विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका · VIDEHA · ISSN 2229-547X

स्वप्न मे मिज्झर होइत

गजेन्द्र ठाकुर · 2026-09-15 · अंक 450

Keywords: Maithili literary history, Mithila studies, literary criticism, research article

गजेन्द्र ठाकुर

“स्वप्न मे मिज्झर होइत” : समय, भाषा, दर्शन आ समानान्तर इतिहासक बहुध्रुवीय काव्य-जगत

गहन पाठ-अध्ययन, भारतीय–पाश्चात्य तुलनात्मक समीक्षा, नव्य-न्याय विश्लेषण आ विदेह समानान्तर ऐतिहासिक पद्धतिक आलोकमे

शोध-लेख

मुख्य शब्द — स्वप्न; मिज्झर समय; मैथिली काव्य; भाषा-दर्शन; भारतीय दर्शन; नव्य-न्याय; इतिहास-दर्शन; समानान्तर इतिहास; अनुवाद; लोकजीवन।

१. प्रस्तावना : पोथीक विधा-सीमा किएक टूटैत अछि

“स्वप्न मे मिज्झर होइत” नाम अपनेमे ग्रन्थक केन्द्रीय काव्य-क्रिया बतबैत अछि—अनुभवक अलग-अलग परत एक-दोसरामे एना मिलैत अछि जे जागरण, स्मृति, इतिहास, दर्शन, लोक आ स्वप्नक सीमा स्थिर नहि रहि जाइत। प्रारम्भिक पद्यक “दुनू मिज्झर भऽ गेल अछि” कथन बादक समूचा ग्रन्थ लेल एक प्रकारक काव्य-सूत्र बनि उठैत अछि। मुदा ई मिज्झरता अस्पष्टताक पर्याय नहि; उलटे, ग्रन्थ बारम्बार कसौटी, प्रमाण, प्रश्न, तर्क, अनुभव, भाषा आ न्यायक शब्दावलीक सहारे धुँधला अनुभूतिक भीतर रेखा खींचबाक चेष्टा करैत अछि।

ग्रन्थक बाह्य रूप पद्य-संग्रहक अछि, मुदा आन्तरिक रूप एक चलैत बौद्धिक अभिलेखक। आरम्भमे लोकगीत, स्वप्न, मृत्यु, ग्रामीण स्मृति आ निजी संवेदना अछि; पछिला खण्डसभमे भाषा, ज्ञानमीमांसा, नैतिकता, भारतीय दर्शन, पाश्चात्य दर्शन, इतिहास-दर्शन, विधि आ न्यायक विस्तृत अनुशीलन; अन्तमे महाभारत आ बुद्धचरितक अति-संक्षिप्त मैथिली गीत-रूपान्तर तथा एक अंग्रेजी आमुखक मैथिली अनुवाद। एहि विन्यासमे कविता “विषय”क सजावट नहि, विचारक कार्य-प्रणाली बनि जाइत अछि।

एहि अध्ययनक उद्देश्य ग्रन्थकेँ कोनो एक दार्शनिक सम्प्रदायक नुमाइन्दा बनायब नहि, बल्कि ओकर भीतर चलैत बहु-स्वरक तर्क-विन्यास देखब अछि। जहाँ एक रचना कालातीत आधारक सम्भावना पर विचार करैत अछि, दोसर क्षणभंगुरता, शून्यता अथवा परस्परता पर; जहाँ एक ठाम प्रत्यक्ष–अनुमानक अनुशासन अछि, दोसर ठाम लोकविश्वासक संवेदना; जहाँ एक ठाम इतिहासक महत्त्व स्वीकारल जाइत अछि, ओतहि ओकर “अन्तिम देवता” बनि जाएबाक जोखिम पर प्रश्न उठैत अछि। एहि अन्तर्विरोधसभकेँ दोष नहि, ग्रन्थक विचारात्मक ऊर्जा मानब अधिक उपयुक्त अछि।

२. पाठ-परिमाण, संरचना आ सम्पूर्णता

मूल फाइलमे १००२ पृष्ठ आ लगभग १९,८९१ अनुच्छेद/पद्य-एकाइ अछि। अनुक्रमक आधार पर मुख्य रचना-प्रविष्टिसभक संख्या 437 अछि; वास्तविक शीर्षक-शैलीक पाठ-विभाजनमे 440 स्वतंत्र पद्य/अनुलग्नक-एकाइ भेटैत अछि। ई अन्तर किछु संयुक्त शीर्षक, उपशीर्षक आ अनुलग्नकक क्रमांकित अंशक कारण अछि। एहि शोधपत्रक अन्तिम “सम्पूर्ण रचना-आवरणिका”मे वास्तविक पाठ-विभाजनक सभ स्वतंत्र एकाइ दर्ज अछि।

प्रारम्भिक अनुक्रम पोथी केँ आठ बड़ विषयगत आन्दोलनमे बाँटैत अछि: (१) स्वप्नमे मिज्झर होइत; (२) स्वप्न, जागरण आ मिज्झर समय; (३) ओस, देहरी आ घरक नेह; (४) अर्थ, भाषा आ लोकजीवनक अँजोर; (५) भाषा; (६) प्रश्न; (७) अनेक दिशाक दार्शनिक आकाश; (८) सन्देह, अनुभव, इतिहास आ न्याय। एहि क्रममे निजी अनुभूति सँ सामाजिकता, लोक सँ भाषा, भाषा सँ दर्शन, दर्शन सँ इतिहास-न्याय आ फेर अनुवाद दिस विस्तार स्पष्ट अछि।

२.१ खण्डगत रचना-वितरण

३. काव्य-भाषा : लोक-शब्द, दार्शनिक अमूर्तन आ दृश्यात्मकता

एहि पोथीक भाषिक विशिष्टता ई अछि जे “माटि”, “आँगन”, “ओसारा”, “पएर”, “अँजुरी”, “पात”, “पोखरि”, “करघा”, “बीआ”, “धुँआ”, “भोर” सन ठोस लोक-छविसभक संग “प्रमाण”, “कारण”, “सम्बन्ध”, “सत्ता”, “अस्तित्व”, “इतिहास”, “कर्तव्य”, “निषेध”, “अभेद” सन दार्शनिक पद एकहि वाक्य-लयमे प्रवेश करैत अछि। फलतः अमूर्त विचार शुष्क परिभाषा बनि नहि रहैत; ओकरा दृश्य, देह, माटि आ घरेलू क्रियाक उपमा भेटैत अछि। “ज्ञानक चारि दुआर”, “तर्कक फूल”, “सत्यक धागा”, “करुणाक करघा”, “प्रश्नक देहरी” अथवा “अर्थक खुलल वन” एही प्रवृत्तिक नामकरण-उदाहरण अछि।

कवितासभमे “देहरी” बारम्बार सीमा आ संक्रमणक प्रतीक बनैत अछि। घरक देहरी निजी–सामाजिक, ज्ञात–अज्ञात, देह–चेतना, इतिहास–मुक्ति, परम्परा–नवता आ भाषा–मौनक बीचक सीमा बनि सकैत अछि। “उजास” दोसर अत्यन्त आवर्ती बिम्ब अछि; ई केवल प्रकाश नहि, स्पष्टता, बोध, प्रमाण, करुणा, नैतिक विवेक आ मुक्ति—सभक रूपक बनैत अछि। एहि पुनरावृत्तिसँ संग्रहमे एक प्रकारक अन्तःलय बनैत अछि, यद्यपि किछु दीर्घ दार्शनिक अनुक्रममे एकहि रूपकक अधिक प्रयोग शैलीगत समानता उत्पन्न करैत अछि।

खण्ड ३ आ ४ मे भाषा अधिक आत्मीय, लघु-पंक्तिक, स्पर्शात्मक आ घरेलू अछि; खण्ड ५ सँ ८ धरि वाक्य दीर्घ, संकल्पनात्मक आ तर्क-क्रमवाला भऽ जाइत अछि। एहि रूपान्तरणकेँ “कविता सँ निबन्ध”क साधारण दूरी कहब उचित नहि, कारण लेखक दार्शनिक विवेचनमे सेहो छन्दोन्मुख आवृत्ति, समान्तर वाक्य, बिम्बक पुनरागमन आ ध्वन्यात्मक संतुलन रखैत छथि। ताहि कारण ई “दार्शनिक पद्य-निबन्ध” अथवा “काव्यात्मक दर्शन-लेखन”क एक मिश्र विधा निर्मित करैत अछि।

४. स्वप्न, काल आ इतिहास : ग्रन्थक मूल अक्ष

खण्ड १ क “कालक धार पार अनन्तक उजास” संग्रहक दार्शनिक घोषणापत्र समान अछि। एतय इतिहासक उपयोगिता—राजनीति, सामाजिक घाव, अन्याय, सांस्कृतिक परिवर्तन, स्मृति—स्वीकारल गेल अछि, मुदा इतिहासकेँ मनुष्यक अन्तिम अस्तित्वगत आश्रय मानबाक विरोध अछि। रचना रेखीय प्रगति-वाद आ ऐतिहासिक अनिवार्यताक हिंस्र सम्भावना पर प्रश्न करैत अछि: भविष्यक नाम पर वर्तमान मनुष्यकेँ साधन बना देबाक विचारक नैतिक खतरा स्पष्ट कएल गेल अछि। एहि ठाम कालातीत मूल्य इतिहासक पलायन नहि, इतिहासक नैतिक मापदण्डक रूपमे सामने अबैत अछि।

ई दृष्टि पाश्चात्य इतिहास-दर्शनक दू ध्रुवक बीच संवाद करैत देखाइत अछि। एक दिस इतिहासक अर्थ, क्रम, अभिप्राय आ कथात्मक पुनर्रचना; दोसर दिस “इतिहास स्वयं नैतिक न्यायाधीश नहि” ई आग्रह। एतय घटनाक तथ्य आ घटनाक मूल्यांकन अलग स्तर अछि। “घटनाक क्रम सँ ऐतिहासिक बोध धरि” मे इतिहासकारक पाछाँक ज्ञानकेँ अतीतक पात्र पर थोपबाक विरुद्ध चेतावनी विशेष महत्त्वपूर्ण अछि; अभिकर्ताक उपलब्ध सम्भावना, लक्ष्य, भय आ अपूर्ण ज्ञानकेँ ओहि समयक भीतर सँ बुझबाक आग्रह ऐतिहासिक सहानुभूति आ आलोचनात्मक दूरी दुनूकेँ संग रखैत अछि।

स्वप्न एहि इतिहास-दृष्टिक विरुद्ध नहि, ओकर सहचर अछि। स्वप्न स्मृतिसँ असम्बद्ध कल्पना नहि, बल्कि अनुभवक पुनर्संयोजन अछि। निजी स्मृति, लोककथा, दार्शनिक प्रश्न, सामाजिक हिंसा आ कालानुभूति जखन एकहि चेतनामे पुनःगठित होइत अछि, तखन “मिज्झर” रूपक उचित बनैत अछि। ई मिज्झरता इतिहासक अभिलेखीय अनुशासनकेँ नकारैत नहि; बल्कि कहैत अछि जे मनुष्य इतिहास केवल बाहरी क्रममे नहि, स्मृति, भय, इच्छा, मूल्य आ भाषा द्वारा सेहो जीबैत अछि।

५. भारतीय दार्शनिक पद्धतिसँ पाठ

भारतीय दर्शनक कसौटी पर ग्रन्थक सबसँ उल्लेखनीय पक्ष “सम्प्रदाय-सूची”क पुनरुक्ति नहि, प्रश्न-केन्द्रित प्रस्तुति अछि। प्रत्यक्ष की? अनुमान कखन वैध? शब्द कखन प्रमाण? जगत यथार्थ कि चेतनाक रूप? आत्मक निरन्तरता केना बुझल जाए? कर्म आ कर्तव्यक सम्बन्ध की? मुक्ति बाहरी संस्था सँ कि भीतरक भ्रम सँ? ई प्रश्न न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य, योग, वेदान्त, बौद्ध आ जैन धारा केँ एक-दोसरक पाछाँ क्रमशः रखने बिना समान समस्याक अलग उत्तरक रूपमे सामने आनैत अछि।

“प्रमाणक छह दीप” आ “ज्ञानक चारि दुआर” प्रमाणमीमांसाक काव्यात्मक पुनर्विन्यास अछि। प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान आ शब्दक संग अन्य प्रमाण-पद्धतिसभक चर्चा ई स्पष्ट करैत अछि जे लेखक “ज्ञान”केँ केवल अनुभूति नहि, वैधताक प्रश्न मानैत छथि। एहि बिन्दु पर संग्रह दार्शनिक कविता मात्र नहि, ज्ञानमीमांसात्मक शिक्षण-पाठो बनि जाइत अछि। मुदा साहित्यिक दृष्टिसँ ओकर सफलता तखन अधिक अछि जखन सिद्धान्त उपमा, दृश्य अथवा मानवीय परिस्थिति संग जुड़ैत अछि; केवल क्रमिक परिभाषा-खंडमे काव्यात्मक तनाव कम होइत अछि।

बौद्ध, जैन आ वेदान्तीय सूत्रसभक समानान्तर उपस्थिति ग्रन्थकेँ एकमात्र “अद्वैत” अथवा “शून्यवाद”क पुस्तक बनबाक सँ रोकैत अछि। कतेको रचनामे स्थिर आत्म अथवा आधारक सम्भावना अछि, कतेको ठाम स्वभावगत स्थिरताक विघटन, क्षण, परस्परता, अनेक दृष्टि आ अहिंसक सत्यक आग्रह। “सात भंगीक खिड़की सँ अहिंसक सत्य” शीर्षक जैन स्याद्वादक बहुपक्षीयता केँ नैतिक विनम्रतासँ जोड़ैत अछि; एतय दृष्टिकोणक मर्यादा स्वयं अहिंसाक ज्ञानमीमांसात्मक रूप बनैत अछि।

रस, कला आ सौन्दर्य पर आधारित रचनासभ—विशेषतः “सुन्दरक सीमा सँ पार कला” आ “रसक क्षणमे जगत आनन्द बनल”—भारतीय काव्यशास्त्रीय परम्परा केँ दर्शनक अन्य प्रश्नसभक संग जोड़ैत अछि। एतय कलात्मक अनुभूति निजी सुखक वस्तु नहि, अनुभवक साधारणीकृत, साझा आ रूपान्तरकारी स्थिति बनैत अछि। एहि कारण संग्रह अपन साहित्यिक आलोचना स्वयं भीतर सँ करैत देखाइत अछि: कविता केवल विचार पहुँचाबयक पात्र नहि, ज्ञानक एक अलग अनुभूतिक माध्यम अछि।

६. पाश्चात्य दार्शनिक पद्धतिसँ पाठ

खण्ड ७–८ मे पाश्चात्य दर्शनक प्रश्नसभ प्रत्यक्ष नामोल्लेख सँ बेसी संकल्पनात्मक शीर्षक द्वारा प्रवेश करैत अछि। “सन्देहक दीप सँ निश्चयक आकाश धरि” पद्धतिगत सन्देह, चेतन-अस्तित्व आ निश्चित आधारक खोजक अनुक्रम रचैत अछि; “अनुभवक धार पर कारणक प्रश्न” अनुभववादक समस्या; “वस्तुक आभास सँ चेतनाक अन्तराल धरि” आ “अभिमुख चेतना सँ स्वतन्त्र अस्तित्व धरि” अनुभूति, अभिप्रायिता आ वस्तु-स्वातन्त्र्यक तनाब; “वाक्यक अर्थ सँ तार्किक सत्य धरि” भाषा–तर्क सम्बन्ध; “फेंकल क्षणसँ मृत्यु-दिशि खुलल समय” अस्तित्व, सीमास्थिति आ मृत्युबोधक दिशा खोलैत अछि।

