गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल वृषेश चन्द्र लाल
Videha Issue 451 · Research article continuation 1
१.९. गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल वृषेश चन्द्र लाल
VIDEHA 451 • VIDEHA451 / PROSE 09 • सम्पूर्ण मूल पाठ
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नित नवल वृषेश चन्द्र लाल
लेखक गजेन्द्र ठाकुर
सम्पादक विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका
www.videha.co.in
प्रकाशन-विवरण
नित नवल वृषेश चन्द्र लाल
लेखक: गजेन्द्र ठाकुर सम्पादक: विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका वेबसाइट: www.videha.co.in
© गजेन्द्र ठाकुर/ प्रीति ठाकुर, २०२६
सर्वाधिकार सुरक्षित। लेखकक लिखित अनुमतिक बिना एहि पुस्तकक कोनो अंशक पुनर्मुद्रण वा व्यावसायिक पुनर्प्रकाशन नहि कएल जाए। उद्धरण आ शैक्षिक उपयोग प्रचलित सन्दर्भ-परम्पराक अनुसार कएल जा सकैत अछि।
एहि पुस्तकमे वृषेश चन्द्र लालक साहित्यिक कृतित्व, रूपान्तरण-कर्म आ वैचारिक-सामाजिक सरोकारपर केन्द्रित छह गोट विस्तृत अध्ययन एकत्रित अछि।
विषय-सूची
1. आन्दोलन
वृषेश चन्द्र लालक 'आन्दोलन' कविता संग्रह: समकालीन राजनीतिक चेतना, प्रतिगमन आ लोकतान्त्रिक विमर्शक गहन साहित्यिक-ऐतिहासिक अनुशीलन
प्रस्तावना
साहित्य समाजक दर्पण मात्र नहि, अपितु युगक स्पन्दन, राजनीतिक उथलपुथल आ मानवीय संघर्षक सबसँ प्रामाणिक दस्तावेज होइत अछि। कोनो सेहो कालखण्डक इतिहासकें बुझबाक लेल जतय राजनीतिक आलेख, सरकारी दस्तावेज आ ऐतिहासिक तिथिक्रमक आवश्यकता होइत अछि, ओतहि जनमानसक वास्तविक पीड़ा, आक्रोश आ आशाकें अनुभूत करबाक लेल ओहि कालक साहित्यक अध्ययन अपरिहार्य अछि। मैथिली साहित्यक प्रखर समालोचक डा. राजेन्द्र प्रसाद 'विमल' क शब्दमे, "कविता किंवा साहित्यकें मूक इतिहासक मुखर सहोदर कहल गेल अछि"। एहि व्यापक सन्दर्भमे नेपालक समकालीन राजनीतिक इतिहास—विशेषतः प्रजातान्त्रिक संघर्ष, शाही प्रतिगमन आ जनआन्दोलनक पृष्ठभूमिमे रचित वरिष्ठ राजनेता तथा साहित्यकार वृषेश चन्द्र लालक 'आन्दोलन' नामक मैथिली कविता संग्रह एकटा ऐतिहासिक, वैचारिक आ साहित्यिक माइलखुट्टी (मील-स्तम्भ) मानल जाइत अछि।
सुदामा प्रकाशन, जनकपुरधामसँ प्रकाशित एहि कविता संग्रहक प्रकाशन-मूल्य अत्यन्त सांकेतिक (नेपाली १५ टाका आ भारतीय १० टाका) राखल गेल अछि, जे ई सिद्ध करैत अछि जे एहि पोथीक मुख्य उद्देश्य कोनो व्यावसायिक लाभ नहि, अपितु लोकतान्त्रिक चेतना आ प्रतिगमन-विरोधी सन्देशकेँ जन-जन धरि पहुँचाएब छल। पोथीक समर्पण-पत्र ओहि सम्पूर्ण ज्ञात-अज्ञात शहीद सभ आ महान आत्मा सभक प्रति समर्पित अछि, जे लोकहित आ प्रजातन्त्रक रक्षार्थ अपन प्राणक आहुति देबामे समर्थ भेलाह। ई समर्पण एहि पोथीक क्रान्तिकारी, जनपक्षीय आ बलिदानी चरित्रकें प्रारम्भमे उद्घाटित कऽ दैत अछि।
पोथीक शीर्षक ‘आन्दोलन’ अपनेमे क्रिया, स्थिति आ इतिहास — तीनू अर्थ एक संग खोलैत अछि। ई केवल कोनो एक राजनीतिक कार्यक्रमक नाम नहि, बल्कि जड़ताक विरुद्ध गति, भयक विरुद्ध प्रतिरोध आ सत्ता-केंद्रित समाजक विरुद्ध जन-अधिकारक आग्रह बनि उठैत अछि। संग्रह सुदामा प्रकाशन, जनकपुरधामसँ प्रकाशित अछि। विश्वविद्यालयीय ग्रन्थ-सूचीमे एकर प्रकाशन-वर्ष वि.सं. २०६१ देल अछि, जे २००४–०५ ई.क समयसँ मेल खाइत अछि। एहि समय नेपाल निर्वाचित संसदक विघटन, राजकीय हस्तक्षेप, माओवादी सशस्त्र संघर्ष आ लोकतान्त्रिक दलसभक प्रतिगमन-विरोधी आन्दोलनक बीच गम्भीर राजनीतिक संकटसँ गुजरि रहल छल।
समर्पण-पृष्ठ पोथीक नैतिक स्वर पहिने सँ निश्चित क’ दैत अछि: ई “लोकहितलेल बलिदानक पीड़ा” धारण करनिहार शहीद आ महान आत्मासभ केँ समर्पित अछि। एहि वाक्यक महत्त्व केवल भावुक श्रद्धांजलि धरि सीमित नहि। बादक कवितासभमे कवि बेर-बेर पूछैत छथि जे बलिदानक फल के भोगैत अछि, पीड़ा के झेलैत अछि, नेतृत्वक प्रतिष्ठा के कमबैत अछि, आ जनता कतय अछि। तेँ समर्पण आ ’चलू आन्दोलनमे !’क व्यंग्य एक-दोसरक विरोध नहि, बल्कि एकहि नैतिक प्रश्नक दू छोर अछि: सच्चा बलिदान बनाम बलिदानक राजनीतिक कारोबार।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ‘विमल’क भूमिकामे कविता केँ “इतिहासक मुखर सहोदर” कहबाक विचार अछि, आ संग्रहक प्रत्येक कविता केँ तत्कालीन नेपालक “ओजस्वी दस्तावेज” मानल गेल अछि। मुदा एहि संग्रहक साहित्यिक मूल्य केवल दस्तावेजीकरणमे सीमित नहि अछि। समाचार समाप्त भ’ जाइत अछि, राजनीतिक परिस्थिति बदलि जाइत अछि; कविता तखन टिकैत अछि जखन ओ घटना सँ ऊपर उठि सत्ता, भय, अवसरवाद, भीड़, नायक, जनाधिकार, राष्ट्र आ विकासक स्थायी प्रश्न बनि जाइ। ’आन्दोलन’क श्रेष्ठ कविता ई उन्नयन करैत अछि।
स्रष्टाक व्यक्तित्व, राजनीतिक पृष्ठभूमि एवं साहित्य-साधना
कवि वृषेश चन्द्र लालक জন্ম २९ मार्च १९५५ ई. (२०११ साल चैत्र १६ गते) कें भेल छल। हुनक सम्पूर्ण जीवन नेपालक लोकतान्त्रिक आन्दोलन, सामाजिक न्याय, आ मधेशक अधिकारक निरन्तर संघर्षमे समर्पित रहल अछि। ओ नेपालक लोकतान्त्रिक आन्दोलनक एकटा शीर्षस्थ राजनेता, पूर्व राष्ट्रिय सभा सदस्य (२०१७-२०१९), आ जनकपुर नगरपालिकाक पूर्व प्रमुख (मेयर) रहि चुकल छथि।
हुनक राजनीतिक यात्राक अध्ययन एहि कविता संग्रहकें बुझबाक लेल नितान्त आवश्यक अछि। प्रारम्भमे ओ नेपालक प्रथम जननिर्वाचित प्रधानमन्त्री एवं महान साहित्यकार विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला (बी.पी.) क प्रतिबद्ध राजनीतिक अनुयायी छलाह आ लामो समय धरि नेपाली कांग्रेसक राजनीतिमे सक्रिय रहलाह। बी.पी. कोइरालाक प्रजातान्त्रिक समाजवाद, राष्ट्रिय मेलमिलाप आ मानवीय स्वातन्त्र्यक सिद्धान्त वृषेश चन्द्र लालक वैचारिक चिन्तनक आधार-स्तम्भ रहल अछि। कालान्तरमे, मधेश आन्दोलनक भावनाकें सम्बोधन करबाक हेतु आ राज्यक केन्द्रीकृत मानसिकतासँ मोहभंग भेलाक कारणें, सन् २००७ मे महन्थ ठाकुरक संग नेपाली कांग्रेस परित्याग कऽ ओ तराई मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी (तमलोपा) क स्थापनामे अग्रणी भूमिका निर्वाह केलनि। ओकर बाद लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी (लोसपा) मे महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करैत, अध्यक्ष महन्थ ठाकुरक कार्यशैली आ मधेश आन्दोलनक मर्मक उपेक्षाक विरोधमे ओ पुनः तमलोपा ब्युँताएबक निर्णय केलनि। ई सम्पूर्ण राजनीतिक उतार-चढ़ाव ई प्रमाणित करैत अछि जे वृषेश चन्द्र लाल कोनो वातानुकूलित कक्षमे बैसि कऽ कल्पना करयबला कवि नहि छथि, अपितु सडक, आन्दोलन आ जनताक बीचसँ उठल यथार्थवादी स्रष्टा छथि। जनकपुरक प्रसिद्ध मिथिला नाट्य कला परिषद् (मिनाप) द्वारा महामूर्ख सम्मेलनमे हुनका २०१८ मे 'महामूर्ख' क उपाधिसँ सेहो सम्मानित कएल गेल छल, जे हुनक सामाजिक आ सांस्कृतिक स्वीकार्यताकें दर्शाबैत अछि।
राजनीतिक व्यस्तताक कारणें साहित्य-सृजनक लेल पर्याप्त समय नहि भेटलाक बादो, जतेक रचना ओ प्रस्तुत कएने छथि, से मैथिली साहित्यक लेल अमूल्य निधि अछि। विश्वेश्वरप्रसाद कोइरालाद्वारा लिखित विख्यात मनोवैज्ञानिक उपन्यास 'मोदिआइन'क मैथिली रूपान्तरण, मौलिक कथा संग्रह 'माल्हो', तथा 'संघीयताक सम्बन्धमे' जकाँ वैचारिक पुस्तक हुनक साहित्यिक आ बौद्धिक गहिराइकें प्रमाणित करैत अछि। डा. राजेन्द्र प्रसाद 'विमल' स्पष्ट करैत छथि जे लालक व्यक्तित्व बाल्यकालहिंसँ अत्यन्त भावुक, संवेदनशील, चिन्तनशील, कालद्रष्टा आ प्रखर राजनैतिक चेतनासँ उद्भासित रहल अछि, यद्यपि जीवनक सम्पूर्ण ऊर्जा प्रजातन्त्रक स्थापनामे लगा देबाक कारणें साहित्यक क्षेत्रमे हुनक प्रतिभाक दान नगण्य रूपमे प्राप्त भेल अछि। तथापि, 'आन्दोलन' संग्रहमे विद्यमान भावनाक ज्वार, ओजस्विता, बिम्बात्मकता आ नग्न यथार्थ चित्रण हुनक अदृश्य काव्य-प्रतिभाक अकाट्य प्रमाण थिक।
एहि कारण ‘आन्दोलन’मे राजनीतिक शब्दावली सजावटी नहि लगैत अछि। ’सत्ता’, ‘जनता’, ‘राष्ट्रियता’, ‘गणतन्त्र’, ‘शान्ति’, ‘संघर्ष’, ‘बलिदान’ — ई सभ अमूर्त संज्ञा होइतहुँ कवि ओकरा देह, भूख, लाठी, रक्त, सड़क, अन्हार, नगाड़ा, जाँता-सिलौट, कोठरी आ माटिसँ जोड़ि दैत छथि। राजनीतिक विचारक सफल काव्य-रूपान्तरण तखन होइत अछि जखन विचार दृश्य बनि जाए; लालक श्रेष्ठ पंक्तिसभमे ई गुण प्रबल अछि।
ऐतिहासिक आ राजनीतिक पृष्ठभूमि: शाही प्रतिगमन आ जनआन्दोलन
कोनो सेहो क्रान्तिकारी साहित्यक वास्तविक मूल्यांकन ओकर रचना-कालक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्यक बिना असम्भव अछि। 'आन्दोलन' कविता संग्रहक सिर्जना-गर्भ नेपालक समकालीन इतिहासक सबसँ त्रासद, अस्थिर आ निर्णायक कालखण्ड (वि.सं. २०५९ सँ २०६३) सँ जुड़ल अछि। नेपालमे लोकतान्त्रिक संस्था सभकें योजनाबद्ध रूपसँ नष्ट करबाक जे खेल शुरू भेल, ओकर चरमोत्कर्ष राजा ज्ञानेन्द्रक शाही 'कू' (Coup) छल। जेठ २०५९ (मई २००२) मे तत्कालीन प्रधानमन्त्रीद्वारा प्रतिनिधि सभाक विघटन, तदनन्तर असोज २०५९ (अक्टोबर २००२) मे निर्वाचित प्रधानमन्त्रीकें अपदस्थ करब, आ अन्ततः १९ माघ २०६१ (१ फरवरी २००५) कें राजा ज्ञानेन्द्रद्वारा कएल गेल प्रत्यक्ष शाही तख्तापलट (प्रतिगमन) सँ नेपालक लोकतान्त्रिक प्रणाली पूर्णतः धराशायी भ' गेल छल।
वि.सं. २०६१क नेपाल बुझने बिना ’आन्दोलन’क काव्य-ताप पूर्णतः पकड़ल कठिन अछि। मई २००२ मे संसद भंग भेल; अक्टूबर २००२ मे राजा ज्ञानेन्द्र प्रधानमन्त्री शेरबहादुर देउबा केँ हटाकए कार्यकारी सत्ता अपन हाथमे लेलनि, चुनाव स्थगित रहल, आ निर्वाचित प्रतिनिधित्वक प्रक्रिया अनिश्चित बनल। २००३–०४ धरि राजकीय नियुक्त सरकार, माओवादी हिंसा, सेना-केन्द्रित सुरक्षा-दृष्टि आ नागरिक स्वतन्त्रतापर दबावक मिश्रित संकट छल। अप्रैल २००४ मे पाँच राजनीतिक दलक प्रतिगमन-विरोधी प्रदर्शन पर व्यापक दमनक विवरण मानवाधिकार प्रतिवेदनसभमे भेटैत अछि। एहि राजनीतिक वातावरणक अनुगूँज संग्रहक अन्हार, भूत, बन्दूक, लाठी, ठग, आतंक, रक्त आ प्रतिकारक बिम्बसभमे स्पष्ट अछि।
एहि ऐतिहासिक तथ्यक कारण संग्रह केँ बादक २००७ मधेश आन्दोलन वा २००८ गणतन्त्रक परिणामक रोशनीमे उल्टा पढ़ब उचित नहि। कवि बादमे मधेश राजनीति आ संघीयताक विमर्शमे महत्वपूर्ण सार्वजनिक भूमिका निभौलनि, मुदा ‘आन्दोलन’क मूल क्षण मुख्यतः संसदीय लोकतन्त्रक संकट, राजकीय प्रतिगमन आ राजनीतिक दलसभक विश्वसनीयताक प्रश्नक क्षण अछि। ई काल-सीमा अत्यन्त जरूरी अछि; नहि तँ बादक राजनीतिक परिचय मूल कविताक अर्थपर आरोपित भ’ सकैत अछि।
काल-निर्धारणक प्रसंगमे २०२०क प्रतिनिधिसभा-विघटनसँ एहि संग्रहक प्रत्यक्ष रचना-सन्दर्भ जोड़बाक एक मत सेहो भेटैत अछि; मुदा पोथीक प्रकाशन-वर्ष वि.सं. २०६१ देल रहबाक कारण ई मत संग्रहक प्रकाशन-सन्दर्भसँ मेल नहि खाइत अछि। तैं मूल ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य २००२–०४क संसदीय संकट, राजकीय हस्तक्षेप, माओवादी द्वन्द्व आ प्रतिगमन-विरोधी आन्दोलनक समय मानल अधिक संगत अछि।
एहि कालखण्डमे नेपाल एक दिस राज्यसत्ताक सैन्य दमन आ दोसर दिस माओवादी सशस्त्र द्वन्द्वक भयानक दुश्चक्रमे पिसि रहल छल। नागरिकक मौलिक अधिकार निलम्बित क' देल गेल छल, सञ्चार माध्यमपर कड़ा सेन्सरशिप लगाओल गेल छल, स्वतन्त्र विचार राखयबला पत्रकार आ राजनीतिकर्मी सभकें कारागारमे बन्द कएल जा रहल छल, आ चारू दिस आतंक, हत्या, आ भयक साम्राज्य व्याप्त छल। एहि निरंकुशता आ प्रतिगमनकारी षड्यन्त्रक विरुद्ध सात दलक गठबन्धन (संसदवादी दल), नागरिक समाज आ आम जनता सडकपर उतरि आन्दोलनक शंखनाद केलक, जे अन्ततः ऐतिहासिक दोसर जनआन्दोलन (२०६२/०६३) आ २४० वर्ष पुरान राजतन्त्रक अन्त्य क' नेपालमे लोकतान्त्रिक गणतन्त्रक स्थापनाक मार्ग प्रशस्त केलक।
वृषेश चन्द्र लालक ई कविता संग्रह एही सडकक हुंकार, आन्दोलनकारी चेतना, नागरिकक अदम्य साहस आ निरंकुशताक विरुद्ध एकटा बौद्धिक प्रतिकारक जीवन्त काव्यिक दस्तावेज थिक। जखन संसदवादी शक्तिसभ भाला-गराँस लए दौड़ल प्रतिगमनरूपी मरल गहुमनक सामना क' रहल छल, तखन लालक कलम ओहि संघर्षकें शब्द दैत छल।
डा. राजेन्द्र प्रसाद 'विमल' क भूमिकाक आलोचनात्मक महत्त्व
एहि पोथीकें आओर बेसी प्रामाणिक आ ऐतिहासिक बनाबैत अछि एकर भूमिका, जे मैथिली आ नेपाली साहित्यक मूर्धन्य समालोचक, भाषाविद्, आ प्राध्यापक डा. राजेन्द्र प्रसाद 'विमल' द्वारा लिखल गेल अछि। विमल, जिनकर जन्म २००४ सालमे धनुषाक देवडिहा (खिरखिरिया) मे भेल छल आ जे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालयसँ भाषा विज्ञानमे विद्यावारिधि कएने छथि, समग्र नेपालीय साहित्यमे एकटा गन्यमान्य हस्ताक्षर छथि। ओ नेपाली आ मैथिली दुनू भाषामे समान अधिकारसँ लिखैत छथि आ समाजक विसंगति, मानवीय संवेदना आ राष्ट्रियताक प्रश्नपर प्रखर विचार राखैत छथि।
