विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

अकुलाइत सुर

गजेन्द्र ठाकुर · 2026-09-15 · अंक 450

Keywords: Maithili literary history, Mithila studies, literary criticism, research article

गजेन्द्र ठाकुर

अकुलाइत सुर

समग्र गहन साहित्यिक शोध-समीक्षा

भारतीय काव्यशास्त्र, पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त, नव्य-न्याय आ विदेह समानान्तर ऐतिहासिक पद्धतिक आलोकमे

मूल कृति: गजेन्द्र ठाकुर

कृति-वर्ष: २०२६

सारांश

‘अकुलाइत सुर’ दू समान आकारक खण्डमे विन्यस्त २६६ रचनाक संग्रह अछि—पहिल खण्डमे १३३ किशोर गजल आ दोसर खण्डमे १३३ कविता-गीत। प्रस्तुत अध्ययन मूल वर्ड पाठक सम्पूर्ण रचना-सूची आ वास्तविक रचना-शरीरकेँ मिलान कऽ पाठ-संपूर्णता स्थापित करैत अछि। समीक्षा भारतीय काव्यशास्त्रक रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, औचित्य आ रीति; पाश्चात्य समीक्षाक रूपवादी समीप-पाठ, पाठक-प्रतिक्रिया, संवादिता आ ऐतिहासिक-सामाजिक पठन; नव्य-न्यायक प्रमाण, संशय, अनुमान, शब्द-बोध, व्याप्‍ति आ अवच्छेदक-चिन्तन; तथा विदेह समानान्तर ऐतिहासिक पद्धतिक बहुधुरी दृष्टि एक संग लागू करैत अछि। पहिल खण्ड बाल-कल्पनासँ किशोर आत्मनिर्णय, परीक्षा, मीतता, निज सीमा, जालजगत, सूचना-जाँच, निन्न, आर्थिक जिम्मेदारी, सहकाज आ प्रमाण-आधारित विवेक धरि क्रमिक विस्तार करैत अछि। दोसर खण्ड लोकजीवन, बालगीत, ग्रामीण ध्वनि, सामाजिक व्यंग्य, विवाह-रीति, प्रवास, दफ्तर, पुरान तकनीकी आधुनिकता, भाषा-स्मृति, राष्ट्र-बोध आ कृषि-संस्कृतिक बहुस्तरीय अभिलेख बनैत अछि। समग्र मूल्यांकन संग्रहक विषय-विस्तार, लोक-शब्दभण्डार, किशोर-केंद्रित नैतिक आधुनिकता आ हास्य-व्यंग्यकेँ प्रमुख शक्ति मानैत अछि; संगहि पहिल खण्डमे किछु शीर्षकीय-पाठीय पुनरावृत्ति तथा किछु गजलमे बहुत पैघ मात्रा-अन्तर औपचारिक पुनःसम्पादनक आवश्यकता देखबैत अछि।

बीज-शब्द: अकुलाइत सुर; मैथिली गजल; किशोर साहित्य; कविता-गीत; नव्य-न्याय; रस; ध्वनि; वक्रोक्ति; समानान्तर इतिहास; भाषा-निखार

१. प्रस्तावना

‘अकुलाइत सुर’ शीर्षक संग्रहक काव्य-स्वभावक कुंजी अछि। ‘अकुलाइत’ मे बेचैनी, जिज्ञासा, गति, अधूरापन आ आगाँ बढ़बाक प्रेरणा एक संग निहित अछि; ‘सुर’ एहि बेचैनीकेँ ध्वनि, गीत, गजल, बाल-लय, व्यंग्य आ लोकबोलीक रूप दैत अछि। पहिल खण्ड बाल्य-कल्पनासँ किशोर विवेक धरि क्रमिक मानसिक यात्रा रचैत अछि, जखनकि दोसर खण्ड समय, गाम, परिवार, प्रौद्योगिक बदलाव, सामाजिक रीति, हास्य आ सांस्कृतिक स्मृतिक बहुस्तरीय दृश्य प्रस्तुत करैत अछि।

पारम्परिक रूप आ समकालीन विषय एतय परस्पर टकराइत नहि, बल्कि एक-दोसराकेँ पुनर्परिभाषित करैत अछि। गजल किशोर जीवनक परीक्षा, मीत-दबाव, निन्न, पहिल कमाइ, जालजगत आ समाचार-जाँचकेँ ग्रहण करैत अछि; कविता-गीत रेल, दफ्तर, तार-सन्देश, फैक्स, स्थानान्तरण, विवाह-रीति, गाम, प्रवास आ लोकध्वनिक सामाजिक स्मृति रचैत अछि।

एहि अध्ययनक ध्येय प्रशंसा मात्र नहि। पाठक सर्जनात्मक उपलब्धि, पुनरावृत्ति, छन्दीय असमानता, भाषिक निखारक क्षेत्र, सामाजिक इतिहासक संकेत आ दार्शनिक संरचना सभकेँ समग्र रूपे देखब आवश्यक अछि।

२. आधारपाठ, पाठ-संपूर्णता आ अनुसंधान-पद्धति

अध्ययनक आधार मूल वर्ड संस्करण अछि। विषय-सूची आ वास्तविक रचना-शरीरक शीर्षकक मिलान कएल गेल। दुनू खण्डमे १३३-१३३ रचना, कुल २६६ रचना अछि; विषय-सूचीक २६६ प्रविष्टि आ मूल पाठक २६६ शीर्षकमे एकोटा नाम वा क्रम-विसंगति नहि भेटल।

पहिल खण्डक सभ १३३ गजलमे बहर, मात्रा-क्रम, कल-क्रम तथा काफिया-रदीफक चारि औपचारिक सूचना-पाँति अछि। १३२ गजल दस काव्य-पाँतिक अछि; पहिल ‘बार्बी’ चौदह पाँतिक। दोसर खण्डमे १३३ कविता-गीत अछि। कुल काव्य-पाँति ४१९० अछि—पहिल खण्डमे १३३४ आ दोसर खण्डमे २८५६।

आलोचनात्मक पद्धति चारि स्तरपर काज करैत अछि: समीप-पाठ; भारतीय काव्यशास्त्रीय पठन; नव्य-न्याय आधारित ज्ञानमीमांसक परीक्षण; आ समानान्तर इतिहास, जे ग्रामीण-आधुनिक, बाल-किशोर, लोक-दफ्तर, मौखिक-अंकीय, स्मृति-वर्तमान सभ धारा के एक संग पढ़ैत अछि।

२.१ पाठ-संपूर्णता आ औपचारिक तथ्य

कुल २६६ रचना; ४१९० काव्य-पाँति; १३३ मे १३३ गजलमे चारि छन्दीय सूचना-पाँति; अलग रदीफ ११९; काफिया-रूप १८। घोषित मात्रा-अन्तर ०–५ वाला २२, ६–१० वाला ६८, ११–२० वाला ३२, आ २१ अथवा बेसी वाला ११ गजल अछि।