एहि रचनासभक शक्ति “पाश्चात्य” केँ एक समरूप इकाई नहि बनायबमे अछि। तर्कीय विश्लेषण, अनुभववाद, प्रत्ययवाद, अस्तित्ववाद, नैतिक दर्शन, धर्म-दर्शन, इतिहास-दर्शन—सभ एकहि आकाशमे अलग-अलग दिशा जकाँ रखल गेल अछि। “पूब-पश्चिमक बीच एकहि उजास” तुलना केँ श्रेष्ठता-प्रतियोगिता सँ हटाकऽ प्रश्न-साझेदारी बनबैत अछि: भाषा भिन्न, पर मनुष्यक सत्य, पीड़ा, ज्ञान, कर्तव्य आ मुक्ति सम्बन्धी प्रश्न बहुधा संवाद योग्य अछि।

पाश्चात्य इतिहासचिन्तनक दृष्टिसँ ग्रन्थक “कथा” आ “इतिहास”क सम्बन्ध विशेष फलदायी अछि। इतिहासक घटना केवल तथ्यक ढेरी नहि; क्रम, उद्देश्य, परिणाम, विफलता, आकस्मिकता आ पुनर्व्याख्या द्वारा अर्थ पबैत अछि। ई विचार इतिहासक कथात्मक संरचना प्रति सजग अछि, मुदा कथात्मकता केँ मनमानी कथा बनायबक छूट नहि दैत; प्रमाण, समय-सापेक्ष दृष्टि आ अभिकर्ताक सीमित ज्ञानक अनुशासन एकरे संग जुड़ल अछि।

७. नव्य-न्याय समीक्षा : सूक्ष्म भेद, सम्बन्ध आ भाषिक औजार

नव्य-न्याय दृष्टिसँ संग्रहक सबसँ महत्त्वपूर्ण रचना “सूक्ष्म भेदक नोक पर अर्थ” अछि। एतय ज्ञान, ज्ञाता, वस्तु, गुण आ सम्बन्धकेँ एकसाथ न मिला देबाक आग्रह अछि। लाल फूल देखबाक उदाहरणमे केवल “लाल” आ “फूल” नहि, लालिमाक फूलमे अवस्थित सम्बन्ध, ज्ञानक विषयता, संकेतक स्थान-काल-सापेक्षता आ परिभाषाक सूक्ष्मता पर बल देल गेल अछि। नव्य-न्याय परम्पराक मौलिक योगदान एही प्रकारक विश्लेषणात्मक भाषा अछि—जाहि सँ अस्पष्ट दार्शनिक दावाकेँ घटकसभमे तोड़ि जाँचल जा सकय।

ग्रन्थक अनेक शीर्षक स्वयं नव्य-न्यायीय मनोवृत्ति धारण करैत अछि: “भेदक सूक्ष्म रेखा, सम्बन्धक मौन सूत्र”, “वाक्यक संगति, ज्ञानक अपन उजास”, “ज्ञानक दर्पण, हेतुक डोरी”, “नियमक जालमे अर्थ खोजैत मनुष्य”, “पहिचानक धरती, वाक्यक मौन पूर्वशर्त”। एहि सभमे अर्थ केवल शब्दकोशीय वस्तु नहि; सम्बन्ध, पात्रता, सन्दर्भ, वक्ता, संकेत आ ज्ञान-स्थितिक संयुक्त फल अछि।

तथापि नव्य-न्यायक कसौटी अत्यन्त कठोर अछि। जखन कविता “आत्मा”, “अनन्त”, “उजास”, “आधार”, “साक्षी” सन पदक उपयोग करैत अछि, तखन विश्लेषण पूछत—एहि पदक अवच्छेदक की? सम्बन्धक प्रकार की? ज्ञानक विषय केना निर्धारित? दावाक प्रमाण की? एहि कसौटीसँ संग्रहक काव्यात्मक सार्वत्रिकताक किछु अंश दार्शनिक प्रतिज्ञा रूपमे अपर्याप्त ठहरि सकैत अछि। मुदा साहित्यिक विधामे ई अपूर्णता अनिवार्य रूपेँ दोष नहि; कविताक कार्य कखनो दार्शनिक सूत्र सिद्ध करब नहि, प्रश्नक सूक्ष्मता जागृत करब सेहो अछि। सर्वोत्तम रचनासभ तखन सफल छथि जखन रूपक आ विश्लेषण एक-दोसरकेँ सीमित आ प्रकाशमान करैत अछि।

८. विदेह समानान्तर ऐतिहासिक पद्धति : परिभाषा आ अनुप्रयोग

एहि ग्रन्थसँ उभरैत “विदेह समानान्तर ऐतिहासिक पद्धति” केँ चारि प्रमुख सिद्धान्तमे चिन्हल जा सकैत अछि। पहिल, इतिहासकेँ एकरेखीय केन्द्र सँ नहि, समान समय अथवा समान प्रश्नक अनेक भूगोल आ परम्परा सँ पढ़ब। दोसर, अभिलेखीय घटना संग भाषा, लोकस्मृति, दार्शनिक अवधारणा, साहित्यिक रूप आ सामाजिक अनुभवकेँ समानान्तर साक्ष्य-क्षेत्र मानब। तेसर, “पूर्व–पश्चिम”, “शास्त्र–लोक”, “परम्परा–आधुनिकता” सन द्वंद्व केँ स्थिर श्रेणी नहि मानि संवादात्मक अक्ष बनायब। चारिम, वर्तमान प्रश्नक आलोकमे अतीत पढ़ितहुँ अतीत पर वर्तमानक अन्तिम ज्ञान आरोपित नहि करब।

ई पद्धति खण्ड ५–८ मे विशेष स्पष्ट अछि। उदाहरणार्थ भाषा पर विचार मातृभाषा, स्मृति, सांस्कृतिक सत्ता, ज्ञानक अभिव्यक्ति आ विचार-स्वराजकेँ एकसाथ जोड़ैत अछि। इतिहास पर विचार घटना-क्रम, कथात्मकता, अभिकर्ताक दृष्टि, नैतिक मूल्यांकन आ कालातीत मानक केँ अलग-अलग स्तरमे रखैत अछि। दर्शन पर विचार एक सम्प्रदायकेँ “अन्तिम” नहि मानि एकहि प्रश्नपर अनेक उत्तरक समानान्तर पंक्ति बनबैत अछि। एहि अर्थमे संग्रह स्वयं अपन पद्धतिक प्रयोगशाला अछि।

समानान्तर पद्धतिक सबसँ पैघ लाभ केन्द्र-विमर्शक विघटन अछि। मिथिला अथवा मैथिली एतय “क्षेत्रीय” परिशिष्ट नहि; ई विश्वदर्शनक प्रश्न पूछबाक पूर्ण भाषिक-दार्शनिक स्थल अछि। मैथिलीमे प्रमाणमीमांसा, अस्तित्व, इतिहास, नैतिकता, सौन्दर्य आ भाषादर्शनक विस्तृत लेखन स्वयं ज्ञान-भूगोलक पुनर्संतुलन अछि। मुदा समानान्तरता तखनहि विश्वसनीय रहत जखन तुलनाक दुनू/अनेक पक्षक ऐतिहासिक विशिष्टता, शब्दार्थ आ मूल तर्क सुरक्षित राखल जाए; सतही “सभ एकहि बात कहैत अछि” प्रकारक समन्वय एहि पद्धतिक विरोधी अछि।

९. खण्ड-दर-खण्ड साहित्यिक समीक्षा

९.१ खण्ड १ — स्वप्नमे मिज्झर होइत

ई खण्ड दीर्घ दार्शनिक पद्य-निबन्धसभ द्वारा काल, मुक्ति, धरती, सत्य, दुःख, परिवर्तन, घर, दर्पण, श्वास, कण, आगि, अनाम उजास आ अनेक मार्गक प्रश्न बनबैत अछि। रूपक-तंत्र अत्यन्त सघन अछि। “कालक धार…” इतिहासक नैतिक सीमा निर्धारित करैत अछि; “प्रश्नक देहरी…” प्रश्नकेँ मुक्ति-मार्ग बनबैत अछि; “हथेली भरि धरती…” अमूर्त दर्शनकेँ देहधारी अनुभवमे लौटबैत अछि। एहि खण्डक मुख्य सौन्दर्य विशाल विचारकेँ घरेलू/प्राकृतिक वस्तुसभ द्वारा दृश्य बनायब अछि; मुख्य जोखिम दीर्घता आ समान रूपकक पुनरावृत्ति।

९.२ खण्ड २ — स्वप्न, जागरण आ मिज्झर समय

एतय संग्रह सर्वाधिक बहुरूपी अछि। लोकविश्वास, नव व्यवस्था, जाति-सामाजिक टिप्पणी, कुमारिल, आकांक्षा, देह, ग्रामजीवन, हाइकू/शेनर्यू/टनका, कुण्डलिया, गजल, ध्वज-गीत, कर्ण-स्मृति, स्वप्न-विहीन शून्य, भय, माया-अविद्या—सभ एकहि खण्डमे। ई विविधता कविक दीर्घ रचनात्मक कालक अभिलेखक अनुभूति दैत अछि। पाठकीय दृष्टिसँ ई खण्ड “संग्रह”क अर्थमे वास्तविक संग्रहालय अछि; सम्पादकीय दृष्टिसँ उपविभाजन आ अधिक स्पष्ट कालक्रम देलासँ नेविगेशन आरो सुदृढ़ भऽ सकैत अछि।

९.३ खण्ड ३ — ओस, देहरी आ घरक नेह

ई खण्ड लघुता, नर्म बिम्ब आ घरेलू स्मृति लेल उल्लेखनीय अछि। देहरी, बोली, मेघ, अँगुरी, अँजुरी, आँगन, नेना, खूँटी, माटि, चिड़ै—ई शब्द-संसार दार्शनिक दावासँ बेसी अनुभूतिक सूक्ष्मता पर भरोस करैत अछि। “घर” एतय भवन नहि, भाषा-स्मृति आ सम्बन्धक भावात्मक भूगोल अछि। एहि खण्डमे संग्रहक सर्वाधिक गीतात्मक साँस भेटैत अछि।

९.४ खण्ड ४ — अर्थ, भाषा आ लोकजीवनक अँजोर

एतय लोकजीवन आ भाषिक अर्थ एक-दोसरक विस्तार बनैत अछि। रोटी, करघा, अलपना, थारी, मेहनत, चौक, फूल, पाथर, नाव, किनार—सभ दार्शनिक शब्दावलीक बराबर महत्त्व पबैत अछि। “सभ चाबी एक नहि” आ “प्रश्नकेँ खोलू” बहुविध व्याख्या आ संवादक नैतिकता व्यक्त करैत अछि। एहि खण्डक सामाजिक चेतना प्रत्यक्ष नाराबाजी सँ बचि दैनिक वस्तु आ श्रमक दृश्य द्वारा बनैत अछि।

९.५ खण्ड ५ — भाषा

ई खण्ड संग्रहक वैचारिक केन्द्र अछि। मातृभाषा, विचार-स्वराज, अनुभव, संस्कृति, व्यक्ति–समाज, ज्ञानमीमांसा, आत्म, सौन्दर्य, ध्वनि-अर्थ, मानवता, नैतिक निर्णय, माटि आ अनेक बौद्धिक दिशासभ विस्तृत पद्य-निबन्धमे खुलैत अछि। “भाषा जे भीतर घर करैत अछि” भाषाकेँ पीढ़ीगत स्मृति बनबैत अछि; “मैथिलीक नव खेत” भाषिक सृजनकेँ खेतीक रूपकसँ जोड़ैत अछि। खण्डक विशिष्टता ई जे भाषा केवल माध्यम नहि—ज्ञान-निर्माणक संस्था अछि।

९.६ खण्ड ६ — प्रश्न

शीर्षक अनुरूप ई खण्ड उत्तरक समाहार नहि, प्रश्नक भूगोल अछि। श्रुति, सूत्र, साक्षी–प्रकृति, अभेद, कर्म, पुरुषार्थ, तर्क, पदार्थ, शब्द, राजदण्ड, शून्य, सम्बन्ध, अनेकता, प्रेम, आगम, विद्रोह, लोक, दुःख, श्रम, रस आ इतिहास—प्रत्येक रचना अलग परम्परा अथवा समस्या दिशि दुआर खोलैत अछि। साहित्यिक रूपमे ई संक्रमण-खण्ड अछि: भाषा-केंद्रित चिन्तन सँ व्यवस्थित तुलनात्मक दर्शन दिस।

९.७ खण्ड ७ — अनेक दिशाक दार्शनिक आकाश

ई पोथीक सबसँ विस्तृत तुलनात्मक दार्शनिक खण्ड अछि। भारतीय आ पाश्चात्य परम्पराक अनेक विचार-प्रकार—कारण, सत्ता, प्रत्यभिज्ञा, मध्यम मार्ग, संशय, तर्क, प्रमाण, समाज, इतिहास, प्रेम, कर्म, निषेध, भाषा, श्रम, नैतिकता, प्रतिवाद, समय, स्वतन्त्रता, कृपा, नियम, अनुभव, अस्तित्व, अनेकान्त—क्रमशः काव्यात्मक निबन्ध बनैत अछि। एहि खण्डक मूल्य “नाम-संग्रह” नहि, समस्यासभक पुनःरचना अछि। मुदा दार्शनिक पाठक लेल मूल ग्रन्थ/सिद्धान्तक सूक्ष्म भिन्नताक स्पष्ट संदर्भ कतेको ठाम उपयोगी रहित।

९.८ खण्ड ८ — सन्देह, अनुभव, इतिहास आ न्याय

अन्तिम मुख्य खण्ड पाश्चात्य ज्ञानमीमांसा, तर्क, धर्म-दर्शन, इतिहास-दर्शन आ न्याय-चिन्तनक अधिक संगठित अनुक्रम अछि। “सन्देहक दीप…” सँ “अक्षरक पार जे उजास” धरि यात्रा सन्देह–निश्चय, अनुभव–कारण, आभास–यथार्थ, भाषा–तथ्य, प्रयोग–अर्थ, निजी संकेत–साझा कसौटी, चेतना–अस्तित्व, विश्वास–अशुभ, इतिहास–बोध आ कानून–न्यायक जोड़ीसभ पर चलैत अछि। ई खण्ड पुस्तकक बहुध्रुवीय यात्रा केँ पद्धतिगत समापन दैत अछि।

१०. अनुवाद खण्ड : संक्षेप, पुनर्कथन आ भाषिक स्थानान्तरण

“त्वञ्चाहञ्च” महाभारतक अठारह पर्वक अति-संक्षिप्त मैथिली गीत-प्रबन्ध अछि। ई शब्दशः अनुवाद नहि, घटनाक चयनित पुनर्कथन आ नैतिक-पुनर्वाचन अछि। आरम्भिक पंक्तिसभमे स्वयं प्रश्न अछि जे महाभारत धर्मग्रन्थ रूपमे केना पढ़ल गेल, असमानता, प्रतिभा-दमन, परिवार-मोह, युद्ध आ सत्ता-संघर्षक अर्थ की। अन्तिम निष्कर्षमे “त्वञ्चाहञ्च” कें आपसी लड़ाइक लगातार महामारि समान देखल गेल अछि। अतः ई अनुवादक संग समकालीन आलोचनात्मक हस्तक्षेप सेहो अछि।

“असञ्जाति मन” बुद्धचरितक अति-संक्षिप्त मैथिली रूपान्तर अछि। अठाइस सर्गक क्रम बनाए रखब एकर संरचनात्मक विशेषता अछि। काव्य बुद्धक जीवन, दुःख, वैराग्य, साधना, बोध आ करुणाक यात्रा केँ मैथिली गीत-लयमे संकुचित करैत अछि। संक्षेपक कारण मूलक अलंकारिक विस्तार, संस्कृत महाकाव्यीय विवरण आ दार्शनिक सूक्ष्मता घटैत अछि, मुदा कथाक मूल धुरी स्थानीय पाठक लेल सुगम बनैत अछि।

