व्यावहारिक असफलता, वा मानकीकरण में आभिजात्य वर्ग के भाषिक रूप के प्राथमिकता देला से आन वर्ग-क्षेत्र के मैथिली के अवमूल्यन के प्रश्न — ई अध्याय में प्रायः मौन हय; व्यक्ति-समर्थन आ सिद्धान्त-समर्थन एक वस्तु न, आ प्रशंसा के आधिक्य से चरित्र पूर्ण मानवीय व्यक्तित्व के बदला आदर्शीकृत प्रतिमा बने के जोखिम में पड़ै हय। छठम,’साहित्य-पत्र’ के बन्द होय के आरोप के जे खण्डन हय, ओ तर्काश्रित बेसी, अभिलेखाश्रित कम — पत्रिका के अर्थ-व्यवस्था, ग्राहक-संख्या वा बन्द होय के प्रत्यक्ष कारण के कोनो दस्तावेज न देल गेल।
४.३ प्रत्यालोचक किरणजी: सीमा
पहिल, अध्याय केन्द्रीय स्थापना — किरणजी के आलोचना मूलतः प्रत्यालोचना हय, स्वतन्त्र कृति-अवगाहन से न जनमल — एकगो गम्भीर न्यूनीकरण के जोखिम रखै हय; प्रत्यालोचना के स्वभाव प्रतिक्रियात्मक होय हय आ ई अध्याय में किरणजी के विचार प्रायः पूर्ववर्ती निष्कर्ष के खण्डन के माध्यम से सामने आबै हय, हुनकर स्वतन्त्र सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिमान अधिक व्यवस्थित रूप में निर्मित न होय हय। जे ‘प्रतिक्रियावादिता’ के प्रश्न लेखक खुद उठावै हथिन, से बिना पूर्ण उत्तर के छोड़के देल गेल हय — प्रश्न उठा के ओकर मीमांसा से बचि जाएब आलोचकीय दायित्व के अधूरा निर्वाह हय। दोसर, विरोधाभास-प्रदर्शन में उद्धरण-चयन एकतरफा हय: किरणजी के जे स्थल सब में आत्म-संशोधन वा मत-परिमार्जन भेल हो, से खोजल न गेल; कोनो चिन्तक के चालीस वर्ष के लेखन में मत-भिन्नता विकास भी होके सकै हय, खाली विरोधाभास न। तेसर, कुलानन्द मिश्र के चन्द्रग्रहण-प्रसंग अपूर्ण हय — मिश्रजी के मूल आपत्ति के पूरा तर्क-पक्ष न राखल गेल, खाली खण्डनीय अंश उद्धृत भेल। चारिम, सामाजिक न्याय आ लोकमंगल के आग्रह महत्त्वपूर्ण हय, मुदा साहित्य के खाली विचारधारात्मक उपयोगिता से मापल गेला पर रूप, लय, जटिलता, हास्य, विरोधाभास आ कलात्मक स्वतन्त्रता के अवमूल्यन होय के आशङ्का रहै हय; किरणजी के क्रान्तिकारी वर्ग-दृष्टि के पारम्परिक अलंकारशास्त्र के चौखठि में बान्हि देला से ओकर सामाजिक धार कुनहटएबा के जोखिम भी हय — दूषण-पाँजि आ कौलीनतावादी शुद्धतावाद के जे आन्तरिक विखण्डन के ओर किरणजी के लेखन के संकेत हल, से पूर्ण विकसित न भेल। पाँचम,’मैथिल आँखि’ स्थानीय दृष्टि के सशक्त अवधारणा हय, मुदा एकर सीमा साफ न — की ई दृष्टि सब जाति, लिङ्ग, वर्ग, धर्म आ क्षेत्र के मैथिल अनुभव के समान रूप से ग्रहण करै हय, वा शिक्षित पुरुष-केन्द्रित सांस्कृतिक दृष्टि फेर’पूरा मिथिला’ के नाम पर स्थापित होय हय? छठम, किरणजी के काव्य-कृति (पराशर जइसन)के आलोचकीय दृष्टि से हुन के आलोचना-गद्य के अन्तर्सम्बन्ध के — कवि-आलोचक के द्वैध व्यक्तित्व के — कोनो विवेचन न; ई पक्ष तेरहम अध्याय में फराक चलि गेल, दुनू के सेतु न बनल। साथे, प्राचीन रचना सब में आधुनिक राष्ट्रीयता, वर्ग-संघर्ष वा लोकतान्त्रिक मूल्य खोजै काल ऐतिहासिक दूरी के सावधानी हरदम न राखल गेल हय।
४.४ कन्यादान-पाठ: सीमा
ई प्रखर निबन्ध के पहिल सीमा हय प्रश्न-शृंखला के अनुत्तरता — ‘एकर उत्तरदायी के?’ बेरि-बेरि पूछल गेल (अशिक्षा? माए-बाप? सर-कुटुम्ब? समाज?), मुदा लेखक अपन निर्णय सप्रमाण न देलथिन; उपेक्षिता के आँखि से पढ़े के जे प्रतिज्ञा हल, से अन्त में प्रश्नवाच के मुद्रा में स्थगित होके गेल। दोसर, कन्यादान के हास्य-रस के पक्ष — जे कृति के लोकप्रियता के मूलाधार हय — के रस-शास्त्रीय परीक्षा न भेल: हास्य के आलम्बन अबोध बुच्ची हय की खुद अर्ध-शिक्षित समाज, हास्य के भीतर करुण के अन्तर्धारा कोन विन्यास से बहैत हय, कथावाचक के दूरी आ विडम्बनात्मक द्वयर्थता के विश्लेषण, आ पाठक के असहज हँसी के परीक्षण — ई प्रश्न अस्पर्शित रहल; कतको स्थान पर पुनर्पाठ अभियोग-पत्र बन जाय हय आ साहित्यिक पात्र के हरेक व्यवहार के प्रत्यक्ष सामाजिक यथार्थ मानके लेखक वा कृति के नैतिक दोष निर्धारित करब विधागत रूप से जोखिमपूर्ण हय, कारण कन्यादान हास्य, व्यङ्ग्य, विडम्बना, अतिरञ्जना आ सामाजिक प्रकार-निर्माण के रचना हय। तेसर, द्विरागमन — जेमें हरिमोहन झा खुद कथा के उत्तर-पक्ष रचलनि — के चर्चा के अभाव से मूल्याङ्कन आधा पाठ पर ठाढ़ हय; उपन्यास-युग्म के समग्र पाठेँ लेखकीय दृष्टि के न्याय होके सकै हल। चारिम, पूर्ववर्ती उपन्यास के साक्षर नारी-पात्र के जे तालिका हय, ओ मात्रात्मक साक्ष्य हय — ओ पात्र सभ के साक्षरता कथानक में कतना केन्द्रीय हय आ बुच्ची के निरक्षरता कतना, ई गुणात्मक तुलना के बिना’पीछे हटब’ के स्थापना पूर्ण-प्रमाणित न कहल जा सकै हय। पाँचम, बुच्ची के निरक्षरता खुद व्यंग्य के अस्त्र — समाज के आत्म-दर्शन के दर्पण — रूप में सप्रयोजन रचना त न हय, ई प्रश्न छूटल; साथे बुच्ची दाइ के सम्भावित अन्तःचेतना, मौन के प्रतिरोधी अर्थ, स्त्री-समुदाय के पारस्परिक सम्बन्ध आ घरेलू ज्ञान के विस्तार पूरा रूप से विकसित न भेल। छठम, पति-पत्नी में भाषिक असमानता के प्रश्न मूल्यवान हय, तबो हिन्दी बोलब खाली सांस्कृतिक अनात्मीयता के निश्चित प्रमाण मानब सरल निष्कर्ष होके सकै हय — वर्ग, शिक्षा, नगर-ग्राम दूरी आ वैवाहिक अपरिचय के संयुक्त प्रभावक विश्लेषण अपेक्षित हल।
