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गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल वीरेन्द्र मल्लिक

Videha Issue 451 · Research article continuation 1

१.१२. गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल वीरेन्द्र मल्लिक

VIDEHA 451 • VIDEHA451 / PROSE 12 • सम्पूर्ण मूल पाठ

स्रोतक मूल शीर्षक, प्रकाशन-विवरण, विषय-सूची, अध्याय, तालिका, अन्तिम टिप्पणि आ सन्दर्भ पूर्ण रूपेँ समाविष्ट। मूल स्रोतमे छपल आन्तरिक पृष्ठाङ्क स्रोत-संस्करणक अछि।

मैथिली साहित्य • आलोचना • अनुसन्धान

नित नवल वीरेन्द्र मल्लिक

कविता, काव्यालोचना, रंगमंच आ विद्यापति-विमर्श

गजेन्द्र ठाकुर

सम्पादन : विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका

२०२६

प्रकाशन-विवरण

नित नवल वीरेन्द्र मल्लिक

लेखक : गजेन्द्र ठाकुर

सम्पादक : विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका

© गजेन्द्र ठाकुर / प्रीति ठाकुर, २०२६

सर्वाधिकार सुरक्षित। लेखकक लिखित अनुमतिक बिना एहि पुस्तकक कोनो अंशक पुनर्मुद्रण वा व्यावसायिक पुनर्प्रकाशन नहि कएल जाए। उद्धरण आ शैक्षिक उपयोग प्रचलित सन्दर्भ-परम्पराक अनुसार कएल जा सकैत अछि।

संस्करण : २०२६ • पुस्तकाकार आकार : ६ × ९ इंच

अनुक्रमणिका

विषयविन्यास आ अध्याय-आरम्भक पृष्ठ

भूमिका 4

१ अग्नि-शिखा : कविताक अग्नि आ जनप्रतिरोध 5

२ अथातो काव्य जिज्ञासा : कविता आ समकालीन समाज 39

३ प्रथम पुरुष : काव्यालोचनाक नूतन प्रतिमान 75

४ नाटक आ रंगमंच : प्रकृति आ प्रतिमान 88

५ प्रेम सौन्दर्य विधायक विद्यापति 123

समेकित उपसंहार 148

विस्तृत सन्दर्भ-ग्रन्थावली 149

भूमिका

वीरेन्द्र मल्लिकक साहित्यक एकटा मुख्य विशेषता ई अछि जे ओ मैथिलीक रचनात्मक भाषाकेँ जनजीवनक अस्थिरता, सामाजिक प्रश्न आ आलोचनात्मक विवेकसँ जोड़ैत छथि। हुनक कवितामे मिथिला स्मृतिक स्थिर भूगोल नहि, भूख, श्रम, भाषिक अधिकार, नगर-विस्थापन आ नागरिक असहमतिक जीवित परिवेश अछि। हुनक आलोचनात्मक गद्यमे परम्परा, आधुनिकता, सौन्दर्यशास्त्र आ साहित्यक सामाजिक दायित्वक प्रश्न पुनः-पुनः उभरैत अछि।

एहि पोथीक पहिल दू अध्याय ‘अग्नि-शिखा’ आ ‘अथातो काव्य जिज्ञासा’क कविताकेँ स्वतंत्र रूपसँ पढ़ैत अछि। पहिल संग्रहमे जन-संघर्ष आ भाषा-अस्मिताक उग्र स्वर देखल जाइत अछि, जखन कि दोसरमे पर्यावरण, विकासक विडम्बना, बजार, लोकतन्त्र आ काव्य-वस्तुकरणक बहुविध प्रश्न विस्तार पबैत अछि। कविता-पाठक विविधता बचबैत दुनू संग्रहक पारस्परिक सम्बन्ध बूझब एहि अध्ययनक आधारभूत उद्देश्य अछि।

तेसर अध्याय ‘प्रथम पुरुष’क माध्यमेँ आलोचनाक आत्मपरीक्षण करैत अछि। रामकाव्य, बिम्ब-विधान, परम्परा-प्रयोग आ समकालीन कविताक विवेचनमे मल्लिक विचारक प्रमाण, भाषाक संवेदना आ रूपगत विवेककेँ महत्त्व दैत छथि। चारिम अध्याय ‘नाटक आ रंगमंच : प्रकृति आ प्रतिमान’मे पाठ आ प्रदर्शन, लोककला आ रंगसंस्था, रंगभाषा आ सामाजिक स्मृतिक सम्बन्ध खोजैत अछि। पाँचम अध्याय विद्यापतिक प्रेम आ सौन्दर्यपर लिखल विस्तृत आलोचनात्मक कृतिक नौ अध्यायकेँ विषयवार एकत्र करैत अछि।

एहि पाँच ग्रन्थक सहअध्ययनसँ एकटा व्यापक सूत्र स्पष्ट होइत अछि : मल्लिकक साहित्य-चिन्तनमे रचनात्मक स्वतन्त्रता आ ऐतिहासिक उत्तरदायित्व एक-दोसरक विरोधी नहि। काव्यक ऊष्मा जखन लोकजीवनसँ जुड़ैत अछि, तखन ओकर रूप, वक्ता, प्रतीक, व्यंग्य आ काव्यभाषाक सूक्ष्म परीक्षण सेहो आवश्यक होइत अछि। एहिना आलोचनाक विश्वसनीयता ओहने ठाम दृढ़ होइत अछि जतय प्रशंसा आ प्रश्न, परम्परा आ नवता, सांस्कृतिक आत्मीयता आ तर्कसंगत असहमति संग-संग रहैत अछि।

अध्याय १ • वीरेन्द्र मल्लिकक साहित्य

अग्नि-शिखा

५५ कविताक क्रमबद्ध विवेचन • जनजीवन, भाषा-अस्मिता, शिल्प आ राजनीतिक व्यंग्य

‘अग्नि-शिखा’क कविता-क्रममे ५० प्रविष्टि अछि, मुदा पाँच संयुक्त प्रविष्टिमे दू-दू पृथक कविता अबैत अछि। एही कारण ५५ स्वतंत्र रचनाक विवेचन आवश्यक होइत अछि।

पद्धति चारि स्तरपर आधारित अछि : (क) मूल पाठक निकट-पठन, जाहिमे कथ्य, पात्र, बिम्ब, पुनरावृत्ति आ काव्य-वक्ता पर ध्यान अछि; (ख) राजनीतिक-आर्थिक आ सांस्कृतिक प्रसंगक आन्तरिक अध्ययन; (ग) लोकप्रयोग, मिथक, अंग्रेजी-हिन्दी मिश्रित शब्द आ कथन-शैलीक विश्लेषण; आ (घ) नैतिक-आलोचनात्मक परीक्षण, जाहिमे कविक जनपक्षधरता संग अतिरंजना, हिंसात्मक वाणी आ स्त्री-चित्रणक प्रश्न सेहो परखल गेल अछि।

कविताक ‘हम’, ‘अहाँ’, ‘ओ’ वा ऐतिहासिक व्यक्तिक उल्लेखकेँ हमेशा कविक आत्मकथा वा पुष्ट ऐतिहासिक तथ्य मानब त्रुटिपूर्ण होएत। कविता एकटा सृजनात्मक भाषिक दस्तावेज अछि। ओकर राजनीति, व्यंग्य आ अनुभवक महत्त्व बुझबाक लेल मूल कथन आ स्वतन्त्र इतिहास-सत्यापनक बीच भेद रखल गेल अछि।

२. सम्पूर्ण संग्रहक प्रमुख वैचारिक-विमर्श

२.१ अग्निक बहुअर्थी प्रतीक

‘अग्नि-शिखा’क नाम समूचा संग्रहकेँ प्रतीकात्मक एकता प्रदान करैत अछि। ‘शहरसँ गाम धरि’मे आगि प्रचण्ड विद्रोहक आकांक्षा अछि; ‘साँझ’मे ओहि आगिक रङ झीलमे प्रेम-पत्र लिखैत अछि; ‘नक्सलाइट’मे सूर्यक लाल प्रकाश संघर्षक चेतावनी अछि; शीर्षक-कवितामे अग्नि सामाजिक शल्य-चिकित्सा आ प्रकाशक ऊर्जा बनैत अछि। एकरे परिणामस्वरूप आगि केवल संहारक शक्ति नहि, स्मृति, पुनर्जागरण, परीक्षण आ सर्जनाक संभावना सेहो अछि।

एहि प्रतीकक सन्निकट आओर एकटा श्रेणी अछि—धीपल लोह, लाल किरिन, जलैत चूल्हि, बम, बरूद, प्रक्षेपास्त्र आ विद्युत। कवि आधुनिक तकनीकक शब्दसँ पुरातन अग्नि-कल्पनाकेँ बदलैत छथि। फलस्वरूप जन-क्रांतिक दृश्य आ दैनिक रोटीक आगि लगातार एक-दोसरमे रूपान्तरित होइत अछि।

२.२ भाषा-अस्मिता : अधिकार आ आत्मालोचना

‘एक डिब्बा क्रांति’, ‘माइ डियर इन्दिरा’, ‘मैथिली आन्दोलन’, ‘नपुंसक नेताक नाम’ आ ‘चिट्ठीक उतारा’मे मैथिली अधिकारक प्रश्न बारम्बार अबैत अछि। मातृभाषाक शिक्षण, संवैधानिक पहचान, साहित्यिक प्रकाशन आ स्वनामक सम्मान—ई चारिटा समस्या एक दोसरसँ अलग नहि। कवि भाषा खातिर मात्र भावुक जयघोष स्वीकार नहि करैत छथि; ओ आन्दोलनक असफलता, नेतृत्वक सुविधाभोगिता आ अपन समाजक निष्क्रियतापर सेहो प्रहार करैत छथि।

‘माइ डियर इन्दिरा’ आ ‘एक डिब्बा क्रांति’मे अष्टम अनुसूचीमे मैथिलीकेँ सम्मिलित करबाक माँग एकर रचनाकालीन राजनीतिक प्रसंग थिक। बाह्य संवैधानिक तथ्य अनुसार मैथिलीकेँ २००३क ९२म संविधान संशोधन द्वारा सम्मिलित कएल गेल, जकर प्रकाशन ८ जनवरी २००४क राजपत्रमे भेल छल। एहि प्रमाणसँ पुरान माँगक ऐतिहासिक सन्दर्भ स्पष्ट होइत अछि, मुदा एहि संग्रहक प्रत्येक कविताक रचनातिथि आपसँ समान छल, एहन निष्कर्ष नहि निकलैत।

२.३ भूख, श्रम आ आर्थिक असमानता

‘विद्युत-चाप’क कृषि-कर्ज, फीस आ मातृभाषाक पोथीक अभाव; ‘स्वाधीनताक आँगनमे’क मजदूर आ छात्र; ‘मुक्ति-संघर्ष’क दबायल जन; ‘समानधर्माक नाम’क सर्वहारा; आ ‘मुक्त भेल बजार’क मजदूर आ बाजार—ई समूचा श्रम-यथार्थ संग्रहमे एक दृढ़ सूत्र अछि। कविक जनकवितामे वर्ग-संबन्ध केवल अमूर्त नारा नहि, राशन-पाँति, कागज-पेन्सिल, गहना बन्धक रखब, मटिया तेल आ खेतीक असफलताक दृश्यसँ बनैत अछि।

आर्थिक शोषणक समांतर सांस्कृतिक शोषण चलैत अछि। जे जनभाषा बोलैत अछि, ओकरा शिक्षा, सम्मान आ प्रकाशन नहि भेटब; जे ग्रामीण श्रम करैत अछि, ओकर उत्पादन आ प्रतिफल मध्य दूरी रहब—ई दुनू विषमता संग्रहमे एके प्रकारक अन्याय मानल गेल अछि।

२.४ लोकतंत्रक विकृति आ राजनीतिक व्यंग्य

कविता-संग्रहमे कुरसी, नेता, मंत्री, मुखिया, पंचायत, पुलिस, अफसर, अदालत आ सांसदक चित्र असाधारण रूपेँ बारम्बार अबैत अछि। ‘शून्य काल’मे फाइल आ फीता, ‘यमराजक विदेश-यात्रा’मे यमपुरी, ‘गिरगिट’मे बदलैत रङ, ‘गिद्ध’मे मृतदेहभक्षी लोभ आ ‘कैंसर’मे रोगग्रस्त सामाजिक देह—ई सभ सत्ताक भिन्न रूपक अछि। प्रशासन आ राजनीति नागरिकक सेवा करबाक बदला स्वतःरक्षणक यंत्र बनि जाए, से मुख्य चिन्ता अछि।

एहि राजनीतिक दृष्टिमे एकटा महत्त्वपूर्ण अन्तर्विरोध अछि : जनतांत्रिक अधिकारक माँग बहुधा संघर्षक सैन्य शब्दावलीमे व्यक्त भेल अछि। रचनाक मूल्यांकन करैत कविक शोषण-विरोधी अभिप्राय आ काव्यभाषाक उग्र प्रयोगकेँ अलग-अलग जाँचबाक आवश्यकता अछि।

२.५ मिथिला, नगर आ सामाजिक भूगोल

कवि मिथिलाकेँ एकटा बन्द सांस्कृतिक स्मारक नहि मानैत छथि। ‘ओकर गाम : ओकर शहर’मे राँटी, मंगरौनी, पिलखवार, मधुबनी, दरभंगा, जनकपुर, पटना, कलकत्ता आ दोसर स्थलनामक उल्लेखसँ स्थानक व्यापक नेटवर्क बनैत अछि। ‘अपन लोकवेदक नाम’मे माटि-पानिक सुगन्धि संग सामन्ती संरचना, गरीबी, लोक-जीविका आ लोकक पीड़ा जुड़ल अछि। मिथिला कविक दृष्टिमे गौरवक स्थिर वस्तु नहि, निरन्तर प्रश्नक अधीन सामाजिक धरातल अछि।

शहर-संबद्ध प्रतीक—ट्राम, बस-स्टॉप, होटल, जेल, कार्यालय, सिनेमा, मॉल—ग्रामीण शब्दसामग्री—पोखरि, रोहु-भाकुर, मडुआ, गाछी, खेत, बँसबिट्टी—क संग टकराइत अछि। ई टकराहट मैथिल आधुनिकताक अनुभवकेँ केवल आयातित रूप नहि रहने दैत अछि।

२.६ पुराण, धर्म आ सांस्कृतिक आत्मपरीक्षण

कवितामे रामायण-महाभारतक अनेक पात्र राजनीतिक रूपक बनैत छथि। सीता-सरस्वतीक बारम्बार अपमान, रावणक छद्म-राजनीति, सुरसाक बेरोजगारी, कुंभकर्णक निद्रा, द्रोणाचार्यक संस्थागत अन्याय, एकलव्यक संघर्ष, चक्रव्यूहक अवरोध आ यमराजक अनुपस्थिति—ई सभ पुराणक कथाकेँ समकालीन असमानताक भाषा बनबैत अछि।

धर्मपर कविक कटाक्ष प्रायः ताहि ठाम तीव्र अछि जतय अनुष्ठानकेँ सामाजिक दायित्वक विकल्प मानि लेल जाइत अछि। ‘कीर्तन’, ‘पूजा-गृह’ आ ‘चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः’मे धार्मिक शब्दक व्यंग्यात्मक प्रयोगक लक्ष्य आस्था स्वतः नहि, पाखण्ड आ स्वार्थसँ आच्छन्न सार्वजनिक आचरण अछि।