तेसर अनुलग्नक [Second Person Singular] केर अंग्रेजी आमुखक मैथिली अनुवाद अछि। एहि सँ पोथीक अनुवाद-दृष्टि केवल प्राचीन संस्कृतसँ मैथिली धरि सीमित नहि रहैत; आधुनिक मैथिली काव्यक अंग्रेजी माध्यम सँ पुनः मैथिलीमे प्रत्यावर्तन सेहो सामने अबैत अछि। ई चक्रीय अनुवाद भाषा, आत्म-व्याख्या आ पाठकीय समुदायक सम्बन्ध पर रोचक प्रश्न उठबैत अछि।

११. रूप, लय आ काव्य-शिल्प

संग्रहक शिल्प समानरूप नहि। लघु गीत, लोकगीत, गजल, हाइकू/शेनर्यू/टनका, कुण्डलिया, मुक्तछन्द, दीर्घ पद्य-निबन्ध, गीत-प्रबन्ध आ अनुवाद—सभ रूप उपस्थित अछि। एतय “एक काव्यशास्त्र” खोजब कठिन; अधिक उचित ई कहब जे लेखक प्रश्नक प्रकृति अनुसार रूप बदलैत छथि। निजी स्मृति लघु पंक्ति माँगैत अछि, दार्शनिक बहस दीर्घ तर्क-खंड, महाकाव्यीय अनुवाद कथा-गति।

बारम्बार प्रयुक्त विन्यास—विरोधी अथवा पूरक पदक जोड़: “भीतर/बाहर”, “क्षण/अनन्त”, “नाम/अनाम”, “एक/अनेक”, “शब्द/मौन”, “इतिहास/मुक्ति”, “देह/आकाश”, “प्रमाण/विश्वास”—संग्रहक रचनात्मक व्याकरण बनैत अछि। ई द्विपदीय संरचना पाठकेँ यादगार बनबैत अछि, मुदा अत्यधिक प्रयोग किछु शीर्षकमे पूर्वानुमेयता सेहो आनैत अछि। भविष्यक सम्पादित संस्करणमे समान रूपक/शीर्षकीय संरचनाक घनत्व घटाकऽ विशेष रचनासभक अलग पहचान आरो प्रखर कएल जा सकैत अछि।

१२. आलोचनात्मक निष्कर्ष

“स्वप्न मे मिज्झर होइत” केर साहित्यिक महत्त्व ओकर विशालता मात्र नहि, बल्कि भाषा आ ज्ञानक सम्बन्ध पर कएल प्रयोगमे अछि। मैथिली एतय घरेलू संवेदनाक भाषा रहितहुँ दर्शन, इतिहास, तर्क, नैतिकता आ तुलनात्मक बौद्धिक विमर्शक सक्षम माध्यम सिद्ध होइत अछि। पुस्तकक श्रेष्ठ क्षण ओ अछि जतय लोक-बिम्ब आ दार्शनिक प्रश्न एक-दोसरकेँ आलोकित करैत अछि—माटि प्रमाणक विरुद्ध नहि, करघा नैतिकता सँ अलग नहि, देहरी ज्ञानमीमांसाक सीमा बनि सकैत अछि, आ भोर इतिहासक नूतन सम्भावना।

भारतीय दृष्टिसँ ई ग्रन्थ प्रश्नाधारित बहु-दर्शनक स्थल; पाश्चात्य दृष्टिसँ सन्देह, अनुभव, भाषा, इतिहास आ अस्तित्वक संवाद; नव्य-न्याय दृष्टिसँ अर्थ-सूक्ष्मता आ सम्बन्ध-विश्लेषणक अभ्यास; विदेह समानान्तर इतिहासक दृष्टिसँ अनेक काल, परम्परा, भूगोल आ भाषिक चेतनाक सहपाठ अछि। एकर सबसँ पैघ आलोचनात्मक चुनौती दीर्घता, पुनरावृत्त रूपक, किछु दर्शनक अत्यधिक संक्षेप, आ शब्द-मानकीकरणक असमानता अछि। मुदा ई चुनौतीसभ संग्रहक परियोजनाक पैमाना सँ उत्पन्न—आ व्यवस्थित सम्पादकीय निखारसँ सुधार योग्य—अछि।

अन्ततः पोथी “एक उत्तर” नहि दैत; ओ उत्तरसभक बीचक सम्बन्ध, सीमा आ नैतिक दायित्व पर विचार करबैत अछि। एहि कारण ओकर शीर्षकक “मिज्झर” अवस्था निष्कर्षहीनता नहि, बहुध्रुवीय ज्ञानक रूपक बनैत अछि: स्वप्न जागरणमे, लोक दर्शनमे, इतिहास स्मृतिमे, पूर्व पश्चिममे, कविता तर्कमे—मुदा कोनो एक दोसरामे पूर्णतः बिलायल बिना। एहि भिन्नतासहित सह-अस्तित्वमे ग्रन्थक मौलिकता अछि।

१३. सम्पूर्ण रचना-आवरणिका

नीचाँ मूल पाठक स्वतंत्र शीर्षक-एकाइ क्रमशः दर्ज अछि। “पाठ-सूत्र” प्रत्येक रचनाक वास्तविक पाठमे सर्वाधिक आवर्ती अर्थवाही शब्दसभ सँ निकालल संक्षिप्त संकेत अछि; ई सारांशक विकल्प नहि, बल्कि कविताक मुख्य शब्द-क्षेत्रक पाठाधारित सूचक अछि। एहि आवरणिकाक उद्देश्य ई सुनिश्चित करब अछि जे पोथीक कोनो स्वतंत्र रचना समीक्षा-सूची सँ बाहर नहि रहय।

प्रारम्भिक पद्य

1. अनचिन्हार आखर — पृ. 16; पाठ-परिमाण 50 शब्द; पाठ-सूत्र: मोन, गेल, बड़द, एतऽ, भोथियाय.

2. स्वप्न मे मिज्झर होइत……. — पृ. 16; पाठ-परिमाण 0 शब्द; पाठ-सूत्र: स्वप्न, मिज्झर.

3. मृत्यु गीत (लोकगीत) — पृ. 16; पाठ-परिमाण 54 शब्द; पाठ-सूत्र: कहमा, हंसा, समाएल, रामा, मोकाम.

स्वप्नमे मिज्झर होइत

4. कालक धार पार अनन्तक उजास — पृ. 18; पाठ-परिमाण 2877 शब्द; पाठ-सूत्र: यदि, केँ, अन्तिम, कालक, अधिक.

5. प्रश्नक देहरीसँ मुक्तिक आकाश — पृ. 28; पाठ-परिमाण 2220 शब्द; पाठ-सूत्र: यदि, केँ, दोसरक, अज्ञान, किछु.

6. हथेली भरि धरती, आँखि भरि सत्य — पृ. 35; पाठ-परिमाण 2367 शब्द; पाठ-सूत्र: यदि, देह, अपने, केँ, सन्देह.

7. एक पात पर सात दिशाक ओस — पृ. 43; पाठ-परिमाण 4010 शब्द; पाठ-सूत्र: यदि, दोसर, अपने, कोनो, अधिक.

8. दुःखक गाँठ खोलैत भोर — पृ. 56; पाठ-परिमाण 1948 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, अधिक, मुक्ति, पीड़ा, यदि.

9. लौ बदलैत रहैत, उजास चलैत — पृ. 62; पाठ-परिमाण 1522 शब्द; पाठ-सूत्र: बदलैत, केँ, स्थिर, कारणक, दोसर.

10. चार खिड़की आ एक खुलल आकाश — पृ. 67; पाठ-परिमाण 1857 शब्द; पाठ-सूत्र: यदि, केँ, मुक्ति, दोसर, बाहरी.

11. मुट्ठीक भीतर जे घर नहि — पृ. 73; पाठ-परिमाण 1953 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, अधिक, स्थिर, बदलैत, सम्बन्ध.

12. दर्पणक पार जे देखैत अछि — पृ. 78; पाठ-परिमाण 1803 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, साक्षी, वस्तु, अलग, पूर्ण.

13. श्वासक भीतर एक स्थिर आकाश — पृ. 82; पाठ-परिमाण 1574 शब्द; पाठ-सूत्र: ध्यान, श्वास, केँ, मनक, अधिक.

14. एक-एक कणक अपन चेहरा — पृ. 86; पाठ-परिमाण 1730 शब्द; पाठ-सूत्र: किछु, केँ, वस्तु, गुण, सम्बन्ध.

15. धुँआक पार जे आगि अछि — पृ. 90; पाठ-परिमाण 1701 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, तर्क, बेठीक, कारण, निष्कर्ष.

16. अनेक नामक पाछाँ एक अनाम उजास — पृ. 94; पाठ-परिमाण 1577 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, धीरे, नाम, अनेक, कियो.

17. भीतरक आकाश, बाहरक आकाश — पृ. 97; पाठ-परिमाण 1584 शब्द; पाठ-सूत्र: नाम, गहिर, अधिक, केँ, अलग.

18. तीन दुआर, एके अनन्तक दिस — पृ. 102; पाठ-परिमाण 2197 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, परम, भेद, दोसर, भिन्नता.

19. दू हवाक बीच जागैत नव भोर — पृ. 107; पाठ-परिमाण 2610 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, नवा, भीतरक, पुरान, अधिक.

स्वप्न सँ पहिने

20. नजरि लागि जाइ छै — पृ. 115; पाठ-परिमाण 174 शब्द; पाठ-सूत्र: लागि, जाइ, नजरि, छथि, सुरसुरी.

21. भाग्यशाली — पृ. 115; पाठ-परिमाण 208 शब्द; पाठ-सूत्र: छथि, तेहेन, विरुद्ध, हारि, विचित्र.

22. जाइत जाइत — पृ. 117; पाठ-परिमाण 154 शब्द; पाठ-सूत्र: देश, घुरि, दूरस्त, कोनो, रस्ता.

23. बिलाइत आसक चेन्हासी — पृ. 118; पाठ-परिमाण 20 शब्द; पाठ-सूत्र: गाछ, दुनू, कात, संगे, जाइ.

24. घ — पाठ-परिमाण 3 शब्द.

25. हो — पाठ-परिमाण 2 शब्द.

26. चे — पाठ-परिमाण 13 शब्द; पाठ-सूत्र: न्हा, अन्हार, गुज्ज, आसक, चेन्हासी.

27. शामिल बाजाक दुन्दभी वादक — पृ. 119; पाठ-परिमाण 186 शब्द; पाठ-सूत्र: छथि, चित्र, हहाइत, अनन्तक, सुनैत.

28. मन्दाकिनी जे आकाश मध्य — पृ. 120; पाठ-परिमाण 99 शब्द; पाठ-सूत्र: छाड़ल, धार, मन्दाकिनी, आकाश, मध्य.

29. नव व्यवस्था — पृ. 121; पाठ-परिमाण 0 शब्द; पाठ-सूत्र: व्यवस्था.

30. नव व्यवस्थाक मनुक्ख — पृ. 121; पाठ-परिमाण 50 शब्द; पाठ-सूत्र: मनुक्ख, आस्वाद, गेल, आम्रपाली, छथि.

31. नव व्यवस्थाक दलित — पृ. 121; पाठ-परिमाण 55 शब्द; पाठ-सूत्र: बच्चा, खञ्जित, भीख, पीयर, लाल.

32. नव व्यवस्थाक पुरहित — पृ. 122; पाठ-परिमाण 62 शब्द; पाठ-सूत्र: लघु, कम्पनी, उद्योगक, मालिक, उद्योगकेँ.

33. नव आ पुरान व्यवस्थाक हाट — पृ. 122; पाठ-परिमाण 112 शब्द; पाठ-सूत्र: छथि, व्यवस्थाक, तरकारी, होटलक, बनथि.

34. जखन मशीन आ बिलाड़ि दुनू बुझैए हमरा मृत — पृ. 123; पाठ-परिमाण 622 शब्द; पाठ-सूत्र: स्थान, मृत्यु, बिनु, भीष्म, इच्छा.

35. हाइ रे कुमारिल!! — पृ. 126; पाठ-परिमाण 274 शब्द; पाठ-सूत्र: दिल्ली, भगवान, डॉक्टर, दूर, अस्त.

36. बुद्धिक भरोसे गढ़ल नव सत्यक गढ़नि — पृ. 128; पाठ-परिमाण 0 शब्द; पाठ-सूत्र: बुद्धिक, भरोसे, गढ़ल, गढ़नि.

37. आकांक्षाक अग्नि — पृ. 128; पाठ-परिमाण 48 शब्द; पाठ-सूत्र: आकांक्षाक, कोनो, निरन्तरता, आँचब, प्रज्वलित.

38. अनुक्रमणिका आ विषय सूचीसँ आगाँ — पृ. 128; पाठ-परिमाण 71 शब्द; पाठ-सूत्र: छड़पि, लिखलाहाकेँ, छोड़ि, अनुक्रमणिका, विषय.

39. व्यावहारिक आ सैद्धांतिक — पृ. 128; पाठ-परिमाण 204 शब्द; पाठ-सूत्र: भेड़क, आकांक्षाक, हेंज, सैद्धांतिक, शिक्षक.

40. हमर शरीरक भाथीमे पैसैत अछि वायु — पृ. 130; पाठ-परिमाण 52 शब्द; पाठ-सूत्र: भाथीमे, पैसैत, वायु, अग्नि, दुनूक.

41. कबिराहाक कनसीपर उठैत धुन — पृ. 130; पाठ-परिमाण 92 शब्द; पाठ-सूत्र: हेंजक, दीप, पहीरि, बुझि, गेलौं.

42. भुजनाठीसँ लाड़ैत आकांक्षाक अग्नि — पृ. 130; पाठ-परिमाण 47 शब्द; पाठ-सूत्र: कनसारीक, भुज्जा, दाबापर, उझकुन, ओइपर.

43. अतिखाइन — पृ. 131; पाठ-परिमाण 16 शब्द; पाठ-सूत्र: मकइक, मखानी, सोन्हगर, झूर, नीक.

44. भैसाठ — पृ. 131; पाठ-परिमाण 49 शब्द; पाठ-सूत्र: पातर, अदहन, देल, पानि, आँच.

45. धेनुआर घानी — पृ. 131; पाठ-परिमाण 78 शब्द; पाठ-सूत्र: शोरा, घानी, अवशिष्ट, सुच्चा, नोन.

46. मन्तुर पढ़ि छत्ता लग जायब — पृ. 132; पाठ-परिमाण 107 शब्द; पाठ-सूत्र: मन्तुर, बिज्जी, चिड़ै, पढ़ि, छत्ता.

47. बकछुछरु खेलाइत भीखू संग — पृ. 132; पाठ-परिमाण 225 शब्द; पाठ-सूत्र: काज, भाय, भीखूक, मुन्हारि, साँझमे.

48. उजाहिमे उपलाइत हम आ माँछ — पृ. 134; पाठ-परिमाण 162 शब्द; पाठ-सूत्र: इछाइन, जाल, खिरबैत, नम्माधग्गी, बिड़इमे.

49. ठाढ़ लत्तीकेँ पढ़ैत छी — पृ. 135; पाठ-परिमाण 206 शब्द; पाठ-सूत्र: पात, पानक, गेल, भेने, जड़ि.

50. श्राद्ध ने मरा जाय — पृ. 136; पाठ-परिमाण 53 शब्द; पाठ-सूत्र: मृत्यु, श्राद्ध, दोसर, पिताक, भाय.

51. शलातुर गाम — पृ. 136; पाठ-परिमाण 120 शब्द; पाठ-सूत्र: अराड़ि, चक्र, घूमल, टूटल, ठाढ़.

