गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल ललिता झा
Videha Issue 451 · Research article continuation 1
१.११. गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल ललिता झा
VIDEHA 451 • VIDEHA451 / PROSE 11 • सम्पूर्ण मूल पाठ
स्रोतक मूल शीर्षक, प्रकाशन-विवरण, विषय-सूची, अध्याय, तालिका, अन्तिम टिप्पणि आ सन्दर्भ पूर्ण रूपेँ समाविष्ट। मूल स्रोतमे छपल आन्तरिक पृष्ठाङ्क स्रोत-संस्करणक अछि।
मैथिली साहित्य / भाषिक–सांस्कृतिक समालोचना
नित नवल ललिता झा
डॉ. ललिता झाक ‘मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली’क अध्यायवार समालोचनात्मक अनुशीलन
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भोजनपरम्परा • साहित्य • शब्दार्थ • भाषाविज्ञान
लेखक : गजेन्द्र ठाकुर सम्पादक : विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका २०२६
प्रकाशन-विवरण
नित नवल ललिता झा
लेखक : गजेन्द्र ठाकुर
सम्पादक : विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका
© गजेन्द्र ठाकुर / प्रीति ठाकुर, २०२६
सर्वाधिकार सुरक्षित। लेखकक लिखित अनुमतिक बिना एहि पुस्तकक कोनो अंशक पुनर्मुद्रण वा व्यावसायिक पुनर्प्रकाशन नहि कएल जाए। उद्धरण आ शैक्षिक उपयोग प्रचलित सन्दर्भ-परम्पराक अनुसार कएल जा सकैत अछि।
मुद्रण-विन्यास : ६ × ९ इञ्च
अध्ययनाधीन पोथी : डॉ. ललिता झा। मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली। प्रथम संस्करण, २०११।
कृतिक अध्ययन-सार
डॉ. ललिता झाक ‘मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली’ मैथिलीक भोजन-व्यवहारकेँ केवल व्यञ्जन वा पाक-विधिक सूची मानि नहि, भाषिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक आ ऐतिहासिक अध्ययनक पृथक क्षेत्र मानैत अछि। एकर प्रमुख अवदान ई अछि जे घरेलू व्यवहारमे जीवित अनेक शब्दक अर्थ मात्र नहि, ओकर वस्तु, आकार, प्रक्रिया, प्रयोग, प्रसङ्ग आ परिवर्तित रूपक व्याख्या देल गेल अछि। एहि कारण ई कृति शब्दकोष, लोकसंस्कृति-अध्ययन आ भाषा-विज्ञानक संगमपर अवस्थित अछि।
प्रस्तुत विवेचनमे पोथीक विषय-प्रवेश, बारहो अध्याय, उपसंहार आ दुनू परिशिष्ट अलग-अलग पढ़ि विचारल गेल अछि। पहिल तीन अध्याय भोजनक ऐतिहासिक-सामाजिक पृष्ठभूमि, चारिमसँ छठम अध्याय साहित्यिक साक्ष्य, सातमसँ नवम अध्याय वास्तविक लोक-शब्दसम्पदा आ अन्तिम तीन अध्याय ध्वनि, शब्दरचना तथा प्रत्यय-व्यवस्थाक विवेचन प्रस्तुत करैत अछि। ई विवेचन अध्यायवार प्रतिपाद्यक पुनर्संरचना करैत अछि; मूल पोथीक सम्पूर्ण शब्दसूचीक अनुलिपि नहि अछि।
ग्रन्थक सर्वाधिक मौलिक पक्ष उपकरण, आधार-सामग्री आ भोजनक कार्य-व्यापारक सूक्ष्म शब्दभेद अछि। ‘काँस/काँसा’, ‘पीढ़ी’, ‘सूप’, ‘अरबा/उसिना’, ‘खखरी’, ‘निरैठ’ आदि शब्दसँ स्पष्ट होइत अछि जे मैथिलीमे वस्तु, अवस्था, प्रयोजन आ क्रियाक आधारपर अर्थ-भेदक परम्परा बहुत सघन अछि। साहित्यिक अंशमे भोजनोपकरण, भोज्य-सामग्री, सामाजिक सम्बन्ध आ लोकोक्तिक इतिहासक सूत्र एकहि संग भेटैत अछि।
समालोचनात्मक निष्कर्ष ई अछि जे क्षेत्रीय खाद्य-शब्दावलीकेँ जीवित राखबाक लेल मूल उच्चारण, स्थानीय रूपान्तर, उपयोग-प्रसङ्ग, वक्ताक सामाजिक स्थिति आ वर्तमान प्रचलनक नूतन प्रमाण संकलित करब आवश्यक अछि। पोथीक महत्व एहि लेल सेहो अछि जे लेखिका आधुनिकता आ औद्योगिकीकरणसँ अप्रचलित होइत घरेलू साधन एवं ओकर नामपर विशेष चिन्ता करैत छथि।
विवेचनक दृष्टि
कृतिक शब्दविवेचनकेँ तीन साक्ष्यक्षेत्रमे बुझल जा सकैत अछि—पुरातन आ आधुनिक साहित्य, प्रचलित घरेलू व्यवहार, आ ध्वनि–रूप–अर्थक भाषावैज्ञानिक सम्बन्ध। पुस्तकक अपन पृष्ठ-संकेत साहित्यिक उदाहरण आ शब्दक ऐतिहासिक सन्दर्भक संग पढ़बाक चाही।
कोनो प्राचीन रचनामे खाद्य-पदार्थक नाम भेटब आ आधुनिक व्यञ्जनक ठीक ओहि रूपमे निरन्तरता सिद्ध होयब एक नहि अछि। एही कारण समालोचनामे ग्रन्थक प्रतिपादन, प्रमाणक सीमा आ आगाँक अनुसन्धानक सम्भावना अलग-अलग देखाओल गेल अछि।
कृतिक परिशिष्टसभक क्रमक सन्दर्भमे ध्यान देबाक तथ्य ई अछि जे रेखाचित्र परिशिष्ट–क (पृ. ३२७–३३१) मे आ अधीत ग्रन्थक सूची परिशिष्ट–ख (पृ. ३३२ सँ आगाँ) मे अछि; विषय-सूचीमे देखल क्रमभेदक अपेक्षा पुस्तकक वास्तविक अनुक्रम निर्णायक अछि।
विषय-प्रवेश: मूल अनुसन्धानक प्रश्न
विषय-प्रवेश (पृ. २७–३०) मे लेखिका शब्दकेँ भाषाक आधारभूत एकाइ मानि सामान्य व्यवहारक शब्द आ विशिष्ट-पारिभाषिक शब्दमे अन्तर करैत छथि। भोजनक विषयमे ‘विशिष्ट’ शब्दक अर्थ केवल बाह्य वैज्ञानिक शब्द नहि, गाम-घरमे प्रयोग होइत ओहन नाम अछि जकर अर्थ एक विशेष वस्तु, आकार, क्रिया, स्वाद वा अवसरक संग जुड़ल हो। एकै विषयक विविध शब्दप्रयोगक संकलन भाषिक समृद्धिक प्रमाण सेहो अछि आ सामाजिक जीवनक दस्तावेज सेहो।
एहि भूमिकामे शब्द-ग्रहण, अर्थ-परिवर्तन आ शब्द-लोपक प्रक्रिया प्रमुख प्रश्न अछि। जखन परिवर्तनशील सामाजिक जीवनमे नव उपकरण आ खाद्य-विन्यास प्रवेश करैत अछि, तखन पुरान नाम अप्रचलित भऽ सकैत अछि। एकर अर्थ ई नहि जे सभ नव रूप अनुचिते अछि; अनुसन्धेय तथ्य ई अछि जे कोन शब्द केहन सामाजिक-व्यवहारिक कारणसँ बदलल। लेखिकाक आग्रह एही प्रक्रियाक बीच लोकभाषिक शब्दसँ प्राप्त सांस्कृतिक सूचना संचित करबाक अछि।