२.७ स्त्री-प्रतीक आ स्त्रीक अनुपस्थित स्वर

‘मैथिल ललना’मे परम्परा आ महानगरक दृश्य, ‘साँझ’मे प्रतीक्षा, ‘मिनि गर्ल’मे देहक नाप, ‘अग्नि-शिखा’मे माय-बहीन-पत्नी-प्रेयसीक चिन्ता, ‘छापामार युद्ध’मे नारीजागृति आ ‘गुजरातनामा’मे हिंसाग्रस्त स्त्री—एकरे प्रकारें स्त्री अनेक भूमिकामे प्रकट छथि। ई व्यापकता साहित्यिक दृष्टिएँ ध्यानयोग्य अछि।

तथापि आलोचनाक प्रश्न अछि जे कतेक ठाम स्त्री अपन भाषा मे बजैत छथि आ कतेक ठाम कविक राजनीतिक तर्कक प्रतीक मात्र बनि जाइत छथि। ‘मिनि गर्ल’ आ ‘पूजा-गृह’क देह-विम्ब पाठककेँ आत्मालोचनक अवसर दैत अछि। संग्रहक जनपक्षधरता केँ स्त्रीक स्वतन्त्र अनुभवक प्रश्नसँ जोड़ि पढ़ब जरूरी अछि।

२.८ रचनाकार, साहित्यिक संस्था आ प्रतिरोधक सौन्दर्य

संग्रहक विशिष्ट उपलब्धि ई अछि जे कवि राजनीति पर लिखबा संग स्वयं कवि, बुद्धिजीवी, आलोचक, पुरस्कार-समिति आ प्रकाशन-संस्थानक जाँच करैत छथि। ‘चारि लाख बानरक बीच’मे सांस्कृतिक आयोजन, ‘हे हमर अग्रज’मे पुरान नेतृत्व, ‘चिट्ठीक उतारा’मे पुस्तक-प्रकाशन आ ‘कवितायाः प्रतिवादम्’ तथा ‘कविताश्री पाटलिपुत्रम्’मे कविताक भूमिका पर सीधा विमर्श अछि।

एहि अर्थमे कविता केवल बाहरी व्यवस्था-विरोध नहि, साहित्यिक क्षेत्रक आत्मसमीक्षा सेहो अछि। कविक आग्रह स्पष्ट अछि—साहित्यकेँ जन-जीवनक दुःख आ संघर्षसँ सम्बन्ध बनौने रहबाक चाही। मुदा साहित्यक राजनीतिक उपयोगिताक अतिरिक्त ओकर आन्तरिक सौन्दर्य, विरोधाभास आ बहुअर्थता बचेबाक आवश्यकता सेहो एहि पाठसँ स्पष्ट होइत अछि।

२.९ समयक विस्तार : आरम्भिक जनांदोलनसँ भूमण्डलीकरण धरि

पाठमे इन्दिरा-संबद्ध राजनीतिक भाषण, बंगलादेश, अष्टम अनुसूचीमे प्रवेशक माँग, नक्सलाइट, चारा-हवाला घोटाला, वैश्वीकरण, गुजरातक हिंसा आ ‘बिग बजार’—ई सभ अलग-अलग काल-संकेत अछि। ताहिसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे संग्रहक विषय-विस्तार अनेक ऐतिहासिक स्तरक बीच फैलल अछि। किताबक निश्चित प्रकाशनकाल वा हर कविताक वर्ष बिना प्रामाणिक प्रकाशन-जानकारी लिखब उचित नहि।

बाजारवादी युगक कविता सभ पुरान अन्यायकेँ समाप्त भेल नहि मानैत, अपितु परिवर्तनशील रूपमे पुनः उपस्थित देखैत अछि। ‘मुक्त भेल बजार’क अन्तिम प्रश्न संग्रहक आरम्भिक विद्रोहक ऊर्जा संग जुड़ि कऽ तर्काधारित संघर्षक नव सम्भावना खोलैत अछि।

३. भाषा, काव्यशिल्प आ सौन्दर्यबोध

३.१ लोकशब्द आ बहुभाषिक बनावट

संग्रहमे मैथिलीक लोकप्रयुक्त क्रिया-रूप, देसी वस्तुनाम, गारि, अपभ्रंश, मिथक, ग्रामीण श्रमक शब्दावली संग ट्राम, फ्रिज, प्रेस्टिज कुकर, लेटर बॉक्स, ब्लड बैंक, अल्ट्रा वायलेट रेज, प्रक्षेपास्त्र, हाईब्रिड, मॉल आदि आधुनिक पद संग-संग भेटैत अछि। ई मिश्रणक कारण सामाजिक जीवनक विविध स्तर एके भाषिक सतहपर आबि जाइत अछि। हिन्दी, अंग्रेजी आ संस्कृत-सूत्रक सीमित उपस्थितिकेँ मैथिली आवाजक भीतर काव्यात्मक रणनीति मानल जा सकैछ; ई शोध स्वयं मैथिली गद्यभाषामे प्रस्तुत अछि।

३.२ मुक्तछन्द, कोलाज आ नाटकीय वक्तव्य

बेसिभाग कविता मुक्तछन्दमे अछि; कतहु प्रश्नक झड़ी, कतहु लम्बा अनुच्छेद, कतहु मात्र दू-तीन पाँती, कतहु एक-एक शब्द अलग पाँतीमे। ‘विष्णुर्योनिम्’क दृश्यविन्यास, ‘कविताश्री पाटलिपुत्रम्’क पूर्णविराम-प्रयोग, ‘साँझ’क लयबद्ध लघुचित्र आ ‘चारि लाख बानरक बीच’क नाटकीयता एहि विविधताक दृष्टान्त अछि। छन्दबद्ध गानक अभावक अर्थ लयक अभाव नहि: सम्बोधन आ पुनरुक्ति संघर्षक अलग मौखिक लय रचैत अछि।

३.३ बिम्बक प्रमुख परिवार

आगि-प्रकाश, रोग-शरीर, जानवर-भीड़, घर-देवाल, खेत-भूख, युद्ध-अस्त्र, नगर-मंच आ धर्म-अनुष्ठान—ई आठ प्रतीकपरिवार लगभग पूरा संग्रहमे पुनः-पुनः सक्रिय होइत अछि। ‘गिद्ध’ आ ‘कैंसर’मे मृत्युक दाह; ‘नव घर उठे’ आ ‘घून लागल वटवृक्ष’मे संरचनाक क्षय; ‘साँझ’ आ ‘अग्नि-शिखा’मे प्रकाशक रूपान्तर—एहि सम्बन्धसभकेँ पढ़लासँ संग्रहक आन्तरिक संगठन अधिक स्पष्ट होइत अछि।

३.४ व्यंग्यक तीक्ष्णता आ अर्थक जोखिम

गदहा, कुकुर, बानर, सियार, साँप, गिरगिट, गिद्ध आदिक बिम्ब सत्ताधारी वर्गक विवेचनमे अत्यन्त कड़क अछि। एहन व्यंग्य लोकपाठक लेल त्वरित भावानुभूति दैत अछि, मुदा कखनहुँ मानवीय व्यवहारक जटिलताकेँ एक जानवर-प्रकारमे समेटि देबाक जोखिम सेहो अछि। रचनाक मौलिकता आ सीमा दूनूक सही समझ एहि द्वन्द्वसँ बनैत अछि।

४. कविता-वार विशद विवेचन : सभ ५५ स्वतंत्र पाठ

निम्नलिखित क्रम मूल पोथीक वास्तविक मुद्रित पृष्ठ-क्रमक अनुसरण करैत अछि। प्रत्येक टिप्पणीमे पहिने कथ्य आ सन्दर्भ, तकर बाद शिल्प, प्रतीक वा आलोचनात्मक अर्थक विचार देल गेल अछि। कोष्ठकक पृष्ठ मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ थिक।

१. शहरसँ गाम धरि (पृ. ९–११)

संग्रहक आरम्भमे कवि अपनाकेँ ‘बताह’ बनि नगरसँ गाम धरि पसरैत आगिक रूपमे कल्पना करैत छथि। ई पागलपन निष्क्रियताक प्रतिरोधक नाम थिक। शहरी लुटेरा, गामक सूदखोर महाजन, भ्रष्ट नेता, बैमान मुखिया आ शिक्षा-संस्थाक विफलता एके सामाजिक संकटमे जुटि जाइत अछि। सीता, सरस्वती, रावण, कोशी, कमला आ बलानक उल्लेखसँ मिथिलाक सांस्कृतिक भूगोल राजनीतिक भाषा बनैत अछि। कविक रोष कोनो एकटा व्यक्तिपर नहि, शोषणक समूचा जालपर केन्द्रित अछि।

प्रारम्भ आ अन्तमे आगि बनि पसरबाक कथनक पुनरावृत्ति कविताकेँ वृत्ताकार बनबैत अछि। नदीक पानि अन्तिम आशा आ अनियंत्रित प्रतिरोध दुनूक प्रतीक बनैत अछि। ‘जन-क्रांति’क कामना स्पष्ट अछि, मुदा आगि-संबद्ध अतिशयोक्ति आ युद्धक बिम्बकेँ काव्यात्मक आह्वानक रूपमे बुझबाक चाही, ऐतिहासिक घटनाक शाब्दिक भविष्यवाणी मानि नहि।

२. एक बुट्टी मासु (पृ. १२–१३)

एहि कवितामे सरकारी आश्वासन, पदवी आ कुरसीकेँ ‘एक बुट्टी मासु’क प्रलोभन बना कऽ देखाओल गेल अछि। लोक आ संगठन एहि छोट लाभ पर टूटि पड़ैत अछि आ अपनहि वर्गसँ लड़बाक क्रममे सामूहिक अधिकार बिसरि जाइत अछि। विषधर साँप, कुकुर आ हड्डीक बिम्ब निर्बल जनसमुदाय आ सत्ताक असमान सम्बन्धकेँ उघारैत अछि। कविक तीख आक्षेप नेता, छात्र, बुद्धिजीवी आ राजनीतिक कार्यकर्ता सभक दिशि समान रूपेँ गेल अछि।

‘गीता’, ‘कामसूत्र’ आ ‘विद्यापति पदावली’क उल्लेख एतय ग्रन्थ-विरोध नहि, सन्दर्भसँ काटल आत्मतुष्ट पाठनपर व्यंग्य अछि। मातृभाषा आ मायकेँ स्वीकार नहि करबाक चित्र सांस्कृतिक आत्मविस्मृतिक चरम रूप अछि। प्रश्नवाचक आ अपमानबोधक वाक्य पाठककेँ आत्मालोचन दिस धकेलैत अछि।

३. एक डिब्बा क्रांति (पृ. १४–१५)

कवि शासनक बलप्रधान यथार्थकेँ उद्घाटित करैत कवि-लेखक, छात्र आ आम जनता सँ प्रश्न पुछैत छथि। अष्टम अनुसूचीमे मैथिलीकेँ स्थान देबाक माँग, मातृभाषामे पढ़बाक अधिकार आ जातिक नामपर भोट दऽ कऽ अयोग्य प्रतिनिधि जितेबाक प्रवृत्ति कविता मध्य मुख्य विषय अछि। शब्द, कलम आ जनबलक बीच राजनीतिक प्रभावक सम्बन्धक पड़ताल कएल गेल अछि। ‘डिब्बा’ नाम राजनीतिक क्रांतिक पैकेटबद्ध, खोखल आ प्रदर्शनकारी स्वरूपपर सेहो संकेत करैत अछि।

पुनरावृत्त सूत्र ‘बल जकर लाठीमे’ आदि लोकप्रचलित कहावतक व्यंग्यात्मक परिवर्तन अछि। कठोर ललकारक अन्तर्गत कवि आन्दोलनक वास्तविक तैयारी आ आत्मसंयमक प्रश्न उठबैत छथि। आक्रोशक स्वरक संग भाषिक अधिकारक ठोस माँग एकर विशेषता अछि।

४. हे हमर अग्रज शान्त भऽ जाउ (पृ. १६–१७)

ई रचना पीढ़ीगत संघर्षक सीधा वक्तव्य अछि। कवि अपन ‘अग्रज’ पीढ़ीकेँ सुविधाभोगी, पदलोभी, आत्मसंतुष्ट आ मातृभाषाक प्रति उदासीन कहि संबोधित करैत छथि। डिबरी, तेल, सलाइक काठी, क्लर्क, पीउन, सभा, ताश आ चौपड़क विवरण जीवनक तुच्छ दिनचर्या आ अपूर्ण सार्वजनिक उत्तरदायित्वकेँ सोझाँ अनैत अछि। मुख्य आग्रह अछि जे पुरान नेतृत्व नव पीढ़ीक मार्गमे अवरोध बनि नहि ठाढ़ होअए।

आदेशात्मक शीर्षकमे सतही विनय अछि, भीतर तीक्ष्ण व्यंग्य। ‘शान्त भऽ जाउ’ मृत्यु-कामना नहि, सार्वजनिक नेतृत्व छोड़ि नवतुरियाकेँ काम करबाक अवसर देबाक राजनीतिक आग्रह अछि। छोट-छोट लोकजीवनक उपमान आ प्रश्नवाचक आवेग कविताकेँ भाषणात्मक होइतहुँ जीवंत बनबैत अछि।

५. बंगाल बन्द (पृ. १८–१९)

‘बन्द’क अवसरपर कलकत्ताक शहरी जीवन भय, गोली, बम, गिरफ्तारी आ प्रशासनिक दमनक आच्छादनमे अछि। अलीपुर जेल, नक्सलाइटक नामपर युवा रक्तक उल्लेख आ पी.डी. एक्टक चर्चा एकटा विशेष राजनीतिक वातावरणक पाठ-संकेत अछि। एहि त्रासक बीच कलुआ चमार आ चतुरा चमाइनक घरेलू संवाद आम जनक जिएबाक व्यावहारिक चिन्ता उभारैत अछि। फलतः सार्वजनिक ‘बन्द’ आ निजी भूख-भयक बीच दूरी बनैत अछि।

सर्द लाश सन शहर आ दैनिक बोलचालक हिन्दी-मिश्रित संवाद एक-दोसरक विरोधी लय रचैत अछि। कवि केवल नारा नहि दैत छथि; लोकजीवनक हास्य, असहायता आ विरोधाभासकेँ एक दृश्य-कवितामे समेटैत छथि।

६. साँझ (पृ. २०)

ई लघुकविता संग्रहक तीक्ष्ण राजनीतिक स्वरक बीच एकटा सौन्दर्य-बिन्दु अछि। झीलक जलपर सूरजक लालिमा मानू आगिसँ लिखल कोनो नाम अछि, आ साँझ मानू लेटर-बॉक्समे राखल मिलनक चिट्ठी। एहि दृश्यमे प्रकृति आ शहरी संचारक वस्तु सहजहि एक भऽ जाइत अछि। प्रकाशक क्षयकेँ कवि वियोग नहि, पुनर्मिलनक प्रतीक्षा बना दैत छथि।

मात्र किछु पाँतीमे प्रतीक, दृश्यात्मकता आ मानवीकरणक संयमित प्रयोग भेल अछि। ‘आगि’ एतय विनाशक नहि, प्रेमिल आलोकक संकेत अछि; इएह शब्दक अर्थविस्तार बुझब संग्रहक समग्र पाठ लेल आवश्यक अछि।

७. मैथिल ललना (पृ. २०)

चौरंगीमे देखाओल मैथिल स्त्रीक काजर, सेनुर, ओरहुल-सन रंगल ठोर, ललका छीटक साड़ी आ चप्पल-विहीन पएर कविताक दृश्य रचैत अछि। महानगरक आधुनिक सड़क आ मिथिलाक पारम्परिक वस्त्र-विन्यासक भेंटमे पहचानक द्वन्द्व उपस्थित अछि। स्त्रीकेँ केवल ‘पिछड़ल’ वा ‘आधुनिक’ कोनो एक श्रेणीमे रखब एकर पाठकेँ संकीर्ण करब।

