‘बाल गोपाल’
शंभु ‘अगेही’क बज्जिका बाल-कविता-संग्रहक समेकित गहन समीक्षा
भारतीय काव्यशास्त्र · पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त · नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसा · विदेह समानान्तर
परम्परा
सार-संक्षेप
शंभु प्रसाद सिन्हा ‘शंभुअगेही’क ‘बाल गोपाल’ बज्जिका बाल-कविताक एहन संग्रह अछि
जाहिमेराष्ट्रबोध सँ लऽ कऽ घर-आँगन, खेल, निन्न, परिवार, मेला, खाद्य-संस्कृति, गाम, श्रम,
विद्यालय, घड़ी आ रेल धरि बालजीवनक अनेक स्तर उपस्थित अछि। कृतिक स्थायी मूल्य एकर
सभ कविताक समान कलात्मक सिद्धिमेनहि, अपितुबालकक स्थानीय बोली, माय, इआ,
दादा, नाना-घर, खेल, माटि, चूड़ा, गाछी, मेला, जाँता, विद्यालय आ बदलैत संसारकेँमुद्रित बालसाहित्यक विषय बनएबामेअछि। जखन कवि बालकक सहचर बनैत छथि, कविता सहज,
सुश्राव्य आ संवेदनात्मक होइत अछि; जखन प्रौढ़ उपदेश, राष्ट्र-नीति वा अनुशासनक भार बढ़ैत
अछि, बाल-दृष्टिक स्वाभाविकता कनेक दबि जाइत अछि। एहि समेकित समीक्षामे रस, ध्वनि,
वक्रोक्ति, गुण-रीति, औचित्य; अनुकृति, रूपवाद, वर्ग-पाठ, उत्तर-औपनिवेशिक/निम्नवर्गीय
प्रश्न, पाठक-ग्रहण, संवादिता, अन्तर्निहित प्रौढ़, पारिस्थितिक पाठ; नव्य-न्यायक शब्द-प्रमाण,
व्याप्ति आ दृष्टान्त; तथा विदेह समानान्तर परम्पराक साक्ष्य-अनुशासन, बहुकेन्द्रिकता, भाषिक
स्वनामक सम्मान आ आत्म-समीक्षाकेँपरस्पर संवादमेराखल गेल अछि।
१. ग्रन्थ-परिचय, प्रकाशन-सूचना आ पाठ-सावधानी
मापदण्ड विवरण
पोथीक नाम बाल गोपाल (बज्जिका बाल कविता)
रचनाकार शंभु प्रसाद सिन्हा ‘अगेही’
प्रथम संस्करण २०१२
प्रकाशक सृष्टि-दृष्टि, शुभंकरपुर, दरभंगा
मुद्रक त्रिदेव/त्रिदेवा प्रिन्टर्स, दरभंगा —
समर्पण महाकवि हरेन्द्र सिंह विप्लव, ‘कच देवयानी’क प्रणेता
विधा बाल-कविता / शिशु-साहित्य
अनुक्रम ५१ पृथक् कविता-शीर्षक
मापदण्ड विवरण
रचनाकारक शैक्षणिक
परिचय
एम.ए. (हिन्दी, अर्थशास्त्र), बी.एल., . . Dip in Ed
समर्पण-पृष्ठ कृतिक साहित्यिक आत्म-स्थिति बुझबा लेल महत्त्वपूर्ण अछि। रचनाकार अपन
बाल-काव्यकेँ बज्जिका साहित्यक पूर्ववर्ती महाकाव्यात्मक उपलब्धिसँजोड़ैत छथि। एहि संग
‘बात के बात’ शीर्षक भूमिका स्पष्ट करैत अछि जेपोथी संयोगवश जोड़ल कविता-पुंज नहि,
बाल-साहित्यक कार्य, भाषा आ बाल-मनोविज्ञान सम्बन्धी एक चेतन कार्यक्रमक परिणाम
अछि।
पाठ-सावधानी आवश्यक अछि। जहाँमूल बज्जिका शीर्षक उद्धृत द्धृ अछि, ओकर भाषिक रूप
समीक्षा-मैथिलीक अनुकूल बदलल नहि गेल अछि।
२. रचनाकार, बहुभाषिक साहित्यिक पृष्ठभूमि आ ‘बात के बात’
पोथीक अन्तिम परिचय-अंशक आधारपर शंभुअगेही हिन्दी, बज्जिका आ मैथिली तीनूभाषामे
सक्रिय रचनाकार रूपमे उभरैत छथि। ‘ओझराएल डीह’, ‘सतंजा’, ‘तेसरी बेरिया’, ‘छंद
विभास’ आ ‘कीर्तिलता’क काव्यात्मक अनुवाद बज्जिका-साधनासँ; ‘रश्मिधन्वा’ मैथिली-
साधनासँ; आ हिन्दीमेकविता, कथा, गजल तथा समालोचनासँजुड़ल कृतित्वक उल्लेख अछि।
एहि बहुभाषिक पृष्ठभूमिक कारण ‘बाल गोपाल’क काव्यभाषामे लोकवाचिक बज्जिका,
संस्कृतमूलक साहित्यिक पदावली आ कतहु हिन्दी साहित्यिक संस्कारक सह-अस्तित्व
बुझबा योग्य बनैत अछि।
भूमिकामे रचनाकार बज्जिका बाल-साहित्यक तत्कालीन आरम्भिक अवस्थाक उल्लेख करैत
डॉ. सुरेन्द्र मोहन प्रसाद, डॉ. ब्रह्मदेव प्रसाद कार्यी, निर्मल मिलिन्द, डॉ. ब्रजनन्दन वर्मा, रामेश्वर
प्रसाद आ स्वयं अपन साहित्यिक सक्रियताकेँस्मरण करैत छथि। ई नामावली इतिहासक पूर्ण
सूची नहि, मुदा एक समकालीन लेखकक आत्मदस्तावेज अवश्य अछि; समानान्तर
साहित्येतिहास लेल एहन आत्मदस्तावेज विशेष महत्त्व रखैत अछि।
‘बात के बात’क सबसँ उल्लेखनीय सूत्र ई अछि जे बाल-साहित्य रचबाक लेल वयस्क
रचनाकारकेँबालकक क्रीड़ा, कौतुक, हास-रुदन, जिज्ञासा, अनुकरण, अधिगम आ सामाजिकसंवेगात्मक विकासक स्तर धरि उतरि ओकर सहचर बनबाक चाही। लेखक अपन प्रकाशकीय
हड़बड़ीक बात सेहो कहबी मार्फत स्वीकार करैत छथि; ई आत्म-समीक्षा रचनाकारक
आत्मविश्वासक संग आत्मसचेतता सेहो प्रकटकरैत अछि।
भूमिकामेअलेक्जेंडर पोपक प्रसिद्ध उक्ति “What oft was thought but ne er , ’
so well expressed ” क स्मरण लेखकक तुलनात्मक साहित्यिक चेतनाक परिचायक
अछि। मुदा एहि समेकित समीक्षाक कसौटी लेखकक बाहरी उद्धरण नहि, मूल कविता आ
लेखकक घोषित बाल-साहित्य-दृष्टि अछि।
३. समीक्षा-पद्धति : चारि परम्पराक संवाद
एहि कृतिक परीक्षण ‘एक सिद्धान्त सँ सम्पूर्ण कृतिक नाप’ नहि, बहु-दृष्टिक संवाद पर आधारित
अछि। भारतीय काव्यशास्त्र भावक रसात्मक परिणति, व्यंजना, भाषिक वक्रता, गुण-रीति आ
औचित्यक प्रश्न उठबैत अछि। पाश्चात्य समीक्षा अनुकृति, रूप, पुनरावृत्ति, पाठक-ग्रहण, वर्ग,
सत्ता, संवादिता, बालक-प्रौढ़ तनाव आ पारिस्थितिक-सांस्कृतिक अर्थक प्रश्न खोलैत अछि।
नव्य-न्याय शिक्षात्मक कवितामेज्ञान-संचरण, शब्दबोध, व्याप्ति आ दृष्टान्तक तर्क-रचनाकेँ
सूक्ष्म रूपेँदेखबाक अवसर दैत अछि। विदेह समानान्तर परम्परा स्थानीय अभिलेख, हाशियाक
अनुभव, भाषिक स्वनाम, परम्पराक आलोचनात्मक उत्तराधिकार, साक्ष्य-अनुशासन आ आत्मसमीक्षाकेँ एक संग रखैत अछि।
एहि सिद्धान्तसभकेँ एक-दोसराक पर्याय मानल नहि गेल अछि। रस आ reader response -
दुनूपाठक-अनुभवक प्रश्न उठा सकैत अछि, मुदा दूनू समान सिद्धान्त नहि; ध्वनि आ implied
meaning मेसंवाद सम्भव अछि, मुदा ऐतिहासिक-सैद्धान्तिक अन्तर बचाएब आवश्यक;
वक्रोक्ति आ रूसी रूपवादक अपरिचितीकरणमे प्रश्नगत निकटता अछि, मुदा वंशानुक्रमिक
समानता घोषित करब अनुचित। समानान्तर पद्धतिक मूल अनुशासन एहि अन्तरसभकेँ बचाएब
अछि।
३.१ भारतीय समीक्षा-कसौटी
• रस : वात्सल्य, हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, शान्त वा मिश्र भावक सौन्दर्यात्मक परिणति।
• ध्वनि : प्रत्यक्ष कथनसँ आगाँसांस्कृतिक स्मृति, सम्बन्ध, सामाजिक प्रश्न आ भावक
व्यंजना।
• वक्रोक्ति : बाल-उक्ति, पुनरावृत्ति, ध्वनि-अनुकरण, मानवीकरण, प्रश्न, तुक आ सामान्य
वस्तुक कल्पनात्मक पुनर्रचना।
• गुण-रीति : प्रसाद, माधुर्य, ओज, सरलता, प्रवाह आ वाचिक सुश्राव्यता।
• औचित्य : बाल-वय, प्रसंग, शब्द-भार, उपदेश, भय, दण्ड, हास्य आ भाव-सन्तुलनक
उपयुक्तता।
३.२ पाश्चात्य समीक्षा-कसौटी
• अनुकृति आ दैनिक जीवनक काव्यात्मक पुनर्रचना।
• रूपवाद/निकट-पाठ : , refrain ध्वनि, पुनरावृत्ति, अन्त्यानुप्रास, लघुपंक्ति आ वाचिक
स्मृति।
• मार्क्सवादी वर्ग-पाठ : श्रम, गरीबी, शिक्षा-असमानता आ मालिक-सेवक शक्ति-सम्बन्ध।
• उत्तर-औपनिवेशिक/निम्नवर्गीय प्रश्न : स्थानीय ज्ञान, ग्रामीण अनुभव आ प्रतिनिधित्वक
शक्ति।
• पाठक-ग्रहण : बालकक सक्रिय सहभागिता, मुखस्थता, उच्चारण, स्मृति आ अनुभवसंयोग।
• बाख्तिनी संवादिता : घरक बोली, विद्यालयी भाषा, सार्वजनिक राष्ट्र-पदावली, गामक लोकसंस्कृति आ आधुनिक तकनीकी शब्दक सह-अस्तित्व।
• बाल-साहित्य सिद्धान्त : बालकक स्वायत्त इच्छा आ प्रौढ़ लेखकक नैतिक/शैक्षिक
नियमनक तनाव।
• पारिस्थितिक-सांस्कृतिक पाठ : गाछ, आम, धूरि, बाग, खाद्य, पशु, मेला आ श्रम-संसारक
पर्यावरणीय-सांस्कृतिक अर्थ।
३.३ नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसीय कसौटी
• शब्द-प्रमाण/शाब्दबोध : शिक्षात्मक पद्य ज्ञान-संचरणक माध्यम कोना बनैत अछि।
• तात्पर्यग्रह : अक्षर, वस्तु-दृष्टान्त आ नैतिक कथनक अभिप्राय बालक कोना ग्रहण करैत
अछि।
• व्याप्ति आ दृष्टान्त : शिक्षा, श्रम, अन्न, कल्याण आदि सम्बन्धी सार्वत्रिकतासदृश कथन
कोना बनैत अछि।
• सावधानी : काव्य-पंक्तिक औपचारिक न्याय-अनुमान रूपमेकृत्रिम अनुवाद नहि; मात्र तर्कसंरचनाक विश्लेषण।
३.४ विदेह समानान्तर परम्पराक कसौटी
• अभिलेखीय मौन कथा गढ़बाक अनुमति नहि; अस्पष्ट पाठपर अनुमान नहि।
• हाशियाक स्वर ज्ञानगत रूपेँमहत्त्वपूर्ण, मुदा आलोचनातीत नहि।
• परम्परा आलोचनात्मक उत्तराधिकार अछि—संरक्षण, परीक्षण आ आवश्यक प्रश्न तीनू
साथ।
• स्थानीय अभिलेख विशेषाधिकार प्राप्त सत्य नहि, साझीदार साक्ष्य अछि।
• भाषिक स्वनामक सम्मान—‘बज्जिका बाल कविता’केँ ओही आत्म-परिचयक संग पढ़ब।
• कैनन-विस्तार—बाल-साहित्य, लोकवाणी, गाम, खाद्य, खेल आ दैनिक जीवनकेँ
