गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल कमला चौधरी
Videha Issue 451 · Research article continuation 3
आधुनिक साहित्यपर केन्द्रित अध्याय विषय-सूचीक अनुसार ग्रन्थक सर्वाधिक विस्तृत खण्डमेसँ एक अछि। ई विस्तार स्वयं बतबैत अछि जे आधुनिक कथा, कविता आ अन्य साहित्यिक विधामे लोक-परिधानक भाषा तुलनात्मक अध्ययनक लेल समृद्ध क्षेत्र बनैत अछि।
आधुनिक रचनामे वस्त्र आ शृंगार-पद पात्रक आर्थिक स्थिति, जातीय प्रतिष्ठा, पीढ़ीक अन्तर, लैंगिक अपेक्षा, उत्सव अथवा विस्थापनक सांकेतिक सूचक भऽ सकैत अछि। साहित्यिक विवरण कखनो व्यंग्यात्मक, कखनो संस्मरणात्मक, आ कखनो यथार्थपरक होइत अछि। ताहि कारण पाठक-प्रसंगक बिना कोशीय अर्थ अपूर्ण रहैत अछि।
आधुनिक कालक उपभोक्ता-संस्कृति आ बदलैत उत्पादन-व्यवस्था शब्दसम्पदामे नव श्रेणी जोड़ि सकैत अछि। तथापि एहि व्यापक ऐतिहासिक कथनकेँ ग्रन्थक कोनो विशेष लेखक अथवा उद्धरणक प्रत्यक्ष निष्कर्ष नहियेँ मानल जा सकैत; प्रत्येक उदाहरण हेतु मूल उद्धरणक पुष्टि आवश्यक अछि।
एहि अध्यायक समालोचनामे साहित्यिक प्रतिनिधित्वक समस्या उठैत अछि : साहित्यक पात्र-संसार समग्र मिथिलाक गणनात्मक नमूना नहि होइत। नगर, ग्राम, वर्ग, लिंग आ कालक असमान उपस्थिति शब्द-संग्रहक आवृत्तिकेँ प्रभावित कऽ सकैत अछि।
एहि खण्डक महत्त्व ऐतिहासिक त्रिपदी पूर्ण करबामे अछि—प्राचीन, मध्यकालीन आ आधुनिक। एहि तीनू अध्यायक अन्तर्सम्बन्धक वैज्ञानिक परीक्षण लेल वस्तु-विशेषक “प्रथम देखल लिखित प्रयोग” आ “अन्तिम देखल प्रयोग” जकाँ साक्ष्य-आधारित चिह्न उपयोगी होयत।
सप्तम अध्याय : वेशक शब्दावली
मूल ग्रन्थमे एहि अध्यायक आरम्भ मुद्रित पृष्ठ २७२ पर आ अगिला अध्यायसँ पहिने अन्तिम पृष्ठ २९१ धरि अछि (विषय-सूचीक आधारपर)।
विषय-सूचीक अनुसार एहि अध्यायसँ पुस्तक वर्णनात्मक इतिहाससँ प्रत्यक्ष कोशरूप दिस अग्रसर होइत अछि। देखल गेल मुद्रित पृष्ठ २८६–२८७ मे वस्त्रक नाम, ओकर देहपर धारण करबाक पद्धति, आकार वा उपयोगसँ सम्बन्धित परिभाषात्मक विवरण अछि। ई अंश शब्दसूचीकेँ निर्जीव नाम-संग्रहसँ अलग करैत अछि।
मूल-पाठक एहि भागमे “पायजामा/पजामा”, “मोहरी”, “पेट”, “साड़ी”, “नुआ/लुगा”, “आँचर” सन शब्द एवं रूप आँखि पड़ैत अछि। एहि सभकेँ एतय मात्र प्रत्यक्ष देखल उदाहरणक रूपमे लेल गेल अछि; कोनो शब्दक सर्वत्र समान अर्थक दावा नहि कएल गेल अछि।
