गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल योगानन्द झा
Videha Issue 451 · Research article continuation 5
ग्रन्थक आरम्भमे समर्पण, आशीर्वचन, गाँधी-साहित्यक महत्त्व सम्बन्धी भूमिका, ‘अनुवादक दिससँ’ आ काका कालेलेकरक ‘निवेदन’ भेटैत अछि। ई सभ खण्ड पाठक लेल अलग-अलग प्रवेशद्वार रचैत अछि। एक दिस गाँधीक आदर्शक महत्ता आ मैथिलीमे वैचारिक साहित्यक आवश्यकता रेखांकित होइत अछि; दोसर दिस अनुवादक स्पष्ट करैत छथि जे मैथिलीमे गाँधीजीक मूल विचार उपलब्ध करेनाइ हुनक उद्देश्य छल। काका कालेलेकर पाठक भाषा-प्रसारक प्रश्न उठबैत छथि आ गाँधीजीक विचार बहुभाषी भारतीय पाठक धरि पहुँचबाक अभिप्राय व्यक्त करैत छथि। (पृ. ५–१५)
‘अनुवादक दिससँ’ (पृ. १३–१४) विशेष महत्त्वपूर्ण अछि। एतय अनुवादक अपन साहित्यिक प्रेरणा आ अनुवाद-प्रक्रियाक व्यावहारिक कठिनाइ—प्रकाशकीय अनुमति, मैथिली प्रकाशनक व्यवस्था आ पाठक-विस्तार—क विवरण दैत छथि। एहि तथ्य सँ ई पुस्तक केवल वैचारिक आयात नहि रहि जाइत अछि; ई मैथिलीमे दार्शनिक-नैतिक गद्यक आधार बढ़ेबाक सचेत प्रयास बनैत अछि। ‘निवेदन’ (पृ. १५) मे काका कालेलेकरक दिनांक ६ जून १९५८ छपल अछि। एहि दिनांक केँ २०१३ क मैथिली प्रकाशन-वर्ष मानब भूल होयत; ई पूर्वस्थित प्रस्तावनात्मक वक्तव्यक तिथि अछि।
प्रकाशकीय पृष्ठक अनुसार मैथिली अनुवादक पाछाँ हिन्दी अनुवादक अमृतलाल ठाकोरदास मणावतीक नाम देल अछि। एहि आधार पर ग्रन्थक सम्भावित संप्रेषण-शृंखला ‘गाँधीक मूल लेखन → हिन्दी रूपान्तर → मैथिली रूपान्तर’ बुझल जाइत अछि। एकरा अंग्रेजी अनुवादक सीधा मैथिली रूपान्तर कहब पुस्तकक स्वयं देल तथ्यक विपरीत होयत। मुदा मध्यवर्ती हिन्दी संस्करणक पूरा पाठ एहि अध्ययनक आधार-पत्रमे उपस्थित नहि अछि, तेँ अनुवादक रूपान्तरक सूक्ष्म विचलनक दावे एतय जानि-बूझि रोकल गेल अछि।
३. पन्द्रह मुख्य निबन्ध: पाठ, तर्क आ आलोचनात्मक समीक्षा
३.१ सत्य
मूल पाठ: मुद्रित पृ. १९–२१; लेख-तिथि: २२.०७.१९३०।
आरम्भिक निबन्धमे सत्य केवल सच बाजबाक सदाचार नहि, अस्तित्व आ परमेश्वरक प्रश्न धरि विस्तृत अछि। पाठमे ‘सत्’ केँ स्थिति, विद्यमानता आ वस्तुक असली सत्ता सँ जोड़ल गेल अछि; ‘सत्य’ केँ परमेश्वरक नामक रूपमे विचारल गेल अछि। ई तर्क गाँधीजीक नैतिक जीवन आ अध्यात्मक बीच अटूट सम्बन्ध स्थापित करैत अछि। लेखकक आग्रह अछि जे दैनिक व्यवहारमे सत्यक अभ्यास करैत-करैत मनुष्य व्यापक सत्यक साधना करय। फलतः ई निबन्ध व्रतसभक आधार-पाठ बनैत अछि।
विशेष ध्यान देबाक योग्य बात ई जे निबन्ध सत्यकेँ केवल वाणीधरि सीमित नहि रखैत अछि। विचार, व्यवहार आ मनक भीतरक ईमानदार प्रयास सेहो एतय सत्यक अंश अछि। सत्यक खोज मे स्वयंकेँ परखब, अपन निर्णयक समीक्षा करब आ लोभ-भय सँ मुक्त होयबाक प्रयत्न करब जरूरी ठहरैत अछि। एहि दृष्टिसँ सत्य अविचल घोषणासँ अधिक निरन्तर आत्मपरीक्षणक पद्धति अछि। पाठक अध्यात्म-प्रधान मुहावरा ओकर दार्शनिक आधार देत अछि, मुदा सामाजिक कर्मक संग जोड़लासँ विचार क्रियाशील बनैत अछि।
आलोचनात्मक रूपसँ प्रश्न उठैत अछि: सत्यक निजी अनुभूति आ सार्वजनिक प्रमाणक बीच भेद कोना राखल जाय? गाँधीजीक नैतिक सत्य-साधनाक महत्त्व स्वीकारैत ई स्पष्ट करब उचित अछि जे व्यक्तिगत अन्तःकरणक विश्वास अपने-आप ऐतिहासिक अथवा वैज्ञानिक तथ्यक प्रमाण नहि होइत अछि। आधुनिक सार्वजनिक जीवनमे सत्यक प्रति निष्ठा संग दस्तावेज, जाँच आ तर्क-परीक्षण सेहो चाही। एहि सन्दर्भमे पुस्तकक सत्य-विचारक विशेष बल नैतिक ईमानदारी अछि, तथ्यक प्रत्येक विवादक अन्तिम फैसला नहि।
३.२ अहिंसा
मूल पाठ: मुद्रित पृ. २२–२४; लेख-तिथि: २९.०७.१९३०।
‘अहिंसा’ निबन्ध सत्य आ अहिंसाकेँ एकही साधनाक दू परस्पर जुड़ल पक्षक रूपमे राखैत अछि। पाठ कहैत अछि जे सत्यक सम्पूर्ण दर्शन सहज नहि, ताहि लेल प्रेमक अनुशासन आ अहिंसक साधन अपेक्षित अछि। अहिंसा मात्र हत्या नहि करब नहि, बल्कि द्वेष, क्रोध, ईर्ष्या आ प्रतिशोधक भीतरक रूपक प्रतिरोध अछि। अत्याचारक विरोध छोड़ि देब सेहो अहिंसाक उद्देश्य नहि; अन्यायक प्रतिकार करैत व्यक्तिक प्रति घृणा नहि पोसब ओकर कठिन शर्त अछि।
निबन्धमे ‘चोर’क उदाहरण महत्त्वपूर्ण अछि। ओकर माध्यम सँ लेखक अपराधीकेँ केवल शत्रु बना कऽ देखबाक बदला ओहि व्यक्तिक मानवीय सम्भावना बुझबाक आग्रह करैत छथि। दण्ड-संस्कृतिक विपरीत ई उदाहरण अन्यायक कारण, व्यवहार आ सम्भावित सुधारक प्रश्न खोलेज। अहिंसा एहि अर्थमे निष्क्रिय सहिष्णुता नहि, बल्कि शक्तिक उपयोगक नैतिक सीमा ठहरबैत अछि। एकर सम्बन्ध शरीरिक, वाचिक आ मानसिक व्यवहार सँ बनैत अछि।
एहि विचारक आलोचनात्मक प्रयोगमे एकटा सावधानी आवश्यक अछि: पीड़ित व्यक्तिसँ ‘प्रेम’ वा ‘क्षमा’क माँग कऽ ओकर सुरक्षा अथवा न्याय पाबबाक अधिकार नकारल नहि जा सकैत अछि। अत्याचार, घरेलू हिंसा वा भेदभावक परिस्थिति मे कानूनी संरक्षण आ ठोस संस्थागत प्रतिरोध जरूरी अछि। गाँधीक अहिंसा सँ प्रतिहिंसा-विरोधक नैतिक तत्त्व ग्रहण कएल जा सकैत अछि, मुदा ओकरा पीड़ितक मौन-स्वीकृति मे बदलि देब पाठक सामाजिक शक्ति घटायब होयत।
३.३ ब्रह्मचर्य
मूल पाठ: मुद्रित पृ. २५–२८; लेख-तिथि: ०५.०८.१९३०।
‘ब्रह्मचर्य’ निबन्ध संयमकेँ शेष सभ व्रतक सहायक अनुशासनक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। एतय ब्रह्मचर्यक अर्थ केवल बाहरी यौन-संयम नहि, मन, इन्द्रिय, आसक्ति आ व्यवहार पर नियंत्रण सँ अछि। पाठक आरम्भमे प्रश्न उपस्थित अछि जे जे व्यक्ति सत्य, अहिंसा आ आत्मसमर्पण चाहैत अछि, से निजी भोग-विलास आ अनियन्त्रित इच्छा संग कोना न्याय करत। ई प्रश्न आश्रमक सामुदायिक जीवनक भीतर आत्मसंयमक उपयोगिता देखबैत अछि।
निबन्धक एकटा आधारभूत विशेषता व्यक्तिगत संयम आ व्यापक सेवा-भावक सम्बन्ध अछि। मनुक्खक स्नेह जँ बहुत संकीर्ण स्वामित्व-वृत्ति बनि जाय, तँ लोक-सेवाक क्षमता बाधित भऽ सकैत अछि—एहि आशंकासँ लेखक शरीर आ मन दुनूक नियन्त्रणक बात करैत छथि। भोजन, इन्द्रिय-वृत्ति आ वासनासँ सम्बन्धित विमर्श आगामी ‘अस्वाद’ निबन्धक संग तर्कसंगत कड़ी बनबैत अछि।
आधुनिक विवेचनमे ब्रह्मचर्यक एकमात्र जीवन-पद्धति केँ सभ व्यक्ति पर लागू करब उचित नहि। सहमति, देह-स्वायत्तता, दाम्पत्यक समानता आ लिंग-न्याय मानवीय गरिमाक आवश्यक आयाम अछि। ताहि कारणेँ एहि अध्यायक अध्ययन आश्रम-नियमक ऐतिहासिक सन्दर्भमे करब चाही। संयमक सकारात्मक अर्थ—अपरिग्रह, जिम्मेदारी, सम्बन्धमे सम्मान—आ व्यक्तिगत जीवन पर कठोर नैतिक नियन्त्रणक सम्भावित सीमा, दुनू केँ अलग-अलग देखब उचित अछि।
३.४ अस्वाद
मूल पाठ: मुद्रित पृ. २९–३२; लेख-तिथि: १२.०८.१९३०।
‘अस्वाद’ शीर्षकक तात्पर्य भोजनक स्वादक अस्तित्व नकारब नहि, बल्कि स्वादलिप्साकेँ जीवनक प्रधान लक्ष्य नहि बनायब अछि। लेखक स्पष्ट करैत छथि जे भोजन देहकेँ टिकेबाक साधन अछि; केवल जिह्वाक सुख लेल खाएब आत्मनियन्त्रणक बाधा बनि सकैत अछि। निबन्ध अस्वादकेँ ब्रह्मचर्य सँ जोड़ैत अछि: जिह्वा पर नियन्त्रण इन्द्रियसंयमक अभ्यास बनैत अछि। अकारण अधिक भोजन, स्वादक लोभ आ आवश्यकता-बाहिर भोगक प्रवृत्ति विरुद्ध ई तर्क अछि।
पाठमे भोजनकेँ औषध-जकाँ आवश्यकता आ उपयोगिताक आधार पर ग्रहण करबाक तुलना देल गेल अछि। एहिसँ गाँधीजीक नैतिकता देहक सामान्य आ दैनिक क्रिया धरि उतरि अबैत अछि। व्यक्ति सार्वजनिक सत्य-अहिंसाक बात करय, मुदा अपन भोग पर नियन्त्रण नहि राखय, तँ ओकर व्रतव्यवस्था अधूरा रहैत अछि—ई अध्यायक मूल अन्तःसूत्र अछि।
एहि विषयक सामयिक विश्लेषणमे पोषण, आयु, श्रम, स्वास्थ्यस्थिति आ भोजनक सांस्कृतिक महत्त्वक भेद ध्यानमे रखब जरूरी अछि। स्वादक प्रति सजगता आ अति-उपभोगक आलोचना उपयोगी अछि; मुदा कठोर निषेधकेँ चिकित्सा-विज्ञानक सार्वभौम नियम मानब गलत होयत। पोषण-अभाव झेलैत समाजमे ‘कम खाएब’क नैतिक उपदेश देब वस्तुस्थिति सँ कटल भऽ सकैत अछि। ग्रन्थक बल भोग-विवेक पर अछि, अनाहारक महिमामण्डन पर नहि।
३.५ अस्तेय (अचौर्य)
मूल पाठ: मुद्रित पृ. ३३–३५; लेख-तिथि: १९.०८.१९३०।
‘अस्तेय’ निबन्ध चोरीक परिभाषाकेँ सीधा कानून-विरुद्ध वस्तु उठा लेबाक संकीर्ण अर्थ सँ बहुत आगाँ लऽ जाइत अछि। पाठक तर्क अछि जे अनावश्यक वस्तु लेब, दोसरा लेल निर्धारित वस्तुक अनुचित उपयोग, वा जरूरतसँ अधिक संग्रह सेहो नैतिक अर्थमे चोरीक समीप पहुँचि सकैत अछि। एहि ठाम गाँधीजीक नैतिकता सम्पत्तिक औपचारिक स्वामित्व सँ हटि आवश्यकता आ न्यायपूर्ण उपभोगक प्रश्न उठबैत अछि।
अध्यायक विशेषता ‘जरूरत’ आ ‘अधिकार’ बीचक तनाव अछि। जँ कोनो वस्तु वैध खरीदल गेल अछि, तथापि ओकर अनावश्यक उपभोग सामाजिक साधन पर दबाव डालि सकैत अछि—ई नैतिक तर्क आजुक संसाधन-संकट मे सेहो विचारणीय अछि। निबन्धमे सत्य-अहिंसाक संग अस्तेयक रेखाचित्र प्रस्तुत अछि; एकर अर्थ जे परस्पर विश्वास, गैर-हिंसक व्यवहार आ सीमित उपभोग एकमेक सँ जुड़ल अछि।
एकर आलोचनात्मक सीमा सेहो अछि। कतेक उपभोग ‘आवश्यक’ अछि, ई निर्धारण वर्ग, रोग, अपांगता, बाल्यावस्था, श्रमक प्रकृति आ सामाजिक परिप्रेक्ष्यक अनुसार बदलैत अछि। नैतिक अस्तेय केँ समाजक निर्धन लोकक छोटी-छोटी इच्छापर कठोर निगरानीक औजार नहि बनेबाक चाही। एकर व्यापक अर्थ प्रभुत्वशाली समूहक अपव्यय, शोषण आ संसाधनक असमान पहुँचक परीक्षणमे बेसी फलदायी अछि।
३.६ अपरिग्रह
मूल पाठ: मुद्रित पृ. ३६–३८; लेख-तिथि: २६.०८.१९३०।
‘अपरिग्रह’ अस्तेयक अगिला तार्किक पायदान अछि। पुस्तकमे एहि शीर्षकक अन्तर्गत जरूरतसँ बेसी वस्तु जमा नहि करब, सञ्चयक लालसाकेँ घटायब आ दैनिक उपभोगकेँ सीमित करबाक आग्रह व्यक्त अछि। लेखकक विचारमे सम्पत्ति जमा कएला सँ सुरक्षा आ सन्तोष सुनिश्चित नहि होइत अछि; आवश्यक वस्तुक यथोचित उपयोग आ लोकसेवाक क्षमता नैतिक जीवनक अधिक सार्थक मापदण्ड अछि।
पाठक एक मार्मिक प्रश्न अछि: जखन असंख्य लोकक पास जीवनक अनिवार्य साधन नहि अछि, तखन सम्पन्न व्यक्तिक अत्यधिक वस्तुसंग्रहकेँ सहज किएक मानल जाय? एहि प्रश्नक मार्फत अपरिग्रह धार्मिक तपस्या सँ बढ़ि वितरणात्मक न्यायक बहस बनि जाइत अछि। संग्रह छोड़बाक अर्थ सर्वथा निष्क्रियता नहि; जरूरत पूरा करबाक सामर्थ्य राखि बचल साधन समाजक कार्यमे लगायब एतय आदर्श अछि।
आलोचनात्मक दृष्टिसँ अपरिग्रहक मूल्य तखन बेसी स्पष्ट होइत अछि जखन हम नैतिक स्वैच्छिक त्याग आ जनसामान्यक अनैच्छिक अभावक बीच भेद राखैत छी। जे लोक जीवनयापन लेल संघर्षरत अछि, ओकर न्यूनतम सुरक्षा-भंडारकेँ ‘लोभ’ कहब तर्कहीन होयत। अपरिग्रहक प्रासंगिकता संसाधनक असमान वितरण, उपभोक्तावाद आ जिम्मेदार सार्वजनिक व्ययक प्रश्नमे अछि; निर्धनताकेँ अपने-आप पवित्र मानि लेब एहि विचारक न्यायपूर्ण अनुप्रयोग नहि।
३.७ अभय
मूल पाठ: मुद्रित पृ. ३९–४०; लेख-तिथि: ०२.०९.१९३०।
‘अभय’ निबन्ध आत्मिक निर्भीकताकेँ सत्य-अहिंसाक आवश्यक पूर्वशर्त कहैत अछि। लेखक बाहरी भयक अनेक स्रोतक उल्लेख करैत छथि—मृत्यु, जीविका, प्रतिष्ठा, परिजन, राज्यसत्ता, सामाजिक प्रताड़ना। सत्यपालन जँ परिणामक भय सँ टूटि जाय तँ नैतिक प्रतिज्ञा टिकि नहि सकैत अछि। ताहि दृष्टिसँ निर्भीकता मात्र वीररसक भाव नहि, न्यायपूर्ण निर्णय लेबाक कठिन क्षमता अछि।
पाठक एकटा महत्त्वपूर्ण गुण ई अछि जे अभयकेँ हिंस्र दुस्साहस सँ अलग राखल गेल अछि। निडरता, आत्मसमर्पण, सत्यक खोज आ आत्म-संशोधन एकटा अनुशासित मनोवृत्ति बनबैत अछि। अहिंसक प्रतिरोधक सफलताक लेल बाहरी हानि सहबाक तैयारी आ अपन विवेक प्रति निष्ठा आवश्यक ठहरैत अछि।
परन्तु निर्भीकता आ जोखिमक अन्ध स्वीकार एक नहि। असुरक्षित नागरिक, उत्पीड़ित समूह वा हिंसाक शिकार व्यक्ति सँ निर्भीकता माँगैत समय ओकर वास्तविक सुरक्षा, आश्रय आ संस्थागत सहयोग देब जरूरी अछि। अभयक उत्तम सामाजिक अर्थ भय पैदा करनिहार संरचना बदलब अछि। जँ हम केवल भयभीत व्यक्तिक स्वभावकेँ दोष देब, तँ राज्य आ समाजक उत्तरदायित्व ओझरायल रहि जायत।
३.८ अस्पृश्यता-निवारण
मूल पाठ: मुद्रित पृ. ४१–४३; लेख-तिथि: ०९.०९.१९३०।
एहि निबन्धमे अस्पृश्यता केँ धार्मिक-सामाजिक विकृति मानि ओकर उन्मूलनक आग्रह अछि। पाठक आरम्भमे स्पष्ट रूपसँ कहल गेल अछि जे ‘अस्पृश्यता’ आ ‘अछूत’क धारणा मनुष्यक बराबरीक विरुद्ध अछि। लेखक भोजन, स्पर्श, श्रम आ सामाजिक सम्पर्कक व्यवहारमे बनल विभाजनक आलोचना करैत छथि। एहि निबन्धक बल ई अछि जे सामाजिक अन्यायकेँ सामान्य शिष्टाचारक कमी नहि, एकटा जड़ जमा लेने सामूहिक आचारक दोषक रूपमे देखैत अछि।