ई शब्दचित्र बहुत लघु अछि; वर्णनात्मक अन्तःदृष्टिक अतिरिक्त स्त्रीक अपन स्वर अनुपस्थित अछि। तें स्त्री-अध्ययनमे ई सीमा विचारणीय अछि। रंग आ भेषक संयोजन एकर संक्षिप्त दृश्यात्मक शक्ति अछि।

८. साँप (पृ. २१)

निर्जन, निस्तब्ध दिवसकेँ कवि सड़कपर पड़ल मृत साँपक रूपमे देखैत छथि। लोक निज घरक कारागारमे बंद अछि; शोर नहि, संग्राम नहि। बाह्य शान्तिक भीतर भय आ जीवित सामाजिक चेतनाक अभाव एहिमे व्यक्त भेल अछि। साँप साधारणतया संकट वा विषक प्रतीक मानल जाइत अछि, मुदा एतय ओकर मृत रूप सार्वजनिक निष्क्रियताक द्योतक बनैत अछि।

उपमानक उलट प्रयोग कविता केँ तीक्ष्ण बनबैत अछि। स्तब्ध दिन, घर-कारागार आ अनमोन सड़कक तीन बिम्ब मिलि राजनीतिक कायरताक दृश्य रचैत अछि। एकर मौन, संग्रहक अनेक उग्र कविताक विपरीत, स्वयं एकटा प्रतिरोधी कथन बनैत अछि।

९. मास्टर साहेब (पृ. २१)

ई लघु व्यंग्य शिक्षकक बदलैत भाषा, परिधान आ घरे-घरे घूमबाक व्यवहारक आधारपर बनल अछि। मुँहमे पान, हाथमे घड़ी, कखन अंग्रेजी कखन हिन्दी, कखन पारम्परिक धोती कखन पैंट—एहि विवरणसँ पेशागत अस्थिरता आ बाह्य प्रदर्शन चित्रित अछि। शिक्षकक ज्ञानक चर्चा नहि, हुनक सामाजिक छविक अभिनय कविताक लक्ष्य अछि।

अन्तिम कुकुर-उपमा अपमानक मार्मिक तीक्ष्णता बढ़बैत अछि, मुदा एहन सामान्यीकरण सभ शिक्षकपर लागू करब उचित नहि। सामाजिक प्रकारक व्यंग्यक रूपमे पढ़ला पर कविता अधिक सार्थक अछि।

१०. मैथिली आन्दोलन (पृ. २२)

भाषा-अधिकारक आन्दोलनकेँ बच्चाक फुस्स भऽ गेल बम-पटाखासँ तुलना कएल गेल अछि। जनताक जागरणक अपेक्षामे बारम्बार प्रतीक्षा आ निष्क्रियता कविताक मुख्य व्यंग्य अछि। संघर्षक नामपर प्रतीकात्मक आयोजन तऽ होइत अछि, मुदा ओकर परिणाम नहि निकलैत—कवि एहि अन्तरकेँ प्रश्नांकित करैत छथि।

साधारण घरायसी पटाखाक बिम्ब राजनीतिक दावाक खोखलापन तत्काल देखबैत अछि। अतिलघु आकार व्यंग्यक तेज धार बढ़बैत अछि। संग्रहक आन आन्दोलनधर्मी कविताक संग पढ़ला पर ई रचना स्वपक्षीय आत्मालोचन सेहो थिक।

११. मिनि गर्ल (पृ. २२)

‘मिनि गर्ल’मे पारदर्शी कपड़ा, देह-यष्टि आ नाप-जोखक संख्याक माध्यमसँ शहरी फैशनक एकटा तीक्ष्ण दृश्य देल गेल अछि। स्त्रीक देहकेँ मापमे बदलि देबाक उपभोक्तावादी दृष्टि एतय स्पष्ट देखाइत अछि। मुदा कविताक कथन स्वयं एहन वस्तुकरणक आलोचना करैत अछि कि ओकर पुनरुत्पादन, से प्रश्न खुलल रहैत अछि।

सूची-जकाँ छोट पदावली, संख्यात्मक संकेत आ देह-संबन्धी विवरण एकर प्रयोगधर्मी विन्यास अछि। स्त्रीक व्यक्तित्वक अनुपस्थिति एकटा महत्वपूर्ण आलोचनात्मक सीमा मानल जाएबाक चाही।

१२. माइ डियर इन्दिरा (पृ. २३–२४)

शीर्षकमे अंग्रेजी संबोधनक संग भारतीय सत्ताकेँ प्रत्यक्ष पत्र-जकाँ पुकारल गेल अछि। भाषाकेँ अष्टम अनुसूचीमे स्थान देबाक माँग, आश्वासनक अस्वीकृति आ मैथिलीभाषी जनताक आत्मसम्मान कविता मध्य केन्द्रित अछि। कमला-बलान आ कोशीक गर्जना, मिथिलाक भौगोलिक विस्तारक नाम आ लव-कुशक स्मृति एक आन्दोलित सांस्कृतिक समुदायक चित्र बनबैत अछि।

‘आगि’, ‘दमकल’, ‘धीपल लोह’ आ ‘ललकार’क अनुक्रम भावनाक तीव्रता बढ़बैत अछि। शीर्षकक आत्मीयता आ कविताक कड़ा राजनैतिक स्वरक विरोधाभास महत्त्वपूर्ण अछि। कविता केँ तत्कालीन माँगक काव्यात्मक दस्तावेजक रूपमे पढ़ब, मुदा ओकर रचनातिथि बिना प्रमाण निश्चित नहि करब।

१३. स्वाधीनताक आँगनमे (पृ. २५–२६)

स्वाधीन देशक आँगनमे ठाढ़ छात्र, मजदूर आ किसान वास्तविक स्वतंत्रतासँ वंचित छथि। छात्र बेरोजगारी, परीक्षा-अव्यवस्था आ अश्रुगैस देखैत अछि; किसान रौदी-बाढ़, अनुदानक विडम्बना, राशनक पाँति आ भूखसँ जूझैत अछि। ‘जय जवान जय किसान’ सन सार्वजनिक नाराक सोझाँ जीवनक यथार्थ राखि कवि औपचारिक स्वाधीनता आ सामाजिक स्वराजक अन्तर उघारैत छथि।

एके वाक्यांशक पुनरावृत्ति विभिन्न सामाजिक पात्रकेँ जोड़ैत अछि। रामायणक सुरसा आ विकास-योजनाक ‘प्रयोगशाला’क संगति मिथक तथा आधुनिक राज्यभाषाक आलोचनात्मक सम्मिलन अछि। ई कविताक स्वर व्यक्तिगत रोषसँ बढ़ि वर्गीय साझा अनुभवधरि पहुँचैत अछि।

१४. कीर्तन (पृ. २७–२८)

कीर्तनक धार्मिक-सांस्कृतिक रूपकेँ कवि राज्य, सभा, कार्यालय आ नेताक सार्वजनिक प्रदर्शनक रूपक बना दैत छथि। हड़ताल, छुट्टी, बीयर, शरीरक बाजारू सजावट, अष्टयाम आ मंचक आयोजनक बीच प्रजातंत्रक वास्तविक दायित्व ओझराएल अछि। धार्मिक शब्दसामग्री एतय आस्था पर सार्वभौम आक्रमण नहि; पाखण्डी आयोजन द्वारा राजनीति आ समाजकेँ सुन्न बनएबाक विरोधी व्यंग्यक उपकरण अछि।

कोलाहल, दृश्य-परिवर्तन आ सूचीबद्ध उपमान कविताकेँ भीड़युक्त रंगमंच बना दैत अछि। अश्लीलता आ अनुष्ठानक टकराहटसँ सभ्यताक दिखावा प्रश्नांकित होइत अछि। अति-सघन बिम्बावली कतहु अर्थकेँ जटिल बनबैत अछि; तथापि ई जटिलता कविक विखण्डित समय-बोधसँ जुड़ल अछि।

१५. कैंसर (पृ. २९–३०)

‘कैंसर’ रोगकेँ सामाजिक देहक भीतर फैलैत निष्क्रियता, स्वार्थ आ संस्था-विघटनक रूपक बना दैत अछि। शिक्षक, डॉक्टर, राजनीतिज्ञ, मंत्री आ बुद्धिजीवी अपन-अपन दायित्वसँ हटि गेल छथि। कोर्ट-कचहरी, कुरसी, चुनाव, राशन, विदेशी ऋण आ मूल्यवृद्धि जनजीवनक अनेक रोग-जकाँ उपस्थित अछि। व्यक्तिक रोग नहि, कर्तव्यत्यागी समाजक कुप्रवृत्ति कविताक असली विषय अछि।

विरामहीन प्रश्नावली आ चिकित्सकीय शब्दसामग्री बहुस्तरीय संकटक अनुभूति उत्पन्न करैत अछि। ई कविता सामाजिक रोगक निदानक आवश्यकता पर बल दैत अछि, मुदा इलाजक स्पष्ट संस्थागत रूपरेखा नहि दैत अछि—ई ओकर घोषणात्मक शैलीक स्वाभाविक सीमा अछि।

१६. पूजा-गृह (पृ. ३१–३२)

पूजा-गृहमे भग्न मूर्ति, अगरबत्ती, अश्रुगैस, लाल फीता आ चुनावक सामान एके दृश्य-विधानमे उपस्थित अछि। धर्मस्थल आ प्रशासनिक दफ्तरक वस्तुसभकेँ एकत्र कए कवि बतबैत छथि जे मनुष्यता, चेतना आ न्याय कतेक खण्डित भऽ गेल अछि। शिल्पगत रूपेँ टूटल अङ्ग, सर्वनाम आ शारीरिक प्रतीक सामाजिक विघटनक दृश्यात्मक पाठ बनबैत अछि।

वस्तुसभक असामान्य संयोजन अतियथार्थवादी कोलाज-जकाँ प्रभाव उत्पन्न करैत अछि। स्त्री-देहक प्रतिमासभक उपस्थितिपर आलोचनात्मक दृष्टि आवश्यक अछि; एतय शक्तिसंरचनाक वस्तुकरण देखाओल गेल होइ, अथवा काव्यभाषा स्वयं ओकर पुनरावृत्ति करैत होइ—दुनू सम्भावना परखल जा सकैछ।

१७. चारि लाख बानरक बीच (पृ. ३३–३४)

सांस्कृतिक सभागारक भीतर चन्दा, स्वागत, भाषण, मंच-व्यवस्था, अभिनेताक प्रतीक्षा आ दर्शकक लिप्साकेँ कवि बानरक समूहक रूपमे चित्रित करैत छथि। सभागार साहित्यिक-सांस्कृतिक प्रतिष्ठानक उपहासपूर्ण प्रतिरूप बनि उठैत अछि। कार्यक्रमक मूल उद्देश्य बिसरि व्यवस्थापकक प्रदर्शन, हल्ला आ स्त्री-देहक उत्सुकतापूर्ण चर्चा प्रधान भऽ जाइत अछि।

‘बानर’, ‘हनुमान’, ‘टाइम बम’ आ ‘प्रेसर कुकर’क टकराव लोकउपमा तथा आधुनिक उपकरणक व्यंग्यकारी मेल अछि। संख्या अतिशयोक्तिक उपकरण अछि; एकरा तथ्यात्मक दर्शक-गणना मानब उचित नहि। एकर कटाक्ष साहित्यिक सभासभक आन्तरिक विडम्बनापर अछि।

१८. अपन लोकवेदक नाम (पृ. ३५–३९)

ई विस्तृत कविता संग्रहक आत्मालोचनात्मक केन्द्रसभमे एक अछि। कवि स्वयंकेँ ‘पापी’ कहि अपन माटि-पानि, लोकवेद, मजदूर, गरीब किसान, शहरी श्रमिक आ वंचित जनक दुख उजागर करबाक दायित्व स्वीकार करैत छथि। विद्यापतिक नाम, सीता, आयाची, मण्डन आदिक गौरवक प्रतिमाक आड़मे आजुक अशिक्षा, मातृभाषाक अवहेलना आ सामाजिक असमानता नुकाएबाक प्रवृत्तिक विरोध करैत छथि। पुरान सांस्कृतिक स्मृति आ वर्तमान अभावक बीच स्थायी तनाव उपस्थित अछि।

बारम्बार अपनाकेँ दोषी कहब आत्मव्यंग्य आ नैतिक प्रतिरोधक दूहरी युक्ति अछि। ‘लोकवेद’ संग्रहमे मात्र लोकसंस्कृति नहि, जीबैत जनसमुदायक सामाजिक ज्ञान, श्रम आ अधिकारक व्यापक संज्ञा बनि उठैत अछि। एतय कविक लोकपक्षधरता सर्वाधिक प्रत्यक्ष अछि।

१९. नक्सलाइट (पृ. ४०–४१)

प्रातःक लाल सूर्य, मिसाइल, बम आ संघर्षक बिम्बसँ शुरू भऽ कविता पलायनवादी मनोदशा दिस घुरि जाइत अछि। काशीवास, घाट, पूजा आ शहरी शोषणक दृश्य केवल धार्मिक-नगरीक वर्णन नहि, चेतनासँ पलायन करैत मनुक्खक दृष्टान्त अछि। ‘नक्सलाइट’ शीर्षक सशस्त्र उथल-पुथल आ ओकर प्रति सामाजिक प्रतिक्रियाक कठिन प्रश्न उपस्थित करैत अछि।

स्वप्न, हिंसात्मक प्रतीक, शहरी देह-व्यापार आ आत्मविस्मृतिक टुकड़ा-टुकड़ा दृश्य पाठकेँ बेचैन बनबैत अछि। कवि हिंसाक समाचारक संग वर्गीय असमानता आ राजनीतिक निष्क्रियताक छिपल सम्बन्ध देखबैत छथि; एकरा सरल राजनीतिक घोषणा-मात्र बना देब उचित नहि।

२०. विद्युत-चाप (पृ. ४२–४४)

भूखक समुद्र, खेतीक संकट, कर्ज, स्कूलक फीस, मातृभाषाक पोथीक अभाव आ बेरोजगारी कविताक आधार अछि। समृद्ध खानपानक पारम्परिक स्मृतिक सोझाँ आजुक दरिद्र गृहस्थक कठोर जीवन राखल गेल अछि। ट्रैक्टर, पम्पिंग सेट, विटामिन, ब्लड बैंक आदि आधुनिक शब्द कृषि-सामाजिक यथार्थसँ जोडैत अछि। पूजा-पाठ मात्रसँ भूख, रोग आ आर्थिक संकट नहि मेटत—कवि कर्मशील परिवर्तनक आवश्यकता प्रतिपादित करैत छथि।

शीर्षकक ‘चाप’ दबाव, ऊर्जाक असन्तुलन आ अचानक झटकाक अर्थ उत्पन्न करैत अछि। लगातार ‘कहिया धरि’क प्रश्न व्यवस्था बदलबाक कालसापेक्ष माँग बनि उठैत अछि। एहि कवितामे श्रम, स्वास्थ्य, शिक्षा आ भाषा परस्पर जोड़ल जन-अधिकार अछि।

२१. छापामार युद्ध (पृ. ४५–४७)

ई कविता नवयुगक निर्माताकेँ सम्बोधित दीर्घ आह्वान अछि। बाढ़ि, रौदी, दरिद्रता, पीयर पड़ल धिया, बेरोजगार पुत्र आ वृद्ध माता-पिताक चित्रसँ व्यवस्था-विरोधक आधार बनैत अछि। नवताक चाहना संग स्त्रीक सार्वजनिक सक्रियता आ ‘नारी जागृति’क प्रसंग अबैत अछि। कवि अन्याय सहन करबाक दीर्घ परम्पराकेँ बदलावक बाधा मानैत छथि, आ राजनीतिक संघर्षक भाषा अत्यन्त उग्र बना दैत छथि।