विशेषतः साड़ीक वर्णनमे वस्तुक खण्ड, ओकर शरीरपर स्थान आ स्थानीय नामकरणक अन्तर्सम्बन्ध दिस संकेत भेटैत अछि। “आँचर” सन शब्द वस्त्रक विशिष्ट अंशक नाम होइतो सामाजिक व्यवहारमे अनुषंगिक अर्थ अर्जित कऽ सकैत अछि। वस्तु-भागक नामक संग क्रिया आ सामाजिक प्रसंग जोड़ब कोशक गुणवत्ता बढ़बैत अछि।
एहि अध्यायक समीक्षामे वस्त्रक प्रकार्यगत वर्गीकरण—ऊपरी वस्त्र, निचला वस्त्र, आवरण, सिलाइदार वस्त्र, असिलाइदार वस्त्र, पुरुष/स्त्री/उभय प्रयोग आ विशेष अवसर—विश्लेषणक उपयोगी उपकरण अछि। ई श्रेणी अनुसन्धानकर्ताक प्रस्ताव छी; मूल ग्रन्थक वास्तविक सर्व प्रविष्टिक प्रमाणित अनुक्रम नहि।
अष्टम अध्याय : आभूषणक शब्दावली
मूल ग्रन्थमे एहि अध्यायक आरम्भ मुद्रित पृष्ठ २९२ पर आ अगिला अध्यायसँ पहिने अन्तिम पृष्ठ ३०१ धरि अछि (विषय-सूचीक आधारपर)।
आभूषणक शब्दावली वस्तुक भौतिक संरचना आ ओकर सामाजिक प्रतीकार्थ दुनूकेँ एकत्र कऽ देखबाक अवसर दैत अछि। कर्ण, नाक, गरदनि, भुजा, हाथ, कमर आ पयर—देहक स्थान अनुसार वर्गीकरण बहुधा अर्थ-व्यवस्था स्पष्ट करैत अछि।
आभूषण-पदक अध्ययनमे धातु, मणि, बनावट, जोड़ी अथवा एकल प्रयोग, विवाह वा अन्य संस्कारसँ सम्बद्धता आ स्थानीय नामक भेद अलग-अलग नोट करब चाही। एकहि वस्तुक आकार वा पदार्थ बदललासँ नाम बदलि सकैत अछि, आ एकहि नाम अनेक आकारपर लागू भऽ सकैत अछि।
लैंगिक आ वैवाहिक संकेतक प्रश्न एहि अध्यायसँ सम्बन्धित महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक विमर्श अछि। मुदा कोनो आभूषणकेँ मिथिलाक सभ समुदाय वा सभ कालमे एकहि अनिवार्य सामाजिक संकेत मानि लेब अनैतिहासिक सामान्यीकरण होयत।
शब्दकोशीय दृष्टिसँ आभूषणक चित्र, देहपर प्रयोगक स्थान, समानार्थी, क्षेत्रीय वैकल्पिक रूप आ प्रमाणित साहित्यिक उद्धरण जोड़लासँ ई अध्याय लोकसांस्कृतिक अभिलेखक रूपमे आओर प्रभावशाली भऽ सकैत अछि।
नवम अध्याय : प्रसाधनक शब्दावली
मूल ग्रन्थमे एहि अध्यायक आरम्भ मुद्रित पृष्ठ ३०२ पर आ अगिला अध्यायसँ पहिने अन्तिम पृष्ठ ३०९ धरि अछि (विषय-सूचीक आधारपर)।
प्रसाधनक क्षेत्र वस्त्र आ आभूषणसँ किंचित भिन्न अछि : एतय शरीरक सज्जा, लेपन, केश-विन्यास, सुगन्ध, अलंकरण आदि क्रिया आ सामग्री आपसमे जुड़ैत अछि। एकटा शब्द पदार्थक नाम भऽ सकैत अछि तँ दोसर ओकर उपयोगक क्रिया अथवा उपयुक्त अवसर सूचित करैत अछि।