ग्रन्थक धार्मिक तर्कमे धर्मक नाम पर भेदभावक वैधताकेँ चुनौती देल गेल अछि। ई चुनौती ओहि पाठक समुदाय लेल विशेष महत्त्वपूर्ण छल जे जाति-आधारित बहिष्करणकेँ परम्परा मानि स्वीकारि लेने छल। एहि खण्डमे अस्पृश्यता-निवारण सत्य-अहिंसाक ठोस सामाजिक परीक्षा बनि जाइत अछि: व्यक्तिक प्रति प्रेमक दावा तखनहि सार्थक, जखन ओकर सामाजिक प्रतिष्ठा आ बराबरी व्यवहारमे मानल जाय।
आलोचनात्मक अध्ययनमे एतय एकटा तनाव देखाइत अछि। मुख्य पाठ भेदभाव-विरोधक प्रबल तर्क देत अछि, मुदा परिशिष्टक पृ. ६६ मे वर्णव्यवस्था आ आश्रमजीवन पर टिप्पणी सेहो अछि। एहि दुनूकेँ जोड़ि देखलासँ जाति-निवारणक घोषित उद्देश्य आ परम्परागत वर्ण-सम्बन्धी विवेचनक बीच सम्भावित वैचारिक असहजता उभरैत अछि। आधुनिक समानताक कसौटी पर अस्पृश्यता-विरोधक संग जातिगत पदानुक्रम, पैतृक व्यवसाय-बन्धन आ सामाजिक अवसरक असमानता केँ सेहो पूर्णतः अस्वीकार करब आवश्यक अछि।
३.९ श्रमव्ययी आजीविका
मूल पाठ: मुद्रित पृ. ४४–४६; लेख-तिथि: १६.०९.१९३०।
एहि अध्यायमे श्रम आ जीविकाकेँ परस्पर निर्भर नैतिक दायित्व मानल गेल अछि। पाठ ‘ब्रेड लेबर’ सम्बन्धी विचारक परिचय दैत अछि: जे मनुष्य खाइत अछि, ओकरा अपन सामर्थ्यक अनुसार उत्पादक शारीरिक श्रम सेहो करबाक चाही। ई धारणा नियोक्ताक विशेषाधिकार आ मजदूरक हीनता, दुनूक विरुद्ध अछि। श्रमकेँ व्यक्ति-चरित्र निर्माण आ सामाजिक समानताक माध्यम बनाओल गेल अछि।
पाठक एक महत्वपूर्ण मोड़ ई अछि जे जे लोक शारीरिक श्रम नहि करैत छथि, हुनकर भोजन-अधिकार पर नैतिक प्रश्न उठैत अछि; तथापि वृद्ध, असमर्थ आ आश्रित व्यक्तिक सेवादायित्वक चर्चा सेहो एतय उपस्थिति अछि। श्रमविमर्शक मर्म ई अछि जे जीविकाक साधन तैयार करनिहार हाथक प्रति सम्मान बढ़य आ कामक आधार पर ऊँच-नीचक विचार कम होय। लेखक स्वयं शरीर सँ काज करबाक उदाहरणक बल पर श्रमक गरिमा स्थापित करैत छथि।
आजुक आर्थिक सन्दर्भमे एहि धारणा केँ ज्यों-का-त्यों लागू करब कठिन अछि, कारण देखभाल, अध्यापन, मानसिक श्रम, तकनीकी सेवा आ अपांग-अनुकूल रोजगारक अनेक रूप अछि। तथापि श्रमक सम्मान, श्रमिकक अधिकार, उत्पादन-उपभोगक सम्बन्ध आ सेवाक सामूहिकता पर एहि निबन्धक आग्रह गम्भीर अछि। नैतिक दायित्वक नाम पर मजदूरक न्यून पारिश्रमिक वा श्रम-शोषणक समर्थन कदापि नहि होयबाक चाही; श्रमक गरिमा संग न्यायसंगत मजदूरी आ सुरक्षा अनिवार्य अछि।
३.१० सर्वधर्म-समभाव—१
मूल पाठ: मुद्रित पृ. ४७–४९; लेख-तिथि: २३.०९.१९३०।
पहिल ‘सर्वधर्म-समभाव’ निबन्ध सहिष्णुताक शब्दार्थ आ नैतिक सीमा पर केन्द्रित अछि। लेखक ‘सहिष्णुता’ सँ आगाँ बढ़ि ‘समभाव’क विचार प्रस्तुत करैत छथि। मूल अभिप्राय ई जे अपन धर्मकेँ त्रुटिहीन आ दोसरा धर्मकेँ स्वभावतः अधम मानबाक दृष्टि त्यागल जाय। मनुष्यक ज्ञान सीमित अछि; ताहि कारणेँ धर्मक मानवीय व्याख्यासभमे अपूर्णता होयब सम्भव अछि।
एहि निबन्धक सामर्थ्य आत्मालोचना अछि। दूसराक सम्मान केवल सामाजिक शान्तिक रणनीति नहि, अपन ज्ञानक सीमाबोध सँ निकलैत अछि। धर्मक प्रति निष्ठा आ धर्मसम्बन्धी विनयकेँ परस्पर विरोधी नहि मानल गेल अछि। पाठमे ‘धर्म सब अपूर्ण’ कहबाक प्रसंग ई नहि जे आस्था निरर्थक अछि; बल्कि मनुक्खक व्याख्या अन्तिम सत्य पर एकाधिकार नहि रखैत अछि।
आलोचनात्मक रूपेँ ‘समभाव’ आ वास्तविक धार्मिक स्वतन्त्रता बीच भेद जरूरी अछि। समान सम्मानक आदर्श तखन सशक्त बनैत अछि जखन पूजा, अ-आस्था, धर्मत्याग, मतभिन्नता आ धर्मपरिवर्तनक कानूनी अधिकार सुरक्षित रहय। केवल भावात्मक सद्भाव पर्याप्त नहि, अल्पसंख्यक आ भिन्न विश्वास रखने लोकक समान नागरिकता सेहो जरूरी अछि। एहि निबन्धक नैतिक प्रयोजनकेँ आधुनिक अधिकार-विमर्श सँ जोड़ब फलदायी अछि।
३.११ सर्वधर्म-समभाव—२
मूल पाठ: मुद्रित पृ. ५०–५२; लेख-तिथि: ३०.०९.१९३०।
दोसर ‘सर्वधर्म-समभाव’ निबन्ध सिद्धान्तकेँ आश्रमक बहुधार्मिक प्रार्थना-व्यवहार मे उतारैत अछि। एतय प्रार्थनामे विभिन्न धार्मिक परम्पराक स्तुति वा पाठक उल्लेख अछि। लेखक एहिमे आत्मीयता, शिक्षण आ परस्पर सम्मानक सम्भावना देखैत छथि। पहिल लेखक सैद्धान्तिक आग्रह एहि लेखमे प्रत्यक्ष सामाजिक प्रयोगक रूप धारण करैत अछि।
ग्रन्थक एक विशेष बिन्दु ई अछि जे अपन धर्मक सत्य-बोध सुरक्षित रखैत दोसरा परम्पराक वाणी सुनबाक क्षमता पर बल देल गेल अछि। संवादक लक्ष्य दोसराकेँ हराएब नहि, अपनेँ भीतरक संकीर्णता कम करब अछि। धार्मिक बहुलताक ई धारणा निर्विवाद एकरूपता नहि माँगैत अछि; एकटा आश्रम-समाजमे पारस्परिक अनुशासन आ आदरक वातावरण चाहैत अछि।
आलोचनात्मक सवाल अछि जे साझा प्रार्थना मे स्वेच्छा, असहमतिक अधिकार आ गैर-धार्मिक व्यक्तिक स्थान कतेक सुरक्षित अछि। धर्मसभक धार्मिक भाषाकेँ मिलि कऽ बजब सामूहिकता रचि सकैत अछि, मुदा सभ नागरिकक सम्मान लेल धार्मिक सहभागिताकेँ बाध्यकारी नहि बनेबाक चाही। एहि शर्त पर साम्प्रदायिक भेद घटेबाक गाँधीवादी प्रस्ताव लोकतान्त्रिक बहुलताक संग रचनात्मक संवाद करि सकैत अछि।
३.१२ नम्रता
मूल पाठ: मुद्रित पृ. ५३–५४; लेख-तिथि: ०७.१०.१९३०।
‘नम्रता’ शीर्षकमे विनयकेँ अलग व्रतक रूपमे देखबाक कठिनाई पर विचार अछि। लेखकक कथनक भाव ई जे नम्रता कागज पर लीहल प्रतिज्ञासँ नहि, भीतरक अहंकार घटबाक क्रमिक अभ्यास सँ विकसित होइत अछि। ओही कारणेँ नम्रताकेँ सभ व्रतक साङ्गतिक गुण मानल गेल अछि। जे व्यक्ति अपन सत्यपालन पर गर्व करैत दोसरा केँ तुच्छ मानैत अछि, से अपन साधनाक मूल भाव खोइ सकैत अछि।
एहि निबन्धक अध्यात्मिक पक्ष सेवाक भाव सँ जुड़ैत अछि। मनुष्य अपन सीमितता बुझैत अछि तँ अपन उपलब्धिक दावा सँ हटि समाजक व्यापक जीवनक प्रति उत्तरदायी बनैत अछि। विनयक ई अर्थ दासभाव नहि, अहंकार-शून्य सहयोग अछि। निबन्धक रूपक-भाषा आत्मपरिष्कारक कठिनाइकेँ सहज करैत अछि।
वर्तमान सार्वजनिक विमर्शमे नम्रता विशेष उपयोगी अछि, कारण तर्क-विवाद बहुधा व्यक्तिपूजाक रूप लऽ लेत अछि। तथापि विनयक नैतिक आदर्शकेँ कमजोर वर्ग सँ चुप रहबाक आदेश बनायब हानिकारक होयत। प्रश्न पूछब, विरोध करब आ अपन अधिकार माँगब नम्रताक विरुद्ध नहि। उचित नम्रता शक्ति सँ जुड़ल अहंकार सीमित करैत अछि, आत्मसम्मान नहि मेटबैत अछि।
३.१३ स्वदेशी: प्रस्तावनात्मक टिप्पणी
मूल पाठ: मुद्रित पृ. ५५; विषय-सूचीमे स्वतंत्र क्रमांक १३।
एहि संक्षिप्त लेखमे गाँधीजी स्पष्ट करैत छथि जे स्वदेशी पर विस्तृत लिखैत काल राजनीतिक अर्थक प्रसंग स्वाभाविक रूपसँ आबि सकैत अछि, तथापि ध्यान मूलतः ओकर नैतिक-धार्मिक पक्ष पर अछि। ई टिप्पणी आगामी ‘स्वदेशी व्रत’क व्याख्याक प्रवेशिका अछि। निबन्ध छोट अछि, मुदा ओकर आलोचनात्मक महत्त्व बड़ अछि: स्वदेशीकेँ केवल विदेशी वस्तुक बहिष्कारक कार्यक्रम मानलासँ विचारक आधा अर्थ बचैत अछि।
एहि अंश सँ लेखकक पाठकीय अभिप्राय सेहो स्पष्ट होइत अछि। ओ स्वदेशीक सम्बन्ध सम्बन्धित लोकक सेवा, स्वानुशासन आ जिम्मेदारी सँ स्थापित करबाक जमीन तैयार करैत छथि। एही से विषय-सूचीमे एहि छोट टिप्पणीकेँ अलग स्थान देल जायब अर्थवान् अछि; एकरा ‘स्वदेशी व्रत’मे मिला कऽ छोड़ी देब ग्रन्थक सम्पादकीय संरचनाकेँ अस्पष्ट करत।
एहि टिप्पणीकेँ पढ़बाक उपयुक्त पद्धति ई अछि जे राजनीतिक राष्ट्रवाद, आर्थिक स्थानीयता आ नैतिक निकटता—तीनू बीच भेद राखल जाय। लेखकक स्वदेशी-विवेचनक गुण-अवगुण देखबाक क्रम एहि भेद सँ स्पष्ट होइत अछि।
३.१४ स्वदेशी व्रत
मूल पाठ: मुद्रित पृ. ५६–५९।
‘स्वदेशी व्रत’मे स्वदेशीक अर्थ पड़ोसी आ निकटवर्ती समुदाय प्रति प्रथम उत्तरदायित्वक रूपमे स्थापित अछि। लेखक कहैत छथि जे दूरेक लोकक सेवा करबाक ऊँच विचार राखैत अपन आसपासक लोकक उपेक्षा कएलासँ सेवाक वास्तविक दायित्व छूटि सकैत अछि। स्थानीय सम्बन्ध सँ शुरु भेल सेवा आगाँ व्यापक मानवता धरि पहुँचित अछि। ई विचार स्वदेशीकेँ भौगोलिक बन्दिश नहि, जिम्मेदारीक क्रमबद्ध विस्तारक रूपमे बुझबाक अवसर देत अछि।
निबन्धक एक महत्त्वपूर्ण विशेषता धार्मिक प्रसंग आ सामाजिक-आर्थिक प्रसंगक मिलन अछि। अपन पड़ोसीक श्रम, ओकर वस्तु आ ओकर कठिनाईक प्रति सजग होयब स्वदेशी अछि; मुदा ई भाव दोसरा देश वा धर्मक लोकक प्रति द्वेष नहि बनय। लेखमे स्वदेशीकेँ सेवा आ पारस्परिकता सँ जोड़बाक प्रयास दुराग्रही बहिष्कार सँ अलग ठहरैत अछि। स्थानीय उत्पादन, भाषा आ सांस्कृतिक आधारक सम्मान एहि व्यापक नैतिक भावक सम्भावित क्षेत्र अछि, मुदा ई सभ आधुनिक अनुप्रयोग अछि, मूल पाठक प्रत्यक्ष नीतिगत सूची नहि।
समकालीन मूल्याङ्कनमे स्वदेशी आ वैश्विक परस्परावलम्बन बीच सन्तुलन आवश्यक अछि। औषधि, विज्ञान, शिक्षा, व्यापार आ प्रवासी समुदायक सहयोग कखनो-कखनो अन्तरदेशीय सञ्जाल पर निर्भर करैत अछि। स्थानीय अर्थव्यवस्थाक समर्थन, पर्यावरणीय जिम्मेदारी आ शोषण-रहित व्यापार महत्त्वपूर्ण अछि, तथापि केवल उत्पत्तिस्थानक आधार पर वस्तु वा व्यक्तिक नैतिकता तय करब उचित नहि। गाँधीजीक निकटवर्ती सेवा-विचारक सभसँ उर्वर प्रयोग स्थानीय उत्तरदायित्व संग सार्वभौम मानवीय सम्मान जोड़ब अछि।
३.१५ व्रतक आवश्यकता
मूल पाठ: मुद्रित पृ. ६०–६२; लेख-तिथि: १४.१०.१९३०।
अन्तिम मुख्य निबन्ध सम्पूर्ण ग्रन्थक आत्मपरीक्षण अछि। लेखक व्रत लेबाक आवश्यकता पर सम्भावित आपत्तिसभ उठबैत छथि: नियम मानी लेल पर्याप्त किएक नहि? कठिन परिस्थिति मे व्रत किएक कठोर हो? लेखकक उत्तर अछि जे सदिच्छा मात्र पर्याप्त नहि; नैतिक निर्णयमे दृढ़ निश्चय चाही। ताहि लेल व्रत क्षणिक भावनाक बदला दीर्घकालीन अनुशासनक सार्वजनिक घोषणा बनैत अछि।
एहि निबन्धमे ‘जहिना सम्भव हो’क अनिश्चित अभिव्यक्तिक आलोचना भेटैत अछि। लेखकक मतमे व्रत अपवाद खोजबाक चतुराई नहि, प्रलोभनक सोझाँ ठाढ़ रहबाक बल प्रदान करैत अछि। शराब-पान त्यागक उदाहरण, सूर्यक निश्चित गतिक उपमा आ मनुष्यक वचन पालनक प्रश्न—ई सभ तर्कक द्वारा नियम आ चरित्रक सम्बन्ध स्पष्ट कएल गेल अछि। ई निबन्ध आरम्भिक ‘सत्य’क संग विचारक पूर्ण वृत्त बनबैत अछि।
आलोचनात्मक रूपेँ दृढ़ता आ जड़ता बीच अन्तर रखब जरूरी अछि। कोनो निर्णय नब प्रमाण, दूषण वा दोसरा व्यक्ति पर हानि स्पष्ट भेला पर संशोधित होयबाक चाही। से बात १९३२ क उपलब्ध अंग्रेजी पाठमे सेहो स्वीकारल गेल अछि जे पछि गलत सिद्ध भेल व्रत छोड़बाक आवश्यकता आबि सकैत अछि; तथापि मैथिली निबन्धक जोर निश्चित संकल्प पर अछि। कठोर व्रतकेँ मानवीय विवेक, चिकित्सा-अपवाद आ न्यायपूर्ण परिणाम सँ निरन्तर जाँचैत रहब एहि विचारक समकालीन, विवेकपूर्ण पाठ होयत।
४. परिशिष्टक स्वतंत्र मूल्याङ्कन: एगारह आश्रम-व्रत
मुद्रित पृ. ६३–६६ पर ‘परिशिष्ट’ शीर्षक अन्तर्गत आश्रम-नियमावलीक एगारह व्रतक संक्षिप्त व्याख्या देल अछि। मुख्य भागक १५ निबन्ध आ परिशिष्टक ११ व्रतकेँ एकहि गिनती नहि मानबाक चाही। मुख्य निबन्धमे ‘स्वदेशी’क प्रवेशिका, ‘स्वदेशी व्रत’ आ सर्वधर्म-समभावक दू लेख अलग गिनल गेल अछि, तथा नम्रता आ व्रतक आवश्यकता पर स्वतंत्र विमर्श अछि। परिशिष्ट प्रस्तावित जीवन-विधानक संक्षिप्त, व्यवहारी प्रतिरूप अछि; मुख्य लेख व्रतसभक विस्तृत नैतिक औचित्य प्रस्तुत करैत अछि।
परिशिष्टक क्रम: (१) सत्य, (२) अहिंसा, (३) ब्रह्मचर्य, (४) अस्वाद, (५) अस्तेय/अचौर्य, (६) अपरिग्रह, (७) श्रमव्ययी आजीविका, (८) स्वदेशी, (९) अभय, (१०) अस्पृश्यता-निवारण, (११) सहिष्णुता/सहबाक सामर्थ्य। (मुद्रित पृ. ६३–६६)
परिशिष्टक महत्त्व एहि मे अछि जे दार्शनिक अवधारणा नैतिक व्यवहारक ठोस सूची बनि जाइत अछि। उदाहरणार्थ, अस्तेयक व्याख्या अनावश्यक ग्रहणक प्रतिरोध आ अपरिग्रहक व्याख्या अतिरिक्त वस्तुसंग्रह घटायब सँ जुड़ैत अछि; श्रमव्ययी आजीविका देह सँ काम करबाक जिम्मेदारी बतबैत अछि; स्वदेशी पड़ोसीक सेवा लेल प्राथमिकता दैत अछि; अहिंसा विरोधी व्यक्ति प्रति घृणाहीन प्रतिरोधक आग्रह करैत अछि। एहि नियमसभक व्यवहारगत स्वरूप आश्रमक सामूहिक अनुशासन बुझबाक लेल जरूरी अछि।
परिशिष्टक पृ. ६६ मे अस्पृश्यता-निवारणक संग वर्ण-व्यवस्था सम्बन्धी टिप्पणी सेहो अछि। एतय समकालीन पाठककेँ मूल ऐतिहासिक पाठकेँ ज्यों-का-त्यों समझबाक संग-संग आलोचनात्मक दूरी राखबाक चाही। अस्पृश्यता उन्मूलनक नैतिक आग्रह महत्त्वपूर्ण अछि; मुदा सामाजिक बराबरीक आधुनिक परिभाषा जाति-आधारित व्यवसायिक बन्धन, पदानुक्रम आ बहिष्करणक सभ रूपक अन्त चाहैत अछि। ई द्वन्द्व समीक्षा मे छिपाओल नहि गेल अछि।
५. अनुवादक भाषा-संवेदना आ मैथिली गद्यक बनावट