‘आउ’क लगातार पुनरावृत्ति गीतात्मक आवाहनक लय रचैत अछि। कवितामे शस्त्र, रण-नीति आ छापामार युद्धक पद काव्यिक राजनीतिक आग्रहक अंश अछि; आलोचनामे एहिसँ जुड़ल मानवीय क्षति, अहिंसात्मक लोकतांत्रिक सम्भावना आ भाषाक अतिशयोक्ति सेहो विचारणीय अछि। ई आक्रोशकेँ ऐतिहासिक सामाजिक दस्तावेजक रूपमे पढ़बाक चाही।

२२. शून्य काल (पृ. ४८–४९)

‘शून्य काल’ निर्णयहीन वर्तमानक कविता अछि। कवि कवि, इतिहासकार, बुद्धिजीवी, नेता आ मंत्री सभक निष्क्रियता वा अवसरवादसँ विचलित छथि। कार्यालयक फाइल, सरकारी फीता, घूस, चकबन्दी, मन्त्रीक शीशमहल आ लोकक बन्हकी राखल थारी एके व्यवस्थाक अनेक रूप अछि। लोकतंत्रक प्रक्रियामे सामान्य जनक दैनंदिन अपमान एहि समयकेँ ‘शून्य’ बनबैत अछि।

अनेक प्रश्नवाचक संबोधनसँ कवि नेतृत्वक अभाव उजागर करैत छथि। कविता समस्या-सूची बनैत अछि, मुदा एही सूचीमे स्थानीय प्रशासनसँ राष्ट्रीय शासनधरि शोषणक तंत्र स्पष्ट होइत अछि। ‘शून्य’ समयक अर्थ निष्क्रिय निर्वात नहि, निर्णायक कार्यक प्रतीक्षा अछि।

२३. नव घर उठे : पुरान घर खसे (पृ. ५०–५६)

संग्रहक सभसँ विस्तृत आ घोषणात्मक रचनासभमे ई प्रमुख अछि। ‘घर’ केवल मकान नहि, सामाजिक व्यवस्था, जातीय संस्कार, परम्परागत सत्ता आ मानसिक जड़ताक रूपक अछि। पुरान संरचनाकेँ खसाएब आ नव आधारपर निर्माण करब—दूनू कर्म एक संग अपेक्षित अछि। मिथिलाक गौरव-गरिमा स्वीकार करैत कवि ओकर दरिद्रता, अशिक्षा, चापलूसी आ संस्थागत निर्बलताक निदान खोजैत छथि। पितृपुरुषक नामक मात्र उच्चारणक बदला वर्तमानक ठोस जिम्मेदारीपर बल अछि।

एकल शब्दक पाँती, अचानक विराम, प्रश्न, आदेश आ श्रेणीबद्ध उच्चारणसँ कविता आंदोलनकारी घोषणापत्रक रूप ग्रहण करैत अछि। ‘नव घर’क विचार रचनात्मक अछि, यद्यपि कतिपय पाँतीक रणप्रधान भाषाक लोकतांत्रिक अर्थ पर आलोचनात्मक प्रश्न उठैत अछि। कविताक मूल सामर्थ्य पुरातन प्रतिष्ठाक बजाय सामाजिक पुनर्निर्माणकेँ मूल्य मानब अछि।

२४. एक आओर नर्कमे धकेलल जएबाक नाटक (पृ. ५७–५८)

सीढ़ी उतरैत रहितहुँ नर्कक अन्त नहि भेटब—ई आरम्भिक बिम्ब असफल परिवर्तनक चक्र देखबैत अछि। एकटा व्यक्ति वा दलक स्थानपर दोसर आबैत अछि, मुदा व्यवस्था सामान्य जनकेँ पुनः पीसैत अछि। कवि विजयोल्लासक बीच शोक, विष आ अन्धकारक प्रश्न पुछैत छथि। मातृभाषा आ मायकेँ मुक्त करबाक दायित्व व्यक्तिगत सुविधासँ बेसी महत्त्वपूर्ण मानल गेल अछि।

कविताक अन्तमे ‘ज्ञान नहि, नौकरी चाही’ आ ‘उपदेश नहि, काज चाही’क अभिमुखता अमूर्त विचारसँ ठोस आजीविका दिस घुरैत अछि। एहि कारण ई रचना नारा आ सामाजिक व्यवहारक बीचक अन्तर उजागर करैत अछि। ‘नर्क’क पुनरावृत्ति नियतिक नहि, बदलबाक योग्य व्यवस्थागत उत्पीड़नक अर्थ दैत अछि।

२५. किकिआइत कुकूरक प्रति बन्दूकसँ खेलाइत (पृ. ५९–६१)

कवि नवतुरिया रचनाकारकेँ यथास्थिति सँ भयभीत नहि होएबाक आग्रह करैत छथि। छलपूर्ण प्रशासक, अवसरवादी नेता, राजनीति आ ‘गरीबी हटएबाक’ खोखल घोषणा पर कटाक्ष अछि। ई कविता शब्द, भाषा आ रचनाकेँ संघर्षक साधन मानैत अछि; कविक दृष्टिमे प्रतिपक्षी शक्ति भेष बदलबाक कलामे पटु अछि, तें परिवर्तनकारीकेँ आत्मसतर्क रहबाक चाही।

‘सावधान’, ‘खबरदार’ आ ‘होशियार’ सन सम्बोधन राजनीतिक चेतावनीक लय रचैत अछि। गुलिवर आ पहाड़क आकारक बिम्ब अनुपातक उलटाव करैत अछि। एहि पाठक भाषिक ‘हथियार’केँ प्रतिरोधी लेखनक रूपकक रूपमे ग्रहण केलासँ साहित्यिक दायित्व प्रमुख रूपेँ उभरैत अछि।

२६. विष्णुर्योनिम् (पृ. ६२)

ई लघु प्रयोगधर्मी कविता परम्परागत वाक्य-विन्याससँ हटि देह, वस्त्र, निःश्वास, स्पर्श आ संवेदनाक अलग-अलग शब्दक क्रम प्रस्तुत करैत अछि। एकटा संगठित कथा वा उपदेशक बदला इन्द्रियानुभवक विखण्डित शब्दचित्र उपस्थित अछि। संस्कृताभास शीर्षक आ लोकप्रयुक्त देह-शब्दक दूरी पाठककेँ रीतिगत पवित्रता तथा भौतिक अनुभूतिक सम्बन्धपर सोचबाक अवसर दैत अछि।

एक-एक पदक स्वतन्त्र पाँती, खाली स्थान आ अर्थक असम्पूर्णता एकर शिल्पक मूल तत्त्व अछि। यौनिक अनुभूतिकेँ एकटा निश्चित नैतिक निर्णयमे बन्द करब पाठक व्यापक सम्भावनाक हानि होएत। मुद्रित पृष्ठक दृश्यविन्यास पढ़ब एतय विशेष आवश्यक अछि।

२७. युद्ध (पृ. ६३)

दू-चारि पाँतीक एहि कवितामे कवि गहीर विभाजन आ अधिकारक प्रश्नकेँ ‘युद्ध’क प्रतिमा द्वारा देखैत छथि। हमरा-हुनका बीच पैघ अन्तर आ खाधि सामान्य समन्वयसँ भराएब कठिन होइत देखाओल गेल अछि। छोट आकारक कारण प्रत्येक पद राजनीतिक निर्णयक भार वहैत अछि।

अधिकार, संघर्ष आ दूरीक रूपक अत्यन्त संक्षिप्त अछि। एतय ‘युद्ध’ सामाजिक टकरावक प्रतीक वा शाब्दिक संघर्ष—दूनू अर्थक सम्भावना रखैत अछि; आलोचनाक कार्य हिंसाक समर्थन मानि लेब नहि, वास्तविक असमानताक दाबकेँ विश्लेषित करब अछि।

२८. अपराजेय (पृ. ६३)

कवि भगवानकेँ सम्बोधित करैत अपन नझुकबाक संकल्प व्यक्त करैत छथि। आस्था, संशय आ आत्मसम्मानक टकराहट ई अल्पाक्षरी कविताक मूल विषय अछि। ईश्वरपर आश्रित होएबाक बदला वक्ता अपन निर्णय आ दृढ़ता पर भरोस करैत छथि।

दृढ़ देहभाषा—सीना तनल रहब—राजनीतिक संघर्षकेँ व्यक्तिगत नैतिक संकल्प बनबैत अछि। संग्रहक व्यापक विद्रोही शब्दावली एतय बहुत कम शब्दमे समाहित अछि।

२९. गतिशीलता (पृ. ६४)

ई छोट कविता अपन पहिचानक बदलैत प्रक्रियाकेँ स्वीकार करैत अछि। ‘आब हम ओ नहि रहलहुँ’क भाव जीवन, अनुभव आ विचारमे परिवर्तनक सूचक अछि। वक्ता अपन नव रूपक अंतिम निर्णय दोसर लोकपर छोड़ैत छथि।

आत्मपरिचयक अनिर्णीत अन्त पाठककेँ सक्रिय सहभागी बना दैत अछि। समूहक घोषणात्मक गीतसभक बीच ई आत्मनिरीक्षणक सूक्ष्म विराम अछि।

३०. वस्तुस्थिति (पृ. ६४)

मिथिलाक सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्यकेँ सिंह, बाघ, कुकुर आ बानरक रूपक द्वारा देखाओल गेल अछि। वास्तविक सामर्थ्य दुर्लभ, छलपूर्ण अनुकरण सर्वत्र; मुदा कवि आशा नहि छोड़ैत छथि जे समय आबिते मुखौटा खसत आ वास्तविक शक्ति फेरि जागत।

पशु-रूपक लोकव्यंग्यकेँ सहज बनबैत अछि। ‘वस्तुस्थिति’ शीर्षकक अर्थ यथार्थक कथन अछि, मुदा अन्त आशावादी भविष्यदृष्टि स्थापित करैत अछि। एकर राजनीतिक अभिप्राय पशुसभक गुण-दोषसँ जोड़ल सांकेतिक संरचनामे निहित अछि।

३१. नपुंसक नेताक नाम (पृ. ६५–६६)

ई शीर्षक नेतृत्वक आत्मसमर्पणपर तीक्ष्ण व्यंग्य अछि। कवि कहैत छथि जे मातृभाषाक लेल संघर्ष करैत शहादत देब वाला नेता अधिक सम्माननीय होइत, बजाय ओकर जे जातीय पहिचानकेँ निजी स्वार्थसँ बेचलनि। मर्दनसुमारीमे आन भाषाक नाम लिखाएब, गरीब लोकक पेटक मूल्यपर व्यक्तिगत लाभ उठाएब आ सांस्कृतिक अवमूल्यनक प्रसंग मुख्य आरोप छथि।

‘हम चाहैत छी’क आवर्तन वास्तविक मृत्यु-कामनाक बदला सार्वजनिक नैतिक जिम्मेदारीक चरम अतिशयोक्ति बनैत अछि। एहन आक्रामक वक्तव्यक शब्दार्थसँ अलग ओकर व्यंग्यार्थ पर विचार आवश्यक अछि। कविता नेता आ लोकक बीच उत्तरदायित्वक प्रश्न उठबैत अछि।

३२. आइ (पृ. ६७–६८)

अतीत बाकसमे बन्द, वर्तमान सड़कपर छिड़िआयल आ भविष्य कुहेसमे लाल किरिन-जकाँ भटकैत—ई कालक तीन बिम्ब कविता केँ दिशा दैत अछि। शहरी आ ग्रामीण भूख, तिजोरीमे बन्द उजास, सरकारी नारा आ प्रशासनक चाटुकारिता समकालीन जीवनक द्वन्द्व बनैत अछि। लोक भोजनक बदला भाषण ‘खाइत’ अछि; मूल्यवृद्धि आ भ्रष्टाचार नागरिक अस्तित्वकेँ संकुचित करैत अछि।

मानवीकरण आ व्यंग्यात्मक रूपान्तरणक प्रयोग विशेष प्रभावी अछि। ‘आइ’ केवल कैलेंडरक दिन नहि, बीतल स्वाधीनता-स्वप्न आ अधूरा भविष्यक बीच अटकल पूरा समय अछि।

३३. अपराध (पृ. ६९–७०)

पुरान घर ढाहि नव सामाजिक मूल्यक स्थापना करब ‘अपराध’ कहल जाइत अछि—कवि एहि उलट न्यायकेँ चुनौती दैत छथि। परम्परागत आचार-संहिता, भाषिक प्रतिष्ठान आ स्वार्थी समीक्षक नव विचारकेँ दमन करैत अछि। नहि झुकबाक साहसक कारण कवि बारम्बार दण्डित होएबाक अनुभव करैत छथि, मुदा रक्तसँ नव बीज अंकुरित होएबाक बिम्ब परिवर्तनक अविनाशी सम्भावना रचैत अछि।

‘अपराध’ शीर्षक व्यंग्यात्मक उलटबाँसी अछि: वास्तविक अन्याय करनिहार प्रतिष्ठित आ ओकर आलोचक अभियुक्त। अलकतरासँ शब्द पोतब आ कएल गेल मृत्यु-दण्डक बिम्ब कलात्मक अभिव्यक्तिक दमनक रूपक अछि।

३४. गिद्ध (पृ. ७१–७२)

गिद्धक रूपक सत्ताक परजीवी स्वभावकेँ चित्रित करैत अछि। लोकक रक्त-मज्जाविहीन देहपर शोषकक भोजन, मूल्यवृद्धि, बाह्य सीमा-संकट आ भीतरी आतंक एके चित्रमे उपस्थित अछि। कवि व्यवस्था द्वारा लोकक गरदनि दबाएबाक परिणामस्वरूप शब्दक बारूद बनि उठबाक सम्भावना देखैत छथि।

पाँखि, मुँह, रक्त आ अस्थिक देहप्रधान बिम्ब सामाजिक अपमानकेँ शारीरिक बनबैत अछि। बांग्लादेशक सन्दर्भ व्यापक उपमहाद्वीपीय राजनीतिक स्मृतिक साक्षी अछि, मुदा कविताक प्रत्येक रूपककेँ कोनो एक ऐतिहासिक घटना सँ एकरेखीय रूपेँ जोड़ब उचित नहि।

३५. मुक्ति-संघर्ष (पृ. ७३–७४)

पूर्वजक बनाओल ढहनाय लागल देवालक नीचाँ पिचायल जनसमुदाय कविताक केन्द्रीय बिम्ब अछि। साझा दुःखक सम्बोधनसँ आरम्भ कऽ कवि राजनीतिक दलाल, समझौतापरस्त वर्ग, भूख आ मुँहक आहार छिनबाक अन्यायपर प्रहार करैत छथि। ‘हमर कविता’ आ ‘हमर शब्द’क उपस्थितिसँ साहित्य समाजक पीड़ाकेँ मात्र लिखैत नहि, ओकर सक्रिय प्रतिवाद करबाक दायित्व स्वीकार करैत अछि।

देवाल, कील, हड्डी, इस्पाती फार आ आगिक बिम्ब दुःखक देहगत तीव्रता बढ़बैत अछि। अन्तमे गरीबीक चर्चा ‘फैशन’ बनि जाएबाक आलोचना साहित्यिक-राजनीतिक पाखण्डकेँ एक संग पहचानैत अछि।

३६. अग्नि-शिखा (पृ. ७५–७६)