52. बड़का सड़क छह लेन बला — पृ. 137; पाठ-परिमाण 531 शब्द; पाठ-सूत्र: माय, सड़क, लाल, गामक, रहै.

53. पक्काक जाइठ — पृ. 139; पाठ-परिमाण 87 शब्द; पाठ-सूत्र: जाठि, पोखरि, पोखरिक, लकड़ीक, टोलक.

54. पता नै घुरि कऽ जायब आकि… — पृ. 140; पाठ-परिमाण 276 शब्द; पाठ-सूत्र: घुरि, पता, जायब, आकि, एत्तै.

55. गजल — पृ. 142; पाठ-परिमाण 59 शब्द; पाठ-सूत्र: अनेरे, मुतकारिब, बहरे, रुक्न, लुन.

56. प्रकृति, पुरुष — पृ. 142; पाठ-परिमाण 611 शब्द; पाठ-सूत्र: प्रकृति, लगैए, हरदि, पनिसोखा, गाछ.

57. हाइकू/ शेनर्यू/ टनका — पृ. 145; पाठ-परिमाण 768 शब्द; पाठ-सूत्र: प्रकृति, अकास, नृत्य, ठाढ़, गाछ.

58. कुण्डलिया — पृ. 148; पाठ-परिमाण 178 शब्द; पाठ-सूत्र: नीक, बोल, करू, हुए, काल.

59. मिथिलाक ध्वज गीत — पृ. 149; पाठ-परिमाण 57 शब्द; पाठ-सूत्र: ध्वज, मिथिलाक, फहरायत, जगतमे, माँ.

टुटैत अबैत स्वप्नक बीच

60. जोति बड़द सोचमे पड़लौं — पृ. 149; पाठ-परिमाण 34 शब्द; पाठ-सूत्र: बड़द, मोन, गेल, भोथिआय, जोति.

61. बिसरलौं फेर- कर्णक मृत्युक छोट-छीन रूप — पृ. 149; पाठ-परिमाण 37 शब्द; पाठ-सूत्र: जाइ, गप्प, मोन, पड़ैत, खूब.

62. कटिहारी — पृ. 150; पाठ-परिमाण 533 शब्द; पाठ-सूत्र: छथि, सर्द, कनकनी, हाड़मे, आगि.

63. डैनियाही दुपहरिया — पृ. 153; पाठ-परिमाण 114 शब्द; पाठ-सूत्र: सहस्रबाढ़निक, निन्न, निन्नक, विचित्र, डैनियाही.

64. खाम्ह अदृढ़ताक ठाढ़ — पृ. 154; पाठ-परिमाण 51 शब्द; पाठ-सूत्र: देबाल, ढहैत, ठाढ़, मोनक, अदृश्य.

65. निन्नक ओहि पार — पृ. 154; पाठ-परिमाण 381 शब्द; पाठ-सूत्र: स्मृति, रील, गति, जीव, मृत्युक.

स्वप्न विहीन शून्य

66. सङ गामक पोखरि कात — पृ. 156; पाठ-परिमाण 102 शब्द; पाठ-सूत्र: बंशी, पाथि, पकड़बाक, अनन्त, प्रयास.

67. सङ सागर तटपर — पृ. 157; पाठ-परिमाण 180 शब्द; पाठ-सूत्र: सभटा, मंदिर, बिसरल, मोनक, तटपर.

68. सर्वज्ञाता — पृ. 158; पाठ-परिमाण 483 शब्द; पाठ-सूत्र: किछु, अनुभव, सभटा, जाइए, देखाइत.

स्वप्न विहीन शून्यक पाछाँ

69. घृणाक तरहरिमे — पृ. 161; पाठ-परिमाण 67 शब्द; पाठ-सूत्र: जायत, तरहरि, रहत, प्रेमक, घृणा.

70. जावत रहब — पृ. 161; पाठ-परिमाण 86 शब्द; पाठ-सूत्र: प्रेमक, स्थूल, रहब, चारूकात, गिलेबासँ.

71. चतुरहस्त — पृ. 162; पाठ-परिमाण 46 शब्द; पाठ-सूत्र: गुमकी, नृत्य, ध्वनि, गुम, पहिल.

72. बुढ़िया डाही — पृ. 163; पाठ-परिमाण 239 शब्द; पाठ-सूत्र: बुढ़िया, डाही, प्रेमक, भयंकर, धारक.

73. आ तखन, फैसला हेतै आब — पृ. 164; पाठ-परिमाण 77 शब्द; पाठ-सूत्र: जाइए, उनटि, जाइ, बदलि, वाणी.

74. जँ विश्वास कऽ ली अहाँपर, ऐ प्रकृतिपर — पृ. 165; पाठ-परिमाण 186 शब्द; पाठ-सूत्र: लगैत, खोंइचा, डाही, आश्वासन, बुढिया.

75. घड़ी पूजा — पृ. 166; पाठ-परिमाण 574 शब्द; पाठ-सूत्र: पूजा, भगवती, घड़ी, घरमे, देल.

76. नाराशंसी — पृ. 170; पाठ-परिमाण 575 शब्द; पाठ-सूत्र: छथि, कविक, छन्दक, गायत्री, कविताक.

77. निगदति कुसुमपुरेऽभ्यर्चितं ज्ञानम् — पृ. 173; पाठ-परिमाण 80 शब्द; पाठ-सूत्र: चन्द्रयाणक, पृथ्वी, तरेगण, पूर्वापर, आर्यभटक.

78. सपना — पृ. 174; पाठ-परिमाण 123 शब्द; पाठ-सूत्र: मोनक, सपना, निन्न, मोन, छाती.

79. चुप्पीक अपन बोली — पृ. 174; पाठ-परिमाण 135 शब्द; पाठ-सूत्र: गेल, लैत, किछु, अबैए, जाइए.

80. स्मृति-भय — पृ. 175; पाठ-परिमाण 844 शब्द; पाठ-सूत्र: स्मृति, भेटल, देलक, विज्ञान, चारि.

81. वादक सम्बल अर्थहीन — पृ. 180; पाठ-परिमाण 117 शब्द; पाठ-सूत्र: सूगा, वादक, सम्बल, विकराल, सोझाँ.

स्वप्न मे मिज्झर होइत

82. क्षणक अछोर — पृ. 181; पाठ-परिमाण 113 शब्द; पाठ-सूत्र: जाइए, नाम, तैयो, कहियो, एखुनका.

83. चमत्कारक पोथी — पृ. 182; पाठ-परिमाण 205 शब्द; पाठ-सूत्र: संख्या, जाइए, चेतना, सोझाँ, आस्ते.

84. विचारक विराम — पृ. 183; पाठ-परिमाण 108 शब्द; पाठ-सूत्र: कने, कहियो, छाह, बेर, बदलैए.

85. भयक पकड़ ढील होइत — पृ. 183; पाठ-परिमाण 73 शब्द; पाठ-सूत्र: कने, मृत्युक, नाम, सुनि, सिकुड़ैए.

86. कलहक अभ्यास — पृ. 184; पाठ-परिमाण 116 शब्द; पाठ-सूत्र: रोकि, अनेक, कखनो, भोर, ककरासँ.

87. अपन परिचयक खाली ठाम — पृ. 184; पाठ-परिमाण 337 शब्द; पाठ-सूत्र: ठाम, लोक, रहय, दिनक, काजक.

88. घड़ीक बाहरी किनार — पृ. 186; पाठ-परिमाण 72 शब्द; पाठ-सूत्र: टिक, सुनैत, उठैए, घटना, डोरी.

89. एतहि खोज — पृ. 186; पाठ-परिमाण 74 शब्द; पाठ-सूत्र: पवित्र, दिनक, प्रतीक्षामे, साधारण, बीति.

90. प्राणक गवाही — पृ. 187; पाठ-परिमाण 90 शब्द; पाठ-सूत्र: दैए, पशु, यन्त्रक, विचार, सुनैत.

91. शब्दशास्त्रम् — पृ. 187; पाठ-परिमाण 84 शब्द; पाठ-सूत्र: नाम, केओ, अनुभव, बच्चा, पहिल.

92. अपन दाबीक सोझाँ — पृ. 188; पाठ-परिमाण 32 शब्द; पाठ-सूत्र: एके, हाथ, महिमाक, कथा, भूलक.

93. माया-अविद्या — पृ. 188; पाठ-परिमाण 72 शब्द; पाठ-सूत्र: पर्दा, आँखिपर, बाहरक, दृश्य, झाँपैए.

94. चिन्तक — पृ. 188; पाठ-परिमाण 144 शब्द; पाठ-सूत्र: अनेक, केओ, कथा, चिन्तक, पाछाँक.

95. बीतैत दिनक संग — पृ. 189; पाठ-परिमाण 95 शब्द; पाठ-सूत्र: रहैए, किछु, बदलैत, पुरान, घरक.

96. देहक देहरी — पृ. 190; पाठ-परिमाण 76 शब्द; पाठ-सूत्र: लगैए, पैर, धरती, छूबैए, धरतीक.

97. चिन्हब आ बुझब — पृ. 190; पाठ-परिमाण 105 शब्द; पाठ-सूत्र: होयब, छोट, वर्षक, परिचय, तैयो.

98. डीह — पृ. 191; पाठ-परिमाण 54 शब्द; पाठ-सूत्र: माटिपर, पुरखाक, पएर, पड़ल, घरक.

99. मनुक्ख — पृ. 191; पाठ-परिमाण 112 शब्द; पाठ-सूत्र: अहाँक, सकैए, आसन, एके, देह.

100. अन्तक प्रश्न, आइक दिन — पृ. 191; पाठ-परिमाण 58 शब्द; पाठ-सूत्र: रहत, दिनमे, कलेन्डरक, पन्ना, पलटैत.

101. स्वप्नमे मिज्झर होइत — पृ. 192; पाठ-परिमाण 1537 शब्द; पाठ-सूत्र: बलि, गेल, शुनःशेप, रहै, स्वप्न.

102. स्थितप्रज्ञतामे लिबैत सत्य! — पृ. 198; पाठ-परिमाण 171 शब्द; पाठ-सूत्र: बुझैत, दियौ, रस्ता, बुझऽ, रही.

103. ई जिनगी कोनो बेजाय नै अछि — पृ. 199; पाठ-परिमाण 78 शब्द; पाठ-सूत्र: जिनगी, कोनो, बेजाय, बिनु, तेहने.

104. महत्वाकांक्षा — पृ. 200; पाठ-परिमाण 33 शब्द; पाठ-सूत्र: कालक, उड़ैत, गुड्डी, महत्वाकांक्षा, लागल.

105. ओकरा हँसैत देखि जे आबि जाइ छौ तोरा नोर — पृ. 200; पाठ-परिमाण 275 शब्द; पाठ-सूत्र: तोरा, तोहर, हारि, गेल, हँसी.

ओस, देहरी आ घरक नेह

106. देहरीक ओहि पार — पृ. 203; पाठ-परिमाण 159 शब्द; पाठ-सूत्र: देहरीपर, उठलहुँ, माटि, आँखि, हुलास.

107. अनचिन्ह घाटक नेह — पृ. 203; पाठ-परिमाण 142 शब्द; पाठ-सूत्र: अहाँक, घाट, हिलकोरि, चिट्ठीमे, पानि.

108. बोलीक चिरै — पृ. 204; पाठ-परिमाण 140 शब्द; पाठ-सूत्र: नन्हका, नाव, रेखाक, माथपर, छोट.

109. मेघक पएरक चिन्ह — पृ. 205; पाठ-परिमाण 135 शब्द; पाठ-सूत्र: बूँदक, पातक, मोती, भेटल, उठल.

110. अँगुरीमे बसल गीत — पृ. 206; पाठ-परिमाण 148 शब्द; पाठ-सूत्र: गेल, तिनका, हुनक, माए, डलिया.

111. पलकक ओहि पार — पृ. 207; पाठ-परिमाण 112 शब्द; पाठ-सूत्र: गेल, रहलहुँ, धीरे, करिया, ओढ़नी.

112. अँजुरीसँ आगाँ — पृ. 208; पाठ-परिमाण 107 शब्द; पाठ-सूत्र: अकास, गेल, खोजैत, देब, पोखरिक.

113. पएरक अपन बाट — पृ. 208; पाठ-परिमाण 113 शब्द; पाठ-सूत्र: जुत्ता, ओएह, माटि, चिड़ै, गेल.

114. बोलक भीतर बसात — पृ. 209; पाठ-परिमाण 108 शब्द; पाठ-सूत्र: गमक, गेलहुँ, गेल, ठाम, माए.

115. सभक लेल पाँति — पृ. 210; पाठ-परिमाण 107 शब्द; पाठ-सूत्र: पाँति, देहरी, ठाढ़, गेल, भोजक.

116. कुहेसाक बनल घर — पृ. 211; पाठ-परिमाण 113 शब्द; पाठ-सूत्र: गेल, भोर, महल, जाहि, नदीक.

117. एक नामक कतेक पात — पृ. 211; पाठ-परिमाण 108 शब्द; पाठ-सूत्र: गाछ, नेना, पात, सभकेँ, एकहि.

118. फेर चिन्हल देहरी — पृ. 212; पाठ-परिमाण 108 शब्द; पाठ-सूत्र: ओएह, आँखिक, गेलहुँ, बरखक, गाम.

119. आधखुलल किवाड़ — पृ. 213; पाठ-परिमाण 101 शब्द; पाठ-सूत्र: कात, देखलहुँ, दिससँ, धीरे, रहब.

120. आँगनक खुलल दिशा — पृ. 214; पाठ-परिमाण 99 शब्द; पाठ-सूत्र: सभक, भरल, आँगन, सुनि, लागल.

121. नेनाक बोलीमे भोर — पृ. 214; पाठ-परिमाण 108 शब्द; पाठ-सूत्र: नेना, दादी, आएल, सभक, पूछलक.

122. खाली खूँटीक छाँह — पृ. 215; पाठ-परिमाण 107 शब्द; पाठ-सूत्र: खूँटी, ओढ़नी, खाली, ठाम, रहत.

123. दोसर आँखिक ठाम — पृ. 216; पाठ-परिमाण 108 शब्द; पाठ-सूत्र: दिससँ, दुनू, देखलहुँ, रहत, खेत.

124. माटिक भीतर पाँखि — पृ. 216; पाठ-परिमाण 104 शब्द; पाठ-सूत्र: बीआक, करिया, खोलक, हरियर, पाँखि.

125. रंगक अनकहल स्वर — पृ. 217; पाठ-परिमाण 105 शब्द; पाठ-सूत्र: उठल, अलग, अरिपन, देइत, अँगुरी.

126. भीतरक अचल ठाम — पृ. 218; पाठ-परिमाण 105 शब्द; पाठ-सूत्र: अलग, आएल, सम्पूर्ण, ठाम, क्रोधक.

127. निन्नक पाछाँ सेहो जागल — पृ. 219; पाठ-परिमाण 113 शब्द; पाठ-सूत्र: कथा, ठाम, सपनामे, नाव, बनलहुँ.

128. टेढ़ बाटक हरियरी — पृ. 219; पाठ-परिमाण 109 शब्द; पाठ-सूत्र: मोड़, सीध, भेटल, घुरि, दोसर.

129. कंठसँ उड़ल चिड़ै — पृ. 220; पाठ-परिमाण 103 शब्द; पाठ-सूत्र: गेल, गीत, पाँखि, बचल, गनलहुँ.

अर्थ, भाषा आ लोकजीवनक अँजोर

130. जड़िक नव पात — पृ. 223; पाठ-परिमाण 76 शब्द; पाठ-सूत्र: केओ, चलैत, पात, ठाम, ऋतु.

131. काल्हिक बीआ — पृ. 223; पाठ-परिमाण 73 शब्द; पाठ-सूत्र: किछु, दाना, कोठीक, मुँह, खोलैत.