मैथिली रूपान्तरक सभसँ स्पष्ट पहचान ओकर पाठक-सम्बोधनक बोलचाल-निकट गद्य अछि। ‘हमरालोकनि’, ‘आओर’, ‘थिक’, ‘करैत छी’, ‘होइत अछि’, ‘कहबाक चाही’ सन रूपसँ तर्क व्यक्त कएल गेल अछि। एहि भाषा सँ पाठ पाठकक समीप अबैत अछि; साहित्यिक संस्कृतनिष्ठ दुरूहता आ पूर्णतः बोलचालीक असंगति—दुनू सँ बचबाक प्रयत्न देखाइत अछि। वाक्यरचना प्रायः प्रश्न, उदाहरण, शंका आ उत्तरक सहारे आगाँ बढ़ैत अछि। सत्य, अहिंसा आ व्रतक आवश्यकता सन प्रसंगमे ई संवादात्मकता पाठककेँ विचारक भीतर सहभागी बनबैत अछि।
अनुवादक दार्शनिक शब्दकेँ सहज मैथिली वाक्यमे प्रयोग करैत छथि: सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह, अभय, अस्पृश्यता-निवारण, सर्वधर्म-समभाव, नम्रता, स्वदेशी। एहिमे बहुतो शब्द संस्कृत मूलक अछि, मुदा ओकर तात्पर्य भोजन, वस्तु, पड़ोसी, चोर, श्रम, भय आ धर्मक ठोस उदाहरण सँ खोलल गेल अछि। विशेष रूपसँ ‘श्रमव्ययी आजीविका’क संग ‘ब्रेड लेबर’क व्याख्या पाठक लेल वैचारिक सेतु प्रदान करैत अछि। एहि अर्थमे अनुवाद मात्र शब्द-प्रतिस्थापन नहि, मैथिली पाठक लेल वैचारिक अनुक्रमक पुनर्प्रस्तुति अछि।
किछु शीर्षक-संकेत शोधक दृष्टिसँ जरूरी अछि। ‘सर्वधर्म-समभाव’क शब्दार्थ ‘tolerance’ अथवा धार्मिक समान सम्मानक संग एक-जकाँ नहि अछि; एक ठाम सहब, दोसर ठाम समभाव, तेसर ठाम धार्मिक अधिकारक प्रश्न आबैत अछि। ठीक ओहिना ‘ब्रह्मचर्य’ केँ मात्र यौन-संयम धरि सीमित कएलासँ मन-इन्द्रिय नियन्त्रणक व्यापक अर्थ छूटैत अछि। तुलना करैत समय केवल शब्दकोशीय समानता नहि, प्रसंगक नैतिक अर्थ देखब जरूरी अछि।
मुद्रित प्रति मे मूल मैथिली वर्तनीक रूपसभकेँ आधुनिक मानकीकरणक नाम पर स्वतः त्रुटि नहि मानल गेल अछि। समीक्षा भाषाक रूपगत विश्लेषण करैत अछि, मूल पाठक ‘सुधारल’ संस्करण नहि बनबैत अछि। मे किछु स्थल पर हलुक धब्बा आ अक्षरक धुँधलापन अछि; ताहि कारणेँ लम्बा, अक्षरशः उद्धरण देबासँ बचल गेल अछि। एहि पद्धति सँ अप्रमाणित पाठोद्धार अथवा गलत उद्धरणक जोखिम घटैत अछि।
६. मूल–अनुवाद सम्बन्ध: प्रमाण आ सीमा
अंग्रेजी संस्करणक प्रस्तावनामे १९३० मे येरवडा कारागार सँ आश्रमक सदस्यकेँ पत्र लिखबाक उल्लेख अछि। ई तथ्य मैथिली पुस्तकक ‘मंगल-प्रभात’ शीर्षकक ऐतिहासिक सन्दर्भ बुझबामे सहयोगी अछि। (सेवाग्राम आश्रम: ‘From Yeravda Mandir’, शीर्ष/प्रस्तावना पृष्ठ)
दुनू प्रकाशित सूचीमे विषयक व्यापक समानता अछि: Truth/सत्य, Ahimsa/अहिंसा, Brahmacharya/ब्रह्मचर्य, Control of the Palate/अस्वाद, Non-stealing/अस्तेय, Non-possession/अपरिग्रह, Fearlessness/अभय, Removal of Untouchability/अस्पृश्यता-निवारण, Bread Labour/श्रमव्ययी आजीविका, Equality of Religions/सर्वधर्म-समभाव, Humility/नम्रता, Importance of Vows/व्रतक आवश्यकता, Swadeshi/स्वदेशी। किछु शीर्षकक स्थान आ पृथक प्रस्तुति दुनू मे एकरूप नहि अछि। अंग्रेजी सूचीमे ‘Yajna or Sacrifice’ आ ‘More About Yajna’ नामक अध्याय सेहो अछि, जकर समनाम शीर्षक मैथिली मुख्य विषय-सूचीमे नहि अछि। ई पाठ-रचना बीचक प्रमाणित अन्तर अछि, मुदा मध्यवर्ती हिन्दी संस्करण देखल बिनु ‘अनुवादकलेँ अध्याय हटौलनि’ कहब प्रमाणहीन होयत।
ई तुलनात्मक भेद आगेक अनुसन्धान लेल संकेत करैत अछि: गुजराती मूलक विशेष संस्करण, अमृतलाल ठाकोरदास मणावतीक हिन्दी रूपान्तर आ २०१३ क मैथिली अनुवादकेँ एक पंक्ति मे राखि रचना-संख्या, शीर्षक-क्रम, शब्दार्थ आ उदाहरणक आधार पर मिलान कएल जाय। एहि समीक्षामे ओहि अप्राप्त मध्यवर्ती पाठक स्थान पर अनुमान नहि भरल गेल अछि। एहि सँ उपलब्ध प्रमाणक सीमा स्पष्ट रहैत अछि।
७. दार्शनिक आ सामाजिक मूल्याङ्कन
एहि ग्रन्थक समग्र दार्शनिक गठन तीन स्तर पर विकसित होइत अछि। पहिल स्तर आत्म-साधना अछि: सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, नम्रता। दोसर स्तर सामाजिक संसाधनक नैतिकता अछि: अस्तेय, अपरिग्रह, श्रमव्ययी आजीविका, स्वदेशी। तेसर स्तर भय आ भेदभाव सँ मुक्त सहजीवन अछि: अहिंसा, अभय, अस्पृश्यता-निवारण, सर्वधर्म-समभाव। ई वर्गीकरण समीक्षकक विश्लेषणात्मक सुविधा अछि, गाँधीजी द्वारा ग्रन्थमे दत्त अध्याय-विभाजन नहि। विश्लेषणक लाभ ई जे व्रतसभ स्वतंत्र नैतिक उपदेश नहि, परस्पर-आश्रित साधनाक जाल बनि जाइत अछि।
पुस्तकक मूल शक्ति उपदेशकेँ जीवन-व्यवहारमे परखबाक आग्रह अछि। सत्य केवल भाषणक विषय नहि, अहिंसा केवल युद्ध-विरोध नहि, ब्रह्मचर्य केवल औपचारिक शपथ नहि, अपरिग्रह केवल धनक त्याग नहि, आ स्वदेशी केवल राजनैतिक नारा नहि। एक-एक अवधारणा मनुष्यक रोजमर्राक विकल्प, भोजन, वस्तु-प्राप्ति, श्रम-वितरण, समुदाय आ धर्म-सम्बन्धक निर्णयमे उतरैत अछि। एहि ठाम गाँधी-दर्शन अमूर्त सिद्धान्त सँ प्रयोगपरक नैतिक अभ्यास बनि जाइत अछि।
पुस्तकक सीमा सामाजिक संरचनाक प्रत्यक्ष विश्लेषणक अपेक्षाकृत सीमितता अछि। व्यक्ति अपन लोभ, भय आ घृणा पर नियन्त्रण करय, ई जरूरी अछि; मुदा जाति, श्रम-बाजार, भूमिहीनता, लिंग-असमानता अथवा राज्यसत्ताक हिंसक संरचना केवल व्यक्तिगत सदाचार सँ समाप्त नहि होइत अछि। उदाहरणार्थ, अस्पृश्यता-विरोधक विचार सामाजिक चेतना जगबैत अछि, मुदा वास्तविक समानता लेल संसाधन, शिक्षा, प्रतिनिधित्व आ संस्थागत अधिकारक प्रश्न सेहो चाही। एहि अर्थमे ग्रन्थ नैतिक प्रेरणा देत अछि; आधुनिक नीतिशास्त्र आ सामाजिक न्यायशास्त्र ओकर आलोचनात्मक पूरक अछि।
दोसरा दिस, प्रत्येक व्रतक कठोर स्वरूपक विवेचनमे विवेकक स्थान बनल रहनाइ चाही। स्वास्थ्यक अवस्था अनुसार भोजन, पारिवारिक सम्बन्धमे परस्पर सहमति, अपांगता अनुसार श्रम, धार्मिक मतभेदक स्वतन्त्रता आ जान-मालक सुरक्षा—ई सभ मानवीय परिस्थिति गाँधीजीक व्रत-नैतिकताक समकालीन प्रयोगमे अनिवार्य मानदण्ड अछि। एतय ग्रन्थक असहमति छिपाएब आवश्यक नहि, कारण गहन समीक्षा आदर आ आलोचनाकेँ एक संग सम्भव बनबैत अछि।
८. मैथिली साहित्यक सन्दर्भमे पुस्तकक योगदान
मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक अध्ययन प्रायः कविता, कथा, नाटक वा लोकसंस्कृति धरि सीमित नहि रहबाक चाही। गाँधीजीक आचार-विचारक ई रूपान्तर दार्शनिक गद्य, समाज-सुधार, धर्म-चिन्तन आ सार्वजनिक नैतिकताक शब्दावलीक विस्तारमे योगदान देत अछि। एतय परिग्रह, अस्तेय, समभाव आ स्वदेशी सन अवधारणासभ मैथिली पाठकक अपन परिचित वाक्य-विन्यासमे विमर्शित अछि। एहि सँ भाषाक वैचारिक क्षमता केवल सिद्धान्ततः नहि, प्रत्यक्ष मुद्रित पाठ द्वारा प्रमाणित होइत अछि।
अनुवादकक ‘अनुवादक दिससँ’ आ पुस्तकक अनुमति-संबन्धी सामग्री एकटा सांस्कृतिक तथ्य सेहो देखबैत अछि: भारतीय विचारक रचना मैथिलीमे पहुँचेबाक लेल भाषायी श्रम, प्रकाशकीय सहयोग आ संस्थागत स्वीकृतिक आवश्यकता पड़ैत अछि। २०१३ क ई संस्करण ताहि श्रमक एकटा दस्तावेज अछि। भाषा-रूपान्तर वैचारिक लोकतन्त्रीकरणक साधन बनि सकैत अछि, कारण पाठककेँ विचार बुझबाक लेल सदिखन हिन्दी-अंग्रेजीक मध्यस्थता पर निर्भर नहि रहय पड़ैत अछि।
एहि योगदानक समीक्षा करैत सावधान रहबाक चाही जे पुस्तक मैथिलीमे गाँधीवादक समस्त विमर्शक प्रतिनिधि नहि, बल्कि आश्रम-व्रत सम्बन्धी एक विशेष पाठ अछि। मैथिलीमे गाँधी-साहित्यक इतिहासक पूर्ण दावा लेल अन्य पत्रिका, पुस्तक, अनुवाद, तिथि आ प्रकाशन-स्वरूपक स्वतंत्र अध्ययन आवश्यक होयत। एहि समीक्षाक प्रमाण केवल एहि ग्रन्थक योग्यता आ ज्ञात मूल-परम्परा धरि सीमित अछि।
९. समेकित निष्कर्ष
‘मंगल-प्रभात’ पढ़लापर मुख्य बोध ई होइत अछि जे नैतिकता किताबक अध्यायकेँ अलग-अलग याद कऽ लेलासँ पूर्ण नहि होइत अछि। सत्यक आग्रह बिना अहिंसाक दिशा अस्पष्ट भऽ सकैत अछि; अहिंसा बिना सत्यक साधन क्रूर भऽ सकैत अछि; अस्तेय बिना अपरिग्रह अपूर्ण रहैत अछि; श्रमक गरिमा बिना स्वदेशी केवल उपभोगक नारा बनि सकैत अछि; अस्पृश्यता-निवारण आ सर्वधर्म-समभाव बिना आत्मशुद्धि सामाजिक न्याय सँ कटल रहि सकैत अछि। ई परस्परता ग्रन्थक वैचारिक केन्द्र अछि।
डॉ. योगानन्द झाक मैथिली रूपान्तरक महत्व एहि तथ्य मे अछि जे आश्रमवासी लेल लिखल नैतिक विचार मैथिली गद्यक माध्यम सँ नव पाठकसमूह धरि पहुँचैत अछि। पुस्तकक १५ मुख्य लेख आ ११-व्रतवाला परिशिष्ट, ओकर प्रस्तावना आ अधिकारपत्र सभ मिलि एकटा पठनीय वैचारिक आ प्रकाशकीय दस्तावेज बनबैत अछि। एकर असली उपयोग अनालोचनात्मक अनुकरण नहि, आत्मानुशासन, समता, श्रम-सम्मान आ अहिंसक सार्वजनिक व्यवहार पर विचारक मजबूत आरम्भक रूपमे अछि।
अन्तिम मूल्याङ्कनमे पुस्तक प्रेरक सेहो अछि आ प्रश्नोत्पादक सेहो। संयमक आदर्श केहन हो जे देह-स्वायत्तताकेँ न कुचलय? धार्मिक समभाव कोना अधिकार-समानता सँ जुड़य? श्रमक गरिमा कोना वास्तविक श्रमिक-न्याय बनय? अस्पृश्यता-विरोध जातिगत पदानुक्रमक पूर्ण अन्त धरि कोना पहुँचय? स्वदेशी कोना पड़ोसीक सेवा करैत विश्व-मानवक हित सँ नहि कटय? एहि प्रश्नसभक जन्म स्वयं पुस्तकक विचार सँ होइत अछि। ताहि कारणेँ ई अनुवाद मैथिलीमे गाँधी-दर्शनक केवल परिचय नहि, आलोचनात्मक संवादक जीवित आधार बनि सकैत अछि।
अध्याय 12 / २०१४
भोरे-भोर
डॉ. योगानन्द झाक कृतिक आलोचनात्मक विवेचन
समीक्षाक मूल प्रतिपादन
‘भोरे-भोर’ केवल भोरे उठबाक उपयोगिताक कविता नहि थिक; ई नेनाक दैनिक अनुभवकेँ प्रकृति-दर्शन, पारिवारिक सम्बन्ध, अनुशासन, ज्ञानार्जन, स्वास्थ्य, देशप्रेम आ परोपकारक विचारसँ जोड़बाक प्रयत्न थिक। पोथीमे पहिल रचना ‘भोरे-भोर’ (मुद्रित पृ. ४–११) आ दोसर रचना ‘प्रार्थना’ (पृ. १२–१६) अछि। पहिल रचनाक ८ खण्डमे भोरेसँ दिनचर्याक क्रम आगाँ बढ़ैत अछि; दोसर रचनाक ५ खण्डमे बालक अपन चरित्र आ सामाजिक आचरण लेल वरदान मँगैत अछि। प्रत्येक मुद्रित पृष्ठपर आठ पाँतिक विन्यास आ तकर संग चित्र, अर्थ ग्रहणक पृथक कड़ी बनबैत अछि।
साहित्यिक दृष्टिएँ एहि पुस्तकक विशेषता ओकर दृश्यात्मक बालोपयोगिता आ व्यावहारिक आचारबोधक एकसूत्रता थिक। मुदा एहि एकसूत्रताक सीमासभ सेहो देखाइत अछि: नेनाक अपन प्रश्न, असहमति, खेलक स्वच्छन्दता आ वैकल्पिक जीवन-अनुभव लेल स्थान कम अछि। एतय बालक प्रायः सीखयवला पात्र अछि; अपन स्वतन्त्र संसार रचयवला पात्र कम। ई आलोचना पाठक आधार पर अछि, लेखक वा अनुवादकक इरादाक अप्रमाणित अनुमान पर नहि।
अनुवादकेँ जाँचैत ई समीक्षा उपलब्ध मैथिली पाठक शब्दचयन, स्वर, पदक्रम, पुनरावृत्ति आ बाल-सम्बोधन पर केन्द्रित अछि। हिन्दी मूलक पूरा प्रमाणित पाठ एतय उपलब्ध नहि भेल, तेँ मूल–अनुवादक प्रत्येक पाँतिक शाब्दिक समानता वा अन्तरक दाबी नहि कएल गेल अछि। हिन्दी मूल ‘सुबह सवेरे’ सम्बन्धी समकालीन प्रकाशित समीक्षाक मदति सँ केवल रचनात्मक संरचना आ विषयगत साम्यक सीमित पुष्टिकरण कएल गेल अछि।
१.१ पोथीक पहिचान
भीतरी शीर्षकपृष्ठपर ‘भोरे-भोर’ नामक नीचाँ ‘अनुवाद: योगानन्द झा’ आ ‘मूल हिन्दी: डॉ. ए. कीर्तिवर्द्धन’ छपल अछि। प्रकाशकक नाम विद्यालक्ष्मी प्रकाशन, मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) अछि। विवरण-पृष्ठपर ‘संस्करण: प्रथम, २०१४ ई.’, मुद्रकक नाम इण्डियन प्रिण्टिंग प्रेस तथा मूल्य २०.०० अंकित अछि। आरम्भिक ‘दू शब्द’मे स्वयं अनुवादक हिन्दी बालकविता-संग्रह ‘सुबह सवेरे’क मैथिली रूपान्तरक चर्चा करैत छथि। एहि प्रमाणसभसँ कृतिक रूपान्तरित स्वरूप सुनिश्चित होइत अछि।
बाहरी साक्ष्यमे ‘विदेह’क पोथी-सूची एहि अनुवादकेँ २०१४ क कृति रूपमे दर्ज करैत अछि; ‘मैथिल मंच’क पुस्तकालय-सूची सेहो मूल लेखक, अनुवादक, प्रकाशक आ वर्ष बतबैत अछि। एहि दूटा सूचीक उपयोग मुख्यतः ग्रन्थक पहचान पुष्ट करबाक लेल कएल गेल अछि, पाठ-समीक्षाक स्थानापन्न बनयबाक लेल नहि। [सन्दर्भ २–३]
समीक्षाक प्रमुख आधार कविताक पाँति, पृष्ठानुसार विषय-क्रम, काव्यात्मक आवृत्ति, चित्रक प्रत्यक्ष दृश्य, भाषिक बनावट तथा दूनू भूमिका-पाठ छथि। प्रत्येक व्याख्याक संग सम्बन्धित मुद्रित पृष्ठक उल्लेख देल गेल अछि। ‘मूल लेखकक दृष्टिकोण’ आ ‘अनुवादकक दृष्टिकोण’केँ अलग राखल गेल अछि; आलोचकीय निष्कर्ष तेसर स्तरपर स्पष्ट कएल गेल अछि। मूल हिन्दी पाठक यथार्थ शब्दावली, कविताक अलग संस्करण, वा पाठक-प्रतिक्रियाक प्रत्यक्ष आँकड़ा उपलब्ध नहि रहबाक कारणेँ तिनकर बारेमे निर्विवाद दावा नहि अछि।
२. ‘दू शब्द’ आ ‘नेनालोकनि!’: दू प्रकारक पाठकीय सम्बोधन
२.१ अनुवादकक वैचारिक भूमिका
‘दू शब्द’ केवल औपचारिक प्रस्तावना नहि अछि। अनुवादक लोक-साहित्य, बाल-साहित्य, मातृभाषा, भाषिक प्रभुत्व आ अनुवादक सामाजिक आवश्यकताकेँ एक दोसरसँ जोड़ैत छथि। हुनक तर्कमे बाललोक-साहित्यकेँ भाषाक अभिव्यक्ति आ संस्कृतिक जीवन्त परम्पराक रूपमे बुझल गेल अछि। भाषिक दबावक कारणेँ मातृभाषामे अध्ययन-पाठन दुर्बल होयबाक चिन्ता कएल गेल अछि; विशेषतः मैथिली बाल-साहित्यक रचना-पाठनमे सक्रियताक आवश्यकता राखल गेल अछि।