४.५ अनालोचित कवि लक्ष्मीपति सिंह: सीमा
लेखक खुद स्वीकारै हथिन कि छिड़िआएल कविता में से ‘किछु मात्रे झोड़ि’ सकलथिन — ई ईमानदार स्वीकारोक्ति प्रशंसनीय हय, मुदा एकर परिणाम ई जे निष्कर्ष सब (निरपेक्षता, अनुदार समकालीनता के शिकार) सीमित नमूना पर ठाढ़ हय आ सामान्यीकरण के वैधता संदिग्ध रहै हय — सीमित आ बिखरल उदाहरण के आधार पर कवि के पूरा काव्य-दृष्टि निर्धारित करब सावधानी माँगै हय। दोसर, कतको प्राकृतिक प्रतीक के प्रत्यक्ष राजनीतिक रूपक मानल गेल हय — ‘पछबा’ पाश्चात्य संस्कृति आ ‘शरदागम’ औपनिवेशिक क्षय के प्रतीक अवश्य होके सकै हय, मुदा प्रतीक के ई अर्थ कविता के आन्तरिक संरचना, रचनाकालीन साक्ष्य आ आन कविता से पुष्ट होय के चाही; जीवनीपरक तथ्य आ काव्यार्थ कतको स्थान पर एक-दोसर में मिलि जाय हय, आ कवि के जीवन के राष्ट्रीय वातावरण से ई स्वतः सिद्ध न होय हय कि हरेक प्रकृति-कविता राजनीतिक ध्वनि रखै हो। तेसर, गद्य-कृति — श्रीचामुण्डा आ पंचवटी उपन्यास — के नाममात्र उल्लेख भेल; ‘अनालोचित’ के पुनर्वास के जे प्रतिज्ञा हल, से कविता तक सीमित रहि गेल आ कवि के आधा व्यक्तित्व एहू अध्याय के बाद अनालोचिते रहल। चारिम, विवरण-बाहुल्य हय — जीवन-वृत्त, पत्रिका-नाम, तिथि — मुदा काव्य-शास्त्रीय विश्लेषण (छन्द-विधान, बिम्ब-योजना, भाषिक स्तर)’शरदागम’ आ’पछबा’ के बाहर विरल हय; फलतः लक्ष्मीपति सिंह महत्त्वपूर्ण विचार के रूप में उभरैत हथिन, मुदा कवि के विशिष्ट कलात्मक स्वर कम साफ होय हय। पाँचम, कवि के दरबारी-सामन्ती परिवेश के सान्निध्य से हुन के वर्ग-दृष्टि कइसे प्रभावित भेल — पाश्चात्य संस्कृति के विरोध के संग गाम के जमीन्दारी शोषण के विरुद्ध हुन के काव्य में कोन स्वर हय — ई वर्ग-प्रश्न अस्पर्शित रहल। छठम, कवि के हिन्दी-लेखन आ मैथिली-लेखन के अन्तर्सम्बन्ध के प्रश्न — द्विभाषिक कवि-चेतना के गति — उठावल न गेल, जब कि पोथी के अन्तिम अध्याय के द्विभाषिकता-विमर्श से एकर सोझ संगति बनि सकै हल।
४.६ यात्री के भाषा: सीमा
पहिल, चारू उपकरण पश्चिमी शैलीविज्ञान से आनल गेल हय आ भारतीय काव्यशास्त्र से संगति-स्थापन (‘निरंकुशाः कवयः’, वक्रोक्ति-सम्प्रदाय) संकेत-खाली रहि गेल; कुन्तक के छह वक्रता-भेद से चयन-विचलन के व्यवस्थित मिलान भेल रहितै के त पूर्व-पश्चिम-सेतु पूर्ण बनितै के — से अवसर छूटि गेल। दोसर, उदाहरण चयन मुख्य रूप से सफल भाषिक प्रयोग पर केन्द्रित हय आ विश्लेषण-सामग्री मुख्य रूप से पत्रहीन नग्न गाछ पर; यात्री के कमजोर, अतिशय कृत्रिम, अस्पष्ट वा समयबद्ध शब्दनिर्माण के परीक्षण, आ हुन के परवर्ती संग्रह आ गद्य के व्यवस्थित समावेश कैल गेल रहितए त’यात्री के भाषा’ के समग्र चित्र आरो सन्तुलित होय। तेसर, विचलन के कतको स्थान पर खुद सौन्दर्य के प्रमाण मानल गेल हय, मुदा हरेक व्याकरणिक उल्लङ्घन कलात्मक न होय हय — औचित्य, प्रसङ्ग, अर्थ-स्पष्टता आ पाठकीय प्रभावक कसौटी पर हरेक विचलन के अलग परीक्षा आवश्यक हय। चारिम,’भाषा के भूगोल’ के आकर्षक रूपक अपरिभाषित रहल — एकर मानचित्रण (कोन अंचल के, कोन वर्ग के, कोन व्यवसाय-क्षेत्र के शब्द-सम्पदा यात्री कहाँ से अनलनि) बिना ई रूपक अलंकारे रह जाय हय, विश्लेषण-उपकरण न बनै हय; साथे’देशज’ के गौरव उचित हय, मुदा भाषा सदा मिश्रित आ परिवर्तनशील होय हय — देशज आ आगन्तुक के कठोर विभाजन खुद ऐतिहासिक रूप से अस्थिर हय। पाँचम, समानान्तरता-खण्ड में मामा-गीत के उद्धरण दीर्घ हय मुदा ओकर सामाजिक व्यंग्य-पाठ (मध्यवर्गीय जीवन-वृत्त के विडम्बना) संक्षेप में निपटा देल गेल — शैली-विश्लेषण अर्थ-विश्लेषण से आगू भागि गेल; ध्वनि-संरचना, वाक्य-दीर्घता, कथन-स्वर, संवाद, व्यङ्ग्य के बहुस्तर, भाषिक संकरता आ अलग-अलग विधा में भाषा-परिवर्तन के पर्याप्त विवेचन भी न हय।
४.७ मनमोहन झा: सीमा
ई संग्रह के लघुतम अध्याय हय आ एकर लघुते एकर मुख्य सीमा हय।’अनालोचित पक्ष’ के घोषणा भेल, मुदा विश्लेषण कथा-सार के स्तर पर रहि गेल — पात्र के उद्धरण हय, कथा-शिल्प के (दृष्टिबिन्दु, कथन-भंगिमा, समय-विन्यास, संवाद, कथन-गति, करुणा आ राष्ट्रीयता के रचनात्मक सन्धि के) विवेचन न। अध्याय पात्र के कथन, कथावाचक के दृष्टि आ लेखक के विचार में पर्याप्त भेद न करै हय — कोनो पात्र राष्ट्र वा मिथिला के खातिर आत्मोत्सर्ग के बात कहै हय, ओसे पूरा कथा वा लेखक के अन्तिम विचार स्वतः निर्धारित न होय हय। राष्ट्रीयता आ मैथिल उपराष्ट्रीयता के प्रायः सकारात्मक नैतिक मूल्य मानके खातिर गेल हय — राष्ट्रवाद के भीतर जाति, वर्ग, लिङ्ग, धर्म आ क्षेत्रीय प्रभुत्व के सम्भावना प्रश्नांकित न भेल, आ उपराष्ट्रीय गौरव के भीतर निम्नवर्गीय समाज के मूल प्रश्न (भूख, बेगारी) ओझल रहि गेल। आत्मबलिदानी स्त्री-पात्र सभ के प्रशंसा करै समय ई पूछब आवश्यक हल जे स्त्री के स्वाधीनता हुनकर अपन जीवन-चयन में हय वा पुरुष-निर्धारित राष्ट्र आ संस्कृति के खातिर बलिदान में — नारीवादी दृष्टि से त्याग के महिमामण्डन पितृसत्तात्मक आदर्श के फेर पुष्ट करि सकै हय। करुण-रस के ख्याति आ नव-प्रतिपादित राष्ट्रीय स्वर के अन्तःसम्बन्ध के रस-शास्त्रीय मीमांसा — करुणा राष्ट्रीय चेतना के उद्दीपन बनै हय की अवरोध — पूरा तरह से अस्पर्शित हय। निधन के दसम दिन लिखल गेला के कारण श्रद्धांजलि के आर्द्र स्वर आलोचना के तटस्थता पर भारी हय; बंगला कथा के प्रभावक जे प्रचलित चर्च हय, ओकर परीक्षण स्थगित रहि गेल।
