विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

दीवान-ए-विदेह खण्ड-१

गजेन्द्र ठाकुर · 2026-09-15 · अंक 450

Keywords: Maithili literary history, Mithila studies, literary criticism, research article

गजेन्द्र ठाकुर

दीवान-ए-विदेह समग्र गहन शोध-समीक्षा, काव्यशास्त्रीय परीक्षण आ मैथिली निखार-अनुशीलन

मूल कृति: गजेन्द्र ठाकुर

५९१ गजल, प्रारम्भिक काव्य-रचनासभ, सामान्य आ किशोर खण्ड, छन्द-विधान तथा सम्पूर्ण रचना-सूचीक आधारपर तैयार शोध-लेख।

सार

ई शोध-लेख ‘दीवान-ए-विदेह’क सम्पूर्ण उपलब्ध पाठकेँ आधार बनबैत अछि। पोथीमे ५९१ गजल दुइ प्रमुख खण्डमे व्यवस्थित अछि—४५८ सामान्य गजल आ १३३ किशोर गजल। प्रारम्भिक भागमे छन्द-विधान, एक ‘रुबाइ’ शीर्षक रचना आ ‘कता १’ तथा ‘कता २’ शीर्षक दू रचना भेटैत अछि। शीर्ष-पृष्ठक संख्या-विवरण आ मुख्य पाठक रचना-शीर्षकमे एहि बिन्दुपर एक आन्तरिक विसंगति अछि, जकरा आलोचनामे तथ्यगत रूपेँ अलग चिन्हित कएल गेल अछि। अध्ययनक मूल प्रश्न ई अछि जे मैथिली गजल अपन परम्परागत अरूज़ी स्मृति, स्थानीय उच्चारणाधारित मात्रा-पद्धति, मिथिलाक भू-दृश्य, लोक-श्रम, स्मृति, प्रवास, नेह, नैतिक आत्मसंवाद आ किशोर-जीवनक समकालीन प्रश्नसभकेँ कोना एकहि दीवानमे बहुस्तरीय काव्य-जगत बनबैत अछि। भारतीय काव्यशास्त्रक रस-ध्वनि-वक्रोक्ति-औचित्य, पाश्चात्य निकट-पाठ आ संवादधर्मिता, नव्य-न्यायक परिभाषा-भेद-प्रमाण अनुशासन, आ विदेह समानान्तर ऐतिहासिक पद्धतिक काल-सामाजिक तुलनात्मक दृष्टि—चारूकेँ एकीकृत कऽ समीक्षा कएल गेल अछि। निष्कर्षतः ई दीवान मैथिली गजलकेँ केवल प्रेम वा विरहक पारम्परिक क्षेत्रमे सीमित नहि रखैत, बल्कि गाम-नगर, लोक-स्मृति, कृषि-पर्यावरण, डिजिटल युग, किशोर नागरिकता, आलोचनात्मक बुद्धि आ आत्म-अनुशासन धरि विस्तार दैत अछि।

बीज-शब्द: मैथिली गजल; ध्वनि; रस; वक्रोक्ति; नव्य-न्याय; प्रमाण; समानान्तर इतिहास; लोक-स्मृति; किशोर काव्य; छन्द।

१. पाठ-सामग्री आ शोध-सीमा

अध्ययनक प्राथमिक स्रोत ‘दीवान-ए-विदेह’क पूर्ण ६१०-पृष्ठीय संस्करण अछि। सम्पूर्ण दस्तावेजक संरचनात्मक परीक्षणमे ५९१ गजल क्रमांकित रूपेँ भेटल; गजल १ ‘मोन पड़ैए’ सँ गजल ५९१ ‘साँच जाँचू’ धरि क्रम अखण्ड अछि। गजल १–४५८ ‘सामान्य गजल’ आ गजल ४५९–५९१ ‘किशोर गजल’ खण्डमे अछि। एहि कारण समीक्षा खण्डगत अन्तर, कालबोध, सम्बोधन-शैली, नैतिक स्वर, शब्दावली आ छन्द-व्यवहारकेँ पृथक-पृथक देखैत अछि, मुदा अन्ततः सम्पूर्ण दीवानकेँ एक साझा काव्य-प्रयोग मानैत अछि।

पोथीक आरम्भिक ‘छन्द-विधान’ उच्चारणकेँ मात्रा-निर्णयक आधार मानैत अछि; लघु-गुरु, कल-क्रम, यति, काफिया-रदीफ आ गुनगुना कऽ लय-परीक्षा ओकर घोषित कार्यविधि अछि। ई आत्म-व्याख्यात्मक प्रस्तावना महत्वपूर्ण अछि, कारण ई दीवान अपन छन्दीय मानक स्वयं स्पष्ट करैत अछि; आलोचक लेल बाहरी अरूज़ी साँचा यांत्रिक रूपेँ आरोपित करब एहि पाठक घोषित पद्धतिक विरुद्ध होएत।

रचना-संख्या सम्बन्धी एक सम्पादकीय विसंगति उल्लेखनीय अछि। शीर्ष-पृष्ठ ‘५९१ गजल · १ कता · २ रुबाइ’ कहैत अछि, मुदा मुख्य पाठमे एकटा ‘रुबाइ’ तथा ‘कता १’ आ ‘कता २’ शीर्षक दू पृथक रचना अछि। अतः उपलब्ध पाठक प्रत्यक्ष संरचना ५९१ गजल + २ कता + १ रुबाइ देखबैत अछि। ई निष्कर्ष पाठ-साक्ष्य पर आधारित अछि; एहि ठाम रचनाकारक अभिप्राय विषयक अनुमान नहि कएल गेल अछि।

२. शोध-पद्धति: चारि समानान्तर आलोचनात्मक दृष्टि

२.१ भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि

रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, औचित्य आ शब्दार्थ-सामञ्जस्य एहि अध्ययनक भारतीय आधार अछि। गजल-संरचनामे प्रत्येक शेर अर्थतः अपेक्षाकृत स्वतंत्र रहैतहुँ रदीफ-काफिया, लय आ पुनरावर्तन द्वारा भावात्मक एकत्व रचैत अछि। ध्वनि-सिद्धान्तक दृष्टिसँ ‘मोन पड़ैए’, ‘रहि गेल’, ‘ओहि पार’, ‘फेर भेटत’, ‘मौनक स्वर’ जकाँ शीर्षक केवल कथन नहि, अप्रकट स्मृति, दूरी, अनुपस्थिति आ पुनरागमनक अर्थ-क्षेत्र खोलैत अछि। रस-परीक्षणमे करुण, शृंगार, शान्त, वीर, हास्य तथा विस्मयक सूक्ष्म मिश्रण देखल गेल अछि; मुदा संकलनक प्रधान भाव-सूत्र स्मृति-करुणा आ पुनर्निर्माणक आशावादी शान्ति अछि।

वक्रोक्तिक स्तर पर लोक-उपकरण आ प्रकृति-बिम्ब—करघा, चाक, ढेकी, जाँत, चरखा, पनघट, बखारी, माटि, धान, कुसियार, मखान, कमला, कोसी—अनेक बेर साधारण वस्तु नहि रहि समय, श्रम, पीढ़ी आ सामुदायिक स्मृतिक रूपक बनि जाइत अछि। ई लोक-वस्तुकेँ अलंकारिक सजावट नहि, अर्थ-उत्पादक केन्द्र बनबैत अछि।

२.२ पाश्चात्य निकट-पाठ आ संरचनात्मक दृष्टि

निकट-पाठक पद्धति रूप आ आशयकेँ अलग-अलग वस्तु नहि मानैत। एहि दीवानमे रदीफक पुनरावर्तन अर्थक पुनरावर्तन नहि, अर्थक क्रमिक परिवर्तन अछि। ‘मोन पड़ैए’ हर शेरमे अलग स्मृति-स्रोतकेँ एक साझा भाव-प्रतिध्वनिमे जोड़ैत अछि; ‘साँच जाँचू’ आदेशात्मक पुनरावर्तनकेँ ज्ञानमीमांसात्मक अनुशासन बनबैत अछि। विरोधाभास, विडम्बना, पुनरुक्ति, विराम, कथोपकथन आ शीर्षक-संक्षेप—ई सभ अर्थनिर्माणक संरचनात्मक साधन अछि।

संवादधर्मिता विशेषतः किशोर खण्डमे तीव्र अछि। ‘सुनू’, ‘बाजू’, ‘बुझू’, ‘चुनू’, ‘राखू’, ‘जाँचू’, ‘सीखू’ जकाँ क्रियापद पाठककेँ निष्क्रिय ग्रहणकर्ता नहि रहने दैत; कविता एक सक्रिय सम्बोधन बनि जाइत अछि। एहि ठाम काव्य-वक्ता आ पाठकक बीच प्रश्नोत्तर, सलाह, आत्म-संशय आ प्रतिपरीक्षणक संवाद बनैत अछि।

२.३ नव्य-न्याय दृष्टि

नव्य-न्यायक उपयोग एहि समीक्षा मे कविता के तर्कशास्त्रीय प्रस्तावमे बदलबाक लेल नहि, बल्कि अर्थ-स्पष्टता, सम्बन्ध-भेद, प्रमाण आ निषेधक सूक्ष्मता जाँचबाक लेल कएल गेल अछि। ‘नहि’, ‘नै’, ‘किएक’, ‘कोना’, ‘के’, ‘ककरा’, ‘प्रश्न’, ‘साँच’, ‘जाँच’ जकाँ आवर्ती शब्द दीवानमे संदेह आ परीक्षणक सक्रिय भाषिक संस्कृति बनबैत अछि। विशेषतः किशोर खण्डक अन्तिम समूह सूचना, प्रचार, स्रोत, चित्र, समाचार, निर्णय, समूह-दबाव, मीतक चयन आ सहायता माँगबाक विषयकेँ प्रमाण-आधारित विवेकसँग जोड़ैत अछि।

अवच्छेद, सम्बन्ध आ भेदक दृष्टिसँ देखल जाए तँ ‘घर’ केवल स्थान नहि; ‘घरक दुआर’, ‘घर घुरबाक बाट’, ‘घरमे बाजू’ जकाँ रूपमे घर-सत्ता अलग-अलग सम्बन्ध द्वारा अर्थवान होइत अछि। तहिना ‘मौन’ निष्क्रिय शून्यता नहि; ‘मौनक स्वर’, ‘मौन सुनू’, ‘मौन राखू’ मे मौनक प्रकार्य अलग-अलग अछि। ई विभेदक सूक्ष्मता नव्य-न्यायपरक पठनकेँ उपयुक्त सामग्री दैत अछि।

२.४ विदेह समानान्तर ऐतिहासिक पद्धति

एहि अध्ययनमे ‘विदेह समानान्तर ऐतिहासिक पद्धति’ सँ अभिप्राय एहन पठन अछि जतए साहित्यिक रूप, भाषिक परिवर्तन, भू-सांस्कृतिक स्मृति, दैनन्दिन वस्तु, पीढ़ीगत अनुभव आ समकालीन माध्यमकेँ एकहि कालरेखा पर नहि, अनेक समानान्तर कालरेखामे पढ़ल जाइत अछि। दीवानमे एक दिस करघा, ढेकी, जाँत, बखारी, पनघट, पुरनका डाकघर, पुरनका रेडियो आ पोथी अछि; दोसर दिस [डिजिटल], [स्क्रीन], [लाइक], जालजगत आ समाचार अछि। ई सह-अस्तित्व ‘पुरान बनाम नब’क सरल द्वन्द्व नहि, मिथिलाक समयक सहजीवी बहुलता अछि।

भू-दृश्य सेहो ऐतिहासिक साक्ष्यक रूप लैत अछि। कमला, कोसी, पोखरि, कछार, बालू, बाढ़ि, धान, सरिसो, मखान, कुसियार, पलाश, सखुआ, सामा-चकेवा, मधुश्रावणी—ई शब्द केवल प्रादेशिक रंग नहि; सामाजिक श्रम, मौसम, उत्सव, पर्यावरणीय असुरक्षा आ सांस्कृतिक निरन्तरताक समानान्तर अभिलेख अछि।

३. संकलनक वास्तु: दीवान रूपमे बहुस्तरीयता

दीवानक विशालता—५९१ गजल—एकर आलोचना लेल संख्या मात्र नहि, संरचनात्मक तथ्य अछि। शीर्षकसभक पुनरागमन, जकाँ ‘जाड़क धूप’ चारि बेर, ‘अपन गति’, ‘ओहि पार’, ‘करघाक धुन’, ‘ना कहू’, ‘नै भूलब’, ‘प्रश्नक साहस’, ‘फेर भेटत’ आदि अनेक बेर, एक प्रकारक अन्तःपाठीय पुनरावलोकन बनबैत अछि। एक्के शीर्षक दोसर प्रसंगमे फेर आबि अर्थक समानता आ भिन्नता दुनू देखबैत अछि।

गजलसभक घोषित बहर सभ ठाम ‘मात्रिक छन्द · पारम्परिक अरूज़ी’ अछि। उपलब्ध मात्रा-विवरणमे न्यूनतम सीमा 11 आ अधिकतम सीमा 54 धरि जाइत अछि; औसत निचला सीमा लगभग 17.2 आ औसत ऊपरी सीमा लगभग 25.4 मात्रा अछि। एहि फैलावसँ स्पष्ट अछि जे संकलन एकल स्थिर मात्रा-साँचा पर नहि, उच्चारणाधारित निकट-समलय आ मिश्र कल-विन्यासक अनेक रूप पर काम करैत अछि। पोथीक अपन छन्द-विधान सेहो यांत्रिक अक्षर-गणनाक बदला वास्तविक उच्चारण आ गेयतालकेँ निर्णायक मानैत अछि।

अधिकांश गजल दस मिसराक, अर्थात् पाँच शेरक संरचना रखैत अछि; किछु गजल छह, आठ, बारह वा ओकरा बेसी मिसराक सेहो अछि। ई भिन्नता पाठक अनुभवमे विराम, विस्तार आ कथ्य-घनत्व बदलैत अछि। खास कऽ गजल ४२५–४५० बीच किछु रचना पारम्परिक पाँच-शेर ढाँचासँ बाहर बढ़ैत देखाइत अछि; एहि ठाम सम्पादकीय रूपेँ शेर-विभाजनक पुनःदृश्य परीक्षण उपयोगी होएत।

४. सामान्य गजल खण्ड: स्मृति, गाम, प्रवास आ आत्म-पहिचान

गजल १–४५८ मे स्मृति आ लौटबाक आकांक्षा आरम्भसँ प्रमुख अछि। ‘मोन पड़ैए’ गाम, कमलाक धार, माइक हँकार, निन्न, नेहार आ बाढ़ि बाद ठाढ़ भेल घरकेँ स्मृतिक परत बनबैत अछि। ‘रहि गेल’, ‘आउ ने’, ‘कहियो नै’, ‘अहाँक बाद’, ‘सुनै छी’, ‘बदलि गेल’, ‘रहि जाउ’ आदि शुरुआती शीर्षक अनुपस्थिति आ सम्भावित पुनर्मिलनक भावक्षेत्र खोलैत अछि।

मध्यवर्ती गजलसभमे ‘पुरनका’ विशेषण एक प्रकारक स्मृति-चिह्न बनि उठैत अछि—पुरनका चश्मा, पुस्तकालय, रेडियो, पोथी, डाकघर, घड़ी, चित्र, कुञ्जी। वस्तु पुरान अछि, मुदा कविता ओकरा मृत अवशेष नहि बनबैत; ओ वस्तु समयक संवाहक अछि। एहि ठाम स्मृति निजी आत्मकथा सँ सामुदायिक इतिहास दिस बढ़ैत अछि।

लोक-श्रमक प्रतिमा संकलनक विशिष्ट उपलब्धि अछि। करघा, चरखा, कुम्हारक चाक, लोहारक आगि, दर्जीक सुई, औजार, हाथक मोल, श्रमक गरिमा—ई सभ गजल श्रमकेँ अलंकार नहि, मानवीय प्रतिष्ठाक आधार बनबैत अछि। वस्तु आ कारीगरक सम्बन्धमे ध्वनि, स्पर्श, ताल आ उपयोगिता एक साथ उपस्थित अछि; एहि कारण श्रम-विषयक गजलसभ दीवानक सामाजिक काव्यशास्त्र रचैत अछि।

५. मिथिला-पर्यावरण आ ऋतुचक्रक काव्य-भाषा

ऋतु-नाम आ कृषि-बिम्बक घनत्व दीवानकेँ स्थानीय कालगणनाक संवेदनशील दस्तावेज बनबैत अछि। चैत, फागुन, भादो, कातिक, अगहन, पूस, जाड़; सरिसो, अलसी, मसूर, सनई, धान, गहुम, कुसियार; कदम्ब, पलाश, कनेर, अड़हुल, पीपर, बटगाछ, नीम, महुआ, सखुआ—ई श्रृंखला प्रकृतिक वर्णन मात्र नहि। मौसम आ वनस्पति द्वारा समय पहिचानल जाइत अछि, आ समय द्वारा मनःस्थिति।

जल-बिम्ब विशेष महत्त्वपूर्ण अछि। कमलाक धार, कोसीक बालू, पोखरि, पनघट, नदीक मोड़, नदीक वचन, नदीक धुँध, नदीक बालू, बाढ़ि, मेह, ओस—जल कखनो स्मृति, कखनो अस्थिरता, कखनो पुनरुत्पत्ति, कखनो विनाशक संकेत अछि। ‘जलोदीप’ जकाँ रचनामे जल आ इजोतक संयुक्त प्रतीक जीवन-रक्षाक प्रश्नकेँ तीव्र करैत अछि।