डा. विमल 'आन्दोलनक आगिसँ बहराएल ई काव्य-कंचन...' शीर्षक सँ अत्यन्त मार्मिक टिप्पणी लिखने छथि। हुनक भूमिकाक किछु प्रमुख स्थापनासभ एहि प्रकार अछि: प्रथम, ओ साहित्यकें मूक इतिहासक मुखर सहोदर मानैत छथि। फूलक प्रत्येक पंखुरी जेना अपन माटि, जल आ प्रकाशक कथा कहैत अछि, तहिना कविता स्रष्टाद्वारा भोगल हास्य-रोदन, रोष आ विक्षोभकें प्रकट करैत अछि। द्वितीय, ओ दाबी करैत छथि जे नेपालीय मैथिली साहित्यमे पहिल बेर एहन कोनो कविता संग्रह आएल अछि जाहिमे प्रत्येक कविता विशुद्ध रूपे समसामयिक राजनीति आ लोकतान्त्रिक संघर्षसँ अभिप्रेरित अछि। ई दाबी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि, कारण मैथिली साहित्य पारम्परिक रूपसँ शृंगार, भक्ति, आ सामाजिक-सांस्कृतिक सुधार (जेना विद्यापतिक परम्परा वा बाल-विवाह विरोध) मे बेसी केन्द्रित रहल अछि। विशुद्ध राजनीतिक-प्रतिरोधी कविताक एहन पूर्ण संगालो विरल छल। तृतीय, डा. विमल लालकें 'कालद्रष्टा' कहैत छथि। एकटा राजनेताक भितर नुकाएल जे सुकोमल मुदा आगो उगलयबला कवि अछि, तकर प्रकटीकरण एहि पोथीमे भेल अछि।
भूमिकाकार तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्यक वर्णन सेहो अत्यन्त आलंकारिक शैलीमे करैत छथि — संसदक विघटनक बाद ‘प्रतिगमनवादी शक्ति फोंफिया रहल अछि — जेना मरल गहुमनमे फेर जान आबि गेल होइक आ फेंच काढ़ि नेने हुअए’, आ ‘संसदवादी शक्तिसभ भाला-गरांस लए दौड़ल अछि, गात्र-गात्रमे बेधैत छैक मुदा ओ डसबाक लेल बेर-बेर लपकैत छैक’। एहि जीवजन्तु-प्रतीकसभ (मरल सांप, गहुमन) क प्रयोगसँ राजनीतिक पुनरुत्थान आ प्रतिशोधक भावकेँ अत्यन्त जीवन्त रूपमे चित्रित कएल गेल अछि, जे स्वयं कविक कविता-शैलीसँ मेल खाइत अछि।
'आन्दोलन' संग्रहक कविता सभक विषयगत, दार्शनिक आ शिल्पगत विवेचना
संग्रहमे कुल १२ टा कालजयी राजनीतिक-वैचारिक कवितासभ संकलित अछि। एहि कविता सभकें मुख्य रूपसँ पाँचटा वृहद् विषयगत खण्डमे विभाजित क' एकर सूक्ष्म आ गहीर विश्लेषण कएल जा सकैत अछि।
१. प्रतिगमनक प्रतीकात्मक चित्रण आ वैचारिक नेतृत्वक आह्वान
संग्रहक पहिल कविता 'आबह न !' (पृ. ७) नेपालक तत्कालीन प्रतिगमनकारी सत्तापर एकटा प्रहारक संगहि अपन वैचारिक गुरु बी.पी. कोइरालाकें कएल गेल भावपूर्ण आह्वान अछि। कवि प्रतिगमनकें 'भूत'क रूपमे चित्रित करैत छथि। मिथिलाक लोककथा सभमे भूत प्रायः पाछाँ दिस घुमल पएरबला आ रक्तपिपासु होइत अछि। कवि एहि लोक-बिम्बकें उत्कृष्ट राजनीतिक बिम्बमे परिणत करैत छथि:
"बी.पी. तोहर गाममे / भूतक प्रवेश भ' गेल छह / जे उनटे चलैत अछि ! / ओकर पएर कहाँदोन पाछाँ घुमल छैक / दाँतसभपर खून एखनो जमल छैक / आ मुहोक छाँह पानिमे मरलहेसन अबैत छैक / आँखि आ' कान पीठदिशि भेलासँ / ओ पछे देखैत अछि, पछे सोचैत अछि !!"।
एतय 'पाछाँ घुमल पएर' आ 'पछे सोचैत अछि' अग्रगामी समाजकें पाछाँ (निरंकुशता आ सामन्तवाद दिस) धकेलबाक राजतान्त्रिक प्रवृत्तिक अचूक प्रतीक थिक। 'दाँतपर खून' राज्य-आतंक आ निर्दोष नागरिकक हत्याक सूचक अछि। कवि चिन्तित छथि जे समाजकें एहि भूतसँ मुक्त करयबला 'भगत' (ओझा) सेहो कतै एहि भूतसँ नहि मिलि जाए, जे अवसरवादी नेता सभक सत्ताक प्रति समर्पण (दरबारसँ मिलि जएबाक प्रवृत्ति) कें व्यंग्य करैत अछि। तैं बी.पी. सन निष्ठावान क्रान्तिकारी दृष्टिक आवश्यकता अछि।
दोसर कविता 'कत्त छी, आउने !' (पृ. ८) मे सेहो एही अन्धकारमय समयमे एकटा सच्चा पथप्रदर्शकक खोज अछि।
"गल्ली-गल्लीमे हतियार नेने / टिकबासभ अछि घुमिरहल / रक्षाक नामपर ठगबासभ / सर्वस्व अछि लुटिरहल"।
राज्य जखन रक्षकसँ भक्षक बनि जाइत अछि आ 'टिकबा' (हतियारबन्द सुरक्षाकर्मी वा विद्रोही) लोककें त्रस्त करैत अछि, तखन समाज कोना दिग्भ्रमित होइत अछि, से एहिमे मार्मिक रूपेँ दर्शाओल गेल अछि। ई संकटकालमे नागरिक असुरक्षाक चरम यथार्थ अछि।
कविता बी.पी.क ऐतिहासिक व्यक्तित्व केँ लगभग ’भगत’क भूमिकामे बोलबैत अछि — भूत भगाबय लेल। एहि ठाम भक्ति आ व्यंग्यक मिश्रण अछि। एक दिस कवि लोकतान्त्रिक आदर्शक नैतिक संरक्षक खोजैत छथि; दोसर दिस वर्तमान राजनीतिक नेतृत्वक अक्षमता स्वतः प्रकट होइत अछि: जँ मृत नेता केँ वापस बोलाबय पड़ि रहल अछि तँ जीवित नेतृत्वक स्थिति की अछि? एहि प्रश्नक उत्तर कविता सीधे नहि दैत अछि, मुदा ओकर नाटकीय संरचना उत्तरसँ बेसी तीक्ष्ण प्रश्न छोड़ैत अछि।
दोसर कविता “कत्त छी, आउने !” लगभग एक छोट राजनीतिक एकालाप अछि। गल्ली-गल्ली हथियार लेने लोक, रक्षा नामपर लूट, मार्गदर्शकक अनुपस्थिति — ई सभ मिलि राज्यक असुरक्षा आ नैतिक अराजकताक दृश्य रचैत अछि। “कनेक्के बाट देखाउने” पंक्ति संग्रहक एक मूल आकांक्षा खोलैत अछि: कविता स्वयं तैयार नक्शा नहि दैत, मुदा रास्ता देखाबयवाला सार्वजनिक विवेक खोजैत अछि। ’रोड-मैप’मे एहि ’बाट’क प्रश्न बादमे विडम्बनापूर्ण रूपेँ फेर आबैत अछि, जतय असली बाटक बदला नक्शा शासन करए लगैत अछि।
२. राज्य-आतंक, खोखला शान्ति आ निरंकुशतापर तीक्ष्ण व्यंग्य
शासक वर्ग जखन बन्दूकक बलपर जनताकें चुप कराबय चाहैत अछि, तखन ओ ओकरा 'शान्ति'क नाम दैत अछि। कविता 'शान्ति चाही मुदा फर्मा बमोजिम' (पृ. ९) मे कवि एहि थोपल गेल 'नेगेटिभ पिस' (Negative Peace) अर्थात श्मशानक शान्तिपर कटाक्ष करैत छथि:
"हे हौ, शान्ति बनाबएबलासभ / फर्माबमोजिम शान्ति बनाबह / ई गोर्खालीसभक देश थीक ! / बिनु झगड़ा, रगड़ा आ' शोक / बिना हतियार, खुखुरी आ' नोंक / एहिठामक जीवनमे जीवन्तता नहि / एतय शान्तिमे हिंसा समटाएक चाही"।
एतय 'गोर्खालीसभक देश' शब्दावलीक माध्यमसँ कवि नेपालक सैन्यवादी आ एकल-जातीय अहङ्कार सँ ग्रसित राज्य-संरचनापर गहीर चोट करैत छथि। नेपालक केन्द्रीकृत सत्ता सधिखन शक्ति प्रदर्शनमे विश्वास कएलक अछि। शासकक शान्ति सेहो 'फर्मा बमोजिम' (पूर्वनिर्धारित साँचामे ढालल) होइत अछि, जाहिमे हिंसा अनिवार्य अछि। ई पंक्ति मधेशी आ सीमान्तकृत समुदायक ओहि विक्षोभकें सेहो स्वर दैत अछि, जकरा सत्ता सधिखन शंकाक दृष्टिसँ देखैत रहल अछि।
संग्रहक सर्वाधिक तीक्ष्ण, प्रखर आ व्यंग्यात्मक कविता 'दुर्रर्र बकलेल !' (पृ. १०-१२) थिक, जाहिमे शासकक सर्वग्रासी लोभ, पाखण्ड आ जनताक दमनक यथार्थ चारि खण्डमे चित्रित अछि। शासक वर्ग शान्ति, क्रान्ति, त्याग, नियम, स्वर्ग—सभ किछु चाहैत अछि, मुदा मात्र अपन लेल:
"श्रम चाही, संघर्ष चाही / त्याग आ' उत्सर्ग चाही / सभसँ नीक अर्घ चाही / पृथ्वीयोपर स्वर्ग चाही / की नै चाही ? सभ किछु चाही / तैं कि तोरा लेल ? / दुर्रर्र बकलेल ! / चाही तsssss / मुदा हमरालेल !!"।
एकर दोसर खण्डमे शासक जनताकें चुप रहबाक आदेश दैत अछि: "हम बजैत छी शान्त रह / खेल खेलैत छी शान्त रह / खूब पेलैत छी शान्त रह... / भूखल सुतैत छें शान्त रह / काहि कटैत शान्त रह / सोझे मरैत छें शान्त रह / यएह तँ असली शान्ति भेल"। ई सामन्ती व्यवस्थाक चरम अमानवीयताक पर्दाफाश करैत अछि जतय जनताक मृत्यु सेहो मौन रहबाक चाही जाहिसँ शासकक तथाकथित 'शान्ति' भङ्ग नहि हुअए।
तेसर खण्डमे शासकक दम्भ देखू: "राज्य छी हमहीं हमरे कहाबओ / सभ रैती अछि एम्हरे लाबओ"। ई फ्रान्सक सम्राट लुई चौदहवाँक 'L'état, c'est moi' (हमहीं राज्य छी) सन सामन्ती अहंकारक नग्न रूप अछि जे जनताकें नागरिक नहि, मात्र रैती (दास/रैयत) बुझैत अछि। ई कविता निरंकुशताक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण थिक।
“ई गोर्खालीसभक देश थीक” जेकाँ पंक्ति केँ शाब्दिक जातीय निष्कर्षक रूपमे पढ़ब उचित नहि। सम्पूर्ण कविताक स्वर अतिशयोक्तिपूर्ण व्यंग्यक अछि: हिंसाक परम्परा केँ स्वभाव मानि शान्तिमे सेहो हिंसा फिट करबाक तर्कक उपहास होइत अछि। कविता असलमे एहि मानसिकताक आलोचना करैत अछि जे जीवन्तता, उत्सव, वीरता वा राष्ट्रक नामपर हिंसा केँ सामान्य आ आवश्यक मानि लैत अछि।
कविताक दोसर खण्डमे “हम बजैत छी शान्त रह”, “हम खाइत छी शान्त रह”, “भूखल सुतैत छें शान्त रह” जेकाँ वाक्य अधिकारवादी शासनक संवादहीन आदेश केँ पकड़ैत अछि। ई साधारण वाक्य शिल्पतः अत्यन्त प्रभावी अछि, कारण सत्ता अपन विचारधारा लम्बा भाषणमे नहि, दैनन्दिन आदेशमे प्रकट करैत अछि। तेसर खण्ड “हम सोची से जनता बाजओ” प्रतिनिधित्वक उल्टा रूप देखबैत अछि: जनता स्वयं नहि सोचत, शासक जे सोचत ओही केँ जनता बाजत। एतय कवि लोकतन्त्रक नकली संस्करण — जनताक नामपर नेतृत्वक आत्म-प्रतिध्वनि — पर वार करैत छथि।
पाँचम खण्डमे कवि जातीय-साम्प्रदायिक राजनीतिकेँ लक्ष्य बनबैत छथि — ‘के छह हिन्दू चौर डोलाबह, जौं छह बौद्ध तँ सम्यक कराबह... जौं मुगुरालि त पगड़ी बढ़ाबह’ — जाहिमे धर्म-सम्प्रदायक नामपर वोट-बैंक राजनीतिपर तीखा टिप्पणी अछि। ई कविता समग्रतामे नेपाली राजनीतिक वर्गक अवसरवादपर एकटा सम्पूर्ण चित्रात्मक अभियोग-पत्र बनि जाइत अछि।
८. ‘ई आन्दोलन देखा देत’: इतिहासक दिशा आ प्रतिगमनक विरोध
एहि कवितामे आन्दोलन इतिहासक अग्रगामी बल अछि। “काल तँ आगाँ ने बढ़तैक यौ” पंक्ति कविक काल-दृष्टि स्पष्ट करैत अछि: समयक स्वाभाविक दिशा आगू अछि, प्रतिगमन काल-विरुद्ध चेष्टा अछि। “पछमुँड़ियाक” बिम्ब ओहि शक्तिक लेल अछि जे इतिहासक दिशा उलटब चाहैत अछि। आन्दोलन ओकरा “सोझे मेटा देत” — ई भाषा ललकारपूर्ण अछि, मुदा कविता केवल दमनक प्रतिदमन नहि, भय-आतंक पर आधारित सत्ताक ऐतिहासिक अस्थायित्वक घोषणा करैत अछि।
एकर सीमा सेहो एतय देखाइत अछि। इतिहास सदा रेखीय रूपेँ आगाँ नहि बढ़ैत; लोकतान्त्रिक उपलब्धि उलटियो सकैत अछि। मुदा काव्यक राजनीतिक क्षणमे ई विश्वास रणनीतिक ऊर्जा बनैत अछि। आन्दोलनी कविता अक्सर तथ्यात्मक भविष्यवाणी नहि, सामूहिक साहसक निर्माण करैत अछि। एहि दृष्टि सँ “देखा देत” भविष्यकाल भाषिक प्रतिरोधक औजार अछि।
३. आन्दोलनक आह्वान आ नेतृत्वक अवसरवादितापर आत्मनिरीक्षण
कवि मात्र सत्ताक अन्ध-आलोचक नहि छथि, ओ आन्दोलनक भितरका अवसरवादिता, पाखण्ड आ नेतृत्वक विफलताकें सेहो सूक्ष्म दृष्टिसँ देखैत छथि। राजनीतिक दलक नेता होइबाक कारणें लालकें राजनीतिकर्मीक दोहरी चरित्रक गहीर ज्ञान अछि। 'चलू आन्दोलनमे !' (पृ. १४-१६) कवितामे ओ जनताकें आन्दोलनमे आबक आह्वान तँ करैत छथि, मुदा संगहि नेता सभक स्वार्थपर कड़ा आत्मनिरीक्षण सेहो करैत छथि:
"आहाँक त्याग अछि / हिनकर लगानी छन्हि / आहाँ बलिदानी छी / हिनकर फुटानी छन्हि / आहाँक भिक्षाटन अछि / तऽ एतए कारदानी छन्हि / मारि आहाँ खएने हएब / मुदा हिनकामे मर्दानी छन्हि"।
ई पद्य पंक्ति क्रान्तिक कटु सत्य थिक। आन्दोलनमे आम जनता, गरीब आ सीमान्तकृत वर्ग रक्त बहाबैत अछि, मुदा तकर लाभांश अवसरवादी नेता सभ 'लगानी'क रूपमे वसूल करैत छथि। जनता मरि कऽ सेहो किछु नहि पबैत अछि, आ नेता बिना किछु कएने 'मर्दानी' देखाबैत छथि। "रक्तबीजक जीन आ' लाज भेल लोप छन्हि" कहिकए कवि स्पष्ट करैत छथि जे एक निरंकुश शासककें हटेलाक बादो ओकरे सन प्रवृत्ति भेल दोसर शासक (रक्तबीज दानव जकाँ) जन्म लऽ लैत अछि। ई कविता वृषेश चन्द्र लालक अपन मोहभंगकें सेहो दर्शाबैत अछि, जे कालान्तरमे हुनका परम्परागत पार्टी (नेपाली कांग्रेस) छोड़ि नव विकल्प (तमलोपा) दिस प्रवृत्त केलक।
अत्याचारी सत्ताक प्रतिकार लेल 'देर छैक अन्हेर नहि !' (पृ. १७-१८) मे कवि 'बाघक छाल ओढ़ने गीदड़' (कायर मुदा क्रूर शासक) सँ नहि डराबक सन्देश दैत छथि। "बज्रसन मुठि अछि / बान्हि कसि प्रहार करु" कहिकए जनताक सुप्त शक्तिमे विश्वास जगाबैत छथि।
शीर्षक सुनिते पहिने ई सामान्य आह्वान लगैत अछि; ध्रुवपद “जिन्दाबाद मुर्दाबाद करए / चलू आन्दोलनमे !” आन्दोलनक परिचित ध्वनि जगबैत अछि। मुदा खण्ड दर खण्ड कविता नारा केँ उलटि ओकर भीतरक विडम्बना खोलैत अछि। वांछित केँ मँगाबय, अवांछित केँ भगाबय, पीड़ित केँ जगाबय आ पीड़क केँ हड़काबयक आदर्श आरम्भमे अछि; तुरन्त बाद बलिदान, शहीदी, स्वर्ग, मान-सम्मान आ नेतृत्वक प्रतिष्ठाक अर्थशास्त्र प्रश्न बनि उठैत अछि।
जाति, कँखचप्पी, अपराधीक समर्थन, रक्तबीज, नेतृत्व-लालसा — कविता आन्दोलनक भीतरक विकृतिसभ केँ बाहरक शत्रुसँ कम खतरनाक नहि मानैत अछि। अन्तिम खण्डमे “आन्दोलन बिनु आहाँ जी नहि सकब / हिनकर जीवने आन्दोलनमे छन्हि” पेशेवर आन्दोलनकारी नेतृत्व पर प्रहार अछि। जनता आगाँ, नेता पाछाँसँ ठेलैत; अन्ततः “फेरसँ नेते बनताह”। एहि व्यंग्यक कारण ‘आन्दोलन’ संग्रह आत्ममुग्ध प्रतिरोध-काव्य नहि रहैत, आत्म-परीक्षणक क्षमता अर्जित करैत अछि।
शीर्षक लोक-प्रचलित आश्वासनक पुनर्संयोजन अछि: देर हो सकैत अछि, न्याय पूर्णतः नष्ट नहि। कविता “वारपर प्रतिकार करू” कहैत अछि। एतय प्रश्न उठैत अछि — की ई हिंसक प्रतिहिंसाक समर्थन अछि? सम्पूर्ण संग्रह देखला पर उत्तर सरल ‘हाँ’ नहि। कविक भाषा प्रतिरोधक अछि, मुदा ओ शान्तिक नामपर हिंसा, बन्दूकक निर्दोष हत्या आ बलिदानक व्यापारक आलोचक सेहो छथि। “प्रतिकार” केँ एतय अधीनता छोड़ि अधिकार धारण करबाक राजनीतिक अर्थमे पढ़ब अधिक संगत अछि।
“सहस्र कण्ठ” आ “वज्रसन मुठ्ठी” जेकाँ बिम्ब सामूहिकता उत्पन्न करैत अछि। व्यक्तिगत वीर-नायकक बदला हजार कण्ठक आवाज़ महत्त्वपूर्ण अछि। एहि बिन्दुपर संग्रहक लोकतान्त्रिक संवेदना स्पष्ट अछि: परिवर्तनक नैतिक आधार जनसमूह अछि, एकल उद्धारक नहि — यद्यपि पहिल कविता बी.पी. केँ प्रतीकात्मक उद्धारकक रूपमे बोलबैत अछि। ई आन्तरिक तनाव संग्रह केँ रोचक बनबैत अछि।
त्याग करू बलिदान करू
ई आहाँक धर्म थिक
मानवक जीवनकेर
यएह तँ लक्ष्य आ मर्म थिक
४. खोखली राष्ट्रीयता आ विदेशी हस्तक्षेपपर दार्शनिक विमर्श
राजनीतिक आन्दोलनक परिप्रेक्ष्यमे राष्ट्रीयताक परिभाषा सधिखन विवादित रहल अछि। मधेशक भूमिसँ उठल कवि वृषेश चन्द्र लाल, जे संघीयता आ मधेशी पहिचानक मुखर वकिल छथि, 'हाय, हमर राष्ट्रीयता !' (पृ. १९-२१) कवितामे नेपालक कातर, भयभीत, कृत्रिम आ सङ्कीर्ण राष्ट्रीयतापर दार्शनिक प्रश्न ठाढ़ करैत छथि।