३. ग्रन्थरचना आ द्विखण्डीय स्थापत्य

दुनू खण्ड समान रचना-संख्या राखैत अछि। पहिल धुरी भविष्याभिमुख अछि: बच्चा-किशोर आगाँ केना बढ़त, निर्णय केना लेत, मित्रता आ निज सीमा केना बुझत, सूचना केना जाँचत। दोसर धुरी स्मृति आ समाजाभिमुख अछि: गाम, दफ्तर, विवाह, मजूरी, प्रवास, तकनीक, परिवार, भाषा, प्रकृति आ लोकध्वनि केना अनुभवमे बसल अछि।

गजल १–१३ मे चान, तरेगन, परी, दादी, कागजक नाव, मेह, निन्न आ खेल अछि। गजल १४ सँ स्वप्न, राह, विषय, तुलना, मीतता, परीक्षा, निन्न, समय, निज सीमा, प्रश्न, असफलता, जालजगत, पहिल कमाइ, टोली, समाचार, यात्रा, भाषण, जिम्मेदारी आ सत्यापन क्रमशः जुड़ैत जाइत अछि। अन्तिम चरणमे गोपनता, प्रमाण, थाकल मोन, सहायता, कार्य-क्रम आ साँच-जाँच अछि।

दोसर खण्ड कोलाज सन अछि। बालध्वनि, प्रकृति, मिथिला, आधुनिक वस्तु, व्यंग्य, दफ्तर, विवाह, गाम, प्रवास, संस्कृत-परम्परा, राष्ट्र-बिम्ब, विद्यालय, कम्प्यूटर-खेल, माए, मैथिली आ कृषि एक-दोसराक कात ठाढ़ अछि। एहि सह-अस्तित्वमे समानान्तर सामाजिक इतिहास बनैत अछि।

४. खण्ड १ — १३३ किशोर गजल: रूप, विषय आ आलोचनात्मक मूल्यांकन

४.१ बाल-कल्पनासँ किशोर नागरिकता धरि

गजल १–१३ संग्रहक सर्वाधिक दृश्यात्मक अंश अछि। ‘बार्बी’मे बाहरी खिलौना-संस्कृति स्थानीय परी, ऐरावत, गाम, पानि, अकास आ निन्नक बिम्बसँ जुड़ैत अछि। ‘चान मामा’, ‘सात रंग’, ‘दादीक कथा’, ‘तरेगन गनी’, ‘कागजक नाव’, ‘पतंगक पाँखि’, ‘मेहक खेल’ आ ‘निन्नक कथा’ बाल-कल्पनाक परिचित जगत बनबैत अछि।

गजल १४–२० निर्णायक मोड़ अछि। ‘अपन सपना’, ‘खेलक मैदान’, ‘पोथीक पाँखि’, ‘परीक्षाक बिहान’, ‘मीतक संग’, ‘पर्दासँ बाहर’ आ ‘अपन राह’ बच्चाकेँ स्वायत्त किशोर पाठकमे बदलैत अछि।

गजल २१–५८ आत्ममूल्य, मीतता, संवाद, निन्न, समय, विषय-चयन, सहमति, विश्राम, सहायता आ जालजगतक अनुशासनक मध्यखंड अछि। ‘तुलना नहि’, ‘लाइकसँ बाहर’, ‘अपन रूप’ आ ‘तुलना छोड़ू’ सामाजिक तुलनाक विरुद्ध; ‘ना कहू’, ‘अपन बात’, ‘भरोसा’ आ ‘सोझाँ बाजू’ निज सीमा आ प्रत्यक्ष संवादक पक्षमे अछि।

गजल ५९–८० व्यवहारिक स्वतंत्रताक पाठ अछि: पहिल कमाइ, प्रश्न, टोली, कौशल, खर्च, समाचार, यात्रा, भाषण, असफलता, समूह-दबाव, अंकीय विराम, जिम्मेदारी, साँच-जाँच आ अपन आवाज।

गजल ८१–११० आत्मनियमनक सूक्ष्म क्षेत्र खोलैत अछि—विश्राम, मीतक सीमा, अपन लय, डरक पार, रुचि, साँचक जाँच, भूल स्वीकार, काज बाँटब, लिखि कऽ बुझब, रिसक बेर थमब, कौड़ी बचाउ आ गाछ रोपू।

गजल १११–१३३ संग्रहक सबसे प्रत्यक्ष नैतिक-ज्ञानमीमांसक चरण अछि। मान, सुनब, हुनर, सीमा, पढ़ि बुझब, निज बात, गोपनता, प्रमाण, थाकल मोन, सहायता आ अन्ततः ‘साँच जाँचू’ एकटा ज्ञान-नैतिक उपसंहार बनबैत अछि।

४.२ गजल-रूपक तकनीकी समीक्षा

सभ १३३ रचना स्वयंकेँ ‘मात्रिक छन्द · पारम्परिक अरूज़ी’ कहैत अछि। काफिया-रदीफक स्पष्ट उद्घोषणा विशिष्ट सम्पादकीय गुण अछि। ११९ अलग रदीफ रचनात्मक विविधता प्रमाणित करैत अछि; आज्ञार्थक रदीफ किशोर पाठकसँ प्रत्यक्ष सम्बन्ध बनबैत अछि।

तथापि पारम्परिक गजलमे बहरक सममिति मूल अपेक्षा अछि। २२ गजलमे घोषित मात्रा-अन्तर ०–५, ६८ मे ६–१०, ३२ मे ११–२०, आ ११ गजलमे २१ वा बेसी अछि। विशेषतः अन्तिम चरणक किछु गजलमे १४–५४, १५–५०, १४–४५ सन अन्तर देखाइत अछि। एहन फैलावकेँ ‘पारम्परिक अरूज़ी’ कहबाक लेल पुनःछन्द-जाँच जरूरी अछि।

अनेक गजल एक-विषयी क्रमिक सलाह-पत्र जकाँ विकसित होइत अछि; पारम्परिक शेर-स्वायत्तता किछु कम होइत अछि। ई बाल-किशोर संप्रेषणीयताक कारण उपयोगी संकर प्रयोग हो सकैत अछि, मुदा विधागत भूमिकामे एकर स्पष्ट उल्लेख उपयोगी होएत।

शीर्षकीय पुनरावृत्ति सेहो ध्यान योग्य अछि: ‘अपन गति’ तीन बेर, ‘ना कहू’ तीन बेर, ‘प्रश्नक साहस’ तीन बेर; ‘मीत चुनू’, ‘भूलसँ सीखू’, ‘पहिल कमाइ’, ‘टीमक खेल’, ‘साँच जाँचू’ आ ‘बेर बाँटू’ दुई वा बेसी बेर। शिक्षणमे पुनरावृत्ति स्मृति-सुदृढ़ीकरण कऽ सकैत अछि, मुदा संग्रह-सम्पादनमे भिन्नता स्पष्ट होएबाक चाही।

४.३ काव्यात्मक उपलब्धि आ सीमा

पहिल खण्डक प्रमुख उपलब्धि विषयक आधुनिकता अछि। किशोरक वास्तविक प्रश्न—तुलना, छवि, मित्र-दबाव, ‘ना’ कहबाक अधिकार, गोपनता, निन्न, थाकल मोन, जालजगत, गलत समाचार, पहिल कमाइ, पहिल जिम्मेदारी—मैथिली गजलमे लगातार केन्द्र बनैत अछि।