शीर्षक-कविता सम्पूर्ण संग्रहक काव्यदृष्टिक संगम अछि। असंख्य छोट-छोट उजासक बीच एकटा अग्नि-शिखा ज्ञानक दम्भ, ईर्ष्या, स्वार्थ आ कुशासनकेँ चीरबाक शक्ति मानल गेल अछि। आधुनिक विज्ञानक ‘अल्ट्रा वायलेट रेज’, शल्य-चिकित्सा आ ‘ऑपरेशन-टेबल’क बिम्ब आगिक प्रचलित धार्मिक प्रतीककेँ नवा वैज्ञानिक रूप दैत अछि। पिता, माय, बहीन, प्रेयसी आ पत्नी सभक प्रतीक्षा संघर्षक घरेलू आ मानवीय मूल्य प्रकट करैत अछि।

सार्वजनिक मंच आ निजी शोकक पारस्परिक कटाव कविताक गहीर संवेदना अछि। अग्नि केवल विनाश नहि; रोगग्रस्त समाजक परीक्षण, मृतप्राय सम्बन्धक उष्मा आ आशाक किरण सेहो अछि। परिवारक आवाजसँ संघर्षकारी नायकक अमूर्त चित्र मानवीय बनैत अछि।

३७. ओकर गाम : ओकर शहर (पृ. ७७–७९)

ई कविता गामसँ शहरधरि भटकैत एक वंचित व्यक्तिक जीवनचरित रचैत अछि। मिथिलाक अनेक गाम, नगर आ महानगरक नाम क्रमसँ आबैत अछि; संगहि खेत, गाछी, पोखरि, पुस्तकालय, मोकदमा, छुआछूत, गरीबी, बेरोजगारी, शहरी शोषण आ पदलोलुपताक सूचि बनैत अछि। ई भूगोलक सूची केवल स्थानपरिचय नहि, श्रम आ अपमानक बिखरल अनुभवक नक्सा अछि।

लघु वाक्य आ विराम-बिन्दुक आवर्तन थाकल जीवनक छिन्नभिन्न गतिशीलता देखबैत अछि। गामकेँ निश्चल स्वर्ग वा शहरकेँ सम्पूर्ण नरक मानबाक बदला दुनू ठामक अलग-अलग कुरीति आ सम्भावना देखाओल गेल अछि। एहि कवितामे सामाजिक यथार्थ स्थान-नामक ठोस विवरणसँ प्रमाणिकता प्राप्त करैत अछि।

३८. समानधर्माक नाम (पृ. ८०–८२)

ई समान वैचारिक धरातलक लोककेँ सम्बोधित राजनीतिक आत्मपरीक्षण अछि। ‘टाइगर ब्राण्ड’क खोल, भाषण दैत सियार, आश्वासनक चक्करमे पड़ल जनसमुदाय आ सेठक तिजोरीसँ कवि सत्ताक छलावरण उघारैत छथि। लोकतंत्र, समाजवाद, न्याय आ गरीबी हटएबाक दावाक सोझाँ वास्तविक आर्थिक असमानता रखल गेल अछि। व्यक्ति ‘भोट’मे सिमटि जाएब नागरिक मर्यादाक संकटक मुख्य संकेत अछि।

सीधा सम्बोधन, प्रहारात्मक उपमा आ आर्थिक शब्दसंग्रह एकर प्रधान शिल्प अछि। ई पाठ आयातित विचारक सर्वथा अस्वीकार नहि, स्थानीय यथार्थ सँ कटि गेल सिद्धान्तक असारता पर प्रश्न करैत अछि।

३९. यमराजक विदेश-यात्रा (पृ. ८३–८५)

यमराजक अनुपस्थितिमे राज्य स्वयं ‘यमपुरी’ बनि गेल अछि—ई व्यंग्यात्मक कथाबीज कविता केँ संचालित करैत अछि। राजधानीक भीड़, सरकारी अधिकारी, सेठक तिजोरी, अकाल, अन्धकार, आतंक, छात्रक क्रोध आ न्यायव्यवस्थाक विफलता सामाजिक मृत्युक दृश्य बनबैत अछि। मिथकीय यमराजक नाम आधुनिक शासनक क्रूरताकेँ चिह्नित करैत अछि; यमराज छथि बाहर, मुदा मृत्यु-तंत्र भीतर सक्रिय अछि।

मिथकक रूपान्तरण, वस्तुक विस्तृत विन्यास आ सरकारी हास्यास्पद आयोजनेक एकर व्यंग्यक प्रमुख स्रोत अछि। आधुनिक उपकरण, आर्थिक संसाधन आ प्राचीन कथा एकेसँग उपस्थित भऽ कऽ विचित्र राजनीतिक यथार्थ रचैत अछि।

४०. गिरगिट (पृ. ८६–८९)

कवि अवसरवादी नेताक रूप, झण्डा, दल, पोशाक आ कथन बदलबाक प्रवृत्तिकेँ गिरगिटक बदलैत रङसँ तुलना करैत छथि। बाह्य शालीनता आ भीतरक शोषणकारी प्रवृत्ति बीच तीक्ष्ण विरोध अछि। प्रशंसा, पुरस्कार, पद, जनसेवा आ विचारधाराक मुखौटासभसेँ सार्वजनिक व्यक्ति अपन स्वार्थकेँ ढाँपैत अछि। एहिमे नेताक संग साहित्यिक प्रतिष्ठानक अवसरवाद पर सेहो प्रहार अछि।

परिवर्तित रंगक लम्बी शृंखला वस्तुतः चरित्रहीनताक बहुरूपिया नाट्य अछि। सौन्दर्यप्रसाधन, विदेशी वस्तु आ धार्मिक-राजनीतिक प्रतीकसभक मेल कविक क्रीड़ात्मक परन्तु कटु भाषा देखबैत अछि। एहि कविताक केन्द्र ‘रूप बदलनाइ’ नहि, मूल्य बदलि स्वार्थ बचेनाइ अछि।

४१. घून लागल वटवृक्ष (पृ. ९०–९४)

‘वटवृक्ष’ पुरान विशाल व्यवस्था, सांस्कृतिक संरक्षण आ सामूहिक आश्रयक परम्परागत प्रतीक अछि। कवि देखबैत छथि जे ओकर भीतर घून लागि गेल अछि: सुविधापरस्ती, रिश्वत, छद्म देशभक्ति, जाति-गोत्रक संरक्षण, पुरस्कारक सिफारिश आ जनक स्वरक उपेक्षा। कविता अनेक चिह्नित खण्डमे बढ़ैत अछि; खण्डान्तरमे सार्वजनिक पाखण्डक अलग-अलग रूप उजागर होइत अछि। सामन्ती स्मृति आ आधुनिक संस्थागत भ्रष्टाचार परस्पर सहायक होइत देखाओल गेल अछि।

रोगग्रस्त वृक्षक रूपक दीर्घ कविता केँ एकसूत्रमे बान्हैत अछि। पुरस्कृत राजहंस, बाघक खोल, कंकालक जुलूस आ संसदक चित्र डर आ मान-प्रतिष्ठाक कृत्रिमताकेँ उघारैत अछि। ‘घून’ भीतरसँ चलैत क्षयक सूचक अछि—बाहरी भव्यतासँ जकरा नुकाएब सहज अछि।

४२. कलकत्ता आ राजकमल (पृ. ९५–१००)

राजकमल चौधरीकेँ केन्द्रमे राखि लिखल ई कविता संस्मरणात्मक श्रद्धाञ्जलि सँ आगाँ बढ़ि एक सर्जनशील विद्रोहीक व्यक्तित्वक पुनर्रचना करैत अछि। कवि राजकमलकेँ नवताक प्रवक्ता, व्यवस्थाक प्रतिपक्षी आ विश्वयुवा पीढ़ीक पक्षधर रूपमे देखैत छथि। कलकत्ताक ट्राम, कालीघाट, बेहाला, देहव्यापार, पूँजी आ शोषणक दृश्य हुनक संघर्षपूर्ण शहरी संसारक रूपमे अबैत अछि। मैथिली-हिन्दीक द्विभाषिक रचनाशीलता आ ‘कंकावती’क सन्दर्भ साहित्यिक अन्तरपाठ रचैत अछि।

कविताक राजकमल एक जीवनीक निर्विवाद तथ्यसमूह नहि, कविक मूल्यांकनसँ निर्मित रचनात्मक व्यक्तित्व अछि। एहि भेदकेँ ध्यानमे रखब शोधक लेल आवश्यक अछि। शहरी यथार्थ, काया आ आगिक घनीभूत भाषा स्वयं राजकमलक आधुनिकतावादी काव्य-जगतक संग संवाद करैत अछि।

४३. अहाँ सँ बहुत किछु कहबाक छल (पृ. १०१–१०२)

दिसम्बरक ठंढा साँझ, बस-स्टॉप, यात्रीक भीड़ आ ‘टू डाउन’क प्रतीक्षा पुरान परिचित मंजरी दासगुप्ताक स्मृति जगा दैत अछि। पूर्व-प्रेम, यौवनक समय, कार्यालयक फाइल, घरक दायित्व आ महँगाइ एकेसँग वर्तमानमे समाहित अछि। प्रेमक भूतकाल केवल मधुर संस्मरण नहि: ओकर मध्यवर्ती जीवन आर्थिक आ पारिवारिक बाध्यतासँ घेरल अछि।

शहरी स्थानक सटीक संकेत आ एक व्यक्तिक प्रत्यक्ष सम्बोधन संग्रहक सामान्यतः समूहकेंद्रित स्वरमे निजी सूक्ष्मता जोड़ैत अछि। समयक प्रवाह, बदलैत रूप-रंग आ स्मृति-संबद्ध दृश्य कविता केँ आत्मकथात्मक स्वर दैत अछि, मुदा ‘हम’केँ कविक जीवनक प्रमाण मानब आवश्यक नहि।

४४. कवितायाः प्रतिवादम् (पृ. १०३–१०४)

एहि कवितामे काव्यसृजनक सामाजिक उत्तरदायित्व मूल प्रश्न अछि। साम्प्रदायिक दंगा, जातिवाद, राजनीतिक हत्या, भूख, शोषण आ आर्थिक असमानताक बीच केवल स्तवन, शोकगीत वा प्रेमपत्र लिखि संतोष पएबाक आग्रहपर कवि आपत्ति करैत छथि। कविता केँ विरोधक नैतिक शक्तिक रूपमे स्थापित कएल गेल अछि; साहित्यकारकेँ अपन पक्ष स्पष्ट करबाक माँग अछि।

संस्कृताभास शीर्षक आ सीधा ‘हे मीत’, ‘कॉमरेड’ सम्बोधन भाषिक स्तरपर द्वन्द्व रचैत अछि। अन्तक प्रश्न सभ—कविताक परिभाषा बदलय कि नहि, आत्मपरीक्षण करय कि नहि—एहि रचनाकेँ एकटा बन्द सिद्धान्त नहि, निरन्तर आलोचनात्मक संवाद बना दैत अछि।

४५. अस्ताचलगामी सूर्यकेँ प्रणाम (पृ. १०५–१०७)

डूबैत सूर्यक चित्र आ व्याप्त अन्हारक बीच कवि संघर्षरत उजासकेँ देखैत छथि। कालसमुद्रमे दीप-जकाँ चमकैत योद्धा, राति, गोली, बम, स्त्रीक आर्तनाद आ पुलिस-व्यवस्थाक निष्फलता समान दृश्यसमूह बनबैत अछि। सूर्य अस्त भऽ रहल अछि, तथापि संघर्ष समाप्त नहि; गाम, कसबा आ शहर भीतर आगि अझुओ धधकि रहल अछि।

प्रकृतिचित्रसँ राजनीतिक दृश्यक अचानक संक्रमण एकर मुख्य रचनाविधि अछि। प्रणाम समर्पणक नहि, निरन्तर संघर्षशील सूर्यक प्रति सम्मानक भाव अछि। कवि लोकक नायक-प्रतीक्षाक व्यर्थतापर प्रश्न करैत वर्तमानकेँ स्वयं जागबाक अवसर मानैत छथि।

४६. कविताश्री पाटलिपुत्रम् (पृ. १०८–१०९)

लोकतंत्रमे सरकारक विरोध करब अपराध घोषित होएबाक विडम्बना कविता केँ आरम्भ दैत अछि। कवि कविता आ विद्रोहक सम्बन्धकेँ तीक्ष्ण रूपेँ परखैत छथि: शब्द जखन जन-आन्दोलन, किसान-मजदूरक सक्रिय सहभागिता आ वास्तविक जीवनक संघर्षसँ कटि जाइत अछि तखन ओ प्रतिष्ठानक सजावट बनि जाइत अछि। ‘विद्रोह’ आ ‘विद्रोहाभास’क भेद ई रचनाक सैद्धान्तिक केन्द्र अछि।

पूर्णविरामक असामान्य बहुलता गद्य, घोषणापत्र आ कविता बीच सीमाकेँ जानि-बूझि धुँधला दैत अछि। खून, हँसू, छूरा, नारा आ फाइलक सूची सामाजिक वर्ग आ राजनीतिक शक्तिक मानचित्र बनैत अछि। कवि साहित्यक राजनीतिक उपयोगितापर जोर दैत छथि, जकर संग कला-स्वायत्तताक प्रश्न सेहो आलोचनामे उठबाक चाही।

४७. चिट्ठीक उतारा (पृ. ११०–११२)

मोहन भारद्वाजकेँ सम्बोधित ई पत्रात्मक कविता साहित्यिक प्रकाशन आ संस्था-व्यवस्थाक आलोचना अछि। नव लेखकक पोथी छापबाक मार्गमे सम्बन्धवाद, गोत्रवाद, पदाधिकार, पुरान विद्वानक प्रभुत्व आ सिफारिशी तंत्र बाधा बनैत अछि। कर्ण, दधीचि, एकलव्य, द्रोणाचार्य, अभिमन्यु आ चक्रव्यूहक मिथकीय दृष्टान्त नव पीढ़ीक संस्थागत संघर्षकेँ उजागर करैत अछि।

‘प्रिय भाइ’क आत्मीय शुरुआत आ अन्तिम संग्रामक भाषा बीच विकसित तनाव विशेष उल्लेखनीय अछि। परम्परागत महाभारतक पात्र आधुनिक प्रकाशन-तंत्रक सत्ता-संबन्धक रूपक बनैत अछि। ई कविता संग्रहक साहित्य-संस्थान विषयक आत्मालोचनाकेँ ठोस रूप दैत अछि।

४८. लोक सुनय लागल अछि आब (पृ. ११३–११४)

लोक आब भाषणक भाषा, शासकक मुस्की आ समाजवादक खोखल दावाकेँ पहचानए लागल अछि—कविताक मुख्य कथन ई अछि। युवा-रक्त, भूखक भट्टी, शतरंजक चाल आ श्मशानक रूपक शासकवर्गक दमनकारी रूप दिखबैत अछि। अन्तमे कवि अपराधी आ शोषकक नियन्त्रणमे रहल देशकेँ अपन देश मानबाक असहमति प्रकट करैत छथि।

‘आब’क आवृत्ति जनचेतनाक बदलैत क्षणकेँ चिह्नित करैत अछि। पदचाप सुनबाक बिम्ब नव सूर्यक आगमनक आशा उत्पन्न करैत अछि। ई कवितामे जनसमुदाय केवल पीड़ित नहि, सत्ता केँ परखए लगल सक्रिय ऐतिहासिक कर्ता अछि।

४९. खबरदार (पृ. ११५)

वैश्वीकरण, भूमण्डलीकरण, विनाशकारी अस्त्र, आतंकवाद आ एक्कैसम शताब्दीक अस्थिरताक परिप्रेक्ष्यमे लिखल ई कविता सामूहिक सावधानीक आह्वान अछि। कथनक स्तरपर राष्ट्र-सुरक्षा, जनशक्ति पर भरोसा आ भेष बदलल विध्वंसकारी प्रवृत्ति सँ रक्षा प्रमुख अछि। कविक नजरि आब मिथिलाक निकटवर्ती प्रश्नसँ निकलि विश्व-व्यवस्थाक संकट धरि पहुँचैत अछि।