४.८ प्रवासी के योगदान: सीमा
पहिल, प्रवासी-निवासी के निर्धारण हेतु विदेशी मुद्रा-विनिमय अधिनियम के विधिक कसौटी के प्रयोग साहित्यिक-सांस्कृतिक विश्लेषण खातिर अटपटाह हय — लेखक खुद एकर असंगति देखाबै हथिन, मुदा तब अपन वैकल्पिक कसौटी (‘सांस्कृतिक मिथिला के सघनता’)के कोनो परिचालनीय परिभाषा न दे हथिन; नेपाल-तराइ के सांस्कृतिक निरन्तरता के कारण’प्रवास’से बाहर रखे के तर्क भावनात्मक रूप से सशक्त हय, मुदा राजनीतिक सीमा, नागरिकता, प्रशासन, आर्थिक सम्बन्ध आ भिन्न ऐतिहासिक अनुभव के वास्तविकता भी विचारणीय हय। दोसर, प्रवासी पत्रकारिता के इतिहास मुख्य रूप से शिक्षित पुरुष सम्पादक आ प्रतिष्ठित पत्रिका के इतिहास बनि रह जाय हय — महिला सम्पादक, मुद्रक, वितरक, पाठिका, आर्थिक सहयोगी, ग्रामीण ग्राहक आ पत्राचार-लेखक के भूमिका बहुत कम देखाय हय; साथे सम्पादक-वर्ग के अपन सामाजिक स्थिति — जमीन्दार-संभ्रान्त वर्ग के संरक्षण आ ओकर वैचारिक प्रभाव — के वर्ग-विश्लेषण न भेल। तेसर, अध्याय आँकड़ा-रहित हय — कोन पत्रिका कतना दिन चलल, प्रसार-संख्या, ग्राहक-वर्ग, वितरण-क्षेत्र, अर्थ-स्रोत, नियमितता, प्रतिबन्ध, राजकीय दबाव आ पाठकीय प्रतिक्रिया — पत्रकारिता के इतिहास-लेखन जे परिमाणात्मक आधार के अपेक्षा करै हय, से इहाँ न हय; पत्रिका के वैचारिक प्रभावक आकलन मुख्य रूप से सम्पादकीय सामग्री से भेल हय। चारिम, स्वाधीनोत्तर काल के सर्वेक्षण असन्तुलित हय — मिथिला दर्शन के चर्च भेल, मुदा दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता के परवर्ती पत्रिका-प्रयास’नाम गनाएब’से आगू न गेल। पाँचम, प्रवासी-योगदान के छाया-पक्ष — प्रवास-जन्य आदर्शीकरण, मिथिला के यथार्थ से दूरी, भावु के अतीत-मोह — के आलोचनात्मक परीक्षा न भेल; योगदान के अभिनन्दन हय, योगदान के सीमा के हिआओल न। छठम, पत्रकारिता आ साहित्यिक पत्रिका के सीमा कतको स्थान पर धुँधला हय — साहित्यिक विशेषाङ् के, सामाजिक पत्रिका, समाचार-पत्र आ विचार-पत्र के अलग कार्यपद्धतिक अधिक साफ वर्गीकरण अपेक्षित हल।
४.९ दीनाभद्री: सीमा
पहिल, पाठ-प्रामाणिकता के जे केन्द्रीय प्रश्न उठावल गेल — कोन पाठ आधार मानल जाए — ओकर समाधान लेखक खुद न देलथिन; समीक्षित पाठ के समालोचनात्मक संस्करण (पाठान्तर-सूची सहित) तैयार करे के जे स्वाभाविक अगिला डेग हल, से प्रस्तावो रूप में न आएल। साथे लोकगाथा के एक मूल पाठ खोजे के प्रवृत्ति खुद मौखिक परम्परा के बहुरूपता से मेल न खाय — हरेक क्षेत्र, गायक, अवसर, जातीय उपसमूह आ पीढ़ी अपन पाठ निर्मित करै हय। दोसर, ग्रियर्सन के संकलन महत्त्वपूर्ण हय, मुदा औपनिवेशिक सङ्कलक, अनुवादक, लिप्यन्तरक आ सम्पादक के मध्यस्थता के आलोचनात्मक परीक्षण पर्याप्त न — घुमन्तू गायक के जीवित प्रस्तुति लिखित पाठ में आबि कतना बदलल, ई प्रश्न आवश्यक हय। तेसर, महेन्द्रनारायण राम आ फूलो पासवान के दावा के खण्डन में जे कठोरता हय (‘इतिहास-सम्मत न’, ‘नकारात्मक दृष्टि’), से हुन के संकलन-श्रम के स्वीकृति के संग सन्तुलित न भेल — प्रत्यालोचना के जे मर्यादा-सूत्र तेसर अध्याय में प्रतिपादित हय, से इहाँ किछु शिथिल हय। चारिम — आ ई गम्भीरतम — दलित लोकगाथा के विवेचन पूरा तरह से अभिजात आलोचकीय स्थिति से भेल हय: मुसहर समुदाय के अपन गायक, अपन भगता, अपन वर्तमान वाचिक परम्परा के कोनो प्रत्यक्ष साक्ष्य (क्षेत्र-कार्य) न हय; जे तेलुगु दलित-विमर्श के उद्धरण अध्याय में हय — जे कहै हय कि दलित-विषय में बाजबा के अधिकार पर खुद दलित-स्वर के दावी हय — ओकर आलोक अपनहि पद्धति पर न पड़ल; बाहरी आलोचक के व्याख्या आ समुदाय के आत्मव्याख्या में अन्तर होके सकै हय। दीनाभद्री के गाथा के प्रेतयोनि से मुक्ति आ तीर्थ-पूजा जइसन सनातनी ढाँचा में रखके पढ़ला से हुन के स्वायत्त विद्रोही रूपक संस्कृतिकरण के जोखिम भी प्रश्नांकित न भेल। पाँचम, गाथा के स्त्री-पात्र (निरसो, हिरिया, जिरिया)के भूमिका के स्वतन्त्र विश्लेषण न भेल — निम्नवर्गीय विमर्श के भीतरो नारी-स्वर हाशिये पर रहि गेल; साथे मुसहर समुदाय के आन्तरिक विविधता, अनुष्ठान, प्रस्तुति-सन्दर्भ, आर्थिक परिवर्तन आ वर्तमान राजनीतिक उपयोग के विस्तृत क्षेत्रीय अध्ययन अपेक्षित हल।
४.१० कथा के विकास: सीमा