६. नेह, विरह, मौन आ संवाद

गजल-विधाक पारम्परिक नेह-विरह दीवानमे उपस्थित अछि, मुदा ओकर मैथिलीकरण स्थान, सम्बोधन आ घरेलू बिम्ब द्वारा होइत अछि। ‘अहाँक बाद’, ‘अहाँक संग’, ‘नेहक थाह’, ‘मीतक संग’, ‘मीतक मान’, ‘मीतक गोपन बात’, ‘तोहर’ सम्बोधन, माइक हँकार आ दादीक कथा—ई सभ निजी सम्बन्धकेँ विस्तृत सामाजिक-परिवारिक भावभूमिसँ जोड़ैत अछि।

मौनक कई रूप अछि: चुप्पी, मौन, नहि बाजब, सुनब, धीरे कहब। ‘मौनक स्वर’ शीर्षक अपने भीतर विरोधाभास रचैत अछि—स्वरहीनता एक संप्रेषण बनैत अछि। पाश्चात्य निकट-पाठक दृष्टिसँ ई ‘विरोधाभास’ अर्थक मूल युक्ति अछि; भारतीय ध्वनि-दृष्टिसँ अनकहल अर्थक सक्रियता।

७. किशोर गजल खण्ड: उपदेश नहि, अभ्यास-नैतिकता

गजल ४५९–५९१ ‘किशोर गजल’ रूपेँ अलग खण्ड बनबैत अछि। आरम्भ ‘बार्बी’ जकाँ बाल-किशोर कल्पना सँ होइत अछि, मुदा क्रमशः पोथी, खेल, मीत, परीक्षा, असफलता, पहिल कमाइ, जिम्मेदारी, निर्णय, समय, प्रश्न, साँच, सहायता, सीमा, समूह-दबाव, जालजगत आ समाचार दिस बढ़ैत अछि। एहि क्रममे बाल्य-कल्पना सँ सामाजिक उत्तरदायित्व धरि एक विकासरेखा देखाइत अछि।

ई खण्डक विशेषता आदेशात्मक क्रियापदक बहुलता अछि—‘चुनू’, ‘राखू’, ‘बुझू’, ‘सुनू’, ‘पूछू’, ‘जाँचू’, ‘लिखू’, ‘सीखू’, ‘बाँटू’। सतही पठनमे ई उपदेशात्मक बुझा सकैत अछि; मुदा अनेक गजल आदेशकेँ आत्म-अभ्यास रूपेँ प्रस्तुत करैत अछि। वक्ता स्वयं सेहो भूल, दबाव, भ्रम, असफलता आ तुलना सँ मुक्त नहि अछि। तें नैतिक स्वर एकतरफा प्रवचनक बदला साझा अभ्यासक रूप लैत अछि।

अन्तिम गजल ‘साँच जाँचू’ संकलनक वैचारिक समापन जकाँ पढ़ल जा सकैत अछि। समाचार, चित्र, स्रोत, प्रचार, दोहराव, सन्देह आ आधारक प्रश्न एक आधुनिक ज्ञानमीमांसात्मक अनुशासन बनबैत अछि। नव्य-न्यायक प्रमाण-चिन्ता आ समकालीन माध्यम-साक्षरता एतए आश्चर्यजनक रूपेँ नजिक आबैत अछि।

८. छन्द, रदीफ-काफिया आ गेयता

दीवानक घोषित छन्द-पद्धति ‘उच्चारणाधारित मात्रा-लेखा’ अछि। एहि पद्धतिमे लिखित अक्षर सँ बेसी उच्चारित वर्णांशक काल-भार महत्वपूर्ण अछि; नासिक्य, संयुक्त व्यञ्जन, हलन्त, संकुचित रूप तथा शब्दान्तक अन्तर्निहित स्वरक निर्णय गायन-पाठ अनुसार कएल जाइत अछि। ई पद्धति मैथिली उच्चारणक वास्तविकताकेँ मान्यता दैत अछि आ देवनागरीक मात्र दृश्य रूपपर निर्भर नहि रहैत।

रदीफ दीवानक मुख्य संगीतात्मक उपकरण अछि। अनेक शीर्षक स्वयं रदीफ बनि जाइत अछि—‘मोन पड़ैए’, ‘आउ ने’, ‘कहियो नै’, ‘फेर भेटत’, ‘जाँचू’ आदि। एहि सँ शीर्षक, स्मरण आ शेर-अन्त एक वृत्त बनबैत अछि। सफल रचनासभमे रदीफ प्रत्येक शेरक अर्थ बदलैत-बढ़बैत अछि; कमजोर ठाम रदीफ कथ्यकेँ पूर्वानुमेय सेहो बना सकैत अछि। विस्तृत सम्पादनमे प्रत्येक गजलक पाँच शेर अलग-अलग अर्थ-उत्पादक दबाव बनबैत अछि कि नहि—ई कसौटी उपयोगी रहत।

९. भाषा, रजिस्टर आ मैथिली निखार

दीवानक भाषा व्यापक रूपेँ जीवित मैथिली बोलचाल, ग्रामीण शब्दावली, दैनन्दिन क्रिया-रूप आ क्षेत्रीय बिम्बपर आधारित अछि। ‘मोन’, ‘हँकार’, ‘ओसार’, ‘दुआर’, ‘माटि’, ‘घैल’, ‘पोखरि’, ‘कछार’, ‘भकरार’, ‘झुरमुट’, ‘बखारी’, ‘खरिहान’, ‘मोजर’, ‘पुरइन’, ‘मखान’ जकाँ शब्द काव्यभाषाकेँ स्थानीय देह दैत अछि।

तथापि शुद्ध मैथिली निखारक दृष्टिसँ किछु शब्द आ रूप पुनर्विचार योग्य अछि। ‘कूपक डोर’केँ ‘इनारक डोर’; ‘बरामदाक कुर्सी’ तथा बरामदा-प्रयोगकेँ ‘ओसाराक कुर्सी/ओसारा’; ‘चाय’केँ ‘चाह’; ‘कमरा’ आ ‘कोठरी’केँ प्रसंगानुसार ‘कोठली’; ‘भूल’केँ ठाम-ठाम ‘चूक’ अथवा ‘बिसर’ मूलक मैथिली रूपसँ बदलल जा सकैत अछि। ई सुझाव अर्थ-प्रसंग जाँचि लागू हो; मूल उद्धरण बदलि कऽ प्रस्तुत नहि कएल जाए।

समकालीन सांस्कृतिक शब्द—[बार्बी], [फैशन], [टीम], [डिजिटल], [स्क्रीन], [लाइक], [स्टेशन], [रेडियो], [टिकट]—जँ जानि-बूझि आधुनिक जीवनक संकेत रूपेँ राखल जाए तँ समीक्षा-दृष्टिसँ वैध अछि; मुदा प्रकाशनक शुद्ध-मैथिली शैलीमे एहि विदेशी शब्दसभकेँ कोष्ठकमे राखब वा सम्भव मैथिली विकल्प देब संगति बढ़ाएत। रोमन लिपिक प्रत्यक्ष प्रयोग मुख्य काव्य-पाठमे लगभग नहि अछि; प्रारम्भिक प्रकाशकीय सूचनामे मात्र मानकीकृत प्रकाशन-संकेत आ वेब-पता अछि।

१०. शीर्षक-व्यवस्था, पुनरावर्तन आ सम्पादकीय अनुशासन

५९१ गजलमे 47 शीर्षक एहन अछि जे एक बेरसँ बेसी दोहरायल अछि। पुनरावर्तन अपने आपमे दोष नहि; उलटे समान शीर्षकक भीतर समय, प्रसंग वा दृष्टिकोणक परिवर्तन एक श्रृंखलाबद्ध काव्य-प्रयोग बनि सकैत अछि। मुदा अनुक्रमणिका आ उद्धरण-सुविधा लेल दोहरायल शीर्षकक संग गजल क्रमांक अनिवार्य मानल जाए। ‘जाड़क धूप’ चारि बेर, आ किछु शीर्षक तीन बेर धरि अछि; ई तथ्य सम्पादकीय पहचानक आवश्यकता बढ़बैत अछि।

संयोजन-विच्छेदमे सेहो एकरूपता उपयोगी रहत: ‘मोनमे अछि/मोनमेअछि’, ‘घरमे बाजू/घरमेबाजू’, ‘पर्दासँ बाहर/पर्दासँबाहर’, ‘कने आराम/कनेआराम’, ‘एतबे नेह/एतबेनेह’ जकाँ रूपसभक एक मानक तय कएल जाए। एहि निखारसँ उच्चारण बदलत नहि, मुदा पठन-सुगमता आ शब्दरूपक स्थिरता बढ़त।

११. भारतीय काव्यशास्त्रक विस्तृत मूल्यांकन

रसक दृष्टिसँ संकलन एकरस नहि। सामान्य खण्डक आरम्भिक आ मध्य भागमे करुण-शृंगारक संयोग बहुल अछि; प्रकृति-आधारित गजलसभमे शान्त, अद्भुत आ ऋतु-सौन्दर्य; श्रम-विषयक गजलसभमे वीर तथा गरिमा; सामाजिक आलोचनामे रौद्रक हलुक ध्वनि; किशोर खण्डमे उत्साह, हास्य, स्नेह आ शिक्षात्मक शान्ति देखाइत अछि। महत्वपूर्ण ई जे रस स्थायी ‘लेबल’ नहि, शेर-दर-शेर बदलैत अनुभव अछि।

ध्वनिक स्तर पर ‘ओहि पार’, ‘बाँचल अछि’, ‘रहि गेल’, ‘फेर जनमत’, ‘अपूर्णतासँ सीख’ जकाँ शीर्षक अनकहल पूर्वकथा बनबैत अछि। पाठककेँ पूरा घटना नहि कहल जाइत; संकेत, अवशेष आ पुनरुक्ति द्वारा अर्थ बनैत अछि। ई संक्षिप्तता गजल-विधाक अनुकूल अछि।

औचित्यक कसौटी पर लोक-बिम्बसभ अधिकतर स्वाभाविक अछि, कारण ओ पात्रहीन दार्शनिक रूपक नहि, जीवन-प्रसंगसँ उपजल अछि। जखन आधुनिक बाहरी शब्द अचानक लोक-रजिस्टरमे प्रवेश करैत अछि, तखन औचित्य प्रश्न उठैत अछि; मुदा किशोर खण्डमे [स्क्रीन], [लाइक] वा [बार्बी] जकाँ शब्द विषयगत संसारक अंग भएक कारण औचित्य प्राप्त करैत अछि।

१२. पाश्चात्य आलोचनात्मक पठन: रूप, विडम्बना, आवाज आ पाठक

निकट-पाठक दृष्टिसँ दीवानक श्रेष्ठ क्षण ओ अछि जतए साधारण कथनक भीतर विरोधी भाव एक साथ टिकैत अछि—घरक स्मृति आनन्द सेहो अछि आ पीड़ा सेहो; बाढ़ि विनाश सेहो अछि आ पुनर्निर्माणक पृष्ठभूमि सेहो; मौन अनुपस्थिति सेहो अछि आ ‘स्वर’ सेहो; पुरान वस्तु जीर्ण सेहो अछि आ जीवित स्मृति सेहो। एहि तनावकेँ गद्य-सारांशमे घटाओल नहि जा सकैत।

पाठक-सम्बोधनक रूप समयक संग बदलैत अछि। सामान्य खण्डमे ‘अहाँ’, ‘तोहर’, ‘ककरा’, ‘के जानै’ आदि आत्मीय वा अनिश्चित सम्बोधन अछि; किशोर खण्डमे ‘करू’, ‘बुझू’, ‘जाँचू’, ‘सीमा राखू’ जकाँ प्रत्यक्ष सम्बोधन बढ़ैत अछि। एहि बदलावसँ दीवान निजी गीतात्मकता सँ सार्वजनिक नैतिक वार्तालाप दिस गति करैत अछि।

१३. नव्य-न्यायपरक अर्थ-परीक्षा: प्रमाण, सन्देह, भेद

‘साँच’ आ ‘जाँच’क आवर्तन संकलनक उत्तरार्धमे विशेष घनत्व पबैत अछि। नव्य-न्याय दृष्टिसँ एहि रचनासभमे ज्ञानक उत्पत्ति, स्रोतक विश्वसनीयता, कथन आ वस्तुस्थिति, चित्र आ पूर्ण सत्य, लोकप्रिय पुनरावृत्ति आ प्रमाण—ई सभ अलग-अलग सम्बन्ध रूपेँ देखल जा सकैत अछि। ‘सभ दोहराबए’ सत्यक पर्याप्त हेतु नहि; स्रोत, आधार, प्रसंग आ प्रतिपरीक्षण आवश्यक अछि।

निषेधात्मक शीर्षक—‘आब नहि’, ‘एना नहि’, ‘किएक नै’, ‘कहियो नै’, ‘नै झुकब’, ‘नै बदलू’, ‘तुलना नहि’—केवल नकार नहि। नव्य-न्यायक ‘अभाव’ चिन्तनक अनुरूप ई देखब उपयोगी अछि जे कोन वस्तुक, कोन सम्बन्धमे, कोन कालमे निषेध अछि। कवितासभक अर्थ एही विशिष्टतासँ बनैत अछि; सामान्यीकृत ‘नहि’ प्रायः पर्याप्त नहि।

१४. विदेह समानान्तर इतिहास: परम्परा आ समकालीनताक सह-अस्तित्व

दीवानक ऐतिहासिक महत्त्व एतय अछि जे ग्रामीण मिथिला, आधुनिक नगर, प्रवासी अनुभव आ जालजगत एक-दोसरा के हटबैत नहि, एकहि पाठ-संसारमे समानान्तर रहैत अछि। ‘पुरनका रेडियो’ आ ‘स्क्रीनक बाहर’, ‘डाकघर’ आ ‘समाचार’, ‘कागजक नाव’ आ ‘जालजगत’, ‘करघाक धुन’ आ ‘डिजिटल विराम’—ई युग्म सभ स्वतः इतिहासलेखनक सामग्री अछि।

एहि पद्धतिमे ‘इतिहास’ केवल तिथि-क्रम नहि, वस्तु-क्रम सेहो अछि। कोन वस्तु जीवनमे प्रवेश करैत अछि, कोन वस्तु स्मृति बनैत अछि, कोन शब्द नब पीढ़ीक भाषा बनैत अछि—ई सभ परिवर्तन काव्य-पाठमे दर्ज अछि। तें दीवान लोक-संस्कृतिक स्थिर चित्र नहि, संक्रमणशील मिथिलाक बहु-कालिक अभिलेख जकाँ पढ़ल जा सकैत अछि।

१५. आलोचनात्मक उपलब्धि आ सीमा

मुख्य उपलब्धि पाँच स्तर पर अछि: मैथिली गजलकेँ विराट संख्या आ विषय-विस्तार देब; स्थानीय भू-दृश्य आ श्रम-वस्तुकेँ केन्द्रीय काव्य-बिम्ब बनायब; उच्चारणाधारित छन्द-विवेचन प्रस्तुत करब; सामान्य गीतात्मकता सँ किशोर नागरिक-विवेक धरि विस्तार; आ परम्परा तथा डिजिटल वर्तमानकेँ एकहि दीवानमे समानान्तर राखब।

मुख्य सीमा सेहो स्पष्ट अछि। विशाल संकलनमे सूत्र-वाक्य, आदेशात्मक क्रिया आ समान रदीफक कारण किछु रचनामे भाव-पूर्वानुमेयता आबि सकैत अछि। शीर्षक-पुनरावर्तन पाठकीय स्मृति पर दबाव बढ़बैत अछि। किछु गजलमे मात्रा-सीमा बहुत विस्तृत घोषित अछि; एहन ठाम वास्तविक गायन-पाठक ध्वनि-दस्तावेज उपलब्ध हो तँ छन्दीय सत्यापन अधिक कठोर बनत। किछु विदेशी वा मानक-हिन्दी शब्द शुद्ध मैथिली रजिस्टरक संग असमानता पैदा करैत अछि। ई सीमा संकलनक मूल्य घटबैत नहि; अगिला सम्पादकीय संस्करण लेल कार्यसूची प्रदान करैत अछि।

१६. निखार-अनुशंसा

• शीर्ष-पृष्ठक ‘१ कता · २ रुबाइ’ विवरण मुख्य पाठक वास्तविक संरचना सँ मिलान कऽ सुधारू।

• दोहरायल शीर्षकसभक अनुक्रमणिका आ उद्धरणमे गजल क्रमांक सदा संग राखू।

• ‘कूप’, ‘बरामदा’, ‘चाय’, ‘कमरा/कोठरी’, ‘भूल’ जकाँ रूपकेँ अपन निर्धारित मैथिली शैली अनुसार क्रमशः ‘इनार’, ‘ओसारा’, ‘चाह’, ‘कोठली’, आ प्रसंगानुसार ‘चूक/बिसर’ रूपमे जाँचू।

• विदेशी सांस्कृतिक/तकनीकी शब्द राखबाक आवश्यकता हो तँ [कोष्ठक] नीति एकरूप रूपेँ लागू करू।

• संयुक्त रूप आ परसर्ग-लेखन—‘मोनमे’, ‘घरमे’, ‘पर्दासँ’, ‘एतबे’—लेल एक सम्पादकीय मानक बनाउ।

• असामान्य मिसरा-संख्या वाला गजलसभक शेर-विभाजन आ पृष्ठ-लेआउट पुनः जाँचू।

• मात्रा-क्रमक बहुत विस्तृत सीमा वाला गजलमे गेय-पाठक आधार पर पुनर्गणना करब उपयोगी होएत।