सीमा ओतय उत्पन्न होइत अछि जतय काव्यिक बहुअर्थिता सलाहक स्पष्टतामे विलीन भऽ जाइत अछि। किछु रचना वाच्यार्थप्रधान अछि; सर्वश्रेष्ठ गजल ओ अछि जतय सलाह ‘डोर’, ‘दुआर’, ‘पाँखि’, ‘नाव’, ‘गाछ’, ‘अन्हार’, ‘इजोत’, ‘बाट’ सन बिम्बमे रूपान्तरित होइत अछि।

संग्रहक नैतिकता दण्डात्मक नहि, पुनरारम्भक अछि। हारक बाद उठब, भूल स्वीकारब, सहायता माँगब, धीरे बढ़ब, थाकल मोनकेँ विश्राम देब—ई सभ किशोरक आत्ममूल्यकेँ अंक वा बाहरी उपलब्धिसँ अलग करैत अछि।

५. खण्ड २ — १३३ कविता-गीत: लोकजीवन, व्यंग्य, बालदृष्टि आ सामाजिक इतिहास

५.१ बालदृष्टि, प्रकृति आ ध्वन्यात्मकता

‘ट्रेनक गाड़ी’क ‘छुक छुक’ सँ दोसर खण्ड श्रव्य जगत खोलैत अछि। ‘बौआ ठेहुनिया मारि’, ‘ट्रिंग-ट्रिंग-ट्रिंग’, ‘भोरक बसात’, ‘छाहक करतब’, ‘सपन’, ‘कोइरीक कूकू’, ‘मकड़ीक जाल’, ‘वायुगोलक’, ‘हाथीक सूप सन कान’ आ ‘छुट्टी’ बाल-दृष्टिक अवलोकन-शक्ति देखबैत अछि।

अन्तिम ‘बड़द करैए दाउन ने यौ’ पशु-हँकार, लोक-आदेश, ध्वनि आ खरिहानक जीवित शब्दावली बचबैत अछि। ई कविता भाषिक नृवंश-स्मृति जकाँ पढ़ल जा सकैत अछि।

५.२ हास्य-व्यंग्य: आधुनिकता आ सामाजिक विसंगति

‘रिपेयर’, ‘नोकर’, ‘क्लासमे अबाज’, ‘एस.एम.एस.’, ‘टी.टी.’, ‘नौकरी’, ‘मरकरी डिलाइट’, ‘फ्रैक्चर’, ‘क्रिकेट-फील्डिंग’, ‘मैट्रिक प्लक’, ‘कैप्टन’, ‘अटेंडेंस’, ‘महीस पर वी.आइ.पी.’, ‘ट्रांसफर’, ‘ऑफिसमे भरि राति बन्द’, ‘गैस सिलिण्डरक चोरि’, ‘फैक्स’, ‘इटालियन सैलून’ आदि सामाजिक संक्रमणक शब्द-संग्रह अछि।

‘दहेज’, ‘बूढ़ वर’, ‘बिकौआ’, ‘फलनाक बेटा’, ‘पिण्डश्याम’, ‘चोरुक्का विवाह’, ‘जेठांश’ आ ‘नव-घरारी’ सामाजिक रीति आ परिवारक शक्ति-संबन्धकेँ व्यंग्य वा कथात्मक प्रसंगमे खोलैत अछि। वक्रोक्ति एतय मुख्य शक्ति अछि।

५.३ श्रम, गाम, प्रवास आ स्मृति

‘दरिद्र’, ‘नोकर’, ‘नौकरी’, ‘भारमे माटि’, ‘कंजूस’, ‘पाइ’, ‘गद्दरिक भात’, ‘मजूरी नहि माँगह’ आदि रचनामे श्रम, मजूरी, भोजन, पैसा, मालिक-नोकर सम्बन्ध आ आत्मसम्मान प्रत्यक्ष अछि।

‘गाम’, ‘प्रवासी’, ‘नानीक पत्र’, ‘मोनक जड़िमे’, ‘पुनः स्मृति’, ‘हम्मर माए’ आदि स्मृति-कविता सभ संग्रहक भावात्मक केन्द्र बनैत अछि। प्रवासक अनुभवमे गाम भूगोल मात्र नहि, भाषिक आ पारिवारिक आश्रय अछि।

५.४ भाषा, संस्कृति आ सामूहिक पहिचान

‘मिथिला’, ‘अखण्ड भारत’, ‘वेद’, ‘बुद्ध’, ‘केसर श्वेत हरित त्रिवार्णिक’, ‘सरस्वती मेधा’, ‘बाजू मैथिली’, ‘ध्येय पथिक साधक’ आदि रचना भाषा, ज्ञान, इतिहास, राष्ट्र वा आध्यात्मिक मूल्यक उद्बोधन बनैत अछि।

‘बाजू मैथिली’ संग्रहक भाषिक परियोजनाकेँ प्रत्यक्ष करैत अछि: मैथिली बालगीत, किशोर सलाह, दफ्तरक व्यंग्य, आधुनिक तकनीक, इतिहास, नैतिकता आ दार्शनिक प्रश्न सभक भाषा बनैत अछि।

६. भारतीय काव्यशास्त्रीय समीक्षा

६.१ रस

पहिल तेरह गजलमे अद्भुत रसक प्रधानता अछि; दादी आ मायक उपस्थितिसँ वात्सल्य-भाव जुड़ैत अछि। किशोर खण्ड आगे बढ़ैत लौकिक वीर-भाव ग्रहण करैत अछि—डरक पार, हारक बाद उठब, प्रश्न पूछब, निर्णय लेब, सत्य जाँचब।

दोसर खण्डमे हास्य रस अत्यन्त सक्रिय अछि। दफ्तर, आधुनिक यन्त्र, सामाजिक प्रतिष्ठा, विवाह, पढ़ाइ, नौकरी, धन आ दैनिक उलझन पर व्यंग्य हास्यकेँ सामाजिक आलोचना बनबैत अछि। स्मृति आ प्रवासमे करुण भाव, ‘बुद्ध’ आ ‘वेद’ सन रचनामे शान्त भाव उभरैत अछि।

६.२ ध्वनि, वक्रोक्ति, रीति आ औचित्य

जतय ‘डोर’, ‘दुआर’, ‘पाँखि’, ‘नाव’, ‘अन्हार’, ‘इजोत’, ‘बाट’, ‘ताल’ सन बिम्ब सक्रिय अछि, ओतय वाच्यार्थसँ बेसी अर्थ खुलैत अछि। ‘अपन ताल’ जीवनक निज लयक ध्वनि बनैत अछि।

वक्रोक्ति दोसर खण्डक प्राण अछि। ‘महीस पर वी.आइ.पी.’ सन संयोजन प्रतिष्ठाक आधुनिक चिह्न आ ग्रामीण दृश्यक टकराहटसँ हास्य आ सामाजिक टिप्पणी दुनू बनबैत अछि।