विस्फोटक शब्दसमूह आ तीव्र चेतावनी एहि कविताक गतिकेँ संचालित करैत अछि। सुरक्षा-चिन्ताक संग लोकाधारित निर्णयक आग्रह ओकर लोकतांत्रिक सम्भावना अछि। भय पैदा करबाक शब्दावली आ विवेकपूर्ण सावधानीक बीच संतुलन आलोचनात्मक रूपेँ जाँचबाक विषय अछि।

५०. सावधान (पृ. ११६)

ई कविता यथास्थिति, जी-हजूरी आ चापलूसीक विरुद्ध रचनाकारक संकल्प अछि। राजनीतिक डर वा सरकारी शक्तिक सोझाँ चुप रहने साहित्यक दायित्व पूरा नहि होइत। कवि रचनाकेँ प्रक्षेपास्त्र आ भाषाकेँ ब्रह्मास्त्र कहि शब्दक जाग्रतकारी सामर्थ्यक घोषणा करैत छथि।

‘नहि’क पुनरावृत्ति अस्वीकृतिक लय बनबैत अछि। वैचारिक रूपेँ ई पृष्ठ ५९क ‘किकिआइत कुकूरक प्रति बन्दूकसँ खेलाइत’सँ संवाद करैत अछि, मुदा शब्दशः ओकर पुनर्मुद्रण नहि: पछिला कवितामे बदलैत राजनीतिक सन्दर्भ आ ‘मानव-बम’क रूपक जुड़ैत अछि। एहि भेदकेँ पाठमे बचाएब आवश्यक अछि।

५१. होशियार (पृ. ११७)

अराजकता, घोटाला, आतंकी हिंसा, अपराधीकरण आ राज्यसत्ताक संरक्षणप्राप्त दुष्प्रवृत्ति एहि कविताक संकटसूची अछि। कवि देशक माटि-पानि आ लोकक अस्मिता दाँवपर लागल देखैत छथि। सुरक्षा केवल सीमापर नहि, राजनीति आ प्रशासनक नैतिक व्यवहारमे सेहो आवश्यक अछि।

शीर्षक स्वयं एकटा चेतावनीक शब्द। अन्तिम ‘सावधान, होशियार’क संयुक्त उच्चारण पिछला दू कविताकेँ लघु चेतावनी-त्रयी बनबैत अछि। एहि त्रयीमे प्रतिरोधी भाषा, सार्वजनिक सतर्कता आ नागरिक अधिकार परस्पर गुंफल अछि।

५२. देश-दर्शन : बीसम शताब्दीक सीमान्तपर (पृ. ११८–१२२)

ई दीर्घ कविता शताब्दी-अन्तक सामाजिक-राजनीतिक समग्र दृश्यक प्रयास अछि। चारा घोटाला, हवाला, सेंट किट्स, बाजारू माध्यम, उपभोक्तावादी अर्थनीति, इलेक्ट्रॉनिक विज्ञापन, जाति-धर्मक राजनीति आ पर्यावरण-संकट—एहि सभकेँ कवि एक व्यापक मूल्यविघटनक रूपमे जोड़ैत छथि। ‘एक मंचपर’ पश्चिमी लोकप्रिय संस्कृति आ भारतीय शास्त्रीय संगीतक उपस्थितिकेँ सांस्कृतिक मिश्रणक बिम्ब बनाओल गेल अछि।

समाचार-शैलीक विवरण, कथोपकथन आ आक्रोशपूर्ण उपमा रचनाकेँ समकालीन युग-आलेखक स्वर दैत अछि। सांस्कृतिक आदान-प्रदानकेँ केवल पतन मानबाक बजाय कविता जे आर्थिक असमानता, राजनीतिक अवसरवाद आ मीडियाक सम्मोहन देखबैत अछि ताहि कारणक पृथक विवेचन जरूरी अछि। ई बहुस्तरीय पाठक आलोचनात्मक मूल्यांकन अछि।

५३. गुजरातनामा (पृ. १२३–१२४)

‘गुजरातनामा’ साम्प्रदायिक हिंसाक विरुद्ध लिखल गहन प्रतिरोध-कविता अछि। कवि हिंसक भीड़क क्रूरता, स्त्री आ बच्चापर अत्याचार, प्रशासनिक निष्क्रियता आ राजनीतिक विजयोल्लासक अमानवीयता पर क्षोभ व्यक्त करैत छथि। ‘बड़ लाज लगैछ हमरा’क आत्मस्वीकृति पीड़ित लोकक संग समयपर नहि ठाढ़ भऽ सकबाक नैतिक अपराधबोध रूपमे अबैत अछि।

शीर्षक एकटा सार्वजनिक घटना-स्मृतिक काव्यात्मक साक्ष्य बनैत अछि; एहिमे वर्णित आरोपकेँ ऐतिहासिक निष्कर्षक रूपमे उद्धृत करबाक लेल स्वतंत्र दस्तावेजी सत्यापन जरूरी अछि। कविता केँ सर्वप्रथम मानवीय करुणा आ साम्प्रदायिक हिंसा-विरोधक प्रत्यक्ष वक्तव्यक रूपमे पढ़बाक चाही।

५४. चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः (पृ. १२५–१३१)

संस्कृतसूत्ररूप शीर्षक आ वर्तमान धर्म-जाति-सम्प्रदाय आधारित वोट-राजनीतिक चित्र बीच कविता गहीर विरोध रचैत अछि। अपहरण, फिरौती, अपराधीकरण, पुलिस-व्यवस्थाक असफलता, धनबल, जातीय विखण्डन आ बौद्धिक मौनक विस्तृत चित्र देखाओल गेल अछि। धर्मक नामपर चलैत प्रपंचक सोझाँ वास्तविक नैतिक न्यायक प्रश्न प्रमुख होइत अछि। ‘लोकतंत्र’ कहाएतहुँ सर्वहारा जनक निःशब्द होएब कविक मूल चिन्ता अछि।

लम्बा बयान, समाचार-जकाँ विवरण, आक्रोशपूर्ण विशेषण आ विरोधाभासी दृश्य एकर रचनात्मक उपकरण अछि। शीर्षकक शास्त्रीय भाषा आधुनिक सत्ता-व्यवहारक नैतिक शून्यताकेँ परखबाक माप बनैत अछि। उद्धृत संस्कृतसूत्रक दार्शनिक मूल-प्रसंग आ एहि कविताक व्यंग्यार्थकेँ एक नहि मानबाक चाही।

५५. मुक्त भेल बजार (पृ. १३२–१३५)

संग्रहक अन्तिम कविता आर्थिक उदारीकरण आ बाजारवादक सामाजिक प्रभाव पर केन्द्रित अछि। टेलीविजन, फ्रिज, मॉल, बिग बजार, बहुराष्ट्रीय कम्पनी, विज्ञापन आ विदेशी मालक आकर्षणक मध्य देशी उद्योगक संकट, मजदूरक दुरवस्था, वर्गीय विषमता आ मध्यमवर्गक आकांक्षाक चित्र अछि। बजार ‘मुक्त’ होइतहुँ जनजीवन मुक्त नहि—शीर्षकक मुख्य विडम्बना ई अछि।

कवि खरीद-बिक्री, उपभोक्ता-लालसा आ मीडियाक प्रभावक संग जातीय-साम्प्रदायिक विखण्डनक सम्बन्ध देखैत छथि। अन्तिम प्रश्नसभ बाजारवादी व्यवस्थाक विकल्प, सामाजिक संघर्षशीलता आ तर्काधारित परिवर्तनक दिशि पाठककेँ भेजैत अछि। एहन आलोचनाक संग बाजारसँ उत्पन्न नवा अवसरक प्रश्न सेहो शोधक समीक्षात्मक बहसक अंश भऽ सकैत अछि; मूल पाठक पक्ष स्पष्ट रूपेँ शोषित जनसँ जुड़ल अछि।

५. समेकित आलोचनात्मक मूल्यांकन

५.१ संग्रहक विशिष्ट उपलब्धि

‘अग्नि-शिखा’क मूल सफलता ई अछि जे साहित्यिक भाषा समाजक वंचित जनक प्रश्नकेँ केंद्रमे रखैत अछि, आ कविता स्वयं अपन सांस्कृतिक समाजक पक्षपात, निष्क्रियता आ संस्थागत पाखण्डसँ मुठभेड़ करैत अछि। एहि संग्रहमे मैथिली भाषिक अधिकारक दस्तावेज, मिथिलाक भूगोलक जन-इतिहास, राजनीतिक व्यंग्यक प्रखर उदाहरण आ आधुनिक मुक्तछन्दक प्रयोगशाला—चारू रूपमे पढ़ल जा सकैछ।

५.२ अनुभव आ घोषणाक तनाव

कवितामे जखन रौदी, बाढ़ि, मडुआक रोटी, स्कूलक फीस, माँक प्रतीक्षा, बस-स्टॉप आ श्रमिकक देहक ठोस अनुभव उपस्थित अछि तखन पाठ विशेष घनत्व पबैत अछि। जखन एके पाँतीमे अनेक राजनीतिक नारा, अपमानजनक विशेषण वा हिंसात्मक प्रतीक जमा भऽ जाइत अछि तखन कतहु कविता घोषणामुखी भऽ पड़ैत अछि। तथापि ई द्वन्द्व कविक समयबोधक अभिन्न अंश अछि; एकरा नकारि देब नहि, तकर कार्य-कारण समझबाक चाही।

५.३ लोकपक्षधरता आ प्रतिनिधित्वक सीमा

कवि श्रमिक, स्त्री, किसान, छात्र आ वंचित लोकक पक्षमे स्पष्ट उभैत छथि। मुदा सभ पात्र समान रूपेँ अपन स्वरमे नहि बजैत छथि। स्त्रीक देह वा जाति-नामक व्यंग्यात्मक प्रयोग पर आलोचनात्मक जाँच जरूरी अछि जे शोषण-विरोधी भाषा स्वयं कतहु पुरान अपमानक पदावलीक पुनरुत्पादन तऽ नहि करैत। जनवादी साहित्यक गहीर मूल्यांकनमे ई प्रश्न उपेक्षित नहि रहबाक चाही।

५.४ इतिहासक संग पाठक सम्बन्ध

इन्दिराक नाम, संवैधानिक भाषा-आन्दोलन, नक्सलाइट, गुजरातक हिंसा, राजनीतिक घोटाला आ उदारीकरणक प्रसंग संग्रहक ऐतिहासिक महत्त्व बढ़बैत अछि। मुदा कविता इतिहासक मौलिक अभिलेख नहि, इतिहासक अनुभवक कलात्मक पुनर्रचना अछि। घटनाक काल, विधिक स्थिति आ दावासभक सत्यापन लेल सरकारी अभिलेख, स्वतंत्र ऐतिहासिक दस्तावेज आ समकालीन समाचारक अलग अनुसंधान अपेक्षित होएत।

५.५ राजकमल-संवाद आ आधुनिक मैथिली कविता

‘कलकत्ता आ राजकमल’मे राजकमल चौधरीकेँ नवताक पक्षधर आ विद्रोहीक रूपमे प्रस्तुत करब साहित्यिक परम्पराक भीतर संवादक संकेत अछि। राजकमल पर बाह्य आधुनिकतावादी अध्ययन हुनकर बहुभाषिकता आ प्रयोगशीलताकेँ रेखांकित करैत अछि; मुदा ‘अग्नि-शिखा’क कविक राजकमल-विवेचनकेँ एहि अध्ययने स्वतः सिद्ध करैत अछि, एहन दावा नहि कएल जा सकैत अछि। प्राथमिक प्रमाण मल्लिकक अपन कविता थिक।

६. निष्कर्ष

‘अग्नि-शिखा’मे जनपक्षधर कविता मिथिलाक भाषा-आन्दोलन, राजनीतिक असंतोष, जाति-व्यवस्था, भूख, श्रम, स्त्री-अनुभव, सांस्कृतिक पाखण्ड आ बाजारवादी विषमताक एक व्यापक आलोचनात्मक प्रतिमान बनबैत अछि। कविक कविता निर्जीव प्रशंसा अथवा निष्क्रिय सांस्कृतिक गौरवक विरोधमे अछि। ओ अपन लोकवेदक पक्षधर छथि, मुदा ओकर भीतरक यथास्थितिपर सेहो प्रश्न उठबैत छथि। ई द्वंद्व एकर प्रमुख जीवन्तता अछि।

सभ ५५ कविताक पाठसँ स्पष्ट अछि जे एहि संग्रहमे ‘आगि’क वास्तविक अर्थ सदिखन रक्तपात नहि, प्रायः चेतनाक ऊष्मा, आत्मालोचन, अन्यायसँ असहमति आ नवजीवनक संभावना अछि। कविता जतय उपदेशात्मक वा कठोर होइत अछि, ओतहु ओकर मूल चिन्ता जनक मानवीय गरिमा अछि। एहि कारण पुस्तककेँ केवल राजनीतिक नाराक संकलन नहि, आधुनिक मैथिली कवितामे भाषा, सत्ता आ लोकजीवनक संग्रामक बहुआयामी साहित्यिक दस्तावेज मानि पढ़ल जएबाक चाही।

परिशिष्ट : सम्पूर्ण ५५ कविता, मूल पृष्ठ आ अनुक्रमणिकाक क्रम

मूल ‘कविता-क्रम’क ५० प्रविष्टिक अनुरूप क्रम देल गेल अछि। जाहि प्रविष्टिमे दू अलग कविता अछि, तकर संख्या एके मूल प्रविष्टि सँ जोड़ल गेल अछि। एतय अनुक्रमणिकाक संयुक्त शीर्षककेँ अलग-अलग कविता रूपमे देल गेल अछि।

मूल कविता-क्रमक प्रविष्टि ६ (साँझ/मैथिल ललना), ७ (साँप/मास्टर साहेब), ८ (मैथिली आन्दोलन/मिनि गर्ल), २४ (युद्ध/अपराजेय) आ २५ (गतिशीलता/वस्तुस्थिति)मे दू-दू स्वतंत्र कविता अछि।

अध्याय २ • वीरेन्द्र मल्लिकक साहित्य

अथातो काव्य जिज्ञासा

४६ कविताक अध्ययन • प्रकृति, वैश्वीकरण, मातृभाषा आ कविताक आत्मविवेचन

मूल अनुक्रमणिकाक आधार पर पूर्ण कविता-सूची

वीरेन्द्र मल्लिकक एहि संग्रहमे ४६ कविता अछि। कविता-दर-कविता व्याख्याक संग प्रकृति, सामाजिक प्रतिरोध, भाषिक अधिकार आ समकालीन सभ्यताक प्रश्न पर विचार कएल गेल अछि।

समग्र काव्य-संसारक प्रमुख प्रश्न

कविता, जीवन आ नैतिक प्रतिबद्धता

संग्रहक शीर्षक कविता ‘अथातो काव्य जिज्ञासा’मे कविता केवल मनोरंजनक वस्तु वा अलंकारिक चमत्कार नहि, जीवनक लेल आवश्यक संवेदना अछि। खेत, मजदूर, न्याय, शब्द, भाषाक प्राण आ जनजीवनक अभाव कविता लेल वस्तु-क्षेत्र बनैत अछि। ‘कविता बिकबा लए तैयार’ एहि मूल्यबोधक उलट दृश्य अछि: कविता मालक रूपमे बिकबाक भय। ‘वाक्-विमर्श’ आ ‘अथ कविता उवाच’ लेखनक आत्मपरीक्षणक दोसर विस्तार अछि। एहि चारू रचनाकेँ संग पढ़लासँ कविक काव्य-दर्शन स्पष्ट होइत अछि—कविता सामाजिक असत्यक पर्दा हटाबय, मुदा स्वयं बाजारू प्रतिष्ठा वा केवल उपदेशमे विलीन नहि भऽ जाए।