"सात रङ्ग समेटिकए / चमकल ई सूर्य अछि / अनेक होइछ एक तखन / गमकैत अपूर्व अछि / तों मुदा एक छाड़ि / देखि दू खरा जाइत छह / फुला अनेरे मुह अपन / कन्दरामे नुका जाइत छह / तों कतए भसिया जाइत छह"।
ई कविता राज्यद्वारा थोपल गेल ओहि 'एकल-पहिचान' (महेन्द्रीय राष्ट्रवाद) बला राष्ट्रवादपर प्रहार अछि जे देशक भाषिक, सांस्कृतिक आ जातीय विविधतासँ डरा जाइत अछि। सन्तुलित राष्ट्रीयता सात रङ्ग (इन्द्रेणी) सन अनेकतामे एकता सँ बनैत अछि, मुदा नेपालक पारम्परिक राष्ट्रीयता विविधता देखिते कन्दरामे नुका जाइत अछि, आ "माटिमे लेढ़ा जाइत छह"। ई मधेश आन्दोलनक बौद्धिक बीजारोपण सेहो थिक।
तहिना, 'रोड-म्याप' (पृ. २२-२३) कवितामे विदेशी शक्तिक मध्यस्थता, महल-केन्द्रित कागजी शान्ति-प्रक्रिया आ एन.जी.ओ. मार्का समाधानक उपहास उड़ायल गेल अछि। विदेशी सभक बनाएल 'रोड-म्याप' मे देशक वास्तविक समस्याक लेल कोनो स्थान नहि अछि। कवि व्यंग्य करैत छथि जे एहि रोड-म्याप सँ देशक प्रगति तँ नहि हएत, मुदा "देशे रोडपर घुसकतैक / आब देशे रोडपर घुसकतैक !" अर्थात देश स्वयं सडकपर आबि जएतैक, भिखमंगा वा घरबारविहीन भ' जएतैक।
चार खण्डक ई कविता संग्रहक वैचारिक रूपेँ सर्वाधिक परिपक्व रचनासभमे सँ एक अछि। कवि राष्ट्रियता केँ स्वतः पवित्र मूल्य मानि नहि चलैत छथि; ओ ओकर व्यवहार देखैत छथि। जड़ छोड़ि मूल खोजब, बात बिना तमसाब, अक्षर कोरला पर डरब, सभकेँ जोड़बाक बदला एकहि सँ लोटाब — एहि बिम्बसभमे असुरक्षित, भय-उत्पादक, एकरूपतावादी राष्ट्रियताक चित्र अछि।
ई पंक्तिसभ राष्ट्रक बहुलतावादी सौन्दर्यशास्त्र रचैत अछि। सात रंग अलग रहिते इन्द्रधनुष बनैत अछि; एकरूपता रंगक विलोपन नहि, सह-अस्तित्वक संयोजन अछि। “तँ मुदा एक छाड़ि / देखि दू खरा जाइत छह” संकीर्ण राष्ट्रियताक बीमारी अछि — बहुलता देखिते ओकरा विभाजन नजरि पड़ैत अछि। एतय लालक काव्य राजनीतिक बहुलतावादक समर्थक बनि उठैत अछि। बादक संघीयता-विमर्शक आलोकमे ई पंक्ति रोचक लगि सकैत अछि, मुदा मूल कविता केँ ओकर २००४क प्रसंगमे पढ़ल अधिक ऐतिहासिक रूपेँ उचित अछि।
कविताक ध्रुवपद “सभ उड़ैछ अन्तरिक्षमे / तँ माटिमे लेढ़ा जाइत छह” आधुनिकता आ संकीर्णता बीच तीक्ष्ण विरोध रचैत अछि। दुनिया आगे बढ़ि रहल अछि, मुदा राष्ट्रियता माटिमे लोटि रहल अछि — माटि एतय मातृभूमिक पवित्रता नहि, जड़ता आ आत्म-संकुचनक बिम्ब बनि जाइत अछि। एकहि शब्दक अर्थ बदलि देबाक ई काव्य-कौशल उल्लेखनीय अछि।
‘रोड-मैप’ राजनीतिक-प्रशासनिक अंग्रेजी शब्दक मैथिली व्यंग्यात्मक पुनर्रचना अछि। गामक ‘बतहा’ एकटा नक्शा किनि आनैत अछि; कहैत अछि, एहिमे रोड जाल जकाँ बिछाएल अछि। धीरे-धीरे असली देश, लोक आ पीढ़ी नक्शाक अधीन भ’ जाइत अछि। ध्रुवपद — “देशमे नइ रहतैक रोड / देशे रोडपर घुसकतैक” — विकास-योजनाक उलटबाँसीक उत्कृष्ट उदाहरण अछि। साधन देशक सेवा करबाक बदला देश साधनक भीतर घुसि रहल अछि।
“विदेशीसभ बड़का-बड़का रोड बनओलक” आ ओकरासँ बड़का “मैप” चमकओलक — एहि कथनमे बाहरी सहायता, परियोजना, नीतिगत नक्सा आ सार्वभौमिकताक प्रश्न एक संग उठैत अछि। कविता विदेश-विरोधी सरल राष्ट्रवाद नहि रचैत; असली आलोचना नक्सा-निर्भर शासनक अछि, जतय स्थानीय जीवनक जटिलता कागजी मार्गक अधीन भ’ जाइत अछि। ‘बतहा’ पात्रक प्रयोग व्यंग्य केँ लोक-नाटकीय सहजता दैत अछि।
५. गणतन्त्रक उद्घोष आ क्रान्तिकारी आशावाद
संग्रहक वैचारिक उत्कर्ष 'हँ, हँ लोककै गणतन्त्र चाही !' (पृ. २४) मे प्रकट होइत अछि। ई कविता केवल शासन-सुधारक वा मन्त्री बदलबाक मांग नहि, अपितु सम्पूर्ण सामन्ती ढाँचाकें उखाड़ि फेंकबाक आ गणतन्त्र (Republic) स्थापनाक प्रखर घोषणा अछि:
"हँ, हँ ई लड़ाई सत्ताके छैक / रोटी, देहरि आ' लत्ताके छैक / लोक नइ छैक बपौती ककरो / ठीके ई लड़ाई जनसत्ताके छैक... / नगाड़ा पिटि आब जोरसँ डड्का बजाओत जनता / हँ, हँ रावणक लड्का सुड्डाह क' जराओत जनता !!"।
एतय 'रावणक लंका' सामन्ती राजतन्त्रक प्रतीक थिक, जकरा आम जनता जराबए लेल तयार अछि। लोकतन्त्रमे देश ककरो बपौती (निजी सम्पत्ति) नहि होइत अछि, आ ई कविता ओही जनसत्ताक वकालत करैत अछि।
अन्ततः, 'काल मड़ड़ाइत छैक !' (पृ. २५) आ 'इजोतदिसि ससरत !' (पृ. २६) कविता सभमे अत्याचारी शासकक पतनक सुनिश्चितता आ लोकतन्त्रक भोरक आशावाद प्रतिध्वनित अछि। शासक "अपने जालमे फँसल अछि" आ "खूनल अपने खाधिमे खसि तमसाइत छैक"। जतेक बन्दूक गरजे, क्रान्तिक रंगकें नहि रोकि सकैत अछि:
"बन्दूक आइयो गर्जेत अछि / बन्दूक काल्हियो गर्जत / नहि जानि कतेक निरीह आ' निर्दोषपर / भोथहा कुरहरि बजरत / मुदा तैयो होरीमे रङ्ग बरिसते रहतैक / आ' उमङ्ग एकर आओरो पसरत / एखुनका जे अन्हार दिन अछि / अबस्से इजोतदिशि ससरत !"।
एहि कविता मे संग्रहक राजनीतिक लक्ष्य सर्वाधिक स्पष्ट अछि: लड़ाई सत्ता लेल अछि, मुदा सत्ता केकर? उत्तर — जनसत्ता। “लोक नइ छैक बपौती ककरो” आधुनिक नागरिकताक मूल घोषणा अछि। जनता दया वा भीखक पात्र नहि; ओ अधिकारक धारक अछि। “लठैतक लाठी बहुत सहलक ई / अपन ठेङ्गे सही मुदा उठाओत जनता” पंक्ति निर्भरता छोड़ि आत्मबलक रूपक बनैत अछि।
दोसर खण्डमे “अपने यन्त्र”, “अपन पूरा स्वतन्त्र”, “ककरो रैती नइ बनत”, “समता मात्र समताक मन्त्र” — ई चार सूत्र गणतन्त्र केँ केवल राजतन्त्र-विरोध नहि, नागरिक स्वामित्व, स्वतन्त्रता, गैर-रैयतीकरण आ समताक कार्यक्रम बनबैत अछि। एहि कारण कविता ‘गणतन्त्र’ शब्दक संस्थागत अर्थसँ आगे सामाजिक लोकतन्त्रक अर्थ ग्रहण करैत अछि।
अन्तिम दू कविता संग्रहक भाव-यात्रा पूर्ण करैत अछि। “काल मड़ड़ाइत छैक”मे इतिहास लगभग आकाशमे घुमैत बाज जकाँ अछि; मुदा चारूभर जनताक झण्डा फहराइत अछि। शोषक अपने खोदल खाधिमे खसल, अपने जालमे फँसल — कर्मफल-सदृश राजनीतिक बिम्ब अछि। “नष्ट हएत समूल” घोषणा आन्दोलनी ओजक चरम रूप अछि।
मुदा अन्तिम कविता आशा केँ अधिक जटिल ढंगसँ रचैत अछि। “बन्दूक आइयो गर्जैत अछि / बन्दूक काल्हियो गर्जत” — कवि भविष्य केँ झूठी शान्तिसँ सजाबैत नहि छथि। निर्दोष पर प्रहार जारी रहत; तथापि होरीमे रंग बरिसत, उमंग पसरत, अन्हार दिन “इजोतदिसि ससरत”। ई बहुत महत्त्वपूर्ण अन्त अछि: आशा हिंसाक अनुपस्थिति नहि, हिंसाक बीच जीवनक अविरत पुनरुत्पादन अछि। एहि कारण अन्तिम स्वर नारा सँ अधिक मानवीय बनि उठैत अछि।
काव्यगत शिल्प, बिम्बविधान आ भाषिक सौन्दर्य
वृषेश चन्द्र लालक 'आन्दोलन' कविता संग्रहक शिल्प-सौन्दर्य ओकर सरलता, तीक्ष्णता आ मैथिलीक मौलिक माटिक गन्धमे निहित अछि। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 'विमल' एकर "आलंकारिता, विम्वात्मकता, प्रतीकात्मकता, नग्न यर्थाथक चित्रण, आह्वान, आक्रोश आ' अद्भूत शिल्प-विच्छिति" कें रेखांकित कएने छथि।
पारम्परिक मैथिली कवितासभ प्रायः संस्कृतनिष्ठ शब्दावली (तत्सम शब्द) सँ बोझिल रहैत छल, जकरा आम जनताकें बुझबामे कठिनाइ होइत छल। मुदा लालक कविताक भाषा पूर्णतः जनभाषा थिक।
ठेट / देशज शब्दावलीक प्रयोग: कवि मैथिलीक तद्भव आ देशज शब्दावलीक अत्यन्त सजीव प्रयोग कएने छथि। जेना—'पछमुड़िया' (पाछाँ घुमल), 'फर्मा' (साँचा), 'बकलेल' (मूर्ख), 'धहलेल', 'घोकचिकए' (संकुचित भ' क'), 'लेढ़ा जाइत' (खराब भ' रहल), 'सुड्डाह' (पूर्णतः जारब), 'रैती' (रैयत/प्रजा), 'भसियाकए', 'टिकबा', 'ठगबा'। ई शब्द लोकभाषाक शक्ति बनिकए पाठकक हृदयमे सीधा प्रहार करैत अछि आ क्रान्तिक विमर्शकें खेत-खलिहान धरि पहुँचाबैत अछि।
दृश्य एवं गतिज बिम्ब (Visual & Kinetic Imagery): संग्रहमे दृश्य आ गतिज बिम्बक अद्भुत संयोजन अछि। प्रतिगमनकें 'पाछाँ घुमल पएर' आ 'दाँतपर खून' जमल भूतक रूपमे, दमनकारी सत्ताकें 'बाघक छाल ओढ़ने गीदड़'क रूपमे, तथा अत्याचारीक सर्वनाशकें 'रावणक लङ्का सुड्डाह जराबैत' दृश्य बिम्बक रूपमे उपस्थित कएल गेल अछि। ई अमूर्त राजनीतिक विचार सभकें पाठकक मस्तिष्कमे चित्र जकाँ ठाढ़ कऽ दैत अछि।
रस एवं वक्रोक्ति (Irony & Satire): संग्रहमे प्रधान रूपे वीर, रौद्र एवं वीभत्स रसक संग हास्य-व्यंग्यक वक्रोक्ति विद्यमान अछि। 'दुर्रर्र बकलेल !' आ 'शान्ति चाही मुदा फर्मा बमोजिम' राजनीतिक व्यंग्यक उत्कृष्ट प्रतिमान थिक। एहिमे शासकक अमानवीयताकें हास्यक माध्यमसँ उदाङ्ग कएल गेल अछि, जे पाठककें हँसबैत-हँसबैत गहीर पीड़ाक अनुभूति कराबैत अछि।
१५. भाषा: जनपदीय मैथिली, राजनीतिक मुहावरा आ वाचिक ऊर्जा
संग्रहक भाषा संस्कृतनिष्ठ गाम्भीर्यक प्रदर्शन नहि करैत। “हौ”, “तँ”, “आबह”, “कत्त छी”, “नइ”, “कनेक्के”, “बकलेल”, “ठेङ्गा”, “बतहा” जेकाँ लोक-प्रयोग कविता केँ बोलैत आवाज़ दैत अछि। एहि वाचिकता कारण कविता मंच, सभा, जनसंवाद आ पाठ — सभठाम प्रभाव पैदा करबाक क्षमता रखैत अछि। वाक्य छोट अछि, पुनरावृत्ति प्रचुर अछि, ध्रुवपद बारम्बार लौटैत अछि। ई शैली राजनीतिक कविताक स्मरणीयता बढ़बैत अछि।
कवि अंग्रेजी-प्रशासनिक पद “रोड-मैप” केँ ज्योंक-त्यों अपनबैत छथि, मुदा ओकरा मैथिली लोकबोधक बीच राखि अर्थ उलटि दैत छथि। एही तरह ‘जिन्दाबाद-मुर्दाबाद’ राजनीतिक सार्वजनिक भाषाक तैयार सूत्र अछि, जकरा “चलू आन्दोलनमे !” व्यंग्यात्मक प्रतिध्वनि बना दैत अछि। लालक भाषा-रणनीति एहि अर्थमे उत्तर-औपनिवेशिक सेहो कहल जा सकैत अछि जे बाहरसँ आएल राजकीय/विकासात्मक शब्दावली केँ स्थानीय भाषिक विवेकक अदालतमे खड़ा करैत अछि।
१६. शिल्प: पुनरावृत्ति, सम्बोधन, विडम्बना, प्रतीक आ दृश्यात्मकता
१६.१ पुनरावृत्ति आ ध्रुवपद
लगभग प्रत्येक प्रमुख कविता अपन एक ध्वनि-वाक्य बारम्बार दोहरबैत अछि — “ई आन्दोलन देखा देत”, “चलू आन्दोलनमे”, “देर छैक अन्हेर नहि”, “हाय, हमर राष्ट्रियता”, “देशे रोडपर घुसकतैक”, “काल मड़ड़ाइत छैक”। पुनरावृत्ति यहाँ केवल संगीत नहि; प्रत्येक वापसीक बाद अर्थ बदलैत अछि। उदाहरणतः “चलू आन्दोलनमे” पहिने उत्साह, बादमे शंका, अन्ततः व्यंग्यक स्वर ग्रहण करैत अछि।
१६.२ नाटकीय सम्बोधन
बी.पी., अनुपस्थित मार्गदर्शक, शान्तिक व्यापारी, राष्ट्रियता, जनता — कवि निर्जीव अमूर्त विचार केँ प्रत्यक्ष सम्बोधित करैत छथि। एहि काव्य-उपायसँ विचार संवाद बनैत अछि। पाठक केवल तर्क नहि सुनैत, मानो सभामे आवाज़ सुनैत अछि।
१६.३ व्यंग्य आ उलटबाँसी
“शान्तिमे हिंसा समटाएक चाही”, “आहाँक त्याग अछि / हिनकर लगानी”, “देशमे नइ रहतैक रोड / देशे रोडपर घुसकतैक” — ई उलटबाँसी संग्रहक सर्वश्रेष्ठ काव्य-प्रविधि अछि। कवि विरोधाभास केँ समझबैत नहि छथि; वाक्यक भीतर टकरा दैत छथि। पाठक स्वयं विसंगति अनुभव करैत अछि।
१६.४ प्रतीक-परिवार
अन्हार–इजोत, भूत–जीवन, रक्त–झण्डा, माटि–अन्तरिक्ष, रोड–मैप, लाठी–ठेङ्गा, बन्दूक–होरीक रंग — ई द्वन्द्वात्मक प्रतीक संग्रहक संरचना बाँधैत अछि। विशेषतः अन्हारसँ इजोत धरि यात्रा आरम्भिक संकट आ अन्तिम आशा बीच आन्तरिक वास्तु बनबैत अछि।
१७. दक्षिण एशियाई प्रतिरोध-काव्यक प्रसंगमे स्थान
राजनीतिक व्यंग्य, लोकभाषा, जनपक्षधरता आ सत्ता पर सीधा प्रहार भारतीय उपमहाद्वीपक अनेक प्रतिरोध-काव्य परम्परामे भेटैत अछि। मैथिली-हिन्दी दुनू साहित्यक व्यापक परिप्रेक्ष्य मे नागार्जुनक जनभाषिक राजनीतिक व्यंग्यक स्मृति स्वतः जागि सकैत अछि; हिन्दीमे धूमिलक सत्ता-सन्देह, लोकतान्त्रिक शब्दावलीक विखण्डन आ नागरिक आक्रोश सेहो तुलनात्मक दृष्टि देइत अछि। मुदा लालक काव्यक विशिष्टता नेपालक लोकतान्त्रिक संकट, बी.पी. कोइरालाक प्रतीकात्मक उपस्थिति, गोर्खाली राज्य-रूपक, जनकपुरक भाषिक-सांस्कृतिक धरातल आ नेपाली मैथिली राजनीतिक अनुभवक संयोगमे अछि।
तुलना करैत समय सावधानी जरूरी अछि: ’आन्दोलन’क कविता भाषिक प्रयोगवाद वा गहन आत्म-मनःसंघर्षक काव्य नहि; ई सार्वजनिक काव्य अछि। एकर मूल मंच व्यक्ति-मन नहि, नागरिक चौक अछि। एही कारण एकरा ओहि मानदण्डसँ मापब उचित नहि जे पूर्णतः निजी, रूपवादी वा रहस्यात्मक कविता लेल बनल हो। एकर सफलता जनभाषिक संप्रेषण, व्यंग्यक मार, ऐतिहासिक तत्परता आ नैतिक स्पष्टतामे अछि।
वृषेश चन्द्र लालक कृतित्वमे ’आन्दोलन’क स्थान
‘आन्दोलन’कऽ कवि वृषेश चन्द्र लालक व्यापक साहित्यिक-राजनीतिक कृतित्वक सन्दर्भमे राखि देखबऽ आवश्यक अछि। पोथीक अन्तमे देल परिचयक अनुसार, कवि (जन्म १९५५ ई., चैत्र १६, २०११ सालमे) बी.पी. कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीतिक अनुयायी छथि, आ राष्ट्रिय दैनिकसभमे नेपाली राजनीतिपर नियमित लिखैत रहैत छथि। एहि संग्रहक अतिरिक्त हुनकर प्रकाशित कृतिसभमे बी.पी. कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास ’मोदिआइन’क मैथिली रूपान्तरण, कथा-संग्रह ’माल्हो’, आ अनुवाद ‘संघीयताक सम्बन्धमे’ शामिल छथि।
ई तथ्य विशेष महत्वपूर्ण अछि जे ‘आन्दोलन’, बी.पी. कोइरालाक ‘सुम्निमा’क मैथिली अनुवाद, आ पछाति प्रकाशित कविता-संग्रह ’ढोलक’ — एहि कृतिसभकेँ एकसंग देखलापर कवि-अनुवादक वृषेश चन्द्र लालक साहित्यिक-राजनीतिक परियोजनाक एकटा रूपरेखा उभरैत अछि। एहि त्रयीकेँ एकसंग देखलापर कवि-अनुवादक वृषेश चन्द्र लालक साहित्यिक-राजनीतिक परियोजनाक एकटा स्पष्ट रूपरेखा उभरैत अछि — बी.पी. कोइरालाक लोकतान्त्रिक-समाजवादी विचारधाराक मैथिली भाषामे सतत् प्रसार (अनुवादक माध्यमे), आ समकालीन नेपाली राजनीतिक संकटपर मौलिक काव्यक माध्यमसँ प्रत्यक्ष हस्तक्षेप (‘आन्दोलन’ आ ‘ढोलक’क माध्यमसँ)। ’आन्दोलन’ एहि त्रयीमे सभसँ बेसी तात्कालिक आ नारात्मक स्वरवाला कृति थिक — जतय ‘ढोलक’मे सामाजिक न्याय (दलित-चेतना, स्त्री-विमर्श) क विस्तृत आयाम भेटैत अछि, ओतय ’आन्दोलन’ विशुद्ध रूपे एकटा तात्कालिक राजनीतिक संकट (संसद-विघटन) क प्रत्यक्ष काव्यात्मक प्रतिक्रिया थिक।