१७. निष्कर्ष

‘दीवान-ए-विदेह’ मैथिली गजलकेँ केवल पारम्परिक प्रेमगीतक उत्तराधिकार रूपेँ नहि, समकालीन मैथिली जीवनक बहुविषयी काव्य-माध्यम रूपेँ स्थापित करबाक प्रयास अछि। एकर केन्द्रमे ‘स्मृति’ अछि, मुदा स्मृति निष्क्रिय नॉस्टेल्जिया नहि; ओ घर, गाम, श्रम, नदी, ऋतु, भाषा, सम्बन्ध आ बदलैत माध्यमसभक बीच आत्म-पहिचानक खोज अछि।

भारतीय काव्यशास्त्र एकर ध्वनि, रस, वक्रता आ औचित्य स्पष्ट करैत अछि; पाश्चात्य निकट-पाठ रूप-आशयक अन्तर्सम्बन्ध आ विरोधाभास खोलैत अछि; नव्य-न्याय प्रश्न, सन्देह, प्रमाण आ भेदक भाषिक अनुशासन देखबैत अछि; विदेह समानान्तर ऐतिहासिक पद्धति पुरनका रेडियो सँ [स्क्रीन] धरि, करघा सँ जालजगत धरि, कमला-कोसी सँ समाचार-स्रोत धरि अनेक कालरेखाकेँ एक संग पढ़ैत अछि। चारू दृष्टि मिलि ई प्रमाणित करैत अछि जे दीवानक वास्तविक उपलब्धि ओकर संख्या मात्र नहि, बल्कि मैथिली अनुभवक विविध रजिस्टरकेँ गजल-विधामे समेटबाक क्षमता अछि।

परिशिष्ट : सम्पूर्ण रचना-दर-रचना समीक्षात्मक अभिलेख

एहि परिशिष्टक उद्देश्य ई सुनिश्चित करब अछि जे पोथीक कोनो रचना समीक्षा-सूचीसँ बाहर नहि रहए। प्रत्येक प्रविष्टिमे रचनाक क्रम/शीर्षक, उपलब्ध औपचारिक सूचना, आरम्भिक पंक्ति आ मुख्य अर्थ-क्षेत्र देल गेल अछि। आरम्भिक पंक्ति मूल पाठक पहचान-साक्ष्य रूपेँ उद्धृत अछि।

रुबाइ — आरम्भ: “कारी अनहार मेघ, आ नै होइए”। प्रारम्भिक काव्य-रचना; संक्षिप्त रूप, बिम्ब-घनत्व आ कथ्य-संघनन।

कता १ — आरम्भ: “एक्केटा गप बुझबैत साँझ भेल बुझाइए”। प्रारम्भिक काव्य-रचना; संक्षिप्त रूप, बिम्ब-घनत्व आ कथ्य-संघनन।

कता २ — आरम्भ: “सबहक सपना समेटल आ आगाँ बढ़लौं”। प्रारम्भिक काव्य-रचना; संक्षिप्त रूप, बिम्ब-घनत्व आ कथ्य-संघनन।

गजल 1 — मोन पड़ैए। मात्रा-क्रम: २३–२४; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: मोन पड़ैए। आरम्भ: “साँझ उतरते तँ अपन दुआर मोन पड़ैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 2 — रहि गेल। मात्रा-क्रम: १९–२०; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: रहि गेल। आरम्भ: “जे कहबाक छल, से बात तँ रहि गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 3 — आउ ने। मात्रा-क्रम: १९–२०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: आउ ने। आरम्भ: “एहि सुनसान घरक दुआर आउ ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 4 — कहियो नै। मात्रा-क्रम: १९–२०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कहियो नै। आरम्भ: “मोन बेचब ई व्यापार कहियो नै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 5 — अहाँक बाद। मात्रा-क्रम: २२; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: अहाँक बाद। आरम्भ: “घर तँ घर रहल, नै संसार अहाँक बाद”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 6 — सुनैछी। मात्रा-क्रम: १९–२०; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: सुनैछी। आरम्भ: “खिड़की पर एखन बरसात सुनैछी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 7 — बदलि गेल। मात्रा-क्रम: १८; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: बदलि गेल। आरम्भ: “ओही ठाम छी, गाम बदलि गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 8 — रहि जाउ। मात्रा-क्रम: २२–२४; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: रहि जाउ। आरम्भ: “सभ बात तँ बिसरि जाउ, नेहक सार रहि जाउ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 9 — कतेक दिन। मात्रा-क्रम: १८–२०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कतेक दिन। आरम्भ: “मौनक बोझ कने उधार कतेक दिन”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 10 — बाकी अछि। मात्रा-क्रम: १९–२०; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: बाकी अछि। आरम्भ: “राति गेलो नै, ई भोर बाकी अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 11 — एखन धरि। मात्रा-क्रम: १८–२४; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: एखन धरि। आरम्भ: “तोहर कहल ओ बात एखन धरि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 12 — कहू ने। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: कहू ने। आरम्भ: “मोनक भीतर कोन दुआर कहू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 13 — के जानै। मात्रा-क्रम: १७–२०; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: के जानै। आरम्भ: “ककर मोनमे कोन बात के जानै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 14 — राति भरि। मात्रा-क्रम: २०–२६; काफिया-रदीफ: –आइल · रदीफ: राति भरि। आरम्भ: “तोहर सुर मोनमे समाइल राति भरि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 15 — रहए दिअ। मात्रा-क्रम: १७–२२; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: रहए दिअ। आरम्भ: “एक पुरनका दुआर रहए दिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 16 — आइयो। मात्रा-क्रम: १६–२०; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: आइयो। आरम्भ: “साँझ होइते हमर दुआर आइयो”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 17 — कतेक दूर। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: कतेक दूर। आरम्भ: “घर लग अछि, दुआर कतेक दूर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 18 — एखनहु। मात्रा-क्रम: १५–२०; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: एखनहु। आरम्भ: “मोनमे बचल आस एखनहु”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 19 — फेर भेटत। मात्रा-क्रम: १६–२०; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: फेर भेटत। आरम्भ: “जतऽ छुटल दुआर फेर भेटत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 20 — रहबे करत। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –ओर · रदीफ: रहबे करत। आरम्भ: “राति कतबो, भोर रहबे करत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 21 — घुरि आउ ने। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: घुरि आउ ने। आरम्भ: “साँझ गुम्म भेल, थाकल दुआर घुरि आउ ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 22 — कहू तँ सही। मात्रा-क्रम: १८–२१; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: कहू तँ सही। आरम्भ: “ककरा देलियै ई बात कहू तँ सही”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 23 — मोनमे अछि। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: मोनमे अछि। आरम्भ: “गाम घुरबाक आस मोनमे अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 24 — बदलि गेलै। मात्रा-क्रम: १९–२३; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: बदलि गेलै। आरम्भ: “घर ओही ठाम, मुदा दुआर बदलि गेलै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 25 — बाकी अछि। मात्रा-क्रम: १७–२०; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: बाकी अछि। आरम्भ: “टूटल स्वरमे एक गीत बाकी अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 26 — जाइत छी। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –रि · रदीफ: जाइत छी। आरम्भ: “भीड़मे अपन नाम बिसरि जाइत छी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 27 — बाँचल अछि। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: बाँचल अछि। आरम्भ: “मोनमे कने आस बाँचल अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 28 — नै भूलब। मात्रा-क्रम: १७–२१; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: नै भूलब। आरम्भ: “पहिल बेर खुलल ओ दुआर नै भूलब”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 29 — देखै छी। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –आल · रदीफ: देखै छी। आरम्भ: “गामक बदलैत हाल देखै छी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 30 — बाँचि रहल अछि। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: बाँचि रहल अछि। आरम्भ: “टूटल घरमे एक गीत बाँचि रहल अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 31 — याद रहत। मात्रा-क्रम: २०–२४; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: याद रहत। आरम्भ: “जे दिन छोड़लौं घरक दुआर याद रहत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 32 — बाजि उठैए। मात्रा-क्रम: २१–२५; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: बाजि उठैए। आरम्भ: “साँझ उतरैते पुरनका गीत बाजि उठैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 33 — नै बिकत। मात्रा-क्रम: १५–२५; काफिया-रदीफ: –आन · रदीफ: नै बिकत। आरम्भ: “पाइ बढ़ि जाए, मुदा मान नै बिकत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 34 — घुरि अबैए। मात्रा-क्रम: १९–२४; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: घुरि अबैए। आरम्भ: “मेह पड़िते ओ बहार घुरि अबैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 35 — ठाढ़ रहत। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: ठाढ़ रहत। आरम्भ: “सभटा टूटत, कने आस ठाढ़ रहत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 36 — सुनाइ पड़ैए। मात्रा-क्रम: १९–२५; काफिया-रदीफ: –ओर · रदीफ: सुनाइ पड़ैए। आरम्भ: “मौन भीतर कतेक शोर सुनाइ पड़ैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 37 — बुझाइ पड़ैए। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: बुझाइ पड़ैए। आरम्भ: “चुप्पीमे सेहो बात बुझाइ पड़ैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 38 — छोड़ि देलहुँ। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: छोड़ि देलहुँ। आरम्भ: “तोहर घुरबाक आस छोड़ि देलहुँ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 39 — लिखैत रहू। मात्रा-क्रम: १७–२४; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: लिखैत रहू। आरम्भ: “कागज पर अपन गीत लिखैत रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 40 — जागि रहल अछि। मात्रा-क्रम: १९–२५; काफिया-रदीफ: –ओर · रदीफ: जागि रहल अछि। आरम्भ: “राति बीतल, कने भोर जागि रहल अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 41 — अछि किएक। मात्रा-क्रम: १७–२०; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: अछि किएक। आरम्भ: “चान एतेक उदास अछि किएक”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 42 — रहि गेल। मात्रा-क्रम: १४–१९; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: रहि गेल। आरम्भ: “अधकही ओ बात रहि गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 43 — बाजू ने। मात्रा-क्रम: १४–१९; काफिया-रदीफ: –आल · रदीफ: बाजू ने। आरम्भ: “मोनक असली हाल बाजू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 44 — के कहत। मात्रा-क्रम: १४–१८; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: के कहत। आरम्भ: “मौन भीतर कोन बात के कहत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 45 — एना नहि। मात्रा-क्रम: १४–१७; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: एना नहि। आरम्भ: “नेहकेँ व्यापार एना नहि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 46 — धीरे-धीरे। मात्रा-क्रम: १४–१९; काफिया-रदीफ: –ल · रदीफ: धीरे-धीरे। आरम्भ: “दिन हमर ढलल धीरे-धीरे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 47 — एहि शहरमे। मात्रा-क्रम: १९–२२; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: एहि शहरमे। आरम्भ: “दामक चर्चा, भूखक बात एहि शहरमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 48 — तखन बुझलहुँ। मात्रा-क्रम: १५–१९; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: तखन बुझलहुँ। आरम्भ: “अहाँ चुप भेलहुँ, बात तखन बुझलहुँ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 49 — मोनमे रहत। मात्रा-क्रम: १९–२३; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: मोनमे रहत। आरम्भ: “जाबत देह, कने आस मोनमे रहत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 50 — गीत बनत। मात्रा-क्रम: १५–२०; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: गीत बनत। आरम्भ: “जँ हृदय छूबत, बात गीत बनत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 51 — कहब ने। मात्रा-क्रम: १५–१९; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: कहब ने। आरम्भ: “मोनक साँच बात कहब ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 52 — भेल अछि। मात्रा-क्रम: १५–१७; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: भेल अछि। आरम्भ: “मोन किएक उदास भेल अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 53 — आब नहि। मात्रा-क्रम: १६–२०; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: आब नहि। आरम्भ: “नेहक एहन व्यापार आब नहि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 54 — याद अबैए। मात्रा-क्रम: १७–२१; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: याद अबैए। आरम्भ: “मेहक पहिल बरसात याद अबैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 55 — फेर आउ। मात्रा-क्रम: १७; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: फेर आउ। आरम्भ: “खुलल अछि ई दुआर फेर आउ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 56 — छूटि गेल। मात्रा-क्रम: १५–१९; काफिया-रदीफ: –आम · रदीफ: छूटि गेल। आरम्भ: “रेल चढ़िते गाम छूटि गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 57 — रहैत अछि। मात्रा-क्रम: १५–१७; काफिया-रदीफ: –ईर · रदीफ: रहैत अछि। आरम्भ: “मौन भीतर पीर रहैत अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 58 — ककरा कहू। मात्रा-क्रम: १५–१९; काफिया-रदीफ: –आल · रदीफ: ककरा कहू। आरम्भ: “गामक एहन हाल ककरा कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 59 — बुझाइत अछि। मात्रा-क्रम: १३–१८; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: बुझाइत अछि। आरम्भ: “अन्हारो रात बुझाइत अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 60 — रहि जेतै। मात्रा-क्रम: १३–१७; काफिया-रदीफ: –ईत · रदीफ: रहि जेतै। आरम्भ: “नाम मेटत, गीत रहि जेतै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 61 — एहि बेर। मात्रा-क्रम: १५–२१; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: एहि बेर। आरम्भ: “साँझ फेर खुजल दुआर एहि बेर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 62 — कहैए। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: कहैए। आरम्भ: “मौन भीतर बहुत बात कहैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 63 — रहू ने। मात्रा-क्रम: १६–२३; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: रहू ने। आरम्भ: “सभ बन्द हो, एक दुआर रहू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 64 — किएक नै। मात्रा-क्रम: १५–२०; काफिया-रदीफ: –ओर · रदीफ: किएक नै। आरम्भ: “राति अछि तँ भोर किएक नै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 65 — आबो अछि। मात्रा-क्रम: १५–१९; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: आबो अछि। आरम्भ: “घुरि एबाक आस आबो अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 66 — देखू ने। मात्रा-क्रम: १६–१९; काफिया-रदीफ: –आल · रदीफ: देखू ने। आरम्भ: “खेतक एखन हाल देखू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 67 — घुरि चलू। मात्रा-क्रम: १६–२०; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: घुरि चलू। आरम्भ: “बहुत भेल शहरक दुआर, घुरि चलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 68 — कहियो-कहियो। मात्रा-क्रम: २०–२३; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: कहियो-कहियो। आरम्भ: “चुप्पी बनि जाइत बात कहियो-कहियो”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 69 — तखनियो। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: तखनियो। आरम्भ: “स्वर टूटए, रहत गीत तखनियो”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 70 — सुनैत रहू। मात्रा-क्रम: १६–२३; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: सुनैत रहू। आरम्भ: “मौन भीतरक बात सुनैत रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 71 — फेरो कहू। मात्रा-क्रम: २५–२९; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: फेरो कहू। आरम्भ: “जे गप मोनमे दाबि रखने छी, बात फेरो कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 72 — एखन बाकी अछि। मात्रा-क्रम: २६–३०; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: एखन बाकी अछि। आरम्भ: “हारि कऽ लौटि एलहुँ, तइयो आस एखन बाकी अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 73 — लगैए। मात्रा-क्रम: १८–२४; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: लगैए। आरम्भ: “तोहर स्वर सुनिते पुरनका दुआर लगैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 74 — कोना होएत। मात्रा-क्रम: २१–३०; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: कोना होएत। आरम्भ: “नाव छै, धार तेज—एहि धारक पार कोना होएत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 75 — रहि जाए। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: रहि जाए। आरम्भ: “शब्द थाकए, मुदा गीत रहि जाए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 76 — ओहि पार। मात्रा-क्रम: १७–२०; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: ओहि पार। आरम्भ: “नाव एतऽ, आँखिक नीर ओहि पार”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 77 — बुझि गेलहुँ। मात्रा-क्रम: १५–१९; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: बुझि गेलहुँ। आरम्भ: “अहाँ चुप भेलहुँ, बात बुझि गेलहुँ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 78 — एहि रातिमे। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: एहि रातिमे। आरम्भ: “के खोललक मोनक दुआर एहि रातिमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 79 — आब की। मात्रा-क्रम: १५–१९; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: आब की। आरम्भ: “टूटि गेल जँ विश्वास, आब की”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 80 — सुनि लिअ। मात्रा-क्रम: १५–१९; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: सुनि लिअ। आरम्भ: “मोनक धीमी पुकार सुनि लिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 81 — एखनहुँ। मात्रा-क्रम: १५–२०; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: एखनहुँ। आरम्भ: “घुरि एबाक आस एखनहुँ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 82 — घुरि आउ। मात्रा-क्रम: १७–२१; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: घुरि आउ। आरम्भ: “साँझ फेर खोललक दुआर, घुरि आउ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 83 — कहियो ने। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: कहियो ने। आरम्भ: “मोनक असली बात कहियो ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 84 — मोन मानै नहि। मात्रा-क्रम: १९–२२; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: मोन मानै नहि। आरम्भ: “एतेक जल्दी हार, मोन मानै नहि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: सामाजिक नैतिकता।

गजल 85 — रहि गेलै। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: रहि गेलै। आरम्भ: “शब्द थमल, एक गीत रहि गेलै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 86 — आब कहू। मात्रा-क्रम: १७–२२; काफिया-रदीफ: –आल · रदीफ: आब कहू। आरम्भ: “मोनक असली हाल आब कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 87 — बिसरब नहि। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: बिसरब नहि। आरम्भ: “पहिल बेर खुलल ओ दुआर बिसरब नहि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 88 — तइयो। मात्रा-क्रम: १४–२४; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: तइयो। आरम्भ: “सभटा बाट बन्द, आस तइयो”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 89 — ओहि दिस। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: ओहि दिस। आरम्भ: “साँझ खोललक दुआर ओहि दिस”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 90 — गीत बनि जाए। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: गीत बनि जाए। आरम्भ: “जँ हृदय छूबि जाए, बात गीत बनि जाए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 91 — कने ठहरू। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: कने ठहरू। आरम्भ: “राति एखन अछि, दुआर कने ठहरू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; किशोर-अनुशासन।