समालोचनात्मक दृष्टिसँ एहि प्रवेशक तीन मूल अनुसन्धान-प्रश्न उभरैत अछि: (१) कोन विशेष शब्दक कोन निश्चित प्रत्यक्ष सन्दर्भ अछि? (२) ओकर रूप, अर्थ आ प्रयोग कालान्तरमे कोना बदलैत अछि? (३) साहित्यिक प्रमाण आ वर्तमान लोकप्रयोगक बीच कतय साम्य आ कतय अन्तर अछि? एहि तीनू प्रश्नकेँ समस्त बारहो अध्यायपर लागू कएल जा सकैत अछि।
प्रथम अध्याय। भारतीय भोजनक पारम्परिक स्वरूप
पुस्तकमे सम्बद्ध पृष्ठ: ३१–३९।
पर्यावरण आ भोजनक आधार
लेखिका भौगोलिक पर्यावरणकेँ भारतीय भोजनक प्रथमतः निर्धारक तत्त्व मानैत छथि। वनस्पति, पशुधन, नदी-जलाशय, समतल खेत आ पठारी भूभागक अन्तर खाद्य-संसाधनमे विविधता अनैत अछि। मुदा भोजन केवल प्राकृतिक उपलब्धताक प्रश्न नहि; सामाजिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि सेहो ‘खाद्य’ आ ‘अखाद्य’क वर्गीकरण बनबैत अछि। अतः एहि अध्यायक आरम्भसँ भौगोलिक कारण आ मानवीय मूल्यव्यवस्थाकेँ एकत्र पढ़ब आवश्यक अछि।
कालक्रमक स्रोत आ तकर अर्थ
सिन्धु सभ्यतासँ लऽ वैदिक साहित्य, महाकाव्य, पुराण, आयुर्वेद, संस्कृत काव्य-नाटक आ अनुवर्ती राजनीतिक-सांस्कृतिक सम्पर्क धरि लेखिका भोजन-पदार्थ, पान-व्यवहार आ विधि-निषेधक उल्लेख संकलित करैत छथि। पृ. ३२–३८ मे जौ, गहूम, चाउर, तिल, मटर, दूध-दही, घृत, मधु, गुड़, मांस-माछ, फल, लवण आदिक चर्चा कालविशेषक साहित्यिक साक्ष्यसँ जोड़ल गेल अछि। भिन्न युगक साहित्यस्रोतकेँ एकरूपी भोजन-व्यवस्थाक प्रमाण मानि लेब उचित नहि; अध्यायक मूल्य कालक्रममे परिवर्तनक संकेत देबामे अछि।
नाम आ पदार्थक अन्तर
‘करम्भ’, ‘अपूप’, ‘पुरोडाश’, ‘धान’, ‘तण्डुल’ आदिक उल्लेख जखन पुरान ग्रन्थमे भेटैत अछि, तखन ओ नामक ऐतिहासिक उपस्थिति सिद्ध करैत अछि। मुदा ओही नामसँ आइ बननिहार व्यञ्जन निश्चय एक्के सामग्री वा पद्धतिसँ बनैत छल, एकर अतिरिक्त प्रमाण चाही। एहि सावधानीक संग ई अध्याय मैथिल भोजनक व्यापक भारतीय पृष्ठभूमि तैयार करैत अछि।
विधि-निषेध आ शक्ति-संबन्ध
आहारक सन्दर्भमे शुद्ध-अशुद्ध, अनुमत-वर्जित, मांसाहार-निरामिषता, सामाजिक श्रेणी आ धार्मिक मान्यता सभ निरन्तर बदलबाक रूपमे प्रस्तुत अछि। एहि विवरणकेँ इतिहासक तत्कालीन दृष्टिकोण मानब; आधुनिक स्वास्थ्य-विज्ञान अथवा सामाजिक नैतिकताक शाश्वत नियम मानि नहि लयब।
पाठाधारित शब्द-साक्ष्य
आलोचनात्मक परीक्षण
एहि अध्यायमे पुरान साहित्यसँ पदार्थक नाम ग्रहण करबाक पद्धति उपयोगी अछि, मुदा साहित्यिक पाठक सामाजिक प्रतिनिधित्व सीमित होइत अछि। उच्चवर्गीय ग्रन्थ, धर्मशास्त्र वा काव्यमे दर्ज खाद्य-व्यवहारकेँ सम्पूर्ण जनसमुदायक व्यावहारिक भोजन-सूची नहि मानल जा सकैछ। कालक्रमक निष्कर्ष लेल पुरातत्त्व, वनस्पति-अवशेष आ स्थानीय इतिहासक स्वतंत्र मिलान भविष्यक काज अछि।
द्वितीय अध्याय। मैथिल भोजनक परम्परा
पुस्तकमे सम्बद्ध पृष्ठ: ४०–५३।
धानप्रधान खाद्य-संरचना
मिथिलाक धानप्रधान कृषि आ स्थानीय जलवायुकेँ लेखिका भोजनक विशेषता संग जोड़ैत छथि। भात आ चूड़ाक व्यापक व्यवहार, चूड़ा-दहीक प्रतिष्ठा, राहड़िक दालि, उड़ीद-आधारित खिच्चड़ि, मडुआ-मकइक रोटी आदि उदाहरणसँ भोजनक सामाजिक वितरण आ उपलब्धताक अन्तर स्पष्ट होइत अछि (पृ. ४०–४२)। ‘प्रधान’ कहबकेँ ‘एकमात्र’ नहि बुझबाक चाही; ग्रन्थमे अनेक अन्न, दलिहन, साग-सब्जी, माछ आ फल वर्णित अछि।
दैनिक भोजन आ सांस्कृतिक मूल्य
माँड़-भात, चूड़ा, भूजा, साग, अचार, दालि आ व्यञ्जन घरेलू रोजमर्राक भोजनक अङ्ग अछि। नदी, पोखरि आ जलसम्पदाक सन्दर्भमे माछक प्रसिद्धि सेहो देखाओल गेल अछि। भोजनकेँ केवल पदार्थक एकत्रीकरण मानलासँ ओकर सामाजिक अर्थ छूटि जाइत अछि; केकरा कोन अवसरपर परसल गेल, कोन खाद्य सम्मानक मानल गेल, आ केहेन घरमे कोन भोजन उपलब्ध छल, एतय सांस्कृतिक सूचना निहित अछि।
पावनि, व्रत, संस्कार आ सहभोज
लेखिका विवाह, श्राद्ध, उपनयन, अतिथिसत्कार आ सामूहिक भोजनक प्रसङ्गक संग भोजन-व्यवस्था देखबैत छथि। सतुआनि, जुड़शीतल, रवि-शनि, कोजागरा आदि पर्वमे विशिष्ट अन्न, बासी भात, सातु, बड़ी, दालिपूड़ी, मखान-पान आदिक सन्दर्भ भेटैत अछि (पृ. ४९–५२)। एकरा ‘अनुष्ठान-सूचक शब्दावली’क रूपमे पढ़लासँ भोजन-संबन्धी नामक सामाजिक कार्य स्पष्ट होइत अछि।
आचार आ सामाजिक वर्गीकरण
पृ. ४३–४९ मे धर्मग्रन्थीय खाद्य-वर्जना, भोज्य-स्पर्श, पात्र, परान्न, भोजनकाल, जाति-वर्ण सम्बन्धी नियमक विवेचन अछि। एहन नियम ग्रन्थीय परम्पराक ऐतिहासिक तथ्य अछि; वर्तमान समाजक लेल निर्देश नहि। एहि अन्तरकेँ स्पष्ट राखलासँ अध्यायक समाजशास्त्रीय उपयोगिता बढ़ैत अछि।
पाठाधारित शब्द-साक्ष्य
आलोचनात्मक परीक्षण
ग्रन्थमे कतिपय खाद्यक ‘शुद्ध’, ‘अशुद्ध’ आ सामाजिक वर्ग-विशेषसँ सम्बन्धित मूल्याङ्कन परम्परागत मान्यताक रूपमे दर्ज अछि। एहन कथनकेँ लोकविश्वासक विवरण मानब उचित, वस्तुनिष्ठ पोषणात्मक वा नैतिक निर्णय नहि। समकालीन क्षेत्रीय सर्वेक्षणसँ कोन परम्परा एखन जीवित अछि से स्पष्ट होयत।