पहिल, चन्द्रप्रभा के तिथि-निर्धारण (रचना १८८० के दश के तक) मुख्य रूप से सम्पादक लक्ष्मीपति सिंह के स्मृति-कथन (‘साठि-सत्तरि वर्ष पहिले के’) आ जीर्ण-शीर्ण पाण्डुलिपि के वर्णन पर आधारित हय — पाण्डुलिपि-विज्ञान के कोनो बाह्य कसौटी (कागज, मसि, लिपि-शैली के काल-निर्धारण)के अभाव में प्रस्थान-बिन्दु के ई पुनर्स्थापन ओतने दृढ़ न हय जतना निबन्ध के स्वर सुझबैत हय; जे कठोरता से रामदेव झा के मदनराज-चरित-विषय के तिथि-भ्रम के खण्डन भेल, ओही कठोरता के प्रयोग अपन पक्ष के साक्ष्य पर न भेल — ई मापदण्ड के द्वैध हय। दोसर, आत्म-सन्दर्भ के सघनता — मैथिली के आरम्भिक कथा, मिथिला दर्पण, निर्दयी सासु आदि उद्धृत स्रोत के सम्पादक खुद लेखक हथिन; सम्पादन-श्रम स्तुत्य हय, मुदा अपनहि सम्पादित सामग्री के निर्णायक प्रमाण बनएबा में स्वार्थ-संलग्नता के आभास अनिवार्य हय, जकर कोनो पद्धतिगत निराकरण (स्वतन्त्र साक्ष्य से पुष्टि) न कैल गेल। तेसर, जलधर झा के ‘विलक्षण दाम्पत्य’ के विधागत स्वरूप — रम्य-रचना, समाचार-मूल के गद्य की कथा — के जे विवाद हय, से अनिर्णीत छोड़ल गेल;’आद्य कथा माने के औचित्य न’ कहल गेल मुदा कथात्व के कसौटी (कथानक, चरित्र, परिणति) सूत्रबद्ध न भेल — मौखिक आख्यान, व्रतकथा, नीति-कथा, आख्यायिका, उपन्यास आ आधुनिक लघुकथा के विधागत भेद भी पर्याप्त कठोरता से निर्धारित न हय। चारिम, लुप्त सामग्री के सम्भावना इतिहास के महत्त्वपूर्ण प्रश्न हय, मुदा ‘उपलब्ध न हय’से’अवश्य हल’ तक पहुँचब अनुमान के छलाँग होय हय — पाण्डुलिपि, उल्लेख, प्रकाशन-विज्ञापन, पत्राचार आ समकालीन समीक्षा जइसन बाहरी साक्ष्य आवश्यक हय; वाचिक कथा-परम्परा के तेसर धारा के स्थापना भी रमानाथ झा के प्राचीन कथन पर आश्रित हय, स्वतन्त्र क्षेत्र-साक्ष्य अनुपस्थित। पाँचम, पुरुषपरीक्षा के अनुवाद प्रभावहीन हल — ई सम्भव निष्कर्ष हय, मुदा एकर प्रचार, पाठक-संख्या आ प्रभावक अभाव के प्रत्यक्ष प्रमाण भी सीमित हय; प्रभाव खाली लोकप्रियता से न, भाषिक वा शैलीगत अनुकरण से भी निर्धारित होय हय। छठम, चन्द्रप्रभा के राजनीतिक प्रतीकात्मक पाठ रोचक हय, मुदा हरेक राजा-प्रजा कथा औपनिवेशिक प्रतिरोध के रूपक हो, ई निश्चित न — सामाजिक नीति-कथा, राजधर्म आ पुरातन उपदेश-परम्परा के सम्भावना समान रूप से जाँचल जाएबा के चाही।
४.११ भूकम्प: सीमा
अध्याय द्वि-केन्द्रित हय — सीताराम झा आ कृष्णनन्दन सिंह — आ १९८८ के संकलन के प्रयोग चयनित उद्धरण तक सीमित; संकलन के समग्र प्रवृत्ति-विश्लेषण (कतना कवि, कोन-कोन दृष्टि, कोन छन्द-परम्परा) न भेल। दोसर, अध्याय कविता के ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में प्रभावपूर्ण ढङ्ग से पढ़ैत हय, मुदा दस्तावेजी मूल्य काव्यात्मक मूल्य पर भारी पड़ै हय — छन्द, ध्वनि, गति, विराम, पुनरावृत्ति आ भयान के रस के संरचना के तुलनात्मक विश्लेषण सीमित हय; आपदा-वर्णन खातिर छन्द के औचित्य-प्रश्न — करुण-रस आ बद्ध-छन्द के सम्बन्ध — अस्पर्शित रहल। तेसर, भूकम्प के लोक-स्मृति — लोकगीत, कहबी, जनश्रुति — पूरा तरह से छूटल, जब कि लोकगीत-अध्याय के लेखक से ई स्रोत के उपयोग के अपेक्षा स्वाभाविक हल; शिष्ट काव्य आ लोक-अभिव्यक्ति के तुलना से आपदा-स्मृति के द्विस्तरीय पाठ बनि सकै हल। चारिम, कम्पकारिका के ‘धर्मशाला बँचि गेल, काशी-वैद्यनाथ मन्दिर बँचल’ जइसन पाँती के जे दैवी-लीला-पर के व्याख्या कवि के हय, ओकर आलोचनात्मक परीक्षण (भवन-संरचना के भौतिक कारण बनाम आस्था-पाठ) न भेल — आलोचक इहाँ कवि के विश्व-दृष्टि के वर्णनकर्ता रहि गेलथिन, विश्लेषक न बनलाह; धार्मिक विश्वास आ वास्तविक विनाश-वितरण के अन्तर्विरोध पर्याप्त प्रश्नांकित न भेल। पाँचम, पीड़ित स्त्री, दलित बस्ती, भूमिहीन मजदूर, अपाङ्ग व्यक्ति आ अनाथ बालक के अलग अनुभव के खोज कम हय — राहत-वितरण आ पुनर्वास में वर्ग-भेद आ जाति-भेद पर रचित लोक-अभिव्यक्ति उपेक्षित रहल;’पूरा मिथिला’ के सामूहिक त्रास के भीतर सामाजिक विषमता छिपि सकै हय। साथे भूकम्प के कारण, भूगर्भीय संरचना, राहत-नीति, मृत के-संख्या आ सामाजिक वितरण के ऐतिहासिक स्रोत से काव्य-वर्णन के तुलना कैल जाय त साहित्य आ इतिहास के सम्बन्ध अधिक साफ होय।
४.१२ कोसी: सीमा
ई अध्याय संग्रह के सबसे बेसी वर्णनात्मक हय — कवि-दर-कवि उद्धरण-माला हय, मुदा विश्लेषण के सूत्र पातर। पहिल, बाढ़िक राजनीतिक अर्थशास्त्र — बान्ह-निर्माण के इतिहास, कोसी-परियोजना, नेपाल-भारत जल-सन्धि, गाद, धारा-परिवर्तन, जल-प्रबन्धन, तटबन्ध के भीतर के बस्ती के स्थायी विस्थापन — के कोनो चर्च न; ‘लोककृत त्रासदी’ के पद एक ठाम आएल हय, मुदा ओकर विस्तार न भेल, जेसे बाढ़ि प्रायः नियतिक प्रकोप बनल रहि गेल आ सरकारी नीति के आलोचना नैतिक रूप से प्रभावी मुदा नीतिगत रूप से अपूर्ण रह जाय हय। दोसर, कथा-उपन्यास के (पंचवटी, लिली रे के पटाक्षेप, इन्किलाब) खाली नामोल्लेख हय —’बाढ़ि-साहित्य’ के जे व्यापक शीर्षक-ध्वनि हय, से कविता तक सिकुड़ि गेल। तेसर, लोकगीत के कोसी-उपराग के जे मार्मिक सन्दर्भ शीर्षकहि में हय, ओकर पाठ-विश्लेषण अत्यल्प हय — शीर्षक जे वादा करै हय, पाठ से पूरा न करै हय। चारिम, कविता के कतको स्थान पर प्रत्यक्ष सामाजिक प्रतिवेदन के समान पढ़ल गेल हय — कविता में अतिशयोक्ति, प्रतीक, भावात्मक संक्षेप आ वक्ता के काल्पनिकता भी होय हय; साथे नदी के’माइ’ कहब आत्मीय हय, मुदा मातृत्व के प्रतीक प्राकृतिक विनाश के भाग्य वा देवी के कोप मानके राजनीतिक उत्तरदायित्व धुँधला करि सकै हय — नदी न, अनुचित बान्ह, कमजोर प्रशासन, भ्रष्ट राहत आ असमान बसावट अनेक त्रासदी के कारण होय हय, आ शृंगारिक-कारुणिक व्याख्या में रोमानीकरण के जोखिम रहै हय। पाँचम, बाढ़िक बोझ स्त्री, निम्नजाति, भूमिहीन, पशुपाल के आ प्रवासी मजदूर पर भिन्न-भिन्न पड़ै हय — ई अन्तरसम्बन्धी विश्लेषण के विस्तार अपेक्षित हल। छठम, बाढ़ि-वर्णन के पुनरावृत्ति-दोष — हरेक वर्ष एके अनुभव के एके प्रकार के अभिव्यक्ति — के जे संकेत लेखक खुद दे हथिन, तकरा कसौटी बना के कविता सभ के तारतम्य-निर्णय (के रूढ़ि, के मौलिक) न कैल गेल।