गजल 92 — एखन धरि। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: एखन धरि। आरम्भ: “जे कहबाक छल, ओ बात एखन धरि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 93 — कने सुनू। मात्रा-क्रम: १५–२३; काफिया-रदीफ: –ओर · रदीफ: कने सुनू। आरम्भ: “मौन भीतरक शोर कने सुनू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 94 — रहए दिअ। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: रहए दिअ। आरम्भ: “सभ हिसाबमे किछु उधार रहए दिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 95 — के जानै। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: के जानै। आरम्भ: “ककर मोनमे कोन बात के जानै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 96 — फेर भेटत। मात्रा-क्रम: १७–२१; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: फेर भेटत। आरम्भ: “जतऽ छुटल छल ओ दुआर फेर भेटत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 97 — एना किए। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: एना किए। आरम्भ: “मोनमे एतेक पियास एना किए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 98 — आबो रहत। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: आबो रहत। आरम्भ: “शब्द थाकत, गीत आबो रहत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 99 — नै भूलब। मात्रा-क्रम: १८–२१; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: नै भूलब। आरम्भ: “पहिल बेर खुलल ओ दुआर नै भूलब”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 100 — बाँचल रहत। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: बाँचल रहत। आरम्भ: “नाम मेटत, गीत बाँचल रहत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 101 — मानक दाम। मात्रा-क्रम: २०; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: कहियो नै। आरम्भ: “नेहकेँ बनेब व्यापार कहियो नै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 102 — घरक दुआर। मात्रा-क्रम: २४; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: मोन पड़ैए। आरम्भ: “राति उतरते तँ घरक दुआर मोन पड़ैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 103 — रहि जाए। मात्रा-क्रम: २०; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: रहि जाए। आरम्भ: “नाम मेटए मुदा गीत रहि जाए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 104 — कतेक दिन। मात्रा-क्रम: २०; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: कतेक दिन। आरम्भ: “बोलक आगाँ तँ दीवार कतेक दिन”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; समकालीन माध्यम।

गजल 105 — एखनहुँ। मात्रा-क्रम: २०; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: एखनहुँ। आरम्भ: “हारि गेलहुँ, ई बचल आस एखनहुँ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 106 — सुनि लिअ। मात्रा-क्रम: १६; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: सुनि लिअ। आरम्भ: “मोनक धीमी पुकार सुनि लिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 107 — तइयो। मात्रा-क्रम: १६; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: तइयो। आरम्भ: “सभटा बाट बन्द, आस तइयो”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 108 — आब कहू। मात्रा-क्रम: १८; काफिया-रदीफ: –आल · रदीफ: आब कहू। आरम्भ: “मोनक तँ असली हाल आब कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 109 — नै भूलब। मात्रा-क्रम: २०; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: नै भूलब। आरम्भ: “बाढ़िक रातिक ओ हँकार नै भूलब”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 110 — बाँचल रहत। मात्रा-क्रम: २०; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: बाँचल रहत। आरम्भ: “नाम मेटत, मुदा गीत बाँचल रहत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 111 — कने बाजू। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: कने बाजू। आरम्भ: “मोनमे उठल पुकार कने बाजू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 112 — नै कहब। मात्रा-क्रम: १५–२०; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: नै कहब। आरम्भ: “नेहकेँ व्यापार नै कहब”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 113 — याद आबैए। मात्रा-क्रम: १७–२२; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: याद आबैए। आरम्भ: “साँझ पड़िते दुआर याद आबैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 114 — बुझू कने। मात्रा-क्रम: १६–२०; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: बुझू कने। आरम्भ: “मौन भीतरक बात बुझू कने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 115 — फेर होएत। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: फेर होएत। आरम्भ: “सूखल गाछिमे बहार फेर होएत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 116 — ओहि ठाम। मात्रा-क्रम: १५–२०; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: ओहि ठाम। आरम्भ: “जतऽ बचल अछि आस ओहि ठाम”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 117 — रहैत अछि। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: रहैत अछि। आरम्भ: “मौन भीतर एक गीत रहैत अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 118 — कनी बात। मात्रा-क्रम: २२–२५; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: कहू ने। आरम्भ: “जिया मौन कनी देर, जगत सार कहू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 119 — अपन मान। मात्रा-क्रम: २३–२५; काफिया-रदीफ: –आन · रदीफ: रखू ने। आरम्भ: “जगत बीच अलग चाल, अपन मान रखू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 120 — कनी बाट। मात्रा-क्रम: २३–२५; काफिया-रदीफ: –आट · रदीफ: चलै छी। आरम्भ: “जिया मौन कनी देर, कनी बाट चलै छी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 121 — जतन गीत। मात्रा-क्रम: २२–२५; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: लिखै छी। आरम्भ: “जिया मे कनी पीर, जतन गीत लिखै छी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 122 — नेहक थाह। मात्रा-क्रम: २२–२५; काफिया-रदीफ: –एह · रदीफ: बुझू ने। आरम्भ: “नयन नीर जिया मौन, तकर नेह बुझू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 123 — ओहि पार। मात्रा-क्रम: २२–२५; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: तकै छी। आरम्भ: “जिया मौन कनी देर, नदी पार तकै छी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 124 — गामक सुर। मात्रा-क्रम: २३–२५; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: गबै छी। आरम्भ: “उगल भोर पवन संग, जतन गीत गबै छी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 125 — कने रहू। मात्रा-क्रम: १८–२४; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: कने रहू। आरम्भ: “साँझ एखन उतरि रहल, दुआर कने रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 126 — भूलि नहि जाउ। मात्रा-क्रम: १९–२७; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: भूलि नहि जाउ। आरम्भ: “जे घर पहिल बेर खोललक दुआर, भूलि नहि जाउ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 127 — ओतबे काफी। मात्रा-क्रम: १९–२३; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: ओतबे काफी। आरम्भ: “मोनसँ कहल एक बात ओतबे काफी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 128 — ककरो लेल। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: ककरो लेल। आरम्भ: “लिखि दिअ एकटा गीत ककरो लेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 129 — एखनो सुनू। मात्रा-क्रम: १७–२१; काफिया-रदीफ: –ओर · रदीफ: एखनो सुनू। आरम्भ: “मौन भीतरक शोर एखनो सुनू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 130 — फेर लिखब। मात्रा-क्रम: १७–२४; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: फेर लिखब। आरम्भ: “जे बात एखन अधूरी, विचार फेर लिखब”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 131 — फेरो सही। मात्रा-क्रम: १९–२२; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: फेरो सही। आरम्भ: “आइ नहि तँ काल्हि बात फेरो सही”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 132 — घर चलू। मात्रा-क्रम: २०–२३; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: घर चलू। आरम्भ: “साँझ खोललक पुरनका दुआर, घर चलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 133 — साँच कहू। मात्रा-क्रम: १६–२३; काफिया-रदीफ: –आत · रदीफ: साँच कहू। आरम्भ: “मोनमे जे अछि ओ बात, साँच कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 134 — रहि सकैए। मात्रा-क्रम: १९–२५; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: रहि सकैए। आरम्भ: “सभ टूटलापर कने आस रहि सकैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; किशोर-अनुशासन।

गजल 135 — एतबे रहय। मात्रा-क्रम: १९–२३; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: एतबे रहय। आरम्भ: “कंठमे बाँचल गीत एतबे रहय”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 136 — फेर जनमत। मात्रा-क्रम: २०–२५; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: फेर जनमत। आरम्भ: “सूखल गाछिमे एक दिन बहार फेर जनमत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 137 — आब नहि। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: आब नहि। आरम्भ: “मोनपर राखब उधार आब नहि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 138 — तखन देखब। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: तखन देखब। आरम्भ: “राति बीतत, खुलत दुआर, तखन देखब”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 139 — कने बचाउ। मात्रा-क्रम: १९–२४; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: कने बचाउ। आरम्भ: “घर बदलू, मुदा दुआर कने बचाउ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 140 — नै बदलू। मात्रा-क्रम: १६–१९; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: नै बदलू। आरम्भ: “दिन बदलए, मुदा प्यार नै बदलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 141 — एखनो अछि। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –आस · रदीफ: एखनो अछि। आरम्भ: “घुरि एबाक कने आस एखनो अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 142 — फेर गाबू। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: फेर गाबू। आरम्भ: “स्वर थाकल तँ कने गीत फेर गाबू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 143 — घरमे बाजू। मात्रा-क्रम: १९–२३; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: घरमे बाजू। आरम्भ: “अपन भाषाक पुकार घरमे बाजू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 144 — संग रहू। मात्रा-क्रम: १७–२४; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: संग रहू। आरम्भ: “दिन कठिन हो तँ बनि आधार संग रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 145 — फेर उठू। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: फेर उठू। आरम्भ: “आइ भेटल जँ हार, फेर उठू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 146 — कने लिखू। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: कने लिखू। आरम्भ: “धूरिमे मेटल नाम कने लिखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 147 — तइयो चलू। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: तइयो चलू। आरम्भ: “धूरि भरल अछि राह, तइयो चलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 148 — रहय दिअ। मात्रा-क्रम: १४–२३; काफिया-रदीफ: –ोल · रदीफ: रहय दिअ। आरम्भ: “घरमे अपन बोल रहय दिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 149 — ककरा कहब। मात्रा-क्रम: १७–२१; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: ककरा कहब। आरम्भ: “मोनमे जागल पीर ककरा कहब”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 150 — फेर आबि गेल। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: फेर आबि गेल। आरम्भ: “मेह पड़िते माटिक रंग फेर आबि गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 151 — नै झुकब। मात्रा-क्रम: १५–२२; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: नै झुकब। आरम्भ: “भूख सहब, मुदा मान नै झुकब”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 152 — मोनमे रहत। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ेर · रदीफ: मोनमे रहत। आरम्भ: “भेट भेल एक बेर मोनमे रहत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; किशोर-अनुशासन।

गजल 153 — कने छोड़ू। मात्रा-क्रम: १६–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कने छोड़ू। आरम्भ: “मोनपर एतेक भार कने छोड़ू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 154 — समय कहत। मात्रा-क्रम: १७–२४; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: समय कहत। आरम्भ: “के सही छल, के गलत—ई बात समय कहत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 155 — संग बाँचू। मात्रा-क्रम: १७–२१; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: संग बाँचू। आरम्भ: “दुखक दिनमे मीतक संग बाँचू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 156 — नै बिसरू। मात्रा-क्रम: १५–२४; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: नै बिसरू। आरम्भ: “जे हाथ देलक नाम, नै बिसरू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 157 — एना रहू। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: एना रहू। आरम्भ: “मोनमे कने गीत, एना रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 158 — फेर बजत। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: फेर बजत। आरम्भ: “मौन बहुत अछि, मुदा शोर फेर बजत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 159 — अपन रहू। मात्रा-क्रम: १४–२३; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: अपन रहू। आरम्भ: “दाम बढ़ए, मुदा मान अपन रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 160 — धीरे चलू। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ेर · रदीफ: धीरे चलू। आरम्भ: “बाट लम्बा अछि फेर, धीरे चलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 161 — चिट्ठी खोलू। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: चिट्ठी खोलू। आरम्भ: “बहुत दिनक दबल बात, चिट्ठी खोलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 162 — धार कहैए। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: धार कहैए। आरम्भ: “चुप्पीमे सेहो नीर, धार कहैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 163 — मान रखू। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: मान रखू। आरम्भ: “कठिन दिनमे जान, मान रखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 164 — मौन सुनू। मात्रा-क्रम: १५–२३; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: मौन सुनू। आरम्भ: “शब्द थाकल अछि, शोर—मौन सुनू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 165 — पोथी बाँचू। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पोथी बाँचू। आरम्भ: “शब्दमे अपन विचार, पोथी बाँचू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 166 — घुरि देखू। मात्रा-क्रम: १७–२२; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: घुरि देखू। आरम्भ: “जेठक धूरिमे छुटल दुआर, घुरि देखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 167 — धीरे कहू। मात्रा-क्रम: १८–२४; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: धीरे कहू। आरम्भ: “अधरमे रहि गेल बात, धीरे कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 168 — जगैत रहू। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: जगैत रहू। आरम्भ: “आँखिमे कने आस, जगैत रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; किशोर-अनुशासन।

गजल 169 — याद रहत। मात्रा-क्रम: १५–२४; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: याद रहत। आरम्भ: “धूरिमे मेटल नाम याद रहत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 170 — मोन खोलू। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ोल · रदीफ: मोन खोलू। आरम्भ: “रूसल छी तँ अपन बोल, मोन खोलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 171 — ठाढ़ रहू। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: ठाढ़ रहू। आरम्भ: “टूटि नहि जाए मान, ठाढ़ रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 172 — एतबे बहुत। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: एतबे बहुत। आरम्भ: “लोकक ओठपर गीत, एतबे बहुत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 173 — घुरि आबू। मात्रा-क्रम: १४–२६; काफिया-रदीफ: –ेर · रदीफ: घुरि आबू। आरम्भ: “बहुत भेल ई देर, घुरि आबू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 174 — कने बैसू। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कने बैसू। आरम्भ: “उमेर देलक कने भार, कने बैसू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 175 — नामसँ आगाँ। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: सँ आगाँ। आरम्भ: “मनुखक मोल अछि नामसँ आगाँ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 176 — एखनो बाँचल अछि। मात्रा-क्रम: १९–२४; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: एखनो बाँचल अछि। आरम्भ: “पुरनका अँचरक सुवास एखनो बाँचल अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 177 — मौन राखू। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: मौन राखू। आरम्भ: “सभ बातपर नहि शोर, मौन राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 178 — फेर पढ़ू। मात्रा-क्रम: १५–२३; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: फेर पढ़ू। आरम्भ: “पुरनका पन्नाक विचार, फेर पढ़ू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 179 — रहय। मात्रा-क्रम: ११–२५; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: रहय। आरम्भ: “रोष रहय, मुदा प्रीत रहय”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; सामाजिक नैतिकता।