रीति-दृष्टिसँ संग्रह बोलचाल, लोकशब्द, बालध्वनि, दफ्तरी उधार-शब्द आ सहज मैथिली वाक्यरचना एक संग रखैत अछि। शुद्धीकरणक कसौटी एकरूप प्रतिस्थापन नहि, बल्कि प्रसंग-सापेक्ष औचित्य होएबाक चाही।

७. पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्तक आलोकमे पठन

७.१ रूपवादी समीप-पाठ

आज्ञार्थक रदीफ विषयक नैतिक आग्रहकेँ ध्वनिक पुनरावृत्ति दैत अछि। ‘जाँचू’, ‘राखू’, ‘चुनू’, ‘फेर उठू’, ‘निन्न बचाउ’—रदीफ अर्थक केन्द्र होइत अछि।

रूपवादी कसौटी पर मात्रा-अन्तरक पैघ फैलाव गंभीर प्रश्न अछि, कारण संग्रह स्वयं पारम्परिक अरूज़ी दावी करैत अछि। छन्दीय परीक्षण संग्रहक अपन घोषित रूप-विधानकेँ ओकर पाठसँ मिलबैत अछि।

७.२ पाठक-प्रतिक्रिया आ निहित किशोर पाठक

पहिल खण्ड स्पष्ट रूपे एहन किशोर पाठक रचैत अछि जे परीक्षा दैत, मीत चुनैत, जालजगत देखैत, गलत सूचना पबैत, थाकैत, पहिल कमाइ वा खर्चक अनुभव करैत आ भविष्यक विषय चुनैत अछि।

दोसर खण्डक वयस्क पाठक एके समय बाल्यस्मृति, गाम, पुरान तकनीक आ सामाजिक व्यंग्य पढ़ि सकैत अछि; एहि तरह पोथी बहु-पीढ़ी पाठक बनबैत अछि।

७.३ संवादिता आ सामाजिक वस्तु-संस्कृति

दोसर खण्ड बालक ध्वनि, ग्रामीण हँकार, शिक्षक-दफ्तरक भाषा, तकनीकी शब्द, विवाह-सम्बन्धी बोली, राष्ट्रीय उद्बोधन आ दार्शनिक शब्दक बहुध्वनिक संगम अछि।

रेल, एस.एम.एस., फैक्स, दफ्तर, स्थानान्तरण, गैस-सिलिण्डर, उपस्थितिपंजी, कम्प्यूटर-खेल आदि समयक सामाजिक इतिहासक साक्ष्य बनैत अछि; पहिल खण्डक जालजगत आ सूचना-जाँच एहि इतिहासक अगिला अंकीय चरण प्रस्तुत करैत अछि।

८. नव्य-न्याय आधारित ज्ञानमीमांसक समीक्षा

‘प्रश्न पूछू’, ‘समाचार’, ‘साँच जाँचू’, ‘साँचक जाँच’, ‘बात जाँचू’, ‘प्रमाण देखू’ आ अन्तिम ‘साँच जाँचू’ संशयसँ निर्णय धरि स्पष्ट ज्ञान-क्रम बनबैत अछि।

न्यायपरम्पराक प्रमाण-विचारमे प्रत्यक्ष, अनुमान आ विश्वसनीय शब्द महत्त्वपूर्ण साधन अछि। संग्रहक तथ्य-जाँच गजल एक चित्र वा एक स्रोतकेँ पर्याप्त नहि मानैत; दोसर स्रोत, दाबी पाछाँक आधार आ प्रचारक स्वरूप जाँचबाक आग्रह करैत अछि।

‘प्रश्नक साहस’ समूहमे जिज्ञासा अज्ञानक लज्जा नहि, ज्ञान-उत्पत्तिक साधन अछि। पोथी वा बहुसंख्यक कथनकेँ स्वतः अन्तिम सत्य नहि मानब न्यायिक विवेकसँ मेल खाइत अछि।

अवच्छेदकक धारणा रूपक रूपे गजल पर लागू होइत अछि: रदीफ शेरक अन्तिम ध्वनिक सीमा, काफिया पूर्ववर्ती ध्वनि-क्षेत्र सीमित करैत अछि। मात्रा-विस्तार अत्यधिक होएत तँ औपचारिक सीमा शिथिल होइत अछि।

‘निज बात’, ‘मीतक गोपन बात’, ‘सीमा राखू’ आदि रचनामे अधिकारक सीमांकन अछि—ककर बात ककर अनुमति बिना साझा होएत, मीतताक नामपर अधिकार कतय समाप्त होइत अछि।

९. विदेह समानान्तर ऐतिहासिक पद्धतिक आलोकमे स्थान-निर्धारण

समानान्तर इतिहास साहित्यकेँ एकमात्र संस्थागत वा उच्च-कैननिक धारा नहि मानि लोक, बाल, श्रम, प्रवास, मौखिकता, अंकीय जीवन, नूतन विधा आ सामाजिक हाशियाक अनुभव सभकेँ एक संग वैध ऐतिहासिक धारा मानैत अछि। ‘अकुलाइत सुर’ उच्च-काव्य आ बालगीत, गजल आ लोकध्वनि, ग्रामीण शब्द आ दफ्तरी उधार-शब्द, दादीक कथा आ जालजगत सभकेँ एके पोथीमे स्थान दैत अछि।

पहिल खण्ड २०२० दशकक युवा जीवनक सांस्कृतिक साक्ष्य रूपे पढ़ल जा सकैत अछि: पर्दा-जीवन, पसन्द-चिन्ह, समाचार-साझाकरण, अंकीय विराम, निजता, समूह-दबाव आ तथ्य-जाँच। दोसर खण्ड पूर्ववर्ती सामाजिक आधुनिकताक वस्तु-स्मृति सुरक्षित करैत अछि—रेल, दफ्तर, स्थानान्तरण, तार-सन्देश, फैक्स, उपस्थितिपंजी, गैस-सिलिण्डर, प्रवास।

मैथिली गजलक आधुनिक पुनरुत्थान रूपगत अनुशासन पर बल दैत अछि। ‘अकुलाइत सुर’ एहि अनुशासनकेँ किशोर विषयसँ जोड़ैत अछि; योगदान तखन बेसी मजबूत होएत जखन घोषित अरूज़ी मानदण्ड आ वास्तविक मात्रा-विन्यासक दूरी घटाओल जाए।

१०. दुनू खण्डक तुलनात्मक संश्लेषण

पहिल खण्ड भविष्यक भाषा अछि; दोसर खण्ड स्मृति आ वर्तमानक बहुध्वनिक अभिलेख। पहिल खण्डक वाक्यरचना ‘चलू’, ‘राखू’, ‘जाँचू’, ‘सुनू’, ‘चुनू’ सन निर्देशात्मक क्रियापर केन्द्रित; दोसर खण्ड कथात्मक, दृश्यात्मक आ संवादात्मक।

पहिल खण्डक प्रमुख पात्र किशोर पाठक अछि। दोसर खण्डक पात्र सामूहिक अछि—बौआ, माए, नानी, मजदूर, कर्मचारी, ग्रामीण, प्रवासी, शिक्षक, पशु-पक्षी, कृषक। पोथी व्यक्तिगत आत्मनिर्माण आ सामुदायिक स्मृति बीच सेतु बनैत अछि।