‘आन्दोलन’क वि.सं. २०६१ प्रकाशन-सन्दर्भक कारण एकरा २०२१–२०२२ ई.क निकट प्रकाशनकालमे राखबाक मत कालक्रमसँ मेल नहि खाइत अछि; तथापि ’सुम्निमा’, ‘ढोलक’ आ ’आन्दोलन’केँ वैचारिक-कृतित्वगत सम्बन्धमे एकसंग पढ़बाक प्रस्ताव अपन आलोचनात्मक महत्त्व राखैत अछि।
नेपालीय मैथिली साहित्यमे पोथीक ऐतिहासिक स्थान
नेपालीय मैथिली साहित्यक एकटा विशाल परम्परा रहल अछि, जकरामे विद्यापतिक शृंगार आ भक्तिसँ ल' क' आधुनिक कालक सामाजिक यथार्थवाद धरि शामिल अछि। रामभरोस कापड़ि 'भ्रमर', राजेन्द्र विमल, धीरेन्द्र प्रेमर्षि आदि स्रष्टा सभ नेपालीय मैथिलीकें समृद्ध कएने छथि। मुदा, राजनीतिक कविताक धारा मैथिलीमे उपस्थित रहितो, एकटा पूर्ण कविता संग्रह जे विशुद्ध रूपेँ समसामयिक राजनीति, सत्ताक क्रूरता, राज्य-दमन, आ जनआन्दोलनक हुंकारपर केन्द्रित हुअए, से विरल छल।
डा. विमलक दाबी सत्य अछि जे "नेपालीय मैथिली साहित्यमे पहिल बेर एहन कोनो कविता संग्रह आएल जाहिमे प्रत्येक कविता समसामयिक राजनीतिसँ प्रेरित अछि"। वृषेश चन्द्र लालक ई प्रयास एक दिस मैथिली कविताकें कोठलीक बिलास आ आदर्शवादी प्रवचनसँ बहार निकलि सडकक क्रान्तिकारी मोर्चापर ठाढ़ करैत अछि, तँ दोसर दिस लोकतान्त्रिक कार्यकर्ता सभकें एकटा वैचारिक हतियार प्रदान करैत अछि। बी.पी. कोइरालाक समाजवाद, मधेशक सीमान्तकृत चेतना, आ लोकतन्त्रक सार्वभौम मूल्य—एहि तीनू धाराक त्रिवेणी एहि 'आन्दोलन' संग्रहमे प्रवाहित भेल अछि।
१८. काव्य-संग्रहक मुख्य उपलब्धि
राजनीतिक कविता केँ दलगत प्रचार बनबाक खतरा सँ बचबैत, सत्ता आ आन्दोलन — दुनू पर आलोचनात्मक दृष्टि राखब।
समकालीन इतिहासक जटिल प्रश्न केँ लोकभाषिक, स्मरणीय आ दृश्यात्मक बिम्बमे रूपान्तरित करब।
राष्ट्रियता केँ बहुलता, नागरिक साहस आ समताक कसौटी पर जाँचब।
शान्ति, विकास, बलिदान आ नेतृत्व जेकाँ सकारात्मक शब्दक भीतर छिपल स्वार्थी राजनीति खोलब।
जनता केँ करुण पात्रक रूपमे नहि, राजनीतिक कर्ता आ जनसत्ताक स्रोतक रूपमे उपस्थित करब।
अन्तिम आशा केँ सरलीकृत विजय-घोषणा नहि, चलैत हिंसा बीच जीवनक जिजीविषाक रूपमे रचब।
१९. सीमासभ आ आलोचनात्मक प्रश्न
गम्भीर साहित्यिक मूल्यांकन प्रशंसामात्र नहि होइत अछि। ‘आन्दोलन’क शक्ति जतेक स्पष्ट अछि, किछु सीमा सेहो ओतबे देखाइत अछि। पहिल, अनेक कविता तत्कालीन राजनीतिक संकेत पर बहुत निर्भर अछि; बी.पी., प्रतिगमन, गोर्खाली सत्ता-मानस, आन्दोलनकारी नेतृत्वक विशेष प्रसंग नहि बुझनिहार भावी पाठक लेल किछु व्यंग्यक पूरा धार कम भ’ सकैत अछि। एहि कारण आलोचनात्मक संस्करणमे ऐतिहासिक टिप्पणी लाभकारी होइत।
दोसर, नारा-जकाँ ध्रुवपद कतेको ठाम ऊर्जावान अछि, मुदा किछु खण्डमे पुनरावृत्ति काव्य-घनत्व घटबैत अछि। ओजस्विता कभी-कभी सूक्ष्मता पर भारी पड़ैत अछि। तेसर, संग्रहक केन्द्र राष्ट्रीय सत्ता-संकट अछि; स्त्री, श्रमक विशिष्ट अनुभव, दलित प्रश्न, वर्गक सूक्ष्म जीवन-दृश्य, ग्रामीण अर्थनीति जेकाँ आयाम संकेत रूपेँ उपस्थित भ’ सकैत अछि, मुदा स्वतन्त्र काव्य-विस्तार नहि पबैत अछि।
चारिम, इतिहासक “आगाँ बढ़बाक” विश्वास प्रेरक अछि, मुदा राजनीतिक इतिहासक टेढ़ापन, आन्दोलनक विफलता, जनताक आन्तरिक विभाजन आ लोकतान्त्रिक संस्थाक जटिलता किछु कम स्थान पबैत अछि। तथापि “चलू आन्दोलनमे !” आ “हाय, हमर राष्ट्रियता !” एहि सरल रेखीयताक भीतर जरूरी आत्म-संशय प्रवेश करबैत अछि; एहि दू कविता कारण संग्रह एकमुखी घोषणावादसँ बचि जाइत अछि।
निष्कर्ष आ समकालीन प्रासंगिकता
समग्रतः, वृषेश चन्द्र लाल रचित 'आन्दोलन' मैथिली कविता संग्रह केवल किछु पद्यक संगालो वा साहित्यिक आनन्दक पोथी मात्र नहि अछि, अपितु नेपालक ऐतिहासिक राजनीतिक संक्रमण-कालक एकटा जीवन्त, ज्वलन्त आ प्रामाणिक घोषणापत्र थिक। जखन देशमे निरंकुशताक कालो मेघ मड़रा रहल छल, जखन बन्दूकक संगीनकें 'शान्ति'क नाम देल जा रहल छल, आ जखन नागरिक अधिकारक चीरहरण भ' रहल छल, तखन एहि कविता सभहक जन्म भेल। कवि लाल अपन लामो राजनीतिक अनुभव, सामाजिक संवेदनशीलता, आ मैथिली भाषाक लोक-शक्तिक अद्भुत सामञ्जस्य कए ई काव्य-कंचन सृजन केलनि अछि।
एहि पोथीक दार्शनिक गहिराइ एहि बातमे अछि जे ई मात्र तत्कालीन राजाक निरंकुशताक विरोध नहि करैत अछि, अपितु आन्दोलनक नामपर जनताकें ठगयबला पाखण्डी नेता, विविधतासँ डरायबला खोखला राष्ट्रवादी, आ नव-उपनिवेशवादी विदेशी हस्तक्षेप (रोड-म्याप) सभपर सेहो समान रूपसँ निर्मम प्रहार करैत अछि। 'आन्दोलन' कविता संग्रह प्रमाणित करैत अछि जे जखन राजनीतिक प्रतिबद्धता आ साहित्यिक संवेदनशीलताक साँचो संगम होइत अछि, तखन साहित्य मात्र मनोरञ्जनक साधन नहि रहिकए समाज परिवर्तनक अमोघ अस्त्र बनि जाइत अछि। लोकतान्त्रिक चेतना, गणतन्त्रक स्थापना, संघीयताक बहस आ समकालीन राजनीतिक विमर्शक अध्ययनक लेल ई ग्रन्थ मैथिली साहित्यमे सधिखन एकटा अमूल्य धरोहर आ सन्दर्भ-सामग्रीक रूपमे प्रतिष्ठित रहत। ई पोथी एहि बातक साक्षी अछि जे राजनीति जखन पथभ्रष्ट होइत अछि, तखन साहित्य ओकरा बाट देखाबय लेल मशाल बनिकए आगाँ अबैत अछि।
२०. समग्र मूल्यांकन
‘आन्दोलन’ केँ नेपाली मैथिली राजनीतिक कविताक एक महत्त्वपूर्ण जनवादी दस्तावेज कहब उचित अछि, मुदा “दस्तावेज” शब्द अकेले पर्याप्त नहि। ई दस्तावेज तखन साहित्य बनैत अछि जखन “भूत” प्रतिगमनक प्रतीक बनैत अछि, “शान्तिक व्यापारी” नीति-भाषाक पाखण्ड खोलैत अछि, “त्याग” नेताक “लगानी” बनि जाइत अछि, “रोड-मैप” देश केँ निगलैत अछि, “राष्ट्रियता” अन्तरिक्षक युगमे माटिमे लोटैत अछि, आ बन्दूकक आवाज़ बीचोबीच इजोत दिस इतिहास सरकैत अछि।
कविक सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि ई अछि जे ओ लोकतन्त्र केँ केवल संसद वा राजतन्त्र-विरोधक प्रश्न नहि मानैत छथि। लोकतन्त्र हुनका लेल भाषा, विचार, बहुलता, आत्मसम्मान, जन-अधिकार, नेतृत्वक जवाबदेही आ सत्ता पर जनताक स्वामित्वक समुच्चय अछि। “लोक नइ छैक बपौती ककरो” एहि दर्शनक संक्षिप्ततम सूत्र अछि।
साहित्यिक दृष्टिसँ संग्रहक सर्वाधिक प्रभावी रचनासभ “शान्ति चाही मुदा फर्माबमोजिम”, “दुर्र बकलेल !”, “चलू आन्दोलनमे !”, “हाय, हमर राष्ट्रियता !” आ “रोड-मैप” अछि, कारण एहि सभमे तत्कालीन राजनीतिक संदर्भ सार्वकालिक विडम्बनामे रूपान्तरित भ’ जाइत अछि। “आबह न !” आ “ई आन्दोलन देखा देत” ऐतिहासिक ऊर्जा देइत अछि; “इजोतदिसि ससरत !” संग्रह केँ मानवीय आशाक खुला अन्त दैत अछि।
अन्ततः ’आन्दोलन’क मूल्य एहि बातमे अछि जे ई पाठक केँ आन्दोलनक पक्ष चुनबाक मात्र आह्वान नहि करैत; ई पूछैत अछि — आन्दोलन केकर लेल? शान्ति केकर लेल? त्याग के करैत अछि, लाभ के लैत अछि? राष्ट्र की एक रंग अछि कि सात रंगक समवेत गमक? विकास देशक भीतर बनैत अछि कि देश कागजी ’रोड-मैप’क भीतर घुसि जाइत अछि? जनता सत्ता केँ जन्म दैत अछि कि सत्ता जनता केँ अपन रैती मानैत अछि? एहि प्रश्नसभक कारण ई छोट पोथी अपन समय सँ बाहर निकलि लोकतान्त्रिक विवेकक दीर्घजीवी काव्य-पाठ बनैत अछि।
“लोक नइ छैक बपौती ककरो” — एहि एक पंक्तिमे ’आन्दोलन’क लोकतान्त्रिक आत्मा संकुचित अछि।
ई संग्रह इतिहासक क्षणमे लिखल गेल, मुदा एकर श्रेष्ठ कविता इतिहासक क्षण केँ पार करैत सत्ता आ नागरिकताक स्थायी प्रश्न बनि जाइत अछि। एही ठाम ’आन्दोलन’क साहित्यिक विजय अछि।
ग्रन्थसूची
१. लाल, वृषेश चन्द्र। आन्दोलन। मैथिली कविता-संग्रह। सुदामा प्रकाशन, जनकपुरधाम, वि.सं. २०६१।
२. लाल, वृषेश चन्द्र। माल्हो। कथा-संग्रह।
३. कोइराला, विश्वेश्वरप्रसाद। मोदिआइन। मैथिली रूपान्तरण: वृषेश चन्द्र लाल।
४. लाल, वृषेश चन्द्र। संघीयताक सम्बन्धमे।
५. कोइराला, विश्वेश्वरप्रसाद। सुम्निमा। मैथिली अनुवाद: वृषेश चन्द्र लाल।
६. लाल, वृषेश चन्द्र। ढोलक। कविता-संग्रह।
2. ढोलक
१. प्रस्तावना आ सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि
मैथिली साहित्यक समकालीन परिदृश्यमे, विशेषतः नेपालीय मिथिलाक सन्दर्भमे, कविता मात्र सौन्दर्य-बोध वा भावात्मक उच्छवासक साधन नहि रहि गेल अछि। ई क्रान्ति, सामाजिक न्याय, सीमान्तीकृत जन-समुदायक क्रन्दन आ लोकतान्त्रिक चेतनाक एकटा सशक्त अस्त्र बनि चुकल अछि। एहि वैचारिक आ प्रायोगिक रूपान्तरणक अग्रिम पंक्तिमे ठाढ़ छथि सुप्रसिद्ध राजनीतिज्ञ, विचारक आ साहित्यकार वृषेश चन्द्र लाल। हुनक सद्यः प्रकाशित मैथिली कविता-संग्रह 'ढोलक' (२०७८ वि.सं.) एक दिस जतए साहित्यक सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिमानकेँ नव ऊँचाई दैत अछि, ततहि दोसर दिस समाजक पंकिल यथार्थ, राजनीतिक पाखण्ड, सीमान्तीकृत वर्गक शोषण आ मानवीय जिजीविषाक अत्यन्त प्रामाणिक आ मर्मस्पर्शी दस्तावेज प्रस्तुत करैत अछि।
साहित्य आ समाजक जे अन्योन्याश्रित सम्बन्ध अछि, तकरा वृषेश चन्द्र लालक ई कृति सम्पूर्णतामे प्रमाणित करैत अछि। 'ढोलक' मात्र किछु कविताक सँगाल नहि थिक, अपितु ई एकटा युगक दस्तावेज थिक जतए क्रान्तिक आँच, मोहभंगक सन्त्रास आ नव-निर्माणक संकल्प एक संगे प्रवाहित होइत अछि।
सार-संक्षेप
“ढोलक” एहन कविता-संग्रह अछि जाहिमे काव्यक एकहि साँस बाल-मनोविज्ञान, लोकगीत, जनकपुर-मधेशक सार्वजनिक जीवन, राजनीतिक प्रतिरोध, श्रम, निर्धनता, लैङ्गिक प्रश्न, आत्म-संघर्ष, मृत्यु-बोध, उत्सव आ विडम्बना धरि पहुँचैत अछि। पोथीक संरचना स्वयं अर्थवान अछि—“बाल-खण्ड”, “ताल-खण्ड” आ “नाल-खण्ड”। विषय-सूची अनुसार पहिल खण्डमे २०, दोसरमे १४ आ तेसरमे ६२ रचना अछि; अर्थात कुल ९६ कविता/गीत। ई क्रम बच्चाक सहज ध्वनिसँ तालबद्ध सामुदायिक गायन, आ ओतए सँ सामाजिक नस-नाड़ी (“नाल”) धरि कविक यात्रा सन बुझाइत अछि।
संग्रहक सर्वाधिक विशिष्ट गुण अछि ओकर ध्वन्यात्मकता। “फुर्र-फुर्र”, “धुम-धुम”, “धक-धक”, “चकके-चकदुम”, “भुकु-भुकु”, “जोगिरा” आदि ध्वनि मात्र सजावट नहि, बल्कि अर्थक वाहक बनैत अछि। ध्वनि एतए देह, उत्सव, भय, प्रतिरोध, बाल-क्रीड़ा आ लोक-स्मृति सभकेँ एक दोसरासँ जोड़ैत अछि। शीर्षक “ढोलक” सेहो एहि ध्वनि-राजनीतिक केन्द्रक रूपमे उपस्थित अछि—लोकजीवनमे ढोलकक उपयोग होइत अछि, फेर काज समाप्त भेला पर ओ फेर अन्हार कोनमे टाँगि देल जाइत अछि। एहि बिम्बमे कलाकार, श्रमिक, दलित-वंचित, राजनीतिक कार्यकर्ता अथवा साधारण नागरिक—सभक उपयोगितावादी सामाजिक नियति पढ़ल जा सकैत अछि।
काव्य-गुणवत्ता समस्त ९६ रचनामे समान नहि अछि। कतेको कविता बिम्ब, लय आ व्यंग्यक कारण दीर्घकालिक प्रभाव छोड़ैत अछि; कतेको ठाम कवि विचारकेँ कविता बनबाक पहिने घोषणात्मक पंक्तिमे कहि देैत छथि। मुदा ई असमानता संग्रहक ऐतिहासिक महत्व घटबैत नहि; उलटे ई कविक सार्वजनिक व्यक्तित्व आ नागरिक लेखनक प्रकृति स्पष्ट करैत अछि। “ढोलक”क मूल मूल्य ओकर जन-संवादधर्मिता, बोलचालक ऊर्जा, लोक-लय, राजनीतिक निर्भीकता आ सामाजिक दृश्यावलोकनमे अछि।
मुख्य निष्कर्ष
२. कविक व्यक्तित्व, राजनीतिक पृष्ठभूमि आ कृतित्वक अन्तःसम्बन्ध
कोनो भी कालजयी साहित्यिक कृतिक गहिराइकेँ बुझबाक लेल ओकर स्रष्टाक जीवन-दर्शन आ संघर्षकेँ बुझब अनिवार्य होइत अछि। वृषेश चन्द्र लाल (जकर छठिहारक नाम विश्वेश्वर छन्हि) मात्र एकटा भावुक वा कल्पनाशील कवि नहि छथि, अपितु नेपालक लोकतान्त्रिक आन्दोलन आ मधेशक अधिकार-संघर्षक एकटा शीर्षस्थ योद्धा, विचारक आ जननेता छथि। हुनक जन्म २९ मार्च १९५५ ई. मे महोत्तरी जिलाक सुगा-भवानीपट्टी गाममे पिता स्व. उदितनारायण लाल आ माता श्रीमती भुवनेश्वरी देवक कोखिसँ भेल छल। नेपालमे लोकतन्त्रक स्थापना, पञ्चायती व्यवस्थाक अन्त आ नागरिक समताक लेल संघर्षक अनवरत क्रममे हुनक जीवन अत्यन्त कष्टसाध्य रहल अछि। एहि संघर्षक दौरान हुनक १७ बेर गिरफ्तारी भेलन्हि आ लगभग ८ वर्षक कठोर जेल-जीवन व्यतीत भेलन्हि। ओ विश्वेश्वर प्रसाद कोइरालाक प्रतिबद्ध राजनीतिक अनुयायी छथि आ तराई-मधेश लोकतान्त्रिक पार्टी (तमलोपा) क राष्ट्रिय उपाध्यक्ष, जनकपुरधामक पूर्व नगर प्रमुख (मेयर) तथा नेपालक संघीय संसदक राष्ट्रियसभा सदस्य (२०१७-२०१९) जकाँ गरिमामय पदपर रहि चुकल छथि।
साहित्यक क्षेत्रमे हिनकर योगदान मात्र 'ढोलक' धरि सीमित नहि अछि। हिनकर 'आन्दोलन' नामक कविता संग्रह पूर्वहि प्रकाशित अछि जे प्रतिगमन कालमे जनताकेँ जाग्रत करबाक काज कएने छल। एकर अतिरिक्त, वी.पी. कोइरालाक प्रसिद्ध लघु उपन्यास 'सुम्निमा' आ 'मोदिआइन' कें मैथिलीमे रूपान्तरण क' हिनका द्वारा मैथिली साहित्यक भण्डारकेँ अत्यधिक समृद्ध कएल गेल अछि। 'सुम्निमा' क अनुवादक लेल हुन्का 'नेपाल विद्यापति मैथिली अनुवाद पुरस्कार' सँ सेहो सम्मानित कएल गेल अछि, जे हुनक भाषिक अधिकार आ प्राञ्जल मैथिलीक प्रमाण थिक। मैथिली आन्दोलन आ विद्यापति स्मृति दिवस जकाँ आयोजनसभमे हुनक सक्रियता ई प्रमाणित करैत अछि जे ओ भाषाकेँ केवल संवादक माध्यम नहि, बल्कि क्षेत्रीय अस्मिता आ पहिचानक अस्त्र मानैत छथि। वर्ष २०७४ मे मिथिला नाट्य कला परिषद् (मिनाप) द्वारा हिनका 'महामूर्ख' सन सुप्रसिद्ध व्यंग्यात्मक उपाधिसँ सेहो विभूषित कएल गेल छल, जे मिथिलाक बौद्धिक आ सामाजिक क्षेत्रमे हुनक उच्च स्वीकार्यताक द्योतक अछि। साहित्यक प्रति हुनक समर्पण एतबे नहि अछि, ओ अपन माता-पिताक नामपर एकटा अक्षय कोषक स्थापना क' मैथिली साहित्यकार लोकनिकें पुरस्कृत करबाक परिपाटी सेहो प्रारम्भ कएने छथि।