गजल 180 — आजसँ फेर। मात्रा-क्रम: १६–२६; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: आजसँ फेर। आरम्भ: “बन्द बुझायल राह खोलू आजसँ फेर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 181 — एखनो चलू। मात्रा-क्रम: १८–२४; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: एखनो चलू। आरम्भ: “थाकल पएरमे बचल राह, एखनो चलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 182 — नाम लिखू। मात्रा-क्रम: १५–२४; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: नाम लिखू। आरम्भ: “जे हाथ दिनभरि करै काम, नाम लिखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 183 — घरमे रहय। मात्रा-क्रम: १६–२६; काफिया-रदीफ: –ोल · रदीफ: घरमे रहय। आरम्भ: “अपन माइक सहज बोल घरमे रहय”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 184 — संग रहत। मात्रा-क्रम: १७–२४; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: संग रहत। आरम्भ: “कठिन दिनमे जे आधार संग रहत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 185 — खोलि देखू। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: खोलि देखू। आरम्भ: “पुरनका चिट्ठीक बात, खोलि देखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 186 — चुप नहि रहू। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: चुप नहि रहू। आरम्भ: “मोनमे उठल पुकार, चुप नहि रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 187 — फेर शुरू करू। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: फेर शुरू करू। आरम्भ: “एक नब प्रयास, फेर शुरू करू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 188 — देर भऽ गेल। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: देर भऽ गेल। आरम्भ: “मोनमे दबि रहल बात, देर भऽ गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 189 — फेर भेटू। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –ेर · रदीफ: फेर भेटू। आरम्भ: “ई विदा अन्तिम नहि, एक बेर फेर भेटू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 190 — कने राखू। मात्रा-क्रम: १७–२२; काफिया-रदीफ: –ोल · रदीफ: कने राखू। आरम्भ: “घरमे अपन बोल, कने राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 191 — आब बुझू। मात्रा-क्रम: १६–२८; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: आब बुझू। आरम्भ: “धूरिमे मेटल नाम, आब बुझू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 192 — एखन बाकी। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: एखन बाकी। आरम्भ: “कंठमे एक गीत एखन बाकी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 193 — चुप नहि रहू। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: चुप नहि रहू। आरम्भ: “मोनमे उठल पुकार, चुप नहि रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 194 — फेर चलू। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: फेर चलू। आरम्भ: “रुकि गेलहुँ तँ चुनू राह, फेर चलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 195 — कने थामू। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कने थामू। आरम्भ: “मोनपर एतेक भार, कने थामू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 196 — ककरा बुझाबू। मात्रा-क्रम: १९–२२; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: ककरा बुझाबू। आरम्भ: “मोनक एहन पीर, ककरा बुझाबू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 197 — बाँचि रहय। मात्रा-क्रम: १५–२३; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: बाँचि रहय। आरम्भ: “लोकक ओठपर गीत बाँचि रहय”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 198 — घुरि देखब। मात्रा-क्रम: १५–२३; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: घुरि देखब। आरम्भ: “समय मेटाओत नाम, घुरि देखब”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 199 — एहि बेर। मात्रा-क्रम: १५–२४; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: एहि बेर। आरम्भ: “अपन चुनब राह एहि बेर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 200 — मौन रहैए। मात्रा-क्रम: २१–२५; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: मौन रहैए। आरम्भ: “सभतरि अछि शोर, मुदा मोन मौन रहैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 201 — अहाँ रहू। मात्रा-क्रम: १५–२६; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: अहाँ रहू। आरम्भ: “दूर रहू, मोनक पास अहाँ रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 202 — धीरे-धीरे। मात्रा-क्रम: २०–२२; काफिया-रदीफ: –ेर · रदीफ: धीरे-धीरे। आरम्भ: “उमेर खोलै अपन फेर, धीरे-धीरे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 203 — हाथक मोल। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: याद रखू। आरम्भ: “जे हाथ करै चुप काम, याद रखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 204 — घरमे बाजू। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ोल · रदीफ: घरमे बाजू। आरम्भ: “अपन माइक बोल घरमे बाजू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 205 — बाँचि रहय। मात्रा-क्रम: १७–२८; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: बाँचि रहय। आरम्भ: “घर बदलए, मुदा आकार बाँचि रहय”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 206 — एतबे नेह। मात्रा-क्रम: १९–२२; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: एतबे नेह। आरम्भ: “मोनसँ कहल एक बात—एतबे नेह”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 207 — समय रहत। मात्रा-क्रम: १५–२१; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: समय रहत। आरम्भ: “नाम नहि रहत, गीत समय रहत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 208 — फेर लिखू। मात्रा-क्रम: १६–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: फेर लिखू। आरम्भ: “जे बात एखन अधूरी, विचार फेर लिखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 209 — एहि मोड़पर। मात्रा-क्रम: १९–२३; काफिया-रदीफ: –ेर · रदीफ: एहि मोड़पर। आरम्भ: “पाछाँ ताकलहुँ एक फेर, एहि मोड़पर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 210 — कने बुझू। मात्रा-क्रम: १७–२२; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: कने बुझू। आरम्भ: “सूखल माटिक प्यास, कने बुझू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 211 — बाँचि रहू। मात्रा-क्रम: १५–२३; काफिया-रदीफ: –ोल · रदीफ: बाँचि रहू। आरम्भ: “घरक अपन बोल, बाँचि रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 212 — मान राखू। मात्रा-क्रम: १५–२३; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: मान राखू। आरम्भ: “कमाइ कम हो, मान राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 213 — ओहि पार। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: ओहि पार। आरम्भ: “घर एतऽ अछि, खेतक तीर ओहि पार”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 214 — फेर खिलत। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: फेर खिलत। आरम्भ: “सूखल पातमे हरियर रंग फेर खिलत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 215 — अपन राह। मात्रा-क्रम: १५–२४; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: अपन राह। आरम्भ: “लोक कहत अनेक राह—अपन राह”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 216 — फेर सँ लिखू। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: फेर सँ लिखू। आरम्भ: “जे अधूरा अछि विचार, फेर सँ लिखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 217 — एक बेर आर। मात्रा-क्रम: १९–२३; काफिया-रदीफ: –ेर · रदीफ: एक बेर आर। आरम्भ: “पाछाँ ताकू फेर, एक बेर आर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 218 — माटि कहैए। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: माटि कहैए। आरम्भ: “हाथ चिन्है अपन काम, माटि कहैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 219 — मोनमे बचल। मात्रा-क्रम: १६–२३; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: मोनमे बचल। आरम्भ: “एक अधूरा गीत मोनमे बचल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 220 — अपन कहू। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: अपन कहू। आरम्भ: “कम हो दाम, मुदा मान अपन कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 221 — आबो महकैत। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: आबो महकैत। आरम्भ: “पुरनका अँचरक सुवास आबो महकैत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 222 — फेर भेटत। मात्रा-क्रम: १६–२०; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: फेर भेटत। आरम्भ: “छुटल मीतक संग फेर भेटत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 223 — मेहक बाद। मात्रा-क्रम: १९–२५; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: फेर जागल। आरम्भ: “मेह छुबिते माटिक रंग फेर जागल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 224 — मौनक स्वर। मात्रा-क्रम: १७–२०; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: कने सुनियौ। आरम्भ: “मौनक भीतर शोर कने सुनियौ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 225 — नदीक वचन। मात्रा-क्रम: १९–२२; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: नदी कहैए। आरम्भ: “चलैत रहू बनि नीर, नदी कहैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 226 — पोथीक भीतर। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: पन्नामे अछि। आरम्भ: “धूरिमे मेटल नाम पन्नामे अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 227 — उमेरक साँझ। मात्रा-क्रम: १९–२३; काफिया-रदीफ: –ेर · रदीफ: एहि उमेरमे। आरम्भ: “पाछाँ ताकू एक फेर एहि उमेरमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 228 — श्रमक गरिमा। मात्रा-क्रम: १६–२५; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: मान दिअ। आरम्भ: “धूरि सानैत हाथक काम—मान दिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 229 — ओहि चुप्पीमे। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: ओहि चुप्पीमे। आरम्भ: “कहि नहि सकलहुँ बात ओहि चुप्पीमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 230 — घड़ी रुकल छल। मात्रा-क्रम: १७–२४; काफिया-रदीफ: –ेर · रदीफ: घड़ी रुकल छल। आरम्भ: “दीवारपर एक फेर—घड़ी रुकल छल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 231 — स्याहीक गन्ध। मात्रा-क्रम: १९–२४; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: स्याहीमे अछि। आरम्भ: “बहुत दिनक दबल बात स्याहीमे अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 232 — कारीगरक हाथ। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: हाथ कहैए। आरम्भ: “घाममे पकैत काम हाथ कहैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; लोकजीवन-श्रम।

गजल 233 — साँझक रेल। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: रेल चलि गेल। आरम्भ: “हाथ हिलैत रहल दुआर—रेल चलि गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 234 — फेर सोझाँ। मात्रा-क्रम: १६–२३; काफिया-रदीफ: –ोल · रदीफ: फेर सोझाँ। आरम्भ: “रूसल छल जे बोल—फेर सोझाँ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 235 — अपन उजास। मात्रा-क्रम: १६–२५; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: अपन उजास। आरम्भ: “रातिमे राखू आस—अपन उजास”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 236 — अधूरा पन्ना। मात्रा-क्रम: १६–२३; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: अधूरा नहि। आरम्भ: “एक पाँती रुकल तऽ गीत अधूरा नहि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 237 — पुरनका रेडियो। मात्रा-क्रम: १९–२५; काफिया-रदीफ: –ाज · रदीफ: फेर बजल। आरम्भ: “धूलि झाड़िते आवाज फेर बजल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 238 — मेह उतरला पर। मात्रा-क्रम: २०–२५; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: मेह उतरला पर। आरम्भ: “माटि देलक सुवास मेह उतरला पर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 239 — शहरक कोठरी। मात्रा-क्रम: २०–२४; काफिया-रदीफ: –ाल · रदीफ: एहि कोठरीमे। आरम्भ: “के पूछत मोनक हाल एहि कोठरीमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 240 — औजारक चमक। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: हाथमे अछि। आरम्भ: “पीढ़ीक पुरनका औजार हाथमे अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; लोकजीवन-श्रम।

गजल 241 — देह कहैए। मात्रा-क्रम: १८–२४; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: देह कहैए। आरम्भ: “दिन भरि बहुत भेल काम—देह कहैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 242 — चिट्ठीक कोर। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ाद · रदीफ: चिट्ठीक कोरपर। आरम्भ: “अटकल अछि याद चिट्ठीक कोरपर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 243 — फेर आरम्भ। मात्रा-क्रम: १९–२६; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: फेर आरम्भ। आरम्भ: “रुकि गेल बाट तऽ खोजू राह—फेर आरम्भ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 244 — जाड़क धूप। मात्रा-क्रम: १९–२६; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: जाड़क धूपमे। आरम्भ: “आँगन भरि पसरल उजास जाड़क धूपमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 245 — बिहानक बजार। मात्रा-क्रम: २१–२४; काफिया-रदीफ: –ाज · रदीफ: बिहान बजारमे। आरम्भ: “पहिल उठै आवाज बिहान बजारमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 246 — करघाक सुर। मात्रा-क्रम: २०–२६; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: करघा बाजैए। आरम्भ: “सूत्रमे जागै रंग—करघा बाजैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: लोकजीवन-श्रम; नेह-संबन्ध।

गजल 247 — पुरनका पुस्तकालय। मात्रा-क्रम: १९–२६; काफिया-रदीफ: –ाद · रदीफ: पोथी खोलिते। आरम्भ: “धूरिसँ उठै याद पोथी खोलिते”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 248 — अपन सीमा। मात्रा-क्रम: १६–२५; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: सीमा बुझू। आरम्भ: “अपनो अछि मान—सीमा बुझू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 249 — प्रवासक टिकट। मात्रा-क्रम: १९–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: टिकट हाथमे। आरम्भ: “पाछाँ छुटत संसार टिकट हाथमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 250 — नब गीत। मात्रा-क्रम: १७–२४; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: आब गाबू। आरम्भ: “पुरनका स्वरमे नब गीत आब गाबू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 251 — जाड़क धूप। मात्रा-क्रम: १९–२३; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: धूपमे बैठू। आरम्भ: “आँगन भरि उजास—धूपमे बैठू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 252 — बिहानक बजार। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: बजार जागल। आरम्भ: “हाथ लगिते काम—बजार जागल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 253 — करघाक धुन। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: करघा बाजै। आरम्भ: “सूत्रमे जागल रंग—करघा बाजै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: लोकजीवन-श्रम; नेह-संबन्ध।

गजल 254 — पुरनका पुस्तकालय। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: पन्ना खोलू। आरम्भ: “जल्दी नहि, कने धीर—पन्ना खोलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; किशोर-अनुशासन।

गजल 255 — सीमा चिन्हू। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: सीमा चिन्हू। आरम्भ: “नेहमे सेहो मान—सीमा चिन्हू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 256 — प्रवासक टिकट। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: टिकटमे रहल। आरम्भ: “घर छोड़बाक बात टिकटमे रहल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 257 — नब गीत। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: फेर गूँजल। आरम्भ: “मौन कटिते शोर—फेर गूँजल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 258 — पुरनका चश्मा। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: चश्मा पहिरिते। आरम्भ: “धुँधल अक्षर आयल पास चश्मा पहिरिते”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 259 — हाट छुटला पर। मात्रा-क्रम: २१–२३; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: हाट छुटला पर। आरम्भ: “देहपर देखल थकान हाट छुटला पर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: लोकजीवन-श्रम; सामाजिक नैतिकता।

गजल 260 — दीपक धुआँ। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: धुआँमे छल। आरम्भ: “कहि नहि सकल एक बात धुआँमे छल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 261 — भाषाक बीज। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: रोपैत रहू। आरम्भ: “नेनाक कंठमे गीत रोपैत रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 262 — टूटल पुल। मात्रा-क्रम: १५–२३; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पुल बनत। आरम्भ: “धार रहत, एक दिन पार पुल बनत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 263 — सीमा बुझू। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: सीमा बुझू। आरम्भ: “नेहमे सेहो मान—सीमा बुझू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 264 — नब पन्ना। मात्रा-क्रम: १९–२६; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: नब पन्ना खोलू। आरम्भ: “पुरनका भूल छोड़ि चुनू राह—नब पन्ना खोलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 265 — ओसक बिहान। मात्रा-क्रम: १९–२४; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: ओसक बूँदमे। आरम्भ: “झलकि उठल बिहान ओसक बूँदमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 266 — दर्जीक सुई। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: सुई चलैए। आरम्भ: “कपड़ाक छोर सुई चलैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: लोकजीवन-श्रम।

गजल 267 — घाटपर। मात्रा-क्रम: १५–२३; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: घाटपर। आरम्भ: “धीरे बहै धार घाटपर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 268 — पुरनका पोथी। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: पोथी खोलिते। आरम्भ: “फेर उभरल रंग पोथी खोलिते”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 269 — बिना कहल। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ोल · रदीफ: बिना कहल। आरम्भ: “बुझि गेलहुँ नेहक मोल बिना कहल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 270 — अहाँक संग। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: अहाँक संग। आरम्भ: “लम्बा हो तइयो राह अहाँक संग”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 271 — एखन लिखू। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: एखन लिखू। आरम्भ: “जे दबल रहि गेल पीर एखन लिखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 272 — जाड़क धूप। मात्रा-क्रम: १९–२४; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: जाड़क धूपमे। आरम्भ: “आँगन भरि गेल उजास जाड़क धूपमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 273 — लोहारक आगि। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: आगिक सोझाँ। आरम्भ: “चमकि उठल औजार आगिक सोझाँ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: लोकजीवन-श्रम।

गजल 274 — पुरनका चित्र। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: फेर जागल। आरम्भ: “चित्र देखिते पुरनका गाम फेर जागल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 275 — पुल पार करैत। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: पुल पार करैत। आरम्भ: “पाछाँ छुटल तीर पुल पार करैत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 276 — लोकक कंठमे। मात्रा-क्रम: १८–२८; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: लोकक कंठमे। आरम्भ: “भाषा बनि रहय गीत लोकक कंठमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 277 — दूरीक बादो। मात्रा-क्रम: १९–२४; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: दूरीक बादो। आरम्भ: “अहाँ रहू मनक पास दूरीक बादो”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 278 — नब बिहान। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: फेर उगैत अछि। आरम्भ: “रातिक पाछाँ आस फेर उगैत अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 279 — पुरनका कुञ्जी। मात्रा-क्रम: १६–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: खोलि देखू। आरम्भ: “धूरि लागल पुरनका दुआर खोलि देखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 280 — करघाक धुन। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: करघा बाजै। आरम्भ: “सूतमे जागल रंग करघा बाजै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: लोकजीवन-श्रम; नेह-संबन्ध।

गजल 281 — नदीक धुँध। मात्रा-क्रम: १४–२३; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: धुँध हटत। आरम्भ: “देखाएत फेर तीर धुँध हटत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 282 — पोथीक दोकान। मात्रा-क्रम: १६–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कने पढ़ू। आरम्भ: “कागजक भीतर विचार कने पढ़ू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 283 — पड़ोसक आँगन। मात्रा-क्रम: २१–२६; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: ओहि आँगनमे। आरम्भ: “संग जागैत छल भोर ओहि आँगनमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 284 — अपन मान। मात्रा-क्रम: १६–२६; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: एना नहि। आरम्भ: “दाम लेल घटत मान—एना नहि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 285 — अधूरा गीत। मात्रा-क्रम: १९–२५; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: एखन गाबू। आरम्भ: “अधूरा रहल गीत एखन गाबू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 286 — कुम्हारक चाक। मात्रा-क्रम: २१–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: चाक घूमैए। आरम्भ: “माटि लैत नव आकार चाक घूमैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 287 — पुरनका डाकघर। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: चिट्ठी अबैत। आरम्भ: “लिफाफापर लिखल नाम चिट्ठी अबैत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 288 — जाड़क धूप। मात्रा-क्रम: १९–२४; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: धूप उतरैए। आरम्भ: “आँगन भरि उजास धूप उतरैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 289 — बरामदाक कुर्सी। मात्रा-क्रम: १७–२८; काफिया-रदीफ: –ेर · रदीफ: कुर्सी ताकैए। आरम्भ: “दुआर दिस एक फेर कुर्सी ताकैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 290 — रातिक स्टेशन। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: रेल अबैत। आरम्भ: “दूरसँ उठैत शोर रेल अबैत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 291 — बीज बचाउ। मात्रा-क्रम: १८–२९; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: बीज बचाउ। आरम्भ: “अगिला बर्ख लेल धान बीज बचाउ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 292 — गीत फेर जन्मत। मात्रा-क्रम: १९–२७; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: गीत फेर जन्मत। आरम्भ: “शब्द म्लान हो, नब रंग गीत फेर जन्मत”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 293 — नदीक चिट्ठी। मात्रा-क्रम: १९–२४; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: बहैत जाए। आरम्भ: “रेत छुबैत ई धार बहैत जाए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 294 — धानक गन्ध। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: घर बजबैए। आरम्भ: “कटनीक धानक सुवास घर बजबैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 295 — पुरनका घड़ी। मात्रा-क्रम: १८–२४; काफिया-रदीफ: –ाल · रदीफ: टिक-टिक करैए। आरम्भ: “भित्तिपर धीम चाल टिक-टिक करैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 296 — नीमक छाँह। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: ठंढक दैए। आरम्भ: “घरक पुरनका दुआर ठंढक दैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 297 — कागजक नाव। मात्रा-क्रम: १९–२६; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: पानिमे चलैए। आरम्भ: “बालपनक जान पानिमे चलैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; सामाजिक नैतिकता।

गजल 298 — साँझक घंटी। मात्रा-क्रम: १९–२३; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: धीरे बाजैए। आरम्भ: “साँझ पड़िते ध्यान धीरे बाजैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 299 — घर घुरबाक बाट। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: मोन खींचैए। आरम्भ: “दूर धरि ओ राह मोन खींचैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 300 — चूल्हिक आँच। मात्रा-क्रम: १९–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: आँच बचल अछि। आरम्भ: “माइक पुरन दुलार—आँच बचल अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; लोकजीवन-श्रम।

गजल 301 — पोखरिक चान। मात्रा-क्रम: १८–२७; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: चान उतरैए। आरम्भ: “शान्त पोखरिक नीर—चान उतरैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 302 — मसालाक गन्ध। मात्रा-क्रम: १६–२८; काफिया-रदीफ: –ाद · रदीफ: घर भरैए। आरम्भ: “पीसल मसालाक स्वाद घर भरैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 303 — ओसारक दीप। मात्रा-क्रम: १७–२४; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: दीप जरैए। आरम्भ: “अन्हारमे छोट उजास—दीप जरैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 304 — बरखाक खिड़की। मात्रा-क्रम: १९–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: बरखा अबैए। आरम्भ: “काँचपर महीन फुहार—बरखा अबैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 305 — बाँसुरीक दूर स्वर। मात्रा-क्रम: १६–२५; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: स्वर अबैए। आरम्भ: “साँझक नदीक नीर—स्वर अबैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 306 — खेतक पाँति। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: पाँति उठैए। आरम्भ: “माटिमे रोपल धान—पाँति उठैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 307 — सामा-चकेवाक साँझ। मात्रा-क्रम: १९–२६; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: साँझ उतरैए। आरम्भ: “धानक मृदु सुवास—साँझ उतरैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 308 — मखानक पोखरि। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –ाल · रदीफ: जल चमकैए। आरम्भ: “मखान पातक जाल—जल चमकैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; बाल-किशोर कल्पना।