साहित्येतिहासक वैध सामग्री मानब।
• आत्म-समीक्षा—क्षेत्रीय गौरव प्रमाणक विकल्प नहि।
४. बज्जिका-मैथिली भाषिक प्रसंग आ काव्यभाषा
‘बाल गोपाल’ अपन शीर्षक-पृष्ठपर स्वयं केँ ‘बज्जिका बाल कविता’ कहैत अछि; अतएव एहि
समीक्षामेभाषिक आत्म-परिचय प्राथमिक अछि। बज्जिका आ मैथिलीक निकटता, साझा
शब्दरूप, सांस्कृतिक भूगोल आ ऐतिहासिक सम्पर्क महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा समीक्षाक काज एक
भाषाकेँदोसरामेविलीन करब नहि। निकटता आ भिन्न स्वनाम—दुनू तथ्य एक संग राखल
जाए।
भाषिक अवलोकनमे “हए/हय”, “करइत हए/रहइअ”, “देखलिऐ/खइलिऐ” सन क्रियारूप;
“लगावऽ”, “फुटकाबऽ”, “देखाबऽ” सन आइ्ञार्थक -ऽ; सम्बन्धकारक “के”; आ “हम्मर”,
“ओकर”, “तोहर” सन सर्वनामक उल्लेख अछि। मैथिली समीक्षा-भाषामे एहि रूपसभक
रूपान्तर करब उचित नहि, कारण ई मूल कृतिक भाषिक साक्ष्य अछि।
काव्यभाषाक भीतर लोकवाचिक बज्जिका स्वर आ संस्कृतमूलक सार्वजनिक पदावलीक सहअस्तित्व देखाइत अछि। घर, खेल, माय, इआ, निन्न, गाछी, चूड़ा आ मेला सम्बन्धी कविता
अधिक बोलचाल-निकटअछि; राष्ट्र, गुरु, सदाचार आ शिक्षा सम्बन्धी कविता कतहु अधिक
सार्वजनिक/शास्त्रीय पदावली ग्रहण करैत अछि। एहि द्वैधताकेँसामान्यीकृत “अशुद्धि” कहब
उचित नहि; कलात्मक प्रश्न ई अछि जेकोन ठाम ई मिश्रण सहज अछि आ कोन ठाम संदेशक
भार बाल-लयकेँकठोर बनबैत अछि।
५. विषय-विन्यास : राष्ट्रसँआँगन, खेल, श्रम आ आधुनिकता धरि
विषयगत क्षेत्र प्रतिनिधि कविता मुख्य भाव/प्रतीक मनोवैज्ञानिकसामाजिक अर्थ
राष्ट्रबोध अप्पन देस; भारत माँ;
अभिलाषा; देश के
झंडा; पंद्रह अगस्त
मातृभूमि, ध्वज,
वीरता, सामूहिक
स्मृति
सार्वजनिक
नागरिकता; कतहु प्रौढ़
आदर्शक भार
लोक-क्रीड़ा आ
कल्पना
मजा अबइत हए खेले
में; ताल-गुल्ली;
गुड़िया; पतंग; कागज
के नाव; धुर खेल
देह, गति, साथी,
रूपान्तरण,
कौतूहल
सहकारिता,
स्वायत्तता,
सृजनशीलता
वात्सल्य आ
परिवार
बउआ के मुँह चान सन;
हमर माय; हमर
बालगोपाल; निनिया तू
आ जो रे; नाना घर;
अन्तर प्यार में
माय, निन्न, दादा,
नाना, घरक
पुचकार
भावात्मक सुरक्षा,
सम्बन्ध, पीढ़ीगत
स्मृति
शिक्षा आ
सामाजिक
यथार्थ
पढ़ रे बउआ; तरी आ
छड़ी; पढ़ेन जायब बाबू
जी; हमर जमहिरा केना
क पढ़तई; रमचरना
गुरु, छड़ी,
पाठशाला, गरीबी,
बाल-श्रम
बाल-अधिकार,
भयमुक्त शिक्षा, वर्गविषमता
प्रकृति, खाद्य आ
लोक-संस्कृति
सोनपुर के मेला; सुन्दर
बाग लगाव; चूड़ा
मेला, गाछ, आम,
जाँता, खाद्य, लोकक्षेत्रीय स्मृति,
इन्द्रियबोध, घरेलूश्रम
विषयगत क्षेत्र प्रतिनिधि कविता मुख्य भाव/प्रतीक मनोवैज्ञानिकसामाजिक अर्थ
गमागम; गाछी के आम;
माय नचावेजाँता; गाम
मेंमदारी
प्रदर्शन
आधुनिकता-
बोध
घड़ी; गौंआ गोनूटीसन
आयल; चान पर हमहूँ
जायब
समय, रेल,
अन्तरिक्ष-कौतूहल
स्थानीय जीवन आ
आधुनिक गति/ज्ञानक
अन्तःक्रिया
६. भारतीय काव्यशास्त्रीय पाठ
६.१ रस : वात्सल्यक प्रधानता, हास्य-अद्भुतद्भु, वीर आ करुणक विस्तार
‘बाल गोपाल’क मूल रस-विन्यास एकरेखीय नहि अछि। आरम्भिक राष्ट्रकवितासभमेवीरभाव,
गौरव आ सामूहिक ओज प्रमुख अछि; परिवार-केन्द्रित रचनासभमे वात्सल्य, माधुर्य आ
निकटता; खेलक कवितासभमेहास्य, उत्साह आ चपलता; चान, पतंग, रेल, मेला, गुड़िया आ
कागजक नावमे अद्भुत-कौतूहल; समय, श्रम आ बदलैत संसारक अन्तिम रचनासभमे
शिक्षात्मक चिन्ता आ कखनहुँशान्त/नीतिमूलक भाव भेटैत अछि।
वात्सल्य एहि संग्रहक सर्वाधिक स्वाभाविक सौन्दर्य-प्रदेश अछि। ‘बउआ के मुँह चान सन’ मे
शिशुमुखक चन्द्र-उपमा, घरक पुचकार आ सम्बोधन स्वयं विभावक काज करैत अछि। कविता
भावकेँ तर्कसँनहि, पुकार, पुनरावृत्ति, लघुपद आ स्नेहचित्रसँजगबैत अछि। एहि प्रकारक
पाठमे सहृदय बालक नहि मात्र, माय-बाप, दादा-दादी वा परिवारक प्रौढ़ पाठक सेहो रसास्वादक
बनैत छथि। बाल-साहित्यक द्वैध-पाठकता एतय भारतीय रस-दृष्टि आ आधुनिक बाल-साहित्यदृष्टि दुनूसँपढ़ल जा सकैत अछि।
हास्य-रसक रूप शरारत, खेल, बिल्ली, मदारी, बाल-जिद्द, छड़ीक भय, रेलगाड़ी वा सामाजिक
विसंगतिक हलुक प्रस्तुतीकरणमेभेटैत अछि। अद्भुतक मूल आधार ‘दूर’ वस्तुकेँ ‘निकट’
बनायब अछि—चानपर जायबाक अभिलाषा, पतंगक ऊर्ध्वगति, गुड़ियाक जीवित-जगत,
कागजक नावक यात्रा, रेलक आगमन। बालकक संसारमेअद्भुत द्भु मात्र अलौकिक नहि; परिचित
वस्तुक नूतन अनुभव सेहो अद्भुत द्भु अछि।
६.२ ध्वनि : प्रत्यक्ष अर्थक पाछाँलोक-स्मृतिस्मृ आ सामाजिक प्रश्न
आनन्दवर्धनक ध्वनि-विचारक आलोकमे एहि पोथीक अनेक रचना अपन प्रत्यक्ष संदेशसँबेसी
सांस्कृतिक अर्थ धारण करैत अछि। ‘नाना घर’ मात्र नातेदारीक उल्लेख नहि; ग्रामीण
बाल्यकालक छुट्टी, अपनापन, भोजन, खेल आ मातृकुलक विशिष्ट भाव-संसारक व्यंजना अछि।
‘चूड़ा गमागम’ मात्र खाद्य-वर्णन नहि; गन्ध, स्वाद, घरेलूश्रम आ क्षेत्रीय खान-पानक सामूहिक
स्मृति जगबैत अछि। ‘गाछी के आम’ फलसँ आगाँ ऋतु, गाछी, सामूहिकता आ प्रतीक्षाक
लोकानुभव बनि जाइत अछि।
‘घड़ी’क टिक-टिक प्रत्यक्षतः समयक शिक्षा देत अछि, मुदा ध्वनित स्तरपर आधुनिक
अनुशासन, विद्यालयी समय, श्रम-तालिका आ जीवनक क्षणभंगुरताक संकेत सेहो उपस्थित
अछि। ‘गौआ गोनूटीसन आयल’ मेरेलक आगमन मात्र यन्त्रगत कौतूहल नहि; गामक स्थानीय
समय आ बाहरी गतिशील संसारक मिलनक ध्वनि अछि। समानान्तर दृष्टिसँ एहि सूक्ष्म
अर्थसभकेँ ‘आधुनिकता बनाम परम्परा’क सरल द्वन्द्वमेनहि बाँधि, सह-अस्तित्वक बहुस्तरीय
दृश्य मानब उचित अछि।
६.३ वक्रोक्ति : बाल-भाषाक काव्यात्मक विचित्रता
कुन्तकक वक्रोक्ति-सिद्धान्त कविता-भाषाक सामान्य व्यवहारसँभिन्न रचनात्मक विन्यासपर
बल दैत अछि। ‘बाल गोपाल’मे ई विचित्रता प्रायः महान रूपक वा जटिल श्लेषसँनहि, अपितु
बाल-उक्ति, ध्वनि-अनुकरण, पुनरावृत्ति, सम्बोधन, प्रश्न, तुक, मानवीकरण आ वस्तु-
लघुकरणसँ उत्पन्न होइत अछि। ‘घड़ी’क ‘टिक-टिक’, ‘चूड़ा गमागम’क गन्ध-ध्वनि, ‘निनिया
तू आ जो रे’क पुकार, ‘इआ ! तनि सेआन होए दे’क पुनरागमन—ई सभ वाचिक वक्रताक बालसुलभ रूप अछि।
वक्रोक्तिक सफलतम क्षण ओतय अछि जतय सामान्य वस्तुअनुभवक खेल बनि जाइत अछि
—कागज नाव बनैत अछि, पतंग आकांक्षाक देह बनैत अछि, चान यात्रास्थल बनैत अछि,
रेलगाड़ी गामक आँखि खोलैत अछि। एहि रचनासभमे काव्यत्व शब्दाडम्बरमे नहि, दृष्टि-
परिवर्तनमेअछि।
६.४ गुणगु -रीति आ भाषिक प्रसाद
संग्रहक बालोपयोगी रचनामे प्रसाद-गुण प्रधान अछि—वाक्य छोट, क्रिया स्पष्ट, सम्बोधन
प्रत्यक्ष आ भाव आसानीसँ ग्रहणीय। वात्सल्यप्रधान रचनामेमाधुर्य, राष्ट्रप्रधान रचनामे ओज
आ खेलप्रधान रचनामेचपल प्रवाह देखाइत अछि। तथापि जतय विद्यालयी राष्ट्रवादी पदावली
वा नीतिवचनक भार बढ़ैत अछि, ओतय बाल-भाषाक सहज प्रसाद कनेक दबि जाइत अछि।
रीति-स्तरपर कवि लोकवाचिक बज्जिका स्वरकेँमुद्रित साहित्यक संस्कृतनिष्ठ पदावलीसँजोड़ैत
छथि। एहि द्वैधताकेँयांत्रिक ‘दोष’ कहब उचित नहि; ई समयक बहुभाषिक सामाजिक यथार्थक
चिन्ह सेहो अछि। मुदा बाल-काव्यक कलात्मक कसौटीपर प्रश्न रहैत अछि—कोन रचनामे ई
संगम सहज अछि आ कोन रचनामेसंदेशक भार भाषाकेँकठोर बनबैत अछि।
६.५ औचित्य : बाल-वय, शिक्षा आ दण्ड-संस्कृतिक कसौटी
क्षेमेन्द्रक औचित्य-विचारक व्यापक अर्थमेबाल-साहित्य लेल ‘वय-औचित्य’, ‘भाव-औचित्य’,
‘भाषा-औचित्य’ आ ‘शिक्षा-औचित्य’ विशेष उपयोगी कसौटी बनैत अछि। ‘मेला देखब’,
‘गुड़िया’, ‘पतंग’, ‘कागज के नाव’, ‘गाछी के आम’, ‘माय नचावेजाँता’ सन रचनामेविषय
आ बाल-रुचि सहज मिलैत अछि। ‘शिक्षक दिवस’, ‘विद्यादान’, ‘सार्थक जीवन’ मेशिक्षा
मूल्यक रूपमेअबैत अछि, मुदा प्रौढ़ वाक्य-भार बढ़ैत अछि। ‘तरी आ छड़ी’ पुरान दण्डात्मक
शाला-संस्कृतिक हास्य/भयक दस्तावेज बनैत अछि; आधुनिक बाल-अधिकारक कसौटीपर
छड़ीक सामान्यीकरण स्वीकार्य नहि ठहरैत, यद्यपि साहित्येतिहासक साक्ष्य रूपमे रचना
महत्त्वपूर्ण अछि।
एहि ठाम आलोचना आ संरक्षण दुनू एक संग आवश्यक अछि। समानान्तर परम्परा ‘परम्परा =
सत्य’ नहि मानैत; परम्पराकेँ आलोचनात्मक उत्तराधिकार मानैत अछि। तैं पुरान शैक्षिक
संस्कारक पाठकेँ मेटायब नहि, ओकर ऐतिहासिक अर्थ स्पष्ट करब आ आधुनिक नैतिक
कसौटीसँपरीक्षण करब अधिक उचित अछि।
करुण रसक सामाजिक धार विशेषतः ‘रमचरना’ आ ‘हम्मर जमहिरा केना क पढ़तई’मेतीव्र