४.१३ महाकाव्य में युग-सन्दर्भ: सीमा
पहिल, पाँच महाकाव्य के चयन प्रयोजन-आधारित घोषित हय, मुदा बहिष्करण के तर्क अपूर्ण — ‘शेष महाकाव्य युग-सन्दर्भ से हीन न’ कहके आगू बढ़ि जाएब चयन-पूर्वाग्रह के प्रश्न खुजल छोड़के दे हय; कीचकवध, दत्तवती वा चित्रा जइसन कृति के अनुपस्थिति के कारण-कथन अपेक्षित हल, आ शेष महाकाव्य के उल्लेख खाली से ई निर्धारित न होय हय कि चुनल कृति पूरा परम्परा के पर्याप्त प्रतिनिधित्व करै हय। दोसर, तीनू पुरस्कृत महाकाव्य के चयन से जे प्रतिष्ठान-निरपेक्षता के दावी पोथी के स्वर हय, ओमें व्यवधान आबै हय — साहित्य अकादमी के स्वीकृति के छाया चयन पर देखि पड़ै हय। तेसर, युग-सन्दर्भ के खोज में काव्यत्व गौण हो गेल — रस-निष्पत्ति, बिम्ब-विधान, छन्द-प्रयोग, महाकाव्यत्व के शास्त्रीय लक्षण (सर्ग-बद्धता, नायक-स्वरूप, व्यापक कथानक, उदात्त शैली, चरित्र-विकास, वर्णन, संवाद) पर प्रायः मौन; फलतः महाकाव्य विचार-वाहक प्रलेख जइसन पढ़ाएल, काव्य जइसन कम। चारिम, पुराण के पात्र के आधुनिक स्वतन्त्रता सेनानी, समाज-सुधारक, कृषक वा क्षेत्रीय राष्ट्रवादी के रूप में पढ़ब फलदायी हय, मुदा ऐतिहासिक वर्तमानवाद के जोखिम भी हय — प्राचीन मिथक आधुनिक विचार के सीधा पूर्वरूप न। पाँचम, कृतिवार विस्तार असन्तुलित हय — सुभद्राहरण आ पराशर के जतना स्थान, राधाविरह आ त्रिपुण्ड के ओसे बहुत कम; नारी-सशक्तीकरण के जे स्थापना राधाविरह से जोड़ल गेल, से दू-तीन उद्धरण के भरोसे हय आ विप्रलम्भ-शृंगार के प्रधान रस से ई सामाजिक पाठक सम्बन्ध के मीमांसा न भेल — राधा के कर्तव्य फेर पति आ राष्ट्र के सेवा से निर्धारित हय; स्त्री के आत्मनिर्णय, देह, कामना आ निजी जीवन के स्वतन्त्र मूल्य पर चर्चा सीमित रह जाय हय। छठम, अगस्त्यायनी आ पराशर जइसन कृति में जाति-संघर्ष आ आभिजात्य व्यवस्था के जे प्रश्न निहित हय, ओकर सोझाँ-सोझी विखण्डन के स्थान पर’युग-धर्म’ के सामान्य विमर्श तक रुकि जाएब सामन्ती संरचना के पूर्ण आलोचना के अवसर गमा दे हय।
४.१४ नऽव गीत: सीमा
पहिल,’नऽव गीत’ के अवधि आ व्याप्ति के निर्धारण अस्पष्ट रहल — कोन तिथि से, कोन कृति से एकर आरम्भ मानल जाए, कोन-कोन गीतकार ई कोटि में आबै हथिन — एकर कोनो सूची वा काल-रेखा न; परिभाषा मूल्यबोध-आधारित हय, मुदा मूल्यबोध के कसौटी व्यक्तिनिष्ठ रहि गेल, आ ई परिभाषा से अनेक आधुनिक कविता स्वतः नऽव गीत के भीतर आबि सकै हय — गीतत्व के विशिष्ट कसौटी साफ न। दोसर, साक्ष्य-आधार तीन-चारि गीतकार (गुंजन, प्रवासी, बुद्धिनाथ मिश्र) तक सीमित — एतना पातर आधार पर समग्र प्रवृत्ति-निर्धारण आगमन-दोष से ग्रस्त हय; नऽव गीतकार के सामाजिक स्थिति, प्रकाशन-मञ्च, पाठक, पीढ़ीगत अन्तर आ स्त्री-गीतकार के योगदान के विस्तृत मानचित्र न बनै हय। तेसर, नऽव गीत आ नऽव कविता के भेद-विवेचन सूत्र-रूप में दऽ विस्तार हेतु अपनहि पोथी के सन्दर्भ देल गेल — आत्म-निर्देशक ई प्रवृत्ति पाठक के अपूर्ण तर्क के संग छोड़के दे हय। चारिम, गीत के गीतत्व — गेयता, स्वर-विधान, आरोह-अवरोह, ध्वनि-क्रम, अन्त्यानुप्रास, मात्रा, आवृत्ति, लोक-धुन से सम्बन्ध आ सामूहिक गायन-सम्भावना — पर कोनो विचार न;’लयात्मक सम्मिश्रण’ के पद आएल, मुदा लय-विश्लेषण के कोनो उदाहरण न, जब कि गीत-विधा के प्राण गेयते में बसैत हय — सामाजिक विषय खाली से रचना गीत न बनै हय। पाँचम, पारम्परिक प्रेम, भक्ति वा प्रकृति-काव्य के कतको स्थान पर रूढ़ि मानके छोड़के देल गेल — मुदा आधुनिकता खाली विषय-परिवर्तन न; पुरान विषय के नूतन संवेदना आ रूपान्तरण भी आधुनिक होय हय। छठम, वर्तमान युग में नव माध्यम — ध्वनि-दृश्य मञ्च, अन्तर्जाल आ ई-पत्रिका — से होके रहल गीत के लोकतन्त्रीकरण के चर्च न हय; गीत-विमर्श पारम्परिक मुद्रित संकलन के सीमा में रहि गेल।
४.१५ वर्तमान धारा: सीमा