132. दू बाटक बीच — पृ. 224; पाठ-परिमाण 77 शब्द; पाठ-सूत्र: एकहि, कहलक, पड़ल, दुनू, आयल.

133. एक जल, अनेक लहरि — पृ. 224; पाठ-परिमाण 73 शब्द; पाठ-सूत्र: अलग, चान, उठल, बचल, पोखरिक.

134. खाली पीढ़ी — पृ. 225; पाठ-परिमाण 73 शब्द; पाठ-सूत्र: आयल, दुआरपर, पीढ़ी, देखाइत, लकड़ी.

135. पयरसँ आगाँ प्रश्न — पृ. 225; पाठ-परिमाण 71 शब्द; पाठ-सूत्र: आधा, कहलक, पयर, चलि, देखू.

136. मोनक दूर किनार — पृ. 226; पाठ-परिमाण 67 शब्द; पाठ-सूत्र: काज, दूर, दिनभरि, देहक, समेटलहुँ.

137. रोटीक पाछाँक भूख — पृ. 226; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: कौर, थाकल, नपल, अर्थ, पहिल.

138. करघाक नव फूल — पृ. 227; पाठ-परिमाण 65 शब्द; पाठ-सूत्र: पुरान, सङ्ग, मायक, हाथक, नमूना.

139. फेर अँकुरायब — पृ. 227; पाठ-परिमाण 69 शब्द; पाठ-सूत्र: भेटल, पतझड़मे, पात, झरल, माटिक.

140. भोरक खुलल आँखि — पृ. 228; पाठ-परिमाण 74 शब्द; पाठ-सूत्र: पड़ल, सपनामे, बहि, गेल, छप्पर.

141. बोलैत आँगन — पृ. 228; पाठ-परिमाण 66 शब्द; पाठ-सूत्र: देबाल, ओहिमे, बजैत, सम्बोधन, दुआरक.

142. छुबैत धरती — पृ. 229; पाठ-परिमाण 69 शब्द; पाठ-सूत्र: एतहि, पयर, नक्शामे, छोट, पोखरि.

143. नक्शाक बाहर — पृ. 229; पाठ-परिमाण 73 शब्द; पाठ-सूत्र: भेटल, कखनो, नक्शा, गामक, बनौलहुँ.

144. चाहक आकार — पृ. 230; पाठ-परिमाण 74 शब्द; पाठ-सूत्र: एकमे, चाह, सुख, मनक, कोठरी.

145. आवाजक पुल — पृ. 230; पाठ-परिमाण 69 शब्द; पाठ-सूत्र: गेल, कहलहुँ, पानी, लोटा, बढ़ा.

146. सुखक सीढ़ी — पृ. 231; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: भेटल, छोट, मिठास, मिठाइ, तखने.

147. अलपनाक दुआर — पृ. 231; पाठ-परिमाण 68 शब्द; पाठ-सूत्र: चाउर, पीसि, दादी, अङ्गुरी, डुबौलनि.

148. बराबरक थारी — पृ. 232; पाठ-परिमाण 69 शब्द; पाठ-सूत्र: कोनो, हाथ, भोज, उठल, आँगनमे.

149. जियबाक कारीगरी — पृ. 232; पाठ-परिमाण 72 शब्द; पाठ-सूत्र: भेटल, माटि, हाथमे, एखनो, सम्पूर्ण.

150. आँखि आ हथेली — पृ. 233; पाठ-परिमाण 67 शब्द; पाठ-सूत्र: हाथ, सुख, फूलक, आँखि, कहलक.

151. देखि रहल छी — पृ. 233; पाठ-परिमाण 68 शब्द; पाठ-सूत्र: गरम, गरमी, जनैत, नजरि, लागल.

152. हमरा नीक लगैत अछि — पृ. 234; पाठ-परिमाण 72 शब्द; पाठ-सूत्र: कहलहुँ, साँझ, एकहि, मेघ, घेरलक.

153. अवश्य होयत? — पृ. 234; पाठ-परिमाण 74 शब्द; पाठ-सूत्र: आयल, बीआ, जनैत, बरखा, हरेक.

154. अनमोलक छाँह — पृ. 235; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: दाम, कोनो, हाटमे, पीतल, तौलल.

155. मेहनतिक रंग — पृ. 235; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: भट्ठीक, आगिसँ, मुख, लाल, हाथक.

156. नामक ओहि पार — पृ. 236; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: किछु, नेना, पहिल, बेर, बजौलक.

157. बजबाक पहिल दिन — पृ. 236; पाठ-परिमाण 68 शब्द; पाठ-सूत्र: नाम, कखनो, वस्तु, छोट, सङ्ग.

158. फेरसँ ताकू — पृ. 237; पाठ-परिमाण 74 शब्द; पाठ-सूत्र: आँखि, चमकल, भेटल, अर्थ, दूरक.

159. हरेक पातक अपन हरियरी — पृ. 237; पाठ-परिमाण 67 शब्द; पाठ-सूत्र: पात, एकक, अलग, पातकेँ, तैयो.

160. रंगक सङ्ग रूप — पृ. 238; पाठ-परिमाण 67 शब्द; पाठ-सूत्र: नीला, कठोर, दोसर, कहलहुँ, गहिर.

161. गाँठिक भीतर बाट — पृ. 238; पाठ-परिमाण 68 शब्द; पाठ-सूत्र: गाँठि, सुतरी, कतहु, अलग, हाथमे.

162. किएकक अनेक रंग — पृ. 239; पाठ-परिमाण 71 शब्द; पाठ-सूत्र: कखनो, पूछलक, कारण, अलग, नेना.

163. अञ्जुरीक उजास — पृ. 239; पाठ-परिमाण 72 शब्द; पाठ-सूत्र: हाथ, अञ्जुरी, जुड़ल, देखलहुँ, भोर.

164. प्रश्नक पाछाँक शान्ति — पृ. 240; पाठ-परिमाण 65 शब्द; पाठ-सूत्र: लेलहुँ, रहलहुँ, चुप्पे, साँस, तारा.

165. कहलासँ बचल — पृ. 240; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: हथेली, आयल, घुरलहुँ, दीर्घ, विरहसँ.

166. खेलक बोली — पृ. 241; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: बदलल, पाथर, खेल, काज, नेनासभ.

167. भीतरक नीरव घर — पृ. 241; पाठ-परिमाण 71 शब्द; पाठ-सूत्र: शान्ति, आँखिक, खिड़की, खोललक, रंगक.

168. कारणक सीढ़ी — पृ. 242; पाठ-परिमाण 65 शब्द; पाठ-सूत्र: धुआँ, केओ, बढ़ल, उठल, लोक.

169. ओझरायल उजास — पृ. 242; पाठ-परिमाण 69 शब्द; पाठ-सूत्र: खींचैत, भरल, कोठरीमे, छाँहसँ, लगल.

170. नजरिक मिलन — पृ. 243; पाठ-परिमाण 67 शब्द; पाठ-सूत्र: फूल, रंग, गामक, बाटपर, मोन.

171. सपनो जखन सुतल — पृ. 243; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: कोनो, चित्र, समेटलक, स्वप्नक, अन्तिम.

172. निन्नक तीन किनार — पृ. 244; पाठ-परिमाण 63 शब्द; पाठ-सूत्र: खाली, मोन, दुनू, घुरल, जागल.

173. डगमग धरतीपर — पृ. 244; पाठ-परिमाण 72 शब्द; पाठ-सूत्र: पयर, कहलक, पार, धीरे, लेलहुँ.

174. काल्हिक भोर — पृ. 245; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: आशा, पूब, लाल, पाँखि, खोलि.

175. सम्भवक खिड़की — पृ. 245; पाठ-परिमाण 72 शब्द; पाठ-सूत्र: मनमे, हरियर, चान, बनौलहुँ, आकाश.

176. एहि क्षणक ताप — पृ. 246; पाठ-परिमाण 74 शब्द; पाठ-सूत्र: अनुभव, देखलहुँ, तपन, पूछलहुँ, आगि.

177. जागल की सपना? — पृ. 246; पाठ-परिमाण 69 शब्द; पाठ-सूत्र: सपनामे, पत्र, पढ़लहुँ, अक्षर, एतेक.

178. पहिने ककर पहिचान — पृ. 247; पाठ-परिमाण 66 शब्द; पाठ-सूत्र: मुख, कखनो, रहलहुँ, देखबासँ, पदचाप.

179. चाहीक स्वर — पृ. 247; पाठ-परिमाण 69 शब्द; पाठ-सूत्र: घटना, आग्रह, सङ्ग, हाथ, दोसरकेँ.

180. अहाँक पीड़ा — पृ. 248; पाठ-परिमाण 71 शब्द; पाठ-सूत्र: अहाँक, बीचक, माथपर, हाथ, रखने.

181. बोलक बसात — पृ. 248; पाठ-परिमाण 64 शब्द; पाठ-सूत्र: बोलसँ, बोलक, भोरक, हाँकसँ, गाम.

182. शब्दक घरमे — पृ. 249; पाठ-परिमाण 72 शब्द; पाठ-सूत्र: न्याय, तकैत, गेलहुँ, कोनो, कओन.

183. सीखल स्वर — पृ. 249; पाठ-परिमाण 69 शब्द; पाठ-सूत्र: आयल, बजलीह, पहिल, किछु, लेलक.

184. सभक चौक — पृ. 250; पाठ-परिमाण 73 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, दोसर, लोक, मनमे, चिन्ह.

185. फूल आ फीता — पृ. 250; पाठ-परिमाण 65 शब्द; पाठ-सूत्र: फीता, ठीक, माप, अलग, दुनूक.

186. अपन पयरक भार — पृ. 251; पाठ-परिमाण 73 शब्द; पाठ-सूत्र: नाम, रखलहुँ, बाटक, मोड़पर, केओ.

187. साँचासँ बाहर — पृ. 251; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: लोक, कहलनि, होयब, पहिनेसँ, रूपक.

188. खुलल आकाशक नीचाँ — पृ. 252; पाठ-परिमाण 69 शब्द; पाठ-सूत्र: ताकलहुँ, मौन, भेटल, रहय, भूख.

189. देहक घेरसँ — पृ. 252; पाठ-परिमाण 77 शब्द; पाठ-सूत्र: देह, देहक, पोखरिक, जलमे, मुख.

190. जगतक सङ्ग जागब — पृ. 253; पाठ-परिमाण 65 शब्द; पाठ-सूत्र: संसार, कहितहुँ, आँखिमे, अनलहुँ, घेरने.

191. हथेलीक पाथर — पृ. 253; पाठ-परिमाण 66 शब्द; पाठ-सूत्र: पाथर, हथेलीपर, रखलहुँ, ठण्ढक, आयल.

192. एकलसँ सङ्ग — पृ. 254; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: एकल, भेटल, नाव, हाथ, लागल.

193. समयक पायल — पृ. 254; पाठ-परिमाण 71 शब्द; पाठ-सूत्र: उठल, केओ, पुरान, धुन, स्वरमे.

194. अनगिन ढङ्गक फूल — पृ. 255; पाठ-परिमाण 65 शब्द; पाठ-सूत्र: मिलल, सभकेँ, अलग, भेटल, भिन्न.

195. कसौटीक उजास — पृ. 255; पाठ-परिमाण 67 शब्द; पाठ-सूत्र: जँचबाक, चललहुँ, हाथमे, कसौटी, मोनमे.

196. माप आ मापल — पृ. 256; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: उठौलक, धान, तौलऽ, तराजू, आनलहुँ.

197. भेटक अनेक बाट — पृ. 256; पाठ-परिमाण 74 शब्द; पाठ-सूत्र: रंग, गवाही, सभक, जतय, गेल.

198. सभ चाबी एक नहि — पृ. 257; पाठ-परिमाण 68 शब्द; पाठ-सूत्र: एकसँ, भिन्न, साफ, घरक, गुच्छामे.

199. अपनहि प्रकाश — पृ. 257; पाठ-परिमाण 69 शब्द; पाठ-सूत्र: दीप, देखलहुँ, सङ्गे, बोधक, जरल.

200. खुलल बैसार — पृ. 258; पाठ-परिमाण 68 शब्द; पाठ-सूत्र: केओ, चलल, चारि, आसन, आँगनमे.

201. प्रश्नकेँ खोलू — पृ. 258; पाठ-परिमाण 72 शब्द; पाठ-सूत्र: पूछलहुँ, चौखट, देखि, रहलहुँ, अहाँक.

202. धीरे सुलझल डोर — पृ. 259; पाठ-परिमाण 71 शब्द; पाठ-सूत्र: कतहु, कयलहुँ, मोनमे, जाल, पड़ल.

203. नाव आ किनार — पृ. 259; पाठ-परिमाण 67 शब्द; पाठ-सूत्र: पतवार, कओन, नाव, यात्रा, सङ्ग.

204. अर्थक खुलल वन — पृ. 260; पाठ-परिमाण 68 शब्द; पाठ-सूत्र: बोल, बचल, बोलक, वनमे, विज्ञानक.

205. बातक भरोस — पृ. 260; पाठ-परिमाण 65 शब्द; पाठ-सूत्र: यात्री, खबर, सुनौलक, दूरक, गाममे.

206. जाँचक दुआर — पृ. 261; पाठ-परिमाण 65 शब्द; पाठ-सूत्र: सङ्ग, जाँचक, कहलहुँ, कुआँमे, डोरी.

207. अर्थक बाँचल ठाम — पृ. 261; पाठ-परिमाण 70 शब्द; पाठ-सूत्र: बर्खाक, चिन्ह, जनैत, ओहिसँ, अधिक.

208. सभ उजासक अपन दिशा — पृ. 262; पाठ-परिमाण 72 शब्द; पाठ-सूत्र: कहलक, तारा, चमकैत, दूरी, एकल.

भाषा

209. भाषा जे भीतर घर करैत अछि — पृ. 264; पाठ-परिमाण 337 शब्द; पाठ-सूत्र: बदलि, जाहिमे, भारतक, देब, केँ.

210. मैथिलीक नव खेत — पृ. 265; पाठ-परिमाण 335 शब्द; पाठ-सूत्र: शब्द, सम्मान, जतय, अर्थ, दोसर.

211. विचार जखन अपन बोली पबैत अछि — पृ. 267; पाठ-परिमाण 530 शब्द; पाठ-सूत्र: कखनो, केँ, आयल, अनुशासन, समाज.

212. पुरान अक्षरमे नव प्रश्न — पृ. 268; पाठ-परिमाण 554 शब्द; पाठ-सूत्र: पुरान, केँ, जीवित, ठाम, संस्कृत.

213. जड़िसँ क्षितिज धरि — पृ. 269; पाठ-परिमाण 650 शब्द; पाठ-सूत्र: कियो, केँ, पुरान, कतहु, जड़ि.

214. स्वराजक भीतर विचारक स्वराज — पृ. 271; पाठ-परिमाण 768 शब्द; पाठ-सूत्र: किछु, केँ, पुरान, स्वतन्त्रता, पहिल.

215. अपन धरती, खुलल आकाश — पृ. 272; पाठ-परिमाण 956 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, यदि, विचारक, चलैत, विश्वक.

216. प्रश्नक परिसर — पृ. 275; पाठ-परिमाण 970 शब्द; पाठ-सूत्र: दार्शनिक, कखनो, जतय, विचार, दर्शनक.

217. जे प्रश्न अखनो उत्तर माँगैत अछि — पृ. 277; पाठ-परिमाण 1229 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, कखनो, दर्शनक, समस्या, पूछैत.

218. अनुभवक कसौटी — पृ. 280; पाठ-परिमाण 1257 शब्द; पाठ-सूत्र: अनुभव, केँ, कखनो, अनुभवक, अर्थ.

219. पाँच दशकक देहरी — पृ. 282; पाठ-परिमाण 966 शब्द; पाठ-सूत्र: दर्शन, केँ, कियो, पाँच, कखनो.