एहि प्रस्तावनामे अनुवादक अनुवादकेँ केवल शब्द-बदलाब नहि, वरन् दुइ भाषाक बीच सम्बन्ध बनाबयवला रचनात्मक प्रक्रिया मानैत छथि। ‘Loss of translation’ नामक पदक उल्लेख कऽ मूल अर्थ अथवा अभिव्यक्तिक किछु हिस्सा स्थानान्तरणमे हेरायबाक सम्भावना स्वीकार कएल गेल अछि। ई सावधानी समीक्षाक लेल उपयोगी अछि: लक्ष्य भाषामे गीत सहज लगैत हो, तैयो मूल-पाठसँ तकर पूर्ण समरूपताक दावा स्वतः सिद्ध नहि होइत।
भूमिकामे वैदिक साहित्य, भाषा-इतिहास, सांस्कृतिक सम्पर्क आ अनुवाद-अध्ययनक प्रसंग सेहो अबैत अछि। मुदा एहि व्यापक सिद्धान्तसभक स्वतन्त्र ऐतिहासिक सत्यापन एहि पुस्तकक भीतर सम्भव नहि; एतय ओकरा अनुवादकक प्रस्तुत वैचारिक प्रस्ताव रूपेँ पढ़ल गेल अछि, अनुसन्धानद्वारा प्रमाणित इतिहासक निष्कर्ष रूपेँ नहि। भूमिका आ मूल कविताक बीच भाषाक कठिनाइक अन्तर सेहो उल्लेखनीय अछि: अवधारणात्मक, तत्समबहुल प्रस्तावनाक बाद कवितामे अपेक्षाकृत छोट आ श्रव्य पाँति भेटैत अछि।
२.२ मूल कविक बालसम्बोधन
‘नेनालोकनि!’ शीर्षक सम्बोधनमे दहिना भाग) कवि छोट-छोट कविताक माध्यमेँ बालककेँ प्रसन्न, हँसमुख आ गीत गबयवला बनल रहबाक सन्देश दैत छथि। पक्षीक गान आ मनुष्यक प्रसन्नताक बीच सम्बन्ध जोड़ल गेल अछि। एहि पृष्ठपर मूल रचनाकारक नाम ‘कीर्तिवर्द्धन’ संग सम्बोधन समाप्त होइत अछि; एहि कारणेँ ओकरा अनुवादकक ‘दू शब्द’क शेष अनुच्छेद मानब उचित नहि।
एहि दूटा प्रवेश-पाठक केन्द्र अलग अछि। प्रस्तावनामे अनुवादक भाषा-संस्कृति आ साहित्यिक स्थानान्तरणक प्रश्न उठबैत छथि; मूल रचनाकारक सम्बोधन बच्चाक हँसी, गीत आ स्वास्थ्यपर केन्द्रित अछि। वास्तविक काव्य-पाठमे ई दुनू धारा एकत्र होइत अछि: पढ़बाक–गबयबाक सरलता आ सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यक सघन उपस्थिति।
३. ‘भोरे-भोर’: आठ खण्डक क्रमिक पाठ-विश्लेषण (पृ. ४–११)
३.१ पृष्ठ ४: भोर केँ दिनचर्याक आरम्भ बनायब
पहिल खण्डक ‘भोरे-सबेरे जागब सीखू’ पाँति सीधा क्रियात्मक सन्देश दैत अछि। एहि संग ‘मातु-पिताकें कऽ प्रणाम’ आ ‘नियत काजमे लागब सीखू’ जेहन पद समाजक व्यवहारिक अनुशासनकेँ बालकक निजी दिनचर्यासँ जोड़ैत अछि। कविता एकाएक अमूर्त आदर्श नहि सुनबैत; निन्नसँ उठब, प्रणाम करब आ काज शुरू करबाक अनुभवसँ बात आरम्भ करैत अछि। चित्रमे बिछाओनपर जागैत नेना, खिड़कीपर भोरक प्रकाश, आ घड़ी अछि। एहिसँ पाठककेँ ‘समय’क अनुभव शब्दक अतिरिक्त दृश्यसँ भेटैत अछि।
आलोचनात्मक सीमा एतय प्रारम्भेँ प्रकट होइत अछि: ‘सीखू’क लगातार आज्ञार्थकता बालकसँ आज्ञा मानबाक अपेक्षा करैत अछि, मुदा ओकरा अपन नींद, जिज्ञासा वा काजक चुनावक आवाज नहि भेटैत। बालसाहित्यक उपदेशात्मक परम्परामे ई सहज शिल्प भऽ सकैत अछि, मुदा आधुनिक सहभागितापूर्ण पाठनमे शिक्षककेँ एहि पदक संग प्रश्न-विनिमय जोड़ब पड़त।
३.२ पृष्ठ ५: चिड़ै आ बालकक सहअस्तित्व
दोसर खण्डमे चिड़ै/पक्षीक हँसब–बजब, गीत गाएब, घर-आँगनमे घूमब, पानि आ दाना देब तथा ओकर नहाएब देखबाक प्रसन्नता अछि। चित्रमे फूलल डाढ़िपर दू चिड़ै आ रेलिङ पकड़ने नेना देखाइत अछि। पहिल पृष्ठक ‘करबाक’ उपदेश एतय ‘देखबाक’ आनन्द बनैत अछि। भोजन-पानि देबाक संकेत बच्चाकेँ मानवेतर जीवक प्रति जिम्मेवार बनबैत अछि; ओ केवल प्रकृतिक उपभोक्ता नहि, देखरेख करयवला संगाती सेहो बनि सकैत अछि।
कविताक ई अंश सभसँ अधिक बालकेन्द्रित प्रतीत होइत अछि, कारणेँ चिड़ैक चाल, आवाज आ स्नान दृश्य–श्रव्य कौतूहल पैदा करैत अछि। चित्र आ पाँति दूनू एकहि अनुभवक पूरक छथि। तथापि चिड़ैकेँ सदा प्रसन्न आ गबैत रहयवला प्राणी बनायब कविताक भावात्मक मानवीकरण थिक, पक्षिविज्ञानक तथ्यात्मक विवरण नहि।
३.३ पृष्ठ ६: हबा, घंटी आ सूनबाक अभ्यास
तेसर खण्डमे आकाश दिस ध्यान देब, निर्मल हवाक आनन्द, मन्दिरक घंटी, गीत-भजन आ ज्ञानक बात सुनबाक प्रसंग अछि। चित्रमे मेजपर कानपर हाथ देने बालक, मनमे घंटी आ बाजबाक सुर-चिह्न देखबैत अछि। एहिसँ दृश्यात्मक वर्णन सुनबाक अभ्यास दिस मुड़ैत अछि: नेना केवल प्रकृतिक रूप नहि, ओहि परिवेशक आवाज सेहो ग्रहण करैत अछि।
साहित्यिक जटिलता ई अछि जे ‘शुद्ध हबा’क शारीरिक सन्तोषसँ मन्दिरक स्वर आ ‘ज्ञान’क नैतिक बोध धरि कविता तेज गतिएँ पहुँचैत अछि। एतय विषयक एकसूत्रता ‘भोरक वातावरण’ अछि, मुदा प्रकृति–धर्म–ज्ञानक तीन अलग अनुभव एक खण्डमे भरि गेल अछि। कक्षामे पढ़बैत काल एहि भिन्नताकेँ खोलि कऽ बुझेनाइ अधिक सार्थक होयत।
३.४ पृष्ठ ७: बगीचा एकटा अनुभवशाला
चारिम खण्डमे बाबूजीक संग गाछीमे टहल, गाछ-बिरिछक हरियरपन, कोकिलक कूजन, भमरक गुनगुन, फूल-पात आ तितलीक प्रसंग अछि। काव्यक भोरे उठबाक आदेश एतय बगीचाक दृश्य–ध्वनि–गन्धक संसार दिस पसरैत अछि। चित्रमे पैघ लोक आ बालकक साझा उपस्थिति अछि; बच्चाक नजर फूल आ उडैत कीड़ामकोड़ा दिस अछि। ई खण्ड प्राथमिक बाल-अनुभवक दृष्टिएँ अत्यन्त प्रभावी अछि, कारणेँ कौतूहल खालि सदाचार-सन्देशसँ नहि, प्रत्यक्ष प्राकृतिक दृश्यसँ उठैत अछि।
बाबूजी संग टहलब एकल पारिवारिक नमूना प्रस्तुत करैत अछि। एहि रूपक अन्तर्गत दादी, माय, बहिन, शिक्षक वा संगियाक संग प्रकृति देखबाक सम्भावना पाठमे नहि उभरैत; ई मौलिक पाठक परिधि थिक, अनुवादक बनाओल अन्तर अछि से साबित नहि।
३.५ पृष्ठ ८: चन्द्रमाक अस्त आ सूर्योदयक प्रतीक्षा
पाँचम खण्डमे चन्दा मामा, नील गगन, पश्चिममे चमकैत चान आ पूब दिस प्रतीक्षित सूरजक स्थिति चित्रित अछि। भोरक ई क्षण बच्चाकेँ एकहि आकाशमे समयक परिवर्तन देखबैत अछि। चित्रमे पर्वत आ बादरक बीच चन्द्रमा आ उगैत सूरजक संकेत अछि। कविता आ चित्र दूनू ‘राति समाप्त भेल, दिन आरम्भ भेल’ एहि संक्रमणकेँ खेलक रूप दैत अछि।
‘चन्दा मामा’ शब्दक आत्मीयता मिथिलाक बालबोलीमे सहज ग्रहणीय छवि बनबैत अछि। रातिसँ दिनक बदलावमे चानक दृश्यता घटैत देखायब वैज्ञानिक शिक्षाक प्रवेश-बिन्दु भऽ सकैत अछि, मुदा कविता खगोलशास्त्रीय सूत्र नहि देइत; ओकर महत्त्व अनुभवात्मक अवलोकनमे अछि।
३.६ पृष्ठ ९: लालिमा आ सूर्यक मानवीकरण
छठम खण्डमे पूर्व दिशाक लालिमा, दिनकरक उदय आ आकाशक सुन्दरता वर्णित अछि। चित्रमे हँसैत सूर्यकेँ मानवीय मुख देल गेल अछि; एहि सँ अपरिचित वा विराट सूर्य नेनाक परिचित साथी जेकाँ भासैत अछि। ‘सूरज’क क्रमशः ऊपर उठब पहिल खण्डक बिछाओन छोड़बाक गतिसँ भिन्न, समूच दिनक प्राकृतिक घड़ी प्रस्तुत करैत अछि।
कविता पाठक दृष्टिकेँ ‘जागब’सँ ‘सूर्योदय देखब’ धरि लऽ अबैत अछि। उपदेशक बीच एहि दृश्यात्मक अवकाशक कारणेँ पुस्तक केवल नियमित दिनचर्याक सूची नहि रहि जाइत अछि। एहि दृश्यात्मक खण्डकेँ चित्र बिनु पढ़लासँ तकर बालक-सुलभ प्रभावक एक भाग छूटि सकैत अछि।
३.७ पृष्ठ १०: सूर्यनमस्कार आ देहक अनुशासन
सातम खण्डमे बच्चा सूर्यकेँ प्रणाम करैत अछि। पाठमे ‘कऽ प्रणाम, दऽ ध्यान मगन मन’ आ ‘रश्मि देह पर’ जकाँ प्रयोगसँ शारीरिक, मानसिक आ आध्यात्मिक अभ्यास एकठाम मेल करैत अछि। चित्रमे हाथ जोड़ने बालक आ पर्वतक बीच उगैत सूर्य अछि। एहिमे भोरक प्रकृति अब सामाजिक–अनुष्ठानिक व्यवहारमे रूपान्तरित होइत अछि।
कविता सूर्यक प्रकाशकेँ बल–बुद्धिक विकाससँ जोड़ैत अछि। ई कथनकेँ स्वास्थ्यक मापल-तोलल परिणाम वा चिकित्सकीय दाबीक रूपमे नहि, कविताक आशावादी प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति रूपेँ देखबाक चाही। कवि प्रकाशक अनुभवकेँ उत्साह, सचेतना आ अनुशासनसँ सम्बद्ध करैत छथि; चिकित्सा अथवा विज्ञानक प्रमाण अलग विषय थिक।
३.८ पृष्ठ ११: प्रथम पाठक पुनरागमन
आठम खण्डमे नियमित भोरे उठब, विशुद्ध हवा, चिड़ैक गीत, रोगसँ रक्षा, माता-पिताकेँ प्रणाम, तन–मोनक निर्मलता आ दैनिक काजक सफलता पुनः अबैत अछि। चित्रमे बच्चा माता-पिताकेँ प्रणाम करैत अछि। ई अन्तिम खण्ड पहिल पृष्ठक सन्देशकेँ वृत्ताकार ढंगसँ फेर सोझाँ अनैत अछि: आरम्भेँ प्रणाम आ काज, अन्तमे सेहो प्रणाम आ काज। एहि पुनरागमनसँ कविता स्मरणीय बनैत अछि, मुदा नव दृश्य प्रस्तुत करबाक अपेक्षा पुरान सन्देशक पुष्टि बढ़ि जाइत अछि।
‘रोग कोनो नहि सकत दबा’ जकाँ कथनकेँ पाठ्य-आलोचनामे अलंकारिक आश्वासन मानल उचित, अक्षरशः सार्वभौम स्वास्थ्य-गारंटी नहि। एहि अन्तरकेँ स्पष्ट करब बालसाहित्यक जिम्मेवार अध्यापनक भाग थिक।
४. ‘प्रार्थना’: पाँच खण्डक विस्तृत अध्ययन (पृ. १२–१६)
४.१ पृष्ठ १२: विनती, विद्या आ दया
दोसर कविताक शीर्षक ‘प्रार्थना’ मुद्रित पृ. १२ पर अछि। आरम्भ ‘विनती हमर सुनू भगवान’सँ होइत अछि; बालक विद्या, समझ, मानवीय प्रेम, दया आ उपकारक प्रवृत्ति चाहैत अछि। चित्रमे हाथ जोड़ने बालकक सम्मुख वीणा धारण कएने देवीक प्रतिमा अछि। ई दृश्य कविता अपन नैतिक मूल्यसभकेँ केवल आदेशक सूची नहि, कृपाक कामना रूपेँ प्रस्तुत करय लागैत अछि।
एतय पहिल कविताक ‘सीखू’ शब्दक बाहरी आग्रह बदलि कऽ ‘दीअ’ प्रकारक विनती बनैत अछि। दूनू रूपमे लक्ष्य आदर्श आचरण अछि, मुदा वाचक-दृष्टि बदलि गेल अछि: पहिल काव्यांशमे एकटा वयस्क स्वर बच्चाकेँ निर्देश दैत अछि, प्रार्थनामे बच्चा स्वयं सामर्थ्य आ ज्ञानक प्रार्थी बनैत अछि।
४.२ पृष्ठ १३: गुरु, शिक्षा आ पारिवारिक सेवा
दोसर खण्डमे मातु-पिताक भक्ति, एकलव्यक गुरु-अनुराग, शिक्षा-दीप, कृपा, चतराइ, प्रेम आ दयाक प्रसंग अछि। चित्रमे दीप वा आरती-जेकाँ दृश्य सहित नेनाक श्रद्धा प्रदर्शित अछि। एहि खण्डमे ‘श्रद्धा’ आ ‘शिक्षा’ एकहि नैतिक पदक्रममे ठाढ़ अछि; ‘एकलव्य’क सांस्कृतिक उल्लेख बालपाठकसँ पूर्वपरिचयक अपेक्षा करैत अछि।
एकलव्य प्रसंग जटिल साहित्यिक–सामाजिक पृष्ठभूमि रखने अछि। मात्र ‘गुरु-अनुराग’क आदर्श रूपेँ पढ़लासँ ओकर प्रश्नाकुल पक्ष—अधिकार, अवसर आ गुरु-शिष्यक शक्ति-सम्बन्ध—अनछुए रहि सकैत अछि। बालकक उमेरअनुसार कथा सुनेनाइ, प्रश्न पूछेनाइ आ एकाधिक दृष्टि सोझाँ आनब एहि पदक अधिक विवेकी शिक्षण होयत।
४.३ पृष्ठ १४: राष्ट्र, दुर्गा आ ज्ञानरूपक
तेसर खण्डमे मातु-पिताक आदर, राष्ट्रभक्ति, शान्तिक बल, मातृभूमिक सुपुत्र बनब, दुर्गाक शक्ति, सहाराक टकरा आ कृष्णक ज्ञानरूपकक उल्लेख अछि। चित्रमे हाथमे भारतक ध्वजा आ पोथी लेने हँसमुख बालक अछि। एहि दृश्यसँ ‘देश’ आ ‘पढ़ाइ’ अलग-अलग विषय नहि रहि, एकहि नेनाक दुन्नू जिम्मेवारी बनैत अछि।
ई खण्ड मूल्यक बहुलता देखबैत अछि: श्रद्धा, शान्ति, शक्ति आ ज्ञान। तथापि शिशु वा आरम्भिक कक्षाक पाठक लेल अल्प पाँतिमे एतेक साङ्केतिक नामक आगमन अर्थकेँ घना बना दैत अछि। शान्ति आ शक्तिक आपसी सम्बन्ध समझेनाइ पाठकीय व्याख्याक आवश्यक काज बनैत अछि।
४.४ पृष्ठ १५: जीवदया आ ऐतिहासिक आदर्श
चारिम खण्डमे ‘महावीर सन बनी अहिंसक’ आ ‘जड़-चेतनसँ प्रेम करी’ जकाँ पाँति स्पष्ट अहिंसा आ सहानुभूतिपर जोर दैत अछि। अगिला पाँतिमे बुद्धक शान्तिपथ, राणा आ शिवाजीक आदर्श तथा शत्रुभयसँ मुक्ति सम्बन्धी कामना अछि। चित्रमे बालकक हाथ अथवा छाती निकट एकटा चिड़ै-जेकाँ जीव देखाइत अछि; ई जीवनक प्रति कोमल भावकेँ दृश्यरूप दैत अछि।
एहि खण्डक भीतर असाधारण वैचारिक समीपता अछि: एक दिस अहिंसा, जीव-प्रेम; दोसर दिस पराक्रम आ निर्भीकता। एकरा परस्पर विरोध मानि तुरन्त खारिज नहि कएल जा सकैत, कारणेँ अहिंसा आ साहस सह-अस्तित्वमे रहि सकैत अछि; मुदा बिना प्रसङ्गक सूचीकरण बच्चाकेँ ई अन्तर स्वयं नहि बुझा पबैत। एहि कारणेँ ई काव्यांश मूल्यविमर्श लेल अच्छा, आ स्वतः स्पष्ट नीतिवचन रूपेँ अपेक्षाकृत कम सहज अछि।
४.५ पृष्ठ १६: कर्मयोग, सेवा आ निष्काम जीवन
अन्तिम खण्डमे धरती, गगन, पातालपर विजयक ध्वज; मातु-पिता आ गुरुजन-परिजनक स्वप्न पूरा करब; ‘कर्मयोगमे लागल सदिखन’; फलक आकांक्षा छोड़ि काज करब; बुद्धि, बल आ सेवाभावसँ जीवन निर्वाह करबाक इच्छा अछि। चित्रमे पर्वतीय धरातलपर ध्वजा पकड़ने बालक देखाइत अछि। पोथीक अन्तिम दृश्य आरम्भक नींदसँ जागैत नेनाकेँ कर्मशील, राष्ट्राभिमुख आ लक्ष्यनिष्ठ पात्रमे बदलैत अछि।
अन्तिम पाँतिक आचार-सन्देश सामान्य ‘सफलता’सँ आगाँ बढ़ि सेवाभावक महत्व स्थापित करैत अछि। मुदा ‘विजयक ध्वजा’ आ ‘फल नहि चाहब’क संयुक्त अर्थ विचारणीय अछि: पहिल छविमे उपलब्धिक प्रतीक, दोसरमे फलसँ अनासक्ति। एहि द्वन्द्वकेँ रचनाक दुर्बलता कहबाक बदला भिन्न परम्पराक नैतिक शब्दावली एकहि बाल-पाठमे समेटबाक प्रयत्न रूपेँ पहिचानब उचित अछि।
५. विषयानुक्रम: भोरक प्रकाशसँ सामाजिक मनुष्य धरि
५.१ समय आ स्थानक विस्तार