एहि तरहक शब्दमे भौतिक पदार्थ आ सामाजिक अर्थक सीमा प्रायः परस्पर प्रवेश करैत अछि। एक वस्तु दैनिक शारीरिक स्वच्छता, सौन्दर्य, अनुष्ठान अथवा स्वास्थ्यक प्रसंगमे भिन्न अर्थ लऽ सकैत अछि। अतः मात्र एक-पंक्तिक समानार्थ देब सदिखन पर्याप्त नहि होइत।
पुरान लोक-प्रसाधन आ बाजारसँ आबि रहल नव सामग्रीक सम्बन्ध भाषिक रूपान्तरणसँ जोड़ल जा सकैत अछि। मुदा विशिष्ट उत्पादक प्रवेश-काल प्रमाणित करबा लेल अन्य ऐतिहासिक स्रोत आवश्यक होयत; वर्तमान समीक्षा स्रोत-विहीन तिथि नहि जोड़ैत अछि।
एहि अध्यायक भावी अनुसन्धानमे शब्दक पदार्थ-वर्ग, बनबबाक विधि, प्रयोगकर्ताक समूह, अवसर, निषेध-नियम आ लोकगीतमे उपस्थितिक पृथक् विवरण उपयोगी अछि।
दशम अध्याय : ध्वनि-विचार
मूल ग्रन्थमे एहि अध्यायक आरम्भ मुद्रित पृष्ठ ३१० पर आ अगिला अध्यायसँ पहिने अन्तिम पृष्ठ ३१५ धरि अछि (विषय-सूचीक आधारपर)।
“ध्वनि-विचार” के समावेशसँ ई पोथी मात्र सांस्कृतिक शब्द-संग्रह नहि रहि भाषावैज्ञानिक अध्ययनक दाबी प्रस्तुत करैत अछि। वेश-प्रसाधनक शब्द समय आ क्षेत्र अनुसार उच्चारण-परिवर्तन अनुभव कऽ सकैत अछि।
भाषावैज्ञानिक परीक्षणमे मूलरूप, व्यवहृत उच्चारण, ध्वनि-स्थानान्तरण, स्वर-परिवर्तन, व्यञ्जनक सरलीकरण आ सम्पर्कजन्य रूपकेँ अलग करब अपेक्षित अछि। वर्तनीक भेद आ ध्वनिक भेद एक नहि : लिखित रूपक भिन्नताकेँ स्वतः उच्चारणक भिन्नता नहि मानबाक चाही।
शब्दक व्युत्पत्ति घोषित करबा लेल केवल रूप-साम्य पर्याप्त नहि। ऐतिहासिक मध्यवर्ती रूप, समान अर्थ आ स्पष्ट ध्वनि-नियम आवश्यक अछि। एहि कसौटीपर पुनःपरीक्षण ग्रन्थक भाषावैज्ञानिक उपलब्धिक उपयोग बढ़ा सकैत अछि।
एहि अध्यायकेँ मूल्याङ्कन करबा समय उच्चारणक स्थान, वक्ताक पीढ़ी, सामाजिक परिवेश तथा लिखित साहित्यक रूढ़ वर्तनीक अलग-अलग अभिलेखन उपयोगी होयत।
एकादश अध्याय : शब्द-विचार
मूल ग्रन्थमे एहि अध्यायक आरम्भ मुद्रित पृष्ठ ३१६ पर आ अगिला अध्यायसँ पहिने अन्तिम पृष्ठ ३२३ धरि अछि (विषय-सूचीक आधारपर)।
शब्द-विचारक केन्द्र शब्दक निर्माण, रचना, वर्ग, अर्थ आ सम्बन्ध होइत अछि। एहि ग्रन्थक समग्र योजना देखलासँ एकटा विशेष प्रश्न उठैत अछि : कोन वस्तु-नाम स्थानीय मूलक अछि, कोन शब्द अन्य भाषिक परम्परासँ आबि बसल अछि, आ कोन शब्द बहुअर्थी बनल अछि?