ध्वनि-स्तरपर पहिल खण्ड रदीफ-काफियाक नियंत्रित आवर्तन पर टिकल अछि; दोसर खण्ड लोकध्वनि, ध्वन्यनुकरण, बोलचाल, संवाद आ कथानकक लय पर। एहि भिन्नताकेँ एकता शीर्षक ‘सुर’ दैत अछि।

११. शुद्ध मैथिली निखार-अडिट

मूल रचना-शरीरक परीक्षणमे रोमन लिपिक प्रत्यक्ष शब्द नहि भेटल। बाहरी मूलक अनेक शब्द देवनागरी रूपमे अछि; किछु समकालीन किशोर जीवन वा सामाजिक इतिहासक सचेत संकेत अछि, तेँ सभकेँ यांत्रिक रूपे हटेनाइ उचित नहि।

‘कोठरी’ दू ठाम भेटैत अछि; ‘कोठली’ अधिक वांछनीय। ‘हरेक’ एक ठाम अछि—‘सपन दिस बढ़ब हरेक डेग’; एकरा ‘सपन दिस बढ़ब एक-एक डेग’ कएल जा सकैत अछि। परिमाणवाचक ‘हर’ पाँच ठाम निखार योग्य अछि; कृषि-अर्थक ‘हर’ दू ठाम शुद्ध अर्थभेदक शब्द अछि आ यथावत रहबाक चाही।

किशोर गजलमे ‘स्क्रीन’, ‘लाइक’, ‘सोशल’, ‘डिजिटल’, ‘करियर’, ‘टीम’, ‘फोन’, ‘फोटो’ जकाँ देवनागरीकृत उधार-शब्द अछि। देशज निखार लेल ‘पर्दा’, ‘पसन्द-चिन्ह’, ‘जालजगत’, ‘अंकीय’, ‘जीविका-पथ’, ‘टोली’, ‘दूरभाष’, ‘चित्र’ विकल्प सम्भव अछि; मुदा समकालीन अनुभवक तत्क्षण पहचान बचाएब सेहो आवश्यक।

दोसर खण्डक ‘रिपेयर’, ‘एस.एम.एस.’, ‘टी.टी.’, ‘मरकरी डिलाइट’, ‘फ्रैक्चर’, ‘क्रिकेट-फील्डिंग’, ‘मैट्रिक प्लक’, ‘कैप्टन’, ‘अटेंडेंस’, ‘वी.आइ.पी.’, ‘ट्रांसफर’, ‘ऑफिस’, ‘गैस सिलिण्डर’, ‘फैक्स’, ‘इटालियन सैलून’ आदि सामाजिक कालचिह्न सेहो अछि; मूल शीर्षक सुरक्षित राखब उपयुक्त।

‘छथि’क अधिकांश प्रयोग मनुख वा मानवीकृत पात्रक लेल अछि। ‘सुरुज जेकाँ बरहम घूमै छथि’मे ‘बरहम’ मानवीकृत कल्पना-पात्र अछि; एकरा काव्यिक पुरुषीकरण मानल जा सकैत अछि।

१२. सम्पादकीय आ छन्दीय पुनरीक्षणक प्राथमिकता

पहिल प्राथमिकता: जाहि ११ गजलमे घोषित मात्रा-अन्तर २१ वा बेसी अछि, ओहि सभक पाँति-दर-पाँति पुनर्मात्रांकन।

दोसर: समान शीर्षक आ बहुत निकट पाठवाला गजलकेँ भिन्न उपशीर्षक वा स्पष्ट शृंखला-क्रम देब।

तेसर: ‘किशोर गजल’क प्रयोगधर्मी परिभाषा भूमिकामे स्पष्ट करब, विशेषतः जतय शेर-स्वायत्तता कम आ एक-विषयी क्रम अधिक अछि।

चारिम: सीमित भाषा-निखार—कोठरी, हरेक, परिमाणवाचक हर; मुदा लोकशब्द, पशु-हँकार, ग्रामीण शब्द आ समय-चिह्न उधार-शब्दकेँ अति-मानकीकरणसँ बचाएब।

१३. २६६ रचनाक रचना-दर-रचना पूर्ण समीक्षात्मक सूची

एहि सूचीक उद्देश्य संग्रहक कोनो रचना आलोचनात्मक दृष्टिसँ छूटि नहि जाए। पहिल खण्डमे औपचारिक छन्द-सूचना सेहो संक्षेपमे जोड़ल जाएत; दोसर खण्डमे मुख्य विषय आ प्रमुख काव्य-उपकरण चिन्हित कएल जाएत।

१३.१ खण्ड १ — किशोर गजल १–१३३

१३.२ खण्ड २ — कविता-गीत १–१३३

१४. निष्कर्ष

‘अकुलाइत सुर’क सबसे पैघ उपलब्धि विषयक सामाजिक स्तर सभकेँ मैथिली काव्यभाषामे समान अधिकार देनाइ अछि। बच्चाक कागजक नाव, किशोरक निज सीमा, गलत समाचारक जाँच, पहिल कमाइ, दफ्तरक हास्यास्पद उलझन, दहेज-विवाहक विसंगति, प्रवासक स्मृति, मैथिली बाजबाक आग्रह आ खरिहानक बड़द—सभ एके साहित्यिक जगतमे प्रवेश करैत अछि।

भारतीय काव्यशास्त्रक दृष्टिसँ संग्रह अद्भुत, हास्य, वीर, करुण आ शान्त भाव-क्षेत्रक आवागमन प्रस्तुत करैत अछि; ध्वनि आ वक्रोक्ति बिम्बप्रधान गजल आ व्यंग्य-कवितामे सफल अछि। पाश्चात्य समीप-पाठ रूप-कथ्यक सम्बन्ध, निहित किशोर पाठक आ सामाजिक वस्तु-संस्कृतिक अभिलेखीय महत्व उजागर करैत अछि। नव्य-न्याय तथ्य-जाँच, प्रश्न, प्रमाण, सीमा आ निर्णय विषयकेँ ज्ञानमीमांसक एकता दैत अछि। समानान्तर इतिहासक आलोकमे पोथी ग्रामीण-मौखिक, दफ्तरी-आधुनिक आ अंकीय-किशोर संस्कृतिक सह-अस्तित्वक दस्तावेज बनैत अछि।

सर्वाधिक जरूरी पुनरीक्षण छन्दीय अछि। सभ गजलमे बहरक स्पष्ट घोषणा संग्रहक शक्ति अछि, ताहि कारण मात्रा-अन्तरक बहुत पैघ फैलावकेँ अनदेखा नहि कएल जा सकैत। कठोर पुनर्मात्रांकन, निकट पाठवाला गजलक सम्पादकीय भिन्नता, आ सीमित भाषा-निखारक बाद पहिल खण्डक विधागत विश्वसनीयता बढ़त। दोसर खण्डमे उलट सावधानी जरूरी अछि: ओकर लोकशब्द, उधार-शब्द, ध्वनि आ समय-चिह्न सभकेँ अत्यधिक मानकीकरणसँ बचाएब आवश्यक अछि।