तृतीय अध्याय। मैथिल रुचिपर प्रभाव ओ तज्जन्य परिवर्तन
पुस्तकमे सम्बद्ध पृष्ठ: ५४–५८।
परिवर्तनक त्रिस्तरीय व्याख्या
अध्यायक केन्द्रबिन्दु उपकरण, आधार-सामग्री आ भोजन-व्यापार—ई तीन क्षेत्र अछि। लेखिकाक मतमे औद्योगिक विकास, सांस्कृतिक सम्पर्क आ यान्त्रिकीकरण पुरान भोजन-विन्यासकेँ रूपान्तरित करैत अछि। पृ. ५४ पर उक्खरि-मूसर, ढेकी-जाँत, माटिक कोहा, घैल आ पीढ़ीक बरक्स मिल, टीन-ड्रम, डेकची, प्रेशरकुकर, जग, प्लेट आ कुर्सी-टेबलक उल्लेख भेटैत अछि।
शब्द-प्रतिस्थापनक तन्त्र
वस्तुक प्रयोग घटला पर ओकर विशिष्ट नामो घटैत अछि। नव साधन प्रवेश कएलाक बाद नओ शब्द—कखनो आन भाषासँ उधार लेल—लोकभाषामे पैसैत अछि। एहि परिवर्तनकेँ ‘शब्दलोप’ मात्र मानब पर्याप्त नहि; सामग्री, निर्माण-कौशल, ईंधन, पाक-गति, घरेलू श्रम आ प्रतिष्ठाक बदलैत सम्बन्ध सेहो देखब चाही।
खाद्य-पदार्थ आ स्वादक पुनर्रचना
अध्यायमे भक्ष्य-अभक्ष्य विचारमे लचक, नव खाद्यक आगमन, नगर-जीवन आ रुचिगत बदलावक संकेत अछि। जखन परिवार, बाजार आ रोजगारक संरचना बदलैत अछि, भोजन-शब्दक सामाजिक प्रतिष्ठा सेहो बदलैत अछि। एहि रूपमे ई अध्याय सातमसँ नवम अध्यायक लोक-कोश निर्माणक ऐतिहासिक औचित्य प्रदान करैत अछि।
पाठाधारित शब्द-साक्ष्य
आलोचनात्मक परीक्षण
परिवर्तनक एकमात्र दिशा पुरान सँ नओ नहि होइछ; अनेक ग्रामीण आ नगरीय घरमे पुरान आ नओ उपकरण संगहि रहैत अछि। एहि कारणेँ भावी अध्ययनमे प्रतिस्थापन, सहअस्तित्व आ पुनरुत्थान—तीनू स्थिति दर्ज करब अपेक्षित अछि। मूल ग्रन्थ २०११क काल-चित्र दैत अछि; ओकरा आजुक सर्वत्र लागू वर्णन नहि मानल जाए।
चतुर्थ अध्याय। प्राचीन मैथिली साहित्यमे वर्णित भोजन-विन्यास
पुस्तकमे सम्बद्ध पृष्ठ: ५९–७१।
भाषाक आरम्भिक साहित्यिक प्रमाण
अध्यायमे चर्यापद, सिद्धाचार्यक पद, प्राकृत-अपभ्रंश सामग्री आ ज्योतिरीश्वरक ‘वर्णरत्नाकर’ तथा ‘धूर्तसमागम’क उल्लेख अछि। पृ. ५९ पर माँड़, भात आ हाँड़ीक प्रसङ्ग द्वारा सिद्ध कएल गेल अछि जे भोजनोपयोगी शब्द केवल आधुनिक व्यवहारक नहि, प्रारम्भिक साहित्यिक स्रोतक सेहो अङ्ग रहल अछि। साहित्यक भाषाक निर्धारण सम्बन्धी प्रश्न जटिल अछि; तथापि पदमे उल्लिखित सामग्री भाषिक इतिहासक उपयोगी संकेत दैत अछि।
वर्णरत्नाकरक कोशीय महत्त्व
‘वर्णरत्नाकर’क जेओनार-वर्णन भोजन-सामग्री, पकमान, पात्र आ भोजक व्यवस्थाक सघन पाठ प्रस्तुत करैत अछि (पृ. ६२–६७)। लेखिका अनेक दुर्लभ पदक अर्थ तत्कालीन पाठ आ आधुनिक मैथिली लोकप्रयोगक आधारपर बूझबाक प्रयत्न करैत छथि। एहि ठाम शब्दकोशकारिता आ पाठ-सम्पादनक परस्पर आश्रय देखल जा सकैत अछि।
अर्थसमीक्षा आ सावधानी
ककरो पुरान शब्दकेँ आधुनिक समानध्वनि शब्दसँ जोड़ब युक्तिसंगत परिकल्पना भऽ सकैत अछि, अनिवार्यतः प्रमाणित व्युत्पत्ति नहि। जेना ‘अमृतकुण्डी’ आ ‘अमिरती’क सम्भावित सम्बन्धक चर्चा पृ. ६६ मे अछि; एकरा सम्भावना रूपे राखब उचित। अर्थ-निर्णयमे पाठभेद, सन्दर्भ, वस्तुक प्रकृति आ बीचक ऐतिहासिक रूपक अपेक्षा बनैत अछि।
प्राचीन भोजनक सामाजिक दृश्य
माँड़, चूड़ा, दही, दुग्ध, मिष्टान्न, पान, अतिथि-भोज आ भोजक सजावटसँ जुड़ल पद भाषा आ संस्कृति दुनूक इतिहास उजागर करैत अछि। भोजन-विन्यास एतऽ दृश्यात्मक साहित्यिक अलङ्कार सेहो अछि आ समाजक व्यवहारिक जानकारीक स्रोत सेहो।
पाठाधारित शब्द-साक्ष्य
आलोचनात्मक परीक्षण
प्राचीन साहित्यक रूपक अथवा अतिशयोक्तिपूर्ण भोज-वर्णनकेँ यथार्थ सामाजिक औसतक प्रत्यक्ष प्रमाण नहि मानब। पद-साक्ष्यक प्रामाणिक संस्करण, पाण्डुलिपि-पाठ आ समकालीन स्रोतसँ मिलान कएलासँ अध्यायक ऐतिहासिक निष्कर्ष अधिक दृढ़ भऽ सकैत अछि।
पञ्चम अध्याय। मध्यकालीन मैथिली साहित्यमे वर्णित भोजन-विन्यास
पुस्तकमे सम्बद्ध पृष्ठ: ७२–७९।
विद्यापति-परम्परा आ भोजन-शब्द
लेखिका मध्यकालक केन्द्रीय रचनाकार विद्यापति आ हुनक परम्परासँ भोजन-विषयक शब्दक अन्वेषण करैत छथि। ‘कीर्तिलता’, ‘कीर्तिपताका’ आ पदावलीमे भोजन केवल भूखक समाधान नहि, आतिथ्य, प्रतिष्ठा, स्नेह, विरह आ सामाजिक नीतिक प्रतिमान बनैत अछि (पृ. ७२–७७)। ‘सुभोअन’ जेकाँ पद प्रारम्भिक शब्दरूप आ अर्थक बीचक सम्बन्ध देखबैत अछि।
भोजनेतर प्रसङ्गमे भोजनक अर्थ
रूपक, कागकेँ खीर-खाँड देबाक कामना, अतिथिक भोजन, गोधनसँ उत्पादित दही-घृत आ कृषिजन्य अन्नक उल्लेखसँ भोजन-विन्यासक व्यापक साहित्यिक स्थान स्पष्ट होइत अछि। एहि उदाहरणमे ‘खीर’ वा ‘घृत’ पदार्थक नाम अछि, तँ भोजन देब अथवा अपमानसँ भोजन लेब सामाजिक सम्बन्धक सूचक।
साहित्यिक निरन्तरता आ स्थानीयता
विद्यापतिक भाषा मे तत्सम, तद्भव आ देशज स्वरक सहअस्तित्व देखल जा सकैत अछि। मध्यकालीन नामक आधुनिक लोकभाषिक रूपसँ मिलान समय-सीमाक भीतर सम्भव अछि, मुदा सभ रूपक सीधा उत्तराधिकार सिद्ध करबाक लेल बीचक साक्ष्य जरूरी अछि।
पाठाधारित शब्द-साक्ष्य
आलोचनात्मक परीक्षण
ई अध्याय साहित्यिक शब्दक प्रमाणक दृष्टिएँ महत्त्वपूर्ण अछि; मुदा भिन्न हस्तलिखित पाठ, कवि-नामक प्रश्न आ भाषाक युगविभाजनसँ जुड़ल विद्वत् मतभेद स्वतन्त्र समीक्षाक विषय अछि। ग्रन्थक उद्धृत रूपकेँ यथार्थ पोथी-संस्करणसँ मिलान कएलासँ अधिक निष्ठावान निष्कर्ष भेटत।