220. दृश्यक पाछाँ जे प्रश्न अछि — पृ. 285; पाठ-परिमाण 1244 शब्द; पाठ-सूत्र: तत्त्वमीमांसा, अर्थ, केँ, कुन, आधार.

221. सृजनक भीतर मनुष्य — पृ. 288; पाठ-परिमाण 1730 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, मूल्य, मानववाद, हरेक, अर्थ.

222. मूल्यक भीतर संस्कृति — पृ. 293; पाठ-परिमाण 1895 शब्द; पाठ-सूत्र: संस्कृति, केँ, मूल्य, कखनो, अर्थ.

223. व्यक्ति आ समाजक बीच खुलल प्रश्न — पृ. 299; पाठ-परिमाण 2231 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, समाज, व्यक्ति, जतय, समाजक.

224. ज्ञानक तलघरमे दीप — पृ. 305; पाठ-परिमाण 3284 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, वस्तु, प्रमाण, आधार, किछु.

225. देहक भीतर “हम” — पृ. 316; पाठ-परिमाण 2297 शब्द; पाठ-सूत्र: देह, केँ, जीवित, आत्मा, यदि.

226. सुन्दरक सीमा सँ पार कला — पृ. 323; पाठ-परिमाण 2955 शब्द; पाठ-सूत्र: कला, केँ, अनुभव, कखनो, अर्थ.

227. अखंड आकाशक बाट — पृ. 333; पाठ-परिमाण 1571 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, यदि, शक्ति, धीरे, कखनो.

228. ध्वनिक पार अर्थक उजास — पृ. 339; पाठ-परिमाण 2860 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, शब्द, ध्वनि, केँ, कखनो.

229. भीतरक दरबज्जा पर उजास — पृ. 350; पाठ-परिमाण 2389 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, प्रेम, भीतरक, अपने, दोसरक.

230. मनुखताक आँगनमे नव भोर — पृ. 361; पाठ-परिमाण 1874 शब्द; पाठ-सूत्र: यदि, समाजक, समाज, मूल, विश्वास.

231. जतय मनुख मनुखक उजास — पृ. 371; पाठ-परिमाण 3422 शब्द; पाठ-सूत्र: समाज, समाजक, जतय, यदि, केँ.

232. अदृश्य तराजूक उजास — पृ. 391; पाठ-परिमाण 4065 शब्द; पाठ-सूत्र: मूल्य, केँ, प्रेम, न्याय, कखनो.

233. टूटल आइना मे अनेक आकाश — पृ. 413; पाठ-परिमाण 3833 शब्द; पाठ-सूत्र: कुन, अनेक, अर्थ, जतय, यदि.

234. निर्णयक धधकैत देहरी — पृ. 437; पाठ-परिमाण 3495 शब्द; पाठ-सूत्र: कखनो, नैतिकता, जतय, यदि, निर्णय.

235. माटिक नाड़ीमे हमर श्वास — पृ. 459; पाठ-परिमाण 4175 शब्द; पाठ-सूत्र: माटि, धरती, प्रकृति, वृक्ष, नदी.

236. अपन आँखिसँ भोर — पृ. 486; पाठ-परिमाण 4270 शब्द; पाठ-सूत्र: अपने, यदि, दोसरक, शब्द, विचार.

237. पुरान नदीमे नव धार — पृ. 514; पाठ-परिमाण 2773 शब्द; पाठ-सूत्र: पुरान, विचार, यदि, दोसर, जीवित.

238. दीपक पाछाँक अनाम उजास — पृ. 536; पाठ-परिमाण 2933 शब्द; पाठ-सूत्र: विचार, कियो, यदि, पुस्तक, पुरान.

239. दिशा-दिशासँ आबैत दीप — पृ. 555; पाठ-परिमाण 2667 शब्द; पाठ-सूत्र: कियो, यदि, दोसर, कुन, कखनो.

प्रश्न

240. जड़ चित्रक पाछाँ बहैत प्रश्न — पृ. 574; पाठ-परिमाण 189 शब्द; पाठ-सूत्र: पुरान, रहय, कतेको, बेर, चित्र.

241. मुक्तिक धुरीसँ बाहर विचारक आकाश — पृ. 575; पाठ-परिमाण 173 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, कखनो, सम्भावना, विचारक, चिन्तन.

242. मुक्ति एक प्रश्न, चिन्तन अनेक बाट — पृ. 576; पाठ-परिमाण 169 शब्द; पाठ-सूत्र: कखनो, मुक्ति, चिन्तनक, कियो, कर्म.

243. श्रुतिक वनमे ककर स्वर मूल — पृ. 577; पाठ-परिमाण 172 शब्द; पाठ-सूत्र: कतहु, स्वर, पुरान, रहय, कहब.

244. सीमाहीन कथनक भीतर मौन प्रश्न — पृ. 578; पाठ-परिमाण 166 शब्द; पाठ-सूत्र: कतहु, भिन्न, अन्तिम, वचन, केँ.

245. सूत्रक देह पर समयक अनेक लेख — पृ. 579; पाठ-परिमाण 176 शब्द; पाठ-सूत्र: पाठ, कतहु, कखनो, सूत्र, देह.

246. साक्षी आ प्रकृतिक बीच अन्तिम दूरी — पृ. 581; पाठ-परिमाण 180 शब्द; पाठ-सूत्र: साक्षी, प्रकृतिक, गति, कहय, स्पष्ट.

247. भ्रमक गाँठिसँ अभेदक निस्तब्धता — पृ. 582; पाठ-परिमाण 186 शब्द; पाठ-सूत्र: गाँठि, भ्रम, केँ, मूल, स्वयं.

248. एक नामक भीतर अनेक विपरीत दिशा — पृ. 583; पाठ-परिमाण 178 शब्द; पाठ-सूत्र: कियो, कखनो, नाम, अनेक, नामक.

249. अग्निक अर्घ्य आ कर्मक एकल लेखा — पृ. 584; पाठ-परिमाण 174 शब्द; पाठ-सूत्र: दोसर, कहय, कर्मक, रहय, यदि.

250. चारि लक्ष्यक चौखटिसँ बाहर जीवन — पृ. 585; पाठ-परिमाण 187 शब्द; पाठ-सूत्र: मुक्ति, लक्ष्य, चारि, चाह, बिनु.

251. सूचीक भीत नहि, प्रश्नक जीवित नदी — पृ. 586; पाठ-परिमाण 169 शब्द; पाठ-सूत्र: कियो, अलग, जीवित, चिन्तनक, समाजक.

252. यज्ञक धुँआसँ तर्कक पहिल उजास — पृ. 588; पाठ-परिमाण 159 शब्द; पाठ-सूत्र: कियो, कर्मक, उठल, शब्दक, स्वतन्त्र.

253. वस्तुक सात दुआर, साक्षीक एक नेत्र — पृ. 589; पाठ-परिमाण 166 शब्द; पाठ-सूत्र: वस्तु, अनेक, साक्षी, गुण, गति.

254. इन्द्रियक पवन थमलापर अन्तर आकाश — पृ. 590; पाठ-परिमाण 170 शब्द; पाठ-सूत्र: जाय, पकड़ि, इच्छा, बहि, बाहरी.

255. शब्दक बीजसँ कल्पनाक वन — पृ. 591; पाठ-परिमाण 173 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थक, शब्दक, शब्द, बीज, स्वर.

256. राजदण्ड, श्रम आ साझा घर — पृ. 592; पाठ-परिमाण 177 शब्द; पाठ-सूत्र: कियो, रहय, मोल, घरक, काजक.

257. क्षणक धार आ अनेक दृष्टिक किनार — पृ. 594; पाठ-परिमाण 172 शब्द; पाठ-सूत्र: कहय, क्षण, अनेक, स्वर, स्थिर.

258. मतक भीत पारि प्रश्नक भूगोल — पृ. 595; पाठ-परिमाण 176 शब्द; पाठ-सूत्र: मतक, समस्या, जतय, जीवित, तर्कक.

259. शब्द, शून्य आ अभेदक पूर्वराग — पृ. 596; पाठ-परिमाण 167 शब्द; पाठ-सूत्र: कियो, अभेदक, अर्थक, जतय, वाणी.

260. सम्बन्धक सूक्ष्म जालमे ज्ञानक दीप — पृ. 597; पाठ-परिमाण 168 शब्द; पाठ-सूत्र: वस्तु, सम्बन्ध, गुण, गुलाब, विषय.

261. एक आ अनेकक अनन्त बहस — पृ. 598; पाठ-परिमाण 169 शब्द; पाठ-सूत्र: यदि, रहय, कहय, मूल, भेद.

262. प्रेमक पाँचम दिशा — पृ. 599; पाठ-परिमाण 164 शब्द; पाठ-सूत्र: कखनो, प्रेम, चाह, मुक्ति, दिशा.

263. सूक्ष्म भेदक नोक पर अर्थ — पृ. 601; पाठ-परिमाण 170 शब्द; पाठ-सूत्र: सम्बन्ध, जानल, गुण, फूल, सूक्ष्म.

264. पुरान श्रुति आ नव आगमक संगम — पृ. 602; पाठ-परिमाण 166 शब्द; पाठ-सूत्र: कियो, पुरान, कहय, अनुभव, स्वर.

265. परम्पराक भीतमे विद्रोही खिड़की — पृ. 603; पाठ-परिमाण 166 शब्द; पाठ-सूत्र: खिड़की, कखनो, पुरान, घरक, जतय.

266. लोकक कण्ठमे उतरैत चिन्तन — पृ. 604; पाठ-परिमाण 166 शब्द; पाठ-सूत्र: कखनो, गीतक, कथा, रहय, सूत्र.

267. दू भाषाक बीच टूटल सेतु — पृ. 605; पाठ-परिमाण 172 शब्द; पाठ-सूत्र: पुरान, सेतु, दोसर, दुनू, देखय.

268. टूटल परम्परासँ नव संश्लेषक पथ — पृ. 606; पाठ-परिमाण 170 शब्द; पाठ-सूत्र: पुरान, कियो, कखनो, दुनू, बचेनाइ.

269. अजन्म मौनसँ जगक आवागमन — पृ. 608; पाठ-परिमाण 164 शब्द; पाठ-सूत्र: कतहु, बीज, पहिल, खेल, गति.

270. दुःखक प्रश्न पर नैतिक आकाश — पृ. 609; पाठ-परिमाण 177 शब्द; पाठ-सूत्र: नैतिक, कर्मक, न्याय, यदि, अर्थ.

271. श्रम, शक्ति आ सीमाक नगर — पृ. 610; पाठ-परिमाण 174 शब्द; पाठ-सूत्र: कियो, बनय, शक्ति, बिनु, श्रम.

272. रसक क्षणमे जगत आनन्द बनल — पृ. 611; पाठ-परिमाण 173 शब्द; पाठ-सूत्र: कला, भाव, रसक, कखनो, मंच.

273. समयक धूलिमे पदचिह्न खोजैत मन — पृ. 612; पाठ-परिमाण 174 शब्द; पाठ-सूत्र: बचल, पदचिह्न, कखन, तिथि, पछिला.

अनेक दिशाक दार्शनिक आकाश

274. अनेक दिशाक एक सत्य — पृ. 615; पाठ-परिमाण 388 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, अर्थ, अनेक, धीरे, दीप.

275. कारणक सीढ़ी, सत्ताक ज्योति — पृ. 617; पाठ-परिमाण 419 शब्द; पाठ-सूत्र: बुद्धि, कारणक, स्वर, दुनू, श्रद्धा.

276. अपनहि उजासक प्रत्यभिज्ञा — पृ. 620; पाठ-परिमाण 344 शब्द; पाठ-सूत्र: एकहि, अनुभव, चेतन, अनेक, साधना.

277. माटिसँ अतिमानस धरि — पृ. 622; पाठ-परिमाण 356 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, चेतना, मौन, कोनो, अलग.

278. रूप, कारण आ मध्यम मार्ग — पृ. 624; पाठ-परिमाण 359 शब्द; पाठ-सूत्र: ठीक, नाम, पूर्ण, पात, नगर.

279. सन्देहक रातिसँ विश्वासक भोर — पृ. 626; पाठ-परिमाण 366 शब्द; पाठ-सूत्र: सीमा, जतय, बनय, बुद्धि, गेल.

280. भीतरक प्रकाश आ दू नगर — पृ. 629; पाठ-परिमाण 446 शब्द; पाठ-सूत्र: इच्छा, धाम, भीतरक, नाम, दिशा.

281. शब्दक पार जे स्वर जागय — पृ. 632; पाठ-परिमाण 364 शब्द; पाठ-सूत्र: शब्द, अर्थ, संकेत, कविता, काव्यक.

282. कहबो एकटा काज अछि — पृ. 634; पाठ-परिमाण 363 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, शब्द, वचन, वाक्यक, बेर.

283. एकहि उजासक अनेक दुआर — पृ. 636; पाठ-परिमाण 357 शब्द; पाठ-सूत्र: अनेक, केँ, सीमा, बदलय, एकहि.

284. प्रकृति नाचय, पुरुष देखय — पृ. 638; पाठ-परिमाण 353 शब्द; पाठ-सूत्र: प्रकृति, पुरुष, प्रकृतिक, साक्षी, कारण.

285. तर्कक फूलसँ सत्यक अर्घ्य — पृ. 641; पाठ-परिमाण 363 शब्द; पाठ-सूत्र: तर्कक, तर्क, कारणक, बुद्धि, जतय.

286. हेतुक दीप, आत्माक साक्षी — पृ. 643; पाठ-परिमाण 357 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, हेतु, उठल, पुरान, तर्क.

287. पदार्थक गति, मनुष्यक मुक्ति — पृ. 645; पाठ-परिमाण 349 शब्द; पाठ-सूत्र: समाजक, विचार, श्रम, सम्बन्ध, बदलैत.

288. अर्थक कसौटी — पृ. 648; पाठ-परिमाण 365 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, अर्थक, वाक्य, प्रमाण, कथन.

289. कण-कणमे भेदक व्याकरण — पृ. 650; पाठ-परिमाण 374 शब्द; पाठ-सूत्र: गुण, सूक्ष्म, भेदक, द्रव्य, गति.

290. अपन आचरणसँ राज्य सँवारू — पृ. 653; पाठ-परिमाण 382 शब्द; पाठ-सूत्र: समाजक, राज्य, दोसरा, यदि, हृदय.

291. अनुभवक साँचा, कर्तव्यक दीप — पृ. 655; पाठ-परिमाण 382 शब्द; पाठ-सूत्र: नियम, अनुभव, समक्ष, बुद्धि, यदि.

292. अर्थक नक्शा, भाषाक अनुशासन — पृ. 658; पाठ-परिमाण 384 शब्द; पाठ-सूत्र: स्पष्ट, वाक्य, अर्थक, अर्थ, किछु.

293. प्रतीकक जग, मनुष्यक अर्थ — पृ. 660; पाठ-परिमाण 387 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, अर्थ, प्रतीकक, कथा, प्रतीक.

294. चुनावक क्षण, आस्थाक छलाँग — पृ. 663; पाठ-परिमाण 432 शब्द; पाठ-सूत्र: अपने, जतय, चुनाव, निर्णय, सम्पूर्ण.

295. प्रमाणक छह दीप — पृ. 665; पाठ-परिमाण 374 शब्द; पाठ-सूत्र: दीप, प्रमाणक, शब्द, वस्तु, संबन्धक.

296. अनुभवक धरती पर समाजक विज्ञान — पृ. 668; पाठ-परिमाण 371 शब्द; पाठ-सूत्र: नियम, समाजक, क्रम, मानव, ठाम.

297. राज्यक मूल प्रजाक हित — पृ. 670; पाठ-परिमाण 365 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, राज्यक, शासन, नीति, प्रजाक.

298. अनुभूतिक रूप, इतिहासक स्वतन्त्रता — पृ. 673; पाठ-परिमाण 390 शब्द; पाठ-सूत्र: कला, जीवित, जतय, स्वर, अनुभव.