पहिल, ई व्याख्यान-पाठ हय आ ओकर श्रोता-सापेक्षता निबन्ध में बनल रहि गेल — पूर्वांचलीय भाषा-बन्धुत्व के दीर्घ भूमिका (जे भुवनेश्वर के सभा खातिर सार्थक हल) पोथी के पाठक खातिर विषयान्तर जइसन लगै हय आ ‘वर्तमान धारा’ के मूल विवेचन खातिर स्थान घटा दे हय। दोसर,’वर्तमान धारा’ के चारू विषय बहुत व्यापक हय — मानव-संकट, उपभोक्तावाद, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद आ पर्यावरण लगभग पूरा आधुनिक साहित्य के समेटि सकै हय; काव्य-आन्दोलन, पीढ़ी, रूप, भाषा आ सौन्दर्यबोध के आधार पर अधिक सूक्ष्म वर्गीकरण अपेक्षित हल, आ धारा-विभाजन के पारस्परिक अतिच्छादन (उपभोक्तावाद आ सांस्कृतिक साम्राज्यवाद कहाँ फराक?) पर विचार न। तेसर, चारू धारा के साक्ष्य-घनत्व असमान हय — मानव-संकट आ सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के धारा सुसाक्षित, मुदा उपभोक्तावाद-विरोध के धारा एक-दू उद्धरण पर; चुनल कविता के संख्या सीमित हय आ ओ पर आधारित व्यापक निष्कर्ष पूरा वर्तमान मैथिली कविता के प्रतिनिधित्व के दावा पूरा रूप से सिद्ध न करै हय। चारिम, वर्तमान धारा के सूची में नारी-स्वर आ दलित-स्वर के अनुपस्थिति खटकै हय — जे आलोचक के अपन पोथी में उपेक्षिता आ दीनाभद्री पर स्वतन्त्र अध्याय हय, हुन के वर्तमान-धारा-चित्रण में ई दुनो धारा न गनाएब आन्तरिक संगति के अभाव हय; स्त्रीवादी, दलित, आदिवासी, प्रवासी, अन्तर्जालीय आ प्रयोगधर्मी कविता के अलग वर्तमान धारा के रूप में पर्याप्त स्थान न भेटल, आ विमर्श मुख्य रूप से प्रतिष्ठित केन्द्र के कवि तक सीमित रहि गेल। पाँचम, नेपाल के मैथिली कविता के भिन्न प्रवृत्ति के जे संकेत हय (’राजतन्त्र के भय से भिन्न रहल’), ओकर एकोटा उदाहरण न — स्थापना निराधार लटकल हय। छठम, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के विवेचन कतको स्थान पर स्थानीय संस्कृति बनाम बाहरी संस्कृति के द्वैत बना दे हय — संस्कृति सदैव आदान-प्रदान, मिश्रण, ग्रहण आ प्रतिरोध से विकसित होय हय; हरेक बाहरी प्रभाव विनाशकारी न आ हरेक स्थानीय परम्परा मुक्तिकामी न।
४.१६ लोकगीत: सीमा
पहिल, ई स्वतन्त्र निबन्ध न, कार्यपत्र पर टिप्पणी हय आ एकर संरचना में से झलकै हय — आरम्भ में कार्यपत्र के पद्धति-दोष के चर्च, बीच में स्वतन्त्र लोकगीत-विमर्श, अन्त में नीति-प्रस्ताव; तीनू खण्ड के सन्धि शिथिल हय। दोसर, यूनेस्को-ढाँचा के सात संरक्षण-उपाय के जे सूची हय, से प्रायः अनूदित-प्रतिध्वनित हय — मैथिली लोकगीत के विशिष्ट स्थिति (के गाओत, कोन पीढ़ी, कोन अवसर बँचल हय, कोन मरि रहल हय)के क्षेत्र-सर्वेक्षण बिना ई उपाय-सूची यान्त्रिक अनुप्रयोग बन गेल; साथे अभिलेखागार, सङ्ग्रहालय आ वर्गीकरण आवश्यक हय, मुदा जीवित लोकगीत के स्थिर नमूना में बदलि देवे के खतरा रहै हय — लोकगीत के जीवन गायन, अवसर, देहगत प्रस्तुति, सामूहिक सहभागिता आ परिवर्तनशील पाठ में हय, खाली ध्वनि-सङ्ग्रह में न, आ सांस्थानिक संरक्षण से लोक-अभिव्यक्ति के प्रतिरोधी धार कुनहटएबा के प्रश्न भी विचारणीय हय। तेसर, लोकगीत के संगीत-पक्ष — राग, ताल, स्वर-लिपिबद्धता — पूरा तरह से अछूत;’अवस्था आ संरक्षण’ के शीर्षक में जे संरक्षण हय, से पाठ-संरक्षण तक सोचल गेल, ध्वनि-संरक्षण (स्वर-आलेखन)के चर्च न। चारिम, सङ्कलक, शोधकर्ता आ संस्था के अधिकार देल गेल हय, मुदा गायक समुदाय के स्वामित्व, सहमति, आर्थिक लाभ, नामोल्लेख आ अभिलेख पर पहुँच के प्रश्न पर्याप्त विकसित न। पाँचम, लोकगीत के भीतर के पितृसत्तात्मक स्वर — जकर मार्मिक उदाहरण (बेटी-जन्म के अवसाद, अरजल बिआनि) खुद निबन्ध में हय — के आलोचनात्मक सामना न भेल; संरक्षण के उत्साह में ई प्रश्न दबि गेल जे लोक-सम्पदा के कोन अंश संरक्ष्य हय आ कोन अंश समीक्ष्य। छठम, लोकज्ञान में औषधीय वा वैज्ञानिक तत्त्व के उपस्थिति महत्त्वपूर्ण हय, मुदा हरेक परम्परागत विश्वास के वैज्ञानिक सत्य मानके लेब रोमानीकरण होयत — अनुभवजन्य उपयोगिता आ चिकित्सकीय प्रमाण में भेद रहै हय; साथे स्त्री के हास्य, सामूहिक प्रतिरोध, गीत-निर्माण के अधिकार आ जातिगत स्त्री-अनुभव के भिन्नता पर आरो विस्तार सम्भव हल।
४.१७ उपनिवेशवाद के नऽव चालि: सीमा
पहिल, तंजानिया-प्रकरण के विस्तार जतना हय, मैथिली-स्थिति के तुलनात्मक विश्लेषण ओ अनुपात में संक्षिप्त — किस्वाहिली के जे संस्थागत आँकड़ा (बजट-प्रतिशत, नीति-तिथि) देल गेल, ओकर समकक्ष मैथिली के कोनो आँकड़ा (विद्यालय में मैथिली-माध्यम के स्थिति, निजी विद्यालय के प्रसार-संख्या) न; दृष्टान्त सुदृढ़, अनुप्रयोग पातर, आ हरेक देश के भिन्न इतिहास, भाषिक जनसंख्या, अर्थव्यवस्था आ शिक्षा-संरचना के अन्तर पर्याप्त साफ न रहने तुलनात्मक निष्कर्ष किछु स्थान पर अत्यधिक शीघ्र हय। दोसर, विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष आ विदेशी सहायता भाषिक प्रभुत्व में भूमिका निभावै हय, तबो स्थानीय अभिजन, सरकारी अकर्मण्यता, अभिभावक के रोजगार-चिन्ता, शिक्षा के गुणवत्ता, पाठ्यपुस्तक के अभाव आ मातृभाषी संस्था के कमजोरी भी उत्तरदायी हय — बाहरी षड्यन्त्र के व्याख्या आन्तरिक उत्तरदायित्व के ओझल करि सकै हय; मिथिला के भीतर के भाषिक हीनताबोध आ आन्तरिक उपनिवेश के विखण्डन बिना बाहरी भाषिक उपनिवेशवाद से संघर्ष अधूरा रहत, ई प्रश्न पर्याप्त विकसित न भेल। तेसर, निबन्ध निदान-प्रधान हय, चिकित्सा-न्यून — भाषा-मृत्यु के संकट देखावल गेल, मुदा फिशमैनहि के प्रतिवर्तन-सिद्धान्त के (भाषा-ह्रास उनटएबा के) रचनात्मक पक्ष, जे ओही ग्रन्थ में हय, न आनल गेल; पाठक चेतल त जाय हय, मुदा दिशाहीन; साथे अंग्रेजी आ मैथिली के पूरा तरह से विरोधी मानब व्यावहारिक समाधान न — बहुभाषिक शिक्षा, मातृभाषा में आधारभूत ज्ञान, भारतीय सम्पर्कभाषा