गजल 309 — कूपक डोर। मात्रा-क्रम: १६–२५; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: जल उठैए। आरम्भ: “हथेलीमे बँसल डोर—जल उठैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 310 — पीपरक पात। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: हवा पढ़ैए। आरम्भ: “पीपरसँ झरल पात—हवा पढ़ैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 311 — बखारीक धान। मात्रा-क्रम: १९–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: धान बचल अछि। आरम्भ: “माटिक ठंढ भंडार—धान बचल अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 312 — मिथिला-चित्रक रेखा। मात्रा-क्रम: १९–२४; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: रेखा बोलैए। आरम्भ: “भीतपर खिलल रंग—रेखा बोलैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; समकालीन माध्यम।

गजल 313 — सरिसो फूल। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पीयर भेल। आरम्भ: “खेतक दूर बहार—पीयर भेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 314 — कमलाक कछार। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: भोर भेल। आरम्भ: “कमलाक निसबद कछार—भोर भेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 315 — सिक्कीक शिल्प। मात्रा-क्रम: १९–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: हाथ गढ़ैए। आरम्भ: “सिक्कीक कोमल तार—हाथ गढ़ैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 316 — पानक बाड़ी। मात्रा-क्रम: १६–२९; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: हरियर रहै। आरम्भ: “ओससँ भीजल पान—हरियर रहै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 317 — मधुश्रावणीक राति। मात्रा-क्रम: १९–२५; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: गीत उठैए। आरम्भ: “सावनक भीजल राति—गीत उठैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 318 — जाँतक घरघर। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: घरघर बाजैए। आरम्भ: “आँगन जागल भोर—घरघर बाजैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; लोकजीवन-श्रम।

गजल 319 — कोसीक बालू। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कथा लिखैए। आरम्भ: “बदलैत रहै धार—कथा लिखैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 320 — मेहक बाद माटिक गन्ध। मात्रा-क्रम: १५–२७; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: मेह पड़ल। आरम्भ: “माटि बदललक रंग—मेह पड़ल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 321 — आमक मोजर। मात्रा-क्रम: १९–२७; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: मोजर फूटल। आरम्भ: “बारी भरि उठल सुवास—मोजर फूटल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; बाल-किशोर कल्पना।

गजल 322 — अरिपनक रेखा। मात्रा-क्रम: २१–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: रेखा बोलैए। आरम्भ: “चाउर-पिठारक दुआर—रेखा बोलैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 323 — दूबिपर ओस। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: ओस चमकल। आरम्भ: “आँगनमे भेल भोर—ओस चमकल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 324 — बाँसक झुरमुट। मात्रा-क्रम: १६–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: हवा चलल। आरम्भ: “डोलि उठल कतार—हवा चलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 325 — दधि-चूड़ाक बिहान। मात्रा-क्रम: १४–२५; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: भोर जागल। आरम्भ: “दधि-चूड़ाक बिहान—भोर जागल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 326 — करघाक धुन। मात्रा-क्रम: १९–२७; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: करघा चलैए। आरम्भ: “सूतरमे उठल तान—करघा चलैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; लोकजीवन-श्रम।

गजल 327 — कातिकक साँझ। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: कातिक आयल। आरम्भ: “घाट भरल अँजोर—कातिक आयल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 328 — खरिहानक चान। मात्रा-क्रम: १६–२७; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: खरिहानमे। आरम्भ: “सोन सन चमकै धान—खरिहानमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 329 — कुसियारक रस। मात्रा-क्रम: १६–२७; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: रस टपकै। आरम्भ: “ओखलि लगिते मिठास—रस टपकै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 330 — पोखरिक सीढ़ी। मात्रा-क्रम: १६–२८; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: सीढ़ी लग। आरम्भ: “भोर झिलमिल नीर—सीढ़ी लग”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; बाल-किशोर कल्पना।

गजल 331 — पलाशक रङ। मात्रा-क्रम: १७–२९; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: पलाश फुलल। आरम्भ: “बोनमे दहकल रङ—पलाश फुलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 332 — माटिक चूल्हि। मात्रा-क्रम: १६–२७; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: चूल्हि जागल। आरम्भ: “बासल गरम भात—चूल्हि जागल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 333 — पातक दोना। मात्रा-क्रम: १६–३०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: दोना बनल। आरम्भ: “पात जुड़ि लेल आकार—दोना बनल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; सामाजिक नैतिकता।

गजल 334 — चैतक हावा। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: हावा बहल। आरम्भ: “खुलि गेल नब भोर—हावा बहल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 335 — भोरक कुहासा। मात्रा-क्रम: १८–३०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कुहासा उठल। आरम्भ: “दूर देखायल पार—कुहासा उठल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 336 — कुम्हारक चाक। मात्रा-क्रम: १६–२६; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: चाक घुरल। आरम्भ: “हाथ देलक जोर—चाक घुरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 337 — सनईक फूल। मात्रा-क्रम: १७–२७; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: सनई फुलल। आरम्भ: “खेत भरल सुवास—सनई फुलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 338 — गामक हाट। मात्रा-क्रम: १६–२८; काफिया-रदीफ: –ाट · रदीफ: हाट भरल। आरम्भ: “गामक बीच हाट—हाट भरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 339 — नावक घाट। मात्रा-क्रम: १६–२९; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: नाव खुलल। आरम्भ: “धीरे बहली धार—नाव खुलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 340 — अँगनाक तुलसी। मात्रा-क्रम: १७–२७; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: तुलसी हरियर। आरम्भ: “अँगनामे प्राण—तुलसी हरियर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 341 — आसिनक अकास। मात्रा-क्रम: १८–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: अकास निखरल। आरम्भ: “दूर खुलल विस्तार—अकास निखरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 342 — धानक बालि। मात्रा-क्रम: १६–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: बालि झुकल। आरम्भ: “दाना भरल भार—बालि झुकल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 343 — पुरइनक पात। मात्रा-क्रम: १८–२७; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: पुरइन डोलल। आरम्भ: “भोर भरल उजास—पुरइन डोलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 344 — चरखाक सूत। मात्रा-क्रम: १७–२८; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: सूत बढ़ल। आरम्भ: “अँगुरी पेलक छोर—सूत बढ़ल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; लोकजीवन-श्रम।

गजल 345 — ओसारक साँझ। मात्रा-क्रम: १६–२६; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: साँझ बैसल। आरम्भ: “ओसारमे प्राण—साँझ बैसल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; किशोर-अनुशासन।

गजल 346 — महुआक गन्ध। मात्रा-क्रम: १५–२६; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: महुआ झरल। आरम्भ: “गाछ तरे रंग—महुआ झरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 347 — इनारक डोर। मात्रा-क्रम: १६–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: डोर उतरल। आरम्भ: “भोर देलक पुकार—डोर उतरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 348 — फागुनक पवन। मात्रा-क्रम: १५–२८; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: पवन बहल। आरम्भ: “कोइल छेड़लक तान—पवन बहल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 349 — ढेकीक ताल। मात्रा-क्रम: १८–३०; काफिया-रदीफ: –ाल · रदीफ: ढेकी बाजल। आरम्भ: “भोर पकड़लक ताल—ढेकी बाजल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 350 — भादोक मेघ। मात्रा-क्रम: १४–२८; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: मेघ घुमल। आरम्भ: “अकास भेल घोर—मेघ घुमल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; बाल-किशोर कल्पना।

गजल 351 — बटगाछक छाँह। मात्रा-क्रम: १६–२८; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: छाँह पड़ल। आरम्भ: “बाटिक कात बास—छाँह पड़ल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 352 — सुपक हावा। मात्रा-क्रम: १४–३०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: सुप चलल। आरम्भ: “हाथ देलक धार—सुप चलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 353 — बगुलाक पाँति। मात्रा-क्रम: १५–२८; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: पाँति उड़ल। आरम्भ: “पाँखि धरलक तान—पाँति उड़ल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: बाल-किशोर कल्पना।

गजल 354 — चूल्हिक राख। मात्रा-क्रम: १५–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: राख तरे। आरम्भ: “लुका रहल अंगार—राख तरे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: लोकजीवन-श्रम; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 355 — कनेरक फूल। मात्रा-क्रम: १६–२८; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: कनेर फुलल। आरम्भ: “भीतक कात रंग—कनेर फुलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 356 — तिलकोरक पात। मात्रा-क्रम: १६–२७; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: ओस चमकल। आरम्भ: “तिलकोरक हरियर पात—ओस चमकल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 357 — माटिक घैल। मात्रा-क्रम: १६–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: घैल भरल। आरम्भ: “इनारसँ उठल धार—घैल भरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 358 — कदम्बक फूल। मात्रा-क्रम: १६–२७; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: कदम्ब फुलल। आरम्भ: “हावामे भरल सुवास—कदम्ब फुलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; बाल-किशोर कल्पना।

गजल 359 — चरौनिहारक बंसी। मात्रा-क्रम: १८–२८; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: बंसी बाजल। आरम्भ: “धुनि जगौलक भोर—बंसी बाजल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 360 — खपरैल पर मेह। मात्रा-क्रम: १६–२८; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: मेह बरसल। आरम्भ: “खपरैल बदललक रंग—मेह बरसल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 361 — मधुमाछीक गुँजार। मात्रा-क्रम: १८–२८; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: मधुमाछी गुँजल। आरम्भ: “फूलमे उठल गान—मधुमाछी गुँजल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; बाल-किशोर कल्पना।

गजल 362 — दलानक कथा। मात्रा-क्रम: १६–२८; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कथा चलल। आरम्भ: “बड़-बूढ़क दुलार—कथा चलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 363 — अड़हुलक फूल। मात्रा-क्रम: १६–३०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: अड़हुल फुलल। आरम्भ: “अँगनामे खुलल दुआर—अड़हुल फुलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 364 — मड़ुआक खेत। मात्रा-क्रम: १९–२९; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: मड़ुआ लहरल। आरम्भ: “संगमे झूमल धान—मड़ुआ लहरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 365 — पनघटक बाट। मात्रा-क्रम: १८–३०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पानि आनल। आरम्भ: “भोरहि खुलल दुआर—पानि आनल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 366 — पनसक गाछ। मात्रा-क्रम: १७–३१; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पनस फलल। आरम्भ: “डारि सम्हारलक भार—पनस फलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 367 — जूटक डोर। मात्रा-क्रम: १६–३०; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: डोर बटल। आरम्भ: “हाथमे कसि डोर—डोर बटल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 368 — कोइलीक पुकार। मात्रा-क्रम: १९–३०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कोइली बाजल। आरम्भ: “डारिसँ उठल पुकार—कोइली बाजल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 369 — कातिकक चान। मात्रा-क्रम: १६–३०; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: चान उगल। आरम्भ: “पोखरिपर पसरल उजास—चान उगल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 370 — पूसक बिहान। मात्रा-क्रम: १७–३२; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: धूप उतरि। आरम्भ: “कुहासामे फूटल उजास—धूप उतरि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 371 — माटिक दीप। मात्रा-क्रम: १६–३५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: दीप जरल। आरम्भ: “साँझहि उज्जर दुआर—दीप जरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 372 — सरपताक झुरमुट। मात्रा-क्रम: १७–३३; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: हावा बाजल। आरम्भ: “नदीक हरियर छोर—हावा बाजल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 373 — मसूरक फूल। मात्रा-क्रम: १६–३४; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: खेत हँसल। आरम्भ: “रंग भरल विहान—खेत हँसल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 374 — घुरक आगि। मात्रा-क्रम: १५–३६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: घुर जरल। आरम्भ: “जाड़मे गरम दुआर—घुर जरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 375 — बथानक साँझ। मात्रा-क्रम: १६–३३; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: गोरु घुरल। आरम्भ: “खुलल घरक दुआर—गोरु घुरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; नेह-संबन्ध।

गजल 376 — जाड़क तारा। मात्रा-क्रम: १८–३३; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: तारा चमकल। आरम्भ: “निर्मल भेल अकास—तारा चमकल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 377 — बरखाक राति। मात्रा-क्रम: १७–३५; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: राति जागल। आरम्भ: “पोखरिक कात उठल शोर—राति जागल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 378 — मटकाक दधि। मात्रा-क्रम: १४–३४; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: दधि जमल। आरम्भ: “माटिक मटकामे सुवास—दधि जमल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 379 — कदलीक पात। मात्रा-क्रम: १५–३३; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: पात हिलल। आरम्भ: “हावाक संग उठल शोर—पात हिलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 380 — सीमरक रूइ। मात्रा-क्रम: १६–३७; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: रूइ उड़ल। आरम्भ: “खेतक ऊपर मैदान—रूइ उड़ल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 381 — खेतक मेड़। मात्रा-क्रम: १४–३९; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: मेड़ पर। आरम्भ: “उगल हरियर बहार—मेड़ पर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 382 — चिरैक पाँति। मात्रा-क्रम: १३–३५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: उड़ि गेल। आरम्भ: “अकासक पार—उड़ि गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 383 — चाननीक पोखरि। मात्रा-क्रम: १७–३७; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: चान उतरल। आरम्भ: “जलमे फूटल उजास—चान उतरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 384 — नदीक मोड़। मात्रा-क्रम: १४–३६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: मोड़ पर। आरम्भ: “चमकि उठल धार—मोड़ पर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 385 — अँगनाक रौद। मात्रा-क्रम: १६–४२; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: रौद उतरल। आरम्भ: “अँगनामे फैलल उजास—रौद उतरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 386 — बन्हल धानक पूला। मात्रा-क्रम: १६–३८; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: पूला बन्हल। आरम्भ: “खेतसँ आयल धान—पूला बन्हल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 387 — उड़ैत पतंग। मात्रा-क्रम: १६–३९; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पतंग उड़ल। आरम्भ: “खुलल अकासक दुआर—पतंग उड़ल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; बाल-किशोर कल्पना।

गजल 388 — गाछक छाल। मात्रा-क्रम: १५–४०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: छाल पर। आरम्भ: “बरखक चिन्ह अपार—छाल पर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 389 — घाटपर साँझ। मात्रा-क्रम: १६–३८; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: साँझ बसल। आरम्भ: “जलमे धुँधल उजास—साँझ बसल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 390 — ओसक बूँद। मात्रा-क्रम: १७–४१; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: ओस चमकल। आरम्भ: “पातक कात बहार—ओस चमकल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 391 — काँसक फूल। मात्रा-क्रम: १६–३६; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: काँस फुलल। आरम्भ: “नदीक कात उजास—काँस फुलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 392 — पोखरिक माछ। मात्रा-क्रम: १५–३९; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पोखरिमे। आरम्भ: “हलुक उठल धार—पोखरिमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 393 — सूपमे उड़ैत धान। मात्रा-क्रम: १५–४१; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: सूप चलल। आरम्भ: “उड़ि उठल भूसी, रहल धान—सूप चलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 394 — जाड़क कुहासा। मात्रा-क्रम: २०–४०; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: कुहासा उतरल। आरम्भ: “दूरक गाछ आयल पास—कुहासा उतरल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 395 — पगडण्डीक धूर। मात्रा-क्रम: १५–४०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: बाट पर। आरम्भ: “गामक खुलल दुआर—बाट पर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 396 — ताड़क छाँह। मात्रा-क्रम: १६–४०; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: छाँह तरे। आरम्भ: “देखायल दूर गाम—छाँह तरे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 397 — साँझक घंटी। मात्रा-क्रम: १८–४४; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: घंटी बाजल। आरम्भ: “दूरसँ आयल पुकार—घंटी बाजल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 398 — बेलक सुवास। मात्रा-क्रम: १५–४४; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: बेल फुलल। आरम्भ: “अँगनामे उठल सुवास—बेल फुलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 399 — पपीहाक पुकार। मात्रा-क्रम: १८–४५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पपीहा बाजल। आरम्भ: “दूरसँ आयल पुकार—पपीहा बाजल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 400 — तिलक खेत। मात्रा-क्रम: १५–४५; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: तिल फुलल। आरम्भ: “खेतमे कोमल रंग—तिल फुलल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 401 — बाँसक कोपल। मात्रा-क्रम: १८–४५; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: कोपल फुटल। आरम्भ: “झुरमुटमे नव उजास—कोपल फुटल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 402 — नदीक बालू। मात्रा-क्रम: १५–४८; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: बालूपर। आरम्भ: “लिखल गेल धार—बालूपर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 403 — गोधूलिक धूर। मात्रा-क्रम: १६–४५; काफिया-रदीफ: –ाल · रदीफ: गोधूलिमे। आरम्भ: “अकास भेल लाल—गोधूलिमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 404 — अगहनक बिहान। मात्रा-क्रम: १६–४४; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: अगहनमे। आरम्भ: “धानपर सुनर उजास—अगहनमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 405 — मखानक पात। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: देखाइत अछि। आरम्भ: “पोखरिमे हरियर पात देखाइत अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 406 — कुसियारक खेत। मात्रा-क्रम: १५–२६; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: रहि गेल। आरम्भ: “ओसभीजल पातमे मिठास रहि गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 407 — पलाशक फूल। मात्रा-क्रम: १४–२४; काफिया-रदीफ: –ाल · रदीफ: देखू ने। आरम्भ: “बोनमे उठल लाल देखू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 408 — माटिक सुराही। मात्रा-क्रम: १६–२६; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: ठंढा रहल। आरम्भ: “सुराही भीतर नीर ठंढा रहल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 409 — चैती पवन। मात्रा-क्रम: १६–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: छूइ गेल। आरम्भ: “चैती पवन दुआर छूइ गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 410 — अमरूदक बगिया। मात्रा-क्रम: १५–२७; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: हरियर रहल। आरम्भ: “ओसक संग बिहान हरियर रहल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 411 — धानक भूसा। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: काज अबैत अछि। आरम्भ: “भूसो घरक सँभार काज अबैत अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 412 — अलसीक नील फूल। मात्रा-क्रम: २०–२२; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: नील भेल। आरम्भ: “अलसीक खेतमे बहार नील भेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 413 — आमक मञ्जरी। मात्रा-क्रम: २०–२२; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: पसरि गेल। आरम्भ: “आमक बगियामे सुवास पसरि गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 414 — गामक पोखरि। मात्रा-क्रम: २०–२२; काफिया-रदीफ: –ीर · रदीफ: रहि गेल। आरम्भ: “गामक पोखरिमे निर्मल नीर रहि गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 415 — नदीक बालू। मात्रा-क्रम: २०–२२; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: बदलैत रहल। आरम्भ: “पानिक संग आइ निशान बदलैत रहल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 416 — सखुआक पात। मात्रा-क्रम: २०–२२; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: सरसराए। आरम्भ: “हावामे सखुआक पात सरसराए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 417 — गहुमक बालि। मात्रा-क्रम: २०–२२; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: झूमि उठल। आरम्भ: “रौद लगिते आइ नव बिहान झूमि उठल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 418 — गामक पुल। मात्रा-क्रम: २०–२२; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: जोड़ैत अछि। आरम्भ: “ई पुल आइ दूनू कछार जोड़ैत अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 419 — एना रे। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ा · रदीफ: रे। आरम्भ: “बझाओल गेलैए चिड़ैया एना रे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 420 — किछु नै बदलैए। मात्रा-क्रम: २६–३४; काफिया-रदीफ: –क · रदीफ: किछु नै बदलैए। आरम्भ: “भोरक लाली साँझक लाली देखा देलक किछु नै बदलैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: सामाजिक नैतिकता।