एकहि वस्तु हेतु अनेक नाम, अथवा एकहि नामक अनेक वस्तु हेतु प्रयोग, शब्दावलीक व्यवहृत प्रकृतिक सूचक अछि। एहि परिस्थिति मे समानार्थकता, अर्थसङ्कोच, अर्थविस्तार आ संज्ञा-निर्माणक विश्लेषण मात्र शब्द-सामग्री बढ़ेबाक काज नहि, अर्थ-विज्ञानक अनुसन्धान सेहो अछि।
समालोचनात्मक रूपसँ प्रत्येक प्रविष्टिमे पद-परिचय, व्याकरणिक वर्ग, स्पष्ट अर्थ, उदाहरण, भेदक सीमा, वर्तमान प्रयोग आ स्रोत-समर्थन अनिवार्य न्यूनतम तत्त्व मानल जा सकैत अछि। ई प्रस्तावित कोशीय मानक अछि, मूल ग्रन्थक प्रत्येक प्रविष्टि एकर अनुपालन करैत अछि—एहन दावा नहि।
एहि अध्यायक प्रासंगिकता एकर क्षमता मे अछि जे लोकजीवनक वस्तुसभकेँ भाषाक अर्थतन्त्रसँ जोड़ि सकैत अछि। अन्य सामाजिक क्षेत्रक शब्दावलीसँ तुलना कएलापर मैथिली शब्दनिर्माणक सामान्य प्रवृत्ति स्पष्ट भऽ सकैत अछि।
द्वादश अध्याय : उपसर्ग आ प्रत्यय विचार
मूल ग्रन्थमे एहि अध्यायक आरम्भ मुद्रित पृष्ठ ३२४ पर आ अगिला अध्यायसँ पहिने अन्तिम पृष्ठ ३४० धरि अछि (विषय-सूचीक आधारपर)।
अन्तिम अध्याय शब्दनिर्माणक रूपात्मक साधनपर दृष्टि अनैत अछि। उपसर्ग आ प्रत्ययक सहारे नवानि शब्द बनबाक प्रक्रिया वेश-भूषा-सम्बन्धी पदक संरचनात्मक अध्ययनक उपयुक्त क्षेत्र अछि।
अर्थ-विश्लेषणमे देखबाक चाही जे कोनो रूप वास्तवमे उत्पादक प्रत्यय अछि कि पुरान शब्दक अभिन्न अंश। सम्पर्कभाषाक रूपकेँ मैथिली प्रत्यय मानबाक पूर्व स्वतंत्र उदाहरण, आवृत्ति आ ध्वनिगत अनुकूलनक प्रमाण चाही।
एहि अध्यायक मूल्यांकन लेल मूल शब्द, प्रत्यययुक्त रूप, पद-भेद, अर्थ-परिवर्तन आ प्रमाणित प्रयोगक समांतर प्रस्तुति लाभकारी अछि। एहि पद्धतिसँ केवल रूप-सूची नहि, बल्कि शब्द-निर्माणक सुसंगत सिद्धान्त उभरि सकैत अछि।
ग्रन्थक अनुक्रममे ध्वनि → शब्द → उपसर्ग-प्रत्ययक क्रम भाषा-विज्ञानक पाठकीय दृष्टिसँ अर्थवान अछि। एतय सांस्कृतिक कोश आ व्याकरणिक विवेचन एकहि अध्ययनमे प्रवेश करैत अछि।
उपसंहारक आलोचनात्मक अध्ययन (मुद्रित पृष्ठ ३४१ सँ)
मूल ग्रन्थमे “उपसंहार” पृथक् देल गेल अछि। सम्पूर्ण विषय-सूचीक क्रमकेँ ध्यानमे रखलासँ एहि शोधक बृहत्तर योगदान मैथिली साहित्य, लोकजीवनक वस्तु-संस्कृति आ भाषावैज्ञानिक शब्द-अध्ययनकेँ एक अनुसन्धान-क्षेत्रमे जोड़ब अछि।
एहि ग्रन्थकेँ केवल लुप्तप्राय नामक सूची मानब एकर सम्भावनाकेँ सीमित करब होयत। ई सांस्कृतिक सन्दर्भ सहित शब्दक परिभाषा, साहित्यसँ साक्ष्य-संग्रह आ रूप-विश्लेषण तीनू स्तरकेँ एकत्र करबाक प्रयत्नक रूपमे महत्त्वपूर्ण अछि। तदपि पाठ-सत्यापन, मानकीकृत उल्लेख-प्रणाली आ क्षेत्रवार उपयोगक चिह्नीकरण अलग विशद जाँचक विषय अछि।
परिशिष्टक अध्ययन
परिशिष्ट (क) : शब्द-सूची — मुद्रित पृष्ठ ३४५