पहिल कविता घरक बिछाओन आ घड़ीसँ शुरू होइत अछि, आँगन–गाछी–आकाश–सूर्योदय घुमि फेर घरक पारिवारिक सम्बन्धपर वापस अबैत अछि। दोसर कविता पूजास्थानसँ शुरू होइत गुरु, राष्ट्र, ऐतिहासिक पुरुष आ अखिल विश्वव्यापी सेवा धरि पसरैत अछि। एहि क्रमकेँ ‘निजी सँ सामाजिक’ विस्तार कहल जा सकैत अछि। ई अर्थ पाठक विषयक्रमसँ निकलैत अछि; लेखकक पूर्वनिर्धारित योजनाक प्रमाण नहि।
५.२ संवेदना आ अनुशासनक तान
दूनू कविता दोसर-दोसर तरहेँ अनुदेश दैत अछि। ‘भोरे-भोर’मे बोलनिहार बच्चाकेँ जगाबैत, देखबैत, सुनबैत आ प्रणाम कराबैत अछि; ‘प्रार्थना’मे बच्चा अपन मनक गुणक आकांक्षा करैत अछि। पूर्वक सक्रिय क्रियासूचक पद आधुनिक बालसाहित्यक व्यवहारिक उपलब्धि अछि, मुदा लगातार उपदेशसँ बालकक कल्पनाक स्वतंत्र क्षेत्र सीमित भऽ सकैत अछि। जतय फूल, तितली आ पक्षी अबैत अछि, ओतय कविता स्वतन्त्र आनन्दक नजदीक पहुँचैत अछि; जतय आदर्श नामक सूची घन होइत अछि, ओतय सूचना आ नीति गीतपर भारी पड़ैत अछि।
५.३ सांस्कृतिक बहुलता बनाम एकल धार्मिक दृश्य
अनुवादकक ‘दू शब्द’ भारतीय बहुभाषिकता आ लोक-साहित्यक विविध रूपक सम्मान करैत अछि। काव्य-पाठमे मन्दिर, सरस्वती-प्रतिमा, दुर्गा, कृष्ण, सूर्यक प्रणाम आदि प्रतीक बारम्बार भेटैत अछि। एहि धार्मिक–सांस्कृतिक प्रतीकसभक उपस्थिति ग्रन्थक वस्तुस्थितिक वर्णन थिक; एकर आधार पर समस्त पाठकक धार्मिक पहिचानक अनुमान नहि। कक्षामे विभिन्न आस्थावाला बच्चा वा धर्मनिरपेक्ष पाठकक दृष्टिएँ प्रार्थनाक व्यापक मानवीय मूल्य—विद्या, करुणा, अहिंसा, सेवा—अलगसँ स्पष्ट करब उपयोगी होयत।
५.४ बालकक सामाजिक स्थिति
रेखाचित्रसभमे प्रधान पात्र प्रायः एकटा बालक अछि; परिवारमे पिता आ माता देखाइत छथि, आ गुरु तथा राष्ट्रक आदर्शसभक उल्लेख अछि। कन्याक अनुभव, दिव्याङ्ग बालक, भिन्न सामाजिक परिवेशक बच्चा वा सामूहिक खेलक दृश्य प्रमुखता नहि पबैत अछि। ई कमी इतिहासगत रचनाक निन्दा मात्र लेल नहि, समसामयिक बालपुस्तकक प्रतिनिधित्व-सम्बन्धी विमर्श उठेबाक लेल महत्त्वपूर्ण अछि।
६. मैथिली भाषा, ध्वनि आ अनुवाद-प्रविधिक समीक्षा
६.१ ‘सुबह सवेरे’ सँ ‘भोरे-भोर’
हिन्दी कृतिक प्रकाशित नाम ‘सुबह सवेरे’ अछि, मैथिलीमे ‘भोरे-भोर’। शीर्षकक ई रूप केवल शब्दार्थक विनिमय नहि; ‘भोर’क दुहराव मैथिली श्रवण-परम्परामे सहज लय आ आत्मीय समय-बोध पैदा करैत अछि। रचनाक भीतर पुनःपुनः ‘भोरे-सबेरे’क आगमन शीर्षकसँ सम्बद्ध होइत अछि। एहि आधारपर लक्ष्यभाषाक ध्वनि आ पाठकीय स्मरण लेल अनुवादकक चयन सार्थक कहल जा सकैत अछि। मूल शीर्षकक सम्पूर्ण अर्थ-छायाक तुलना करबाक लेल मूल हिन्दी पाठक प्रकाशकीय विवरण अपेक्षित अछि।
६.२ क्रियात्मक मैथिली आ बाल-संवाद
‘जागब सीखू’, ‘लागब सीखू’, ‘देखब’, ‘सुनब’, ‘प्रणाम’, ‘करी’, ‘रहय’ जकाँ रूप पाठमे गति पैदा करैत अछि। क्रियाक ई सघनता नेनाकेँ ठाढ़ अनुभव देइत अछि; रचना केवल वस्तुक नाम गनबैत नहि, किछु करबाक अथवा किछु देखबाक आग्रह करैत अछि। बच्चाक लेल पाठक सुनबाक उपयोगिता एहि क्रियात्मकतासँ बढ़ैत अछि। एकहि समयमे ‘सीखू’क दोहराव आग्रहमूलक स्वरकेँ प्रबल करैत अछि; एहिसँ काव्य आ अनुशासनक समीकरण स्पष्ट होइत अछि।
६.३ सहज बोली आ तत्सम शब्दक सह-अस्तित्व
‘बाबूजी’, ‘मातु-पिता’, ‘चन्दा मामा’, ‘गाछ-बिरिछ’, ‘चिड़ै’, ‘पानि’, ‘काज’, ‘भोरे-सबेरे’ जकाँ पद स्थानीय घर-आँगनक आत्मीयता देइत अछि। एकर संग ‘विशुद्ध’, ‘प्रणाम’, ‘कर्मयोग’, ‘अहिंसक’, ‘दयानिधान’, ‘पर-उपकारक’, ‘मातृभूमि’ जकाँ शब्द संस्कृतनिष्ठ नैतिक शब्दावली अनैत अछि। पहिल कविताक आरम्भिक पाँतिमे बोलीक सहजता अधिक अछि; प्रार्थनाक उत्तरार्द्धमे तत्सम आ आदर्श-पात्रक घनत्व बढ़ैत अछि। ई वितरण अर्थवान अछि: प्रकृति-आनन्दक भाषा दृश्यप्रधान, नैतिक वरदानक भाषा अवधारणाप्रधान बनि जाइत अछि।
६.४ मौखिकता, पुनरावृत्ति आ स्मरण
दूनू रचनाक प्रत्येक मुद्रित पृष्ठपर आठ-आठ पाँतिक समान दृश्य-विन्यास अछि। किन्तु एतेक आधारपर निश्चित शास्त्रीय छन्द अथवा सममात्रिक लयक दावा करब उचित नहि; आवाजमे पढ़बाक क्रम, उच्चारणक दीर्घता आ पाँतिक विरामक व्यवस्थित ध्वन्यात्मक परीक्षण अलग चाही। तथापि छोट पाँति, समानार्थक युग्म, ध्वनिसूचक शब्द आ ‘भोरे’क आवृत्ति स्मरणशक्तिक अनुकूलता देइत अछि। व्याख्यानक अपेक्षा सामूहिक पाठ वा गायनमे एकर उपयोगिता सम्भाव्य अछि, प्रत्यक्ष प्रयोगात्मक परीक्षणक परिणाम नहि।
६.५ स्थानिकीकरणक लाभ आ सीमा
मैथिली रूपमे घरक वस्तु, नेनालोकनिक सम्बोधन आ प्रकृतिक स्थानीय शब्दसँ रचना लक्ष्यभाषाक पाठकक कण्ठमे बसबाक संभावना बनबैत अछि। मुदा अनुवादक सफलता जाँचबाक दू अलग मानदण्ड अछि: (१) मैथिलीमे पाठक प्रवाह आ बालोपयोगिता, (२) हिन्दी मूलक अर्थ, लय आ छविक प्रत्यक्ष समानता। पहिल मानदण्डपर एहि पुस्तकक दृश्यसहित पाठक ठोस समीक्षा सम्भव अछि; दोसरपर पूरा हिन्दी मूल सँग द्विपाठ परीक्षण उपलब्ध नहि। ताहि लेल एहि समीक्षामे ‘सहज मैथिली’क प्रशंसा कएल गेल अछि, ‘एक-एक पाँतिक निष्ठापूर्ण अनुवाद’क अप्रमाणित प्रमाणपत्र नहि।
६.६ भाषा-संपादनक ठोस प्रश्न
पाठमे पाँति तोड़बाक ढंग, विरामचिह्न, संयुक्त पद आ उच्चारण-सूचक चिह्नक विविधता देखाइत अछि। मुद्रित रूपमे भेटल भिन्नताकेँ स्वतः अशुद्ध कहल उचित नहि, विशेष कऽ जखन बालबोली, क्षेत्रीय प्रयोग वा गेयता जुड़ल हो। ‘भोरे-भोर’क शीर्षक आ गीतमे ‘भोरे-सबेरे’क उपयोग दूटा भिन्न कार्य करैत अछि; तकर यन्त्रवत एकरूपीकरण काव्यलय घटा सकैत अछि। किछु स्थलपर धुँधलका वा छपाइके कारण अक्षर-पहिचान अनिश्चित अछि; से ठाम सुधारक दावा करबाक बदला मूल प्रति सँ मिलान आवश्यक अछि।
७. रेखाचित्र: अर्थक सह-निर्माण
काव्य-पृष्ठ ४–१६ मे लगभग प्रत्येक पृष्ठपर प्रधान दृश्यचित्र अछि। रेखाचित्र केवल शब्दक सजावट नहि, बालपाठककेँ स्थिति पहिचानबाक ‘दृश्य-वाक्य’ प्रदान करैत अछि। पहिल पृष्ठक घड़ी समयक बोध देइत अछि; पक्षीक चित्र सूनबाक आ देखबाक क्रियाकेँ मूर्त करैत अछि; चन्दा आ सूर्यक मानवीय मुख अनजान खगोलीय वस्तुकेँ परिचित रूप दैत अछि; सूर्यक समक्ष हाथ जोड़ने बालक अभ्यासकेँ दृश्य करैत अछि; प्रार्थनाक देवी-प्रतिमा श्रद्धाक सांस्कृतिक धरातल स्पष्ट करैत अछि; ध्वजा आ पोथी देश-सेवा आ अध्ययनक जोड़ी बनबैत अछि।
किछु चित्र कविता सँ अधिक स्पष्ट कथात्मक सूचना देइत अछि। उदाहरण लेल पृ. ७ क चित्रमे बाबूजी आ बच्चाक संग फूल–तितलीक सजग अवलोकन स्पष्ट अछि; पृ. १४ क चित्रमे बालकक हाथमे पुस्तक आ झंडा एक संग अछि, जखन कि पदमे मूल्यसभ विस्तृत अछि। एतय दृश्य नेनाक लेल विचारक प्रवेशद्वार बनैत अछि। मुदा सबै चित्रमे प्रायः एकहि प्रकारक बालक देखायब प्रतिनिधित्वक एक सीमा सेहो अछि।
चित्रकारक नाम एहिक देखल प्रकाशन-विवरणमे स्पष्ट रूपेँ निर्धारित नहि भऽ सकल; अतएव समीक्षामे कोनो चित्रक किसी विशिष्ट कलाकारक नामसँ श्रेय नहि देल गेल अछि। मूल रेखाचित्रसभकेँ कालक्रम वा कलाशैलीक एकटा विशिष्ट विद्यालयक संग जोड़बाक अनुमान सेहो नहि कएल गेल अछि।
८. अनुवाद-समीक्षा लेल बाहरी साक्ष्यक सीमित उपयोग
२००९ मे प्रकाशित डॉ. कौशलेन्द्र पाण्डेयक हिन्दी समीक्षा ‘सुबह सवेरे’क लगभग सोलह पृष्ठक बालोपयोगी पुस्तिका होयबाक, एकटा लम्बा प्रभाती गीत आ दोसर प्रार्थनाक होयबाक, तथा चित्रक सहायक भूमिकाक उल्लेख करैत अछि। ओहि समीक्षामे पक्षीक चहचहाहट, भोर, आकाश, उद्यान, मातृ-पितृभक्ति, एकलव्य, महावीर, बुद्ध, शिवाजी आ परोपकार जकाँ प्रसंग सेहो अएल अछि। एहि विवरणक विषय-क्रम मैथिली रूपमे प्रत्यक्ष देखल सामग्रीसँ मेल खाइत अछि। एतबे सँ दूनू पाठक प्रमुख विषयक निरन्तरता पुष्ट होइत अछि; शब्दशः समानता, पाँतिसंख्या वा अनुवाद-संशोधनक इतिहास नहि। [सन्दर्भ ४]
साहित्य कुञ्जक लेखक-परिचयमे डॉ. ए. कीर्तिवर्धनक प्रकाशित पोथीसभक बीच ‘सुबह सवेरे’ आ तकर मैथिली अनुवादक उल्लेख अछि। २०१९ क एक प्रकाशित साहित्यिक विवरणमे सेहो ‘सुबह सवेरे’ लेखकक पूर्वकृति रूपमे चिन्हित अछि। ई साक्ष्य रचनाकारक कृति-सूची पुष्ट करबाक लेल उपयोगी अछि; एकर आधारपर कोनो अप्राप्य पाँतिक उद्धरण गढ़ल नहि गेल अछि। [सन्दर्भ ५–६]
बाहरी समीक्षासँ एकटा रुचिकर पाठकीय भिन्नता देखाइत अछि: हिन्दी समीक्षकक झुकाव संस्कार, सुग्राह्यता आ चित्रक प्रशंसापर केन्द्रित अछि। वर्तमान मैथिली अध्ययन उपर्युक्त गुणकेँ स्वीकार करैतहुँ बालकक स्वतन्त्र स्वर, लिंग-प्रतिनिधित्व, सांस्कृतिक विविधता, अत्यधिक आदर्श-सूची आ वैज्ञानिक कथनक सीमाकेँ जाँचैत अछि। एहि तुलना सँ समालोचना रूपेँ प्रश्न बढ़ैत अछि; एतय कोनो दोसर समीक्षकक आशयक विकृतिकरण नहि कएल गेल अछि।
९. आलोचनात्मक मूल्यांकन: उपलब्धि, अन्तर्विरोध आ पाठकीय उपयोग
९.१ उपलब्धि
प्रथम उपलब्धि काव्यक स्पष्ट उद्देश्य अछि: नेनाकेँ भोरे उठबाक बहाने पर्यवेक्षण, स्वच्छता, पारिवारिक आदर आ सामाजिक दयाक विचार धरि लऽ जाएब। दोसर उपलब्धि दृश्य–श्रव्य संगठन: भोरक प्रकाश, चिड़ैक गीत, घंटीक आवाज, बगीचाक चहल-पहल आ चित्र अपन-अपन माध्यमसँ रचनाकेँ स्मरणीय बनबैत अछि। तेसर उपलब्धि मैथिली लक्ष्यभाषाक सहज उपलब्धता: लोकबोलीक पद आ आवृत्तिमूलक लय आम पाठक लेल प्रत्यक्ष प्रवेशद्वार खोलैत अछि। चारिम उपलब्धि दू पद्यक रचनात्मक सम्बन्ध अछि—दिनचर्याक अभ्याससँ सेवा-मूल्यक आकांक्षा धरि।
९.२ सीमासभ
पहिल सीमा आदेशप्रधान वाणी अछि। बहुत पाँति बच्चाकेँ की करयबाक चाही तकर कथन करैत अछि, ओकर अनुभवक अनपेक्षित खोज लेल कम ठाम छोड़ैत अछि। दोसर सीमा आदर्श नामक घनता अछि; एकलव्य, दुर्गा, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, राणा, शिवाजी आदि क नाम अल्प पाँतिमे अएलासँ छोट पाठक लेल अर्थ खंड-खंड भऽ सकैत अछि। तेसर सीमा चयनित आदर्शक सांस्कृतिक दायरा अछि: मूल्य मानवतावादी होइतहुँ चित्रात्मक आ धार्मिक सन्दर्भ अपेक्षाकृत एक परम्परामे केन्द्रित अछि। चारिम सीमा किछु कल्याणकारी आश्वासनक अतिशयोक्ति अछि, जाहिकेँ तथ्यात्मक स्वास्थ्य-सिद्धान्त नहि बुझबाक चाही।
९.३ बाल-कक्षामे आलोचनात्मक पाठनक ठोस सम्भावना
पृ. ४–११ क चित्रक संग क्रमसँ ‘हम भोरमे की देखैत छी?’ प्रश्न पूछल जा सकैत अछि; पृ. ५ क चिड़ै-विषयक अंशसँ जीवक प्रति दया आ देखरेख; पृ. ८–९ सँ चान-सूरजक दृश्यात्मक भिन्नता; पृ. १०–११ सँ देह, अनुशासन आ स्वास्थ्यक विषयमे तथ्य–कविता भिन्न करबाक अभ्यास होयत। ‘प्रार्थना’मे पृ. १२ क परोपकारक भाव आ पृ. १५ क अहिंसा-बहादुरीक संयुक्त उल्लेख सँ बालककेँ ‘साहस भने हिंसा?’ जकाँ प्रश्न पर बातचीतक अवसर भेटि सकैत अछि। ई सभ पाठ-सूत्र समीक्षा द्वारा प्रस्तावित शैक्षिक प्रयोग छथि, पोथीमे छपल गतिविधि नहि।
विशेषतः स्तुति वा समर्पणात्मक पदक पाठनमे विद्यालयक विविध आस्था आ पारिवारिक पृष्ठभूमिक सम्मान आवश्यक अछि। धार्मिक प्रतीकसभकेँ सांस्कृतिक पाठक एक हिस्सा बना कऽ पढ़ल जा सकैत अछि, जखन कि विद्या, समान सम्मान, दया आ सेवा जेहन व्यापक गुणपर सहमति विकसित कएल जा सकैत अछि। एहिसँ मूल कविताक ऐतिहासिक स्वर दबल नहि, आधुनिक पाठकक अनुभव विस्तृत होइत अछि।
एहि अध्ययनक निष्कर्ष तीन स्तर पर विभक्त अछि। प्रत्यक्ष पाठसँ पुष्ट तथ्य: २०१४ क प्रकाशित मैथिली अनुवाद, दू कविता, मुद्रित पृ. ४–१६ क काव्य-विन्यास, १३ पृष्ठक आठ-आठ पाँति, आरम्भिक भाषिक भूमिका, चित्रसभ आ पाँति-विश्लेषण। बाहरी स्रोतसँ पुष्ट तथ्य: हिन्दी मूल ‘सुबह सवेरे’क पुस्तक-पहिचान आ २००९ क समीक्षामे दू पद्यक विषयक समानता। विश्लेषणात्मक निष्कर्ष: आदेश–आनन्दक तनाव, दृश्य–काव्यक सहकार्य, नैतिक नामावलीक घनत्व, बहुलताक प्रश्न आ स्थानीय मैथिली पदक प्रभाव।
काव्यानुवादक सम्पूर्ण भाषिक निष्ठाक अगिला परीक्षण लेल हिन्दी मूल ‘सुबह सवेरे’क प्रमाणित प्रथम संस्करणक मुद्रित पाँतिसँ मैथिली पाँतिक एक-एक जोड़ मिलाब आवश्यक होयत। ताहि तुलना मे शब्दार्थ, लय, पदानुक्रम, छवि, सांस्कृतिक बिम्ब, आदर्श-नाम, चित्रक समरूपता आ नामान्तरक परीक्षण समाविष्ट रहत। हिन्दी मूलक पाठ बिनु कोनो मैथिली पाँतिक ‘हिन्दीमेसँ हटि गेल’ अथवा ‘मूलसँ श्रेष्ठ’ होयबाक घोषणा विद्वत्-सावधानीक प्रतिकूल होयत।
११. समाहार: ‘भोरे-भोर’क साहित्यिक स्थान
‘भोरे-भोर’क केन्द्र भोरक अन्हार हटबाक मात्र दृश्य नहि, बालकक मन आ व्यवहारमे प्रकाशक रूपक बनायब अछि। पहिल कवितामे प्रकाश बच्चाकेँ घड़ीसँ आकाश धरि, आकाशसँ पक्षीक गीत धरि, गीतसँ पारिवारिक स्नेह धरि लऽ जाइत अछि। दोसर कवितामे ओही बालककेँ विद्या, दया, निर्भीकता आ सेवाक आकांक्षी व्यक्ति बनबाक रूपरेखा देल गेल अछि। काव्यात्मक सुकुमारता बगीचाक दृश्य आ जीव-जगतक संगतिक ठाम सभसँ अधिक मुखर अछि; उपदेशात्मक आग्रह आदर्श-गणनाक ठाम सभसँ अधिक घना होइत अछि। दुनू ध्रुवकेँ एकहि संग देखनाइ एहि पुस्तकक वस्तुनिष्ठ समीक्षाक आवश्यक शर्त थिक।