कविक ई दीर्घ राजनीतिक संघर्ष, क्रान्तिकारी अनुभव, कारागारक यातना आ जन-सरोकार हुनक कवितामे कोनो खोखला दलीय नारा वा शुष्क वक्तव्य बनि क' नहि आयल अछि। एकर विपरीत, समाजक अन्तिम पायदानपर बैसल शोषित-दलित जनताक रक्ताक्त यथार्थ, अश्रु, पसीना आ जिजीविषा बनि क' मुखरित भेल अछि। कारागारक अन्धकार, जन-आन्दोलनक कोलाहल, समाजक उपेक्षित वर्गक वेदना आ सत्ता-शिखरक विद्रूपता—ई सभटा वृषेश चन्द्र लालक काव्य-संसारक कच्चा माल थिक। राजनीति आ साहित्यक एहन दुर्लभ समन्वय हिनक रचनाकेँ एकटा विलक्षण धार प्रदान करैत अछि, जाहिमे ओ यथार्थसँ पलायन नहि करैत छथि, बल्कि संघर्षक बीच ठाढ़ भ' नव निर्माणक शंखनाद करैत छथि। डा. शेफालिका वर्मा जकाँ वरिष्ठ साहित्यकार सेहो ई स्वीकार करैत छथि जे राजनीतिमे रहितो आ व्यस्त जीवन जीबितो वृषेशजी साहित्यक लेल जे समय निकालि लैत छथि, ओ मैथिली मायक भण्डारकें निरन्तर श्रीवृद्धि क' रहल अछि।
पोथी, कवि आ साहित्यिक प्रसंग
वृषेश चन्द्र लालक साहित्यिक व्यक्तित्वकेँ केवल राजनीतिक जीवनक परिशिष्ट मानब भूल होयत। उपलब्ध जीवनी-स्रोत हुनकर जन्म महोत्तरी जिलाक सुगा-भवानीपट्टीमे बतबैत अछि; अर्थशास्त्रमे स्नातकोत्तर अध्ययन, श्रम-अध्ययनक प्रशिक्षण, सार्वजनिक-राजनीतिक जीवन, कथा-कविता-लेखन आ अनुवाद—ई सभ हुनकर अनुभव-क्षेत्रकेँ बहुस्तरीय बनबैत अछि। बी.पी. कोइरालाक “मोदिआइन” आ “सुम्निमा”क मैथिली रूपान्तरण हुनकर अनुवादक रूपकेँ स्थापित करैत अछि; २०७७ वि.सं.क नेपाल विद्यापति मैथिली अनुवाद पुरस्कार सेहो एहि काजक संस्थागत मान्यता अछि। एहि पृष्ठभूमिमे “ढोलक” पढ़ला पर बुझाइत अछि जे कवि केवल मंचीय राजनीतिक भाषणकेँ पद्य नहि बनबैत छथि; ओ घर, बालक, पोखरि, पक्षी, प्रेम, नगर, दरिद्रता, धार्मिक प्रतीक, भूख, युद्ध-सदृश हिंसा, उत्सव आ व्यक्तिगत अकेलापन सभकेँ एकहि काव्य-क्षेत्रमे आनैत छथि।
आधुनिक मैथिली साहित्यक इतिहास लिखनिहार जयकान्त मिश्र आ देवकान्त झा दुनू आधुनिक काव्यमे सामाजिक यथार्थ, प्रयोग, गीतात्मकता, व्यंग्य आ नागरिक चेतनाक विस्तारकेँ महत्त्वपूर्ण प्रवृत्तिक रूपमे देखबैत छथि। “ढोलक” एहि दीर्घ परम्पराक नेपाल-मधेशीय अवतार सन अछि। एक दिस विद्यापतिक गीत-परम्परा आ लोकध्वनिक सांस्कृतिक स्मृति अछि, दोसर दिस आधुनिक लोकतान्त्रिक असन्तोष, नगरीय संकट, श्रम-वंचना आ वैश्विक आशंका।
पोथीक आरम्भमे देल राजेन्द्र विमल आ परमेश्वर कापड़िक समीक्षात्मक आलेख संग्रहक सामाजिक सरोकार, पर्यावरण-चेतना, राजनीतिक अधिकार, वर्ग-विषमता, लोकलय आ मानवीय करुणा दिस संकेत करैत अछि।
भूमिका : कवि आ कृतिक पृष्ठभूमि
वृषेश चन्द्र लाल केवल कवि नहि, अपितु सक्रिय राजनीतिकर्मी सेहो छथि। ओ जनकपुरधामक नगर-प्रमुख रहि चुकल छथि आ नेपालक संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रक प्रथम राष्ट्रियसभाक सम्मानित सदस्य सेहो रहि चुकल छथि। ई जीवनी-पृष्ठभूमि एहि काव्य-संग्रह ‘ढोलक’ बुझबाक लेल अत्यन्त महत्वपूर्ण अछि, किएक तँ डा. राजेन्द्र ‘विमल’क भूमिकाक अनुसार एहि काव्य-सृष्टिक मूल विशेषता ईहो अछि जे एकर रचना कोनो राजनेताद्वारा कारागारक अवकाश-कालमे नहि भेल अछि, अपितु नेपालमे अनवरत् चलि रहल विभेद-अन्तक युद्धक मैदानमे युद्धरत् कविहृदय सेनानीद्वारा भेल अछि। भूमिकाकारक भाषामे — लगैछ जेना श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्रक बीचमे ठाढ़ भ’ गीता सुना रहल होथि — ई स्थापना स्वयं एहि संग्रहक पाठकीय स्वरकेँ निर्धारित करैत अछि।
दोसर भूमिका-लेखक परमेश्वर कापड़िक अनुसार, वृषेश चन्द्र लाल पहुंचल राजनीतिकर्मी, आइकाल्हुक राजनीतिक हाक-वाकसँ परिचित परन्तु एहि सभसँ अलग — सूक्ष्म निरीक्षण-प्रामाणिकाइसँ अनुभवसिद्ध कवि थिका, जे जीवन-जगत्क अवलोकन सूक्ष्मताक संग करैत छथि। ई दोहरी पहचान — कवि आ राजनीतिकर्मी — संग्रहमे सभसँ बेसी स्पष्ट रूपे देखाइ परैत अछि: ई मात्र सुन्दर शब्दक चयन नहि, अपितु समाज-राजनीतिमे सीधा हस्तक्षेप करैत मोर्चा थिक।
रचना आ रचनाकारक परस्पर-सम्बन्ध
एहि संग्रहकेँ पढ़ला बाद ई तथ्य बिसरल नहि जाए बला जे रचनाकार मात्र साहित्यकार नहि, अपितु मैथिलीभूमिक संघर्ष — नगर-नेतृत्व, राष्ट्रियसभा-सदस्यता, आन्दोलन-पर्व — मे रहल राजनीतिकर्मी सेहो छथि। एहिसँ ई स्पष्ट होइत अछि जे ‘ढोलक’कार स्वयं ओहि घटना-स्थलकेँ प्रत्यक्ष रूपे भोगल थिक। एहि कारणे भूमिका-लेखक डा. राजेन्द्र विमलक ई तुलना सार्थक बुझाइत अछि: जेना श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्रक बीचमे ठाढ़ भ’ गीता सुना रहल होथि, ओहिना ई कवि संघर्षक मैदानमे ठाढ़ भ’ काव्य-सृजन करैत छथि।
३. पोथीक बाह्य आ आन्तरिक विन्यास (Metadata & Structural Profile)
कोनो पोथीक प्राज्ञिक मूल्यांकनक प्रारम्भ ओकर आधारभूत संरचना आ प्रकाशन विवरणसँ होइत अछि, जे कृति आ पाठकक बीच एकटा प्रारम्भिक सेतु निर्माण करैत अछि। 'ढोलक' संग्रहक प्रकाशन आ विन्यास सम्बन्धी तथ्यपूर्ण विवरण निम्न तालिकाक माध्यमे प्रस्तुत कएल जा रहल अछि:
पोथीक प्रारम्भमे कवि द्वारा 'शुभकामना' आ 'विनय' शीर्षक अन्तर्गत अपन मन्तव्य राखल गेल अछि, जतए ओ स्पष्ट करैत छथि जे हुनका द्वारा अनायास जे 'आडुरसभ नालपर ठोका जाइत छैक' सैह ई कविता संग्रह थिक। 'तस्मै श्री गुरूवे नमः' सँ प्रारम्भ भेल ई पोथी अपन सांस्कृतिक आ आध्यात्मिक जड़िकें सेहो सुरक्षित रखैत अछि।
४. 'ढोलक'क त्रि-आयामी संरचनाक दार्शनिक आधार
'ढोलक' संग्रहक समग्र रचना-संसार तीनटा सुव्यवस्थित खण्डमे विभक्त अछि: बाल-खण्ड, ताल-खण्ड आ नाल-खण्ड। ई त्रि-खण्ड वस्तुतः मानव जीवन आ समाजक त्रि-आयामी विकास-क्रमक प्रतीक थिक, जकरा कवि एकटा वाद्ययन्त्र 'ढोलक' क रूपककें आधार बना क' विनिर्मित कएने छथि। ई खण्ड-विभाजन कोनो यादृच्छिक (Random) संकलन नहि थिक, बल्कि एकर पछाति एकटा गम्भीर दार्शनिक आ मनोवैज्ञानिक योजना काज क' रहल अछि।
पहिल खण्ड 'बाल-खण्ड' मानव जीवनक शैशव, निश्छलता आ प्राथमिक सामाजीकरणक प्रतीक थिक। एतए कवि बाल-मनोविज्ञानक माध्यमसँ नीतिक शिक्षा, सामाजिक विडम्बना आ लोक-क्रीड़ाक चित्रण करैत छथि। दोसर खण्ड 'ताल-खण्ड' समाजक सांस्कृतिक, सांगीतिक आ भावनात्मक यौवनक द्योतक थिक। एहिमे मिथिलाक परम्परागत मांगलिकता, शृंगार, प्रेम, विरह आ नव-युगीन व्यंग्यक ताल बजैत अछि। तेसर आ अन्तिम खण्ड 'नाल-खण्ड' प्रौढ़ सामाजिक संघर्ष, क्रान्ति, दार्शनिक गम्भीरता आ व्यवस्था-विरोधक हुंकार थिक। नाल अर्थात् ढोलकक बायाँ गम्भीर भाग, जाहिसँ गम्भीर गर्जना निकलैत अछि, एहि खण्डक गाम्भीर्य आ क्रान्तिकारी चेतनाकें सार्थकता प्रदान करैत अछि।
“बाल–ताल–नाल”: नामकरणक भीतरक काव्य-दर्शन
तीनू खण्डक नाम पहिल दृष्टिमे खेल-खेलौना सन लगैत अछि, मुदा ई पोथीक सबसे सशक्त सम्पादकीय-काव्यात्मक निर्णयमे सँ एक अछि। “बाल” अर्थात बालक, आरम्भ, कोमलता, स्वाभाविक ध्वनि; “ताल” अर्थात लय, सामुदायिक गायन, देहक गति, उत्सव; “नाल” अर्थात जीवनकेँ जोड़निहार जैविक सूत्र, भीतरक नस-नाड़ी, स्रोत-संबंध। एहिना पोथी “फुर्र-फुर्र सुगा”क बाल-आश्चर्यसँ “जागरण गीत”क सामूहिक उच्चारण, आ तकर बाद “मनुखभमरा”, “समय”, “ढोलक!”, “खोजि रहल छी…”, “चुप्पी”, “खून त खून छैक!”, “नारी”, “मुसहरकेँ हम बच्चा छी!”, “पेट” आ “हे भगवान!” सन रचनासभ धरि पहुँचैत अछि।
ई क्रम विकासात्मक सेहो अछि। बाल-खण्डमे वस्तु बाहरी अछि—पक्षी, फल, चान, पतंग, फोन, दही-किताब, दीप, पोखरि। ताल-खण्डमे बाहरी संसार सामूहिक आवाज बनैत अछि—शुभकामना, जागरण, होरी, प्रेम, नृत्य, पायल। नाल-खण्डमे कवि भीतर आ बाहरक तनावकेँ सीधा भिड़बैत छथि—गरीबी, शहर, लोकतन्त्र, रक्त, भूख, सत्ता, अकेलापन, स्त्री, धर्म, युद्ध, नैतिक प्रश्न। एतए “नाल” व्यक्तिगत जीवन आ सामाजिक शरीरक बीच जोड़नि बनि जाइत अछि।
त्रिखण्डात्मक संरचना
५. बाल-खण्ड : बाल-मनोविज्ञान, लोक-क्रीड़ा आ नव-चेतनाक बीजारोपण
बाल-साहित्य लेखन कोनो भी भाषाक साहित्यक एकटा जटिल विधा मानल जाइत अछि। एकटा प्रौढ़ आ अनुभवी रचनाकारकेँ अपन ज्ञान आ पाण्डित्यकेँ बिसरि पूर्णतः शिशु-सुलभ कोमलता, तुकांत-गेयता आ बाल-मनक क्रीड़ा-भावमे लीन होमए पड़ैत अछि। वृषेश चन्द्र लाल एहि सन्दर्भमे अत्यन्त सफल सिद्ध भेल छथि। बाल-खण्डमे कुल २० टा बाल-कविता आ गीत संगृहीत अछि। एहि खण्डक विशेषता ई अछि जे बाल-संसारक भीतर गम्भीर सामाजिक-सांस्कृतिक सन्देश, राजनीतिक व्यंग्य आ नीतिक बीआ बोअल गेल अछि। ई बाल-कवितासभ केवल रञ्जनक लेल नहि, अपितु भावी पुस्ताकेँ सामाजिक यथार्थसँ परिचित कराबक लेल रचित अछि।
५.१ राजनीतिक व्यंग्य आ पञ्चतन्त्रीय नव-कथा
बाल-कवितालें सदिखन पशु-पक्षी आ प्रकृतिक प्रतीकक उपयोग कएल जाइत अछि। वृषेशजी सेहो खंजन चिड़ैया, सुगा, कौआ, मूस आदिक माध्यमसँ नव पञ्चतन्त्रक रचना कएने छथि, मुदा एहिमे आधुनिक राजनीतिक आ सामाजिक चेतनाक तीव्र पुट अछि। 'दुम-दुम बौआ' कवितामे कौआक (कागा) प्रतीक द्वारा बालककेँ चालाक आ अवसरवादी लोक (विशेषतः भ्रष्ट नेता वा अवसरवादी मित्र) सँ सावधान रहबाक शिक्षा देल गेल अछि। कवि बाल-मस्तिष्कमे ई बात स्थापित करबए चाहैत छथि जे समाजमे एहन लोक भरल अछि जे अपन स्वार्थ सिद्ध करबाक लेल अहाँक समक्ष नतमस्तक रहत, मुदा काज निकलितहि फुर्र भ' जएत। कागाक चरित्र-चित्रण एहि यथार्थकेँ उजागर करैत अछि जे ई अवसरवादी तत्त्व ससरि क' लग अबैत अछि आ मौका भेटितहि लोल मारि क' भागि जाइत अछि। ई पंक्तिसभ नेपालक वर्तमान राजनीतिकर्मीक चरित्रपर कतेक गंभीर व्यंग्य कएल गेल अछि, से डा. राजेन्द्र विमल अपन भूमिकामे स्पष्ट कएने छथि। अवसरवादक ई सजीव चित्रण बाल-गीतक आवरणमे एकटा प्रौढ़ राजनीतिक सत्यकेँ उद्घाटित करैत अछि।
तहिना, सामन्ती शोषण आ भ्रष्टाचारक विरुद्ध बाल-प्रतीक 'मुसरी बड्ड पेड़इअ' कवितामे मूस (चूहा) क माध्यमसँ समाजक ओहि शोषक वर्गपर प्रहार अछि जे बिना श्रम कएने अनकर अन्न हड़पैत अछि। एतए 'मुसरी' ओहि परजीवी वर्गक प्रतिनिधि अछि जे समाजक सम्पदाकेँ चुप्पे-चापे भीतर-भीतर खोखला क' रहल अछि आ बिना नेओतने लोकक घरमे पसि क' डकार लैत अछि। ई कविता बाल-मानसिकतामे मेहनत आ ईमानदारीक मूल्य स्थापित करबाक संगे-संग शोषक प्रवृत्तिप्रति वितृष्णा पैदा करैत अछि।
स्वतंत्रताक महत्ताकेँ प्रतिपादित करैत 'फर्र-फर्र सुगा' कवितामे कवि पिंजरामे बन्द सुगाक विडम्बनाकेँ दर्शावैत छथि। पिंजरामे बन्द सुगा जकरा 'राम-राम' रटबाक लेल बाध्य कएल जाइत अछि, ओकर मन वस्तुतः अपन परतन्त्रतासँ कारी भ' गेल अछि। ई कविता कविक अपन राजनीतिक बन्दी-जीवनक अनुभूतिकें सेहो प्रतिध्वनित करैत अछि। कवि बालककेँ ई सन्देश दैत छथि जे स्वतन्त्रताक लेल संघर्ष आवश्यक अछि। जखन धरि बान्ह (पिंजरा) नहि कटत, तखन धरि कतबो शीश झुकायलासँ मुक्ति नहि भेटत। ई पंक्तिसभ बालककेँ सम्प्रभुता आ स्वतन्त्रताक मूल्य सिखवैत अछि—जे स्वतन्त्रता याचनासँ नहि, अपितु संघर्षसँ प्राप्त होइत अछि।
५.२ नारी-विमर्श आ बालिका-शिक्षाक क्रान्ति
मैथिल समाज आ समग्र रूपेँ दक्षिण एसियाली समाजमे विद्यमान लैंगिक असमानतापर कवि अत्यन्त मार्मिक प्रहार कएने छथि। 'गे दैया हमरो दही किताब' शीर्षक कविता बालिका-शिक्षाक लेल एकटा क्रान्तिकारी गोहार थिक। एहि कवितामे कवि पितृसत्तात्मक समाजक ओहि दोहरो मापदण्डपर सीधा चोट करैत छथि जतए बेटाकेँ स्कूल पठाओल जाइत अछि आ बेटीकेँ घास काटय लेल बाध्य कएल जाइत अछि। जखन ओ बालिका अपन भाइसभकेँ स्कूल जाइत देखैत अछि, तँ ओकर भीतरक ज्ञान-पिपासा जागि उठैत अछि आ ओ अपन मायसँ किताबक माँग करैत अछि।
आगू कवि समाजक ओहि भरमक जालकेँ तोड़बाक आह्वान करैत छथि जाहिमे बेटाकेँ वंशक उद्धारक मानि क' पोसल जाइत अछि आ बेटीकेँ उपेक्षित कएल जाइत अछि। कविक स्पष्ट मानना अछि जे एहि भेदभावक कारणें समाज क्रमिक रूपसँ कंकाल बनि रहल अछि, कारण समाजक आधा अंगकेँ अशिक्षित राखि क' कोनो भी राष्ट्र वा समाज प्रगति नहि क' सकैत अछि। बालिका सशक्तीकरणक ई यथार्थवादी आ हृदयविदारक चित्रण कविकें एकटा प्रगतिशील समाज-सुधारकक रूपमे स्थापित करैत अछि आ बाल-साहित्यमे जेन्डर-सेंसिटिविटी (Gender Sensitivity) क उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करैत अछि।
५.३ बाल-मनोविज्ञान आ आधुनिक पारिवारिक विडम्बना
शहरीकरण, पूँजीवादी विकास आ एकल परिवार (Nuclear Family) क कारणें आधुनिक बालक सभक जे एकाकीपन अछि, तकर मनोवैज्ञानिक चित्रण 'फोन करैअ नानाजी' कवितामे भेल अछि। माता-पिताक कामकाजी जीवन आ बालकक यन्त्रवत् दिनचर्यामे नाना-नानीक प्रेम, कथा आ गीतक जे अभाव भ' गेल अछि, ओकरा कवि सहज बाल-सुलभ भाषामे अभिव्यक्त कएने छथि। पापा आ मम्मी दुनू गोटे अफिस दौड़ि रहल छथि आ बच्चाक हाथमे केवल टिफिनमे बन्द खाना अछि। एहन स्थितिमे बच्चाक भावनात्मक रिक्तताकेँ भरबाक लेल नानाजीक फोन अबैत अछि, जकरासँ बच्चा एकटा गीत सुनबाक आग्रह करैत अछि। ई कविता आधुनिक जीवन-शैलीक ओहि त्रासदीकेँ रेखांकित करैत अछि जतए भौतिक सुख-सुविधा तँ अछि, मुदा पारम्परिक पारिवारिक उष्मा आ ओरल ट्रेडिशन (Oral Tradition) विलुप्त भ' रहल अछि।
'गुड्डी उड़ए आकाशमे' कवितामे कवि पतंगक माध्यमसँ जीवनक उडान आ ताहिमे निहित प्रतिस्पर्धाक चित्रण करैत छथि, जतए धागा तानिते पतंग ऊँच होइत अछि आ संगीक पतंग काटबाक होड़ लागल रहैत अछि। ई बाल-क्रीड़ा जीवनक संघर्षक एकटा सुन्दर रूपक थिक।