जनतंत्र, सत्ता आ सार्वजनिक भाषाक विडम्बना

‘पटना सँ आयल अछि संवाद’, ‘एलेक्शन! एलेक्शन!’, ‘ओ करत मौज! ओ करत राज!!’, ‘रेल! रेल!!’, ‘नेता-पुराण’, ‘डांस! डेमोक्रेसी डांस!’, ‘विकल्प नहि आर कोनो’ आ ‘घर-बाहर’ सत्ता-संरचना, विज्ञापन, शासन, भ्रष्टाचार आ वंशवादी प्रवृत्तिक बारम्बार परीक्षण करैत अछि। एतय जनतंत्रक शब्द आ जनताक अनुभूति बीचक दूरी प्रमुख तनाव अछि। ध्वन्यात्मक शीर्षक, उद्गार, आवृत्ति आ प्रत्यक्ष सम्बोधन लोकसभाक भाषण, चुनावी नारा आ जनविमर्शक नाटकीयताकेँ कविताक रूपमे मोड़ैत अछि। मुदा शक्ति एकर सीधापनमे अछि तँ जोखिम सेहो एहिमे अछि: कतेको पाँति विचारक उद्घोष बनि जाइत अछि।

बजार, उपभोक्तावाद आ भूमण्डलीकरण

‘शाइन इंडिया’, ‘महानायकक अरण्य-यात्रा’, ‘भाषा ठाढ़ बजार मे’, ‘कविता बिकबा लए तैयार’, ‘बजार’ आ ‘वैश्वीकरण’मे उपभोक्ता समाजक आलोचना केन्द्रीय अछि। विकासक चमकक पाछाँ असमानता, सांस्कृतिक वस्तुकरण, श्रमिकक असुरक्षा आ भाषाक उपयोगितावादी अवमूल्यन देखाओल गेल अछि। बाजारकेँ कवि मात्र खरीद-बिक्रीक स्थान नहि, एहन सामाजिक विवेक-विधान बुझैत छथि जतय मूल्यमापक मनुख नहि, मुनाफा बनि जाइत अछि। ‘शाइन इंडिया’क चमकीला शीर्षक आ कविता-श्रमक जमीन-सापेक्ष दृश्य बीचक टकराव एकर प्रभावकारी तकनीक अछि।

गाम, वन, नदी आ बदलैत पारिस्थितिकी

‘अशोक वृक्ष’, ‘बबूर गाछ’, ‘श्यामा सुन्दरी’, ‘आदिवासीक घर’, ‘धन्य थिक ब्रह्माणी नदीक जल’, ‘एक टा छल गाम हमर’ आ ‘अबंड जकाँ बौंआइत’ प्रकृति-विषयक सामान्य सौन्दर्य वर्णनसँ आगाँ बढ़ैत अछि। कटैत गाछ, रेलक खिड़की, विस्थापित बसाहट, प्रदूषण, जंगलक उन्मूलन, नदीक स्मृति आ अराजक सामूहिक दृश्य मिलि एकटा बदलैत धरतीक दस्तावेज बनैत अछि। लघु दृश्य सँ आरम्भ भऽ किछु कविता सभ विस्तृत सामाजिक आख्यानक रूप लैत अछि। एहि विस्तारसँ प्राकृतिक छवि आ सत्ता-संरचनाक सम्बन्ध पढ़ल जा सकैत अछि।

भाषा, मातृभाषा आ सांस्कृतिक अस्मिता

‘मैथिली बरनी’, ‘मातृभाषा’, ‘भोला बाबू’ आ ‘भाषा ठाढ़ बजार मे’ कहैत अछि जे भाषा केवल संचारक औजार नहि, पीढ़ीक स्मृति आ सामुदायिक आत्मसम्मानक स्थल अछि। अंग्रेजी प्रभुत्व, शिक्षा-नीति, प्रकाशन-प्रतिष्ठा आ भाषायी विकल्पक दबाव कविक चिन्ताक विषय अछि। ‘मैथिली बरनी’क लघु खण्ड सभ अलग-अलग दृश्यसँ प्रादेशिक जीवनबोध रचैत अछि। ‘भोला बाबू’मे व्यक्तित्वक माध्यमसँ मातृभाषाक जनजागरण चिन्हित होइत अछि। एहि काव्य-दृष्टिमे मैथिलीप्रेम राजनीतिक अर्थ ग्रहण करैत अछि, केवल भावुक अनुराग नहि रहैत अछि।

वर्ग, जाति, आदिवासी आ वञ्चित मनुष्य

कवि सामाजिक असमानताकेँ सूक्ष्म निजी पीड़ा आ संरचनात्मक अन्यायक दुनू स्तर पर पढ़बाक आग्रह करैत छथि। ‘आदिवासीक घर’मे प्राकृतिक परिवेश आ अभावक सह-अस्तित्व अछि; ‘बारूदक ढेरी पर कविताक संग खेलाइत’मे वर्ग-चेतना, हिंसा, विस्थापन आ प्रतिरोधक जटिल सम्बन्ध भेटैत अछि। ‘विकल्प नहि आर कोनो’ भूख आ राजनीतिक निष्क्रियताक असह्य परिणाम देखबैत अछि। जँ कवि वञ्चितक पक्षमे बाजैत छथि तँ आलोचककेँ ई सेहो देखबाक चाही जे अनेक स्थाने वञ्चित पात्र स्वयं विस्तृत आवाज नहि पाबि, कविक नैतिक वक्तव्यक अन्तर्गत उपस्थित छथि। एहन प्रश्न कविता-संग्रहक महत्त्व घटबैत नहि, ओकर पाठकेँ आर जिम्मेवार बनबैत अछि।

धर्म, कर्मकाण्ड आ नैतिक विवेक

‘शंकराचार्य’, ‘कर्मकांड’, ‘कालचक्र’ आ ‘आहि रे बा! आहि रे बा!!’मे धर्मसँ अधिक धार्मिक सत्ता, दम्भ, ढोंग आ नैतिक पतनक आलोचना अछि। कवि कर्म आ आचरणक सम्बन्ध खोजैत छथि। ‘कर्मकांड’मे उच्च मानदण्डक अभाव, शिक्षा आ उद्योगक नामपर विसंगति देखाओल गेल अछि; ‘कालचक्र’मे समयक रेखीय प्रगतिवाद पर अविश्वास अछि। एहि पाठमे विश्वासक समस्त रूपक निषेध देखब अनुचित होयत; मूल निशाना धार्मिक प्रतीकक राजनीतिक दुरुपयोग आ मनुष्यक प्रति असंवेदनशीलता अछि।

स्त्री-अनुभव आ सामाजिक विषमता

‘टा-टा! बाइ-बाइ!!’मे आधुनिकता, देह, शिक्षा, स्त्री-सम्मान आ पितृसत्तात्मक दृष्टिक टकराव अछि। ‘धन्य थिक ब्रह्माणी नदीक जल’क जीवंत नदी-कल्पना आ ‘बन्न करू ड्रामा श्रीमान’क स्त्री-असमानताविरोधी हस्तक्षेप विषयकेँ आर फैलाबैत अछि। कविक संवेदना स्त्रीक सम्मानक पक्षमे अछि, मुदा किछु प्रस्तुति स्त्रीकेँ स्वतन्त्र कथावाचकक बदला सामाजिक विमर्शक प्रतीक बना सकैत अछि—ई आलोचनात्मक सावधानी अपरिहार्य अछि।

साहित्यिक स्मृति आ जनकवि-परम्परा

‘कलम सिपाही : राजकमल’, ‘भोला बाबू’, ‘वाक्-विमर्श’ आ शीर्षक कविता साहित्यिक परम्परा-सँ कविक आत्मसंवाद रचैत अछि। राजकमलक रचनाशीलता, भोला बाबूक भाषिक योगदान, पूर्ववर्ती कविताक स्मृति आ समकालीन कविक संकट मिलि आलोचनाक केन्द्र बनैत अछि। शास्त्रीय संकेत ‘अथातो’ आ आधुनिक बोलचालक मिश्रण एहि काव्य-संसारक अपन रूप अछि। कवि काव्य-शिल्पकेँ मानवता आ सामाजिक न्यायसँ अलग कए नहि देखैत छथि।

भाषा-शिल्प : आह्वान, पुनरावृत्ति आ बहुस्तरीय शब्दावली

संग्रहमे मैथिली मूल व्याकरण आ लोक-स्वरक संग संस्कृतनिष्ठ पदावली, हिन्दी सँ आएल राजनीतिक शब्द, अंग्रेजी-प्रेरित शीर्षक (‘आइ-क्यू’, ‘शाइन इंडिया’, ‘इनटॉलरेंस’, ‘डांस! डेमोक्रेसी डांस!’) आ आधुनिक तकनीकी-सामाजिक शब्द भेटैत अछि। ई मिश्रण कोनो साधारण भाषिक विचलन नहि; कविताक सामाजिक संसार स्वयं बहुभाषिक अछि। ‘अछि’, ‘सँ’, ‘केँ’, ‘भऽ’, ‘जकाँ’, ‘ककरो’, ‘मुदा’ जकाँ मैथिली रूप मूल धरातल बनबैत अछि। आवृत्तिपूर्ण पदबन्ध, व्यंग्यात्मक सम्बोधन, खण्डित लय, प्रश्नवाचक वाक्य आ सूचीबद्ध आरोप एक प्रकारक जनमंचीय कविता सृजित करैत अछि। गीतिमय लघु कविता आ विस्तृत मुक्तछन्द दुनू संग-साथ उपस्थित अछि।

अन्तर्विरोध आ कलात्मक उपलब्धि

एहि संग्रहक पैघ गुण ओकर स्पष्ट जनपक्षधरता, समकालीन विषयक साहसिक सामना आ भाषा-प्रकृतिक बीच सहज आवाजाही अछि। लघु प्राकृतिक कविता सभमे संयमित बिम्ब; दीर्घ सामाजिक कविता सभमे वेगवान कथन; आ व्यंग्यात्मक रचनामे नारा-ध्वनि व्यंजित होइत अछि। सीमाक प्रश्न सेहो अछि: बहुधा कवि मुद्दाक नाम सीधे लैत छथि, जाहिसँ पाठकक खोजबाक अवकाश घटि सकैत अछि; ‘बजार’, ‘भ्रष्टाचार’, ‘विकास’, ‘साम्राज्यवाद’ जकाँ पदक अधिक प्रयोग अलग-अलग कविताक स्वरमे साम्यता अनैत अछि। तैयो विविध प्रसंग आ स्वरतत्त्व संग्रहकेँ एकमेव राजनीतिक घोषणापत्र बनबासँ रोकैत अछि।

कविता-दर-कविता आलोचनात्मक अध्ययन

१. अशोक वृक्ष

मूल पृष्ठ : 11 | प्रधान विषय : प्रकृति, दृश्य

कविता डाकबँगलाक आगाँक हरियर परिसर, चमकैत पानि, चहरदेवारी आ ‘स्वीमिंग सूट’ पहिरने युवतीक दृश्यसँ आरम्भ होइत अछि। बीचमे ठाढ़ अशोक वृक्ष प्रकृतिक मूक उपस्थिति अछि। एक ओर साज-सज्जा आ विलासक आधुनिक संसार, दोसर ओर बँचल गाछ—एहि छोट चित्रमे कवीक आँखि सार्वजनिक दृश्यकेँ सामाजिक अर्थसँ भरैत अछि। गाछक नाममे सांस्कृतिक स्मृतिक सूक्ष्म ध्वनि सेहो सुनबा मे अबैत अछि।

लघुता एहि कविताक प्रमुख शिल्प-गुण अछि। ई विस्तृत राजनैतिक कथन नहि करैत, एकटा दृश्य चुनैत अछि। पाठक स्वयं सोचैत छथि जे प्रकृतिक ठाढ़ रहब आ मनुष्यक उपभोगक प्रदर्शनक सम्बन्ध की अछि। संग्रहक आरम्भ एहन संयमित प्राकृतिक बिम्बसँ होएब महत्त्वपूर्ण अछि, कारण आगाँक कवितामे ई प्रकृति बाजार, असमानता आ विनाशक बड़ पैघ प्रसंगसँ जुड़ि जाइत अछि।

२. बबूर गाछ

मूल पृष्ठ : 12 | प्रधान विषय : प्रकृति, जिजीविषा

बबूरक सूखल-रूखल देह, टूटल-पातर डारि, काँट आ कबूतर-नभक बीच बनल दृश्य असहज जीवनशक्तिक बिम्ब अछि। फूल वा फलसँ हीन होइतहुँ गाछ ठाढ़ अछि; ओकर देह पर समयक कठोरता लिखल अछि। कवितामे कतहु पात, कतहु फूल, कतहु किछु चिह्न—सामान्य प्रकृति-दर्शनक बदला संघर्षक स्मृति बनि जाइत अछि।

एहि कविता केँ ‘अशोक वृक्ष’क बगलमे पढ़लासँ हरियरी आ रूखापन, सज्जित परिसर आ उपेक्षित जीवनक विरोध देखाइत अछि। कवि बबूरकेँ केवल कुरूप नहि कहैत छथि; ओकर प्रतिरोधी अस्तित्वक रेखाचित्र बनबैत छथि। वर्णनक संक्षिप्त पाँति आ दृश्य-प्रधान भाषा कविताकेँ संयत करैत अछि।

३. श्यामा सुन्दरी

मूल पृष्ठ : 13 | प्रधान विषय : रेलगति, प्रकृति

रेलक खिड़कीसँ दिसैत कारि-श्याह पहाड़, दूर-पसरल हरियरी, छूटैत गाछ आ बारम्बार बदलैत दृश्य एहि कविताक आधार अछि। ‘श्यामा सुन्दरी’ नाम नव-विवाहिता जकाँ लजाइत-हुलुकैत पहाड़क मानवीकरण बनि जाइत अछि। चलैत रेलक गति आ स्थिर प्राकृतिक वस्तुक बीचक अन्तर सँ एकटा कोमल सौन्दर्य पैदा होइत अछि।

कवितामे आँखिक चलायमान दृश्यांकन महत्त्वपूर्ण अछि। खिड़की प्रकृतिक भीतर पैसब नहि, ओकरा दूरसँ देखबाक चौखट बनैत अछि। ई दूरीक बोध संग्रहक बादुक गाम-विस्थापनक प्रसंगसँ जुड़ैत अछि। लयात्मक आ सहज पाँति सभमे प्रेमिल उपमा अछि, मुदा शीर्षकक सौन्दर्यवादी सम्भावना सामाजिक अन्य विषयक संग राखलासँ कविक अनुभव-क्षेत्रक विविधता प्रकट होइत अछि।

४. आदिवासीक घर

मूल पृष्ठ : 14 | प्रधान विषय : आदिवासी, घर

पहाड़क खोह, स्वच्छ नील आकाश, टुकड़ा-टुकड़ा उजास, दूरक गह्वर, जेठक सुखल पात आ बिजुलीक क्षणिक चमक—एहि संकेतसँ आदिवासी बसाहटक चित्र बनैत अछि। प्रकृतिक नजदीकी आ घरक जर्जरता एकहि दृश्यमे अछि; कवि नैसर्गिक रमणीयताकेँ सम्पूर्ण सुखक पर्याय नहि बनबैत छथि।

कविताक सामाजिक अर्थ ओकर संयमित संरचनामे निहित अछि। अभावक वर्णन करैतहुँ ई लोकजीवनकेँ महज दया-पात्र नहि बनबैत; स्थान, मौसम आ रोजमर्राक अवयव सँ ओकर अस्तित्व देखबैत अछि। आलोचनात्मक दृष्टिसँ ध्यान देबाक विषय ई अछि जे आदिवासी समुदाय अपन वाणीमे एतय विस्तृत नहि बाजैत अछि; कविक दृष्टि बाह्य दृश्य-संवेदनाक माध्यमसँ काज करैत अछि। एही सीमा-सँ ओकर यथार्थवादी तात्पर्यक परीक्षण होइत अछि।