डॉ. योगानन्द झाक मैथिली रूपान्तर एहिना एकटा हिन्दी बालकविता-पुस्तिकाकेँ मैथिली बालपाठकक लेल उपलब्ध करबैत अछि; ई भाषिक उपलब्धता अपनहि मे महत्त्वपूर्ण अछि। मुदा अनुवादक प्रशंसा करैत काल मूल हिन्दी पाठक अनुपस्थितिक तथ्य नहि नुकायल जा सकैत। जतेक पाठ प्रत्यक्ष देखल गेल अछि, ओहि आधार पर कहब उचित जे ‘भोरे-भोर’ संस्कारप्रधान, चित्रसमर्थित आ गेयताक सम्भावनासँ युक्त दू-रचनाक बालकविता-पुस्तिका अछि, जाहिमे अपन समयक आचार-विचारक संग समकालीन बालकेन्द्रित आलोचनाक अनेक प्रश्न सेहो निहित छथि।
अध्याय 13 / २०२३
चतुर्दश सूत्र
डॉ. योगानन्द झाक कृतिक आलोचनात्मक विवेचन
संग्रहक विन्यास आ एकर आलोचनात्मक अर्थ
ग्रन्थ तीन विभागमे व्यवस्थित अछि—‘काव्य विवेचन’मे छह आलेख, ‘गद्य विश्लेषण’मे तीन आलेख, आ ‘अवदान-मूल्याङ्कन’मे पाँच आलेख। पहिल विभागमे गंगावन्दना, कथाकाव्य, भक्ति-काव्य, गीत, ऋतुचित्र आ रामकथाक आधुनिक पुनर्व्याख्या मुख्य अछि। दोसर विभागमे कथाकारक यात्रावृत्तान्त, निबन्ध-साहित्य आ समाजदर्शी उपन्यासक परीक्षण अछि। तेसर विभाग व्यक्तिगत कृति सँ आगू बढ़ि पत्रकारिता, भाषाक वैज्ञानिक संरचना, साहित्येतिहास, जीवनीपरक समालोचना आ लोकगाथा-अनुसन्धानक संस्थागत महत्त्वकेँ परखैत अछि।
एहि क्रमक महत्त्व अछि। पहिल खण्ड पाठककेँ काव्यक भाव, बिम्ब, छन्द आ समाजचेतनासँ परिचित करबैत अछि; दोसर खण्ड कथ्य, शिल्प, परिवेश आ सामाजिक परिवर्तनक प्रश्न उठबैत अछि; तेसर खण्ड मैथिली साहित्यक आधुनिक ज्ञान-व्यवस्थाक आधारभूत साधन—दैनिक पत्र, व्याकरण, इतिहास, पुरान पाठक सम्पादन आ मौखिक परम्पराक संरक्षण—दिस दृष्टि घुमबैत अछि। एना पोथीक ‘सूत्र’ केवल चौदह अलग-अलग लेखकक नाम नहि, अपितु मैथिली साहित्यक स्वरूप आ अस्तित्वक चौदह प्रवेशद्वार बनैत अछि।
प्रस्तावनाक आलोचनादर्शन
लेखक प्रस्तावनामे आलोचनाकेँ विवेचन, विश्लेषण आ मूल्याङ्कनक समन्वित कार्य मानैत छथि। हुनक दृष्टिमे समालोचक पाठक आ रचनाकारक बीच सेतु छथि; ओकरा कृतिक काल, रचनाप्रक्रिया, स्रष्टाक व्यक्तित्व, समाजशास्त्र, भाषाशास्त्र, सौन्दर्यशास्त्र, मनोविज्ञान आ नृविज्ञान आदिक आवश्यकता अनुसार विचार करबाक चाही। अन्धप्रशंसा आ छिद्रान्वेषण दुनूकेँ ओ अनुपयोगी मानैत छथि। ई प्रस्तावनात्मक प्रतिज्ञा पाठककेँ न्यायोचित आलोचनाक कसौटी उपलब्ध करबैत अछि, मुदा वास्तविक कसौटी ई थिक जे बादक चौदहो आलेख एहि सन्तुलनकेँ कतए धरि निर्वाह करैत अछि।
ग्रन्थकार अनेक आलेखमे कृतिक मूल कथा, कविताक पाँती, लेखकक जीवन-प्रसंग आ पूर्ववर्ती शोधक उल्लेख एकठाम आनैत छथि। जे आलेख मूलपाठक निकट रहैत अछि, ओतए व्याख्या अधिक विश्वसनीय बनैत अछि। जतए पूर्वलेखकक विचार, इतिहासक सम्भावना आ समीक्षकक अनुमोदन एकसंग अबैत अछि, ओतए प्रमाणक स्तर साफ-साफ अलग करबाक आवश्यकता प्रबल होइत अछि। ई अध्ययन ओही पद्धतिगत प्रश्नकेँ प्रत्येक विषयक अनुसार परखैत अछि।
०१ | गंगा वन्दनाक परम्परा आ मधुपजी
मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: १७–२६
नदीसँ सांस्कृतिक प्रतीक धरि
एहि आलेखक पहिल विशेषता एकर विस्तृत ऐतिहासिक आ सांस्कृतिक भूमिका अछि। लेखक गंगाकेँ हिमालयसँ बंगालक खाड़ी धरि प्रवाहित नदीक रूपमे पहिचानैत छथि, मुदा तुरन्त देखबैत छथि जे भारतीय आ मिथिलाक मानसक लेल ई केवल भौगोलिक इकाइ नहि। गंगा शुचिता, श्रद्धा, तीर्थ, मृत्युसंस्कार आ सामूहिक स्मृतिक आधार बनि गेल छथि। ‘गंगा हिमवतोर्मध्ये’ सन प्रयोग, गंगाक दक्षिणी सीमासँ मिथिलाक सम्बन्ध, गंगा-घाटपर कार्तिकक सेवा आ मैथिली लोकगीतिक उल्लेखसँ ओ सांस्कृतिक भूगोलक रूपरेखा बनबैत छथि (मूल ग्रन्थ, पृ. १७–१९)।
एकर बाद लेखक प्रकृतिपूजाक परम्परा, नदीक मातृत्व-परिकल्पना आ भारतीय वाङ्मयमे गंगाक मानवीकरणक आधार खोजैत छथि। नदीक उपयोगितासँ भक्तिक भावनात्मक रूपमे संक्रमण देखयब एहि आलेखक आन्तरिक तर्क अछि। तथापि आदिम समाजसँ आधुनिक श्रद्धा धरि अविच्छिन्न विकासक परिकल्पना अत्यन्त व्यापक अछि; एकरा सांस्कृतिक व्याख्या कहब अधिक उचित, सर्वकालिक ऐतिहासिक सिद्धान्त नहि। गंगाक धार्मिक प्रतिष्ठा अनेक समाजक लेल सत्य मान्यता अछि, मुदा ताहिसँ सम्बद्ध चमत्कार वा मोक्ष सम्बन्धी विश्वासकेँ इतिहाससिद्ध तथ्य मानि लेब शोधसंगत नहि होयत।
साहित्यिक परम्पराक क्रमिक परीक्षण
लेखक वाल्मीकि, व्यास, कालिदास, शंकराचार्य, पण्डितराज जगन्नाथ आदि संस्कृत परम्पराक उल्लेख करैत गंगावन्दनाक विस्तृत वंशावली रचैत छथि। मैथिली साहित्यमे लालदास, सीताराम झा, सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ आ काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ पर केन्द्रित होइत ओ परम्परा आ नवोन्मेषक अन्तर देखबैत छथि। सीताराम झाक ‘अम्बचरित’ आ सुमनक ‘गंगातरंगिणी’क उल्लेखक बाद मधुपजीक ‘गंगातरंगावली’मे रूपक, व्यञ्जना, सांगरूपक आ प्रौढ़ कल्पनाक विश्लेषण प्रस्तुत कएल गेल अछि (पृ. २०–२६)।
मधुपक पदक प्रसंगमे लेखक गंगाकेँ तस्कर, कृषक, नेना, सागरक गृहिणी आदिसँ जोड़ल काव्यकल्पनाक चर्चा करैत छथि। एहिठाम आलोचनाक केन्द्र स्पष्ट भऽ जाइत अछि—गंगाक महिमा मात्र नहि, गंगाक महिमा कहलाक काव्य-प्रविधि। उपमा, रूपक, परम्परित बिम्ब आ शास्त्रीय शब्दभण्डारक सहायता सँ साधारण विषयकेँ असाधारण काव्यानुभव बनाओल जाइत अछि। उदाहरणक पृष्ठ-सन्दर्भ दऽ शब्दचित्रक मूल्याङ्कन करब लेखकक निकटपाठीय शक्ति थिक।
इतिहासक प्रसंग आ प्रमाणक सावधानी
आलेखमे गंगाक प्रवाह सम्बन्धी औपनिवेशिक कालक एक विवादक उल्लेख सेहो अछि, जाहिमे तत्कालीन दरभंगा महाराजक प्रतिरोधक कथा ‘मिथिला मिहिर’क ८ मई १९१५ अङ्क आ योगमाया झाक ‘मैथिली साहित्यमे गंगा’क सन्दर्भसँ प्रस्तुत कएल गेल अछि (पृ. २०)। एहि सन्दर्भक उपयोगसँ गंगाक प्रति मिथिलाक भावनाकेँ राजनीतिक-सांस्कृतिक पक्ष भेटैत अछि। तथापि इतिहास-विवेचनक लेल मूल समाचार, शासकीय अभिलेख आ नदी-परियोजनाक दस्तावेजक अलग परीक्षण जरूरी अछि। प्रस्तुत ग्रन्थमे वर्णित प्रतिरोधकेँ शोधक एक सूत्र मानल जा सकैत अछि, स्वतन्त्र रूपेँ प्रमाणित सम्पूर्ण इतिहास नहि।
पर्यावरणीय प्रश्नसँ आलेखक नव अर्थ
अन्तमे लेखक आधुनिक गंगा-प्रदूषण, बान्ह-पुलसँ प्रवाहमे परिवर्तन आ सामाजिक-राजनीतिक दूषणक समानान्तर चित्र प्रस्तुत करैत नव गंगावन्दनाक आवश्यकता पूछैत छथि। एहि आत्मप्रश्नक कारणेँ आलेख ऐतिहासिक सर्वेक्षण मात्र नहि रहि वर्तमानक रचनात्मक चुनौती बनि जाइत अछि। एहि ठाम गंगाक शुचिताक रूपक सामाजिक जीवनक नैतिक प्रश्नक संग जुड़ैत अछि। ई विचार प्रभावशाली अछि, यद्यपि जल-प्रदूषणक वैज्ञानिक स्थिति आ नैतिक ‘प्रदूषण’ अलग-अलग प्रकारक कथन छथि; दुनूकेँ काव्योपमा धरि सीमित राखब जरूरी अछि।
समग्रतामे पहिल आलेखक उपलब्धि ई अछि जे लेखक मधुपक काव्यकेँ एकटा जीवन्त, दीर्घकालिक गंगाभक्ति-परम्परामे स्थापित करैत छथि। सम्भावित सीमा ई जे गंगाक सांस्कृतिक गौरवकेँ अनेक ठाम मूलाधार मानि लेल गेल अछि; भिन्न धार्मिक, सामाजिक वा पर्यावरणीय दृष्टिक अनुभव अपेक्षाकृत कम खुलैत अछि। तथापि अन्तिम पर्यावरणीय प्रश्न सम्पूर्ण आलेखकेँ विचारोत्तेजक समकालीनता प्रदान करैत अछि।
०२ | हरिमोहनझाक कथाकाव्य
मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: २७–३२
व्यंग्यक पद्यरूप आ कथात्मक अर्थ
हरिमोहन झाकेँ अधिकतर पाठक हास्य-व्यंग्यपूर्ण गद्यक लेखकक रूपमे चिन्हैत छथि। एहि आलेखमे योगानन्द झा हुनक कविताक कथात्मक पक्षकेँ केन्द्रमे आनैत छथि। ग्रन्थकार सात गोट कथाकाव्यक चर्चा कयने छथि। एहि सात रचनाक अपन-अपन सामाजिक लक्ष्य अछि, मुदा सभमे एक साझा प्रवृत्ति देखल जाइत अछि—रूढ़ि, पाखण्ड आ प्रतिष्ठाक नामपर चलैत असमानताकेँ हास्यक मार्फतेँ उजागर करब (पृ. २७–३२)।
लेखकक पहिल विस्तृत उदाहरण ‘ढाला झा’ अछि। बूढ़ पञ्जीबद्ध वरक जयवार-सासुर यात्रा, वस्त्र-वेष, भाषिक दर्प, भोजनपर रोष आ विदाइक टाकाक माँगक कथासँ समाजक अनमेल विवाह, कन्याक असहायता आ विवाहक आर्थिक दुरुपयोग सोझाँ अबैत अछि। एहि कवितामे हास्यक उत्पत्ति केवल ढाला झाक विचित्र व्यवहारसँ नहि, ओकरा सम्मान दऽ रहल सामाजिक व्यवस्थाक अन्तर्विरोधसँ होइत अछि। लेखकक समीक्षामे बूढ़ वरक व्यंग्यचित्रक पाछाँ कन्यापक्षक विवशता देखाबयब विशेष अर्थपूर्ण अछि।
रूपक-भिन्नतामे एक सामाजिक लक्ष्य
‘टी-पार्टी’मे शिक्षित समुदायक विदेशी फैशनक अन्धअनुकरणपर, ‘बुचकुन बाबा’मे नारीक बदलैत स्थानपर, ‘निरसन मामा’मे खाद्य-अखाद्य आ जातिभेदपर, ‘सलगमक खण्ड’मे अन्धविश्वासपर आ ‘घूटरकका’मे शिक्षित पुतहुक प्रति पुरुषक मानसिक प्रतिरोधपर लेखक विश्लेषण करैत छथि। ‘बुचकुन बाबाक स्वप्न’मे परिवार-नियोजनक प्रश्न सेहो उठैत अछि। एहि उदाहरणसँ स्पष्ट होइत अछि जे हरिमोहन झाक हास्य सुधारवादी नीतिसँ कटल नहि अछि; कथानक सामाजिक शिक्षाक साधन बनैत अछि।
‘निरसन मामा’क कथामे धार्मिक शुचिताक कठोर भाषण देनिहार व्यक्ति स्वयं नागरिक शिष्टाचारक नियम भंग करैत छथि; ‘सलगमक खण्ड’मे काल्पनिक अपवित्रताक भय एकटा सामान्य भोजनकेँ सामूहिक संकट बना दैत अछि। एहन प्रसंग सभमे व्यंग्यक तत्त्व पात्रक कहनी आ करनीक बीच दूरीसँ उपजैत अछि। लेखक एहि तत्त्वकेँ विवृत करैत मैथिली हास्यकेँ सरस मनोरञ्जनक बजाय सामाजिक आलोचनाक बौद्धिक विधान मानबाक आधार दैत छथि।
नारी-प्रश्नक सूक्ष्मतर अर्थ
‘बुचकुन बाबा’ ओ ‘घूटरकका’क पाठसँ नारी-शिक्षा, पेशागत स्वाधीनता, दहेजविहीन विवाह आ परिवारमे बदलैत शक्ति-सन्तुलनक प्रश्न उभरैत अछि। लेखक परम्परावादी पुरुषपात्रक प्रतिक्रिया परिहासपूर्वक प्रस्तुत करैत छथि। विश्लेषणक अधिक गहन स्तरपर ई प्रश्न सेहो उठैत अछि जे हास्यक लक्ष्य शिक्षित स्त्री नहि, ओकर स्वायत्ततासँ डेराइत सत्ता-मानसिकता अछि। एहि भेदकेँ स्पष्ट करब आधुनिक नारीवादी पाठक लेल आवश्यक होयत। ग्रन्थकारक आधार एहि अर्थकेँ सम्भव बनबैत अछि, मुदा ओहि दिशामे विस्तारक अवसर शेष रहि जाइत अछि।
आलोचनाक सामर्थ्य आ शिल्पगत सीमा
एहि आलेखक उत्कृष्ट पक्ष कथासारक साफ प्रस्तुति अछि। उदाहरणक बिना ‘व्यंग्यकवि’क उपाधि देनाइ सहज छल; लेखक एना नहि कऽ कथाप्रसंग, पात्रक भाषा आ सामाजिक परिवेशक सम्बन्ध स्थापित करैत छथि। मुदा सातो कथाकाव्यक मात्राभार, छन्द-विन्यास, संवादक नाटकीयता, वाचकक स्थिति आ हास्यसँ करुणा धरि भाव-परिवर्तनक अधिक तुलनात्मक विश्लेषण कएल जाइत तँ काव्यरूपक विशिष्टता आ स्पष्ट होइत।
समग्र निष्कर्ष ई नहि जे हरिमोहन झा सामाजिक त्रुटि सभक मात्र उपहास करैत छथि। हुनक कथाकाव्य रूढ़िसँ उत्पन्न मनुष्यता-विरोधी असमानताकेँ पहिचानयब सिखबैत अछि। एहि आलेखमे ग्रन्थकार हुनक प्रायः गद्यकेन्द्रित परिचयकेँ पद्यक सामाजिक इतिहाससँ जोड़बाक महत्त्वपूर्ण प्रयास करैत छथि।
०३ | साधक कवि: उपेन्द्रठाकुर ‘मोहन’
मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: ३३–४६
कविक जीवन आ उपलब्ध काव्यसामग्री
एहि दीर्घ आलेखमे उपेन्द्र ठाकुर ‘मोहन’क रचनाक समग्र धरातल देखाओल गेल अछि। लेखक हुनक चतरिया गाम, संस्कृत शिक्षाक पृष्ठभूमि, ‘आर्यावर्त’ आ ‘मिथिला मिहिर’सँ सम्बद्ध सम्पादकीय-कार्यक उल्लेखक संग तीन कविता-संग्रह—‘फुलडाली’ (१९४२), ‘बाजि उठल मुरली’ (१९७७) आ ‘इतिश्री’ (१९८२)—क विवरण दैत छथि। ‘बाजि उठल मुरली’ लेल १९७८ क साहित्य अकादेमी सम्मान प्राप्त होयबाक विवरण सेहो ग्रन्थमे अछि (पृ. ३३–३४)। एहि ऐतिहासिक सूचनाक उपयोग कृतिक कालक्रम बुझबाक लेल उपयुक्त अछि।
शृङ्गार, क्रान्ति आ गीतक दोसर अर्थ
‘फुलडाली’क ‘शृङ्गारकुसुम’ आ ‘क्रान्तिकुसुम’ नामक दू खण्डक उल्लेख कऽ लेखक सर्जनाक दू भावभूमि पहिचानैत छथि। शृङ्गारक आवेग आ क्रान्तिक उद्बोधन परस्पर विरोधी नहि; दुनूमे तीव्र भावनात्मक ऊर्जा अछि। मोहनक गीतमे देशोद्धार, नवजागरण, युवा-कर्तव्य आ लोककल्याणक स्वर भेटैत अछि। लेखक कविक ‘नवगछुली’ प्रतीकक चर्चा करैत नवनिर्माणकेँ प्रकृतिक जीवनशक्तिसँ जोड़ैत छथि। एहि पाठमे संगीतक लय आ सामाजिक उद्घोष एक-दोसराकेँ समर्थित करैत अछि।
मोहनजीक संस्कृताभ्यासक प्रभाव छन्द, रस, वाक्ययोजना आ परम्परित प्रतीकमे अछि; ताहि सँ ई निष्कर्ष नहि निकालल जा सकैत अछि जे हुनक कविता वर्तमानसँ विरत अछि। सामाजिक पतन, राष्ट्रक संकट, मनुष्यक नैतिक जिम्मेवारी, दीन-दुखियाक पीड़ा आ आधुनिकीकरणक विसंगति सभ पर कविक प्रतिक्रिया आलेखमे विवेचित अछि। एहि दृष्टिसँ कवि ‘साधक’ छथि—केवल आध्यात्मिक तपस्वी नहि, शब्दक अनुशासनसँ जीवनमूल्य खोजयवला रचनाकार।