षष्ठ अध्याय। आधुनिक मैथिली साहित्यमे वर्णित भोजन-विन्यास
पुस्तकमे सम्बद्ध पृष्ठ: ८०–१६४।
दीर्घतम अध्यायक विस्तार
ई ग्रन्थक सर्वाधिक विस्तृत साहित्यिक अध्याय अछि। लेखिका आधुनिक साहित्यक पाँच प्रमुख विधा—महाकाव्य, मुक्तक काव्य, कथा-उपन्यास, नाटक आ निबन्ध—मे भोजन-संबन्धी पद खोजैत छथि। एहि साहित्यिक विवेचनक संग लोकगीत, फकड़ा, पहेली आ लोकोक्तिक विशद संकलन सेहो जुड़ल अछि। लेखक-रचनाक पद्धतिगत विस्तारक कारणेँ एकरा केवल व्यञ्जन-वर्णनक संग्रह कहब अधूरा होयत।
महाकाव्य आ मुक्तक काव्य
पृ. ८० सँ महाकाव्यमे वर्णित भोजन-विन्यास प्रारम्भ होइत अछि; आधुनिक काव्य मे भोज, अतिथि, फल, माछ, दही, घृत, पान आ सामाजिक उत्सवक प्रसङ्ग खोजल गेल अछि। पृ. ९० सँ मुक्तक-काव्यक विवेचनमे भोजन नैतिकता, अकाल, हास्य, लोकजीवन, ऋतु आ रूपकक संग प्रवेश करैत अछि। अलग-अलग कविताक खाद्य-पदकेँ साहित्यिक भावसँ काटि मात्र कोषीय प्रमाण मानलासँ काव्यक अर्थ संकुचित भऽ जाइत अछि।
कथा-उपन्यास, नाटक आ निबन्ध
पृ. १०६ सँ कथा-उपन्यासमे गृहस्थ-जीवन, अभाव, पाक-कौशल, अतिथिसत्कार, स्वाद आ पात्रक सामाजिक स्थिति भोजन-भाषाकेँ अर्थ दैत अछि। नाट्यक आरम्भिक प्रसङ्ग पृ. १३१क लगपास अछि; संवादक रूपमे भोजन-नामक जीवित उच्चारण आ रोजमर्राक शैलीक प्रमाण भेटैत अछि। निबन्ध-विवेचन पृ. १३८ सँ आगाँ माछ, आम, स्थानीय रुचि आ व्यञ्जन-स्मृतिसँ सांस्कृतिक चिन्तनक सम्बन्ध देखबैत अछि।
लोकसाहित्यक पृथक महत्त्व
पृ. १४१–१४९ धरि लोकगीत, बरहमासा, डहकन, भोजन-गीत, फकड़ा-पहेलीक प्रसङ्ग अछि। विवाह-भोजमे समधी, बरियाती आ भोजक आयोजकपर रचल डहकन भोजनक सामाजिक नाटकीयता देखबैत अछि। लोकगीतमे पीढ़ीपर बैसाकऽ भोजन परोसब, दालि-भात, दही-घृत, तरकारी आ पानक क्रम संस्कारपरक सामुदायिक व्यवहारक स्मृति राखैत अछि।
दू सयसँ अधिक लोकोक्ति
पृ. १५० सँ लोकोक्तिक क्रमबद्ध संकलन प्रारम्भ होइत अछि आ पृ. १५८ मे क्रमांक २०० सँ आगाँक सामग्री भेटैत अछि। ग्रन्थक प्रास्ताविक टिप्पणीमे सेहो दू सयसँ अधिक भोजन-संबन्धी लोकोक्तिक उल्लेख अछि। ई संग्रह भोजनक अर्थ ‘खा-पि लेब’ सँ आगाँ बुद्धि, लोभ, श्रम, अतिभोजन, निर्धनता, सामाजिक प्रतिष्ठा, मूल्याङ्कन आ व्यवहारक रूपक धरि विस्तार करैत अछि। लोकोक्तिमे भोजन-वाचक शब्द अनेक बेर अभिधासँ लक्षणा आ व्यञ्जना दिस बढ़ैत अछि।
साहित्य आ लोकव्यवहारक मिलान
आधुनिक साहित्यिक प्रयोगक एतेक व्यापक संकलन देखबैत अछि जे घरेलू शब्द प्रादेशिक ज्ञानक वैध साहित्यिक साधन अछि। तथापि साहित्यक पाठ, पात्रक बोली आ वास्तविक सामाजिक सर्वेक्षण स्वतन्त्र प्रमाण अछि। कृति एहि प्रमाणसभक संवादक मजबूत आरम्भिक सामग्री प्रस्तुत करैत अछि।
पाठाधारित शब्द-साक्ष्य
आलोचनात्मक परीक्षण
आधुनिक साहित्यक एकेक कालखण्ड आ विधामे उद्धृत उदाहरणक संख्या बराबर नहि होयब सम्भव अछि। कोषीय निष्कर्ष लेल विद्या, लेखक, कृति, प्रकाशन-वर्ष आ पृष्ठ-सन्दर्भक इलेक्ट्रॉनिक निर्देशिका बनाओल जाय, जाहिसँ पुनरावृत्ति आ वास्तविक प्रयोग-आवृत्तिक परीक्षण सम्भव होय। लोकोक्तिक नूतन क्षेत्रीय सर्वेक्षण सँ अर्थ आ प्रयोगक वर्तमान स्थिति सेहो जाँचल जाए।
सप्तम अध्याय। आधुनिक मैथिली भाषामे भोजनक उपकरण सम्बन्धी शब्दावली
पुस्तकमे सम्बद्ध पृष्ठ: १६५–१९६।
वर्गीकरणक मूल सिद्धान्त
एहि अध्यायमे उपकरणकेँ ओकर मूल निर्माण-सामग्रीक आधारपर धातूपकरण, प्रस्तरोपकरण, मृत्तिकोपकरण, काष्ठोपकरण, वंशोपकरण आ तृणोपकरण छह वर्गमे बाँटल गेल अछि (पृ. १६५)। एकर संग लेखिका साधनक आकार, अंश, उपयोग, सामग्री, बनावट आ स्थानीय नामक भेद विस्तारसँ देइत छथि। एहि पद्धतिसँ शब्दार्थ परिभाषा वस्तुक प्रत्यक्ष व्यवहारसँ जुड़ैत अछि।
धातु आ मिश्रधातुक नाम
धातुक वर्गमे ताम/तामा, पित्तर/पित्तरि, काँस/काँसा आ कंसकूट आदि धातु-सम्बद्ध शब्द (पृ. १६५–१७४) केवल वस्तुक नहि, ओकर भौतिक गुण आ निर्माण-कौशलक परिचायक अछि। ‘बासन’ सामान्य वर्गवाची शब्द अछि, जखन विशेष उपकरण-नाम पात्रक आकार वा कार्य सूचित करैत अछि। एक वस्तुक अनेक नाम क्षेत्रीय, आकारगत अथवा कार्यगत भेद सेहो होयबाक सम्भावना रखैत अछि।
चूल्हा आ ईंधनक शब्दलोक
पृ. १७५–१७९क आसपास चूल्हा, ओकर रचना, जारन, आगिक स्थिति, राख, पाक-क्रिया आदि शब्दक सम्बन्ध वर्णित अछि। एहन पदकेँ एक-दोसरसँ अलग सूचीमे राखलासँ ओहि विशेष तकनीकक सम्पूर्ण रूप स्पष्ट नहि होइत; एकर जाल-रूप विश्लेषण चाही: ईंधन → चूल्हाक संरचना → आगि धराबब → ताप-नियन्त्रण → भोजन पकब → अवशेष।
माटि, काठ, बाँस आ तृण
माटिक कोहा, हाँड़ी, घैल, कठौत, काठक पीढ़ी, ढेकी, बेलन, बाँसक सूप-डगरा आ अन्य पात्रक व्याख्या अध्यायक अंतिम भागमे अछि। पृ. १८९ पर पीढ़ीक भिन्न उच्चारण आ आकारगत रूपभेदक परिचय महत्त्वपूर्ण अछि। पृ. १९२–१९५ मे बाँस एवं तृणसँ बनल पात्र, सूप, मउनी, संग्रहण-साधन आदि सांस्कृतिक कारीगरीक संकेत अछि।
शब्दार्थ-संकलनक मानक पद्धति