होइत अछि। भूख, घरक आर्थिक संकट, पाठशाला सँ दूरी आ बाल-श्रम प्रत्यक्ष विभाव बनैत
अछि। एहि रचनासभक मार्मिकता एतय अछि जेदुःखक वर्णन मात्र दया उत्पन्न करबाक लेल
नहि, शिक्षाक असमान उपलब्धिपर प्रश्न उठेबाक लेल सेहो काज करैत अछि।
‘कइसन भेल संसार’मे प्रकाश-अँधार, सम्पन्नता-अभाव वा सामाजिक विषमताक प्रत्यक्ष दृश्य
प्रत्यक्ष कथनसँबेसी अर्थ धारण करैत अछि। ध्वनि-दृष्टिसँबालकक विस्मय सामाजिक न्याय
सम्बन्धी व्यापक प्रश्न दिशि संकेत करैत अछि; बाल-कण्ठक सरलता एहि व्यंजनाकेँअधिक
तीक्ष्ण बनबैत अछि।
७. पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तसँ बहुस्तरीय पाठ
७.१ अनुकृनुकृति : दैनिक जीवनक काव्यात्मक प्रतिष्ठा
अरस्तूक अनुकृति-विचारक व्यापक अर्थमेसाहित्य जीवनक क्रिया, व्यवहार आ सम्भावनाकेँ
कलात्मक रूप दैत अछि। ‘बाल गोपाल’क विशेषता ई अछि जे एकर जीवन-जगत महाकाव्यिक
घटना नहि; धूरि खेलब, गुड़िया, पतंग, जाँता, चूड़ा, आम, मेला, नाना-घर, घड़ी, रेलगाड़ी सन
छोटअनुभव अछि। एहि ‘छोट’ अनुभवकेँसाहित्ययोग्य माननाइ बाल-साहित्यक लोकतान्त्रिक
सौन्दर्यशास्त्र रचैत अछि।
अनुकृति एतय फोटोग्राफिक नकल नहि। ‘चान पर हमहूँजायब’ प्रत्यक्ष यथार्थक पुनरावृत्ति नहि,
बाल-इच्छाक सम्भाव्य संसार अछि। ‘कागज के नाव’ वस्तुकेँखेल-यात्रामे बदलैत अछि। एहि
कारण संग्रहमेकल्पना आ अनुभव परस्पर विरोधी नहि, परस्पर पोषक अछि।
७.२ रूपवाद आ निकट-पाठ : पुनपुरावृत्तिवृ , ध्वनि आ वाचिक स्मृति
नव-समीक्षात्मक निकट-पाठक उपयोग एहि संग्रहमेविशेषतः ध्वनि-संरचना बुझबा लेल अछि।
अनेक रचना refrain, सम्बोधन, लघुपंक्ति, अन्त्यानुप्रास आ लयात्मक पुनरागमनपर चलैत
अछि। मुद्रित पृष्ठपर ई सरलता कखनहुँसाधारण बुझाइत अछि, मुदा मुखेँपढ़ला पर ध्वनि-
संरचना बालकक स्मृति, सहभागिता आ प्रत्युत्तरक अवकाश बनबैत अछि।
‘निनिया तू आ जो रे’ मेशीर्षक-संरचना स्वयं लोरीक आवर्तन संकेत करैत अछि। ‘घड़ी’ मेटिकटिक अर्थ आ रूप दुनूअछि। ‘चूड़ा गमागम’ मे ‘गमागम’ स्वादसँपहिने गन्धक ध्वन्यात्मक
उपस्थिति रचैत अछि। ‘कइसन भेल संसार’ प्रश्नवाचक शीर्षक अन्तिम सामाजिक विस्मयकेँ
रूपगत केन्द्र बनबैत अछि।
७.३ पाठक-ग्रहण : बालक सक्रिय अर्थ-निर्माता
वोल्फगांग आइज़रक ग्रहण-दृष्टि पाठककेँअर्थ-निर्माणमे सक्रिय मानैत अछि। बाल-कवितामे ई
सक्रियता आरो प्रत्यक्ष अछि: बालक पंक्ति दोहरबैत, ध्वनि नकल करैत, खेल पहिचानैत, अपन
अनुभव जोड़ैत, चित्रक कल्पना करैत अछि। ‘मेला देखब’ पढ़निहार बालक अपन देखल मेला,
झूला वा भीड़ जोड़ि सकैत अछि; ‘नाना घर’ अपन मातृकुलक स्मृतिसँ भरि सकैत अछि;
‘गाछी के आम’ स्वाद-गन्धक निजी अनुभव जगबैत अछि।
एहि कारण एहि पोथीक अर्थ स्थिर ‘सन्देश’ मात्र नहि। एके कविता गामक बालक, शहरक
बालक, 2012क पाठक आ 2026क पाठक लेल भिन्न स्मृति-क्षेत्र खोलि सकैत अछि। बदलैत
जीवन-स्थितिक कारण किछु वस्तु—जाँता, मदारी, परम्परागत खेल—नव पाठक लेल प्रत्यक्ष
अनुभवक बदला सांस्कृतिक अभिलेख बनि सकैत अछि।
७.४ बाख्तिनी संवादिता : एक पोथीमे अनेक सामाजिक स्वर
संग्रहमे एकसमान ‘बाल-भाषा’ नहि, अनेक सामाजिक स्वर अछि—घरक पुचकार, इआक
सम्बोधन, खेलक साथीक भाषा, गुरु-विद्यालयक आदेश, राष्ट्रक सार्वजनिक शब्दावली, गामक
खाद्य-संस्कृति, मेले-हाट, श्रम, रेलगाड़ी आ आधुनिक समय। बाख्तिनक संवादिता-परिप्रेक्ष्यसँ
ई बहुस्वरिता महत्त्वपूर्ण अछि।
एहि बहुस्वरितामे तनाव सेहो अछि। घरक स्वच्छन्द बालक विद्यालयी अनुशासनसँभेटैत अछि;
स्थानीय गाम राष्ट्रीय प्रतीकसँभेटैत अछि; लोकखेल रेलगाड़ी आ घड़ीक आधुनिक समयसंरचनासँभेटैत अछि। संग्रहक साहित्यिक मूल्य एहि विविधताकेँ एकरूप ‘सुसंस्कृत बालक’मे
समेटबामेनहि, अपितु ई देखबामेअछि जेबालजीवन अनेक संस्थागत स्वरक बीच बनैत अछि।
७.५ ‘अन्तर्निहित प्रौढ़’ : बाल-स्वरक पाछाँमूल्यमू -नियमन
पेरी नोडेलमैन बाल-साहित्यक सरल सतहक भीतर प्रौढ़ ज्ञान, इच्छा आ मूल्य-व्यवस्था उपस्थित
रहबाक बात करैत छथि। ‘बाल गोपाल’ एहि दृष्टिसँअत्यन्त रोचक अछि। कवि भूमिका मे
बालकक सहचर बनबाक आकांक्षा व्यक्त करैत छथि; तथापि राष्ट्र, गुरु, शिक्षा, समय, सार्थक
जीवन आ सदाचारक अनेक रचनामेप्रौढ़ मार्गदर्शक स्पष्ट अछि।
ई उपस्थिति स्वयमेव दोष नहि। बाल-साहित्य प्रायः प्रौढ़ द्वारा बालक लेल लिखल जाइत अछि;
प्रश्न ई अछि जेप्रौढ़ स्वर बालकक जिज्ञासा आ स्वायत्तताकेँ स्थान दैत अछि कि नहि। ‘पढ़ेन
जायब बाबूजी’ सन रचना एहि दृष्टिसँमहत्त्वपूर्ण अछि, कारण बालक प्रतिरोधक स्वर ग्रहण
करैत अछि। ‘इआ ! तनि सेआन होए दे’ मेबालक भविष्यक इच्छा स्वयं कहैत अछि। एहि
रचनासभमेअन्तर्निहित प्रौढ़क एकाधिकार टूटैत अछि।
७.६ पारिस्थितिक आ सांस्कृतिक पाठ
बाग, गाछी, आम, धूरि, खेत, गाम, पशु-पक्षी, ऋतु आ खाद्य-सामग्री संग्रहक पारिस्थितिक
आधार बनैत अछि। एहि प्रकृति-वर्णनकेँमात्र सजावटमानब उचित नहि। बालकक खेल, भोजन,
श्रम, परिवार आ उत्सव प्राकृतिक चक्रसँ जुड़ल अछि। ‘सुन्दर बाग लगाव’ प्रकृति प्रति
क्रियाशील सम्बन्ध सुझबैत अछि; ‘गाछी के आम’ गाछीकेँ स्वादक सामाजिक स्थल बनबैत
अछि; ‘माय नचावेजाँता’ घरेलूश्रम, अन्न आ देहगत लयकेँ एक संग आनैत अछि।
आधुनिक पारिस्थितिक समीक्षा एहि रचनासभसँ ई प्रश्न सेहो पूछि सकैत अछि जे प्रकृति मात्र
मानव उपयोगक वस्तुअछि कि सह-अस्तित्वक संसार। संग्रह अधिकांशतः उपयोग, सौन्दर्य आर्य
बाल-आनन्दक दृष्टि धरैत अछि; प्राणी-अधिकार वा पर्यावरणीय संकटक आधुनिक प्रश्न स्पष्ट
नहि। ई अनुपस्थिति दोष कहि देब उचित नहि; मुदा पुनर्पाठ लेल एकटा नूतन प्रश्न अवश्य अछि।
७.७ मार्क्सवादी वर्ग-पाठ : बाल-श्रम, मालिकाना शक्ति आ शिक्षा-असमानता
‘रमचरना’ आ ‘हम्मर जमहिरा केना क पढ़तई’ वर्ग-पाठक दृष्टिसँसंग्रहक विशेष महत्त्वपूर्ण
रचना अछि। हाकिमक घरक सेवा, ईंटा-भट्ठाक श्रम, घट्टल घर आ पाठशाला धरि नहि पहुँचि
सकबाक विवशता बाल-श्रमक भौतिक आधार उघारैत अछि। बाल-साहित्यक परम्परागत
“निष्पाप बचपन”क एकरूपी कल्पना एतय टूटैत अछि; बालक उत्पादन, सेवा, गरीबी आ
शिक्षा-असमानताक संरचनामेफँसल व्यक्ति रूपमेदेखाइत अछि।
एहि कवितासभक आलोचनात्मक बल एतय अछि जेशिक्षाक नैतिक उपदेश आ शिक्षाक
वास्तविक पहुँच बीच अन्तर स्पष्ट भऽ जाइत अछि। “पढ़ू” कहनाइ पर्याप्त नहि, जँभोजन,
अवकाश, आर्थिक सुरक्षा आ विद्यालय पहुँच उपलब्ध नहि। एहि प्रकार वर्ग-पाठ पोथीक
शिक्षात्मक कार्यक्रमक भीतरक सामाजिक शर्तसभकेँ दृश्य बनबैत अछि।
७.८ उत्तर-औपनिवेशिक/निम्नवर्गीय प्रश्न : स्थानीय ज्ञानक प्रस्तुतितु
‘बउआ छिड़िआयल हय’मे डाइन-जोगिन, नजर-गुजर, ओझा-गुनी आ ग्राम्य उपचारविश्वक
उल्लेख ग्रामीण चेतनाक आन्तरिक सांस्कृतिक तर्क उपस्थित करैत अछि। आधुनिक समीक्षा
एहि तत्त्वसभकेँबिना उपहासक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक साक्ष्य रूपमेपढ़ि सकैत अछि, मुदा
एतय सावधानी आवश्यक अछि: लोकविश्वासक प्रस्तुति ओकर सत्यता सिद्ध नहि करैत, आ
सांस्कृतिक सम्मान आलोचनात्मक परीक्षणक निषेध नहि।
निम्नवर्गीय प्रतिनिधित्वक प्रश्न सेहो एतय महत्त्वपूर्ण अछि—बालक, श्रमिक परिवार आ
ग्रामीण पात्रक स्वर लेखक मार्फत अबैत अछि; तैं “ई असली बालकक अथवा निम्नवर्गीयक
सीधा स्वर अछि” एहन सरल दावा नहि कएल जा सकैत। पाठ प्रतिनिधित्व आ अनुभव बीच
दूरीक स्मरण करब आवश्यक अछि।
८. नव्य-न्याय ज्ञानमीमांसीय विश्लेषण
८.१ शब्द-प्रमाण, शाब्दबोध आ तात्पर्यग्रह
नव्य-न्यायक ज्ञानमीमांसीय दृष्टिसँ ‘बाल गोपाल’क किछु शिक्षात्मक रचना शब्दमार्फत ज्ञानसंचरणक प्रक्रिया बुझबा लेल रोचक अछि। ‘पढ़ रे बउआ’, ‘विद्यादान’ आ वर्ण-शिक्षण सम्बन्धी
रचनामेकविता स्मरणीय ध्वनि-रूप दैत अछि, जाहिसँकथ्य बालकक कण्ठ आ स्मृतिमेटिकि
सकैत अछि। अक्षरकेँपरिचित वस्तुसँजोड़नाइ तात्पर्यग्रहक शैक्षिक सहजता बढ़बैत अछि।
एतय “शब्द-प्रमाण” शब्दक प्रयोग सावधानीसँकरबाक चाही। काव्यक गुरु-वाक्य स्वतः
दार्शनिक अर्थमे आप्तवाक्य सिद्ध नहि; समीक्षात्मक अर्थ एतबेजेकविता भाषा, विश्वास आ
स्मृति मार्फत ज्ञान-दाबी बालक धरि पहुँचबैत अछि। दार्शनिक कोटिक ई प्रयोग विश्लेषणक
साधन अछि, मूल कविक घोषित न्याय-तत्त्व नहि।
८.२ व्याप्ति, दृष्टान्त आ शिक्षात्मक तर्क-रचना