गजल 421 — लगैए ई। मात्रा-क्रम: २६–२८; काफिया-रदीफ: –ै · रदीफ: लगैए ई। आरम्भ: “महामाला महाडाला स्वाहा करै लगैए ई”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 422 — हमरा की। मात्रा-क्रम: १९–२४; काफिया-रदीफ: –ैए · रदीफ: हमरा की। आरम्भ: “मनुख जरैए गाम कनैए हमरा की”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 423 — चलू घुरि चली। मात्रा-क्रम: २१–२७; काफिया-रदीफ: –ाइए · रदीफ: चलू घुरि चली। आरम्भ: “सोझाँ देखि मोन ललाइए चलू घुरि चली”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 424 — अहीं तँ छी। मात्रा-क्रम: १७–२०; काफिया-रदीफ: –ा · रदीफ: अहीं तँ छी। आरम्भ: “खेत, आरि, रस्ता सभटा अहीं तँ छी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 425 — झपाइ छी। मात्रा-क्रम: २१–२६; काफिया-रदीफ: –ाइ · रदीफ: छी। आरम्भ: “गुमकी लागै राति बुलैत चान झपाइ छी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 426 — देखै छी। मात्रा-क्रम: १८–२४; काफिया-रदीफ: –ै · रदीफ: छी। आरम्भ: “नोर झरैए मोनक दागनि दगै छी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 427 — तखन किने। मात्रा-क्रम: १९–२१; काफिया-रदीफ: –ैब · रदीफ: तखन किने। आरम्भ: “उचरि नव रूप अपन लिखैब तखन किने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 428 — अनेरे। मात्रा-क्रम: २०; काफिया-रदीफ: –ारी · रदीफ: अनेरे। आरम्भ: “अहाँ बूझि लै छी जुआरी अनेरे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 429 — बिसरनहिए नीक। मात्रा-क्रम: २८–३५; काफिया-रदीफ: –हिए · रदीफ: नीक। आरम्भ: “गुम्म भेल जे ठाढ़ भेल छी मुनल मूह मटकुरिए नीक”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 430 — प्रेमक पथिक। मात्रा-क्रम: २२–२७; काफिया-रदीफ: — · रदीफ: —। आरम्भ: “अकत तीत प्रेमक जे पथिक अदौकालसँ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 431 — सोचनीक होइए। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ैए · रदीफ: —। आरम्भ: “अंतहीन अंत ऐ सोचनीक होइए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; समकालीन माध्यम।

गजल 432 — जा रहल अछि। मात्रा-क्रम: १९–२२; काफिया-रदीफ: –ा · रदीफ: रहल अछि। आरम्भ: “छोड़ि कऽ हमरा ई जे ओ जा रहल अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 433 — बुझतै ओ। मात्रा-क्रम: २४–३०; काफिया-रदीफ: –ै · रदीफ: ओ। आरम्भ: “की कहबै, कोना कहबै, जे बुझतै ओ लुझतै ओ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 434 — कहू की करी। मात्रा-क्रम: १९–२३; काफिया-रदीफ: –ाइए · रदीफ: कहू की करी। आरम्भ: “आँखि ओङठल जाइए कहू की करी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: सामाजिक नैतिकता।

गजल 435 — अङेजब कोना। मात्रा-क्रम: २४–३१; काफिया-रदीफ: –ाइए · रदीफ: अङेजब कोना। आरम्भ: “मिरदङियाक तरंग भँसियाइए अङेजब कोना”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 436 — रहल अछि। मात्रा-क्रम: १३–१८; काफिया-रदीफ: –ा · रदीफ: रहल अछि। आरम्भ: “छोड़ि रहल अछि, भिजा कहल अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 437 — बहुत अछि। मात्रा-क्रम: १५–१९; काफिया-रदीफ: — · रदीफ: अछि। आरम्भ: “छोट-छीन सन बात बहुत अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 438 — दोस्तियारी बिना। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: — · रदीफ: अछि। आरम्भ: “दोस्तियारी बिना ई राह कठिन अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 439 — परिचर। मात्रा-क्रम: १८–२०; काफिया-रदीफ: –र · रदीफ: —। आरम्भ: “बिसबासी लोक जे जीवनमे हमर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 440 — खेत-खम्हारक काज। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –लहुँ · रदीफ: —। आरम्भ: “खेत-खम्हारक काज कऽ सकलहुँ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; किशोर-अनुशासन।

गजल 441 — सत्यसँ भेँट। मात्रा-क्रम: १३–१९; काफिया-रदीफ: –ल · रदीफ: —। आरम्भ: “भय रहित सत्यसँ भेँट भेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: समकालीन माध्यम; सामाजिक नैतिकता।

गजल 442 — मोन पड़ल ऐ। मात्रा-क्रम: १६–२०; काफिया-रदीफ: — · रदीफ: ऐ। आरम्भ: “दिन-राति बीतल से मोन पड़ल ऐ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 443 — धरधड़ी। मात्रा-क्रम: १४–२०; काफिया-रदीफ: — · रदीफ: —। आरम्भ: “छातीक धरधड़ी घटि बढ़ल अछि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 444 — काज चलत नै। मात्रा-क्रम: १४–१७; काफिया-रदीफ: — · रदीफ: नै। आरम्भ: “बकथोथीसँ काज चलत नै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 445 — छद्म ज्ञान। मात्रा-क्रम: १४–१८; काफिया-रदीफ: — · रदीफ: —। आरम्भ: “तेजगर छी से छद्म ज्ञान भेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; सामाजिक नैतिकता।

गजल 446 — तैयार। मात्रा-क्रम: १५–२०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: —। आरम्भ: “बानर पट लैले अछि तैयार”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 447 — ई काल। मात्रा-क्रम: २१–२७; काफिया-रदीफ: — · रदीफ: —। आरम्भ: “कानैत दुनू बच्चाकेँ देखलहुँ बिछुड़ैत गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 448 — तारा कहलक। मात्रा-क्रम: १८–२४; काफिया-रदीफ: –ा · रदीफ: कहलक। आरम्भ: “रातिक इजोरिया देखि रहल तारा कहलक”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 449 — ने कहितौं। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –ितौं · रदीफ: —। आरम्भ: “जे ई गप अहाँ हमरासँ ने कहितौं”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 450 — जलोदीप। मात्रा-क्रम: २४–२६; काफिया-रदीफ: — · रदीफ: —। आरम्भ: “पिपनी झुकल डिम्हा उठल करजनी सन आँखि छै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 451 — अन्हार पसरल। मात्रा-क्रम: २१–२६; काफिया-रदीफ: –ल · रदीफ: —। आरम्भ: “जाऊ कत्तऽ टिटही सेहो इजोरियामे भागल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध।

गजल 452 — भऽ गेलै। मात्रा-क्रम: १६–१९; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: भऽ गेलै। आरम्भ: “दिन देखारे जे अन्हार भऽ गेलै”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 453 — छोड़ि आयल छी। मात्रा-क्रम: २३–२८; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: छोड़ि आयल छी। आरम्भ: “एकटा आस एकटा पियास छोडि आयल छी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास।

गजल 454 — रहि रहि। मात्रा-क्रम: १९; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: दैए रहि रहि। आरम्भ: “भोरक बसात धाह दैए रहि रहि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 455 — उसरि गेल। मात्रा-क्रम: २२–२६; काफिया-रदीफ: –िन्न · रदीफ: उसरि गेल। आरम्भ: “सम्हरि उठैत डेग सुदिन्न भेल उसरि गेल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 456 — सएह बनलिऐ। मात्रा-क्रम: १६–१९; काफिया-रदीफ: –एह · रदीफ: बनलिऐ। आरम्भ: “रौँउ-झाँउ बीच वएह बनलिऐ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 457 — खेरहा। मात्रा-क्रम: २३–२५; काफिया-रदीफ: –िक · रदीफ: खेरहा। आरम्भ: “बूझि सकलौं नै निशाभाग राशिक खेरहा”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 458 — ढङ बदलब तखनिते। मात्रा-क्रम: २३–२९; काफिया-रदीफ: –त · रदीफ: ढङ बदलब तखनिते। आरम्भ: “दिन बीतत बर्ख घेरत ढङ बदलब तखनिते”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 459 — बार्बी। मात्रा-क्रम: १७–२१; काफिया-रदीफ: –ानू · रदीफ: बार्बी। आरम्भ: “कनियाँ पुतरा छोड़ू आनू बार्बी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: बाल-किशोर कल्पना; सामाजिक नैतिकता।

गजल 460 — चान मामा। मात्रा-क्रम: १५–२१; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: आउ ने। आरम्भ: “चान मामा हमर दुआर आउ ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 461 — सात रंग। मात्रा-क्रम: १६–१९; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: देखू ने। आरम्भ: “फूल-फूलमे बहार देखू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 462 — दादीक कथा। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: सुनाउ ने। आरम्भ: “अँचर भरल दुलार सुनाउ ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; बाल-किशोर कल्पना।

गजल 463 — तरेगन गनी। मात्रा-क्रम: २३–२४; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: कहू ने। आरम्भ: “परी संग कनी खेल, कतेक तार कहू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 464 — बाटक खेल। मात्रा-क्रम: २३–२५; काफिया-रदीफ: –आट · रदीफ: चलै छी। आरम्भ: “परी संग कनी खेल, कनी बाट चलै छी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 465 — चिड़ैक गीत। मात्रा-क्रम: २३–२५; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: गबै छी। आरम्भ: “चिड़ै संग उगल भोर, जतन गीत गबै छी”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 466 — हँसीक आँगन। मात्रा-क्रम: १७–२०; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: हँसू ने। आरम्भ: “फूल खिलल अछि बहार, हँसू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 467 — कागजक नाव। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: आउ खेली। आरम्भ: “मेह खोललक पानिक दुआर, आउ खेली”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 468 — दादीक चान। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: दादी कहैए। आरम्भ: “चानक ऊपर एक संसार, दादी कहैए”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 469 — पतंगक पाँखि। मात्रा-क्रम: १५–२१; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: उड़ि चलू। आरम्भ: “नील अकासक ओहि पार, उड़ि चलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: बाल-किशोर कल्पना।

गजल 470 — मेहक खेल। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: दौड़ू ने। आरम्भ: “मेह खोललक पानिक दुआर, दौड़ू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 471 — निन्नक कथा। मात्रा-क्रम: १८–२४; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: कथा सुनू। आरम्भ: “आँखि मूनू, खुलत संसार, कथा सुनू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: बाल-किशोर कल्पना।

गजल 472 — अपन सपना। मात्रा-क्रम: १६–१९; काफिया-रदीफ: –आह · रदीफ: आगाँ चलू। आरम्भ: “अपन चुनल राह, आगाँ चलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 473 — खेलक मैदान। मात्रा-क्रम: १६–२३; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: खेलू ने। आरम्भ: “हारि गेलहुँ तँ की हार, खेलू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; बाल-किशोर कल्पना।

गजल 474 — पोथीक पाँखि। मात्रा-क्रम: १६–२३; काफिया-रदीफ: –आर · रदीफ: पढ़ू ने। आरम्भ: “पन्ना-पन्नामे संसार, पढ़ू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 475 — परीक्षाक बिहान। मात्रा-क्रम: १६–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: डरू नहि। आरम्भ: “पोथीक एतेक भार, डरू नहि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; किशोर-अनुशासन।

गजल 476 — मीतक संग। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: संग चलू। आरम्भ: “मीत अछि तँ हँसीक संग चलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; बाल-किशोर कल्पना।

गजल 477 — पर्दासँ बाहर। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: देखू ने। आरम्भ: “पर्दासँ बाहर संसार देखू ने”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 478 — अपन राह। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: अपन चुनू। आरम्भ: “लोक कहत बहुत राह, अपन चुनू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 479 — तुलना नहि। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: तुलना नहि। आरम्भ: “दोसराक जीतसँ अपन हार—तुलना नहि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 480 — जालजगतसँ बाहर। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: बाहर चलू। आरम्भ: “जालजगतसँ संसार बाहर चलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 481 — विषय अपन। मात्रा-क्रम: १५–२४; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: सोचि चुनू। आरम्भ: “सभ देखाओत राह, सोचि चुनू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 482 — लाइकसँ बाहर। मात्रा-क्रम: १५–२५; काफिया-रदीफ: –ोल · रदीफ: याद रखू। आरम्भ: “लाइक नहि कहै पूरा मोल, याद रखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 483 — बात फरिछाउ। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: बात फरिछाउ। आरम्भ: “मीत रूसल तँ बात, बात फरिछाउ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; किशोर-अनुशासन।

गजल 484 — फेर प्रयास। मात्रा-क्रम: १५–२२; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: फेर करू। आरम्भ: “हारि गेल प्रयास, फेर करू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 485 — अपन रूप। मात्रा-क्रम: २०–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: मोन छोट नहि करू। आरम्भ: “आरसिमे देखल आकार, मोन छोट नहि करू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 486 — अपन बात। मात्रा-क्रम: १६–२१; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: खुलि कहू। आरम्भ: “जे अखरैए ओ बात, खुलि कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 487 — अपन गति। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: रहय अपन-अपन। आरम्भ: “सभक चलबाक राह रहय अपन-अपन”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 488 — ना कहू। मात्रा-क्रम: १८–२१; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: स्पष्ट कहू। आरम्भ: “मन नहि मानै ओ बात, स्पष्ट कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; किशोर-अनुशासन।

गजल 489 — निन्न बचाउ। मात्रा-क्रम: १६–२२; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: निन्न बचाउ। आरम्भ: “स्क्रीनसँ बाहरो अछि संसार, निन्न बचाउ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; समकालीन माध्यम।

गजल 490 — समयक हिस्सा। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: समय बाँटू। आरम्भ: “पढ़ाइ लेल कने काम, समय बाँटू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 491 — बाट चुनैत। मात्रा-क्रम: १५–२२; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: घबराउ नहि। आरम्भ: “एक्के नहि अछि राह, घबराउ नहि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 492 — ना कहू। मात्रा-क्रम: १४–२३; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: ना कहू। आरम्भ: “मोनपर जँ बेसी भार, ना कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 493 — अपन गति। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ेर · रदीफ: अपन गति। आरम्भ: “दोसरासँ भेल जँ देर, अपन गति”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 494 — ना कहू। मात्रा-क्रम: १४–२५; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: ना कहू। आरम्भ: “जे घटाबए अपन मान, ना कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 495 — निन्नक समय। मात्रा-क्रम: १६–२५; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: एखन सुतू। आरम्भ: “बहुत भेल ई शोर, एखन सुतू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन; समकालीन माध्यम।

गजल 496 — प्रश्न पूछू। मात्रा-क्रम: १४–२३; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: प्रश्न पूछू। आरम्भ: “जे नहि बुझलहुँ ओ बात, प्रश्न पूछू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 497 — मीत चुनू। मात्रा-क्रम: १५–२२; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: बुझि चुनू। आरम्भ: “के रहत दुखमे संग, बुझि चुनू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; किशोर-अनुशासन।

गजल 498 — हारक बाद। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: फेर उठू। आरम्भ: “आइ भेटल जँ हार, फेर उठू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 499 — परीक्षाक बाद। मात्रा-क्रम: १६–२३; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: छोड़ि दिअ। आरम्भ: “परीक्षाक एतेक भार, छोड़ि दिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 500 — अपन विषय। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: बुझि चुनू। आरम्भ: “सभ देखाओत अलग राह, बुझि चुनू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 501 — अपन निर्णय। मात्रा-क्रम: १६–२३; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: अपन रहू। आरम्भ: “मीतक बीचो मान अपन रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 502 — अपन ताल। मात्रा-क्रम: १७–२४; काफिया-रदीफ: –ेर · रदीफ: अपन ताल। आरम्भ: “दोसरासँ भेल जँ देर—अपन ताल”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 503 — तुलना छोड़ू। मात्रा-क्रम: १९–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: तुलना छोड़ू। आरम्भ: “आरसिमे देखल आकार—तुलना छोड़ू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; समकालीन माध्यम।