विषय-सूचीक अनुसार मूल ग्रन्थक समापनमे ग्रन्थक समाप्तिक पश्चात् प्राप्त अतिरिक्त शब्दक सूची देल गेल अछि। ई तथ्य सम्पादकीय दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण अछि : शब्द-संग्रह एक स्थिर पूर्णसूची नहि, शोध-समय आ क्षेत्रीय संवादक संग बढ़ैत रहबाक प्रक्रिया अछि। एहि शब्दसभक अन्तिम कोशमे पुनर्संयोजन हेतु रूप, अर्थ, प्रमाण आ उपयोग-क्षेत्र दर्ज करबाक चाही।
परिशिष्ट (ख) : सन्दर्भ ग्रन्थावली — मुद्रित पृष्ठ ३५१
सन्दर्भ-ग्रन्थावली ऐतिहासिक दावा, काव्य-उद्धरण, शब्दक व्युत्पत्ति आ समाज-सांस्कृतिक वर्णन जाँचबाक प्राथमिक साधन अछि। वर्तमान विवेचनमे मूल सूचीकेँ अक्षरशः उतारल नहि गेल अछि, तेँ एतय कोनो अतिरिक्त ग्रन्थक नाम मूल लेखकपर आरोपित नहि कएल गेल अछि।
परिशिष्ट (ग) : अशुद्धि ग्रन्थक सूची — मुद्रित पृष्ठ ३५४
विषय-सूचीक तृतीय परिशिष्ट “अशुद्धि ग्रन्थक सूची” नामसँ अंकित अछि। ई शीर्षक मूल सूचीसँ पठित अछि; यथार्थ अभिप्राय वा प्रविष्टि-स्वरूपक विस्तारसँ पुष्टि बिनु एकरा सामान्य “शुद्धिपत्र” मानि बदलल नहि गेल अछि। एहि भेदक संरक्षण स्रोत-निष्ठ पाठसम्पादनक आवश्यक शर्त अछि।
वेश-सम्बन्धी शब्दक निकट-पाठ
वेशक शब्दावलीक एहि दू पृष्ठमे “पायजामा/पजामा” सन्दर्भमे ओकर निर्माण आ परिधानक विवरण, “मोहरी” रूपमे निचला भागक उल्लेख, तथा “साड़ी” आ “नुआ/लुगा” सम्बन्धी चर्चा देखाइत अछि। शब्दक रूपपर स्थानीय भाषिक प्रयोगक प्रभाव बुझबाक सम्भावना स्पष्ट होइत अछि।
“साड़ी”क प्रसंगमे वस्त्रक अगिला, पछिला, ऊपरक आ लम्बाइ-सम्बन्धी खण्डक विवेचन अछि। “आँचर” सेहो एहि सन्दर्भमे उपस्थित अछि। ई एक महत्त्वपूर्ण कोशीय पद्धति अछि : एकटा वस्तुक अन्तर्गत ओकर भाग-नाम, उपयोग-नाम आ सम्बन्धित क्रियाकेँ एक अर्थक्षेत्रमे पढ़ल जा सकैत अछि।
एहि पृष्ठक उदाहरणसँ भाषिक संरचनाक कम-सँ-कम चार स्तर स्पष्ट होइत अछि : (१) मुख्य वस्तुनाम, (२) वैकल्पिक स्थानीय रूप, (३) वस्तुक अंगक नाम, आ (४) धारण-विधिक क्रियात्मक वर्णन। एहि चार स्तरक पृथक् अनुक्रमणिका बनलासँ अध्ययनक खोज-योग्यता बढ़त।
समेकित आलोचनात्मक निष्कर्ष
1. ई पोथी मैथिल वस्त्र-संस्कृतिक अध्ययनकेँ शब्दसम्पदा आ साहित्यिक इतिहाससँ जोड़ैत अछि; एही कारण केवल नृवंशविज्ञान वा केवल शब्दकोशक संकीर्ण वर्गमे एकरा सीमित करब उचित नहि।
2. बारह अध्यायक क्रम व्यापक भारतीय पृष्ठभूमिसँ मैथिल विशिष्टता, ऐतिहासिक बदलाव, कालक्रमिक साहित्यिक प्रमाण, कोश-संग्रह आ भाषा-विश्लेषण धरि विस्तृत अछि।
3. वेश, आभूषण आ प्रसाधन तीनू समानार्थी क्षेत्र नहि अछि : वस्तुक उपयोग, शरीरसँ सम्बन्ध आ सामाजिक प्रतीकत्वक आधारपर स्पष्ट उपवर्ग जरूरी अछि।