५.४ सांस्कृतिक धरोहरि आ प्रकृति-चित्रण
मिथिलाक लोक-पर्व, ऋतु-परिवर्तन आ प्राकृतिक सौन्दर्यक अद्भुत चित्र बाल-खण्डक अन्य कवितासभमे भेटैत अछि। ई कवितासभ नव पुस्ताकेँ अपन माटि, खान-पान आ परम्परासँ जोड़बाक महत्त्वपूर्ण काज करैत अछि। 'चौरचन चौरचन उगल चान' मे भादव मासक चौरचन (चन्द्र दर्शन) पर्वक उल्लास चित्रित अछि, जतए बालक पूरी, दही, पिरूकिआ, खोआ-खीर, तरूआ, तिलकोर आ नरिअलक लेल लालायित अछि। 'मज्जर' कवितामे आमक गाछमे मज्जर (मञ्जरी) अबबाक सुगन्ध आ भँवराक गुञ्जनक संगे-संग अमोट आ अमरासा बनबाक आशाक चित्रण अछि।
'होरी अएलै हुर्रर्रर्र !' मे फागुनक रंगीनीक वर्णन अछि, जतए मालपू, बड़ी आ तरूआ छना रहल अछि, तासा-ढोल बाजि रहल अछि, आ पिचकारीसँ रङ्ग उगलल जा रहल अछि। 'चकैके चकढुम' आ 'ता ता थैया करू बौआ' जकाँ कवितासभमे दादा-दादी आ नाना-नानीक कोरामे खेलैत बालकक निश्छल आनन्द अभिव्यक्त भेल अछि। 'पोखरिक कात', 'सोन चिड़ैया' आ 'आ आ रे खंजन चिड़ैया' जकाँ गीत बाल-मनकेँ प्रकृतिक समीप ल' जाइत अछि आ पशुपक्षीसँ तादात्म्य स्थापित करैत अछि।
बाल-खण्ड: ध्वनि, दृश्य आ बाल-मनोविज्ञान
बाल-कविता लिखब आसान बुझाइत अछि, मुदा सफल बाल-कविता लेल भाषा केँ छोट करब पर्याप्त नहि। ओकरा आश्चर्य, आवृत्ति, खेल, ध्वनि, दृश्य आ स्मरणीय गति चाही। “ढोलक”क बाल-खण्ड एहि कसौटीपर कतेको ठाम सफल अछि। “फुर्र-फुर्र सुगा”, “गुड्डी उड़य आकाशमे”, “धुम-धुम कौआ”, “फुर्र-फुर्र बगड़ा”, “फोन करैअ नानाजी”, “ता ता थैया कर कौआ”, “होरी अयलै हुर्रर्र!”, “चकके चकदुम”, “सोन चिड़ैया”, “चमक-चमक दीयाबाती”, “मुसरी बहु पेड़इअ” आदि शीर्षक मात्रे ध्वनि आ गति पैदा करैत अछि।
बाल-खण्डक कविता सभमे अनुकरणात्मक ध्वनि अर्थक पहिल द्वार अछि। बच्चा पहिने “कौआ” वा “सुगा”क जैविक परिचय नहि लैत अछि; ओ “फुर्र”, “धुम”, “चक”, “ता-ता थैया” सन ध्वनिसँ संसारक अनुभव करैत अछि। कवि एहि मनोवैज्ञानिक सत्यकेँ सहज रूपमे ग्रहण करैत छथि। पुनरुक्ति पंक्तिक संगीत बनबैत अछि, संगहि बच्चाक स्मृति-संरचना अनुरूप भाषाकेँ चक्राकार करैत अछि।
चित्रक उपयोग एहि खण्डमे सामान्यतः सहायक अछि। पक्षी, पतंग, दीप, फल, बच्चा—सभक प्रत्यक्ष चित्र बाल-पाठककेँ तात्कालिक प्रवेश देैत अछि। तथापि साहित्यिक दृष्टिसँ एक सीमा सेहो अछि: जखन चित्र बहुत प्रत्यक्ष होइत अछि, तखन कविता सँ उपजल कल्पना-पटचित्रक स्वतंत्रता घटि सकैत अछि। भविष्यमे एहन संस्करणमे मिथिला-चित्रकला वा एकरूप मौलिक रेखांकनक प्रयोग संग्रहक दृश्य-व्यक्तित्वकेँ बेसी विशिष्ट बना सकैत अछि।
बाल-खण्डक दोसर महत्त्वपूर्ण पक्ष पारिवारिक आत्मीयता अछि। “फोन करैअ नानाजी”, “गे दैया हमरो दही किताब”, “सोन चिड़ैया” आदि कवितामे परिवार आ घरेलू संबोधन कविता केँ लोकबोलीक उष्मा देैत अछि। ई बाल-साहित्यकेँ नैतिक उपदेश बनबाक सँ बचबैत अछि, यद्यपि कतेको रचनामे संदेश स्पष्ट अछि।
बाल-खण्ड (२० कविता)
बाल-खण्डमे संकलित कविता सभ देखबामे शुद्ध बाल-साहित्य छथि — चिड़ैया-चोर-पंछी, पर्व-त्योहार, खेलकूद आ पारिवारिक स्नेह-सम्बन्धक लेल सरल-सहज तुकबन्दी छन्दमे, जेना ‘फर्र-फर्र सुगा’, ‘ता ता यैया कर बौआ’, ‘आ आ रे खंजन चिड़ैया’। मुदा डूबल नजरिसँ देखल जाए त एहि खण्डमे सेहो कविक सामाजिक चेतना केओ ने केओ ठाम डोली मारैत अछि। ‘फर्र-फर्र सुगा’ कवितामे मिरचाइ खाइत सुगाकेँ पिंजरामे बन्न कएल गेल कष्टक वर्णन अछि, आ अन्तमे ‘बिनु कटने ने छूटत बान्ह, कतबो भुकाएब शीश आ कान्ह’ जेना पंक्तिमे स्वतन्त्रता-चेतनाकेँ समेटि देल गेल छैक। एहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे कवि लालक लेल बाल-साहित्य सेहो केवल मनोरंजनक साधन नहि, अपितु मूल्य-संस्कारक माध्यम सेहो थिक।
एकटा रसप्रद शाब्दिक खेल सेहो देखबामे अबैत अछि कविता ’करोना’मे — शीर्षक पढ़ितहि संसारमारी महामारीक स्मरण होएब स्वाभाविक अछि, मुदा वास्तवमे ई कारोंदा/करोंदा नामक मिथिलांचलक फरक आधारित एकटा सरल बाल-कविता थिक, जाहिमे लरिका सभ फर तोड़ि-तोड़ि चुनि अचार बनबैत छथि आ चट-चट बाजसँ भालु भगा कए भजैत छथि। एहि प्रकारक शाब्दिक संयोग कविक भाषिक चंचलताकेँ सेहो दर्शबैत अछि।
६. ताल-खण्ड : पारम्परिक मांगलिकता, श्रृंगार, विरह आ आधुनिकताक द्वन्द्व
'ढोलक' संग्रहक दोसर खण्ड 'ताल-खण्ड' अछि, जाहिमे १५ टा गीत संगृहीत अछि। ई खण्ड मिथिलाक शास्त्रीय आ लोक-संगीतक ताल (लहरी, सम, मात्रा) पर आधारित रचनासभक समुच्चय थिक। एहिमे प्राचीन परम्परासँ ल' क' आधुनिक विसंगतिधरि कें सांगीतिक रूपमे उकेरल गेल अछि। कवि एहि खण्डमे अपन लोक-संस्कृतिक गहिर समझ आ सांगीतिक बोधक परिचय दैत छथि।
६.१ नव-सामवेद आ मांगलिक गान
वरिष्ठ समालोचक परमेश्वर कापड़ि अपन भूमिकामे 'शुभे हो शुभे !' गीतकेँ 'नव लोक-सामवेद गान' कहने छथि। मिथिलाक परम्परागत अनुष्ठानिक चुमाओनक मन्त्र 'शुभे हे शुभे' जे प्रायः रूढ़िगत भ' गेल छल, तकरा कवि नव युगीन राष्ट्रिय-सामाजिक मंगल-कामनाक रूपमे ढालने छथि। एहि नव-मन्त्रमे कवि केवल वैयक्तिक मंगलक कामना नहि करैत छथि, बल्कि सम्पूर्ण समाजक गौरव, स्वास्थ्य, सेवा, समृद्धि आ सद्गुणक कामना करैत छथि। ई गीत अङ्गनमे शक्तिक वास, घरमे सुखक मचान, सभ घरमे धान आ सोना सन सन्तानक प्रार्थना करैत अछि। ई लोक-गीत मात्र पूजा-पाठक मन्त्र नहि, अपितु एकटा समृद्ध, स्वस्थ आ शान्तिपूर्ण समाजक लेल सामूहिक आ सेक्युलर (Secular) प्रार्थना बनि गेल अछि।
६.२ सांस्कृतिक गौरव आ जागरण-स्वर
'सियाजीक छन्हि आइ बिआह, जनकपुरमे' गीतमे जानकी परिणयक पारम्परिक उल्लासक सजीव झाँकी प्रस्तुत कएल गेल अछि। मिथिलाक लोक-कण्ठमे सीता-विवाहक जे सांस्कृतिक महत्ता अछि, तकरा कवि अवधकिशोरक धनुष भंग, वरमालक दृश्य, मिथिलाक मोरक नाचनाइ, कोबर आ बाँसक लिखाइ, आ राम-लखनक परिछनक माध्यमसँ चित्रित कएने छथि। ई गीत मिथिलाक सांस्कृतिक अस्मिता आ ऐतिहासिक गौरव गान थिक।
ओतहि, 'जागरण गीत' मे कवि लोकतान्त्रिक आन्दोलनक सिपाहीक रूपमे जनताकेँ जगाबक आह्वान करैत छथि। क्रान्ति पवन बहि रहल अछि, तम (अन्धकार) भागि रहल अछि, आ मशाल बनि क' आगू बढ़बाक समय आबि गेल अछि। कवि यथास्थितिवादपर प्रहार करैत पुछैत छथि जे लोक कखन धरि अधिकार छोड़ि क' सूतल रहत आ प्रतिकारक समयमे डेराए क' भागल फिरत। मुट्ठी कसि क' न्याय लेल लड़बाक ई आह्वान समाजक सुप्त चेतनाकें झकझोरैत अछि।
६.३ विद्यापति परम्पराक शृंगार आ विरह-वेदना
मैथिली साहित्यमे महाकवि विद्यापतिक शृंगार आ विरह वर्णनक जे समृद्ध परम्परा अछि, तकरा वृषेश चन्द्र लाल अपन गीतसभमे नव भाषा आ बिम्बक संग जीवन्त कएने छथि। 'गोरकी नजरि मोर', 'धक् धक् करय करेज मोर', 'नइ आउ एना मोनमे', 'प्रीतक गीतमे', आ 'झुनुक झुन झुनझुन पायल बाजए' जकाँ गीतसभमे रसमय श्रृंगार, रूप-सौन्दर्य आ विरहक गम्भीर टीस अभिव्यक्त भेल अछि।
'गोरकी नजरि मोर' मे नायिकाक सौन्दर्यक मादक चित्रण अछि, जतए ओकर एक झलक सजन-मनकेँ हरि लैत अछि। नायिकाक गालक लालीमे चानक मुस्कान आ खोपाक गुलाबक लजाएब, संगे-संग पाजेबक झुन-झुन सँ धड़कनक बढ़ब—ई सभटा विद्यापतिक सौन्दर्य-बोधक स्मरण करावैत अछि।
विरहक चित्रणमे प्रकृतिक मानवीकरण सेहो अद्भुत अछि। 'धक् धक् करय करेज मोर' मे साओनक मेघसँ भरल आकाश, नुकभुक करैत चान आ कू-कू करैत कोइली वियोगिनीक प्रेम-पिपासाकेँ बढ़ा रहल अछि। 'झुनुक झुन झुनझुन पायल बाजए' मे विरहक राति युग-युग सन अनन्त लागैत अछि आ पियसंग बीतल क्षण अत्यन्त छोट। ई गीतसभ प्रमाणित करैत अछि जे राजनीतिक कोलाहलक बीच सेहो कविक हृदयमे एकटा निश्छल आ कोमल भाव-संसार सुरक्षित अछि।
६.४ आधुनिकताक विद्रूपता आ पप-व्यंग्य
एहि खण्डक सभसँ विशिष्ट रचना थिक 'कतसँ करू शुरू'। परमेश्वर कापड़िजीक अनुसार ई मैथिलीक पहिल 'पप-गीत' (Pop Song) थिक, जकरा कवि १९८६ मे रचने छलाह आ ई पछाति मैथिलीक पहिल टेलीफिल्म 'दहेज' मे अत्यधिक लोकप्रिय भेल छल। ई गीत तत्कालीन आ वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक भ्रष्टाचारपर एकटा तीक्ष्ण आ निर्मम व्यंग्य थिक। पश्चिमी डिस्को-डांसक लयपर रचित ई गीत समाजक मूल्य-ह्रास आ अर्थ-प्रधान (Money-centric) मानसिकताकेँ पूर्ण रूपेँ नग्न क' दैत अछि।
कवि आधुनिक पुस्ताक दिशाहीनताक चित्रण करैत कहैत छथि जे कारी अक्षर भैंस बराबर अछि, मुदा हेमा मालिनी आ धर्मेन्द्रक सिनेमा सभ देखल अछि। पढ़ाई-लिखाई बेकार अछि, कारण कुर्सीपर बैसल लोक घूस खाइत अछि, मौज करैत अछि आ कारपर चढ़ैत अछि, जखन कि बुद्धिमान लोक लाचार अछि। समाजक ई यथार्थ जे बिना रुपैयाक नहि बाप अछि नहि माय, ओकरा कवि अत्यन्त सटिक रूपेँ प्रस्तुत कएने छथि। ई गीत व्यंग्यात्मक लहजामे स्मगलिंग शुरू करबाक जे आह्वान करैत अछि, ओ वस्तुतः भ्रष्ट व्यवस्थापर एकटा जोरदार तमाचा थिक।
ताल-खण्ड: गीत, उत्सव आ सामूहिक देह
ताल-खण्ड संग्रहक मध्य-प्रदेश अछि। एतए कविता पढ़बाक अपेक्षा गाबय, दोहराबय, मंचपर उच्चारण करय वा सामूहिक रूपमे अनुभूत करबाक आग्रह बेसी अछि। “शुभकामना गीत”, “जागरण गीत”, “हँ रे सुगना”, “धक-धक करय करेज मोर”, “होरीक गीत”, “प्रीतक गीतमे”, “भुकु-भुकु कुन कुनुकुन पायल बाजए”, “एकटा सुगन गीत”, “आश बाँचिते रहत”, “गोरकी नजरि मोर” आदि रचनामे आवर्त-पंक्ति, संबोधन, लयात्मक पुनरुक्ति आ लोकगायनक संरचना स्पष्ट अछि।
“शुभकामना गीत”मे मंगल, जीवन, स्वास्थ्य, सम्मान आदिक पुनरावृत्ति गीतकेँ अनुष्ठानिक स्वर देैत अछि। “जागरण गीत” राजनीतिक-सामाजिक चेतना केँ गीतक तालमे बदलैत अछि। “होरीक गीत”मे रंग, देह, हास्य, प्रेम आ समुदाय एक संग चलैत अछि। एहि रचनासभक मूल्य केवल लिखित पाठमे नहि; ओकर पूरा जीवन सम्भवतः मंच, जुलूस, उत्सव वा गोष्ठीमे खुलैत अछि। एहि कारण “ढोलक”केँ केवल मुद्रित कविता-संग्रह मानब पर्याप्त नहि—ई वाचिक-प्रदर्शनकारी काव्यक दस्तावेज सेहो अछि।
ताल-खण्डक भाषा प्रायः छोट पंक्ति, ध्वनि-आधारित यति आ प्रत्यावर्तनपर टिकल अछि। पारम्परिक मात्रिक अनुशासन प्रत्येक रचनामे कठोर नहि, मुदा श्रव्य-ताल लगातार सक्रिय अछि। एहि भेदकेँ बुझब आवश्यक: लिखित छन्दक असमानता हरदम लयहीनता नहि होइत अछि। कतेको कविता लोक-गायनक साँस पर चलैत अछि, व्याकरणिक पंक्ति-लम्बाइपर नहि।
ताल-खण्ड (१५ कविता)
ताल-खण्डमे गीत/गीतिका शैलीक रचना सभ संकलित छथि — प्रेम, विरह, मिलन आ पर्व-संस्कारगत प्रसंग। ‘सियाजीक छन्हि आइ बिआह, जनकपुरमे’ सन गीतमे जनकपुरधामक सांस्कृतिक पहचान — सीता-राम विवाहक प्रसंग — केन्द्रमे राखि कवि अपन बोलीक रचनाकेँ आगन्तुक भूमिसँ जोड़ैत छथि। ‘हँ रे सुगबा’, ‘धक्-धक् करय करेज मोर’ बेरा कवितामे लोकगीतक लय-संरचना आ आलंकारिकता दुनू देखाइ परैत अछि। एहि खण्डकेँ समाप्त करएबला कविता ‘कत्तसँ शुरू’ भ्रष्टाचारपर एकटा व्यंग्यगर्भ रचना थिक, जे भूमिकाकार दुनू विद्वान्सक अनुसार पहिल मैथिली टेलीफिल्म ’दहेजमे आएल छी’मे सेहो प्रयुक्त भेल रहल अछि।
७. नाल-खण्ड : समाजशास्त्रीय यथार्थ, क्रान्ति आ दार्शनिक विमर्श
संग्रहक तेसर आ सभसँ गम्भीर खण्ड थिक 'नाल-खण्ड', जाहिमे ६२ टा कविता संगृहीत अछि। नाल अर्थात् ढोलकक बायाँ गम्भीर स्वर। एहि खण्डमे कवि जीवनक नग्न, उबड़-खाबड़ आ विज्ञानसम्मत जमीनपर ठाढ़ भए मानवीय मूल्य आ युग-मूल्यक संधान करैत छथि। ई खण्ड कविक राजनीतिक अनुभव, दार्शनिक चिन्तन आ समाजशास्त्रीय दृष्टिक सर्वोत्कृष्ट प्रतिफलन थिक।
७.१ 'ढोलक'क रूपक : सीमान्तीकृत वर्गक क्रन्दन आ शोषणक यथार्थ
पोथीक शीर्षक-कविता 'ढोलक !' वस्तुतः समाजक उपेक्षित, शोषित आ सर्वहारा वर्गक जीवन्त आ मर्मस्पर्शी प्रतीक थिक। ढोलकक भौतिक नियति आ सीमान्तीकृत जन-समुदायक सामाजिक नियतिमे कवि अभूतपूर्व समानता देखैत छथि। कवि चित्रण करैत छथि जे ढोलककेँ टाटक कोन्हमे लटका क' राखल जाइत अछि, मुदा जखन कोनो उत्सव, भजन-कीर्तन, जन्म वा मरणक अवसर अबैत अछि, तखन ओकरा उतारि क' ओकर उपयोग कएल जाइत अछि।
ओकरा 'जाँघतर दबा क' पीटल जाइत अछि'—ई पंक्ति श्रमजीवी वर्गक चरम शारीरिक आ मानसिक शोषणक सटीक रूपक थिक। समाजक अभिजात वर्ग (Elite class) वा राजनीतिक सत्ता सर्वहारा (मजदूर, दलित, उत्पीडित) वर्गक उपयोग मात्र अपन 'उत्सव' (चुनाव, विकास निर्माण, आन्दोलन) क लेल करैत अछि। मुदा जखन काज खतम भ' जाइत अछि, तखन ओकरा फेर समाजक 'अन्हार कोन्हमे' गुमनामीक जिन्नगी जीबय लेल, फटलाहा गुमसल बोरा ओढ़ा क' लटका देल जाइत अछि। मार्क्सवादी आ सबाल्टर्न (Subaltern) विमर्शक ई एकटा उत्कृष्ट उदाहरण थिक, जतए कवि विरक्ति आ विद्रोहक सम्मिलित स्वर प्रस्तुत करैत छथि।
शीर्षक ’ढोलक’क प्रतीकात्मक अर्थ
संग्रहक शीर्षक-कविता ‘ढोलक !’ (पृ. ५४) पोथीक वैचारिक केन्द्र थिक। एकर मूल पंक्ति स्पष्ट अछि — ढोलक भरि उत्सव, भजन-कीर्तन, जन्म-मरण, रिआज-रिवाज — सभकेँ एकरसाँ एहेन जोगारसँ बजैत अछि, मुदा अन्ततः प्रयोगक बाद फेरो — ओही खुट्टीपर, ओही कोन्हमे, अन्हारमे लटका देल जाइत छैक।
ढोलक ! लटकल छैक टाङल छैक
टाटक कोन्हमे ठोकल खुट्टीसँ बान्हल छैक !
…
अन्हारमे लटका दैत छैक !!
एहि रचनामे ढोलक सर्वहारा-श्रमिक जीवनक प्रतीक बनि जाइत अछि — जे सदिखन आनक तुष्टि लेल बजैत अछि, अपन संतुष्टि लेल कहियो नहि। कवि स्वयं ‘विनय’ शीर्षक कवितामे अपन लेखनकेँ सेहो एहि रूपकसँ जोड़ैत छथि —
ढोल्क घोलमे ईहो आ एहनो बोल, बेताले सही धुना जाइत छैक।
मतसुन्नक ‘मत’ आ ‘मखौल’, अपने अनजाने बुना बुना जाइत छैक !!