‘विद्यादान’ सन रचनामे “विद्या” आ “कल्याण/महानता”क सम्बन्ध सार्वत्रिक नैतिक नियमक
रूपमे प्रस्तुत होइत अछि; ‘कृषक महान’मेअन्नक आवश्यकता आ कृषक-श्रमक महत्त्व जोड़ल
जाइत अछि। ई संरचना व्याप्ति-दृष्टान्तक स्मरण करा सकैत अछि—सामान्य सम्बन्ध, परिचित
उदाहरण, फेर निष्कर्ष। मुदा ई औपचारिक पंचावयव न्याय-अनुमान नहि; बाल-कविताक
नैतिक-तर्कक एक सहज संरचना अछि।
नव्य-न्याय पठनक लाभ ई जेशिक्षा-कविताकेँमात्र “उपदेश” कहि छोड़बाक बदला ई देखल
जा सकैत अछि जेकथन कोन सम्बन्ध स्थापित करैत अछि, उदाहरण कोना चुनैत अछि, आ
बालकक अनुभवसँनिष्कर्षक दूरी कतेक अछि। जँ सम्बन्ध अत्यधिक सामान्यीकृत अछि तँ
कविता प्रश्नहीन नैतिक सूत्र बनि सकैत अछि; जँ दृष्टान्त अनुभवसँजुड़ल अछि तँशिक्षात्मक
अर्थ अधिक जीवित बनैत अछि।
९. विदेह समानान्तर परम्परा-प्रतिमानसँविशेष परीक्षण
९.१ स्वनामक सम्मान : ‘बज्जिका बाल कविता’केँ ओही नामेपढ़ब
पोथी अपन नामकरणमे स्पष्ट अछि। अतएव समानान्तर पद्धतिक पहिल दायित्व भाषिक आत्मपरिचयक सम्मान अछि। मैथिली पाठक एहि शब्दरूप, वाक्यलय आ सांस्कृतिक निकटताकेँ
सहज अनुभव कए सकैत छथि, मुदा समीक्षकक काज ई निकटताकेँ राजनीतिक वा
भाषावैज्ञानिक विलयनमे बदलनाइ नहि। उचित पद्धति संवाद, तुलनात्मक शब्दरूप, साझा
सांस्कृतिक भूगोल आ भिन्न स्वनाम—चारूकेँ एक संग देखब अछि।
९.२ कैननक सीमा तोड़नाइ
विदेह समानान्तर कैनन-परीक्षणक एक महत्त्वपूर्ण नियम बाल-साहित्य, मौखिक विधा, लोकरचना आ डिजिटल/क्षेत्रीय सृजनकेँ प्रतिष्ठित साहित्यक संग पढ़नाइ अछि। ‘बाल गोपाल’ एहि
दृष्टिसँमहत्त्वपूर्ण अछि, कारण ई बालकक घरेलूबोली आ दैनिक अनुभवकेँ ‘लघु’ मानि बाहर
नहि छोड़ैत। जँसाहित्येतिहास मात्र दरबार, महाकवि, संस्कृत-शास्त्र, महान उपन्यास वा
वयस्क राजनीतिक कविता धरि सीमित रहत, तँबालकक भाषा, खेल, खाद्य, नाना-घर, जाँता,
मदारी आ रेलगाड़ी अदृश्य रहि जायत।
९.३ स्थानीय अभिलेख : कविता सामाजिक इतिहासक पूरक पू साक्ष्य
समानान्तर इतिहास-दृष्टि साहित्यिक पाठकेँसीधा इतिहास-तथ्य नहि मानैत, मुदा सांस्कृतिक
स्मृति आ अनुभवक साक्ष्य रूपमेपढ़ैत अछि। ‘बाल गोपाल’ सँ2012क आसपासक बज्जिका
बाल-साहित्यक आदर्श, ग्रामीण बाल-जगत, राष्ट्रवादी विद्यालयी संस्कार, पारिवारिक संरचना,
खेल, खाद्य, गुरु-शिष्य सम्बन्ध आ रेल/समयबोधक काव्यात्मक रूपक जानकारी भेटैत अछि।
ई जानकारी ‘जेलिखल अछि सेसामाजिक वास्तविकता हूबहू छल’ एहन दावा नहि; साहित्यिक
चयन स्वयं एक मूल्य-व्यवस्था अछि।
एहि कारण ई पोथी सामाजिक इतिहासक पूरक अभिलेख होइत अछि, निर्णायक आँकड़ा नहि।
जँशोधकर्ता खेलक इतिहास लिखय चाहथि तँ एहि कविता संग मौखिक इतिहास, विद्यालयी
स्मृति, लोकसंग्रह आ स्थानीय दस्तावेज जोड़ब आवश्यक होयत। ई बहु-साक्ष्य पद्धति
समानान्तर दृष्टिक मूल शर्त अछि।
९.४ हाशियाक अनुभनु वक ज्ञानगत प्रासंगिकता
बालक स्वयं वयस्क साहित्यिक संस्थामेशक्तिशाली वक्ता नहि। लोकभाषिक बालक तऽ आरो
कम। एहि कारण ‘बाल गोपाल’क बाल-स्वर ज्ञानगत रूपेँप्रासंगिक अछि। तथापि बालकक
नामपर कवि जे कहैत छथि से सीधे ‘बालकक असली आवाज’ नहि मानल जा सकैत।
अन्तर्निहित प्रौढ़, पाठ्य नैतिकता आ रचनाकारक चयन सभ जगह उपस्थित अछि। समानान्तर
दृष्टि एहि दूनूबातकेँ एक संग मानैत अछि—हाशियाक अनुभव महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा
आलोचनासँमुक्त नहि।
९.५ परम्पराक आलोचनात्मक उत्तराधिकार
लोरी, खेल-गीत, परिवार, मेला, गाछी, चूड़ा, जाँता—ई सभ संरक्षणयोग्य सांस्कृतिक स्मृति
अछि। परन्तुछड़ी-आधारित शिक्षा वा अत्यधिक आइ्ञापालनक मूल्यकेँमात्र ‘हमर परम्परा’
कहि अपरिवर्तनीय नहि मानल जा सकैत। बाल-साहित्यक पुनर्प्रकाशनमेमूल पाठ यथावत राखि
आलोचनात्मक टिप्पणी द्वारा ऐतिहासिक सन्दर्भ देब सर्वाधिक उचित होयत। एहि प्रकार
संरक्षण आ संशोधन परस्पर शत्रुनहि रहैत।
९.६ आत्म-समीक्षा : समानान्तर पद्धतिको प्रश्न
समानान्तर पद्धति स्वयं केँक्षेत्रीय गौरवक प्रचार-पत्र बनएबाक अनुमति नहि दैत। ‘बाल गोपाल’
क्षेत्रीय बाल-साहित्यक महत्त्वपूर्ण पोथी अछि, मुदा एहि कारण एकर प्रत्येक कविता महान
काव्य नहि भऽ जाइत। किछु रचना संदेशप्रधान अछि, किछुमेप्रौढ़ निर्देश बाल-स्वतन्त्रतापर
भारी अछि, किछुमेचित्राभाव आधुनिक बाल-पाठक लेल सीमा बनेत। एहन आलोचना पोथीक
ऐतिहासिक महत्त्व घटबैत नहि; उलटे ओकर वास्तविक स्थान स्पष्ट करैत अछि।
९.७ आत्मदस्तावेज, संस्थागत परिधि आ भाषिक आत्म-निर्माण
लेखकक भूमिका बज्जिका बाल-साहित्यक समकालीन सक्रिय रचनाकार/सम्पादकसभक नाम
सुरक्षित करैत अछि। समानान्तर इतिहास-दृष्टिसँ ई सूची “अन्तिम अधिकृत कैनन” नहि, अपितु
संस्थागत साहित्येतिहासक बाहर निर्मित आत्मदस्तावेज अछि। समर्पण, भूमिका, रचनासूची,
स्थानीय पत्रिका-संलग्नता आ बहुभाषिक कृतित्व मिलि एक एहन साहित्यिक वंशावली रचैत
अछि जेकेन्द्रीय संस्थागत मान्यताक प्रतीक्षा मात्र पर निर्भर नहि।
एहि प्रक्रियाकेँभाषिक आत्म-निर्माणक रूपमेपढ़ल जा सकैत अछि: बालक लेल लोकभाषामे
वर्ण, खेल, परिवार, राष्ट्र, मेला, श्रम आ आधुनिक यन्त्रक कविता लिखनाइ भाषाकेँमात्र घरक
मौखिक संचार नहि, मुद्रित ज्ञान-संस्कृतिक माध्यम बनबैत अछि। मुदा समानान्तर पद्धति एतहु
आत्म-समीक्षा माँगैत अछि—भाषिक गौरव कृतिक प्रत्येक पंक्तिक कलात्मक सिद्धि नहि।
१०. विषयगत गहन समीक्षा
१०.१ राष्ट्र, मातृभूमिभू आ सार्वजनिक बालक
‘अप्पन देश’ सँ ‘पंद्रह अगस्त’ धरि आरम्भिक छह कविता बालककेँ सर्वप्रथम राष्ट्रक सदस्य
रूपमे स्थापित करैत अछि। देशक प्राकृतिक सौन्दर्य, र्य मातृरूप, जन्मभूमिक ऋण, ध्वजक प्रतीक
आ स्वतन्त्रता-स्मृति—ई अनुक्रम सार्वजनिक नागरिकता बनबैत अछि। भारतीय काव्यशास्त्रीय
दृष्टिसँ ओज आ वीरभाव, पाश्चात्य बाल-साहित्य-दृष्टिसँप्रौढ़ नागरिक आदर्श—दूनू एक संग
उपस्थित अछि।
समस्या ई नहि जेबाल-साहित्यमेराष्ट्रबोध रहबाक चाही वा नहि; प्रश्न ई जेबालकक अनुभव
आ राष्ट्रक अमूर्तता बीच कतेक जीवित सम्बन्ध बनैत अछि। जखन झण्डा रंग, आकार आ दृश्य
बनि अबैत अछि, बालकक इन्द्रियबोध सक्रिय होइत अछि। जखन कविता ऐतिहासिक नाम आ
आदर्शक सूची बनि जाइत अछि, बालकक प्रत्यक्ष भागीदारी घटि सकैत अछि। एहि कारण
आरम्भिक खण्डक कलात्मक सफलता असमान अछि।
१०.२ खेल : देह, समुदा मु य आ स्वाधीनता
‘मजा अबइअत हुए खेलेमें’, ‘ताल-गुल्ली’, ‘गुड़िया’, ‘पतंग’, ‘कागज के नाव’, ‘धुर खेल’
आदि संग्रहक केन्द्रीय उपलब्धि अछि। खेलमेबालक मात्र विषय नहि, क्रियाशील कर्ता अछि।
देह दौड़ैत, फेंकैत, पकड़ैत, उड़बैत, बनबैत, धूरिसँ सनैत अछि। एहि देहगत क्रियासँकविता लय
ग्रहण करैत अछि।
खेल सामूहिकता सेहो बनबैत अछि। बालक संग-साथी, विवाद, हँसी, हार-जीत आ नियम
सीखैत अछि। लेखकक भूमिका मे ‘सामाजिक विकास’ जे लक्ष्य कहल गेल अछि, ओकर
सर्वाधिक स्वाभाविक काव्यरूप उपदेशमेनहि, खेलक रचनासभमेभेटैत अछि। ई महत्त्वपूर्ण
अन्तर्दृष्टि अछि: मूल्य कथनसँनहि, क्रियासँअनुभूत होइत अछि।
१०.३ कल्पना : चान, पतंग, नाव आ गुड़िगु याक संसार
बाल-कल्पनाक चारि रूप उल्लेखनीय अछि। पहिल, मानवीकरण—गुड़िया, चान, निन्न; दोसर,
ऊर्ध्वाकांक्षा—पतंग आ चानपर यात्रा; तेसर, रूपान्तरण—कागज नाव बनैत अछि; चारिम,
लघुसंसार—खेलौना वा घरेलू वस्तुपूर्ण कथा-जगत ग्रहण करैत अछि। एहि सभमेअद्भुत आ
वक्रोक्ति एक-दोसरासँजुड़ैत अछि।
‘चान पर हमहूँ जायब’ विशेष महत्त्वपूर्ण अछि, कारण परम्परागत चन्दा-मामा/चानक
आत्मीयता आधुनिक अन्तरिक्ष-कौतूहलसँभेटैत अछि। कविता वैज्ञानिक विवरण नहि दैत, मुदा
‘दूर’ के ‘जाय सकब’ योग्य बनबैत अछि। बाल-कवितामेकल्पना ज्ञानक विरोधी नहि; ज्ञानक
पहिल प्रश्न बनि सकैत अछि।
१०.४ परिवार : माय, निन्न, दादा, नाना-घर
‘हमर माय’, ‘निनिया तू आ जो रे’, ‘हमर दादा भेलन बलाह’, ‘नाना घर’, ‘अन्तर प्यार में’
आदिमेपरिवार भावात्मक केन्द्र अछि। एहि परिवारमे सम्बोधनक वाचिकता महत्त्वपूर्ण अछि
—‘माय’, ‘इआ’, ‘दादा’, ‘बाबूजी’। सामाजिक विज्ञानक निरपेक्ष शब्द ‘परिवार’ जे
आत्मीयता नहि देत, कविता ओ आत्मीयता सम्बोधनसँ रचैत अछि।
‘नाना घर’ बालकक वैकल्पिक घरक अनुभव उपस्थित करैत अछि; ‘निन्न’ लोरी-परम्परासँ