समग्रतः ई पोथी ‘किशोर गीत-गजल संग्रह’क परिभाषासँ बेसी व्यापक अछि। ई बाल-कल्पनासँ तर्कशील किशोर नागरिकता धरि यात्रा, आ ग्रामीण-सामाजिक स्मृतिसँ अंकीय वर्तमान धरि मैथिली जीवनक बहुध्वनिक सेतु अछि। संग्रहक सर्वोत्तम आलोचनात्मक भविष्य ओतय अछि जतय ओकर भाषिक जीवट, सामाजिक विस्तार आ नूतन पाठक-दृष्टि सुरक्षित रहय, मुदा विधागत दाबी सभकेँ ओतबे कठोर सम्पादकीय अनुशासनसँ परखा जाए।

१५. बिबलियोग्राफी

• अकुलाइत सुर

• नाट्यशास्त्र

• ध्वन्यालोक

• काव्यप्रकाश

• वक्रोक्तिजीवित

• औचित्यविचारचर्चा

• साहित्यदर्पण

• तत्त्वचिन्तामणि

• मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास

• मैथिलीक प्रतिनिधि गजल १९०५–२०२२

• [A Parallel History of Mithila & Maithili Literature]

• [Poetics]

• [The Mirror and the Lamp]

• [The Well Wrought Urn: Studies in the Structure of Poetry]

• [The Dialogic Imagination]

• [The Political Unconscious: Narrative as a Socially Symbolic Act]

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।

पद्य Poetry

२.१. अशोक कुमार ठाकुर- किछु गजल-गीत

२.२. डॉ किशन कारीगर- डिनर डिप्लोमेसी (हास्य कविता)

२.३.तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ११]

२.१. अशोक कुमार ठाकुर- किछु गजल-गीत

अशोक कुमार ठाकुर

किछु गजल-गीत

१

मैथिली गजल

कहलो नहि जाइत अछि

मतला

ई ग़म नहि जे ग़म सहलो नहि जाइत अछि,

पीर ई जे ककरो कहलो नहि जाइत अछि॥

हृदयमे उठैत अछि पीड़ाक बड़का लहर,

नयनक नोर मुदा बहलो नहि जाइत अछि॥

हँसीक ओटमे राखल अछि कतेक पीड़ा,

सभकेँ अपन व्यथा कहलो नहि जाइत अछि॥

किछु घाव समयक देल एहन गहिर अछि,

सभ घाव जगकेँ देखेलो नहि जाइत अछि॥

अपनहि लोक जखन अनजान बनि जाइत अछि,

तखन मनक बात सभ कहलो नहि जाइत अछि॥

कतेक बेर मन करैत अछि जोर सँ कानब,

मुदा नोर नयन सँ बहलो नहि जाइत अछि॥

किछु भार साँससँ भारी भऽ जाइत अछि,

सभ भार माथ पर लऽ चललो नहि जाइत अछि॥

जखन कियो मनक भाषा बुझि नहि पबैत अछि,

तखन पीड़ा शब्दमे ढरलो नहि जाइत अछि॥

किछु सम्बन्ध मौनक दीप जकाँ जरैत अछि,

ओकर बात शब्दमे सजेलो नहि जाइत अछि॥

अशोक, ई हृदय सेहो अचरज करैत अछि,

हर पीड़ा जगसँ कहलो नहि जाइत अछि॥

२

अहाँके की लिखू?

मतला

अहाँके अपन लिखू कि अहाँक तकदीर लिखू,

अहाँके सपना लिखू कि मनक तहरीर लिखू।

अहाँ हमर प्रिय छी, हमर हृदयक नेह छी,

अहाँके प्रेम लिखू कि प्रेमक तासीर लिखू?

अहाँक मुस्कानमे जे सुख भेटैत अछि हमरा,

ओहि सुखक पलके लिखू कि तस्वीर लिखू?

अहाँ दूर छी, तैयो हृदयक बहुत लग छी,

अहाँक दूरी लिखू कि भेटक तकदीर लिखू?

रातिक निस्तब्धतामे यादि अहाँक आबि जाय,

अहाँके निन्न लिखू कि नेहक खुमार लिखू?

अहाँ हमर चुप्पी सेहो बुझि लैत छी,

अहाँके आवाज लिखू कि मनक तासीर लिखू?

जे बात अहाँसँ कहबाक रहि गेल मनमे,

ओहि मौनक कथा लिखू कि मनक तहरीर लिखू?

अहाँक नयनमे जे अपनापन देखाइत अछि,

ओहि नयनक छवि लिखू कि तस्वीर लिखू?

अहाँ हमर सपना छी, अहाँ हमर विश्वास छी,

अहाँके सत्य लिखू कि मनक तासीर लिखू?

शब्द बहुत छथि, मुदा भाव समेटल नहि जाय,

अहाँके पूर्ण लिखू कि अधूर तहरीर लिखू?

मकता

अशोकक कलम अहाँक नामपर रुकि जाइत अछि,

अहाँके प्रिय लिखू कि हृदयक तस्वीर लिखू?

अहाँए कहू, एहि नेहके नाम आखिर की दिअ—

अहाँके प्रेम लिखू कि जीवनक तकदीर लिखू?