एहि अध्यायक एकेक शब्दक संग सामग्री, स्थानीय नाम, माप-आकृति, निर्माणकर्ता, उपयोग, क्रिया, अनुष्ठानिक अवसर आ वर्तमान प्रचलनक क्षेत्र दर्ज करब सम्भव अछि। एहन प्रविष्टि सामान्य पर्यायवाची-सूची सँ बेसी जीवित ‘एथ्नोग्राफिक शब्दकोश’क स्वरूप लेब।
पाठाधारित शब्द-साक्ष्य
आलोचनात्मक परीक्षण
एहि अध्यायक शब्दार्थ समझबाक लेल मूल पोथीक परिशिष्ट–क मे देल रेखाचित्र देखब उपयोगी अछि। तथापि रेखाचित्रक संख्या सीमित अछि। प्रत्येक उपकरणक उच्च-गुणवत्तायुक्त चित्र, स्थान-विशेषक नाम, मापन आ स्थानीय कारीगरक साक्षात्कार सहित डिजिटल अभिलेख बनेनाइ आगामी महत्त्वपूर्ण कार्य होयत।
अष्टम अध्याय। भोजनक आधार-सामग्री सम्बन्धी शब्दावली
पुस्तकमे सम्बद्ध पृष्ठ: १९७–२४६।
तीन व्यापक अर्थ-क्षेत्र
लेखिका भोजनक आधार-सामग्रीकेँ ‘मूल’, ‘आनुषंगिक’ आ ‘विशेष’ वर्गमे राखैत छथि (पृ. १९७)। मूलमे सामान्य खाद्यान्न आ स्थानीय रूपसँ बहुत प्रयुक्त कन्द-मूल सेहो, आनुषंगिकमे भोजनकेँ पूरा करनिहार व्यञ्जन-सामग्री, माछ-मांस, मसल्ला आदि, आ विशेष वर्गमे फल, दुग्ध, मधु, मिष्टान्न, पान तथा अन्य अवसरविशेषक सामग्रीक चर्चा अछि। ई वर्गीकरण भोज्य पदार्थक रासायनिक अथवा पोषण-विज्ञानपर आधारित वर्ग नहि; लोकव्यवहारक उपयोगितापर आधारित वर्ग अछि।
अन्न, धान आ दलिहनक सूक्ष्म भेद
पृ. १९८–२०२क अन्नविषयक अंशमे फसील, बीहन, खैहन, धानक प्रभेद, मकइक बालि, दाना, दलिहनक आकृति आ उपयोग आदि शब्द अछि। एक वस्तुक जीवनचक्रमे बीआ, गाछ, फसील, संग्रहित अन्न आ खाद्य-रूप अलग-अलग नाम ग्रहण करैत अछि। एहि कारण कोषकार लेल कृषि-चरण आ पाक-चरणकेँ जोड़ब जरूरी अछि।
कन्द-मूल, साग आ स्थानीय पारिस्थितिकी
ओल, अल्हुआ, सुथनी, सारुख, चिचोढ़ी आदि शब्द स्थानीय माटि, मौसम, अभावकाल आ घरेलू पाक-कौशलक जानकारी दैत अछि (पृ. २०२–२०८)। एहू प्रकारक साग ओ तरकारीक अनेक नाम भोजनक जैव-विविधता रक्षणक सन्दर्भमे महत्त्वपूर्ण अछि। एकहि प्रजातिक स्थानीय नामभेदक वैज्ञानिक वनस्पति-नामसँ मिलान एहि ग्रन्थमे सर्वत्र उपलब्ध नहि; ई भावी शोधक विषय अछि।
माछ-मांस आ जल-सम्पदा
पृ. २०९–२१९ मे माछक रूप, आकार, देहक अङ्ग, स्वाद, भिन्न जातिक नाम आदि विशेषरूपे समृद्ध रूपमे भेटैत अछि। माछक नाम केवल जीवविज्ञानक पद नहि, पकाएबाक उपयोग, ताजगी, गन्ध, उपलब्धताक मौसम आ लोक-रुचिक सूचना सेहो दैत अछि। मिथिलाक पोखरि, नदी आ जल-भूभागक पारिस्थितिकी एतय भाषामे प्रतिबिम्बित अछि।
तेल-मसल्ला, फल, मधु, पान आ अन्य सामग्री
पृ. २२० सँ तेल आ मसल्लाक सन्दर्भ, पृ. २२४ सँ आमक बिज्जू/सरही आ कलमी प्रभेद, आन अनेक फल, पृ. २४० पर मधु, आ अन्तिम भागमे पान तथा विशेष द्रव्यक शब्द भेटैत अछि। आम, नेबो, बैर, कुसियारक रस, मधु आदि शब्द स्थानीय स्वादक अत्यन्त सूक्ष्म विभाजन करैत अछि। पुस्तकमे दर्ज नशायुक्त पेय वा द्रव्यक वर्णन शब्दार्थ-अध्ययनक विषय अछि, सेवनक अनुशंसा नहि।
पाठाधारित शब्द-साक्ष्य
आलोचनात्मक परीक्षण
कोनो वनस्पतिक स्थानीय नामक सटीक वैज्ञानिक नाम नहुँ भेटला पर अनुमानसँ एकर पहचान घोषित नहि करब। एकहि शब्द अलग गाममे अलग पौधा लेल प्रयुक्त भऽ सकैत अछि; एहन स्थिति मे वाउचर नमूना, स्थानीय वक्ता आ वनस्पति-विशेषज्ञक संयुक्त मिलान चाही। सामाजिक स्तरपर ‘मुख्य’ आ ‘विशेष’ सामग्रीक वर्ग सेहो आय, ऋतु आ परिवार अनुसार बदलि सकैत अछि।
नवम अध्याय। भोजनक कार्य-व्यापार सम्बन्धी शब्दावली
पुस्तकमे सम्बद्ध पृष्ठ: २४७–२८१।
वस्तु नहि, प्रक्रियाक शब्दकोश
एहि अध्यायमे प्रकृतिसँ प्राप्त पदार्थकेँ भोजन बनयबाक आ तकर ग्रहण करबाक यावन्तो कामकेँ शब्दावलीक विषय मानल गेल अछि। लेखिका पाँच वर्ग राखैत छथि: (१) अन्नसँ सम्बद्ध, (२) व्यञ्जनसँ सम्बद्ध, (३) दूधसँ सम्बद्ध, (४) मिष्टान्न-पकमानसँ सम्बद्ध, आ (५) भोजनग्रहणसँ सम्बद्ध शब्द (पृ. २४७)। एहि पद्धतिक विशेषता ई अछि जे समान क्रियासँ भिन्न परिणामक लेल पृथक नाम भेटैत अछि।
धानसँ भोजनधरि क्रियाक अनुक्रम
पृ. २४७–२५३ मे धान, भुस्सा, चाउर, खखरी/खखड़ा, अरबा, उसिना आदि शब्दक व्यवहार पदार्थक अवस्था आ प्रक्रिया दूनू स्पष्ट करैत अछि। धानक बाह्य आवरण हटायब, गरम पानिमे सिझाय-सुखाय चाउर बनायब, चाउरक सफाइ आ भातक पाकसँ सम्बन्धित अनेक अवस्था-नामक चर्चा अछि। ‘अधसिज्झू’ जेकाँ शब्द सिद्ध खाद्यक अधूरा पाक सूचित करैत अछि।
व्यञ्जन आ मिष्टान्नक क्रियापरक अर्थ
पृ. २५४–२७१ मे दालि, साग, तरकारी, बड़ी, पिडुकिया, जिलेबी आदि खाद्यक रचना-क्रम, मिश्रण, आँच, आकार, घोल, पकनाइ आ मिष्टान्नक चासनी सम्बन्धी प्रक्रिया विस्तृत अछि। पृ. २६६ पर जिलेबीक व्याख्या ‘तैयारीक कार्यविधि + आकृति + अन्तिम पाक’क रूपमे देल गेल अछि; एहन परिभाषा कागजी पर्यायवाची मात्र सँ अधिक उपयोगी होइत अछि।
परसना, खयब, अन्नक अवस्था आ सामाजिक क्रिया
पृ. २७२–२७७ मे भोजन सानब, खयब, जूठ/ऐंठ, निरैठ, नोत-बिझो, भोजनी आदि नाम भोजनक व्यावहारिक आ सामाजिक अर्थ जोडैत अछि। ‘ऐंठ’ आ ‘निरैठ’क अन्तर खाद्यक प्रयोग-अवस्था आ सामाजिक शुद्धताक स्थानीय श्रेणी चिन्हैत अछि; एहन श्रेणीकेँ वर्णनात्मक सन्दर्भमे बुझब चाही।
स्वाद, गन्ध आ अनुभूति