4. मूल ग्रन्थक प्रत्यक्ष देखल शब्दसामग्रीमे स्थानीय रूपभेद आ वस्तु-अंगक नाम महत्त्वपूर्ण अछि; एहिसँ मैथिली कोश-लेखनक समृद्धि स्पष्ट होइत अछि।
5. काव्यक वस्त्र-वर्णनकेँ सामाजिक जनगणनाक निष्कर्षक रूपमे नहि पढ़बाक चाही। प्रत्येक साहित्यिक उदाहरणक विधा, प्रसंग आ पाठभेद जाँचल जाय।
6. ऐतिहासिक निरन्तरता, बाहरी प्रभाव, व्युत्पत्ति आ विशिष्ट समुदायमे उपयोग सन दावाक प्रमाण-मानक एकहि होयब जरूरी नहि; प्रत्येक प्रकारक दावाक अलग साक्ष्य-श्रेणी चाही।
7. आगाँक विद्वत् संस्करण लेल प्रत्येक प्रविष्टि संग मुद्रित पृष्ठ, उद्धरण, रूपान्तर, अर्थ, वस्तु-वर्ग, क्षेत्र, साहित्यिक काल आ स्रोत-सत्यापनक स्पष्ट चिह्न देल जाय।
समेकित उपसंहार
कमला चौधरीक साहित्यक पाठ-विविधता एहि तीनू कृतिमे स्पष्ट होइत अछि। ‘मोनक पौती’मे परकाया-प्रवेश करैत अनुवादक भाषा आ अनुभवक बीच संवाद स्थापित करैत छथि; ‘समय-संकेत’मे कथाकारक दृष्टि समाजक असमानता, अन्तःसम्बन्ध आ निर्णयक नैतिकता पर केन्द्रित रहैत अछि; ‘मैथिलीक वेश-भूषा-प्रसाधन सम्बन्धी शब्दावली’मे सांस्कृतिक जीवनक वस्तुगत इतिहास शब्दक रूपमे सुरक्षित होइत अछि।
‘मोनक पौती’क शशितारा आ ‘समय-संकेत’क अनेक स्त्रीपात्र एकटा साझा प्रश्न उठबैत छथि—समाजक स्वीकृत भूमिका सँ बाहर व्यक्ति अपन इच्छा, अधिकार आ सम्मानकेँ केना सुरक्षित राखय? किन्तु पहिल कृति अनूदित उपन्यासिका अछि आ दोसर मौलिक कथा-संग्रह; दूनूक कथन-पद्धति आ लेखकीय अधिकारक अन्तरकेँ मिटाक समानान्तर रखब आलोचनात्मक भूल होयत।
वेश-भूषा-प्रसाधनक कोशीय अनुसन्धान एहिपर एक भिन्न दृष्टि खोलैत अछि। स्त्री-पुरुषक वस्त्र, आभूषण, श्रृंगार आ सामाजिक आचारक नाम केवल पदार्थक नाम नहि, इतिहास, हैसियत, अभिरुचि आ सम्बन्धक सूचक सेहो अछि। कथा आ अनुवादमे जे सांस्कृतिक शब्द सहज व्यवहारक रूपमे उपस्थित अछि, शब्दावली-ग्रन्थ ओहि शब्दक अर्थ-विकास आ परम्पराक अध्ययनक अवसर दैत अछि।
एहि तीनू दिशाकेँ जोड़ैत मैथिली भाषाक लोकजीवनसँ आत्मीयता, स्त्रीक व्यक्ति-सत्ता, सामाजिक व्यवहारक विविधता आ साहित्यिक शिल्पक सक्रियता कमला चौधरीक कृतित्वक प्रमुख विशेषता बनि उभरैत अछि। पाठक लेल ई ग्रन्थ अन्तिम फैसला सुनयबाक बदला विवेचनक एहन व्यवस्थित आधार प्रस्तुत करैत अछि, जतऽ कथा, अनुवाद आ भाषा-संस्कृतिक प्रश्न एक-दोसरकेँ आलोकित करैत अछि।
ग्रन्थसूची
क. प्राथमिक ग्रन्थ आ संस्करण
आशापूर्णा देवी। मोनक पौती। मूल बंगला कथाक मैथिली अनुवाद : कमला चौधरी। बेरमा/निर्मली, बिहार : पल्लवी प्रकाशन, २०२२। ISBN 978-93-93135-12-4।
चौधरी, कमला। समय-संकेत। मैथिली कथा-संग्रह। २०१०। प्रकाशक : उपलब्ध ग्रन्थ-विवरणमे सुनिश्चित नहि।