३

स्वभावसँ नंगे छथि

मतला

पहिने लोक अभावमे नंगे छल,

आब स्वभावसँ नंगे छथि।

तन पर वस्त्र हजारो अछि,

मुदा विचारसँ नंगे छथि॥

पहिने झोपड़ीक जीवन छल,

मुदा मोन उदार छल।

आब महल-अटारी बीच रहि,

व्यवहारसँ नंगे छथि॥

पहिने आधा रोटी खाइत,

आधा आनकेँ दऽ देत।

आब भरल भण्डारक मालिक,

मुदा बाँटबमे नंगे छथि॥

पहिने लाज-धरम बचल छल,

मान-सम्मानक बात छल।

आब लोभक अन्हारमे डूबल,

चरित्रसँ नंगे छथि॥

पहिने दुःखमे साथ ठाढ़ रहथि,

सुखमे सभकेँ बाँटि लेथि।

आब स्वार्थक घेरामे रहि,

सम्बन्धसँ नंगे छथि॥

दर्पण लऽ कऽ अपने देखू,

दोष दोसरमे खोजू नहि।

समय बदलल अछि एहन जे,

कतेक लोक भीतरसँ नंगे छथि॥

अशोक समयक ई तस्वीर,

दर्पण जकाँ देखबैत अछि।

तन ढँकल अछि वस्त्रसँ, मुदा

मन-विचार नंगे छथि॥

४

मिथिला हमर महान

पाग, पान आ मखानसँ,

महकल मिथिला धाम।

माछ-दहीक संस्कृति सँ,

जगमे उज्ज्वल नाम॥

मधुश्रावणीक पावन पर्व,

नेहक बहय धार।

जनक-जानकीक पावन भूमि,

मिथिला अनुपम धाम॥

शादी, मुंडन, उपनयन सभ,

मंगल रीत अपार।

संस्कारक अमूल्य धरोहर,

मिथिलाक श्रृंगार॥

कोहबर, सोहर, लग्नक गीत,

गूँजय घर-आँगन।

लोकगीतमे बसल अछि,

मिथिलाक अपन जीवन॥

विद्यापतिक मधुर वाणी,

ज्ञानक निर्मल धार।

पान, माछ आ मखानसँ,

भरल स्नेह-भंडार॥

जुड़ि-शीतल, सामा-चकवा,

लोक-पर्व अनुपम रंग।

मिथिलाक माटिक गंधमे,

बसल नेहक उमंग॥

जनकपुरीक गौरव-गाथा,

संस्कृतिक अनुपम थाति।

अपन परंपरा सँ मिथिला,

आज धरि जगमे छाती॥

माछ, मखान आ पानसँ,

मधुर बनल पहचान।

संस्कारक राजधानी हमर,

मिथिला अछि महान॥

-अशोक कुमार ठाकुर; ग्राम–करमौली, पोस्ट–करमौली,थाना–खजौली, जिला–मधुबनी (बिहार)मोबाइल नंबर:-8709568993,जनसेवा:-एस.डी.आर.एफ,मे कार्यरत सिपाही।

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।

२.२. डॉ किशन कारीगर- डिनर डिप्लोमेसी (हास्य कविता)

डॉ किशन कारीगर डिनर डिप्लोमेसी (हास्य कविता) डिनर टेबल पर परोसल अछि मटर पनीर आ शाही पनीर छौंकल अछि घी देसी आउ-आउ ई छी डिनर डिप्लोमेसी। हम सतारूढ़ दल वला छी आई सहयोगी दल वला लेल डिनर माने भोज आयोजित भेल हमरा समर्थन भेटल खूम बेसी। आब बाहर सँ समर्थन देनिहार बाकि रहि गेल छथि त आई हुनके नामे राजनीतिक डिनर ई छी डिनर डिप्लोमेसी। अहाँ सभ जे खाएब हम अहाँक फरमाईस पुराएब मुदा एकटा गप कहि दि हम बाहरि समर्थन के कहाबद्धि कराएब। भरि पेट खाई जाई जाउ अहाँ जे खाएब से हम खुआएब मुदा ई कहू त चुपेचाप रहब आ की मध्यावधि चुनाव करबाएब। धू जी महराज अहूँ त एकदम ताले करैत छी खाइत-पीबैत काल ई गप नहि पहिने दारू मँगाउ अहाँ बिदेशी। डिनर टेबुल के नीचा मे देखू बोतल राखल अछि देसी-बिदेशी भरि छाक पीब लियअ ई छी डिनर डिप्लोमेसी। अच्छा ई कहू त सरकार एतेक खर्चा अपना जेबी आ कि सरकारी खजाना सँ हमरा ध लेलक बेहोशी। होश मे आउ गठबंधन बचाउ हम सत्ता मे छी की कहू अपनो खर्चा सरकारी भेल बड्ड बेसी ई छी डिनर डिप्लोमेसी।।

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।

२.३.तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम'] मूल तेलुगु: नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव) मैथिली अनुवाद: मानेश्वर मनुज [खण्ड ११]

तेलुगु काव्य: काठक घोड़ा [मूल तेलुगु'कोय्या गुर्रम' केर लेखक छथि नग्नमुनि (मानेपल्लि हृषीकेशवराव)]

मूल तेलुगु लेखक

नग्नमुनि एक परिचय

नाम: मानेपल्लि हृषीकेशवराव

जन्म: 15 मई 1940

जन्म स्थान: शहर- तेनाली, जिला- गुंटूर (आंध्र प्रदेश)

वृत्ति: चीफ ऑडिटर, आंध्र प्रदेश विधान सभा, तकर बाद डिप्टी सेक्रेटरी, ओतहि

लिंक: पहिने साम्यवादी (कम्युनिस्ट), बादमे राष्ट्रवादी (नेशनलिस्ट)

संस्था: अविभाज्यक जनतंत्र, 1990

आंदोलन: दिगम्बर कविता आन्दोलन 1965

लक्ष्य: नंगट, भूखल, दीन, दरिद्रक हित

कृति:

उदयिंचनि उदयलु (ओ उदय जे उदित नहि भेल)

पूर्वा हवा

जम्मि चेट्ट

विशेष: 1977 ई. मे बहुचर्चित काव्य- 'कोय्या गुर्रम' (KOYA-GURRAM), जकर अर्थ अछि- 'काठक घोड़ा', भाव- 'नकली सरकार'। 19 नवम्बर 1977, शनि दिन बंगालक खाड़ीमे पचास-साठि फुट ऊँच लहड़ि उमड़ि कऽ कृष्णा जिलाक दिविसीमा क्षेत्रकेँ डुबा कऽ नष्ट कऽ देलक। हजारो लोक मारल गेलाह। ई घटना काव्यक वस्तु बनल। विषय आ परिस्थितिसँ उपजल ई काव्य हिन्दी कवि मुक्तिबोधक 'अंधेरे में' क बराबरीक अछि।

मैथिली अनुवादक

नाम: मानेश्वर मनुज

जन्म: गाम- गम्हरिया (बेनीपट्टी) मधुबनी। जनवरी 1958 (प्रमाण पत्रक अनुसार)।

वृत्ति: भारतीय नौसेनामे तकनीकी सहायक, तकर बाद भारतीय रेलक वाणिज्य विभाग सँ (रिटायर्ड)।

कृति:

'सम्बन्ध', कथा संग्रह (मैथिली) 2007

'कि', कविता संग्रह (मैथिली) 2011

'परिवर्तन', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2019

'बेघर', कविता संग्रह (हिन्दी) 2022

'तालाब', कहानी संग्रह (हिन्दी) 2024

अनुभव: विभिन्न भाषा सँ हिन्दी आ मैथिलीमे अनुवाद। हिन्दी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे लेख, कविता, कथा, कहानी इत्यादि प्रकाशित।

अनुवादकक टिप्पणी: अनेक तेलुगुमित्र, स्वयं नग्नमुनि जी, हिन्दी तथा अंग्रेजी मे अनुदित पुस्तकक मदति सँ दीर्घ काल तक मंथन कयलाक बाद अनुवाद कयल गेल अछि। ई नग्नमुनिक प्रसिद्ध कविता अछि। नग्नमुनि सँ लगातार हमर पत्राचार होइत छल। ओ अंग्रेजी आ तेलुगुक विद्वान छलथि। हुनक किछु पत्र देसिल-बयना, हैदराबाद मे छपल अछि। -मानेश्वर मनुज

सम्पादकीय टिप्पणी (खण्ड-११)

