विदेह शोध-सूची · मूल PDF

गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल वृषेश चन्द्र लाल

Videha Issue 451 · Research article continuation 4

१. पठनीयता — उच्च। मैथिली वाक्य स्वाभाविक रूपेँ बहैत अछि; संवाद विशेष रूपेँ जीवित अछि। पाठककेँ निरन्तर ई अनुभूति नहि होइत जे ओ ‘अनुवाद’ पढ़ि रहल अछि।

२. पात्र-वाणी — अत्यन्त सफल। सोमदत्त आ सुम्निमाक पंजीक स्पष्ट भिन्नता चरित्र आ दर्शन दुनू निर्मित करैत अछि। पुलोमाक वाणीमे दाम्पत्यक पीड़ा, आत्मसम्मान आ आक्रोशक स्वर सेहो प्रभावी अछि।

३. सांस्कृतिक संप्रेषण — संतुलित। स्रोतक किरात/वैदिक संसार सुरक्षित अछि, मुदा भाषा मैथिली पाठक लेल घरेलू बनल अछि। लोक-शब्दक उपयोग लक्ष्य-संस्कृतिक निकटता बढ़बैत अछि।

४. सौन्दर्यात्मक पुनर्सृजन — सफल। प्रकृति-वर्णन, देह-संवेदना, भावनात्मक संवाद आ उपसंहारक लय मैथिलीमे साहित्यिक प्रभाव उत्पन्न करैत अछि। प्रदीप गिरिक एहि टिप्पणीमे सार अछि जे अनुवाद ‘मौलिक सन’ लगैत अछि—एहि अर्थमे जे ओकर भाषा स्वयं साहित्यिक जीवन पबैत अछि।

५. शोधोपयोगिता — मध्यम सँ उच्च, पर सम्पादकीय सुधार अपेक्षित। पाठ, भूमिका आ प्रकाशकीय सामग्री बहुमूल्य अछि; भविष्यक यूनिकोड आलोचनात्मक संस्करण, शब्दार्थ, स्रोत-संदर्भ, अनुवादकीय टिप्पणी आ पृष्ठानुक्रमण शोधक लेल विशेष सहायक हएत।

१६. समग्र साहित्यिक निर्णय

विश्वेश्वरप्रसाद कोइराला रचित 'सुम्निमा' मात्र एकटा कथाक पुस्तक नहि, अपितु पूर्वीय आ पश्चिमी दर्शनक बीचक वैचारिक युद्धभूमि थिक। उपन्यासमे सोमदत्तक माध्यमसँ आध्यात्मिक पाखण्ड, सांस्कृतिक वर्चस्व, आ दमित यौनिक मनोवृत्तिक खोखलापनकें उजागर कएल गेल अछि, जखन कि सुम्निमाक माध्यमसँ प्रकृति, मानवीयता, आ जीवनक यथार्थ आनन्दकें सर्वोच्च सत्ताक रूपमे स्वीकार कएल गेल अछि।

’सुम्निमा’क मूल शक्ति ओकर प्रश्नमे अछि, उत्तरमे नहि। ई पाठककेँ पूछैत अछि—की मनुष्यक उद्धार देहकेँ पराजित कऽ सम्भव अछि? की संस्कृति अपन शुद्धता बचबैत-बचबैत जीवनकेँ नष्ट करैत अछि? की प्रेम जातीय सीमा, धर्म, पितृवंश आ शास्त्रसँ बाहर अपन नैतिक सत्य राखैत अछि? की प्रकृति सभ्यताक विरोधी अछि, कि सभ्यता केँ मानवीय बनबैत रहबाक मूल स्मृति? आ सभसँ पैघ—की ’अन्य’केँ सुधारबाक बदला ओकरासँ किछु सीखल जा सकैत अछि?

कृतिक उत्तर एकरेखीय नहि। सोमदत्तक पूर्ण पराजय आ किराती जीवनक पूर्ण विजय कहब सरल होएत, पर उपसंहार ई सरलता तोड़ि दैत अछि। सुम्निमा स्वयं अपन बेटीकेँ ब्राह्मण युवकक ‘उड़ान’ बुझबाक शिक्षा दैत अछि; ब्राह्मण युवक किराती घरमे पलेलो आश्रमक स्मृति दिस लौटैत अछि; दुनू प्रेम करैत छथि, पर अन्तर मिटैत नहि—समझौता, संवेदना आ परस्पर परिवर्तन द्वारा साथ जीबाक संभावना बनैत अछि। एहि बिन्दुपर उपन्यास बहुलतावादी मानवतावादक कृति बनैत अछि।

मैथिली रूपान्तरण एहि मानवतावादकेँ अतिरिक्त ऐतिहासिक अर्थ दैत अछि। जे कथा सांस्कृतिक श्रेष्ठताबोधक विघटन करैत अछि, ओकर नेपाली सँ मैथिलीमे आगमन स्वयं भाषिक केन्द्रवादक विरुद्ध एक साहित्यिक कृत्य बनि जाइत अछि। वृषेश चन्द्र लालक लक्ष्य-पाठक शक्ति एहिमे अछि जे ओ मैथिलीकेँ केवल माध्यम नहि, सह-रचनात्मक भाषा बनबैत छथि। मैथिली लोक-लय, संबोधन, क्रिया, मुहावरा आ संवेदनात्मक शब्दावलीक कारण सुम्निमा नव भाषिक देह पबैत अछि।