अन्तिम पृष्ठसभमे पदार्थक स्वाद, जरेबाक गन्ध, धातुपात्रक प्रभाव, मिरचाइक तीखापन आ देहक प्रतिक्रिया जनबैत शब्द उपस्थित अछि (पृ. २७७–२८१)। ‘पितराइनि’, ‘सुसुआयब’ जेकाँ उदाहरण अनुभवजन्य भाषिक परिशुद्धता देखबैत अछि। एहि अर्थक्षेत्रमे ध्वन्यनुकरण, संवेदना आ क्रियाक रूप एक संग अध्ययन योग्य अछि।
पाठाधारित शब्द-साक्ष्य
आलोचनात्मक परीक्षण
आधुनिक भोजन-शब्दकोशमे ‘क्रिया–साधन–वस्तु–परिणाम’क सम्बन्ध एकै प्रविष्टिमे राखल जाए। जेना भात बनयबाक अनुक्रममे अवस्था-द्योतक संज्ञा, पाक-सूचक क्रिया आ स्वाद-वाचक विशेषण अलग-अलग सूचीमे राखलासँ वास्तविक अर्थ-सम्बन्ध छूटि जाइछ। एहि अध्यायक शब्दसम्पदाकेँ प्रक्रिया-मानचित्रमे बदलि सकब एक ठोस शोध-विस्तार होयत।
दशम अध्याय। मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावलीक ध्वनि-विचार
पुस्तकमे सम्बद्ध पृष्ठ: २८२–२८९।
व्यवहारसँ ध्वनि-व्यवस्था दिस
शब्दावलीक सघन संकलनक पश्चात् लेखिका स्वर आ व्यञ्जनक व्यवस्था देखैत छथि। भोजन-सम्बन्धी शब्दक उच्चारणमे ह्रस्व, दीर्घ, ह्रस्वतर, अनुनासिकता, स्वरसमूह आ व्यञ्जनगुच्छक उदाहरण पृ. २८२–२८६ मे संकलित अछि। ई अध्याय दर्शबैत अछि जे खाद्यशब्द भाषाक सामान्य ध्वनि-संरचनाकेँ परीक्षण करबाक समृद्ध आधार बनि सकैत अछि।
ध्वनि-रूपक विविधता
‘घैल–घैलची’, ‘कठौत–कठौतिया’ जेकाँ रूप उच्चारण, शब्दरचना आ अर्थभेदक सम्बन्ध देखबैत अछि। पृ. २८७–२८९ मे प्राकृत-संस्कृत आदिसँ आधुनिक रूपक ध्वनि-परिवर्तनक संभावित शृंखला प्रस्तुत अछि; यथा ‘अपूप’ सँ ‘पूआ/पू’ आ ‘सूर्प’ सँ ‘सूप’क रूपसम्बन्ध। ग्रन्थक उदाहरण भाषिक इतिहासक तर्कक सामग्री अछि, किन्तु प्रत्येक शृंखलाक स्वीकृति लेल ध्वनिनियम आ प्रमाणित मध्यवर्ती रूपक मिलान आवश्यक अछि।
वर्तनी आ वास्तविक उच्चारण
एकहि शब्दक लिखित रूप, क्षेत्रीय उच्चारण आ व्युत्पत्तिगत आदर्श रूप अलग होयबाक सम्भावना अधिक अछि। एहि कारण कण्ठस्थ लोकशब्दक सुनल उच्चारणकेँ अनिवार्यतः संस्कृतनिष्ठ वर्तनीमे बदलब शब्द-सम्पदा समझबाक मार्गमे बाधा होयत।
पाठाधारित शब्द-साक्ष्य
आलोचनात्मक परीक्षण
अध्यायमे ध्वन्यात्मक प्रतिलेखनक सुव्यवस्थित अन्तरराष्ट्रीय पद्धति सर्वत्र प्रयुक्त नहि अछि। भविष्यक अध्ययनमे उच्चारणक ध्वनि-रिकॉर्डिंग, IPA रूप, क्षेत्र, वक्ताक उमेर आ सामाजिक सन्दर्भक संग स्रोत दएल जाय, जाहिसँ ‘उच्चारण-भेद’ आ ‘अलग शब्द’क भेद स्पष्ट भऽ सकय।
एकादश अध्याय। शब्द-विचार
पुस्तकमे सम्बद्ध पृष्ठ: २९०–३०९।
रूढ़, यौगिक आ योगरूढ़
लेखिका व्युत्पत्तिक दृष्टिएँ शब्दकेँ रूढ़, यौगिक आ योगरूढ़ कोटिमे बाँटैत छथि (पृ. २९० सँ)। ‘घी’, ‘जौ’, ‘दही’, ‘थारी’ जेकाँ शब्दक सामान्य अर्थ ओकर अवयव-विश्लेषणसँ नहि निकलैत अछि; ई रूढ़ वर्गक सन्दर्भक उदाहरण अछि। ‘दालि + पूड़ी → दलिपूड़ी’, ‘दालि + साग → दलिसग्गा’ आदि पारदर्शी यौगिक रचना देखबैत अछि। ‘भतखइ’ जेकाँ प्रयोगमे अवयवक सामान्य योगसँ अलग विशिष्ट परम्परागत अर्थ बनल रहि सकैत अछि।
शब्दक उत्पत्ति आ भाषिक सम्पर्क
पृ. २९८–३०१ मे परम्परागत, तत्सम, तद्भव, देशज आ गृहीत शब्दक चर्चा अछि। भोजनशब्द मैथिलीक स्वकीय ऐतिहासिक रूपक संग अन्य भाषासँ ग्रहण कएल शब्दकेँ सेहो समाहित करैत अछि। मुदा सुनबामे विदेशी लगनिहार शब्दकेँ स्रोत-भाषा निर्दिष्ट करब लेल प्रमाणित ऐतिहासिक शब्दकोश आ पुरान पाठक सहायता आवश्यक अछि।
शब्दभेद, लिङ्ग, वचन, रूपान्तर
पृ. ३०२–३०५ मे संज्ञा, विशेषण, क्रियापद, लघ्वर्थ-सूचक रूप, लिङ्गादिक सम्बन्धक उदाहरण बिखरल अछि। ‘थार–थारी’, ‘पोठा–पोठी’ जेकाँ रूप संग भाषिक संरचनाक विवेचन देखबैत अछि जे बहुतेक ग्रामीण शब्द परिवार-आधारित शब्दसाधनाक उत्पाद अछि।
क्षेत्रीय रूपान्तर, वर्तनी आ अर्थ-परिवर्तन
पृ. ३०५–३०८ मे समानार्थी, उच्चारण-भेद, लिप्यात्मक भेद आ अर्थ-संकोच/अर्थ-विस्तारक सम्भावना पर विचार अछि। ‘गुण्डा’क अर्थक विशेषीकरण तथा ‘मूड़ा’क माछक माथ अर्थमे उपयोग (पृ. ३०८) शब्दार्थ-परिवर्तनक उदाहरण अछि। अर्थ-परिवर्तनक अध्ययन कालनिर्दिष्ट प्रमाणसँ पुष्ट करब आवश्यक अछि।
पाठाधारित शब्द-साक्ष्य
आलोचनात्मक परीक्षण
शब्दक ‘एकाक्षर’, ‘द्व्यक्षर’ आदिक विश्लेषणमे अक्षर, वर्ण आ ध्वनि-संख्या एक्के नहि; एतय पद्धति स्पष्ट करब उपयोगी रहत। रूढ़–यौगिक–योगरूढ़ वर्गीकरणक सीमापर एकहि शब्दकेँ क्षेत्रविशेषमे अलग व्यवहार भेटि सकैत अछि। एहि कारण शब्दप्रविष्टि संग प्रयोग-वाक्य आ क्षेत्रीय वक्ताक प्रमाण संकलन अनिवार्य अछि।
द्वादश अध्याय। उपसर्ग ओ प्रत्यय-विचार
पुस्तकमे सम्बद्ध पृष्ठ: ३१०–३२२।
उपसर्गक सीमित भूमिका
लेखिका भोजन-विषयक साधित शब्दमे उपसर्गक संख्या अपेक्षाकृत अल्प मानैत छथि। ‘कु-’ आ ‘सु-’क योगसँ ‘कुभोजन’, ‘सुभोजन’, ‘सुस्वादु’ आदि रूप उदाहरणरूपे देल गेल अछि; फारसी मूलक ‘बे-’क प्रयोगक प्रसङ्ग सेहो चर्चामे अछि (पृ. ३१०)। ‘निरैठ’ जेकाँ पदमे उपसर्ग आ स्थानीय मूलक युति विशेष ध्यान दैत अछि।
कृत् आ तद्धित प्रत्ययक समृद्धि