कवि पहिने प्रश्न उठबैत छथि- जखन भगवानक जन्म भेल, मनुखक हाथ मे रेखा खींचल गेल, तखने मनुखक आ कर्तव्यक मरण भऽ गेल। तें आब प्रश्न अछि: आब नया पर ककरा मारल जैतै? समुद्र, काठक घोड़ा अर्थात् नकली सत्ता ककरा मारतै? ई प्रश्न मनुखक अस्तित्व-संकट आ सत्ताक नैतिक पतनक प्रतीक अछि। दोसर, कविता नेता, ठिकेदार आ जनसेवकक पाखंड पर समधानि कऽ चोट करैत अछि। जनसेवाक दाबी करयवला लोक लाशक ढेरी पर लड़ैत छथि। कौआ-गिद्धक जगह आब नेता लऽ चुकल छथि। देशक झंडा आकाश मे शान सँ फहराइत रहतै, मुदा निःसहाय नग्न जन माटि-गर्दामे मटियामेट भऽ जाइत छथि। झंडा नहि झुकतै, नोर नहि बहौतै—ई राष्ट्रवादक नकली आडम्बर पर व्यंग्य अछि। कविता मृत्युक दार्शनिक अर्थ सेहो उघाड़ैत अछि। जीवित मनुख सत्य नहि बुझैए; मनुखक भाषा, संसार आ ईश्वर सेहो मरि जाइत छै। मुदा कहियो ओ उस्सठ जमीन जोतल जैतै, खोपड़ी बाहर निकलि हँसतै, कंकाल कैफियत नहि मंगतै। अर्थात् दमनक अंत नहि होइत छै, विद्रोहक बीया जमीन मे जीवित रहैत अछि। अंत मे, प्लास्टिकक गाछ, प्लास्टिकक चिड़ै, प्लास्टिकक गाय-महीस आ यंत्रक खेलौना—ई सब नकली विकास आ झूठ सुखहालीक प्रतीक अछि। “ओहोम” क मंत्रक व्यंग्य ओहि नकली संसारक पूरक अछि। कुल मिला कऽ, ई मनुखक मृत्यु, शोषण, पाखंड आ जनताक दर्दक जीवंत दस्तावेज अछि। - गजेन्द्र ठाकुर

नग्नमुनिक तेलुगु काव्य

'काठक घोड़ा' (कोया गुर्रम)

खण्ड-११

आब नया पर ककरो की मारतै किओ

जाहि क्षण भगवानक जन्म भेलै

जाहि क्षण कहल गेलै जे शृष्टिकर्ता

मनुक्खक हाथ मे रेखा खीच देलकै

ओही क्षण मनुक्खक मरण भऽ गेलै

ओही क्षण कर्तव्यक मरण भऽ गेलै

आब ककरो नया पर की मारतै?

आब समुद्र नया पर

ककरा मारतै?

आब काठक घोड़ा (नकली सत्ता)

शुरु सँ ककरा मारतै?

चिंताक कोनो बात नहि।

जनताक सेवा करय लाए पैघ संख्या मे

देशक नेता सब लाइन मे ठाढ़ अछि

ओ सब आपसो मे लड़ि रहल अछि

सब सँ पहिने लाश क ढेरी केँ उठाबय लाए।

आब कौआ, गिद्ध आ कीड़ाक जरूरत नहि

ओकर जगह जनसेवी नेता लऽ चुकल अछि

आब चिंताक कोनो बात नहि।

ठिकेदार ठाढ़ अछि, नमहड़ संख्या मे

ओ कोन स्वागत करय हेतु आतुर अछि

आब चिंताक कोनो बात नहि।

अनाथ प्रेत आब ककरा सँ कैफियत मंगतै?

जिनगी भरि पद आ ओहदा सँ सजि-धजि कऽ

अपना तन-वदन केँ अलंकृत करऽवला

अगर कियो मरि जाए

बड़ विनम्र भऽ विपन्न देह सँ

माथा झुका लैत अछि

आकाश मे फहराइत देशक सुन्दर झंडा

मुदा निःसहाय नग्न हजारो लोक

ताजिनगी माटि-गर्दामे विताबऽवला

क्षण भरि मे मटियामेट भऽ जाए

तँ देशक झंडाक सिर नहि झुकतै

नोर नहि बहौतै, छाती नहि पिटतै

हवा केँ ललकारैत

आसमान केँ खिल्ली उड़बैत

बड़ शान सँ फहराइत रहतै, आसमान मे!

शहनाईक विषाद नाद नहि सुनेतै

कालचक्रक कंठ नहि बुझतै

इतिहासक आँखिसँ नोर नहि टपकतै

आइ

जिवैत भऽलमानुस सत्य नहि बुझतै

लाश तँ बाजिये ने सकै छै

मनुख केँ मरितहि देरी

ओकर भाषा सेहो मरि जाइत छै

संसार ओकर मरि जाइ छै

ईश्वर सेहो ओकर मरि जाइ छै।

मुदा कहियो ने कहियो

ओ उस्सठ जमीन अबस्स जोतल जैतै

कि एकाएक एक खोपड़ी बाहर निकलि एतै

जोर सँ ठहक्का दऽ हँसि पड़तै एहि नजरि पर

तैओ चिन्ताक कोनो बात नहि

कारण कंकाल कैफियत नहि मंगतै।

आजुक एहि जर्जर अवस्था मे

जन्म लैते धोखा खाए लाए

पलैत अछि धोखा खाए लाए

प्यार करैत अछि धोखा खाए लाए

विश्वास करैत अछि धोखा खाए लाए

जिनगीक सब मोड़ पर

एकमात्र मृत्युये नहि बैसल छै

अपितु अज्ञान, मूर्खता आ सब दुर्गुण

द्वन्द्वात्मक जीवन सब ठाम सब पल

मृत्यु बनि मनुजक पाछा लागल छै।

मृत्यु केँ जीतक लेल

असीम अथाह विज्ञानक ज्ञान ठाढ़ छै

ओकरे मदति सँ सड़कक दुनू कात

प्लास्टिकक गाछ लगाएल जैतै

प्लास्टिकक डारि पर

प्लास्टिकक चिड़ै बैसाएल जैतै

प्लास्टिकक बोआ बाग कऽ

डंक पर चोट दऽ कहतै कि खेत सोन उगलैए

यंत्रक खेलौना बनाएल जैतै

चावी दऽ कऽ ओ उसट्ठ धरती पर

छोड़ल जैतै।

कहल जैतै - सव खुशहाल अछि

नाचि रहल अछि, गावि रहल अछि

आराम सँ जी रहल अछि।

प्लास्टिकक गाय आ महीस केँ

प्लास्टिकक थऽन सँ दूध दुहि

खूब पीयल जैतै।

काठक घोड़ा केँ कन्हा पर बैसा कऽ

जिनगी भरि ढोल जैतै!

जोरे-जोरे सँ कहल जैतै

ओहोम! ओहोम! होम!

ओहोम! ओहोम! होम!

-मानेश्वर मनुज आदर्श नगर कॉलोनी गोशाला रोड मधुबनी पिन - 847211 मो. - 9920674861 / 7464077106

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।

Suggested citation: गजेन्द्र ठाकुर. “अकुलाइत सुर.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 450, 2026-09-15. https://www.videha.co.in/research/2026/450/अकुलाइत-सुर.htm

मूल विदेह अंक / Original issue

Videha Digital Research Archives — preserved releases

All eight archive releases are published and their DOIs are minted.