गजल 504 — भरोसा। मात्रा-क्रम: १९–२२; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: भरोसा रखू। आरम्भ: “मीतसँ खुलि कहू बात—भरोसा रखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; किशोर-अनुशासन।

गजल 505 — भूलसँ सीखू। मात्रा-क्रम: १९–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: भूलसँ सीखू। आरम्भ: “एक चूककेँ हार नहि मानू—भूलसँ सीखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 506 — कने आराम। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: कने आराम। आरम्भ: “दिन भरि भेल बहुत काम—कने आराम”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 507 — सोझाँ बाजू। मात्रा-क्रम: १८–२२; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: सोझाँ बाजू। आरम्भ: “मीतसँ मनक बात—सोझाँ बाजू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; किशोर-अनुशासन।

गजल 508 — अपन सुर। मात्रा-क्रम: १६–२८; काफिया-रदीफ: –ीत · रदीफ: अपन सुरमे। आरम्भ: “गाबू अपन गीत अपन सुरमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 509 — पर्दासँ परे। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कने बाहर। आरम्भ: “पर्दासँ पैघ संसार—कने बाहर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; प्रकृति-ऋतु।

गजल 510 — मीतसँ बात। मात्रा-क्रम: १८–२३; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: फरिछ बाजू। आरम्भ: “मोनमे जे अछि बात—फरिछ बाजू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; किशोर-अनुशासन।

गजल 511 — ध्यानक डोर। मात्रा-क्रम: १७–२५; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: कने थामू। आरम्भ: “पर्दापर एतेक शोर—कने थामू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 512 — मदद माँगू। मात्रा-क्रम: १७–२३; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: मदद माँगू। आरम्भ: “जे भारी लगै बात—मदद माँगू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 513 — भविष्यक बाट। मात्रा-क्रम: १७–२९; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: खोजैत रहू। आरम्भ: “एके नहि अछि राह—खोजैत रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 514 — निर्णय। मात्रा-क्रम: १५–२८; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: अपन निर्णय। आरम्भ: “भीड़मे राखू मान—अपन निर्णय”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 515 — एक परिणाम। मात्रा-क्रम: १४–२३; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: अन्त नहि। आरम्भ: “एक परिणामक हार—अन्त नहि”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 516 — स्क्रीनक बाहर। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: स्क्रीनक बाहर। आरम्भ: “कम अछि एतऽ शोर—स्क्रीनक बाहर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: समकालीन माध्यम।

गजल 517 — पहिल कमाइ। मात्रा-क्रम: १८–२६; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: हिसाब राखू। आरम्भ: “कतेक भेल काम—हिसाब राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 518 — प्रश्नक साहस। मात्रा-क्रम: १४–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पूछि लिअ। आरम्भ: “नहि बुझल विचार—पूछि लिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 519 — टीमक खेल। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: संग खेलू। आरम्भ: “जीत हो वा हार, राखू उमंग—संग खेलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 520 — पहिल कमाइ। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: सोचि खर्चू। आरम्भ: “हाथमे आयल दाम—सोचि खर्चू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 521 — प्रश्नक साहस। मात्रा-क्रम: १५–२२; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: पूछि लिअ। आरम्भ: “जे नहि बुझलहुँ बात—पूछि लिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 522 — टीमक खेल। मात्रा-क्रम: १७–२८; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: संग खेलू। आरम्भ: “जीत-हारक संग—संग खेलू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; किशोर-अनुशासन।

गजल 523 — कौशल। मात्रा-क्रम: १७–२४; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: कौशल सीखू। आरम्भ: “केवल अंक नहि काम—कौशल सीखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 524 — खराब दिन। मात्रा-क्रम: १५–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: बस एक दिन। आरम्भ: “आइ भेटल जँ हार—बस एक दिन”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 525 — टोली। मात्रा-क्रम: १६–२५; काफिया-रदीफ: –ंग · रदीफ: टोलीमे। आरम्भ: “जीत अकेले नहि—संग टोलीमे”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; बाल-किशोर कल्पना।

गजल 526 — निर्णयक समय। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: कने समय दिअ। आरम्भ: “नहि चुनू तुरत राह—कने समय दिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 527 — पहिल खर्च। मात्रा-क्रम: १८–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: हिसाब राखू। आरम्भ: “जाइत छी जखन बजार—हिसाब राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 528 — प्रश्न करू। मात्रा-क्रम: १४–२४; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: प्रश्न करू। आरम्भ: “नहि बुझाइ जे राह—प्रश्न करू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 529 — समाचार। मात्रा-क्रम: १८–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पहिने जाँचू। आरम्भ: “जे भेटल समाचार—पहिने जाँचू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; समकालीन माध्यम।

गजल 530 — पहिल यात्रा। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: ध्यान राखू। आरम्भ: “पहिने बुझू स्थान—ध्यान राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 531 — पहिल भाषण। मात्रा-क्रम: १५–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: मञ्चपर। आरम्भ: “काँपए तइयो विचार मञ्चपर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 532 — पहिल असफलता। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: फेर जाउ। आरम्भ: “पहिल बेर भेटल हार फेर जाउ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 533 — समूहक दबाव। मात्रा-क्रम: १९–२६; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: सोचि कहू। आरम्भ: “जे मनकेँ नहि भावै बात सोचि कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; किशोर-अनुशासन।

गजल 534 — डिजिटल विराम। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ोर · रदीफ: फोन राखू। आरम्भ: “बहुत भेल ई शोर फोन राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: समकालीन माध्यम।

गजल 535 — समय बाँटू। मात्रा-क्रम: १७–२४; काफिया-रदीफ: –ाल · रदीफ: समय बाँटू। आरम्भ: “पढ़ाइ अछि सवाल—समय बाँटू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 536 — पहिल जिम्मेदारी। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: जिम्मेदारी लिअ। आरम्भ: “छोट हो तइयो काम—जिम्मेदारी लिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 537 — साँच जाँचू। मात्रा-क्रम: १७–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: साँच जाँचू। आरम्भ: “आयल जँ समाचार—साँच जाँचू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 538 — अपन आवाज। मात्रा-क्रम: १५–२६; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: खुलि बाजू। आरम्भ: “मोनमे अछि जँ बात—खुलि बाजू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 539 — परीक्षा बाद। मात्रा-क्रम: २१–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कने विश्राम करू। आरम्भ: “मोनपर बेसी भार—कने विश्राम करू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 540 — मीतक सीमा। मात्रा-क्रम: १७–२७; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: सीमा राखू। आरम्भ: “अपन मनक मान—सीमा राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 541 — अपन लय। मात्रा-क्रम: १८–२७; काफिया-रदीफ: –ाल · रदीफ: अपन लय राखू। आरम्भ: “भीड़क अलग चाल—अपन लय राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 542 — मीतक पहिचान। मात्रा-क्रम: १६–२४; काफिया-रदीफ: –ात · रदीफ: मीत चिन्हू। आरम्भ: “जे सुनए मनक बात—मीत चिन्हू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 543 — डरक पार। मात्रा-क्रम: १५–२६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: आगाँ बढ़ू। आरम्भ: “भेटल जँ हार—आगाँ बढ़ू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 544 — आरम्भ। मात्रा-क्रम: २१–२४; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: एखन आरम्भ करू। आरम्भ: “मोनपर नहि भार—एखन आरम्भ करू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; किशोर-अनुशासन।

गजल 545 — रुचिक बाट। मात्रा-क्रम: १७–२४; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: अपन रुचि चिन्हू। आरम्भ: “जे करिते बढ़ए ज्ञान—अपन रुचि चिन्हू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 546 — साँचक जाँच। मात्रा-क्रम: २०–२८; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: जाँचि तखन मानू। आरम्भ: “आयल जँ समाचार—जाँचि तखन मानू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; समकालीन माध्यम।

गजल 547 — नब मीत। मात्रा-क्रम: १८–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: धीरे चिन्हू। आरम्भ: “नब मीतक व्यवहार—धीरे चिन्हू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 548 — भूल स्वीकार। मात्रा-क्रम: १६–२८; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: साँच कहू। आरम्भ: “भूल भेल—स्वीकार, साँच कहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 549 — एखन करू। मात्रा-क्रम: १६–२७; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: एखन करू। आरम्भ: “जे छोट अछि काम—एखन करू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 550 — प्रश्न पुछू। मात्रा-क्रम: १५–२४; काफिया-रदीफ: –ाह · रदीफ: प्रश्न पुछू। आरम्भ: “बुझबाक जँ अछि चाह—प्रश्न पुछू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 551 — काज बाँटू। मात्रा-क्रम: १६–२५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: संग करू। आरम्भ: “एक्के माथ नहि भार—संग करू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 552 — अपन गति। मात्रा-क्रम: १८–२९; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: अपन गति राखू। आरम्भ: “बाटपर राखू ध्यान—अपन गति राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: लोकजीवन-श्रम; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 553 — नब हुनर। मात्रा-क्रम: १८–२७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: सीखैत रहू। आरम्भ: “खोलू नबका दुआर—सीखैत रहू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 554 — बात जाँचू। मात्रा-क्रम: १८–३०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पहिने जाँचू। आरम्भ: “आएल जँ समाचार—पहिने जाँचू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; समकालीन माध्यम।

गजल 555 — लिखि कऽ बुझू। मात्रा-क्रम: १६–३०; काफिया-रदीफ: –ाव · रदीफ: लिखि कऽ बुझू। आरम्भ: “मनमे उठल भाव—लिखि कऽ बुझू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 556 — एक काज। मात्रा-क्रम: १८–२९; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: एक काज करू। आरम्भ: “पहिने राखू ध्यान—एक काज करू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 557 — रिसक बेर। मात्रा-क्रम: १५–२७; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: कने थमू। आरम्भ: “गहिरी लिअ साँस—कने थमू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 558 — अपन माप। मात्रा-क्रम: १७–२९; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: अपन माप रखू। आरम्भ: “अपन श्रमक मान—अपन माप रखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 559 — मीत चुनू। मात्रा-क्रम: १७–२९; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: मीत चुनू। आरम्भ: “पहिने बुझू विचार—मीत चुनू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 560 — कने-कने सीखू। मात्रा-क्रम: २०–२८; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कने-कने सीखू। आरम्भ: “राखू स्पष्ट विचार—कने-कने सीखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 561 — अपन स्वर। मात्रा-क्रम: १७–२९; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: अपन स्वर राखू। आरम्भ: “अपन बातक मान—अपन स्वर राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 562 — भूलसँ सीखू। मात्रा-क्रम: १७–२८; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: भूलसँ सीखू। आरम्भ: “करू अपन स्वीकार—भूलसँ सीखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 563 — बेर बाँटू। मात्रा-क्रम: १७–२६; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: बेर बाँटू। आरम्भ: “पहिने चुनू काम—बेर बाँटू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 564 — साँच लिखू। मात्रा-क्रम: १६–२६; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: साँच लिखू। आरम्भ: “जतए भेटए ज्ञान—साँच लिखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 565 — सुनि कऽ बाजू। मात्रा-क्रम: १७–२९; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: सुनि कऽ बाजू। आरम्भ: “राखू स्पष्ट विचार—सुनि कऽ बाजू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 566 — कौड़ी बचाउ। मात्रा-क्रम: १८–३१; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: कौड़ी बचाउ। आरम्भ: “पहिने करू विचार—कौड़ी बचाउ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 567 — गाछ रोपू। मात्रा-क्रम: १६–३०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: गाछ रोपू। आरम्भ: “अँगना आनू बहार—गाछ रोपू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु।

गजल 568 — प्रश्न लिखू। मात्रा-क्रम: १४–२९; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: प्रश्न लिखू। आरम्भ: “जागल जँ विचार—प्रश्न लिखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 569 — मीतक मान। मात्रा-क्रम: १५–३३; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: मान राखू। आरम्भ: “मीतक अपन मान—मान राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 570 — सपन सँ काज। मात्रा-क्रम: १६–३१; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: काज धरू। आरम्भ: “सपन पर दिअ ध्यान—काज धरू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 571 — बेर बाँटू। मात्रा-क्रम: १७–३३; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: बेर बाँटू। आरम्भ: “काजपर दिअ ध्यान—बेर बाँटू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 572 — पहिने सुनू। मात्रा-क्रम: १७–३४; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पहिने सुनू। आरम्भ: “ककरो अलग विचार—पहिने सुनू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; सामाजिक नैतिकता।

गजल 573 — हुनर निखारू। मात्रा-क्रम: १२–४२; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: निखारू। आरम्भ: “जे अछि ज्ञान—निखारू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; लोकजीवन-श्रम।

गजल 574 — सीमा राखू। मात्रा-क्रम: १४–३३; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: सीमा राखू। आरम्भ: “अपन मान—सीमा राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 575 — पढ़ि बुझू। मात्रा-क्रम: १५–३७; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: पढ़ि बुझू। आरम्भ: “शब्दक भीतर विचार—पढ़ि बुझू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 576 — बाट चुनू। मात्रा-क्रम: १४–४५; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: बाट चुनू। आरम्भ: “अपन पहिचान—बाट चुनू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 577 — निज बात। मात्रा-क्रम: १४–३७; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: सहेजि राखू। आरम्भ: “मीतक मान—सहेजि राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; सामाजिक नैतिकता।

गजल 578 — प्रश्नक साहस। मात्रा-क्रम: १५–३५; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: प्रश्न करू। आरम्भ: “मनमे उठल विचार—प्रश्न करू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 579 — दिनक क्रम। मात्रा-क्रम: १५–४०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: क्रम बनाउ। आरम्भ: “काजक आधार—क्रम बनाउ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; किशोर-अनुशासन।

गजल 580 — दबावमे निर्णय। मात्रा-क्रम: १४–४३; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: अपन मन सुनू। आरम्भ: “अपन मान—अपन मन सुनू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 581 — मीतक गोपन बात। मात्रा-क्रम: १५–५०; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: गोपन राखू। आरम्भ: “मीतक मान—गोपन राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; सामाजिक नैतिकता।

गजल 582 — अपूर्णतासँ सीख। मात्रा-क्रम: १८–४६; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: फेर सँ सीखू। आरम्भ: “एक चूक नहि हार—फेर सँ सीखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 583 — अपन सीमा। मात्रा-क्रम: १४–५४; काफिया-रदीफ: –ान · रदीफ: सीमा राखू। आरम्भ: “अपन मान—सीमा राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: प्रकृति-ऋतु; नेह-संबन्ध।

गजल 584 — प्रमाण देखू। मात्रा-क्रम: १६–४४; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: जाँचि लिअ। आरम्भ: “जे सुनलहुँ ओकर आधार—जाँचि लिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; समकालीन माध्यम।

गजल 585 — धीरे बढ़ू। मात्रा-क्रम: १५–४६; काफिया-रदीफ: –ास · रदीफ: धीरे बढ़ू। आरम्भ: “करू छोट प्रयास—धीरे बढ़ू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: जीवन-अनुभव।

गजल 586 — थाकल मोन। मात्रा-क्रम: १३–२६; काफिया-रदीफ: –ाम · रदीफ: दिअ। आरम्भ: “थाकल मोनकेँ विराम दिअ”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: किशोर-अनुशासन।

गजल 587 — संग काज। मात्रा-क्रम: १२–२८; काफिया-रदीफ: –ाथ · रदीफ: राखू। आरम्भ: “दलमे सभक साथ राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: नेह-संबन्ध; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 588 — सहायता माँगू। मात्रा-क्रम: २५–३०; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: समयपर। आरम्भ: “बड्ड बढ़ि जाए भार—सहायता माँगू समयपर”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: स्मृति-प्रवास; आत्मसंवाद-निर्णय।

गजल 589 — अपन सीमा राखू। मात्रा-क्रम: २०–२२; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: राखू। आरम्भ: “पहिने अपन मनमे साफ विचार राखू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 590 — काजक क्रम। मात्रा-क्रम: २०–२२; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: करू। आरम्भ: “पहिने अपन समयक सँभार नीक करू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

गजल 591 — साँच जाँचू। मात्रा-क्रम: २०–२२; काफिया-रदीफ: –ार · रदीफ: जाँचू। आरम्भ: “आएल प्रत्येक समाचार आइ जाँचू”। मुख्य अर्थ-क्षेत्र: आत्मसंवाद-निर्णय; किशोर-अनुशासन।

बिबलियोग्राफी

नीचाँ केवल पोथीक नाम देल जा रहल अछि; वेबसाइट वा जाल-स्रोत सम्मिलित नहि अछि।

• नाट्यशास्त्र

• ध्वन्यालोक

• काव्यप्रकाश

• वक्रोक्तिजीवित

• रसगंगाधर

• तत्त्वचिन्तामणि

• [History of Sanskrit Poetics]

• [Logic, Language and Reality]

• [Nets of Awareness: Urdu Poetry and Its Critics]

• [The Well Wrought Urn: Studies in the Structure of Poetry]

• [The Dialogic Imagination: Four Essays]

• [Poetics]

Suggested citation: गजेन्द्र ठाकुर. “दीवान-ए-विदेह खण्ड-१.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 450, 2026-09-15. https://www.videha.co.in/research/2026/450/दीवान-ए-विदेह-खण्ड-१.htm

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