पृ. ३११–३१९ मे ‘-अनि’, ‘-इआ’, ‘-आ’, ‘-ई’, ‘-उआ’, ‘-आह’ आदि प्रत्ययक विविध संज्ञा, विशेषण आ कृदन्त रचना देखल जा सकैत अछि। प्रत्यय केवल बाहरी जोड़ नहि; कखनो ध्वनि-परिवर्तन, लघ्वर्थ, युक्तार्थ, स्थानवाचकता, सम्बन्धवाचकता अथवा विशेष गुणक भेद जनबैत अछि। ‘कुटिआ’, ‘कठौतिया’, ‘छाँछिया’, ‘भोराह’, ‘मटिआह’ जेकाँ उदाहरण रूपात्मक उत्पादकता दर्सबैत अछि।
आइन प्रत्यय आ गन्ध-स्वादक अर्थ
ग्रन्थक उपोद्घातमे डॉ. श्रीरामदेव झा विशेषतः ‘-आइन’ प्रत्ययक अर्थ-सम्भावनाक चर्चा करैत छथि (प्रारम्भिक पृ. १८–१९)। सामान्य भाषामे स्त्री-वाची ‘-आइन’ आ भोजन-संबन्धी स्वाद-गन्धवाची ‘बिसाइन’, ‘डढ़ाइन’, ‘इछाइन’ जेकाँ शब्दक अर्थसम्बन्ध जटिल अछि। एकर ऐतिहासिक मूल आ अर्थ-विकासकेँ परिकल्पनाक रूपमे चिन्हित करब उचित।
प्रत्ययसमूहक जटिलता आ आत्मसीमा
पृ. ३२०–३२२ मे लेखिका प्रत्ययक मूल, क्रमिक योग, अर्थ-अनिश्चितता आ मानकीकरण समस्या खुला अनुसन्धान-विषय रूपमे स्वीकार करैत छथि। ‘अमिलगर’ जेकाँ क्रमिक शब्दसाधन बतबैत अछि जे प्रत्यय-विधानक एकरूपी नियम सभ शब्दमे लागू नहि होइत। एहि आत्मसीमाक स्वीकार कृतिक गम्भीर शोधप्रवृत्ति अछि।
पाठाधारित शब्द-साक्ष्य
आलोचनात्मक परीक्षण
आकार-साम्य मात्रसँ शब्दान्त भागकेँ ‘प्रत्यय’ मानल नहि जा सकैछ। सही विश्लेषण लेल उत्पादकता, अनेक स्वतंत्र रूपमे प्रयोग, अर्थक स्थिरता, कालक्रम आ ध्वनिनियम सभकेँ जाँचब चाही। एहि दृष्टिएँ ई अध्याय भावी रूपविज्ञान-अनुसन्धानक प्रश्नावली प्रदान करैत अछि।
उपसंहार : समालोचनात्मक पुनर्पाठ
मूल पोथीक उपसंहार (पृ. ३२३–३२६) मे लेखिका साहित्य आ बोलचालमे भोजन-सम्बन्धी शब्दावलीक अत्यन्त व्यापक क्षेत्र देखबैत छथि। भारतीय परम्पराक ऐतिहासिक सन्दर्भ, मैथिल भोजनक विशिष्ट स्थानीयता, पुरान आ आधुनिक उपकरणक टकराव, साहित्यिक शब्दक उपस्थिति, शब्दक ध्वन्यात्मक बदलैत रूप, देशज-गृहीत शब्दक सम्पर्क आ प्रत्यय-विधानक जटिलता एहि निष्कर्षमे फेर संगठित भेल अछि। ई उपसंहार पुस्तककेँ केवल ‘भोजनक सूची’ सँ उठाय भाषिक-सांस्कृतिक इतिहासक शोधग्रन्थक रूप देइत अछि।
एहि समालोचनाक प्रमुख निर्णय ई अछि जे ग्रन्थक मुख्य सामग्री ‘वस्तु–क्रिया–नाम–प्रयोग–प्रसङ्ग’क सम्बन्धमे निहित अछि। वस्तुक नामकेँ सांस्कृतिक प्रयोगसँ, आ शब्दक व्युत्पत्तिकेँ प्रामाणिक उच्चारणसँ पृथक नहि कएल जाए। एहि सिद्धान्तक कारण घरक दैनिक भोजन सेहो भाषा-विज्ञानक आवश्यक सामग्री बनैत अछि।
मूल ग्रन्थमे शब्दसंकलनक समृद्धि बहुत बेसी अछि, मुदा एकरा आधुनिक खोजयोग्य ‘लेक्सिकल डेटाबेस’ बनयबाक लेल प्रत्येक प्रविष्टिमे शब्दरूप, अर्थ, भौगोलिक क्षेत्र, वस्तुक चित्र, स्रोतपृष्ठ, प्रमाणवाक्य, उच्चारण, शब्दभेद, समानार्थी, अर्थ-सम्बन्ध आ वर्तमान स्थिति लिखब आवश्यक होयत। ई आलोचना कृतिक अवमूल्यन नहि; ओकर मूल अवदानकेँ शोधक नओ चरणमे विस्तार देबाक रूपरेखा अछि।
परिशिष्टसभक अध्ययन
परिशिष्ट–क: कतिपय उपकरणक रेखाचित्र (पृ. ३२७–३३१)
मूल पाठमे धातु, माटि, काठ आ बाँसक उपकरणक जतेक विस्तृत शब्दविवेचन अछि, तकरा दृश्यात्मक रूपमे बुझाबय लेल परिशिष्टमे उपकरणक रेखाचित्र देल गेल अछि। एहि चित्रसभक मूल्य ई अछि जे आकारसँ जुड़ल शब्दार्थकेँ पाठक प्रत्यक्ष रूपमे बुझि सकैत छथि। ई चित्र पूर्ण वस्तु-सूची नहि, चयनित सहायक सामग्री अछि। भविष्यक सचित्र शब्दकोशमे प्रत्येक उपकरणक अलग प्रविष्टि, चित्र, मापन आ नाम-भेद जोड़ल जाए।
परिशिष्ट–ख: अधीत ग्रन्थक सूची (पृ. ३३२ सँ आगाँ)
ग्रन्थक अन्तमे संस्कृत, प्राकृत, मैथिली, भाषावैज्ञानिक आ अन्य सन्दर्भग्रन्थक विस्तृत सूची अछि। एहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे शब्दसंग्रह मात्र मौखिक अनुभवपर आधारित नहि; साहित्यिक-ऐतिहासिक प्रमाणसँ सेहो ओकर मिलान करबाक प्रयत्न भेल अछि। एहि सूचीकेँ शोधक लेल प्राथमिक सन्दर्भ-सूत्र मानब उचित अछि; किछु पुरान संस्करणक प्रकाशन-विवरण आधुनिक मानकसँ फेर जाँचबाक आवश्यकता रहि सकैत अछि।
भाषिक–सांस्कृतिक निष्कर्ष
१. भोजन-शब्दावली सामाजिक स्मृतिक अभिलेख अछि
‘सूप’, ‘जाँत’, ‘पीढ़ी’ जेकाँ वस्तु-नाम ओहि वस्तुक निर्माणकर्ता, व्यवहार आ घरेलू श्रमक इतिहास संग अनिवार्य रूपे जुड़ल अछि। कखनो साधन अप्रचलित होइत अछि तखन ओहि साधनक अंश-वाचक आ क्रियावाचक सूक्ष्म शब्द सर्वप्रथम विस्मरण दिस बढ़ि सकैत अछि।
२. खाद्य-परम्परा एकरूप नहि
धानप्रधान मिथिलाक भीतर विभिन्न अन्न, साग, दलिहन, माछ, कन्द-मूल आ विशेष फल-फूलक परम्परा अछि। एकटा ‘मैथिल भोजन’ कहब उपयोगी सांस्कृतिक संकेत अछि, मुदा ओकर भीतर ऋतु, परिवार, आर्थिक स्थिति, पेशा, क्षेत्र आ अनुष्ठानक अन्तर पहचानब जरूरी अछि।
३. क्रिया-वाचक शब्द विशेष रूपे असुरक्षित
छाँटब, फटकब, पैंचब, रान्हब, उलबब, औंटब, सानब जेकाँ क्रियापद पुरान तकनीकक संग बदलैत अछि। केवल सामग्रीक नाम संकलित करब भोजन-भाषाक आधा इतिहास मात्र होयत।
४. साहित्य अर्थक प्रमाण दैत अछि, व्यवहारक सम्पूर्ण आँकड़ा नहि
चारिमसँ छठम अध्यायमे प्राचीन, मध्यकालीन आ आधुनिक साहित्यक बहुस्तरीय उदाहरण अछि। ई कालक्रमक सूचक अछि; तथापि एक साहित्यिक उल्लेख पूरा समाजक भोजन-वितरणक समग्र प्रतिरूप नहि।
५. ध्वनि, शब्द आ प्रत्ययकेँ अलग नहि करब