जोड़ैत अछि; ‘हमर माय’ वात्सल्य आ सुरक्षा; ‘अन्तर प्यार में’ सम्बन्धक भीतरक स्नेह-सूत्र।
एहि खण्डमेकविक भाषा सर्वाधिक सहज आ माधुर्यपूर्ण होइत अछि।
१०.५ गाम, स्वाद आ श्रम
‘हमर गाँव’, ‘सुन्दर बाग लगाव’, ‘झमरी बिल्ली’, ‘चूड़ा गमागम’, ‘गाँव मेंमदारी’, ‘गाछी के
आम’, ‘माय नचावेजाँता’—ई सभ मिलि ग्रामीण सांस्कृतिक भूगोल रचैत अछि। गाम मात्र
दृश्य नहि; स्वाद, गन्ध, ध्वनि, श्रम, मनोरञ्जन आ सम्बन्धक संगम अछि।
विशेषतः ‘माय नचावेजाँता’ घरेलूश्रमकेँबालदृष्टिसँ दृश्य बनबैत अछि। जाँताक चक्र, मायकेँ
केन्द्रित घरक श्रम आ अन्न-प्रक्रिया आधुनिक यान्त्रिक रसोईसँभिन्न अनुभवक अभिलेख
अछि। नारीवादी पाठ एतय घरेलूश्रमक दृश्यताकेँ सराहि सकैत अछि, संगहि प्रश्न करि सकैत
अछि जेश्रमक भार, थकान वा लैंगिक विभाजन कविता मेकतेक स्पष्ट अछि। समानान्तर दृष्टि
प्रशंसा आ प्रश्न दुनू बचबैत अछि।
‘चूड़ा गमागम’ आ ‘गाछी के आम’ स्वाद-साहित्यक बालरूप अछि। साहित्यिक संस्कृति मात्र
महान मिथक आ शास्त्र नहि; भोजन सेहो स्मृति, ऋतु, श्रम आ क्षेत्रीय पहिचानक वाहक अछि।
एहि ठाम संग्रहक सांस्कृतिक मूल्य अत्यन्त ठोस अछि।
१०.६ मेला, मदारी आ सार्वजनिक लोक-संस्कृति
‘मेला देखब’, ‘सोनपुर के मेला’ आ ‘गाँव मेंमदारी’ बालककेँ घरसँबाहिर सार्वजनिक लोकसंसारमेलैत अछि। मेला रंग, भीड़, वस्तु, पशु, हाट आ प्रदर्शनक बहु-इन्द्रिय अनुभव अछि।
मदारीक खेल चलायमान लोक-मनोरञ्जनक स्मृति अछि। डिजिटल दृश्य-संसारक पूर्व वा
समांतर ई प्रत्यक्ष प्रदर्शन-संस्कृति बालकक सामूहिक विस्मय बनबैत अछि।
आधुनिक नैतिक पुनर्पाठमेपशु-प्रदर्शन वा सड़क-कलाकारक आर्थिक असुरक्षा सम्बन्धी प्रश्न
उठि सकैत अछि; मूल कविता संभवतः बालकक कौतूहलपर केन्द्रित अछि। समीक्षकक कर्तव्य
मूल पाठपर वर्तमान प्रश्न आरोपित करब नहि, अपितुपाठक ऐतिहासिक सीमा आ नव प्रश्न दुनू
पृथक्-पृथक् स्पष्ट करब अछि।
१०.७ शिक्षा, गुरु गु आ अनुशा नु सन
‘शिक्षक दिवस’, ‘विद्यादान’, ‘पढ़ रे बउआ’, ‘तरी आ छड़ी’, ‘सार्थक जीवन’, ‘पढ़ेन जायब
बाबूजी’ एकटा छोटशैक्षिक चक्र रचैत अछि। गुरु सम्मान, ज्ञान, श्रम, अनुशासन, प्रतिरोध—
सभ स्वर एतय अछि। एहि कारण शिक्षा मात्र एकमुखी आदर्श नहि रहैत।
‘पढ़ेन जायब बाबूजी’ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रर्ण तिरोधक रचना अछि। बालक विद्यालय न जायबाक
अपन कारण, भय वा अनुभव प्रकटकरैत अछि; ई स्वर अन्य उपदेशात्मक पाठसभक बीच
असहमतिक अवकाश बनबैत अछि। बाख्तिनी दृष्टिसँ ई बहुस्वरिता, नोडेलमैनक दृष्टिसँ
अन्तर्निहित प्रौढ़क सत्ता पर बाल-स्वरक प्रत्युत्तर, आ समानान्तर दृष्टिसँसंस्थागत शिक्षा पर
भीतरसँ उठल प्रश्न अछि।
‘तरी आ छड़ी’ पुरान दण्ड-संस्कृतिक स्मृति अछि। एखन एहि रचनाकेँबाल-दण्डक अनुमोदन
रूपमेनहि, ऐतिहासिक शैक्षिक मानसिकताक आलोचनात्मक दस्तावेज रूपमेपढ़ब अधिक
उचित अछि।
१०.८ समय, रेल आ बदलैत संसार
अन्तिम रचनासभ संग्रहकेँ पारम्परिक ग्रामीण बाल-जीवनसँ आधुनिक सामाजिक अनुभवक
दिशामेखोलैत अछि। ‘घड़ी’ समयक अनुशासन आ क्षण-मूल्यक शिक्षा देत अछि; ‘गौआ गोनू
टीसन आयल’ रेलगाड़ीकेँ दृश्य, गति आ तकनीकी कौतूहल बनबैत अछि; ‘कइसन भेल संसार’
सामाजिक परिवर्तनपर प्रश्नसूचक विस्मय व्यक्त करैत अछि।
एहि अन्तिम अनुक्रममेविशेष बात ई जे आधुनिकता मात्र महानगर रूपमेनहि अबैत; ओ घड़ी
आ रेल द्वारा गाममे प्रवेश करैत अछि। समानान्तर इतिहासक भाषा मे ई ‘केन्द्र सँपरिधि’क
एकतरफा कथा नहि, स्थानीय जीवन आ बाहरी गति-संरचनाक अन्तःक्रिया अछि।
११. बाल-मनोविज्ञान, शिक्षण-शास्त्र आ सामाजिक यथार्थ
रचनाकारक दीर्घ अध्यापन-अनुभव आ शिक्षाशास्त्रीय प्रशिक्षणक उल्लेख अछि। संग्रहक श्रेष्ठ
खेल-कवितासभ देखबैत अछि जेबालकक संवेगात्मक सन्तुलन, समूहगत व्यवहार, नेतृत्व,
सहकारिता आ देहगत अधिगम प्रत्यक्ष क्रियासँविकसित होइत अछि। “मजा अबइत हए खेले
में” सन रचनामेपढ़ाइ-खेलक तनाव बालकक अनुभवसँ उठैत अछि; “पढ़ेन जायब बाबूजी”मे
बालक असहमति प्रकटकरैत अछि। ई स्वर बालककेँनिष्क्रिय संस्कार-ग्राहक बनबाक बदला
अनुभववान व्यक्ति रूपमे प्रतिष्ठित करैत अछि।
दण्डात्मक शिक्षा सम्बन्धी कवितासभ ऐतिहासिक रूपेँमहत्त्वपूर्ण अछि। छड़ीक भयक चित्रणकेँ
आइ बाल-केन्द्रित शिक्षाक मानकसँ आलोचनात्मक रूपेँपढ़बाक चाही। स्नेह, संवाद, खेल,
प्रश्न, परिचित भाषा आ सक्रिय सहभागिता—ई सभ बाल-अधिगमक अधिक उपयुक्त साधन
रूपमेसंग्रहक सफल रचनासभ स्वयं उदाहरण दैत अछि।
बाल-श्रमक रचनासभ पोथीक नैतिक गम्भीरता बढ़बैत अछि। जमहिरा आ रमचरनाक माध्यमसँ
ई प्रश्न उठैत अछि जेभूख, आर्थिक अभाव आ श्रमक दबावक बीच शिक्षा-अधिकार कोना
सार्थक होयत। एतय कविता बाल-मनोविज्ञानकेँसामाजिक संरचनासँजोड़ैत अछि; बालकक
मानसिक संसार गरीबी, श्रम, परिवार आ संस्थागत पहुँचसँपृथक् नहि।
परिवारक रचनासभ भावात्मक सुरक्षा, पीढ़ीगत सम्बन्ध आ सम्बोधनक महत्त्व देखबैत अछि।
माय, इआ, दादा, नाना-घर, निन्न—ई शब्द मात्र पात्र-सूची नहि, बालकक सुरक्षित सम्बन्धजाल अछि। तथापि आधुनिक समीक्षा परिवारक स्नेहक संग बालकक स्वायत्त इच्छा सेहो देखैत
अछि; एहि कारण प्रतिरोध, जिद्द, प्रश्न आ खेलक स्वतंत्रता साहित्यिक रूपेँविशेष महत्त्वपूर्ण
बनैत अछि।
१२. भाषा, ध्वनि, लय आ वाचिकता
‘बाल गोपाल’क भाषिक प्राण ओकर वाचिकता अछि। कविता सुनब, दोहरायब, गाबय वा
अभिनय करबाक अनुकूल अछि। बाल-साहित्यक मुद्रित पाठ जँकण्ठमेनाचि नहि सकय तँ
ओकर आधा जीवन हराइत अछि। एहि पोथीक अनेक रचना—विशेषतः लोरी, खेल, ध्वनि-
अनुकरण आ सम्बोधनप्रधान कविता—कण्ठगत प्रसार लेल बनल बुझाइत अछि।
बज्जिका रूपसभ संग्रहकेँ स्थानिक आत्मीयता दैत अछि—‘हमर’, ‘बउआ’, ‘इआ’, ‘हय’,
‘जायब’ आदि रूप पाठककेँ घरक वाणी सँजोड़ैत अछि। एकरेसंग राष्ट्र, शिक्षा आ नीतिपरक
कवितासभमेसंस्कृतनिष्ठ सार्वजनिक पदावली प्रवेश करैत अछि। एहि द्वैधताकेँभाषिक अशुद्धि
कहि काटिदेनाइ उचित नहि; परन्तु सम्पादकीय नूतन संस्करणमेमूल वर्तनी सुरक्षित राखि
शब्द-सूची देल जाए तँनव पाठक लेल उपयोगी होयत।
ध्वनि-स्तरपर पुनरावृत्ति संग्रहक प्रधान युक्ति अछि। बालक पुनरावृत्तिमे ऊबैत नहि; ओ
अनुमान, प्रत्युत्तर आ स्मृति बनबैत अछि। तथापि पुनरावृत्ति जँमात्र तुक बचएबाक उपाय बनि
जाए तँ रचना यांत्रिक भऽ सकैत अछि। सफल रचनामेपुनरावृत्ति अर्थ आ ध्वनि दुनूकेँविस्तार
दैत अछि।
अनुकरणात्मक आ ध्वन्यात्मक पद—टिक-टिक, गमागम, धाम-धूम, पुकार, टेक, पुनरावृत्ति—
बाल-कविताक गेयता बढ़बैत अछि। एहन पद कागजपर अर्थ देबाक संग कण्ठमे लय उत्पन्न
करैत अछि। संग्रहक वास्तविक सामर्थ्यक एक भाग मुद्रित दृश्यसँबेसी श्रव्य प्रस्तुतीकरणमे
निहित अछि।
१३. बाल-दृष्टि बनाम अन्तर्निहित प्रौढ़
संग्रहक मूल तनाव एहि प्रश्नमेअछि—कविता बालकक दृष्टिसँसंसार देखैत अछि, कि प्रौढ़
बालककेँसंसार देखबैत अछि? उत्तर द्विविध अछि। खेल, निन्न, गुड़िया, पतंग, नाव, चान, मेला,
आम, बिल्ली, रेल आदिमेबाल-दृष्टि प्रबल अछि। राष्ट्र, गुरु, सार्थक जीवन, समय आदिमेप्रौढ़
शिक्षात्मक संरचना अधिक स्पष्ट अछि।
एहि द्विविधताकेँदोष-सूची बनएबामेसाहित्यिक इतिहासक जटिलता हराइत। 2012क क्षेत्रीय
बाल-साहित्यक एक उद्देश्य मातृभाषिक मनोरञ्जन छल, दोसर उद्देश्य संस्कार/शिक्षा। लेखक
भूमिका मे स्वयं ई दुनू लक्ष्य मानैत छथि। आलोचनाक काज ई देखब अछि जेकखन ई लक्ष्य
संगत होइत अछि आ कखन शिक्षा काव्यपर भारी पड़ैत अछि।
सर्वोत्तम स्थिति ओ अछि जतय मूल्य अनुभवमेघुलि जाइत अछि। सामूहिक खेल स्वतः सहयोग
सिखबैत अछि; बाग लगेनाइ प्रकृति-प्रेमक व्यवहार बनैत अछि; घड़ीक टिक-टिक समयक अर्थ
अनुभूत करबैत अछि। कमजोर स्थिति ओतय अछि जतय कविता नैतिक वाक्यक पद्यरूप मात्र
बनि जाइत अछि। एहि अन्तरकेँपोथीक नूतन मूल्यांकनमेकेन्द्रमेराखबाक चाही।
१४. ५१ कविताक क्रमिक समीक्षात्मक पंजी
निम्न पंजी उपलब्ध विस्तृत अनुक्रमक ५१ कविता क्रमशः देखैत अछि। मूल बज्जिका भाषिक
रूपकेँमैथिलीकरण नहि कएल गेल अछि। आलोचनात्मक केन्द्र समीक्षात्मक उपकरण अछि,
मूल रचनाकारक घोषित सिद्धान्त नहि।
क्र. कविता (मुद्रित पृष्ठ) मुख्य आलोचनात्मक केन्द्र संक्षिप्त निर्णय
1 अप्पन देश / (पृ.