299. अनुभवक किनार पर विश्वासक जाल — पृ. 675; पाठ-परिमाण 372 शब्द; पाठ-सूत्र: जाल, रहय, गाँठ, अर्थक, किनार.

300. ज्ञानक चारि दुआर — पृ. 678; पाठ-परिमाण 391 शब्द; पाठ-सूत्र: सम्बन्ध, अर्थ, अर्थक, स्मृति, चारि.

301. सत्यक धागा, करुणाक करघा — पृ. 680; पाठ-परिमाण 432 शब्द; पाठ-सूत्र: जीवनक, धीमा, कठिन, जन्म, देहक.

302. निद्राक चारि घाट पारि अजन्म उजास — पृ. 683; पाठ-परिमाण 289 शब्द; पाठ-सूत्र: अजन्म, दुनू, भेदक, बदलय, शान्त.

303. संशयसँ निर्णय धरि — पृ. 685; पाठ-परिमाण 385 शब्द; पाठ-सूत्र: कारण, बनय, निष्कर्षक, हेतु, तर्क.

304. प्रेमक नाममे खुलैत अनन्त — पृ. 687; पाठ-परिमाण 419 शब्द; पाठ-सूत्र: कखनो, प्रेमक, शक्ति, गहिर, नामक.

305. कर्मक पाछाँ अनदेखल सेतु — पृ. 690; पाठ-परिमाण 387 शब्द; पाठ-सूत्र: कर्मक, कर्म, कुन, इच्छा, कखनो.

306. समस्या सँ अनुभवक नव बिहान — पृ. 693; पाठ-परिमाण 417 शब्द; पाठ-सूत्र: कोनो, अनुभवक, समस्या, कुन, शिक्षा.

307. क्षणक रूप, निषेधक भाषा — पृ. 695; पाठ-परिमाण 391 शब्द; पाठ-सूत्र: धरय, सोझ, कखनो, भिन्न, नामक.

308. संशयक राखिमे निश्चित स्वर — पृ. 698; पाठ-परिमाण 305 शब्द; पाठ-सूत्र: संशय, निश्चयक, बोध, देह, विचार.

309. क्षणक उजास, हेतुक पाँखि — पृ. 700; पाठ-परिमाण 380 शब्द; पाठ-सूत्र: दुनू, हेतु, क्षण, चिन्ह, धरय.

310. शून्यक बीच सम्बन्धक ज्योति — पृ. 702; पाठ-परिमाण 414 शब्द; पाठ-सूत्र: कहिते, दुनू, गहिर, किछु, स्वभावक.

311. भेदक भीतर अभेदक राग — पृ. 705; पाठ-परिमाण 416 शब्द; पाठ-सूत्र: रहय, जीव, प्रेम, एकहि, मूल.

312. पुरान मूल्यक राखसँ नव अगिनि — पृ. 708; पाठ-परिमाण 439 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, अपने, पुरान, सृजनक, जीवनक.

313. शब्दक देहमे अर्थक धड़कन — पृ. 711; पाठ-परिमाण 401 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थक, बदलय, अनेक, शब्द, तैयो.

314. चित्तक तरंग थमल तखन — पृ. 713; पाठ-परिमाण 419 शब्द; पाठ-सूत्र: कखनो, रहय, तरंग, केँ, ध्यान.

315. संशयक चुभन, कर्मक अर्थ — पृ. 716; पाठ-परिमाण 435 शब्द; पाठ-सूत्र: कखनो, कर्मक, मनक, विश्वास, रहय.

316. सूत्रक दाना, भाषाक अनन्त वन — पृ. 719; पाठ-परिमाण 422 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, शब्द, कखनो, अर्थक, छोट.

317. एक प्रतिवादक दीप — पृ. 722; पाठ-परिमाण 431 शब्द; पाठ-सूत्र: रहय, विचार, कल्पना, भूल, खुलल.

318. कणसँ ध्वनि धरि जगक जाल — पृ. 724; पाठ-परिमाण 421 शब्द; पाठ-सूत्र: सूक्ष्म, अलग, अनेक, कर्मक, ठाम.

319. वाक्यक संगति, ज्ञानक अपन उजास — पृ. 727; पाठ-परिमाण 264 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, बोध, वस्तु, अलग, ज्ञाता.

320. छायाक गुफासँ रूपक सूर्य — पृ. 729; पाठ-परिमाण 277 शब्द; पाठ-सूत्र: छाया, रहय, धीरे, आत्मा, बिनु.

321. देखल जगक मौन उजास — पृ. 731; पाठ-परिमाण 435 शब्द; पाठ-सूत्र: रंग, किछु, आकार, अनुभवक, अर्थ.

322. सूत्रक गाँठिमे अनन्तक स्वर — पृ. 733; पाठ-परिमाण 414 शब्द; पाठ-सूत्र: मूल, अन्तिम, अनेक, एकहि, बदलय.

323. सुखक तराजू, समाजक प्रश्न — पृ. 736; पाठ-परिमाण 428 शब्द; पाठ-सूत्र: सुख, दूर, सुखक, कर्मक, नियम.

324. घड़ीक पारि बहैत जीवन — पृ. 739; पाठ-परिमाण 450 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, स्थिर, क्षण, जीवित, सम्पूर्ण.

325. टुकड़ाक पारि अखण्ड उजास — पृ. 742; पाठ-परिमाण 415 शब्द; पाठ-सूत्र: सम्बन्ध, अलग, पारि, अनुभवक, सीमा.

326. नकारक सीढ़ी सँ स्वतन्त्र आत्मबोध — पृ. 745; पाठ-परिमाण 272 शब्द; पाठ-सूत्र: वस्तु, सीमा, चेतन, अपने, हरेक.

327. शब्दक भीतर अखण्ड ज्योति — पृ. 746; पाठ-परिमाण 446 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, शब्दक, वाणी, अर्थक, अखण्ड.

328. पाँच भेदक बीच समर्पणक दीप — पृ. 749; पाठ-परिमाण 413 शब्द; पाठ-सूत्र: कखनो, जीवक, भेद, मूल, स्वतन्त्र.

329. देहक आँखिसँ खुलैत संसार — पृ. 752; पाठ-परिमाण 294 शब्द; पाठ-सूत्र: देहक, वस्तु, जीवित, देह, मौन.

330. ज्ञानक दर्पण, हेतुक डोरी — पृ. 754; पाठ-परिमाण 410 शब्द; पाठ-सूत्र: बोध, स्मृति, वस्तुक, कखनो, दुनू.

331. श्रमक हाथ, बदलैत जग — पृ. 757; पाठ-परिमाण 425 शब्द; पाठ-सूत्र: बदलय, जीवनक, श्रमक, हाथ, श्रम.

332. रहस्यक दुआर पर खुलल हाथ — पृ. 760; पाठ-परिमाण 424 शब्द; पाठ-सूत्र: वस्तु, खुलल, किछु, जकर, जतय.

333. स्वतन्त्र स्वर, सुखक गहिर माप — पृ. 762; पाठ-परिमाण 454 शब्द; पाठ-सूत्र: सुखक, सुख, अधिकार, बनय, खुलल.

334. ‘नीक’ केर अनिर्वचनीय उजास — पृ. 765; पाठ-परिमाण 284 शब्द; पाठ-सूत्र: नीक, केँ, अर्थ, मूल, शब्द.

335. करुणाक अंकुर, जनक राज — पृ. 767; पाठ-परिमाण 418 शब्द; पाठ-सूत्र: जनक, रहय, बनय, शासन, शासनक.

336. नेति-नेतिक पारि अन्तरतम साक्षी — पृ. 770; पाठ-परिमाण 293 शब्द; पाठ-सूत्र: प्रिय, केँ, वस्तु, अपने, आधार.

337. सीमारेखाक आगिमे आत्मक उजास — पृ. 772; पाठ-परिमाण 484 शब्द; पाठ-सूत्र: जीवनक, आत्मक, सीमा, वस्तु, आत्म.

338. तर्कक कण, भाषाक पारदर्शी आकाश — पृ. 775; पाठ-परिमाण 448 शब्द; पाठ-सूत्र: विचारक, तर्कक, स्पष्ट, सम्बन्ध, केँ.

339. भाषाक गाँठि, मनक अदृश्य चाल — पृ. 778; पाठ-परिमाण 417 शब्द; पाठ-सूत्र: अलग, जीवित, ठीक, कुन, शब्द.

340. पूब-पश्चिमक बीच एकहि उजास — पृ. 781; पाठ-परिमाण 449 शब्द; पाठ-सूत्र: जतय, यदि, गहिर, एकहि, रहय.

341. अनेक रूपमे एकहि आश्रय — पृ. 784; पाठ-परिमाण 456 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, मूल, चेतन, जीव, बिनु.

342. मनुष्यक हाथमे स्वतन्त्र भोर — पृ. 787; पाठ-परिमाण 410 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, मानव, चेतना, साझा, दोसरा.

343. वनक स्वतन्त्र साँससँ जन-इच्छाक नगर — पृ. 789; पाठ-परिमाण 295 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, साझा, इच्छा, सहज, शक्ति.

344. निःशब्द धाराक सहज बाट — पृ. 791; पाठ-परिमाण 488 शब्द; पाठ-सूत्र: रहय, अधिक, केँ, गहिर, मूल.

345. अदृश्य केन्द्रसभक एक सुर — पृ. 795; पाठ-परिमाण 495 शब्द; पाठ-सूत्र: कतहु, तैयो, किछु, एकहि, चेतन.

346. अनुभवक कोरा पात पर स्वतन्त्र हस्ताक्षर — पृ. 798; पाठ-परिमाण 486 शब्द; पाठ-सूत्र: रहय, सीमा, अधिकार, अनुभवक, पात.

347. विश्वासक आगि, अन्तरात्माक मुक्त स्वर — पृ. 801; पाठ-परिमाण 448 शब्द; पाठ-सूत्र: आत्मा, विश्वास, यदि, अर्थ, सेवा.

348. श्रमक मुक्ति, बदलैत धरतीक गीत — पृ. 804; पाठ-परिमाण 447 शब्द; पाठ-सूत्र: अधिकार, मानव, जीवनक, श्रमक, श्रम.

349. सत्य जगत पर कृपाक मधुर धारा — पृ. 807; पाठ-परिमाण 448 शब्द; पाठ-सूत्र: मूल, जाय, प्रेमक, अनेक, चेतन.

350. चेतनाक धारामे रूपक स्वप्न — पृ. 810; पाठ-परिमाण 450 शब्द; पाठ-सूत्र: क्षण, बदलैत, रहय, चेतन, दोसर.

351. अनेक बाटक बीच विवेकक सेतु — पृ. 813; पाठ-परिमाण 492 शब्द; पाठ-सूत्र: भिन्न, चेतन, आकाश, जाय, शब्द.

352. प्रमाणक चारि दुआर, मुक्तिक एक बाट — पृ. 816; पाठ-परिमाण 491 शब्द; पाठ-सूत्र: कारण, रहय, कखनो, अर्थ, अनुभवक.

353. शब्दक खेलमे जगक सीमा — पृ. 819; पाठ-परिमाण 463 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, शब्दक, खेल, नियम, कतहु.

354. नियमक जालमे अर्थ खोजैत मनुष्य — पृ. 822; पाठ-परिमाण 502 शब्द; पाठ-सूत्र: नियम, अर्थ, सत्ता, समाज, गणना.

355. क्षणक गर्भमे सृष्टिक अनन्त बहाव — पृ. 826; पाठ-परिमाण 563 शब्द; पाठ-सूत्र: क्षण, घटना, किछु, केँ, पूर्ण.

356. तीन परत पारि एकहि उजास — पृ. 830; पाठ-परिमाण 499 शब्द; पाठ-सूत्र: जाय, रहय, साक्षी, केँ, देह.

357. वचनक विधिमे कर्तव्यक अदृश्य बीज — पृ. 833; पाठ-परिमाण 280 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, कर्तव्य, अदृश्य, दिशा, वाणी.

358. भेदक सूक्ष्म रेखा, सम्बन्धक मौन सूत्र — पृ. 835; पाठ-परिमाण 499 शब्द; पाठ-सूत्र: वस्तु, सम्बन्ध, एकहि, अलग, यदि.

359. सन्देहक पारि विश्वासक चारि आकाश — पृ. 838; पाठ-परिमाण 505 शब्द; पाठ-सूत्र: बुद्धि, यदि, बनय, सहज, आधार.

360. अपनेक निर्माणक खुलल आकाश — पृ. 841; पाठ-परिमाण 537 शब्द; पाठ-सूत्र: अपने, स्वतन्त्रता, वस्तु, दोसरा, केँ.

361. इन्द्रियक शोर आ अन्तरक दीप — पृ. 844; पाठ-परिमाण 518 शब्द; पाठ-सूत्र: बनय, कखनो, मूल्य, संस्कृति, जतय.

362. पहिचानक धरती, वाक्यक मौन पूर्वशर्त — पृ. 848; पाठ-परिमाण 479 शब्द; पाठ-सूत्र: किछु, आधार, वस्तु, कथन, कखनो.

363. एकहि अनन्त धारा, अनिवार्य जग — पृ. 851; पाठ-परिमाण 290 शब्द; पाठ-सूत्र: मूल, कारण, अपने, अनन्त, विचार.

364. सरल बीजसँ बहुरंगी जग — पृ. 853; पाठ-परिमाण 516 शब्द; पाठ-सूत्र: जतय, मेल, व्यक्ति, समाज, धीरे.

365. फेंकल क्षणसँ मृत्यु-दिशि खुलल समय — पृ. 856; पाठ-परिमाण 519 शब्द; पाठ-सूत्र: सम्भावना, अपने, अर्थ, केँ, जीवनक.

366. भयक मैदान सँ अनुबन्धक नगर — पृ. 860; पाठ-परिमाण 494 शब्द; पाठ-सूत्र: वस्तु, शक्ति, किछु, जतय, चाह.

367. छापक आगिसँ आदतक कारण — पृ. 863; पाठ-परिमाण 275 शब्द; पाठ-सूत्र: जाय, विचार, बिनु, बनाय, क्रम.

368. चेतनाक दुआर पर वस्तुक उजास — पृ. 865; पाठ-परिमाण 466 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, वस्तु, साझा, एखन, हरेक.

369. सात भंगीक खिड़की सँ अहिंसक सत्य — पृ. 868; पाठ-परिमाण 280 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, खिड़की, दोसर, सीमा, कखनो.

370. विरोधक गर्भसँ पूर्णताक यात्रा — पृ. 870; पाठ-परिमाण 534 शब्द; पाठ-सूत्र: सीमा, जाय, केँ, अपने, रहय.

सन्देह, अनुभव, इतिहास आ न्याय

371. सन्देहक दीप सँ निश्चयक आकाश धरि — पृ. 875; पाठ-परिमाण 532 शब्द; पाठ-सूत्र: बुद्धि, केँ, शंका, होइ, आकार.

372. अनुभवक धार पर कारणक प्रश्न — पृ. 876; पाठ-परिमाण 543 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, अनुभवक, अनुभूति, स्मृति, अबैत.

373. रूपक परदा सँ अखण्ड यथार्थ धरि — पृ. 878; पाठ-परिमाण 541 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, किछु, अन्तिम, सीमा, अनुभवक.

374. शब्दक गाँठ सँ तथ्यक उजास धरि — पृ. 880; पाठ-परिमाण 629 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, वस्तु, कथन, सरल, कखनो.

375. हाथक प्रमाण सँ विश्लेषणक सीमा धरि — पृ. 882; पाठ-परिमाण 738 शब्द; पाठ-सूत्र: वस्तु, केँ, अमूर्त, सीमा, विश्लेषणक.