छन्दनिष्ठता आ युगीन परिवर्तन
ग्रन्थकार ई तथ्य रेखाङ्कित करैत छथि जे कवि मुख्यतः गेयधर्मी रचना करैत रहलाह। मात्रावृत्त, वर्णवृत्त, यति, अन्त्यानुप्रास आ पाठ-स्वरक प्रति सजगता हुनक रचनाक स्थायी विशेषता अछि। युगक प्रभावेँ किछु छन्दमुक्त रचनाक उल्लेख सेहो अछि। एहिठाम एक मौलिक आलोचनात्मक प्रश्न उठैत अछि—नवीनता की केवल छन्द-त्यागसँ अबैत अछि? आलेखक आधारपर उत्तर ‘नहि’ अछि। काव्यक भाषा, प्रतीक आ सामाजिक प्रश्नमे नवता रहि सकैत अछि, भले ओकर छन्द परम्परागत हो।
काव्यव्यक्तित्वक मूल्याङ्कन
लेखक मोहनक कविताक पाठसँ शास्त्रीय संस्कार आ सुधारवादी चेतनाक साहचर्य देखबैत छथि। सामाजिक रूढ़ि, पाखण्ड आ विसंगतिक आलोचना, युवाक आह्वान आ आशामूलक वक्तव्य सभ एहि समीक्षाक महत्त्वपूर्ण पाठसाक्ष्य छथि। तखनहुँ काव्यक स्तरीयता मापबाक लेल गीतक संगीतात्मक प्रस्तुति, ध्वनि-संयोजना आ अलग-अलग कालक कवितामे शब्दविन्यासक परिवर्तनक तुलनात्मक छानबीन आर आवश्यक छल।
एहि आलेखक उपलब्धि ई अछि जे मोहनजीकेँ पुरस्कार-प्राप्त कविक सामान्य परिचय धरि सीमित नहि राखि तीन संग्रहक रचनात्मक विकासमे देखल गेल अछि। एकर अन्तर्निहित आलोचनात्मक शिक्षा ई अछि जे परम्परागत शिल्पकेँ स्वतः रूढ़िवादी आ नव छन्दकेँ स्वतः प्रगतिशील मानि लेलासँ कविता बुझल नहि जा सकैत अछि।
०४ | स्नेहलताक मिथिला–मैथिली प्रेम
मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: ४७–५३
भक्ति आ भू-सांस्कृतिक आत्मीयता
‘स्नेहलताक मिथिला–मैथिली प्रेम’ केवल भक्ति-पदक रसग्रहण नहि, मिथिलाक सांस्कृतिक भूगोलकेँ काव्यक केन्द्र बनाबयवला आलेख अछि। लेखक स्नेहलताकेँ रामभक्ति आ मधुरोपासनाक परम्परामे राखि हुनक ‘वैदेही विवाह संकीर्तन’, ‘विनय पदावली’, ‘स्नेह शतक’, ‘स्नेह वाटिका’, ‘झूला संकीर्तन’, ‘महेशवाणी संग्रह’, ‘चेतावनी संकीर्तन’ आ ‘सीतावतरण’ सन कृतिक चर्चा करैत छथि (पृ. ४७–४९)। एहिसँ लेखकक रचनात्मक विस्तार आ काव्यक धार्मिक-सामाजिक व्यवहार दुनूक परिचय भेटैत अछि।
मैथिली पदावलीमे मिथिलाक आदर्शीकरण
स्नेहलताक पदमे मिथिला जनक-जानकीक भूमि छथि। कविक दृष्टिमे एहि प्रदेशक माटि, लोकव्यवहार, ऋतु, भाषा, विवाहक स्मृति आ आत्मीय सम्बन्ध सभ पुण्यभूमिक छवि निर्मित करैत अछि। लेखक पदक उदाहरण दऽ देखबैत छथि जे मिथिलाक गौरवक गानमे केवल स्थलनाम नहि, सांस्कृतिक अनुभूति आ भाषिक निकटता उपस्थित अछि। मातृभूमिप्रेमक एहि रूपमे धार्मिक पदावली क्षेत्रीय अभिज्ञानक भाषा बनि जाइत अछि।
‘साग-पात खोंटि खोंटि दिवस गमेबइ’ सन भावयुक्त पाँतीक चर्चा विशेष अर्थवान अछि। एहिमे दैन्यक बोध रहितो जन्मभूमिक परित्याग नहि करबाक आग्रह अछि। ई सामाजिक यथार्थ आ भक्तिक आदर्शक द्वन्द्व अछि। कवि मिथिलाकेँ सर्वथा सम्पन्न बतबैत नहि छथि; ओ अभाव बीच सेहो अपन सांस्कृतिक सम्बन्ध नहि तोड़य चाहैत छथि। एहि बिन्दुपर आस्तिक आ भावनात्मक काव्य एकटा वास्तविक सामाजिक प्रश्नकेँ छुबैत अछि।
भाषा-बोध आ अन्य भाषिक प्रभाव
लेखक देखबैत छथि जे स्नेहलताक प्रेरणास्रोतमे रामभक्तिक हिन्दी परम्परा, तुलसीक काव्य आ मधुरोपासनाक विभिन्न पदावली रहितो रचनाक मूल अभिव्यक्ति मैथिलीमे अछि। स्रोतक स्वीकार आ स्वभाषाक सृजनशील रूपान्तरण बीचक ई सम्बन्ध अनुवर्तन मात्र नहि, सांस्कृतिक पुनर्रचना थिक। मैथिलीक मधुरता विषयक पदकेँ लेखक क्षेत्रीय स्वाभिमानक प्रमाण रूपमे ग्रहण करैत छथि। एहिठाम भाषा-चेतना धार्मिक श्रद्धासँ अलग नहि होइत, बल्कि ओकर अन्तरतम भाग बनि जाइत अछि।
आलोचनात्मक बहसक अवकाश
आलेखक मुख्य स्वर अनुमोदनात्मक अछि। स्नेहलताक भक्ति, मातृभाषाप्रेम आ मिथिलाक आदर्श-प्रतिमा पर लेखकक रुचि स्पष्ट अछि। मुदा मधुरोपासनाक शास्त्रीय आधार, तुलसीपरम्परासँ पदक अन्तर्पाठीय समानता, नारीपात्रक स्वर आ वास्तविक सामाजिक वर्गविन्यासक अन्तर पर विस्तारसँ बहस कएल जा सकैत छल। मिथिलाक सांस्कृतिक उत्कर्षक पद सभकेँ क्षेत्रीय आदर्शक काव्यात्मक रचना रूपमे पढ़ब उचित अछि; ओहि चित्रकेँ प्रत्येक कालक सामाजिक वस्तुस्थिति न मानब।
एहि सीमा रहितो आलेख ई स्थापित करैत अछि जे भक्ति-कविक ‘मिथिला प्रेम’क अध्ययनमे भाषा मात्र माध्यम नहि, विषय सेहो अछि। कविक मातृभाषाप्रति प्रेम आ सीताभक्ति एक-दोसराकेँ प्रतिष्ठित करैत अछि।
०५ | गीतकार प्रदीपक ‘स्वयंप्रभा’
मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: ५४–६२
रामकथाक अल्पपरिचित प्रसंगक चयन
एहि आलेखमे प्रभुनारायण झा ‘प्रदीप’क ‘स्वयंप्रभा’केँ मैथिली रामकाव्य आ पद्यकथा-विधाक विकासक सन्दर्भमे राखल गेल अछि। लेखक पहिने मैथिली रामकथाक पूर्वपरम्परा—ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, चन्दा झा, लालदास आ विभिन्न लोकगीत—क चर्चा करैत छथि। एहि इतिहासक उद्देश्य ई देखायब अछि जे रामकथा एकहि स्थिर कृति नहि, काल-कालपर नव अर्थ प्राप्त करयवला सामूहिक सांस्कृतिक उपजीव्य छथि (पृ. ५४–५७)।
स्वयंप्रभा रामकथाक ओ पात्र छथि जिनकर प्रसंग ‘अध्यात्म रामायण’क किष्किन्धाकाण्डसँ सम्बद्ध बताओल गेल अछि। सीताक खोजमे निकसल वानरदल, अन्हार गुफा, पियास, योगिनी स्वयंप्रभासँ भेंट आ ओकरा सँ प्राप्त सहायता मूल कथाक आधार अछि। प्रदीप एहि कथाक ग्रहण करैत छथि, मुदा लेखकक विश्लेषण अनुसार ओकर अन्तिम रचनात्मक उद्देश्य केवल पौराणिक कथा दोहरायब नहि अछि।
पौराणिक स्रोतमाथि आधुनिक सामाजिक प्रश्न
कथाक अभिनव मोड़ ओतए अबैत अछि जतए स्वयंप्रभाकेँ आधुनिक मिथिलाक नारी-दुर्दशा, दहेजक दानव आ वैवाहिक प्रताड़नाक विरुद्ध उज्ज्वल शक्तिक रूपमे सक्रिय बनबाक आह्वान कएल जाइत अछि। एना पौराणिक योगिनी सामाजिक प्रतिरोधक प्रतीक बनि जाइत छथि। रामकथाक पारम्परिक मर्यादा आ समकालीन स्त्री-पीड़ाक प्रश्नक ई संगति एहि कृतिक प्रमुख रचनात्मक युक्ति अछि। लेखक ई परिवर्तन देखाबय लेल मूल आख्यान आ कविक कल्पनात्मक विस्तारक तुलनात्मक विवेचन करैत छथि (पृ. ५८–६२)।
मौलिकता पर विचार करैत ई भेद जरूरी अछि जे आधारकथा पुरान होइतहुँ ओकर आधुनिक प्रसंगक विनियोग कविक विशिष्ट रचना-विधि भऽ सकैत अछि। एहि दृष्टिसँ ‘स्वयंप्रभा’ अनुकरण नहि, पुनर्पाठक उदाहरण अछि। कृति सामाजिक सुधार लेल धार्मिक प्रतिष्ठाक प्रतीक अपनबैत अछि; मुदा धार्मिक अधिकारक उपयोग मानवीय समानताक पक्षमे कतेक प्रभावी होइत अछि, तकर मूल्याङ्कन पात्रक वास्तविक सक्रियतासँ करबाक चाही।
भाषा, रस आ छन्दक काज
ग्रन्थकार एहि पद्यकथाक भाषा सरल, बोधगम्य आ प्रसादगुणयुक्त मानैत छथि। तत्समक संग तद्भव-देशज शब्दक प्रयोगकेँ ओ स्वाभाविक मैथिली लेखनक प्रमाण मानैत छथि। भक्तिभाव कथाक पृष्ठभूमिमे रहितो उपदेश मात्र नहि बनैत अछि; लोकशिक्षणक भावकेँ सम्बल दैत अछि। अनेक मात्रिक छन्द आ अन्त्यानुप्रासक प्रयोगक चर्चा करैत लेखक किछु स्थलपर लयक असन्तुलन सेहो चिह्नित करैत छथि। ई सावधानी समीक्षाकेँ केवल गुणगान होयबासँ रोकैत अछि।
विधागत उपलब्धि आ शेष प्रश्न
आलेख रामकाव्यक परम्परासँ पद्यकथाक आधुनिकता धरि एकटा तुलनात्मक मार्ग प्रस्तुत करैत अछि। तथापि आधारग्रन्थक पाठ, प्रदीपक पद आ सम्भव अन्य रामकथात्मक संस्करणक पद्य-पद्य तुलनासँ नवनिर्मित अंशक सीमा अधिक स्पष्ट होइत। कथाक नारी-प्रतिनिधित्व, मिथिलाक सामाजिक यथार्थ आ प्रतीकक प्रतिरोध-क्षमता पर स्त्रीवादी अध्ययन सेहो अतिरिक्त प्रकाश दऽ सकैत अछि।
एहि आलेखक स्थायी महत्त्व पौराणिक स्रोतकेँ आधुनिक समस्या सँ जोड़बाक रचनात्मक प्रक्रियाक पहिचानमे अछि। स्वयंप्रभाक दिव्य ‘प्रभा’ एहि अर्थमे दहेजक अन्हार मेटयवला सामाजिक रूपक बनैत अछि।
०६ | डॉ. जयमन्तमिश्रक ‘कविता कुसुमाञ्जलि’
मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: ६३–७८
संस्कृत पाण्डित्य आ मातृभाषाक सृजन
लेखक एहि आलेखक आरम्भमे संस्कृत आ मैथिली साहित्यक ऐतिहासिक सहसम्बन्धक चर्चा करैत छथि। संस्कृत-पण्डित लोकनिक मैथिली लेखनपर अनेक बेर पुरातनपन्थिताक आरोप लगैत रहल अछि। लेखक एहि सामान्यीकरणकेँ चुनौती दैत जयमन्त मिश्रक सम्पादन-कार्य, शास्त्रीय अभ्यास आ मातृभाषाक प्रति अनुरागकेँ एकहि बौद्धिक जीवनक दू रूप मानैत छथि। मिश्रजीक सम्पादित संस्कृत ग्रन्थक नाम दैत लेखक हुनक अनुसन्धानशीलताकेँ प्रमाणित करबाक प्रयत्न करैत छथि (पृ. ६३–६६)।
भक्ति-संस्कारसँ ऋतु-संवेदना धरि
‘कविता कुसुमाञ्जलि’मे सरस्वती-वन्दना, कृष्णस्तुति, शास्त्रीय बिम्ब आ रागाश्रित गीतक संग ऋतुचित्रक उल्लेख अछि। लेखक वल्लभाचार्यक मधुराष्टकक भावधाराक संग मिश्रजीक कृष्णमाधुर्यक तुलनात्मक संकेत दैत छथि। ई दृष्टि मौलिकताकेँ केवल अभूतपूर्व विषय-चयन नहि, पूर्वस्वीकृत भक्तिरसक भाषिक पुनर्सृजनमे सेहो खोजैत अछि।
छह ऋतुसँ सम्बद्ध कविताक उल्लेख मेघ, ग्रीष्म, शरद, हेमन्त, शिशिर आ वसन्तक प्रकृति-चित्रक माध्यमसँ काव्यक संवेदनात्मक विस्तार देखबैत अछि। ऋतुचित्रक बीच नागपञ्चमी, मधुश्रावणी आ मिथिलाक पर्वजीवनक संकेतक कारणेँ ऋतु सामान्य प्राकृतिक अवस्था नहि, सामाजिक समय बनि जाइत अछि। लेखक जखन शिशिरसँ दुःखी लोकपर दयाक प्रश्न उठबैत पाँतीक चर्चा करैत छथि, तखन प्रकृतिक मानवीकरणक भीतर सामाजिक करुणाक प्रवेश उद्घाटित होइत अछि (पृ. ६९–७२)।
नवता-विवादक केन्द्र
‘हम कतय नित जा रहल छी’ सन आधुनिक असमञ्जसक भावपर लेखक विशेष विचार करैत छथि। ई काव्य-व्यक्तिकेँ युगक उन्नयन, आत्मविस्मृति आ स्वार्थबोधक प्रश्नसँ जोड़ैत अछि। शास्त्रीय छन्दमे रचित कविता सेहो आधुनिक संशय, समाजक विसंगति आ व्यक्ति-समष्टिक द्वन्द्वक वाहक भऽ सकैत अछि—आलेखक मूल आग्रह एतय स्पष्ट होइत अछि। एहि प्रकारेँ लेखक शिल्पक इतिहास आ विचारक इतिहासक बीच आवश्यक भेद देखबैत छथि।
आलोचनात्मक विवेचन
लेखकक पक्ष मजबूत तखन बनैत अछि जखन ओ कविताक उदाहरण सँ ‘रूढ़िवादी’ कहबाक सहज आरोपक प्रतिपरीक्षा करैत छथि। भक्ति, प्रकृति आ सामाजिक चेतनाक वैविध्य पोथीकेँ एकरेखा व्याख्यासँ बचबैत अछि। मुदा कविताक प्रकाशन-कालक्रम, संस्कृत पदानुकरणक सीमा, छन्दविशेषक वास्तविक गणना आ ऋतुक बिम्बमे पाठान्तरक शोधक अतिरिक्त अवसर अछि। शास्त्रीय छन्दक दक्षता आ उत्कृष्ट कविता होयब एके नहि; दुनूक स्वतन्त्र कसौटी चाही।
एहि आलेखक सार्थक उपलब्धि मैथिलीक शास्त्रीय संस्कारकेँ नवता-विरोधक पर्याय नहि मानब अछि। जयमन्त मिश्रक काव्यक अध्ययन एहि कारणेँ भाषा, पाण्डित्य, लोकजीवन आ समयचेतनाक साझा परिसर बनैत अछि।
०७ | कथाकार नगेन्द्र कुमरक ‘श्यामली’
मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: ७९–८९
कथा-परम्परासँ यात्रावृत्तान्तक प्रवेश
एहि आलेखक शीर्षकमे ‘कथाकार’ शब्द अछि, मुदा विवेच्य पुस्तक ‘श्यामली’केँ लेखक आयरलैण्डक यात्रासँ सम्बद्ध साहित्यिक वृत्तान्त मानैत छथि। आरम्भमे मैथिली कथाक विकासयात्रा, समाजसुधारसँ यथार्थवाद धरि परिवर्तन आ हरिमोहन झाक प्रभावक चर्चा अछि। एहि व्यापक भूमिकाक उद्देश्य नगेन्द्र कुमरक साहित्यिक स्थिति निर्धारित करब अछि, यद्यपि पाठककेँ किछु काल धरि प्रतीक्षा करय पड़ैत अछि जे ‘श्यामली’क मूल विधागत स्वरूप की अछि (पृ. ७९–८२)।
नगेन्द्र कुमरक कथा-संग्रह ‘ससरफानी’, ‘दृष्टिकोण’, ‘शिकार’ आ ‘फलेना जामुन’क उल्लेख, आ पूर्व आलोचकक ‘मौलिक गल्पकार’ नहि मानबाक निर्णयपर योगानन्द झाक असहमति, आलेखकेँ एकटा आलोचना-इतिहासक बहस बनबैत अछि। लेखक प्रभाव आ अनुकरणकेँ एके नहि मानैत छथि। एक साहित्यकार दोसरासँ प्रेरणा ग्रहण करितहुँ अपन अनुभव, प्रस्तुति आ विषयक कारणेँ मौलिक भऽ सकैत अछि। ई मत युक्तिसंगत अछि; मुदा एहि निष्कर्षक अन्तिम प्रमाण प्रत्यक्ष कथा-दर-कथा तुलनासँ मजबूत होइत।
‘श्यामली’क विशिष्ट विषयविस्तार
ग्रन्थकारक अनुसार ‘श्यामली’ लेखकक इंग्लैण्ड प्रवासकालीन आयरलैण्ड भ्रमणक साहित्यिक अभिलेख अछि, जकर प्रकाशन मैथिली अकादेमी, पटना सँ १९८१ मे भेल बताओल गेल अछि। हिन्दी यात्रावृत्तान्त ‘पथचारी’सँ एकर सम्भावित सम्बन्ध लेखक अनुमानक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि; एहि अनुमानकेँ सिद्ध पाठसम्बन्ध नहि मानब उचित अछि। यात्रा-साहित्यक विमर्शमे एकर सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक आ शैक्षणिक विवरण—महिलाक सार्वजनिक भूमिका, आयरिश स्वाधीनताचेतना, भारतीय स्वाधीनता-आन्दोलनक संगतियाँ आ मातृभाषाक भविष्यक चिन्ता—महत्त्वपूर्ण छथि (पृ. ८३–८९)।