1)
देशक प्राकृतिक-सांस्कृतिक
सौन्दर्य आ सामूहिक गौरव /
भारतीय दृष्टि: वीर/ओज; प्रकृति
विभाव / पाश्चात्य/समानान्तर:
अनुकृति + सार्वजनिक बालक
आरम्भक घोषणात्मक
कविता; दृश्य बिम्ब जतय
प्रबल, ओतय बाल-ग्रहण
सहज।
क्र. कविता (मुद्रित पृष्ठ) मुख्य आलोचनात्मक केन्द्र संक्षिप्त निर्णय
2 भारत माँ/ (पृ. 2) राष्ट्रक मातृरूप आ त्याग-स्मृति
/ भारतीय दृष्टि: वीररस,
मातृरूपक /
पाश्चात्य/समानान्तर:
अन्तर्निहित प्रौढ़; राष्ट्र-रूपक
भावात्मक देश-कल्पना;
बाल-अनुभवक प्रत्यक्षता
अपेक्षाकृत कम।
3 अभिलाषा / (पृ.
3)
देशसेवा/कर्तव्यक आकांक्षा /
भारतीय दृष्टि: उत्साह-भाव,
ओज / पाश्चात्य/समानान्तर:
इच्छा-रचना; नागरिक आदर्श
बालकक भविष्य-इच्छा
सार्वजनिक कर्तव्यसँ
जुड़ैत; प्रौढ़ आदर्श स्पष्ट।
4 जन्म भूमि हे/ (पृ.
4)
जन्मभूमिसँ भावात्मक ऋणसम्बन्ध / भारतीय दृष्टि:
वीर/शान्त मिश्र; ध्वनि /
पाश्चात्य/समानान्तर: स्थानस्मृति
भूगोलकेँ आत्मीय ‘घर’
बनबैत; सांस्कृतिक स्मृति
प्रबल।
5 देश के झंडा / (पृ.
5)
ध्वजक रंग, प्रतीक आ राष्ट्रस्मृति / भारतीय दृष्टि: रूपक,
ओज / पाश्चात्य/समानान्तर:
दृश्य-चिह्नक पाठ
बालक लेल अमूर्त राष्ट्रक
दृश्य मूर्त रूप;
शिक्षात्मकता आ दृश्यता
संग-संग।
6 पंद्रह अगस्त / (पृ.
6)
स्वतन्त्रता-दिवस आ राष्ट्रीय
स्मृति / भारतीय दृष्टि: वीररस /
पाश्चात्य/समानान्तर: स्मृति-
राजनीति; सार्वजनिक अनुष्ठान
इतिहास-नामावलीक भार
किछु ठाम बाल-लय घटा
सकैत, मुदा सामूहिक
स्मरणक दस्तावेज।
7 बउआ के मुँह चान
सन / (पृ. 7)
शिशुमुख, पुचकार, पारिवारिक
वात्सल्य / भारतीय दृष्टि:
वात्सल्य, उपमा, माधुर्य /
पाश्चात्य/समानान्तर: बालदेहक सौन्दर्य; द्वैध पाठक
संग्रहक स्वाभाविकतम
वात्सल्य-कवितासभमे
एक; चन्द्र-उपमा
लोकवाचिक आत्मीयता
रचैत।
क्र. कविता (मुद्रित पृष्ठ) मुख्य आलोचनात्मक केन्द्र संक्षिप्त निर्णय
8 मजा अबइअत हुए
खेलेमें/ (पृ. 8)
खेलक देहगत आनन्द आ
साथीक संसार / भारतीय दृष्टि:
हास्य/उत्साह; लय /
पाश्चात्य/समानान्तर: खेल आ
बाल-स्वायत्तता
लेखकक ‘बालकक
सहचर’ सिद्धान्तक सफल
क्रियान्वयन; उपदेशक
बदला क्रिया।
9 इआ ! तनि सेआन
होए दे / (पृ. 9–
10)
इआक सम्बोधन आ ‘बड़
होएब’क बाल-आकांक्षा /
भारतीय दृष्टि: वात्सल्य,
पुनरावृत्ति /
पाश्चात्य/समानान्तर: बाल-स्वर;
भविष्य-स्व
आवर्तन बालकक
जिद्द/आकांक्षाकेँ जीवित
बनबैत; प्रत्यक्ष संवादक
शक्ति।
10 ताल-गुल्ली / (पृ.
11)
लोकखेल, नियम, गति आ
सामूहिकता / भारतीय दृष्टि:
हास्य/उत्साह; वाचिक लय /
पाश्चात्य/समानान्तर: देहगत
खेल
लोकखेलक सांस्कृतिक
अभिलेख; देहगत क्रियासँ
कविता गति पबैत।
11 अगती / (पृ. 12) बाल-शरारत आ छोटसामाजिक
प्रसंग / भारतीय दृष्टि: हास्य,
चरित्रचित्रण /
पाश्चात्य/समानान्तर: हास्यपूर्ण
बाल-चरित्र; सामाजिक दृष्टि
प्रौढ़क नजर आ बालव्यवहारकटकराव छोट
नाटकीय स्थिति रचैत।
12 गुड़िया / (पृ. 13) गुड़िया-क्रीड़ा, कल्पना आ घरेलू
नाट्य / भारतीय दृष्टि: अद्भुत,
मानवीकरण /
पाश्चात्य/समानान्तर: लघु
संसार; भूमिकाभिनय
खेलौना जीवित पात्र
बनैत; बाल-कल्पनाक
स्वायत्त संसार।
13 पतंग / (पृ. 14) उड़ान, ऊर्ध्वगति, डोर आ आकाशक दूरी खेलमे
क्र. कविता (मुद्रित पृष्ठ) मुख्य आलोचनात्मक केन्द्र संक्षिप्त निर्णय
आकांक्षा / भारतीय दृष्टि:
अद्भुत; रूपक-ध्वनि /
पाश्चात्य/समानान्तर: कल्पना +
स्वायत्त क्रिया
बदलैत; गति कविता-
रूपकक केन्द्र।
14 सूरज चन्दा / (पृ.
15)
सूर्य-चन्द्रसँ बालसंवाद/कल्पनात्मक निकटता /
भारतीय दृष्टि: अद्भुत, वक्रोक्ति
/ पाश्चात्य/समानान्तर:
आकाशक आत्मीयकरण
आकाशीय वस्तु घरेलू
परिचित बनैत; बालकौतूहलक सहज रूप।
15 कागज के नाव /
(पृ. 16)
कागजक वस्तुसँनावक खेलरूपान्तरण / भारतीय दृष्टि:
अद्भुत, वक्रोक्ति /
पाश्चात्य/समानान्तर:
रूपान्तरकारी खेल
सामान्य वस्तुकल्पनाक
यान; बालसृजनशीलताक प्रमुख
कविता।
16 मुसकाय कन्हैया /
(पृ. 17)
कन्हैयाक बाल-छवि आ स्नेह /
भारतीय दृष्टि: वात्सल्य/भक्ति-
छाया / पाश्चात्य/समानान्तर:
सांस्कृतिक अन्तर्पाठ
धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृति
बाल-वात्सल्यसँ मिलैत;
छविमूलकता महत्त्वपूर्ण।
17 हमर माय / (पृ.
18)
मायक स्नेह, सुरक्षा आ घर /
भारतीय दृष्टि: वात्सल्य, माधुर्य
/ पाश्चात्य/समानान्तर:
देखभालक सम्बन्ध
‘माय’ शब्द स्वयं भावक
केन्द्र; घरेलू बालअस्तित्वक आधार।
18 लाल / (पृ. 19) बालक/लालक स्नेहमय चित्र /
भारतीय दृष्टि: वात्सल्य /
पाश्चात्य/समानान्तर: बालकेन्द्रित दृष्टि
लघुबिम्ब आ पुचकारक
रचना; भावक सरलता
एकर बल।
19 हमर बालगोपाल / बालगोपालक खेल-शरारत आ संग्रह-शीर्षकक भाव-
क्र. कविता (मुद्रित पृष्ठ) मुख्य आलोचनात्मक केन्द्र संक्षिप्त निर्णय
(पृ. 20) मोहकता / भारतीय दृष्टि:
वात्सल्य + हास्य /
पाश्चात्य/समानान्तर: शीर्षकसंकेतित बाल-प्रतिमा
जगत उद्घाटित; बालकक
चपलता काव्यक केन्द्र।
20 बउआ केजगअनी /
(पृ. 21)
बालककेँ जगएबाक पुकार /
भारतीय दृष्टि: वात्सल्य; ध्वनि-
पुनरावृत्ति /
पाश्चात्य/समानान्तर: वाचिक
प्रस्तुति
पाठक वाचिक सहभागिता
माँगैत; घरक जगारण
संस्कारक छवि।
21 निनिया तू आ जो रे
/ (पृ. 22)
निन्न/लोरी आ बाल-निद्रा /
भारतीय दृष्टि: वात्सल्य, माधुर्य,
आवर्तन / पाश्चात्य/समानान्तर:
लोरीक ग्रहण
मुद्रित कविता सँ बेसी
कण्ठक विधा; वाचिक
परम्परासँ गहिर सम्बन्ध।
22 बउआ छिड़िआयल
हय / (पृ. 23)
रूसल/छिड़िआयल बालक आ
मनुहार / भारतीय दृष्टि:
वात्सल्य + हास्य /
पाश्चात्य/समानान्तर: भावनियमन
बाल-भावकेँमान्यता देत;
प्रौढ़ मनुहारक संवाद
भावात्मक साक्षरता
बनबैत।
23 हमर दादा भेलन
बलाह / (पृ. 24–
25)
दादा, परिवार आ हास्यमय प्रसंग
/ भारतीय दृष्टि: हास्य +
वात्सल्य /
पाश्चात्य/समानान्तर:
पारिवारिक कथन
दू पृष्ठक विस्तार छोट
कथात्मक कविता बनबैत;
पीढ़ीगत सम्बन्ध जीवित।
24 नाना घर / (पृ. 26) मातृकुल, यात्रा, खेल आ
अपनापन / भारतीय दृष्टि:
वात्सल्य, ध्वनि /
पाश्चात्य/समानान्तर: स्मृति-
‘नाना घर’ वैकल्पिक
बाल-घर; सांस्कृतिक
भूगोलक आत्मीय स्थल।
क्र. कविता (मुद्रित पृष्ठ) मुख्य आलोचनात्मक केन्द्र संक्षिप्त निर्णय
स्थान
25 अन्तर प्यार में /
(पृ. 27)
सम्बन्धक भीतर स्नेह / भारतीय
दृष्टि: माधुर्य, शान्त /
पाश्चात्य/समानान्तर:
सम्बन्धपरक पाठ
बाह्य क्रियासँ भीतरक
आत्मीयता दिशि गमन;
संग्रहक भाव-ताल धीमा
करैत।
26 मेला देखब / (पृ.