एहिसँ स्पष्ट बूझा जाइत अछि जे ‘ढोलक’ शीर्षक मात्र ग्राम्य-सांस्कृतिक वाद्यकेँ इंगित नहि करैत अछि, अपितु स्वयं कविक सृजन-कर्मकेँ ओहि रूपक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि — मतसुन्नक मत आ मखौलकेँ लय देबाक साधन, जेकर आघातसँ कखनो-कखनो बेताल स्वर सेहो धुनि उठैत छैक। आन्तरिक साक्ष्यक रूपमे एहि संग्रहक संरचना सेहो एकरा पुष्टि करैत अछि: खण्डक नाम ‘ताल-खण्ड’ आ ‘नाल-खण्ड’ सेहो ढोलककेँ संरचनागत रूपक दैत अछि — ताल (स्वर-लय) आ नाल (आन्तरिक धड़कन, नाड़ी-स्पन्दन)।
७.२ 'मनुखमारा' : गैर-सरकारी संस्था आ बौद्धिक पाखण्डपर निर्मम प्रहार
वर्तमान विकास-उद्योग (Development Industry) आ एनजीओ (NGO) संस्कृतिक पाखण्डपर 'मनुखमारा' कविताक प्रहार साहित्यक इतिहासमे स्मरणीय रहत। दलित आ मुसहर समुदायक गरिबी आ विपन्नता कोना बुद्धिजीवी, शोधकर्ता आ नेता लोकनिक लेल 'कमाईक धन्धा' वा 'प्रोजेक्ट' बनि गेल अछि, तकर नग्न यथार्थ एहिमे अछि। कवि व्यंग्य करैत छथि जे मुसहरकेँ मुसहरे राखब आवश्यक अछि, तखने तँ ओकरा निहारि क' फोटो खींचल जएतैक, माङि-चाङि क' भीख देल जएतैक आ जमओरा झारल जएतैक।
सभ्य कहबैका वर्गक कोठीमे पारम्परिक विविधताक बखान करबाक लेल एकटा जिन्दा गरिबक आवश्यकता होइत अछि। मुसहर वर्ग जौं शिक्षित आ समृद्ध भ' जएताह तँ समाजशास्त्रक 'विषय' समाप्त भ' जएतैक, विदेशी फण्ड बन्द भ' जएतैक, आ पर्यटक घटि जएताह। तें ओकरा गरिबे राखब आवश्यक अछि, जाहिसँ मुसहरक नामपर नारा लगा क' चारा खायल जा सकए। कवि अन्तिम पंक्तिमे अत्यन्त मार्मिक प्रश्न करैत छथि जे ओ गरिब तँ पेट भरबाक लेल केवल मूस मारैत अछि, मुदा ई विकासक ठेकेदार सभ जे ओकर जीवन आ भविष्य मारि रहल छथि, ओ सभ साक्षात् 'मनुखमारा' छथि। ई कविता दलित-विमर्शक ओहि ढोंगकेँ पर्दाफाश करैत अछि जतए सहानुभूति एकटा मुनाफेदार व्यवसाय बनि चुकल अछि।
७.३ शहादतक राजनीतिकरण आ व्यवस्थाक छलावा
नेपालमे भेल विभिन्न आन्दोलन (जन-आन्दोलन, मधेश आन्दोलन) मे जनता जे शहादत देलक, तकर राजनीतिकरण कोना भेल, से 'ल' अग्निशिखा रेड़मे' कवितामे स्पष्ट अछि। शहीदक ठन्ढाएल खून आ मायक थुनक दुहाई द' क' जे बेइमान नेता सभ सत्तामे पहुँचल छथि, हुनक नग्न चरित्रक चित्रण एतए भेल अछि। शहीदक खूनक ठोप लगा क', कीनल फूल चढ़ा क' आ घर-परिवारकेँ किछु मालपानी वा नोकरी द' क' ई नेता सभ शहादतकेँ चुनावमे 'सूदि संग' (ब्याज सहित) भजा लैत छथि।
ई कविता क्रान्तिक मोहभंग (Disillusionment) क कविता थिक, मुदा ई पूर्णतः निराशावादी नहि अछि। कवि चेतावनी दैत छथि जे क्रान्तिक ई ज्वाला एखन भलेहि सुसुमे (सुसुप्त) होउक, मुदा भीतरसँ सभ गरमा रहल अछि। ई शहादत 'रक्तबीज' बनि गेल अछि आ जखन कालक्रममे ज्वार उठत, तखन ई श्वेत-खोल ओढ़ने नेता सभक चिथड़ी उडि जएतैक आ गन्हकीक (भ्रष्टाचारक) सड़ल ढेरमे आगि लागि जएतैक।
७.४ शहरीकरणक सन्त्रास आ सम्बन्धक यान्त्रिकीकरण
आधुनिक शहरी जीवनक दिशाहीनता, यान्त्रिकता आ संवेदनहीनताक यथार्थवादी चित्रण 'हमर शहर बहुराएल अछि' मे भेल अछि। शहरक कोलाहलमे मनुख कोना बेहोश आ अहुँराएल अछि, तकर शब्द-चित्र कवि 'बेगिन्ती बेहाल बेकल, बेढंगी बेजान बेचल' जकाँ अनुप्रासयुक्त पदावलीसँ खीचने छथि। भोरेसँ कारी अन्हार, आलसक पथार आ दोसरेपर दारोमदार—ई सभटा शहरक सठिआएल आ बकझाएल स्थितिकेँ देखावैत अछि, जतए उठैत हुंकार सभ बोझक भार सँ दबाएल अछि।
तहिना, सम्बन्धक व्यापारीकरण आ पाश्चात्य संस्कृतिक अन्धानुकरणपर 'फादर्स डे' जकाँ कवितामे तीक्ष्ण प्रहार अछि। माता-पिता आब आदरक पात्र नहि, अपितु 'म्यूजियम आइटम' बनि गेल छथि, जकरा बरस दिनमे एक बेर पोछि क' धोअल जाइत अछि। फेसबुकपर गोर लागि क' आ 'फादर्स डे' तथा 'मदर्स डे' मे मिठाइ खुवा क' वर्ष भरिक लेल कर्तव्यक इतिश्री क' लेल जाइत अछि। भ' सकैत अछि जे सन्तान कहियो नहि भेटए आ कुरियरसँ प्रणाम पठा दए। सम्बन्धसभक ई भर्चुअल (Virtual) आ कुरियर-आधारित सत्य नव पुस्ताक खोखलापन आ परम्परागत पारिवारिक मूल्यक पतनकेँ उजागर करैत अछि।
७.५ दार्शनिक आयाम : समय, अस्तित्व आ जिजीविषा
वृषेश चन्द्र लालक कवितामे क्रान्तिक संगे-संग एकटा गम्भीर दार्शनिक (Philosophical) चिन्तन सेहो प्रवाहित अछि। 'समय' कवितामे ओ काल-तत्वक सर्वशक्तिमत्ता आ निरपेक्षताक वर्णन करैत छथि। समयक कोनो भूत वा भविष्य नहि होइत अछि, ओ सदैव एकटा सिद्ध वर्तमान अछि। समयक कोनो धर्म, अधर्म, राग, वा द्वेष नहि अछि; ओ निराकार आ सर्वशक्तिमान अछि, जे सृष्टिक आरम्भसँ ल' क' प्रलय धरि समान गतिसँ चलि रहल अछि।
'जखन तक ई जिनगी' मे शून्यवाद (Nihilism) आ अस्तित्ववाद (Existentialism) क सुन्दर समन्वय भेटैत अछि। कवि मानैत छथि जे जेना अन्हार शून्य अछि, प्रकाश सेहो शून्य अछि। अस्तित्वक आधार शून्य थिक। मुदा एहि शून्यताक बोधक बावजूद, ओ कर्मसँ पलायन नहि करैत छथि। ओ घोषणा करैत छथि जे जखन धरि जीवन अछि, ओ मशाल जरा रहत आ शून्येसँ ल' क' शंख बजा रहत। ई सार्त्र (Jean-Paul Sartre) क अस्तित्ववादक समतुल्य अछि, जतए मनुख निरर्थकताक बीच अपन कर्मसँ अर्थक निर्माण करैत अछि।
'ई सुरुज देखू अस्ताइत' मे अस्ताचलगामी सूर्य सेहो मृत्युलोकमे नव सृजनक (काल्हि हेतैक निश्चित भोर) सन्देश ल' क' अबैत अछि। ई कविता कालक चक्रीयता आ प्रकृतिक शाश्वत आशावादक प्रतीक थिक। 'खोजि रहल छी...' मे कवि अपन हेराएल धरती, अपन मूल पहिचान आ अपन अखण्ड संस्कृतिक अन्वेषण क' रहल छथि जे आब खण्डित आ दूषित भ' गेल अछि।
७.६ प्रतिरोधक मनोविज्ञान आ न्याय-अन्यायक द्वन्द्व
'धैर्यवान लोक !' कवितामे कवि ओहि आम नागरिकक मानसिकतापर व्यंग्य करैत छथि जे अन्याय सहि क' सेहो चुप रहैत अछि। गामक आ समाजक लोक सहनशील आ शान्तिप्रिय अछि, मुदा ई सहनशीलता वस्तुतः कायरताक दोसर नाम अछि, जतए लोक सोचैत अछि जे 'किछु नहि होइत छैक' आ 'किछु हएबो नहि करत'। ई कविता एहि निष्क्रियताकेँ तोडबाक आह्वान अछि।
मुदा, 'चुप्पी' कवितामे कवि मौनकेँ एकटा रणनीतिक हतियार मानैत छथि, जे निर्लज्जक सामना करैत अछि आ उर्जा उगलैत अछि। 'आह !' कवितामे ओहि पलायनवादी मानसिकतापर चोट अछि जे बिना कोनो दर्द सहने, बिना लड़ले-भिड़ले सुन्दर भविष्य आ विकासक कामना करैत अछि।
'के कएलह ई खून ?' आ 'खून त खून छैक !' कवितासभमे हिंसा, हत्या आ राजनीतिक अपराधपर कठोर प्रहार अछि। हत्यारा कतबो छली आ स्वार्थी होउक, कतबो कायरतापूर्ण ढंगसँ नुकौने होउक, मुदा खूनक यथार्थ मेटैत नहि अछि। न्याय आ अन्यायक ई द्वन्द्व यमलोकक खाताधरि पहुँचैत अछि, जतए खुनियाँक हिसाब निश्चित रूपेँ होइत अछि। ई कवितासभ समाजमे व्याप्त दण्डहीनता (Impunity) क विरुद्ध एकटा नैतिक आवाज थिक।
अन्ततः, 'अपनेसँ करक अछि बात' कवितामे कवि अपन आन्तरिक द्वन्द्व, एकाकीपन आ दबल भावनासभकें ओरिआबक (संयोजित करबाक) आ फेर बाकसमे बन्द क' देबाक जे मार्मिक चित्र खींचैत छथि, ओ कविक संवेदनशीलताक चरम बिन्दु थिक।
नाल-खण्ड: सार्वजनिक जीवनक नस-नाड़ी
६२ रचनाक नाल-खण्ड पोथीक मुख्य देह अछि। एतए कवि घरेलू आ उत्सवी संसारसँ बाहर निकलि नगर, राजनीति, वर्ग, धर्म, गरीबी, लोकतन्त्र, हिंसा, स्त्री, श्रम, बाजार, समय, मृत्यु, युद्ध आ आत्म-संशय धरि जाइत छथि। “हमर शहर बहुहाल अछि…”, “मनुखभमरा”, “समय”, “ढोलक!”, “जखन तक ई जिनगी”, “ई सूरुज देखू अस्ताइत”, “खोजि रहल छी…”, “तप?!”, “बेथान लोक!”, “चुप्पी”, “के कटलक ई खून?!”, “खून त खून छैक!”, “अपनेकें करक अछि बात”, “पिंजरा”, “शाकल सुनल उठह गे बाबल”, “अर्थिक”, “’मुसहर’के हम बच्चा छी!”, “बीआ संघर्षके”, “नारी”, “जीवन सपना”, “चुप्प छी”, “महान छी?”, “सहमति”, “बात त सहज छैक”, “आह, रुपैया!”, “हिमपात”, “धर धर रे!”, “हमर शहर”, “की तोरा लेल?!”, “लोक”, “अजीब अछि!”, “विस्फोट”, “जोगिरा!”, “पेट”, “चुनरीमे दाग”, “हे भगवान!”—ई शीर्षकसभ स्वयं संग्रहक विशाल सामाजिक भूगोल बता दैत अछि।
एहि खण्डमे कविक सबलता अवलोकन अछि। ओ महान काव्य-विषय खोजय लेल मिथकीय दूरी पर नहि जाइत छथि; सड़क, शहर, भिखारी, मजदूर, जुलूस, मोबाइल, रुपैया, पेट, खून, कुर्सी, योजना, मतदान, धर्म, फोटो, आगि—ई सभ हुनकर काव्य-सामग्री अछि। आधुनिकताक वस्तु-संसार एतए प्रत्यक्ष प्रवेश करैत अछि। ई जनवादी सौन्दर्यशास्त्रक एक रूप अछि: कविताक योग्य विषय केवल “सुन्दर” नहि, बल्कि जे सामाजिक जीवनमे दबाव पैदा करैत अछि से सभ अछि।
शीर्षक कविता “ढोलक!”: पोथीक केन्द्रीय रूपक
शीर्षक कविता संग्रह बुझबाक कुंजी अछि। कविता एकटा ढोलकक दृश्यसँ शुरू होइत अछि—माटिक घरक कोनमे टाँगल/लटकल वाद्य। अवसर पड़ला पर ओकरा उतारल जाइत अछि; पूजा, संस्कार, उत्सव, अभ्यास, लोकरीति, आनक प्रसन्नता वा अपन आवश्यकताक अनुसार ओकर डोरी कसि ध्वनि ठीक कएल जाइत अछि; काम समाप्त भेला पर फेर ओही कोनमे टाँगि देल जाइत अछि, फाटल-पुरान आवरणमे, अन्हारमे, अनिश्चित समय धरि।
एहि कथा-जेकाँ सरल दृश्यक भीतर तीक्ष्ण सामाजिक रूपक अछि। समाज अक्सर कलाकार, श्रमिक, स्त्री, दलित, कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी वा साधारण नागरिककेँ तखन स्मरण करैत अछि जखन ओकर उपयोग हो। “ध्वनि” चाही त ढोलक उतारू; ध्वनि समाप्त त फेर टाँगि दिअ। वस्तुकरणक ई संरचना आधुनिक श्रम-संबंधसँ राजनीतिक उपयोगितावाद धरि लागू होइत अछि। कविता ई अर्थ स्पष्ट शब्दमे नहि कहैत अछि—आ सैह ओकर श्रेष्ठता अछि। संग्रहक कतेको अन्य कविता जतए निष्कर्ष सीधा कहि दैत अछि, “ढोलक!” रूपककेँ पाठकक भीतर खुलबाक जगह दैत अछि।
आयोध्यानाथ चौधरीद्वारा सम्पादित अंग्रेजी प्रतिनिधि संकलन “Varied Verses”मे एहि कविताक “The Musical Drum” शीर्षक अनुवाद सम्मिलित होयब उल्लेखनीय अछि। एहि चयनसँ स्पष्ट होइत अछि जे “ढोलक” केवल पोथीक शीर्षक रचना नहि, समकालीन मैथिली कविता केँ बाहरी पाठकधरि लए जाए योग्य प्रतिनिधि कविता सेहो मानल गेल। अंग्रेजी रूपान्तरणमे मूल दृश्य—खूँटा, घरक कोन, डोरी कसि सुर मिलाएब, हथेलीक थाप आ फेर अन्हार कोनमे टाँगि देबाक दृश्य—यथासम्भव सुरक्षित अछि; एहि कारण रूपक भाषान्तरक बादो प्रभावी रहैत अछि।
सामाजिक न्याय: गरीबी, भूख आ श्रम
संग्रहक नैतिक केन्द्र वंचित मनुष्य अछि। “’मुसहर’के हम बच्चा छी!” जकाँ कविता जाति-आर्थिक हाशियाकेँ प्रथम पुरुषमे स्वर देबाक प्रयास करैत अछि। “बेथान लोक!”, “पिंजरा”, “अर्थिक”, “पेट”, “मनुखभमरा” आ शहर-विषयक रचनासभ सामाजिक असमानता, अभाव आ मनुष्यक वस्तुकरणकेँ देखैत अछि। कविक राजनीति एहि ठाम सर्वाधिक विश्वसनीय होइत अछि जखन ओ नारा नहि, दृश्य देैत छथि—भूखल देह, कामक तलाश, नगरक अव्यवस्था, असहाय लोक, उपयोगक बाद फेंकल जीवन।
“पेट” शीर्षकक चयन स्वयं महत्त्वपूर्ण अछि। पेट साहित्यिक रूपमे तुच्छ वस्तु नहि; एतए अस्तित्वक मूल आर्थिक सत्य अछि। पेट भूख, श्रम, बाजार, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता आ नैतिक समझौता सभकेँ एक सूत्रमे जोड़ैत अछि। कविता यदि सभ दार्शनिक आवरण हटाकऽ देहक भूख धरि पहुँचैत अछि, तखन आधुनिक समाजक क्रूरता अधिक स्पष्ट होइत अछि।
तथापि वंचित समुदायपर लिखैत समय प्रतिनिधित्वक नैतिक प्रश्न उठैत अछि। “मुसहर” जकाँ समुदायकेँ केवल दुःखक प्रतीक बना देब पर्याप्त नहि; ओकर अपन निर्णयकारी स्वर, संस्कृति, श्रम-कौशल, प्रतिरोध आ आत्मभाषा सेहो जरूरी अछि। “ढोलक” एहि दिशा मे सहानुभूतिपूर्ण कदम उठबैत अछि, मुदा भविष्यक कवितामे हाशियाक पात्रकेँ बेसी बहुआयामी जीवन देल जा सकैत अछि।
राजनीति आ प्रतिरोध: नारा सँ कविता धरि
वृषेश चन्द्र लाल स्वयं दीर्घ सार्वजनिक-राजनीतिक जीवनसँ आएल छथि; तें संग्रहमे सत्ता, अधिकार, लोकतन्त्र, दमन, जनसंघर्ष आ नागरिक जिम्मेवारी बारम्बार अबैत अछि। “जागरण गीत”, “बीआ संघर्षके”, “धर धर रे!”, “हमर शहर”, “की तोरा लेल?!”, “लोक”, “अजीब अछि!”, “विस्फोट” आदि रचनामे राजनीतिक चेतना प्रत्यक्ष अछि।
राजनीतिक कविता दू खतरासँ घेरल रहैत अछि—एक, समाचारक तात्कालिकता; दोसर, नारा। “ढोलक” एहि दुनूमे कतेको ठाम फँसैत सेहो अछि, निकलैत सेहो। जतए कवि “खून”, “पिंजरा”, “ढोलक”, “शहर”, “रुपैया”, “पेट”, “चुप्पी” सन बहुअर्थी प्रतीक बनबैत छथि, कविता समयातीत होइत अछि। जतए ओ नीति-सूत्र वा सीधा निष्कर्ष देैत छथि, रचना तत्कालीन भाषणक नजदीक पहुँचैत अछि।
एहि संग्रहक राजनीतिक महत्त्व तैओ गम्भीर अछि, कारण ई नेपालक मैथिली भाषी सार्वजनिक क्षेत्रक भीतरक आवाज लिखित रूपमे सुरक्षित करैत अछि। राष्ट्र, मधेश, जनकपुर, भाषा, लोकतन्त्र, असमानता—ई सभ एतए अमूर्त विषय नहि, रोजमर्रा जीवनक अनुभव अछि। साहित्यिक इतिहास लेल एहन संग्रह भविष्यक सामाजिक अभिलेख सेहो बनैत अछि।
शहर, आधुनिकता आ विडम्बना
“हमर शहर बहुहाल अछि…” आ बादक “हमर शहर” सन रचनासभ शहरी आधुनिकताक प्रति मोहभंग व्यक्त करैत अछि। शहर विकासक पर्याय नहि; अव्यवस्था, धूल, गरीबी, सत्ता, सार्वजनिक असुविधा, भीड़ आ नैतिक अकेलापनक स्थल सेहो अछि। “आह, रुपैया!” बाजारक मूल्य-व्यवस्था पर व्यंग्य अछि; “स्टेपनी” जकाँ वस्तु शीर्षक आधुनिक उपभोक्ता जीवनकेँ रूपकमे बदलैत अछि; “अपनेकें करक अछि बात” सामाजिक आत्ममुग्धता पर चोट करैत अछि।
कवि आधुनिक वस्तुसभकेँ कविता-योग्य मानैत छथि—ई महत्त्वपूर्ण आधुनिकतावादी संकेत अछि। किन्तु कतेको ठाम वस्तुक उल्लेख मात्रे आधुनिकता नहि बनैत अछि; ओकर सामाजिक सम्बन्ध खोलब आवश्यक अछि। “ढोलक”क श्रेष्ठ आधुनिक कविता ओहि ठाम अछि जतए वस्तु मनुष्यक सम्बन्धक रूपक बनैत अछि।
प्रेम, स्त्री आ लैङ्गिक दृष्टि
ताल-खण्डक प्रेमगीत आ नाल-खण्डक “नारी” जकाँ कविता संग्रहमे स्त्री-अनुभवक उपस्थिति देखबैत अछि। प्रेमक रचनासभमे नजरि, पायल, रंग, देहक गति, विरह आ आकर्षण अछि। “नारी”मे स्त्रीक शक्ति, जननीत्व, श्रम आ मानवीय गरिमाकेँ मान्यता देबाक भाव अछि।
मुदा आधुनिक स्त्री-विमर्शक कसौटीपर किछु प्रश्न बचैत अछि। स्त्रीकेँ “माय”, “शक्ति”, “सुन्दरता” अथवा प्रेमिका मात्रक प्रतीक बनबैत रहब ओकर वास्तविक सामाजिक व्यक्तित्वकेँ सीमित करि सकैत अछि। काज, सम्पत्ति, शिक्षा, निर्णय, हिंसा, देहपर अधिकार, सार्वजनिक नेतृत्व, घरक अदृश्य श्रम—ई सभ आयाम आर गहिर रूपमे आबि सकैत छल। तें संग्रह स्त्री-गरिमाक पक्षधर तऽ अछि, मुदा स्त्री-अनुभवक भीतरसँ लिखल बहुस्वरता सीमित अछि। ई आलोचना संग्रहक मूल्य घटबैत नहि; ओकर आगामी सम्भावना रेखांकित करैत अछि।
अस्तित्व-बोध: समय, चुप्पी, खोज आ मृत्यु
कविक सार्वजनिक आवाजक पाछाँ एकटा अकेला, प्रश्नाकुल व्यक्ति सेहो अछि। “समय”, “जखन तक ई जिनगी”, “ई सूरुज देखू अस्ताइत”, “खोजि रहल छी…”, “तप?!”, “चुप्पी”, “आह!”, “चलू राति बिती गेल!”, “ई जिनगी”, “जीवन सपना”, “चुप्प छी”, “हे भगवान!” आदि रचना जीवनक अनिश्चितता आ अर्थ-खोजक दिशा खोलैत अछि।
“समय”मे समय स्थिर नहि, सर्वगतिशील सत्ता अछि; मनुष्य ओकर भीतर क्षणिक अछि। “चुप्पी” केवल मौन नहि—सामाजिक भय, आत्म-संयम अथवा मानसिक एकान्तक संकेत बनि सकैत अछि। “खोजि रहल छी…” आत्म-पहिचानक प्रक्रिया अछि; “तप?!” धार्मिक-अध्यात्मिक प्रश्नकेँ जीवनक व्यावहारिक द्वन्द्वसँ भिड़बैत अछि। एहि रचनासभमे कवि जखन उपदेश कम करैत छथि, तखन काव्य अधिक गहिर होइत अछि।
धर्म, मिथक आ नैतिक प्रश्न
“हा! शिव!!”, “हे भगवान!”, शुभकामना, जागरण, संस्कार-संबद्ध गीत आदि संग्रहक धार्मिक-सांस्कृतिक धरातल बतबैत अछि। कवि धर्मकेँ केवल आस्था रूपमे नहि, नैतिक प्रश्न पूछबाक भाषा रूपमे सेहो लैत छथि। ई लोकधर्मी आधुनिकताक लक्षण अछि—धर्म आ आधुनिक सामाजिक प्रश्न एक-दोसराक विरोधी रूपमे नहि, संवादक क्षेत्रमे उपस्थित होइत अछि।
मुदा धर्म-संबंधी कविता जखन नैतिक सत्यकेँ पूर्वनिर्धारित उत्तरमे बदलि दैत अछि, तखन प्रश्नक काव्यात्मक तनाव कम होइत अछि। “हा! शिव!!” सन पुकार सफल तखन अछि जखन ओ विस्मय, पीड़ा आ असमर्थता खुला छोड़ैत अछि।
नाल-खण्ड (२७ कविता) — संग्रहक हृदय
नाल-खण्ड एहि संग्रहक सभसँ बेसी आ सभसँ तीखा खण्ड थिक। बाल आ ताल खण्डक कोमलता एतए आबि गम्भीर, तीख आ सीधा राजनीतिक-सामाजिक स्वरमे बदलि जाइत छैक। एहिमे चारि-पाँच प्रमुख स्वर-धारा देखाइ परैत अछि, जाहिपर अलग-अलग चर्चा आवश्यक छैक।
(क) दलित-मुसहर चेतना आ सामाजिक न्याय
संग्रहक सभसँ तीख स्वर मुसहर (महादलित) समुदायक लेल लिखल कविता सभमे भेटैत अछि: ‘मनुखमारा’, ‘’मुसहर’के हम बच्चा छी’, ‘बेतरासल हीरा’ आ ‘बकए बएल बुफ्फह रे बहुरा’। ‘मनुखमारा’ कवितामे एनजीओ/शोधकर्ताजगत्क ‘डेवलपमेण्ट’ संस्कृतिपर तीख व्यंग्य अछि, जतय मुसहर समुदायकेँ केवल फोटो खिचबाक, लेख आ शोध-पत्रक लेल विषय बनाओल जाइत अछि, मुदा ओहि समुदायक वास्तविक जीवन-स्तरमे कोनो परिवर्तन नहि अबैत अछि।
मुसहरकेँ मुसहरे राखह, देखह खून निहारि !