चौधरी, कमला। मैथिलीक वेश-भूषा-प्रसाधन सम्बन्धी शब्दावली। २००८। प्रकाशक : उपलब्ध ग्रन्थ-विवरणमे सुनिश्चित नहि।
ख. अनुवाद-सिद्धान्त आ तुलनात्मक साहित्यक मुद्रित ग्रन्थ
Baker, Mona. In Other Words: A Coursebook on Translation. Second edition. London and New York: Routledge, 2011.
Bassnett, Susan. Translation Studies. Fourth edition. London and New York: Routledge, 2014.
Catford, J. C. A Linguistic Theory of Translation: An Essay in Applied Linguistics. London: Oxford University Press, 1965.
Munday, Jeremy. Introducing Translation Studies: Theories and Applications. Fourth edition. London and New York: Routledge, 2016.
Nida, Eugene A. Toward a Science of Translating: With Special Reference to Principles and Procedures Involved in Bible Translating. Leiden: E. J. Brill, 1964.
Nida, Eugene A., and Charles R. Taber. The Theory and Practice of Translation. Leiden: E. J. Brill, 1969.
Nord, Christiane. Translating as a Purposeful Activity: Functionalist Approaches Explained. Manchester: St. Jerome Publishing, 1997.
Toury, Gideon. Descriptive Translation Studies and Beyond. Amsterdam and Philadelphia: John Benjamins Publishing Company, 1995.
Venuti, Lawrence. The Translator’s Invisibility: A History of Translation. London and New York: Routledge, 1995.
Niranjana, Tejaswini. Siting Translation: History, Post-Structuralism, and the Colonial Context. Berkeley: University of California Press, 1992.
Simon, Sherry. Gender in Translation: Cultural Identity and the Politics of Transmission. London and New York: Routledge, 1996.
ग. कथा-समालोचना आ कोश-विज्ञानक मुद्रित ग्रन्थ
Landau, Sidney I. Dictionaries: The Art and Craft of Lexicography. Second edition. Cambridge: Cambridge University Press, 2001.
Rimmon-Kenan, Shlomith. Narrative Fiction: Contemporary Poetics. Second edition. London: Routledge, 2002.
Zgusta, Ladislav. Manual of Lexicography. The Hague: Mouton, 1971.
घ. ग्रन्थसूचनात्मक टिप्पणी
‘मोनक पौती’क प्रकाशकीय परिचयमे उल्लिखित ‘Moner Jhanpi’ आ तुलनात्मक विवेचनमे आलेल ‘সোনার কৌটো’ शीर्षकक मूल बंगला मुद्रित संस्करण, वर्ष आ प्रकाशकक परस्पर सम्बन्ध सुनिश्चित नहि अछि; ताहि लेल अपुष्ट बंगला संस्करणक पृथक् पुस्तक-प्रविष्टि बनाओल नहि गेल अछि। ‘समय-संकेत’ आ ‘मैथिलीक वेश-भूषा-प्रसाधन सम्बन्धी शब्दावली’क प्रकाशकक नाम पुष्टि बिना नहि जोड़ल गेल अछि।