28)
मेला देखबाक बाल-कौतूहल /
भारतीय दृष्टि: अद्भुत/हास्य /
पाश्चात्य/समानान्तर: लोक-दृश्य
आ बाल-दृष्टि
रंग, भीड़, प्रदर्शनक
प्रत्याशा; बालक
सार्वजनिक लोकसंस्कृतिमे प्रवेश करैत।
27 चान पर हमहूँजायब
/ (पृ. 29)
चान-यात्राक आकांक्षा /
भारतीय दृष्टि: अद्भुत, वक्रोक्ति
/ पाश्चात्य/समानान्तर: विज्ञानकौतूहल आ कल्पना
लोकक चान आ आधुनिक
अन्तरिक्ष-कौतूहलक
संगम; संग्रहक सर्वाधिक
कल्पनाशील रचनामे
एक।
28 सोनपुर के मेला /
(पृ. 30)
विशिष्ट क्षेत्रीय मेला आ यात्रा-
अनुभव / भारतीय दृष्टि: अद्भुत,
लोक-रस /
पाश्चात्य/समानान्तर: स्थानविशिष्ट सांस्कृतिक अभिलेख
स्थानीय भूगोलक
नामसहित लोकसंस्कृतिक दस्तावेज;
क्षेत्रीय स्मृति सघन।
29 कामना हुए / (पृ.
31)
इच्छा, नैतिक/सामाजिक
आकांक्षा / भारतीय दृष्टि:
शान्त/उत्साह /
पाश्चात्य/समानान्तर: इच्छा आ
प्रौढ़ मानक
बाल-इच्छा आ आदर्शक
मिश्रण; किछु ठाम
संदेशक भार बढ़ैत।
30 हमर गाम / (पृ.
32)
गामक दृश्य, जीविका, सम्बन्ध
आ आत्मीयता / भारतीय दृष्टि:
माधुर्य, प्रसाद /
गाम स्थिर पृष्ठभूमि नहि,
जीवन-व्यवस्थाक
समुच्चय; समानान्तर
क्र. कविता (मुद्रित पृष्ठ) मुख्य आलोचनात्मक केन्द्र संक्षिप्त निर्णय
पाश्चात्य/समानान्तर:
सांस्कृतिक भूगोल
क्षेत्र-दृष्टि लेल केंद्रीय।
31 हमर देश के अपने
रंग / (पृ. 33)
देशक विविधता/रंग / भारतीय
दृष्टि: ओज, रूपक /
पाश्चात्य/समानान्तर: बहुरंगी
राष्ट्रीय प्रतिमा
राष्ट्रकेँ एकरूप नहि, रंगविविधता रूपमे देखबाक
प्रयत्न; सार्वजनिक बालचेतना।
32 धुर खेल / (पृ. 34) धूरिमे खेल, देह आ माटि/
भारतीय दृष्टि: हास्य/उत्साह /
पाश्चात्य/समानान्तर: देहगत
पारिस्थितिकी
माटिक संग बाल-देहक
प्रत्यक्ष सम्बन्ध; स्वच्छता-
नियमनसँ अलग मुक्त
खेलक क्षेत्र।
33 सुन्दर बाग लगाव /
(पृ. 35)
बाग लगेनाइ, फूल-पात आ
सामूहिक श्रम / भारतीय दृष्टि:
शान्त/अद्भुत; औचित्य /
पाश्चात्य/समानान्तर:
पारिस्थितिक शिक्षा
उपदेश क्रियात्मक बनैत
—प्रकृति-प्रेम ‘लगाउ’क
व्यवहारमे; सफल
शिक्षात्मक कविता।
34 झमरी बिल्ली / (पृ.
36)
बिल्लीक चपलता, घरक हास्य
/ भारतीय दृष्टि: हास्य,
मानवीकरण /
पाश्चात्य/समानान्तर: पशु-
बालक साक्षात्कार
लघु पशु-पात्र बालहास्यक माध्यम;
दृश्यात्मकता सशक्त।
35 कृषक महान / (पृ.
37)
किसान/श्रमक महत्ता /
भारतीय दृष्टि: वीर/ओज; नीति
/ पाश्चात्य/समानान्तर: श्रमनीति
श्रम-केन्द्रिक सामाजिक
मूल्य; प्रौढ़ नीतिवाक्यक
अंश, मुदा ग्रामीण
अर्थव्यवस्थासँ सीधा
सम्बन्ध।
36 चूड़ा गमागम / (पृ.
38)
चूड़ाक गन्ध, स्वाद, भोज्यसंस्कृति / भारतीय दृष्टि: माधुर्य,
‘गमागम’ शब्द गन्धकेँ
ध्वनिमे उपस्थित करैत;
क्र. कविता (मुद्रित पृष्ठ) मुख्य आलोचनात्मक केन्द्र संक्षिप्त निर्णय
ध्वन्यात्मक वक्रोक्ति /
पाश्चात्य/समानान्तर: इन्द्रियगत
भौतिक संस्कृति
क्षेत्रीय स्वादक जीवित
अभिलेख।
37 गाम मेंमदारी / (पृ.
39)
मदारीक खेल आ बालकक
कौतूहल / भारतीय दृष्टि:
अद्भुत/हास्य /
पाश्चात्य/समानान्तर: प्रदर्शनसंस्कृति
सड़क/लोक-प्रदर्शनक
स्मृति; सामूहिक दर्शकता
बाल-संसारक हिस्सा।
38 गाछी के आम / (पृ.
40)
आम, गाछी, स्वाद आ ऋतु/
भारतीय दृष्टि: माधुर्य, अद्भुत /
पाश्चात्य/समानान्तर: खाद्यपारिस्थितिकी
फल, ऋतु, गाछी आ
बाल-आनन्द एक संग;
पारिस्थितिक-सांस्कृतिक
पाठक उत्कृष्ट उदाहरण।
39 माय नचावेजाँता /
(पृ. 41)
मायक घरेलूश्रम आ जाँताक
लय / भारतीय दृष्टि: वात्सल्य +
श्रम-बिम्ब /
पाश्चात्य/समानान्तर: लैंगिक
श्रम; भौतिक संस्कृति
घरेलू श्रम दृश्य बनैत;
नारीवादी पुनर्पाठ लेल
महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक
साक्ष्य।
40 शिक्षक दिवस / (पृ.
42)
गुरु-सम्मान आ शिक्षा /
भारतीय दृष्टि: शान्त/आदरभाव
/ पाश्चात्य/समानान्तर:
विद्यालय संस्था
विद्यालयी सार्वजनिक
संस्कार; बालकक
अनुभवसँकिछु दूरी परन्तु
संस्थागत स्मृति स्पष्ट।
41 विद्यादान / (पृ.
43)
ज्ञानक दान, गुरु आ अध्ययन /
भारतीय दृष्टि: नीति, प्रसाद /
पाश्चात्य/समानान्तर:
शिक्षात्मक पाठ
स्पष्ट शिक्षात्मक कविता;
काव्यात्मकता संदेशसँ
प्रतिस्पर्धा करैत अछि।
42 पढ़ रे बउआ / (पृ.
44)
पढ़ाइ, ज्ञान, भविष्य आ
प्रोत्साहन / भारतीय दृष्टि:
सीधा सम्बोधन ऊर्जावान,
मुदा प्रौढ़ लक्ष्य-निर्धारण
क्र. कविता (मुद्रित पृष्ठ) मुख्य आलोचनात्मक केन्द्र संक्षिप्त निर्णय
उत्साह; औचित्य /
पाश्चात्य/समानान्तर: प्रौढ़
मार्गदर्शन
अधिक; बाल-स्वायत्तता
सीमित।
43 तरी आ छड़ी / (पृ.
45)
छड़ी, विद्यालयी अनुशासन आ
भय/हास्य / भारतीय दृष्टि:
हास्य-भय मिश्र; औचित्य प्रश्न
/ पाश्चात्य/समानान्तर:
अनुशासनकारी संस्था
ऐतिहासिक शाला-
संस्कृतिक साक्ष्य;
आधुनिक बाल-अधिकार
दृष्टिसँ आलोचनात्मक
पाठ आवश्यक।
44 सार्थक जीवन / (पृ.
46)
जीवन-मूल्य, श्रम आ सदाचार /
भारतीय दृष्टि: शान्त/नीति /
पाश्चात्य/समानान्तर: नैतिक
प्रौढ़ स्वर
संदेशप्रधान; वयस्क
जीवन-दर्शन बाल-कविता
पर कनेक भारी, तथापि
संग्रहक शिक्षात्मक धारा
स्पष्ट।
45 पढ़े न जायब बाबू
जी / (पृ. 47)
विद्यालय न जायबाक बालप्रतिरोध / भारतीय दृष्टि:
हास्य/करुण छाया; संवाद /
पाश्चात्य/समानान्तर: बालस्वायत्तता; अन्तर्निहित प्रौढ़क
प्रतिवाद
शैक्षिक खण्डक महत्त्वपूर्ण
प्रतिवाद; बालक निष्क्रिय
आइ्ञापालक नहि रहैत।
46 सटकी के फटकी
फुटकाबऽ / (पृ.
48)
स्थानीय क्रिया, खेल/खाद्यसंसार आ बाल-उक्ति / भारतीय
दृष्टि: वाचिक लय, पुनरावृत्ति /
पाश्चात्य/समानान्तर: स्थानीय
भाषा-प्रदर्शन
स्थानीय शब्द-संसारक
मूल्य उच्च;
मानकीकरणसँ अधिक
स्वाभाविक उच्चारण
महत्त्वपूर्ण।
47 हम्मर जमहिरा केना
क पढ़तई / (पृ.