आ अन्तरराष्ट्रीय भाषा के क्रमिक शिक्षण के समन्वित रूप पर चर्चा अपेक्षित हल, कारण द्विभाषिकता स्वतः भाषा-मृत्यु न, असमान प्रतिष्ठावाली द्विभाषिकता संकट बनै हय। चारिम, व्यक्तिगत दृष्टान्त (प्राध्यापक-दम्पति, वकील साहेब, ग्रामीण महिला) नाम-सन्दर्भ-रहित हय — सत्यापन असम्भव; जे लेखक अन्यत्र अभिलेख-प्रमाण के आग्रही हथिन, से इहाँ किंवदन्ती-शैली अपना ले हथिन। पाँचम, आठम अनुसूची में समावेश (२००३)के’प्राण के संचार’ के जे आशावादी विराम-बिन्दु बनावल गेल, ओकर आलोचनात्मक परीक्षण न — अनुसूची-प्रवेश के दस वर्ष बाद प्रकाशित पोथी में ई प्रश्न स्वाभाविक हल जे संवैधानिक मान्यता से जमीनी संक्रमण-स्थिति में की बदलल; निबन्ध के अपनहि तर्क (सरकारी मान्यता पर्याप्त न, अन्तरपुस्तीय संक्रमण अनिवार्य) ई आशावाद के काटैत हय — ई अन्तिम आत्म-विरोध अनसुलझल रहि गेल। छठम, शहरी द्विभाषिक परिवार, मिश्रित विवाह, प्रवासी बालक आ नूतन माध्यम में मैथिली के सम्भावना के चर्चा कम हय।
४.१८ समग्र सीमा
अध्यायवार सीमा के अतिरिक्त किछु सीमा समग्र ग्रन्थ-स्तर के हय। पहिल, पुनरावृत्ति: निबन्ध-संग्रह के स्वाभाविक दोष इहाँ सघन हय — किरणजी के ‘आन के कानब खसब देखि कय’ वला पद्य दू अध्याय में, सीता के ‘जनक न हथिन राजा के दास’ वला प्रसंग तीन अध्याय में, भोलालाल दास-सम्बन्धी उद्धरण आ किरण-रमानाथ विवाद के बिन्दु अनेक ठाम दोहराएल हय; सम्पादन-स्तर पर सन्दर्भ-निर्देश से ई बँचि सकै हल। दोसर, अननूदित अंग्रेजी: पाद-टिप्पणी आ मूल-पाठ दुनो में अंग्रेजी उद्धरण के बाहुल्य खाली मैथिली पाठक के साक्ष्य से वञ्चित करै हय — मातृभाषा-पक्षधर ग्रन्थ के ई आन्तरिक विडम्बना हय। तेसर, आत्म-सन्दर्भ: उद्धृत स्रोत सब में लेखक के अपन सम्पादित-लिखित पोथी के अनुपात पर्याप्त हय — ई एक ओर हुन के अध्यवसाय के प्रमाण हय, दोसर ओर प्रमाण-स्वातन्त्र्य के प्रश्न उठावै हय। चारिम, पद्धति-वैषम्य: किछु अध्याय (यात्री, रमानाथ झा) सिद्धान्त-सघन हथिन त किछु (कोसी, मनमोहन झा) विवरण-प्रधान; किछु अध्याय निकट पाठ पर आधारित हय, किछु इतिहास-संशोधन के दस्तावेज, किछु विचारात्मक प्रतिवाद — ई विविधता से पोथी समृद्ध बनै हय, मुदा समान कसौटी के अनुप्रयोग के अभाव में संग्रह के आन्तरिक स्थापत्य विषम लगै हय आ एकर एकीकृत सिद्धान्त साफ न रहि पावै हय। पाँचम, मुद्रण-दोष: ठाम-ठाम अशुद्धि आ सन्दर्भ-शैली के अनेकरूपता (कहीं पूर्ण, कहीं अपूर्ण पाद-टिप्पणी) अइसन प्रमाण-आग्रही ग्रन्थ के विश्वसनीयता-मान के से मेल न खाय हय। छठम, समाधान-न्यूनता: संग्रह के अधिकांश निबन्ध प्रश्न आ निदान पर विरमि जाय हय — प्रश्नोत्थापन के लेखक खुद अभीष्ट कहने हथिन, तबो कम से कम भाषा-संकट जइसन विषय में कार्य-सूत्र के अपेक्षा अतृप्त रह जाय हय। सातम, लेखक के मैथिलीप्रेम पोथी के ऊर्जा हय, मुदा कतको स्थान पर ई प्रेम सांस्कृतिक आदर्शीकरण, प्राचीन गौरव, बाहरी शक्ति के प्रति अत्यधिक संशय वा राष्ट्रीय प्रतीक के अतिव्याख्या में परिणत होय हय। आठम, स्त्री, दलित, श्रमिक आ लोक के प्रश्न उठावल गेल हय, मुदा ई सब दृष्टि के अन्तरसम्बन्ध — जेना दलित स्त्री, बाढ़िपीड़ित भूमिहीन स्त्री, प्रवासी मजदूर, सीमावर्ती भाषाभाषी — के व्यवस्थित विवेचन कम हय; जहाँ-जहाँ आभिजात्य वर्चस्व से पूर्ण टकराएब सम्भव हल, उहाँ-उहाँ समीक्षा कहीं-कहीं अर्ध-प्रगतिशील रह जाय हय।
५. समग्र आलोचनात्मक निर्णय
५.१ पोथी के प्रमुख उपलब्धि
’हिआओल’ के सबसे बेसी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ई हय कि ई मैथिली साहित्येतिहास के प्रचलित सरल रेखा के बाधित करै हय। ई पोथी पूछै हय — स्वतन्त्र भाषा कहे के अधिकार केकरा हय? साहित्यिक मान के बनावै हय? कोन लेखक इतिहास में प्रतिष्ठित आ कोन विस्मृत होय हथिन? लोककण्ठ के सामग्री साहित्य हय कि न? स्त्री के मौन के हास्य मानल जाए कि सामाजिक त्रास? दलित लोकनायक इतिहास के विषय काहे न? भूकम्प आ बाढ़ साहित्येतिहास के घटना काहे न? प्रवासी केन्द्र मैथिली चेतना के निर्माण में की भूमिका निभावै हय? राजनीतिक स्वतन्त्रता के बाद भाषिक पराधीनता कइसे जीवित रहै हय? ई प्रश्न के कारण पोथी खाली आलोचनात्मक निबन्ध-संग्रह न, मैथिली साहित्य के वैकल्पिक ज्ञान-मानचित्र बन जाय हय।
भारतीय काव्यशास्त्र के दृष्टि से पोथी के आलोचना रस आ अलंकार तक सीमित न — ओ ध्वनि, औचित्य, वक्रोक्ति, लोकमंगल आ साधारणीकरण के सामाजिक इतिहास से जोड़ै हय। पाश्चात्य सिद्धान्त के दृष्टि से पोथी एकसाथ उत्तर-औपनिवेशिक, नव-इतिहासवादी, मार्क्सवादी, नारीवादी, दलित, रूपवादी आ पर्यावरणीय प्रश्न उठावै हय, यद्यपि लेखक ई सब सिद्धान्त के सदैव व्यवस्थित नाम आ पद्धति से लागू न करै हथिन। विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि से ‘हिआओल’ राजकीय आ प्रतिष्ठित इतिहास के समानान्तर निम्नलिखित इतिहास लिखै हय — भाषिक दमन के इतिहास, उपेक्षित आलोचक आ कवि के इतिहास, अशिक्षित स्त्री के इतिहास, दलित लोकनायक के इतिहास, प्रवासी पत्र-पत्रिका के इतिहास, मौखिक कथा के इतिहास, भूकम्प आ बाढ़ के इतिहास, लोकगीत में सुरक्षित स्त्री-श्रम आ लोकज्ञान के इतिहास, आओर पीढ़ीगत भाषा-विच्छेद के इतिहास।