लिखह, फोटो खिचह, मांचिचाड़ि क’ भीखो दहक आ करह जमोरा फाड़ि !
एहन सीधा आ निर्भीक व्यंग्य-शैली मैथिली साहित्यमे कम भेटैत अछि। तहिना ‘’मुसहर’के हम बच्चा छी !’ कविता मार्मिक महत्वक राखैत अछि: ‘दलित’ शब्दकेँ ‘स्खलित’सँ तुकबन्दी क’ समाजक कलंकित दृष्टिकोणकेँ आँकि, कवि ‘मुसहर’ पहचानकेँ श्रम आ सत्यपर आधारित गौरवक रूपमे पुनर्स्थापित करैत छथि।
(ख) स्त्री-विमर्श आ ’सीताके भूमि’क विडम्बना
संग्रहक सभसँ मार्मिक रचना सभमे एकटा ‘सीताके भूमिमे…आह !’ थिक (पृ. १२६)। जनकपुरधाम — सीताक जन्मभूमि — मे आइयो बेटी-बच्चीकेँ परित्यक्त कएल जाइत अछि, फेंकि देल जाइत अछि, एहि विडम्बनापर कवि गहींगहीर आघात पहुंचबैत छथि। रामायणक सीता-परित्यागकेँ समकालीन बालिका-विभेदक रूपकमे पुनर्व्याख्यायित करब कविक एहि कविताकेँ संग्रहक सभसँ साहसिक सर्जनात्मक उपमानसभमे एक बनबैत अछि।
सीताके भूमिमे फेक देलजाइत अछि सीता !
जनमिते जाढ़मे ठिठुरए लेल … कात-करोट भार-फाँखरमे
भोंकि देल जाइत अछि सीता !
एहि कविताकेँ स्त्री-भ्रूणहत्या/कन्या-उपेक्षापर एकटा मार्मिक टीका-टिप्पणीक रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि। कविताक अन्तमे ‘शिव धनुषपर मनुखक भेषमे चोंगामे नुकाएल छीपल दैतपर’ जेना पंक्तिसँ कवि समाजमे व्याप्त पाखण्ड आ दोहरापनपर करारा प्रहार करैत छथि।
(ग) न्याय, हिंसा आ जवाबदेहिताक सवाल
‘खून त खून छैक !!!’ आ ‘के कएलए ई खून ?!’ दुनू कविता हिंसा, न्याय आ राजनीतिक आश्रयक प्रश्नकेँ लेल एकटा दार्शनिक जोड़ी बनबैत छथि।
एहि लोकक लोक त नहि देखैत अछि, मुदा जे कसाइत अछि सत्ते देखैत हएतैक।
न्याय आ अन्यायक लेखा लेल ओतए फरियाद फेकैत हएतैक।
आखिर खून त खून छैक !!!
एहि कवितामे यमलोकक हिसाब-किताबपर आधारित एकटा अलौकिक न्यायक कल्पना — जतए ’खुनियाँक खाता’मे हिसाब जोड़ल जाइत अछि — काव्यात्मक साहसक परिचायक थिक। सरल लय-बद्ध भाषामे एहि प्रकारक दार्शनिक गहराइ एहि खण्डक एकटा विशेष बल थिक।
(घ) समकालीन उपभोगवाद आ सामाजिक पाखण्डपर व्यंग्य
आधुनिक समाजक डिजिटल/बजारवादी आडम्बरकेँ सेहो कवि नहि छोड़ैत छथि। ‘फादर्स डे’ शीर्षक रचना, जे भूमिकामे सेहो उद्धृत भेल छैक, फेसबुक संस्कृतिमे वार्षिक फादर-डे/मदर-डे परफोर्मेन्स बना देल जाएब, जते वास्तविक सम्बन्ध बरसभर उपेक्षित रहैत अछि, तेकरापर व्यंग्यमय रूपे प्रहार करैत छथि। ‘आह, रुपैया !’, ‘महान छी ?’, ‘स्टेपनी’ आदि कविता सेहो भ्रष्टाचार, बेरोजगारी आ बिचौलिया राजनीतिपर चोट करैत छथि।
(ङ) संघर्ष आ जागरणक आह्वान
संग्रहमे मात्र व्यथाक प्रदर्शन नहि, अपितु संघर्षक आह्वान सेहो बजाओल गेल अछि। ‘बीआ संघर्षके’ कविता चारि खण्डमे विभाजित — समस्याक चिन्हारीसँ लऽ कऽ संघर्षक निर्णय धरि — आगू बढ़ैत अछि।
आ की – ?!
उठि ठाढ़ भ’ तानब !
बीआ संघर्षके
छिटएके ठानब !!
एहि प्रकारक कविता — जेना ‘धैर्यवान लोक !’, ‘चलु, राति बिति गेल !’, ‘थाकल सुतल उठह ने बाबल’ — सीधा राजनीतिक नारा नहि दैत, अपितु जनसामान्यक जड़तापर चोट करैत छथि, जाहिमे नेपालक लोकतान्त्रिक आन्दोलनक ऐतिहासिक स्मृति सेहो गूंजैत अछि।
८. शिल्प-विधान आ काव्यशास्त्रीय मूल्यांकन
कोनो भी काव्य-कृतिक सफलता मात्र ओकर विचारमे नहि, अपितु ओकर प्रस्तुतिकरण, शिल्प, भाषा आ बिम्ब-विधानमे निहित होइत अछि। 'ढोलक' एहि दृष्टिें एकटा परिपक्व कृति थिक, जतए भावाभिव्यक्ति आ शिल्प-सौष्ठवक अद्भुत सामञ्जस्य भेटैत अछि।
८.१ भाषा-शैली आ ठेट मैथिलीक प्रयोग
वृषेश चन्द्र लालक भाषा कृत्रिम वा संस्कृतनिष्ठ बोझसँ सर्वथा मुक्त अछि। हिनकर मैथिली मिथिलाक माटि, पानि आ ग्रामीण लोक-संस्कृतिक सोंध गन्धसँ सुवासित अछि। ओ अपन भावकें अभिव्यक्त करबामे अकृत्रिम, ठेट आ जीवन्त शब्दावलीक प्रयोग कएने छथि। ई शब्दावली नहि केवल गाउँ-देहातक स्मृति ताज़ा करैत अछि, अपितु कविताकें सम्प्रेषणीय (Communicable) आ लोक-हृदयक समीप ल' जाइत अछि।
हिनक रचनामे प्रयुक्त ठेट शब्दावलीक किछु उदाहरण द्रष्टव्य अछि: बतंगर (बात केर बतंगर), मन्हुआएल, बिधुआएल, लुलुआएल, खौरछाह, औगताह, पकठोस, अकिलगर, कनोजर, चिनवार, गहवर, ढकड़इ, निहटि, झपस्सा, हुड़का, छनकी, बकए बएल, अमरासा, अमोट, तिलकोर, तरूआ, पिरूकिआ आदि। ई शब्दावली भाषाक मौलिकताकेँ अक्षुण्ण रखैत अछि आ भाव-सम्प्रेषणमे तीक्ष्णता लावैत अछि।
८.२ बिम्ब आ प्रतीक-विधान (Imagery & Symbolism)
कविद्वारा प्रयुक्त दृश्य, श्रव्य आ स्पर्श बिम्ब अत्यन्त सजीव आ प्रभावशाली छथि। श्रव्य बिम्ब (Auditory Imagery) क सन्दर्भमे ढोलकक 'गुम-गुम गुमकाब', हिड़लाक 'हिर्रर्रर्र हिलब', कागाक 'लोल मारि भागब', झिल्लीक 'कड़-कड़ बोलब', आ पाजेबक 'भुनुक भुन भुनभुन पायल बाजए' जकाँ ध्वन्यात्मक शब्द कवितामे सांगीतिक लय (Onomatopoeia) उत्पन्न करैत अछि। दृश्य बिम्ब (Visual Imagery) क दृष्टान्त 'गोरकी नजरि' मे गालक लालीमे चान मुस्काएब आ 'ल' अग्निशिखा रेड़मे' मे खूनक तरतराएब सन चित्र प्रस्तुत करैत अछि।
प्रतीक-विधानक दृष्टिसँ ई पोथी अत्यन्त समृद्ध अछि। ढोलक (शोषित आ सीमान्तीकृत वर्ग), मूस (सामन्त आ शोषक एनजीओ), कौआ (अवसरवादी नेता), चिनवारक आगि (क्रान्ति), शून्य (परम सत्य आ अस्तित्व) आदिक प्रयोग प्रतीकात्मक अछि जे कविताकें बहुआयामी अर्थ प्रदान करैत अछि।
८.३ छन्द, लय आ सांगीतिकता
बाल-खण्ड आ ताल-खण्डक कवितासभ पूर्णतः मात्रिक छन्द आ लोक-लयपर आधारित अछि, जाहिमे गेयता (Lyricism) क प्रधानता अछि। ई गीतसभ मिथिलाक पारम्परिक धुनिमे गाओल जा सकैत अछि। मुदा नाल-खण्डमे मुक्तक छन्द (Free Verse) क प्रयोग भेल अछि, जाहिमे लय शब्दक अन्त्यानुप्रासमे नहि, बल्कि विचार प्रवाहक आरोह-अवरोहमे अछि। 'बेगिन्ती बेहाल बेकल, बेढंगी बेजान बेचल' जकाँ पंक्तितमे अनुप्रास अलंकारक छटा दर्शनीय अछि, जे भावक तीव्रताकेँ द्विगुणित करैत अछि।
लोकध्वनि आ ध्वन्यात्मक काव्य-शिल्प
“ढोलक”क काव्यशास्त्र ध्वनिपर आधारित अछि। ध्वनि तीन स्तरपर काम करैत अछि। पहिल, अनुकरणात्मक ध्वनि—फुर्र, धुम, धक, चकदुम, भुकु, झम-झम, जोगिरा। दोसर, लयात्मक पुनरुक्ति—एकहि वाक्यांशक बारम्बार आगमन, जाहिसँ गीतात्मक वृत्त बनैत अछि। तेसर, सार्वजनिक संबोधन—“हे भगवान!”, “हा! शिव!!”, “धर धर रे!”, “जागू”, “उठह”—जे कविताकेँ पाठ नहि, पुकार बनबैत अछि।
ई पुकारक परम्परा मिथिलाक लोकगीत, ऋतुगीत, होरी, विवाह-संस्कार, जागरण आ सार्वजनिक मंचीय काव्यसँ जुड़ैत अछि। कवि आधुनिक विषय लेल पारम्परिक वाचिक उपकरण उपयोग करैत छथि। फलतः राजनीति सेहो गीत बनि सकैत अछि, आ बाल-खेल सेहो काव्य-लयक पाठशाला।
मुदा पुनरुक्ति हर ठाम समान प्रभावकारी नहि। जतए पुनरुक्ति ध्वनि आ अर्थक तनाव बढ़बैत अछि, ओतए कविता स्मरणीय बनैत अछि; जतए केवल पंक्ति भरबाक रीति सन दोहराइत अछि, ओतए गति मंद पड़ैत अछि। संग्रहक सम्पादित नव संस्करणमे पुनरुक्तिक काव्यात्मक औचित्य अनुसार चयनित संक्षेप कएल जाए तँ कतेको कविता आर तीक्ष्ण भऽ सकैत अछि।
भाषा: नेपालक मैथिली, लोकबोली आ शुद्धताक प्रश्न
“ढोलक”क भाषा पुस्तकालयी मानक मैथिली मात्र नहि; एतए जनकपुर-मधेशक बोलचाल, लोकप्रयोग, संस्कृतनिष्ठ शब्द, हिन्दी/नेपाली सम्पर्कसँ आएल रूप, आधुनिक प्रशासनिक शब्दावली आ कतेको अंग्रेजी मूलक वस्तु-शब्द सहअस्तित्वमे अछि। एहि मिश्रणकेँ केवल “अशुद्धि” कहि छोड़ब साहित्यिक दृष्टिसँ उचित नहि, कारण ई क्षेत्रक वास्तविक भाषिक समाजक दस्तावेज सेहो अछि।
तथापि प्रकाशनक स्तरपर वर्तनी-संगति, विरामचिह्न, रूप-एकरूपता आ टंकण-शुद्धि आर कठोर होयबाक चाही। कतेको पृष्ठपर शब्द-रूप, मात्राक प्रयोग, प्रश्न/विस्मय चिह्नक अधिकता, अक्षर-संयोजन वा शीर्षक-लेखनमे असंगति देखाइत अछि। कविता जँ वाचिकता सँ लिखित साहित्यक स्थायी रूपमे प्रवेश करैत अछि तँ सम्पादकीय शुद्धि आवश्यक अछि। शुद्धि करैत समय स्थानीय मैथिली स्वरकेँ मेटायब नहि, बल्कि वर्तनीक स्पष्टता आ पाठसुलभता बढ़ायब लक्ष्य होयबाक चाही।
भाषाक सबसँ जीवित भाग संबोधन आ क्रियात्मकता अछि। छोट वाक्य, प्रश्न, हाँक, विस्मय, देहगत क्रिया—ई सभ कविता केँ बोलैत भाषा बनबैत अछि। एतए कविक राजनीतिक वक्तृत्व-कौशल कतेको ठाम लाभकारी अछि; पंक्ति मंचपर तुरन्त पकड़ बनबैत अछि।
चित्र आ कविता: दृश्य-पाठक सम्भावना
पोथीक लगभग प्रत्येक कविता संग चित्र देबाक प्रवृत्ति एकरा साधारण कविता-संग्रहसँ अलग दृश्य-पुस्तक बनबैत अछि। बाल-खण्डमे ई विशेष सफल, कारण बच्चाक पाठ-अनुभव दृश्य आ शब्द दुनू पर चलैत अछि। नाल-खण्डमे रक्त, गरीबी, शहर, स्त्री, भूख, अकेलापन, हिमपात, विस्फोट आदि शीर्षकसँ जुड़ल चित्र तात्कालिक प्रसंग देैत अछि।
मुदा आलोचनात्मक दृष्टिसँ चित्रक दू सीमा अछि। पहिल, बहुधा चित्र कविता के अर्थ पहिने सँ बता दैत अछि; पाठकक स्वतन्त्र कल्पना कम होइत अछि। दोसर, चित्र-शैली एकरूप नहि; छायाचित्र, रेखाचित्र, व्यंग्यचित्र आ संगणकीय चित्र अलग-अलग दृश्य-भाषा बनबैत अछि। यदि आगामी संस्करणमे एकहि कलाकार वा एकरूप मिथिला-आधारित दृश्य-व्याकरण अपनाओल जाए, तऽ पोथीक कलात्मक एकता बहुत बढ़त।
काव्य-शिल्पक सबल पक्ष
ध्वन्यात्मकता: “फुर्र-फुर्र”, “धुम-धुम”, “धक-धक”, “चकदुम”, “भुकु-भुकु” जकाँ शब्द कविता केँ देहगत श्रव्य अनुभव बनबैत अछि।
लोक-लय: होरी, जागरण, शुभकामना, पायल, पक्षी-ध्वनि, ढोलक—ई सभ लोक-संगीतक स्मृति सक्रिय रखैत अछि।
प्रत्यक्षता: कठिन दार्शनिक शब्दावलीक बदला कवि दृश्य, वस्तु, सवाल आ संबोधन चुनैत छथि; तें कविता व्यापक पाठक धरि पहुँचैत अछि।
विषय-विस्तार: बच्चासँ राजनीति, प्रेमसँ भूख, शहरसँ अध्यात्म—एकहि संग्रहमे असाधारण विस्तार।
सार्वजनिक वाचिकता: मंचीय पाठ, सामूहिक गायन, जुलूस वा गोष्ठीमे जीवित रहबाक क्षमता।
व्यंग्य: रुपैया, नेता, योजना, लोक, शहर, सामाजिक ढोंग आदिपर छोट तीक्ष्ण वाक्य आ प्रश्न।
रूपक: “ढोलक”, “पिंजरा”, “खून”, “पेट”, “चुप्पी”, “स्टेपनी” जकाँ वस्तु सामाजिक अर्थक द्वार बनैत अछि।
काव्यगत सीमा आ सुधारक सम्भावना
गम्भीर समीक्षा केवल प्रशंसा नहि। “ढोलक”क महत्त्व स्वीकार करैत ओकर सीमासभ सेहो स्पष्ट करब आवश्यक अछि।
क. घोषणात्मकता
कतेको राजनीतिक/नैतिक कविता विचारकेँ बिम्ब वा प्रसंगमे विकसित करबाक पूर्वे निष्कर्ष कहि दैत अछि। फलतः कविता घोषणापत्रक समीप चलि जाइत अछि। रूपक, दृश्य आ चरित्रक माध्यमसँ विचारकेँ स्वयं खुलय देल जाए तऽ काव्य-गहिराइ बढ़त।
ख. पुनरावृत्तिक असमान उपयोग
गीतमे पुनरावृत्ति शक्ति अछि, मुदा प्रत्येक कविता मे अत्यधिक आवर्त-पंक्ति प्रभाव घटा सकैत अछि। श्रव्य पाठमे जे पुनरावृत्ति रसदायक, मुद्रित पृष्ठपर ओ कतेको बेर लम्बा बुझा सकैत अछि। चयनात्मक सम्पादन उपयोगी होयत।