घैल–घैलची, थार–थारी, कठौत–कठौतिया जेकाँ रूपमे ध्वनि, शब्दरूप, वस्तु-आकार आ अर्थ परस्पर आश्रित अछि। शब्द-प्रविष्टिमे ई चारू स्तर दर्ज हो।
६. मूल रूपकेँ बिना प्रमाण बदललासँ सूचना हानि
कोनो देशज शब्दकेँ ‘सुधारबाक’ नामपर संस्कृतनिष्ठ वर्तनीमे रूपान्तरित करब ओकर ऐतिहासिक ध्वनि आ क्षेत्रीय पहचान मेटा सकैत अछि। लेखिकाक भाषा-अनुकरण करब, मुदा स्पष्ट मुद्रणदोष आ अनिश्चित रूपकेँ आलोचनात्मक टिप्पणी सहित चिन्हित करब, एहि शोधक उपयुक्त रीति अछि।
प्रमुख शब्द-क्षेत्र : तुलनात्मक सारिणी
भावी अनुसन्धानक दिशासभ
प्रथम चरण—मूल पाठमे देल शब्दक विश्वसनीय पुनर्लिप्यन्तरण: मूल मुद्रित पृष्ठ, शब्दक वास्तविक वर्तनी, वाक्य-सन्दर्भ, शब्दभेद आ पाठ-निश्चय अलग-अलग दर्ज करब। एक पृष्ठपर अनेक स्थानीय पर्याय आ अर्थभेद अछि; अतः शब्दकेँ अनिवार्यतः एक मानक रूपमे घटा देब उचित नहि।
द्वितीय चरण—मैदान-अध्ययन: दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर, सीतामढ़ी, सहरसा, सुपौल आ नेपालक मैथिलीभाषी क्षेत्रक गाम-घरमे वस्तु देखाय आ पाक-व्यापारक प्रत्यक्ष अवलोकनक संग रेकॉर्डिंग कएल जाए। क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व नमूनाक आकार आ पद्धति पर निर्भर रहत। वक्ताक अनुमतिसँ ध्वनि, चित्र, निर्माण-प्रक्रिया आ नामभेद संरक्षित कएल जाए।
तृतीय चरण—विषयगत नकाशा: ‘धान → भुस्सा हटायब → चाउर → भात → परोसब → जूठ/निरैठ’ अथवा ‘बाँस → फाड़ब → बत्ती → सूप/डगरा → अनाज फटकब’ जेकाँ प्रक्रिया-सम्बन्धित चित्र आ डिजिटल अर्थजाल बनायब। एहि नकाशामे उपकरण, पदार्थ आ क्रियाक सम्बन्ध स्पष्ट होयत।
चतुर्थ चरण—साहित्यिक प्रमाणक पुनःमिलान: चर्यापद, वर्णरत्नाकर, विद्यापति, आधुनिक कथा-कविता, नाटक आ लोकगीतक उद्धरण मूल संस्करणसँ फेर मिलाओल जाए। कृति, सम्पादक, प्रकाशन-वर्ष आ पृष्ठ सहित सन्दर्भ अभिलेख बनाओल जाए।
पञ्चम चरण—अनिश्चित व्युत्पत्तिक पृथक्करण: प्रमाणित रूप-शृंखला, अनुमानित व्युत्पत्ति, जनश्रुति आ अर्थ-साम्यकेँ भिन्न संकेत देल जाए। एहि पद्धतिसँ अनुसन्धान पुनरीक्षण-योग्य बनत।
षष्ठ चरण—लोकप्रयोगक संरक्षण: वृद्ध वक्ता, घरेलू पाककला जाननिहार व्यक्ति आ स्थानीय कारीगरक मौखिक वर्णनक संग युवा पीढ़ीक वर्तमान शब्द-प्रयोग तुलना कएल जाए, जाहिसँ प्रचलित, अर्धप्रचलित आ विलुप्तप्राय शब्द चिन्हल जा सकय।
समग्र मूल्याङ्कन
‘मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली’क बारहो अध्याय एकटा संयुक्त तर्क प्रस्तुत करैत अछि। आरम्भक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि बतबैत अछि जे भोजन प्राकृतिक सम्पदा आ समाजक विचार-दुनूक परिणाम अछि; साहित्यिक अध्याय देखबैत अछि जे भोजनक शब्द मैथिलीक सम्पूर्ण साहित्यिक जीवनमे प्रवेश कयने अछि; लोक-कोशीय अध्याय ई प्रमाणित करैत अछि जे भोजनक उपकरण, सामग्री आ क्रियाक अत्यन्त सूक्ष्म शब्द-सम्पदा उपलब्ध रहल अछि; अन्तिम तीन अध्याय देखबैत अछि जे ई शब्द-सम्पदा ध्वनि-विज्ञान आ रूप-विज्ञानक अध्ययनक मूल सामग्री सेहो अछि।
अतः ग्रन्थक केन्द्रीय उपलब्धि ‘भोजन सम्बन्धी शब्दक संख्या’ नहि, वरन् भोजनकेँ एक व्यापक अर्थ-क्षेत्र मानि तकर भाषिक वर्गीकरण, सामाजिक प्रसङ्ग आ व्युत्पत्तिक जटिलताकेँ एक शोधरचनामे संगठित करब अछि। एहि पोथीक आधारपर तैयार भावी चित्रित, ध्वनि-सहित, क्षेत्र-चिह्नित डिजिटल कोश मैथिली लोकभाषिक धरोहरक संरक्षणक अत्यन्त उपयोगी साधन भऽ सकैत अछि।
अनुक्रमणिका
अध्ययनक अध्याय आ प्रमुख विषय
शब्दानुक्रमणिका
चयनित शब्द, सामग्री आ साहित्यिक साक्ष्य : एहि अध्ययनक पृष्ठसङ्ख्यासहित
समग्र ग्रन्थसूची
अध्ययनाधीन कृति
झा, ललिता। मैथिलीक भोजन सम्बन्धी शब्दावली। प्रथम संस्करण, २०११। प्रकाशकक नाम उपलब्ध विवरणसँ पुष्ट नहि।
मैथिली भाषा, साहित्य आ लोकजीवन
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मिश्र, जयकान्त। History of Maithili Literature। नई दिल्ली : साहित्य अकादेमी, प्रथम संस्करण, १९७६।
झा, देवकान्त। आधुनिक मैथिली साहित्यक इतिहास। नई दिल्ली : साहित्य अकादेमी, प्रथम संस्करण, २०१७।
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Grierson, George A. Bihar Peasant Life। कलकत्ता : Bengal Secretariat Press, प्रथम संस्करण, १८८५।
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Yadav, Ramawatar. A Reference Grammar of Maithili। Berlin/New York : Mouton de Gruyter, १९९६।
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Achaya, K. T. Indian Food: A Historical Companion। दिल्ली : Oxford University Press, १९९४।
Achaya, K. T. A Historical Dictionary of Indian Food। नई दिल्ली : Oxford University Press, १९९८।
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Crooke, William. The Popular Religion and Folk-Lore of Northern India। संशोधित सचित्र संस्करण, दू खण्ड। London : Archibald Constable & Co., १८९६।
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