49)
‘जमहिरा’ पकड़बाक
हास्यमय/कौतूहलपूर्ण प्रसंग /
भारतीय दृष्टि: हास्य, प्रश्न,
अपरिचित स्थानीय पद
स्वयं सांस्कृतिक साक्ष्य;
सम्पादित संस्करणमे
क्र. कविता (मुद्रित पृष्ठ) मुख्य आलोचनात्मक केन्द्र संक्षिप्त निर्णय
वक्रोक्ति /
पाश्चात्य/समानान्तर: हास्यमय
पीछा; स्थानीय शब्दावली
शब्दार्थ उपयोगी होयत।
48 रमचरना / (पृ. 50) घरक आर्थिक-सामाजिक
कठिनाइ आ जीविका-सम्बन्धी
दृश्य / भारतीय दृष्टि: करुणनीति छाया /
पाश्चात्य/समानान्तर:
सामाजिक भौतिक पाठ
बाल-संग्रहमे सामाजिक
विषमता प्रवेश करैत;
हलुक स्वरक पाछाँ
जीवनक कठोरता दृश्य।
49 घड़ी / (पृ. 51) समय, टिक-टिक, अनुशासन आ
क्षण-मूल्य / भारतीय दृष्टि:
ध्वन्यात्मक वक्रोक्ति; नीति /
पाश्चात्य/समानान्तर: आधुनिक
समयबोध
रूप आ संदेश सफलतासँ
जुड़ैत; टिक-टिक कविता
स्वयं समयक ध्वनि बनैत।
50 गौंआ गोनूटीसन
आयल / (पृ. 52)
रेलगाड़ी/टीसनक आगमन आ
यान्त्रिक कौतूहल / भारतीय
दृष्टि: अद्भुत, ओज /
पाश्चात्य/समानान्तर: तकनीक
आ गामक मिलन
गाम आ आधुनिक
परिवहनक मिलन; ध्वनि-
गति बालकक विस्मय
रचैत।
51 कइसन भेल संसार
/ (पृ. 53)
बदलैत सामाजिक संसारपर
विस्मय/प्रश्न / भारतीय दृष्टि:
चिन्तन, करुण/हास्य छाया /
पाश्चात्य/समानान्तर:
सामाजिक आलोचना; खुला
प्रश्न
प्रश्नसूचक अन्त संग्रहकेँ
बन्द न करि खुला छोड़ैत;
बाल-जगत व्यापक
सामाजिक परिवर्तनसँ
जुड़ैत।
१५. समेकित आलोचनात्मक निष्कर्ष
१५.१ सिद्धान्तसभक समानान्तर तुलतु नात्मक सार
एहि कृतिक गहन पाठसँ स्पष्ट होइत अछि जेभारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्त एक-दोसराकेँ
प्रतिस्थापित नहि करैत, अपितुअलग प्रश्न खोलैत अछि। विदेह समानान्तर पद्धति एहि
भिन्नताकेँ बचबैत हुए संवादक क्षेत्र बनबैत अछि।
प्रश्न भारतीय दृष्टि पाश्चात्य दृष्टि ‘बाल गोपाल’मे
निष्पत्ति
पाठकक
भावानुभव
रस/सहृदय Reader response - वात्सल्य, खेल आ
अद्भुतक रचनामे
पाठक सक्रिय भावग्रहण करैत।
अप्रत्यक्ष अर्थ ध्वनि implied
meaning /
readerly
inference
नाना-घर, चूड़ा,
गाछी, घड़ी आदिमे
प्रत्यक्ष वस्तुसँ आगाँ
सांस्कृतिक स्मृति।
काव्यभाषाक
विशिष्टता
वक्रोक्ति defamiliarization
/ formal attention
ध्वनि-अनुकरण,
पुनरावृत्ति,
मानवीकरण आ
वस्तु-रूपान्तरण।
उपयुक्तता औचित्य ageappropriateness /
child address -
खेल-प्रकृति रचनामे
उच्च; छड़ी/अधिक
उपदेशमे प्रश्न।
रूप आ ध्वनि गुण-रीति/
अलंकार
close reading /
formalism
लय, , refrain
छोटपंक्ति आ
कण्ठगतता कृतिक
बल।
प्रश्न भारतीय दृष्टि पाश्चात्य दृष्टि ‘बाल गोपाल’मे
निष्पत्ति
बहु-स्वर — dialogism /
heteroglossia
घर, शाला, राष्ट्र,
गाम, लोक-हाट आ
आधुनिक
तकनीकक
सामाजिक स्वर सहअस्तित्वमे।
बालक बनाम
प्रौढ़
औचित्यक प्रश्न hidden adult /
child agency
‘पढ़े न जायब बाबू
जी’ प्रौढ़ नियंत्रणक
भीतर बाल-प्रतिवाद
खोलैत।
साक्ष्य आ कैनन शास्त्रीय पाठपद्धति सँ बाहरक
प्रश्न
cultural studies /
canon critique
विदेह समानान्तर
प्रतिमान बालसाहित्य, स्थानीय
भाषा आ दैनिक
जीवनकेँ कैननमे
स्थान दैत।
१५.२ प्रमुखमु साहित्यिक उपलब्धि
‘बाल गोपाल’क स्थायी उपलब्धि ई जे ओ बालकक स्थानीय संसारकेँसाहित्ययोग्य मानैत
अछि। गाम, धूरि, गुड़िया, पतंग, कागजक नाव, नाना-घर, जाँता, चूड़ा, गाछी, आम, मदारी,
रेलगाड़ी—ई सभ ‘छोट’ वस्तुसाहित्यिक केन्द्र बनैत अछि। एहि प्रक्रियामेबालक अपन बोली
आ परिवेशकेँमुद्रित पृष्ठपर देखैत अछि। भाषा-सम्मानक ई रूप शिक्षा-नीतिक घोषणासँअधिक
प्रभावी होइत अछि, कारण साहित्य स्वयं कहैत अछि—तोहर संसार लिखबाक योग्य अछि।
१५.३ कलात्मक असमानता
संग्रहक सभ कविता समान कलात्मक उँचाइपर नहि। राष्ट्रवादी आ नीतिपरक किछु रचना
प्रत्यक्ष सन्देशपर अधिक निर्भर अछि; खेल, वात्सल्य, लोरी, खाद्य, मेला, प्रकृति आ आधुनिक
कौतूहलक रचनासभ अपेक्षाकृत बहुस्तरीय अछि। एहि असमानताकेँलुकाएब पोथीक सम्मान
नहि। साहित्येतिहासिक महत्त्व आ प्रत्येक कविताक कलात्मक सिद्धि दू अलग प्रश्न अछि।
१५.४ बाल-साहित्यक भीतर शक्ति-सम्बन्ध
पोथी बालककेँकखन स्वायत्त कर्ता, र्ता कखन संस्कार-ग्रहणकर्ता बर्ता नबैत अछि। एहि द्वन्द्वक कारण
ई संग्रह आधुनिक आलोचनाक लेल उपयोगी अछि। ‘पढ़ेन जायब बाबूजी’ सन बाल-प्रतिरोधक
स्वर प्रौढ़ अनुशासनक बीच संवाद खोलैत अछि। यदि संग्रहमे एहन प्रश्नाकुल बाल-स्वर आरो
अधिक रहितए तँ आधुनिक बाल-साहित्यक दृष्टिसँ एकर बहुस्वरिता आरो प्रखर होइत।
१५.५ भाषिक महत्त्व
बज्जिका बाल-कविताक मुद्रित संग्रह रूपमे एकर शब्दसंसार शोधोपयोगी अछि। स्थानीय
सर्वनाम, क्रियारूप, सम्बोधन, खेलक नाम, खाद्य, घर-परिवार आ लोकोक्तिसदृश लय मौखिक
भाषाकेँलिखित रूप दैत अछि। भावी सम्पादित संस्करणमेमूल पाठ अछूत्तेराखि कठिन पदक
शब्दकोश, ध्वनि-पाठ आ स्थानीय उच्चारणक अभिलेख जोड़ल जाए तँभाषा-अध्ययनक मूल्य
अनेकगुणा बढ़त।
१५.६ दृश्य-विन्यास आ नव संस्करणक सम्भावना
आवरणपर बालसमूहक चित्र अछि, मुदा भीतरी कविता-पृष्ठ प्रायः पाठप्रधान अछि। आधुनिक
बाल-संस्करणमेमूल पाठक संग स्थानीय चित्रकला वा सरल रेखांकन, कविता-पाठक ध्वनि-
QR, शब्दार्थ, खेलक लघुपरिचय आ सांस्कृतिक टिप्पणी जोड़ल जा सकैत अछि। ई जोड़ मूल
पाठक स्थान नहि लेत, ओकर ग्रहण-क्षमता बढ़ाओत। विशेषतः ‘ताल-गुल्ली’, ‘जाँता’,
‘मदारी’, ‘जमहिरा’ सन पद/प्रसंग नव पीढ़ी लेल व्याख्या माँगि सकैत अछि।
नव संस्करणमेमूल बज्जिका पाठ अछूत्तेराखि कठिन स्थानीय पदक बज्जिका-मैथिली शब्दार्थ,
स्थानीय शैलीक रेखांकन, वाचिक पाठक ध्वनि-संकेत, खेल/लोकवस्तुक लघुसांस्कृतिक
परिचय आ सम्पादकीय टिप्पणी जोड़ल जा सकैत अछि। “मानकीकरण”क नामपर मूल
काव्यभाषाक स्थानीय रूप मेटाएब उचित नहि; सम्पादकीय सुविधा मूल पाठक ऊपर अलग
स्तर रूपमे रहबाक चाही।
१५.७ विदेह समानान्तर परम्पराक निर्णय
समानान्तर दृष्टिसँ ‘बाल गोपाल’क मूल्य चारि स्तरपर अछि। पहिल—कृति रूपमे, जतय किछु
कविता सौन्दर्यतः विशेष सफल अछि। दोसर—भाषिक अभिलेख रूपमे, जतय बज्जिका बालवाणी मुद्रित रूप पबैत अछि। तेसर—सांस्कृतिक इतिहास रूपमे, जतय खेल, खाद्य, श्रम, मेला,
परिवार, गुरु, समय आ रेलक अनुभव सुरक्षित अछि। चारिम—कैनन-संशोधन रूपमे, जतय
बाल-साहित्य क्षेत्रीय साहित्येतिहासक परिधिसँकेन्द्र दिशि अबैत अछि।
एहि निर्णयक संग आत्म-समीक्षा अनिवार्य अछि: पोथीक क्षेत्रीय अस्मिता ओकर प्रत्येक
पंक्तिक कलात्मक सिद्धिक प्रमाण नहि; बालकक नामपर कहल प्रत्येक नीति बालकक स्वायत्त
स्वर नहि; स्थानीय परम्परा आलोचनातीत नहि; आ पाश्चात्य वा भारतीय सिद्धान्तक नाम मात्र
लगेला सँ समीक्षा गहन नहि भऽ जाइत। वास्तविक गहनता पाठ, सिद्धान्त आ ऐतिहासिक
परिस्थिति बीच प्रमाणित संवादमेअछि। ‘बाल गोपाल’ एहि संवादक योग्य पोथी अछि।
१६. विस्तृत निष्पत्ति
शंभु ‘अगेही’क ‘बाल गोपाल’क सबसँ उज्ज्वल क्षण ओतय अछि जतय बालकक आँखि, कान,
जिह्वा, देह आ कल्पना एक संग सक्रिय होइत अछि। चान, नाव, पतंग, चूड़ा, आम, मेला, निन्न,
रेल आ खेल—ई सभ इन्द्रियगम्य संसार कविता बनैत अछि। भारतीय रस-दृष्टि एहि अनुभवमे
वात्सल्य, हास्य, अद्भुत आ उत्साहक आस्वाद देखैत अछि; ध्वनि-सिद्धान्त प्रत्यक्ष वस्तुक पाछाँ
पारिवारिक-सांस्कृतिक स्मृति; वक्रोक्ति सामान्य वस्तुक कल्पनात्मक रूपान्तरण; औचित्य
बाल-वय आ उपदेशक अनुपातक परीक्षण करैत अछि।
पाश्चात्य समीक्षा एहि कृतिक दोसर आयाम खोलैत अछि। अनुकृति-विचार दैनिक जीवनकेँ
काव्ययोग्य ठहरबैत; रूपगत पाठ पुनरावृत्ति, ध्वनि आ वाचिकतालै ध्यान दैत; पाठक-ग्रहण
बालकक सक्रिय सहभागिता देखबैत; संवादिता घर, शाला, राष्ट्र, गाम आ आधुनिक तकनीकक
अनेक स्वर एकठाम सुनैत; ‘अन्तर्निहित प्रौढ़’ सिद्धान्त लेखकक शिक्षात्मक इच्छाकेँ प्रश्नांकित
करैत अछि।
विदेह समानान्तर परम्परा एहि दुनूपरम्पराकेँ सन्तुलित करैत अछि, मुदा कृत्रिम समन्वय नहि
बनबैत। ओ कहैत अछि—समान प्रश्न देखू, समानता थोपब नहि; स्थानीय साक्ष्यकेँसुनू, ओकरा
अचूक मत मानूनहि; हाशियाक स्वरकेँ स्थान दिअ, मुदा आलोचना छोड़ू नहि; परम्परा बचाउ,
मुदा अन्याय वा अनुपयुक्तता पर प्रश्न करू; कैनन विस्तृत करू, मुदा क्षेत्रीय गौरवकेँ प्रमाणक
विकल्प मत बनाउ।
एहि कसौटीपर ‘बाल गोपाल’ बज्जिका बाल-साहित्यक संरक्षण, पुनर्पाठ आ आलोचनात्मक
पुनर्मुद्रण योग्य कृति अछि। एकर महत्त्व विशेषतः एहि बातमेअछि जे ई बालककेँबाहरसँ ‘उच्च’
साहित्य नहि दैत, ओकर अपन बोली, माय, इआ, दादा, नाना-घर, खेल, माटि, खाद्य, गाछी आ
गामकेँसाहित्यक दर्जा दैत अछि। साहित्यिक लोकतन्त्रक आरम्भ अक्सर एतहि सँहोइत अछि
—जखन पाठक अपनहि संसारकेँपाठमेदेखैत अछि।
समग्र निष्कर्ष ई अछि जे ‘बाल गोपाल’केँन तँमात्र ऐतिहासिक कौतूहल रूपमेसीमित कएल
जा सकैत अछि, न क्षेत्रीय गौरवक कारण आलोचनासँ ऊपर राखल जा सकैत अछि। एकर श्रेष्ठ
कविता बालकक इन्द्रिय, खेल, सम्बन्ध, कल्पना आ बोलीकेँकाव्य बनबैत अछि; एकर दुर्बल
रचना प्रायः प्रत्यक्ष उपदेशक भारसँ ग्रस्त अछि। एहि दू ध्रुवक बीच पोथी बज्जिका बालसाहित्यक लिखित विकास, उत्तर-बिहार/मिथिलाक लोक-सांस्कृतिक स्मृति, बाल-अधिकार,
शिक्षा आ स्थानीय भाषिक आत्मसम्मानक अध्ययन लेल दीर्घजीवी सामग्री प्रदान करैत अछि।
ग्रन्थसूची
निम्न ग्रन्थसूचीमेमात्र पुस्तक/ग्रन्थ राखल गेल अछि। वेबसाइट, वेब-पृष्ठ, भिडियो, डिजिटल
लिंक, समाचार वा अनलाइन स्रोत जानि-बुझि कऽ सम्मिलित नहि कएल गेल अछि।
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अभिनवगुप्त। अभिनवभारती।
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