376. प्रयोगक बाट पर अर्थक नगर — पृ. 885; पाठ-परिमाण 707 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, वस्तु, शब्द, अलग, प्रयोग.

377. एकाकी संकेत सँ साझा कसौटी धरि — पृ. 887; पाठ-परिमाण 755 शब्द; पाठ-सूत्र: निजी, शब्दक, नियम, ठीक, अनुभूति.

378. अनुभवक धरती सँ नियमक कसौटी धरि — पृ. 889; पाठ-परिमाण 874 शब्द; पाठ-सूत्र: विज्ञान, नियम, व्याख्या, केँ, घटना.

379. वस्तुक आभास सँ चेतनाक अन्तराल धरि — पृ. 892; पाठ-परिमाण 757 शब्द; पाठ-सूत्र: अनुभवक, चेतना, चेतनाक, अर्थ, वस्तु.

380. अभिमुख चेतना सँ स्वतन्त्र अस्तित्व धरि — पृ. 895; पाठ-परिमाण 858 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, वस्तु, केँ, चेतना, अनुभव.

381. वाक्यक अर्थ सँ तार्किक सत्य धरि — पृ. 897; पाठ-परिमाण 759 शब्द; पाठ-सूत्र: तर्कक, तार्किक, अर्थ, वाक्य, वाक्यक.

382. विश्वासक प्रश्न सँ अशुभक अन्हार धरि — पृ. 900; पाठ-परिमाण 763 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्थ, यदि, कहै, नैतिक, ईश्वर.

383. कालक धार सँ धर्मक सत्य धरि — पृ. 903; पाठ-परिमाण 943 शब्द; पाठ-सूत्र: धर्म, धर्मक, अनुभूति, मूल्यक, कहै.

384. पवित्रताक आकाश सँ लौकिक जीवन धरि — पृ. 906; पाठ-परिमाण 893 शब्द; पाठ-सूत्र: धर्म, नूतन, अर्थ, केँ, जीवनक.

385. अनेक पथक संगममे एक सत्यक खोज — पृ. 909; पाठ-परिमाण 712 शब्द; पाठ-सूत्र: धर्म, कहै, अनेक, कियो, अर्थ.

386. ‘शुभ’क अर्थ सँ कर्तव्यक कसौटी धरि — पृ. 911; पाठ-परिमाण 783 शब्द; पाठ-सूत्र: नैतिक, कहै, न्याय, नियम, उचित.

387. घटनाक क्रम सँ ऐतिहासिक बोध धरि — पृ. 914; पाठ-परिमाण 739 शब्द; पाठ-सूत्र: घटना, नूतन, ऐतिहासिक, सही, संस्था.

388. कानूनक अक्षर सँ न्यायबोधक अन्तःस्वर धरि — पृ. 916; पाठ-परिमाण 814 शब्द; पाठ-सूत्र: न्याय, कानून, अधिकार, कहै, नैतिक.

389. अक्षरक पार जे उजास — पृ. 919; पाठ-परिमाण 515 शब्द; पाठ-सूत्र: केँ, कखनो, न्याय, नियम, नियमक.

अनुलग्नक १ — त्वञ्चाहञ्च (गीत प्रबन्ध)

390. त्वञ्चाहञ्च — पृ. 925; पाठ-परिमाण 0 शब्द; पाठ-सूत्र: त्वञ्चाहञ्च.

391. आन-आन पर्व — पृ. 925; पाठ-परिमाण 3997 शब्द; पाठ-सूत्र: पुत्र, कएल, गेल, देखि, अर्जुन.

392. सभा पर्व — पृ. 946; पाठ-परिमाण 1152 शब्द; पाठ-सूत्र: सभा, युधिष्ठिर, दुर्योधन, दुःशासन, शकुनि.

393. वन पर्व — पृ. 952; पाठ-परिमाण 1336 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्जुन, आयल, युधिष्ठिर, गेल, आबि.

394. विराट पर्व — पृ. 958; पाठ-परिमाण 505 शब्द; पाठ-सूत्र: विराट, अर्जुन, सैरन्ध्रीक, कीचक, भीम.

395. उद्योग पर्व — पृ. 961; पाठ-परिमाण 817 शब्द; पाठ-सूत्र: कृष्ण, दुर्योधन, कएल, राज्य, हएत.

396. भीष्म पर्व — पृ. 964; पाठ-परिमाण 847 शब्द; पाठ-सूत्र: भीष्म, अर्जुन, युद्ध, कएल, कृष्ण.

397. द्रोण पर्व — पृ. 968; पाठ-परिमाण 1058 शब्द; पाठ-सूत्र: अर्जुन, द्रोण, युद्ध, कएल, बढ़ल.

398. कर्ण पर्व — पृ. 972; पाठ-परिमाण 369 शब्द; पाठ-सूत्र: कर्णक, अर्जुनक, शल्य, युद्ध, कर्ण.

399. शल्य पर्व — पृ. 974; पाठ-परिमाण 150 शब्द; पाठ-सूत्र: शल्यक, युधिष्ठिर, गदा, दुर्योधन, कृष्ण.

400. सौप्तिक पर्व — पृ. 975; पाठ-परिमाण 276 शब्द; पाठ-सूत्र: अश्वत्थामा, पाण्डव, पाँचू, द्रौपदीक, अस्त्र.

401. स्त्री पर्व — पृ. 976; पाठ-परिमाण 72 शब्द; पाठ-सूत्र: धृतराष्ट्र, भीम, गांधारी, कृष्ण, लौहक.

402. शान्ति पर्व — पृ. 976; पाठ-परिमाण 43 शब्द; पाठ-सूत्र: युधिष्ठिरक, मोन, विखिन्न, छोड़ल, राज.

403. अनुशासन पर्व — पृ. 977; पाठ-परिमाण 29 शब्द; पाठ-सूत्र: युधिष्ठिर, आयल, काल, सूर्य, भेला.

404. आश्वमेधिक पर्व — पृ. 977; पाठ-परिमाण 81 शब्द; पाठ-सूत्र: कएल, आयल, युधिष्ठिरक, कृष्ण, यज्ञ.

405. आश्रमवासिक पर्व — पृ. 977; पाठ-परिमाण 29 शब्द; पाठ-सूत्र: विदुर, बरख, पन्द्रह, बीतल, एला.

406. मौसल पर्व — पृ. 977; पाठ-परिमाण 65 शब्द; पाठ-सूत्र: कृष्ण, करथि, देखि, प्राणान्त, युद्धक.

407. महाप्रास्थानिक पर्व — पृ. 978; पाठ-परिमाण 93 शब्द; पाठ-सूत्र: युधिष्ठिर, कुकुड़, देल, द्रौपदी, हिमालय.

408. स्वर्गारोहण पर्व — पृ. 978; पाठ-परिमाण 141 शब्द; पाठ-सूत्र: पहुँचि, इन्द्र, दूत, ओतऽ, परीक्षा.

अनुलग्नक २ — असञ्जाति मन (गीत प्रबन्ध)

409. असञ्जाति मन — पृ. 980; पाठ-परिमाण 0 शब्द; पाठ-सूत्र: असञ्जाति.

410. सर्ग १ — पृ. 980; पाठ-परिमाण 261 शब्द; पाठ-सूत्र: शाक्य, माया, करथि, हाथी, बुद्धत्व.

411. सर्ग २ — पृ. 981; पाठ-परिमाण 59 शब्द; पाठ-सूत्र: बालकक, सिद्धार्थक, धान्यसँ, पूर्ण, राज्य.

412. सर्ग ३ — पृ. 981; पाठ-परिमाण 280 शब्द; पाठ-सूत्र: वृद्ध, सारथी, कुमार, घुरि, सूत.

413. सर्ग ४ — पृ. 983; पाठ-परिमाण 65 शब्द; पाठ-सूत्र: घुरल, उदायी, लीन, सारथी, द्वार.

414. सर्ग ५ — पृ. 983; पाठ-परिमाण 199 शब्द; पाठ-सूत्र: सिद्धार्थ, करू, बिच, किछु, आज्ञा.

415. सर्ग ६ — पृ. 985; पाठ-परिमाण 74 शब्द; पाठ-सूत्र: वस्त्र, सिद्धार्थ, जाउ, छंदक, सोझाँ.

416. सर्ग ७ — पृ. 985; पाठ-परिमाण 54 शब्द; पाठ-सूत्र: सिद्धार्थ, आश्रम, देखि, स्वर्ग, निकलि.

417. सर्ग ८ — पृ. 985; पाठ-परिमाण 72 शब्द; पाठ-सूत्र: सिद्धार्थक, बाजि, कठोर, हृदय, एम्हर.

418. सर्ग ९ — पृ. 986; पाठ-परिमाण 111 शब्द; पाठ-सूत्र: राम, मोक्षक, गोटे, छथि, कुमार.

419. सर्ग १० — पृ. 986; पाठ-परिमाण 26 शब्द; पाठ-सूत्र: पहुँचि, सिद्धार्थ, बढ़ि, कएल, गंगाकेँ.

420. सर्ग ११ — पृ. 986; पाठ-परिमाण 41 शब्द; पाठ-सूत्र: सिद्धार्थ, राजा, कखनो, काल, बिम्बसार.

421. सर्ग १२ — पृ. 987; पाठ-परिमाण 175 शब्द; पाठ-सूत्र: कएल, गेला, सिद्धार्थ, पाँचटा, मार्ग.

422. सर्ग १३ — पृ. 987; पाठ-परिमाण 181 शब्द; पाठ-सूत्र: मार, वाण, सिद्धार्थ, प्राप्त, हएत.

423. सर्ग १४ — पृ. 988; पाठ-परिमाण 134 शब्द; पाठ-सूत्र: पाओल, मुनि, पहरमे, शाक्य, स्मरण.

424. सर्ग १५ — पृ. 989; पाठ-परिमाण 124 शब्द; पाठ-सूत्र: बुद्ध, क्यो, कएल, हुनक, गुरु.

425. सर्ग १६ — पृ. 990; पाठ-परिमाण 264 शब्द; पाठ-सूत्र: सम्यक, कएल, प्राप्त, बुद्ध, काश्यप.

426. सर्ग १७ — पृ. 991; पाठ-परिमाण 153 शब्द; पाठ-सूत्र: बुद्ध, काश्यप, कएल, प्राप्त, बिम्बसार.

427. सर्ग १८ — पृ. 992; पाठ-परिमाण 55 शब्द; पाठ-सूत्र: सुदत्त, गेल, विहार, जेतवनक, पाइ.

428. सर्ग १९ — पृ. 992; पाठ-परिमाण 84 शब्द; पाठ-सूत्र: बुद्ध, देल, रहय, ग्रहण, दीक्षा.

429. सर्ग २० — पृ. 993; पाठ-परिमाण 50 शब्द; पाठ-सूत्र: कएल, दीक्षित, जेतवन, बुद्धक, ओतऽ.

430. सर्ग २१ — पृ. 993; पाठ-परिमाण 106 शब्द; पाठ-सूत्र: कएल, दीक्षित, बुद्ध, उपदेश, ओतऽ.

431. सर्ग २२ — पृ. 993; पाठ-परिमाण 95 शब्द; पाठ-सूत्र: बुद्ध, गेला, कएल, उपदेश, राजगृहसँ.

432. सर्ग २३ — पृ. 994; पाठ-परिमाण 158 शब्द; पाठ-सूत्र: बुद्ध, छथि, मार, प्राप्त, आम्रपालीक.

433. सर्ग २४ — पृ. 995; पाठ-परिमाण 63 शब्द; पाठ-सूत्र: आनन्द, लिच्छवी, बुद्ध, सुनि, पूछल.

434. सर्ग २५ — पृ. 995; पाठ-परिमाण 110 शब्द; पाठ-सूत्र: शान्त, कएल, नगरी, बुद्ध, आनन्द.

435. सर्ग २६ — पृ. 996; पाठ-परिमाण 85 शब्द; पाठ-सूत्र: प्राप्त, सुभद्र, निर्वाण, अन्तिम, बुद्ध.

436. सर्ग २७ — पृ. 997; पाठ-परिमाण 55 शब्द; पाठ-सूत्र: मल्ल, आगि, महापरिनिर्वाण, आबि, उठेलक.

437. सर्ग २८ — पृ. 997; पाठ-परिमाण 165 शब्द; पाठ-सूत्र: बुद्धक, अस्थि, स्तूप, बुद्ध, आबि.

अनुलग्नक ३ — “Second Person Singular” केर अंग्रेजी आमुखक मैथिली अनुवाद

438. आरम्भ करैत — पृ. 999; पाठ-परिमाण 0 शब्द; पाठ-सूत्र: आरम्भ.

439. १ — पृ. 999; पाठ-परिमाण 835 शब्द; पाठ-सूत्र: कविता, साहित्यिक, छथि, मैथिलीमे, स्थान.

440. २ — पृ. 1000; पाठ-परिमाण 1061 शब्द; पाठ-सूत्र: छथि, किछु, रूपमे, पाठ, करै.

१५. शोधोपयोगी समेकित निरीक्षण

सम्पूर्ण आवरणिका देखबैत अछि जे प्रारम्भिक “स्वप्न” रूपक धीरे-धीरे “प्रश्न”, “भाषा”, “अर्थ”, “प्रमाण”, “इतिहास”, “न्याय” आ “अनुवाद”क शब्द-संसारमे विस्तार पबैत अछि। आरम्भिक घरेलू आ प्राकृतिक शब्दावली पछिला दार्शनिक खण्डसभमे समाप्त नहि होइत; ओ ज्ञानक अमूर्त प्रश्नसभ लेल रूपक-आधार बनल रहैत अछि। एहि निरन्तरताक कारण हजार पृष्ठक विविध सामग्री एकहि काव्य-चेतनामे बान्हल रहैत अछि।

अनुलग्नकसभ पुस्तकक मुख्य परियोजना सँ अलग परिशिष्ट नहि। महाभारत आ बुद्धचरितक संक्षिप्त रूपान्तर भारतीय स्मृति-परम्पराकेँ वर्तमान मैथिली भाषिक चेतनामे पुनःस्थापित करैत अछि; आधुनिक काव्य-आमुखक पुनःअनुवाद समकालीन भाषा-संवाद जोड़ैत अछि। एहि तीनू प्रकारक स्थानान्तरण—महाकाव्य सँ गीत, संस्कृत/तिब्बती परम्परा सँ मैथिली, मैथिली–अंग्रेजी–मैथिली प्रत्यावर्तन—“मिज्झर”क भाषिक रूप अछि।

बिबलियोग्राफी

केवल पोथीक नाम देल जा रहल अछि।

• स्वप्न मे मिज्झर होइत

• न्यायसूत्र

• तत्त्वचिन्तामणि

• नव्य-न्याय भाषा आ पद्धति सम्बन्धी चयनित ग्रन्थ

• बुद्धचरितम्

• महाभारतम्

• भारतीय दर्शन

• [A History of Indian Philosophy]

• [Indian Philosophy: A Counter Perspective]

• [New Perspectives in Indian Philosophy]

• [Philosophy in Classical India: The Proper Work of Reason]

• [Perception: An Essay on Classical Indian Theories of Knowledge]

• [Epistemology in Classical India: The Knowledge Sources of the Nyaya School]

• [The Idea of History]

• [History as Re-Enactment: R. G. Collingwood’s Idea of History]

• [Time and Narrative]

• [Truth and Method]

• [Metahistory]

• [Futures Past: On the Semantics of Historical Time]

• [The Structure of Scientific Revolutions]

Suggested citation: गजेन्द्र ठाकुर. “स्वप्न मे मिज्झर होइत.” Videha — First Maithili Fortnightly eJournal, issue 450, 2026-09-15. https://www.videha.co.in/research/2026/450/स्वप्न-मे-मिज्झर-होइत.htm

मूल विदेह अंक / Original issue

Videha Digital Research Archives — preserved releases

All eight archive releases are published and their DOIs are minted.