५. पटना सँ आयल अछि संवाद

मूल पृष्ठ : 15–17 | प्रधान विषय : सत्ता, संवाद

आरम्भक कथन—संसारमे मानवीय सहवासक टूटब, वर्ग-चेतनाक क्षरण आ आत्मीय सम्बन्धक स्थानपर स्वार्थक विस्तार—महानगरीय राजनीतिक चेतनाक संकट चिन्हित करैत अछि। पटना नाम मात्र भौगोलिक सूचना नहि, सत्ता आ संवादक केन्द्रक संकेत अछि। कविता धीरे-धीरे निजी जीवनसँ साहित्यिक संसार आ सार्वजनिक संघर्ष दिस बढ़ैत अछि।

लम्बा मुक्तछन्दक एहि रचनामे पुनरावृत्ति, नाटकीय मोड़ आ आरोपात्मक वाक्य प्रयोग भेल अछि। ‘संवाद’क शीर्षक आ संवादहीन समाजक वर्णनक बीच विडम्बना निर्माण होइत अछि। कविक जिज्ञासा ई थिक जे जे समाज अपनेक मनुखकेँ सुनब छोड़ि देत, ओतय कविताक भूमिका की रहि जाएत। लय कतहु भाषणक नजदीक पहुँचैत अछि, मुदा एही भाषणात्मकता रचनाक अस्थिर समयकेँ पकड़ैत अछि।

६. बारूदक ढेरी पर कविताक संग खेलाइत

मूल पृष्ठ : 18–21 | प्रधान विषय : हिंसा, प्रतिरोध

कविताक उद्घाटन आत्म-प्रश्नसँ होइत अछि: हम कोन अपराधक यातना सहि रहल छी, कोन जन्मक अभिशापक भार उठबैत छी, आ कोन सुनसान भूभागमे फँसल छी? आगाँ खेत, जंगल, जाति-वर्गक विभाजन, नगरीकरण आ शोषणक अनेक दृश्य जुड़ैत जाइत अछि। ‘बारूदक ढेरी’ हिंसक समाजक धधकैत आधार अछि; ताहि पर कविता-संग खेलायब जीवित रहबाक नैतिक साहसक संकेत।

एहि दीर्घ रचनामे ‘हम’ एक व्यक्तिमात्र नहि, समाजक दमनित चेतनाक प्रतिनिधि बनि जाइत अछि। प्रकृति, घर, श्रम, अधिकार आ सामाजिक अन्याय आपसमे गाँथल अछि। मुक्तछन्दक लम्बा प्रवाह कविताकेँ आत्मकथन आ जनकथनक संगम बनबैत अछि। आलोकित पक्ष ई जे कविता भयक बीचो आवाज बनेबाक आग्रह करैत अछि; कलात्मक जोखिम ई जे विषयक अधिकता किछु ठाम छवि केँ सूचीमे बदलि दैत अछि।

७. धन्य थिक ब्रह्माणी नदीक जल

मूल पृष्ठ : 22–26 | प्रधान विषय : नदी, पर्यावरण

ब्रह्माणी नदीक जल, पयर डुबायब, हिलकोर, जलक स्पर्श आ नित नूतन अनुभव एहि कविताक अनुभवकेन्द्र अछि। नदी मात्र प्राकृतिक संसाधन नहि; शरीर, स्मृति, तृषा, जीवन-प्रवाह आ स्त्री-पुरुषक पारस्परिक सृजनक प्रतीक बनैत अछि। जलक पवित्रताक अनुभूति कोनो रूढ़ विधिसँ नहि, देह आ संवेदनाक प्रत्यक्ष अनुभूतिसँ उपजैत अछि।

कविता अपेक्षाकृत दीर्घ अछि, जाहिमे जल-गतिशीलताक अनुरूप लहरदार वाक्य-विन्यास भेटैत अछि। नदीक माध्यमसँ कवि प्राकृतिक ऊर्जाक पुनर्जन्मक विचार व्यक्त करैत छथि। ‘अशोक वृक्ष’क छोटे दृश्यक तुलनामे एतय प्रकृति सम्पूर्ण अनुभवक दर्शन बनैत अछि। तैओ सभ रूपककेँ केवल रहस्यवाद न मानि प्राकृतिक जीवनक सामाजिक महत्त्वसँ जोड़ब उचित होयत।

८. एक टा छल गाम हमर

मूल पृष्ठ : 27–32 | प्रधान विषय : गाम, स्मृति

‘एक टा छल गाम हमर’ स्मृतिक मार्मिक उद्घोष अछि। अपन ओ घराड़ी, आम-बकाइन, निमक गाछ, बाबा, मेलाक स्वाद, खेल, लोक-पर्व, पड़ोस आ गामक अनेक दृश्य क्रमशः उपस्थित होइत अछि; तकर विपरीत वर्तमानमे गामक पहिचान, परम्परा आ सामाजिक सम्बन्ध बदलि गेल अछि। ‘छल’ शब्द सम्पूर्ण कविताक काल-चेतना बनैत अछि।

ई मात्र अतीतक मिठासक गुणगान नहि; विनष्ट सामुदायिक जीवनक सामाजिक शोकलेख अछि। जातीय सम्बन्धक तनाव, नवी राजनीतिक व्यवहार, भाषा-संस्कृतिक क्षय आ बदलैत जीवनशैली स्मृतिक पाछाँक कठोर पक्ष देखबैत अछि। लम्बा सूचीविधान कखनो आत्मीय सँघनता अनैत अछि, कखनो पाठक सँ धैर्य माँगैत अछि। तथापि कविता आधुनिक मैथिल गामक सांस्कृतिक अध्ययन लेल महत्त्वपूर्ण पाठ अछि।

९. अबंड जकाँ बौंआइत

मूल पृष्ठ : 33–36 | प्रधान विषय : उत्सव, उपभोक्तावाद

सुसज्जित पंडाल, दुर्गापूजा, अनियंत्रित भीड़, मंच, फैशन, ‘चैलेंज’, ‘डुप्लीकेट’ आ नवउपभोक्तावादी प्रदर्शनक उल्लेखसँ कविता बेचैन भीड़क चित्र रचैत अछि। शीर्षकक ‘अबंड जकाँ बौंआइत’ अनुभव सामाजिक दिशाहीनताक रूपक अछि: लोक चलि रहल अछि, मुदा गति आ उद्देश्यक बन्धन टूटि रहल अछि।

विविध दृश्यक टुकड़ा-टुकड़ा जमावट शहरी उत्सवक कोलाहल केँ अनुकरण करैत अछि। धार्मिक आयोजन, मनोरंजन, मंचीय संस्कृति आ वाणिज्य जखन एकहि दृश्य बनि जाइत अछि तँ कवि मनुष्यक विवेकक स्थान पूछैत छथि। एहि रचनाक एक सफलता ओकर बहुध्वनिक भाषा अछि; सीमा ई जे सांस्कृतिक दृश्य पर कविक असहमति किछु ठाम व्यापक सामाजिक भेदकेँ एकहि दोषमे समेटि दैत अछि।

१०. मैथिली बरनी

मूल पृष्ठ : 37–39 | प्रधान विषय : क्षणचित्र, प्रकृति

ई कविता अनेक क्रमाङ्कित लघु खण्डमे रचल गेल अछि। दीप, करेज, पात, झड़ैत पात, जल, कँकाल गाछ, मौन आ प्रकृतिक बदलैत रूप छोट-छोट दृश्य बनैत अछि। प्रत्येक अंशक आकार क्षणचित्रक जकाँ अछि; अर्थ पूर्ण व्याख्या सँ बेसी संकेत आ विराममे सँचारित होइत अछि।

‘बरनी’ शीर्षक देखैत पाठक अनुभूतिक रंग आ प्रकृतिक विभिन्न छटा दिस आकृष्ट होइत छथि। कविता संग्रहक लम्बा राजनीतिक भाषणात्मक खण्डसँ सर्वथा भिन्न शिल्प प्रस्तुत करैत अछि। अतिसंक्षिप्त पाँति, विरल शब्द आ अनकहल अर्थक कारण एहि रचनाकेँ मुक्तक-समूह वा सूक्ष्म बिम्बक शृङ्खला रूपेँ पढ़ल जा सकैत अछि। एकर प्रयोग संग्रहक अभिव्यक्ति-विविधताक महत्त्वपूर्ण प्रमाण अछि।

११. महानायकक अरण्य-यात्रा

मूल पृष्ठ : 40–43 | प्रधान विषय : राजनीति, पूँजी

लोकतंत्र, गणतंत्र, सरकारी प्रचार, मुद्रा, व्यापार, विदेशी कम्पनी आ पूँजीक महाजाल एही कविताक व्यापक पृष्ठभूमि अछि। ‘महानायक’ शब्दक व्यंग्यार्थ सत्ता द्वारा निर्मित नायक-छविक आलोचना करैत अछि; ‘अरण्य-यात्रा’ कथित प्रगतिक बीच सामाजिक अँधकार, भटकल दिशा आ अनियंत्रित पूँजीक जंगलक अनुभूति जगबैत अछि।

रचना राजनीतिक अर्थतंत्र आ प्रचारतंत्रकेँ एकहि परिदृश्यमे देखैत अछि। समृद्धिक सार्वजनिक घोषणाक बरक्स सामान्य लोकक संसाधन-अभाव आ शासनक कुप्रबन्ध उपस्थित अछि। लम्बा पाँति आ वस्तुनामक जमावटमे व्यंग्यक धार तीख अछि। आलोचनात्मक पठनमे एकर आरोपकेँ ऐतिहासिक आँकड़ाक स्थानापन्न नहि मानल जाय; ई मूलतः सामाजिक अनुभूतिक काव्यात्मक अभियोग अछि।

१२. शाइन इंडिया

मूल पृष्ठ : 44–46 | प्रधान विषय : विकासक व्यंग्य

औद्योगिकीकरण, भूमण्डलीकरण, उपभोक्तावादी बजार, मजदूर, गरीब-गुरबा आ धनाढ्य वर्ग बीचक तीक्ष्ण अन्तर एहि कविताक केन्द्र अछि। चमचमाइत ‘शाइन’क छविक पाछाँ भूख, बेरोजगारी, हानि आ मानवीय विनाश देखाओल गेल अछि। शीर्षकक अंग्रेजीवाला विज्ञापन-स्वर आ कविता भीतरक सामाजिक विषमता प्रतिपक्षी अर्थ बनबैत अछि।

व्यंग्यक मुख्य प्रविधि ‘प्रगति’क प्रचलित भाषाकेँ जनजीवनक ठोस अनुभूतिसँ टकरायब अछि। कवि चमककेँ सम्पूर्ण सत्य नहि मानैत छथि। अर्थशास्त्रीय पदक प्रयोग कवितामे वैचारिक कठोरता अनैत अछि, मुदा मानव-स्वरक नजदीक जे पाँति सभ अछि, ओहि ठाम काव्यात्मक वेदना अधिक तीव्र बनैत अछि। एहि कविताक संग ‘हिसाब-किताब’ आ ‘बजार’ पढ़ब उपयोगी अछि।

१३. शंकराचार्य

मूल पृष्ठ : 47–48 | प्रधान विषय : धर्म, आचरण

सकल देशमे अशान्ति, आर्थिक असुरक्षा, बेरोजगारी, राजनीतिक स्वार्थ आ धर्मक नामपर बढ़ैत उन्मादक पृष्ठभूमिमे ई कविता आध्यात्मिक नेतृत्वक आचरण पर प्रश्न करैत अछि। शीर्षक एक ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पदवीक आवाहन करैत अछि, मुदा वर्णित संसारमे धार्मिक गुरुत्व आ मानवीय उत्तरदायित्व बीच फाँक अछि।

कविक लक्ष्य अन्ध श्रद्धाक राजनीतिक उपयोग आ जनदुखसँ विमुख प्रतिष्ठाक संरचना अछि। शब्द-सूची, प्रश्न आ नैतिक प्रतिवादक प्रयोगसँ कविता धार्मिक अधिकारक सामाजिक परीक्षा लेैत अछि। आलोचनात्मक रूपेँ एकरा समस्त अध्यात्म-विरोधी पाठ मानब जल्दबाजी होयत; मूल प्रश्न ई अछि जे उच्च आदर्शक घोषणा करनिहार समाजक पीड़ा प्रति कतेक उत्तरदायी छथि।

१४. आहि रे बा! आहि रे बा!!

मूल पृष्ठ : 49–50 | प्रधान विषय : लोकव्यंग्य

लोकबोलीक उद्गारसँ रचना आरम्भ होइत अछि। झूठक ढेर, बिखरल सम्बन्ध, जातिवाद, मार्क्सवादक उधार विचार, दुर्गाक प्रतिमा आ सार्वजनिक छलछद्मक उल्लेखसँ कवि चारूकात फइलल विडम्बनाक अनुभव करैत छथि। ‘आहि रे बा’क आवृत्ति विस्मय, क्षोभ आ व्यंग्यक साझा ध्वनि अछि।

एहि कविता मे तर्कक क्रमसँ बेसी आक्रोशक क्रम काज करैत अछि। उद्गार गीतक टेक जकाँ बारम्बार घुरैत अछि आ पाठककेँ लोकमंचीय आवाज सुनबैत अछि। समानान्तर रूपेँ ई प्रश्न उठैत अछि जे धर्म, विचारधारा आ न्याय तीनू जँ नाममात्र रहि जाए, तँ मनुष्यक भरोसा कतय टिकत? कविताक धारक संग ओकर सामान्यीकरणक जोखिम सेहो ध्यान देबाक योग्य अछि।

१५. कर्मकांड

मूल पृष्ठ : 51–52 | प्रधान विषय : धर्म, कर्म

आचरणक ऊँच आदर्श आ वास्तविक व्यवहारक बीचक दूरी कविताक मूल विरोध अछि। शिक्षा, उद्योग, भ्रष्टाचार, शोषण, आतंक, दुराचार आ मानवीय स्वार्थक चित्र धर्म-आचारक चर्चा सँ जुड़ैत अछि। ‘कर्मकांड’ शब्द एतय केवल पूजा-विधानक संकेत नहि, बिना नैतिक फलवाला सामाजिक गतिविधिक आलोचना सेहो अछि।

कविता कारण-परिणामक चक्र पर विचार करैत अछि: कर्मक शिक्षा जँ मात्र खोखला नाम बनि जाए तँ चरित्रक विकास नहि होइत। पाँति सभ प्रत्यक्ष कथनक शैलीमे अछि; बिम्बक अपेक्षा सामाजिक निदान प्रमुख अछि। ‘कालचक्र’क ठीक पहिने एहि कविताक स्थिति महत्त्वपूर्ण अछि, कारण अगिला रचना समय आ कर्मक सम्बन्धक व्यापक प्रश्न उठबैत अछि।

१६. कालचक्र

मूल पृष्ठ : 53–54 | प्रधान विषय : समय, विवेक

कविता भूतक जड़ता छोड़ि वर्तमानक कर्म सँ भविष्य निर्माणक आग्रह करैत अछि, मुदा तत्काल मिथ्या भाग्यवाद, स्वर्ग-नरकक द्वैत आ खोखला तर्कक आलोचना सेहो करैत अछि। समयक गति अन्धविश्वासक विरोधमे प्रमाण बनैत अछि। ‘कालचक्र’क प्रचलित आध्यात्मिक संकेतकेँ कवि तर्क आ सामाजिक क्रियाशीलताक क्षेत्रमे खींचि अनैत छथि।