५.२ समग्र मूल्याङ्कन
’हिआओल’ के महत्त्व अन्तिम निर्णय देबा में न, प्रश्न के नूतन भूमि तैयार करबा में हय। ई पोथी पूर्ण साहित्येतिहास न, मुदा भावी साहित्येतिहास के खातिर अनिवार्य संकेत-पोथी हय; ई अन्तिम सिद्धान्त न, मुदा स्थापित सिद्धान्त के निश्चिन्तता के भङ्ग करयवला आलोचनात्मक हस्तक्षेप हय। एकर श्रेष्ठ रूप उहाँ देखाय हय जहाँ लेखक विस्मृत दस्तावेज खोजै हथिन, स्थापित निष्कर्ष के प्रमाण माँगै हथिन, भाषिक रूपक सूक्ष्म विश्लेषण करै हथिन, स्त्री, लोक, दलित आ विपत्तिग्रस्त जन के स्वर सुनै हथिन, आ साहित्य के जीवित सामाजिक इतिहास से जोड़ै हथिन। एकर सीमा उहाँ प्रकट होय हय जहाँ प्रतिवाद विश्लेषण पर भारी पड़ै हय, अनुमान प्रमाण के स्थान ले हय, राष्ट्रीय वा सांस्कृतिक आस्था कलात्मक परीक्षण के दबा दे हय, आ जटिल इतिहास सरल द्वैत में बदलि जाय हय। साथे, जहाँ-जहाँ आभिजात्य वर्चस्व से पूर्ण टकराएब सम्भव हल, उहाँ-उहाँ समीक्षा अर्ध-प्रगतिशील रह जाय हय — कौलीन्य, पाँजि-प्रथा आ राज्य-प्रायोजित संस्थान के विखण्डन जतना तीक्ष्णता से अपेक्षित हल, ओसे किछु न्यून भेल।
६. उपसंहार
समग्रतः ‘हिआओल’ मैथिली आलोचना के ओ दुर्लभ कोटि के ग्रन्थ हय कि श्रद्धा आ संशय — दुनो के प्रमाण के कसौटी पर कसैत हय। भारतीय काव्यशास्त्र के दृष्टि से एकर मूल कसौटी औचित्य हय — शब्द के औचित्य (यात्री-अध्याय), पाठक-दृष्टि के औचित्य (कन्यादान), इतिहास-कथन के औचित्य (कथा के विकास); ध्वनि-सिद्धान्त के व्यवहार ‘शरदागम’ आ’पछबा’ के पाठ में, आ रस-चेतना करुण-प्रधान अध्याय सब में उपस्थित हय, यद्यपि रस-मीमांसा एकर दुर्बल पक्ष रहल। पाश्चात्य कसौटी पर ई उत्तर-औपनिवेशिक आ समाजभाषावैज्ञानिक विमर्श के मैथिली में अग्रणी प्रयोग हय, जकर सीमा सिद्धान्त के असमान आ कहीं-कहीं यान्त्रिक अनुप्रयोग में हय। आ विदेह समान्तर इतिहास के दृष्टि से एकर महत्त्व सर्वोपरि हय — अनालोचित कवि, उपेक्षिता नायिका, दलित महानायक, प्रवासी सम्पादक, लोकगीत के अज्ञात गायिका: प्रतिष्ठान जकरा-जकरा हाशिया पर रखल के, रमणजी तकरा-तकरा अभिलेख के बलेँ केन्द्र में अनलनि।
मुदा एहू दृष्टि से एक अन्तिम सीमा-रेखा खीचब न्यायोचित होयत: समानान्तर धारा के पूर्ण पद्धति उहाँ पहुँचैत हय जहाँ हाशिया के स्वर अपने बाजए — ‘हिआओल’मे हाशिया खातिर बाजल गेल हय, हाशिया के बजाओल कम गेल हय। ई अपूर्णता आगामी अनुसन्धान के निमन्त्रण हय, आ इहे निमन्त्रण-धर्मिता — विचारकलोकनि विमर्श के हेतु उपस्थित होथिन — ई पोथी के स्थायी मूल्य हय। मैथिली आलोचना के इतिहास में’हिआओल’ प्रत्यालोचना के प्रतिमान-ग्रन्थ आ समानान्तर इतिहास-लेखन के पूर्वपीठिका — दुनो रूप में स्मरणीय रहत।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’ के’हिआओल’ (२०१२) मैथिली साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में एकगो सराहनीय आ साहसिक डेग हय, जेमें कतको स्थापित स्थापना के गम्भीर बौद्धिक चुनौती देल गेल हय। रमणजी के भाषा-प्रेम आ मैथिली के ठेठ शब्द-संस्कृति के प्रति अनुराग पूरा तरह से स्पृहणीय हय। ई सैद्धान्तिक सीमा के बावजूद, ‘हिआओल’ मैथिली समीक्षाशास्त्र के सुदीर्घ पथ पर एकगो बहुत महत्त्वपूर्ण मील के पत्थर हय, जे भावी पीढ़ी के स्थापित आभिजात्य इतिहास-लेखन के विरुद्ध “हिआओ” (साहस) से लड़े के दिशा-निर्देश अवश्य करै हय। ई पोथी साहित्य के मुख्य द्वार के अतिरिक्त पछुआरि, आँगन, खेत, नदी, लोककण्ठ, स्त्री के मौन, मुसहर के गाथा, प्रवासी के पत्रिका आ भूकम्प से ढहल घर के भीतर से इतिहास देखे के दृष्टि दे हय। ई अर्थ में ई विदेह समान्तर इतिहास-दृष्टि के एक सशक्त आलोचनात्मक आधारग्रन्थ हय।
सन्दर्भ-सूची
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, हिआओल (मैथिली आलोचना-संग्रह), अखियासल प्रकाशन, लालगंज, सरिसब-पाही, मधुबनी, २०१२।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, अखियासल (आलोचना-संग्रह)।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, बेसाहल (आलोचना-संग्रह)।
डा. रमानन्द झा ‘रमण’, भजारल (आलोचना-संग्रह)।
जी. ए. ग्रियर्सन, An Introduction to the Maithili Language of North Bihar, कलकत्ता, १८८१।
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हरिमोहन झा, कन्यादान (मैथिली उपन्यास)।
PART 27, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_27.htm।
PART 28, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_28.htm।
PART 82, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_82.htm।
A Parallel History of Mithila & Maithili Literature, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/new_page_90.htm।
नूतन अंक सम्पादकीय, विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका, www.videha.co.in/aboutme.htm।
“रमानन्द झा ‘रमण’”, मैथिली लेखक संघ, maithililekhaksangh.blogspot.com/2010/07/blog-post_677.html।