अनुवाद-सिद्धान्तक कसौटी पर ई रूपान्तरण गतिशील/प्रभाव-समतुल्यता, संप्रेषणीयता, चयनित घरेलूकरण आ सांस्कृतिक विदेशीपन-संरक्षणक सफल समन्वय देखबैत अछि। शाब्दिक निष्ठाक बजाय भाव, पात्र-वाणी आ सांस्कृतिक तनावक पुनर्सृजन प्राथमिक अछि। ई रणनीति अनुवादकक घोषित ‘भावानुवाद’ दृष्टिसँ मेल खाइत अछि। स्रोत-पाठक प्रत्यक्ष पंक्ति-दर-पंक्ति तुलना बिना पूर्ण निष्ठा-मूल्याङ्कन देब अकादमिक रूपेँ अनुचित हएत, मुदा लक्ष्य-पाठक साहित्यिक स्वायत्तता निर्विवाद रूपेँ उच्च अछि।

अन्ततः ‘सुम्निमा’ एहन कृति अछि जकरा एक बेर पढ़ि कथा बुझल जा सकैत अछि, मुदा बारम्बार पढ़ने ओकर प्रश्न खुलैत अछि। मनोविश्लेषण ओकर एक द्वार; जातीय अध्ययन दोसर; नारीवाद तेसर; पर्यावरण चौठ; अनुवाद अध्ययन पाँचम। एहि सभ द्वारसँ प्रवेश केलापर जे केन्द्र देखाइत अछि से ‘मनुष्य’ अछि—एहन मनुष्य जे न शुद्ध आत्मा अछि, न केवल देह; न केवल परम्परा, न केवल प्रकृति; न केवल अपन जाति, न केवल व्यक्तिवादी इच्छा। ओ सम्बन्धमे बनैत अछि। एहि दृष्टिसँ ’सुम्निमा’क स्थायी साहित्यिक मूल्य ओकर प्रेमकथासँ बेसी ओकर सम्बन्ध-दर्शनमे निहित अछि।

अन्तिम पंक्तिक प्रतीकात्मक संकेत

“किरातीसभक जातिक रक्त महासमुद्रमे एक टा बून्दक कोनो अस्तित्व नहि रहलैक। कोशिश अबाध गति प्रकृतिक विराट शान्तिकेँ चिरैत बहैत रहलैक।”

ई पंक्ति सम्मिश्रणक प्रतीक थिक—व्यक्तिगत आ जातीय शुद्धताक दावा विराट प्रकृतिक प्रवाहमे टिकैत नहि; जीवित इतिहास सम्बन्ध, मिश्रण आ परिवर्तनक बाटे आगाँ बढ़ैत अछि।

१७. भावी संस्करण लेल सम्पादकीय सुझाव

सम्पूर्ण यूनिकोड देवनागरी पाठ प्रकाशित हो, जाहिसँ खोज, उद्धरण, ई-पुस्तक आ डिजिटल अभिलेखन सहज हो।

दुर्लभ वैदिक, किराती आ क्षेत्रीय पदक २–४ पृष्ठक शब्दकोश जोड़ल जाए; मूल पाठक लय बाधित नहि कएल जाए।

अनुवादकीय टिप्पणीमे स्रोत संस्करण, पाठ-नीति, नाम/पदक रूपान्तरण, लोकशब्द चयन आ भावानुवादक सिद्धान्त संक्षेपमे स्पष्ट कएल जाए।

आलोचनात्मक भूमिका आ राजनीतिक-सांस्कृतिक परिपाठकेँ पृथक खण्डमे रखल जाए, जाहिसँ उपन्यासक स्वायत्त पाठ पहिले उपलब्ध हो।

शोधार्थी लेल अध्यायवार पृष्ठ-सूची, व्यक्तिनाम-सूची, प्रमुख प्रतीक-सूची आ चयनित द्वितीयक ग्रन्थसूची जोड़ल जाए।

भविष्यक तुलनात्मक संस्करणमे मूल नेपाली आ मैथिली पाठक चुनिंदा अंश आमने-सामने देल जाए; एहि सँ अनुवाद-अध्ययनक अकादमिक मूल्य बहुत बढ़त।

अन्तिम टिप्पणी

ग्रन्थसूची — केवल पुस्तक

कोइराला, विश्वेश्वरप्रसाद। सुम्निमा। मैथिली रूपान्तरण: वृषेश चन्द्र लाल। काठमाण्डू: फिनिक्स बुक्स, प्रथम संस्करण २०७८ वि.सं. (२०२१ ई.)।

नाइडा, यूजीन ए. Toward a Science of Translating. लाइडन: ई. जे. ब्रिल, 1964।

कैटफर्ड, जे. सी. A Linguistic Theory of Translation: An Essay in Applied Linguistics. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1965।

न्यूमार्क, पीटर। A Textbook of Translation. न्यूयॉर्क: प्रेन्टिस-हॉल इन्टरनेशनल, 1988।

वेनूटी, लॉरेन्स। The Translator’s Invisibility: A History of Translation. दोसर संस्करण। राउटलेज, 2008 (प्रथम संस्करण 1995)।

बासनेट, सुसान। Translation Studies. चारिम संस्करण। लन्दन/न्यूयॉर्क: राउटलेज, 2014।

मन्डे, जेरेमी। Introducing Translation Studies: Theories and Applications. चारिम संस्करण। राउटलेज, 2016।

टूरी, गिडियन। Descriptive Translation Studies—and Beyond. संशोधित संस्करण। जॉन बेन्जामिन्स, 2012।

नाबोकोव, व्लादिमिर। Lolita।

वर्मा, भगवती चरण। चित्रलेखा।

रजनीश (ओशो)। सम्भोग से समाधि की ओर।