आयरलैण्डक अनुभवक माध्यमसँ मैथिली भाषाक भविष्यपर लेखकक मनमे प्रश्न उठैत अछि। अपन भाषा छोड़ि प्रतिष्ठाक निमित्त दोसर भाषा अपनब, साहित्यक पाठकवर्गक सीमितता आ मातृभाषा रक्षाक अनिवार्यता—ई प्रश्न यात्रा-देशसँ कटल नहि, ओहि तुलना द्वारा प्रखर होइत अछि। एक देशक अनुभव दोसर देशक भाषिक आत्मनिरीक्षणक साधन बनैत अछि। एहि कारणेँ ‘श्यामली’क विवेचन यात्रावृत्तान्तक भीतर आत्मालोचनात्मक मैथिली चेतनाक विवेचन सेहो अछि।
कथा-शैली आ वृत्तान्तक संरचना
लेखक संवादक संक्षिप्तता, सूचनाक प्रचुरता आ दृश्य-निर्माणक सामर्थ्यकेँ ‘श्यामली’क गुण मानैत छथि। कतिपय ठाम लेखकक वर्णन अत्यधिक विस्तार ग्रहण करैत अछि, मुदा ज्ञानवर्धक सूचनाक कारणेँ पाठकक रुचि टिकि रहलाक बात सेहो कहल गेल अछि। एहि मूल्याङ्कनमे सूचनात्मकता आ सौन्दर्यानुभूतिक तनाव उपस्थित अछि—यात्राक प्रमाणित विवरण साहित्यमे कतेक, आ साहित्यिक कल्पना ऐतिहासिक वृत्तान्तमे कतेक ठाम ग्रहण करय, ई प्रश्न खुलैत अछि।
सन्तुलित निर्णय
आलेखक शक्ति ई अछि जे एकटा कथाकारक परिचित छविसँ हटि ‘श्यामली’क विधागत स्वतन्त्रता रेखाङ्कित कएल गेल अछि। कमजोरी ई जे यात्रा-दैनन्दिनी, संवाद, संस्मरण आ रचनात्मक पुनर्निर्माणक परस्पर सम्बन्ध पर अधिक विशिष्ट विश्लेषण सम्भव छल। आयरलैण्डक ऐतिहासिक सूचना सभकेँ बाह्य स्रोतसँ जाँचब आ ‘पथचारी’सँ वास्तविक पाठ-समानता मिलायब भविष्यक शोधक उपयोगी दिशा होयत।
०८ | मायानन्दमिश्रक निबन्ध साहित्य
मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: ९०–१०१
कथाकारक व्यापक निबन्ध-व्यक्तित्व
मायानन्द मिश्रक परिचय प्रायः कथा-उपन्यासक रचनाकारक रूपमे भेटैत अछि; एहि आलेखमे योगानन्द झा हुनक उपेक्षित निबन्धकार स्वरूप खोजैत छथि। मायाबाबूक मैथिली उद्घोषण, सम्पादन, सार्वजनिक सांस्कृतिक जीवन आ साहित्यिक आन्दोलनक गतिविधिक संग हुनक गद्यक सम्बन्ध स्थापित कएल गेल अछि। लेखक कहैत छथि जे उपलब्ध निबन्ध भिन्न-भिन्न पत्र-पत्रिकामे विकीर्ण अछि; ओकर विषयानुसार सूची बनाय पाठककेँ एक संभावित संग्रहक संरचना देब एहि आलेखक ठोस अनुसन्धानात्मक उपलब्धि अछि (पृ. ९०–९५)।
आलोचनात्मक निबन्धक वैचारिक आग्रह
‘मैथिली गल्पक परिस्थिति ओ परिणाम’, ‘आधुनिक मैथिली काव्यक वाद-परम्परा’, ‘आधुनिक मैथिली काव्य: प्रेरक शक्ति आ प्रवृत्ति’, ‘आलोचना दायित्वक बोध’, ‘मैथिली कथाक भूमि-सन्धान’ आ विद्यापति विषयक निबन्ध पर लेखक विचार करैत छथि। मायाबाबूक आग्रह नव वस्तु, नव मानवमूल्य, नव प्रतीक आ नव अभिव्यक्ति-पद्धतिक दिशामे अछि। ‘अभिव्यंजना’ पत्रिकाक आरम्भिक सम्पादकीयसँ उद्धृत विचार लेखकक काव्यदर्शनक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बनैत अछि।
आधुनिक मैथिली काव्यक वाद-परम्परा सम्बन्धी निबन्धमे हिन्दी आलोचनाक नामावली यान्त्रिक ढंगसँ अपनायबापर प्रश्न उठाओल गेल अछि। मायाबाबू मैथिलीक अनुभवसँ मर्यादावाद, सांस्कृतिवाद, प्रकृतिवाद आ अभिव्यंजनावाद सन कोटिक प्रस्ताव करैत छथि (पृ. ९६)। एहि वर्गीकरणक बौद्धिक महत्त्व ई अछि जे साहित्यक इतिहास अपन अनुभव पर आधारित अवधारणा सँ लिखल जाय। किन्तु चारू कोटिक अन्तःसीमा, ऐतिहासिक उपयोगिता आ रचनाकारक समूहीकरणक प्रत्यक्ष परीक्षण बिना ओकरा पूर्ण सिद्ध वर्गीकरण मानल उचित नहि होयत।
संस्मरण आ आन्दोलनक गद्य
लेखक साहित्यिक आलोचनासँ आगू बढ़ि मायाबाबूक संस्मरणपरक, आन्दोलनपरक, भूमिका-लेखनपरक आ शुभाशंसात्मक गद्यक विवेचन करैत छथि। ‘हमर मंच यात्रा’मे साहित्यिक मंच, नौकरी, सार्वजनिक जीवन आ लेखकक आत्मकथा-भावक मेल अछि। ‘मैथिली संघर्ष अभियान’ सम्बन्धी आलेखमे भाषा-आन्दोलनक सहभागी दृष्टि भेटैत अछि। ‘पुस्तकालय आन्दोलन’मे समारोहक खर्चकेँ पुस्तकालय आ प्रकाशन-संरचना दिस लगयबाक व्यावहारिक प्रस्ताव अछि। एहि रचना सभमे निबन्ध सौन्दर्यक वस्तु मात्र नहि, भाषिक सार्वजनिक क्षेत्रक कार्यमूलक साधन अछि (पृ. ९८–१००)।
मिथिलाक राजनीतिक व्यक्तित्वक स्मरणपरक निबन्धमे लेखक भाषाक आलङ्कारिक बिम्ब, गतिशील वाक्य आ ऐतिहासिक व्यक्तिक स्तवनक चर्चा करैत छथि। एतय समालोचकक कर्तव्य स्तुति आ प्रामाणिक इतिहासक भेद रेखाङ्कित करब सेहो अछि। योगानन्द झा रसात्मक भाषाशैलीकेँ उचित स्थान दैत छथि, मुदा व्यक्तिक मूल्याङ्कनमे आलोचनात्मक दूरीक प्रश्न बाँचल रहैत अछि।
निबन्धक सन्दर्भ, पत्रिका, वर्ष आ पृष्ठक सहित तैयार सूची भविष्यमे पाठ-सम्पादनक आधार बनि सकैत अछि। एहि आलेखमे लेखक स्वयं मायाबाबूक बिखरल निबन्धक समग्र संकलनक माँग करैत छथि। ई माँग शोधपरक रूपेँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि: मूल निबन्ध उपलब्ध नहि रहने कथाकारक विचार-विकासक इतिहास अपूर्ण रहत।
आलेखक शक्ति विवेच्य विधाकेँ ‘गौण’ मानि उपेक्षित नहि करब आ लेखकक बौद्धिक-सामाजिक गतिविधिक संग जोडब अछि। सीमा ई जे प्रायः अनुमोदनात्मक वाक्यक बीच निबन्धक तर्कक त्रुटि, आन्तरिक विरोध, पुनरावृत्ति आ भाषिक परिवर्तनक अधिक पाठालोचनात्मक चर्चा चाही। तथापि ई आलेख मैथिली निबन्धक सामग्री-संग्रह आ वर्गीकरणक ठोस आरम्भ मानल जा सकैत अछि।
०९ | विदितजीक ‘ग्राम–गणराज्य’मे समाज-दर्शन
मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: १०२–१३६
यथार्थवाद आ आदर्शवादक बीच उपन्यासक स्थान
‘ग्राम–गणराज्य’ सम्बन्धी आलेख संग्रहक गद्य-विभागमे सभसँ विस्तृत अछि। लेखक पहिने यथार्थवादक नग्न सामाजिक अवलोकन आ आदर्शवादक नैतिक आकांक्षाक भेद स्थापित करैत छथि। विद्यानाथ झा ‘विदित’क उपन्यासकेँ एहने एक कृतिमे राखल गेल अछि जाहिमे मिथिलाक त्रुटि सभ निस्सङ्कोच सोझाँ अनल गेल अछि, मुदा कथा अन्ततः लोककल्याणक सम्भावना खोजैत अछि। समीक्षकक अनुसार ‘ग्राम–गणराज्य’ विदितजीक पन्द्रहम उपन्यास अछि आ जनवरी २०१३ मे प्रकाशित भेल; हुनक उपन्यास-लेखनक पूर्ववृत्त सेहो प्रस्तुत अछि (पृ. १०२–१०४)।
सत्रह ‘उल्लास’क रचनात्मक संयोजना
उपन्यासक सत्रह खण्डकेँ ‘उल्लास’ कहल गेल अछि। प्रारम्भिक तीन उल्लास मूल कथानक आ यात्राक आधारभूमि तैयार करैत अछि; आगूक प्रसंग सभमे विभिन्न जीवात्मा मिथिलाक समाज देखैत-भोगैत छथि; अन्तिम सत्रहम उल्लास अनुभवक समन्वय दिस अबैत अछि (पृ. १०४–१०७)। लेखक एहि वृहदाकार संरचनाक क्रमशः विश्लेषण करैत छथि। एतए प्रत्येक उल्लास स्वतन्त्र घटना, सामाजिक केस-स्टडी आ समग्र मिथिलाक चित्रक एक अंश बनैत अछि।
समाजक आत्मालोचनाक लेल बाहरी दृष्टिक उपयोग एहि उपन्यासक महत्त्वपूर्ण शिल्प होइत अछि। अरुणाचल, किन्नौर, केरल, पंजाब, कश्मीर, बंगाल आ अन्य प्रदेशक सम्बद्ध जीवात्माक अनुभवक माध्यमसँ मिथिलाक लोकजीवनकेँ आन प्रदेशक अनुभवसँ नपल जाइत अछि। एहि पद्धतिमे यात्रा आ संवाद सामाजिक रोगक सूची बनयबाक उपकरण बनैत अछि। मुदा बहुधा कथानक-गतिशीलतासँ बेसी विचारक प्रतिपादन प्रधान भऽ जायत तँ उपन्यास निबन्धात्मक होयबाक जोखिममे पड़ैत अछि; एहिठाम साहित्यिक शिल्प आ समाजोपदेशक बीच तनाव आलोचनाक प्रमुख प्रश्न थिक।
नारी, परिवार आ सामाजिक प्रतिरोध
चतुर्थ उल्लास सम्बन्धी विश्लेषणमे रूसल स्त्रीलोकनिक लेल शरण, संवाद आ पुनर्मिलनक व्यवस्था बनबैत महिलाक कथा अछि। एहि चित्रक माध्यमसँ उपन्यास पारिवारिक क्रोध, अपमान आ आत्मघाती आवेशकेँ सामूहिक समाधानक विषय बनबैत अछि। पञ्चम उल्लासमे विवाह-व्यवस्था आ दहेजसँ उत्पन्न विसंगति पर चर्चा अछि। स्त्रीक मान-सम्मानकेँ घरक मर्यादाक सीमामे नहि, सामाजिक न्याय आ स्वाधीन जीवनक मूल्यक रूपमे पढ़ब एहि प्रसंगक महत्वपूर्ण सम्भावना अछि।
कथाक किछु उदाहरणमे शिक्षित अथवा सक्रिय महिलाक प्रशंसा उपस्थित अछि। तथापि नारीक प्रश्नकेँ केवल परिवारमे सामंजस्य पुनर्स्थापना धरि सीमित करब पर्याप्त नहि। सामाजिक सुरक्षा, निर्णय-स्वाधीनता आ अर्थसत्ता परोक्ष रूपेँ उठैत अछि; एहि तीनूकेँ बड़ विस्तारसँ जाँचल जाय तँ उपन्यासक समाज-दर्शनक सीमा आ उपलब्धि अधिक स्पष्ट होयत।
‘बुड़बक होटल’: व्यवसाय, विज्ञापन आ विडम्बना
छठम उल्लासमे वैकुण्ठक ‘बुड़बक होटल’क कथा विशेष मार्मिक व्यंग्यरूपक बनैत अछि। चालकक रूपमे बितल समय, प्रसिद्ध नर्तकी मल्लिकासँ भेट, व्यवसाय आरम्भ, होटल नामकरण, बढ़ैत प्रतियोगिता, बेटासभक होटल-बँटवारा आ विज्ञापनसँ ग्राहक आकर्षित करबाक उपाय सभ आर्थिक जीवनक बदलैत रूप प्रस्तुत करैत अछि। लेखक पृष्ठ ११४–११८क आसपास एहि कथाकेँ मिथिलामे उद्यमिता, व्यापारक चतुरता, पूँजी-निवेश आ प्रचारक प्रभावक प्रसंगमे परखैत छथि।
‘बुड़बक’ शब्दक अपमानसूचक अर्थक व्यवसायिक ब्राण्ड बनि जायब ई सामाजिक भाषाविज्ञानक दृष्टिसँ सेहो रोचक अछि। हास्यप्रद नामकेँ बाजार मूल्य प्राप्त होइत अछि। एहि कथा पर अधिक विश्लेषणसँ श्रमक मूल्य, रोजगारक अनौपचारिकता आ विज्ञापन-समाजक बदलैत नीतिक प्रश्न उठि सकैत अछि।
पलायन, उपभोक्तावाद आ साम्प्रदायिकता
आगूक उल्लास सभमे प्रवासी मजदूरक शोषण, मिथिलासँ युवाक पलायन, धार्मिक आडम्बर, प्रशासनिक अनाचार, उपभोक्तावादी जीवन, पारिवारिक स्वार्थ, जातीय विभाजन आ राजनीतिक लोभ चित्रित अछि। लेखक प्रसंगानुसार मिथिलाक प्राचीन विद्या-परम्परा, उदयनाचार्य, कुमारिल भट्ट, वाचस्पति मिश्र आ जनक-सीताक स्मृतिक उपयोग द्वारा अतीतक समालोचनात्मक स्मरण करैत छथि। ई स्मरण वर्तमानक दोष देखयबाक नैतिक कसौटीक रूपमे अबैत अछि, मुदा ईहो ध्यान देबाक अछि जे अतीतक गौरवक सूची वर्तमानक समस्याक व्यावहारिक समाधानक स्थान नहि लऽ सकैत अछि।
उपन्यासमे श्रमक प्रतिष्ठा एक महत्त्वपूर्ण सूत्र अछि। सीताक प्राप्तिक जनक-प्रसंगकेँ लेखक कृषि-श्रमक नैतिक महत्त्वसँ जोड़ैत छथि। एकर माध्यमसँ ‘मिथिला केओक कृपापर नहि, अपन श्रमपर ठाढ़ हो’ सन आशय प्रकट होइत अछि। सामूहिक प्रगति लेल स्वार्थ, जड़ता, झूठ प्रतिष्ठा आ निःक्रियता छोड़बाक आवश्यकता कथाक अलग-अलग प्रसंगमे रेखाङ्कित होइत अछि।
मातृभाषा आ ग्राम-गणराज्यक आदर्श
समापन दिशामे जाति, धर्म, वर्ण, ईर्ष्या, मिथ्याभिमान, ठकैती, अपव्यय आ संवेदनहीनतासँ मिथिलाक भविष्यक बन्धनक चित्र प्रस्तुत अछि। लेखकक निष्कर्ष अनुसार मैथिली भाषा-साहित्यक समुन्नयन आ सामाजिक समरसता ग्रन्थक समाधानमूलक क्षितिज पर अवस्थित अछि (पृ. १३२–१३६)। ई उपन्यासक बहु-प्रसंगीय संसारकेँ एक सांस्कृतिक-नैतिक प्रस्तावमे बाँधैत अछि।
एहिठाम एक आलोचनात्मक प्रश्न आवश्यक अछि—केवल मातृभाषाक उन्नयनसँ सामाजिक-आर्थिक अन्याय मेटत की? भाषा सामूहिक आत्मसम्मान आ संवादक आधार जरूर थिक, मुदा भूमि, रोजगार, शिक्षा, जातिगत सत्ता आ सरकारी जवाबदेहीक समस्याक अपन संस्थागत पक्ष अछि। उपन्यासमे भाषाप्रेमकेँ राजनीतिक-अर्थिक कार्यक्रमक संग कतेक सघनता सँ जोडू, ताहि बातपर विमर्शक आवश्यकता अछि।
दीर्घ आलेखक मूल्याङ्कन
लेखक प्रत्येक उल्लासक कथासार विस्तारसँ प्रस्तुत करैत छथि; एहि कारणेँ मूल उपन्यास नहि पढ़निहार पाठककेँ सामाजिक प्रसंगक व्यापक परिचय भेटैत अछि। ई आलेखक उपयोगी पक्ष अछि। मुदा कथा-विवरणक विस्तार कतिपय ठाम आलोचनात्मक तर्ककेँ पाछाँ धकेलैत अछि। औपन्यासिक समय, कथावाचक, चरित्रनिर्माण, संवादक स्वाभाविकता, भाषाक विविध स्तर, अन्तिम आदर्शक साहित्यिक विश्वसनीयता आ उपन्यासक लम्बाइ-सम्बन्धी शिल्पगत अनुशासनपर स्वतंत्र विमर्श कएल जाय तँ समीक्षा अधिक विश्लेषणात्मक भऽ सकैत छल।
तथापि एहि आलेखकेँ मिथिलाक आत्मालोचनाक महत्त्वपूर्ण पाठ मानल जा सकैत अछि। ग्रन्थकार ‘ग्राम–गणराज्य’केँ मिथिलाक लोकसमाजक नैतिक एक्स-रे जकाँ पढ़ैत छथि; अपन क्षेत्रक प्रति अनुरागक अर्थ ओकर दोष सभ पर मौन रहब नहि—ई एहि अध्ययनक सभसँ महत्वपूर्ण शिक्षा अछि।
१० | आचार्य ‘सुमन’क दैनिक ‘स्वदेश’
मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: १३७–१४७
मैथिली दैनिकक इतिहासक एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग
एहि आलेखमे योगानन्द झा साहित्यकारक मूल्याङ्कनसँ पत्रकारिताक संस्थागत इतिहास दिस प्रवेश करैत छथि। मैथिलीमे दैनिक समाचारपत्रक दुर्लभ परम्पराक विवेचन करैत ओ आचार्य सुरेन्द्र झा ‘सुमन’क ‘स्वदेश’केँ मातृभाषाक सार्वजनिक सम्भावनाक साहसिक प्रयोग मानैत छथि। समकालीन मैथिली दैनिकक स्थितिपर ग्रन्थकारक टिप्पणी मूल आलेखक लेखनकालसँ सम्बन्धित अछि; ओकरा २०२६ क वर्तमान समाचारपत्रक पूर्ण सूची मानल नहि जा सकैत अछि (पृ. १३७)।
पहिल प्रयोग: भाषा-चेतना आ लोकसमाचार
ग्रन्थमे १९५५ क ‘स्वदेश’क अङ्क, सम्पादकीय, कविता, स्थानीय सूचना आ व्यंग्य-स्तम्भक उदाहरण देल गेल अछि। पहिल प्रयोगक स्थगन २७ दिसम्बर १९५५ सँ भेल बताओल गेल अछि। पत्रमे दरभंगा बाजारभाव, रेलक समय, खेलक समाचार, चलचित्रसमाचार, साहित्यिक टिप्पणी आ जनोपयोगी सूचना छपबाक विवरण पढ़ि स्पष्ट होइत अछि जे ‘स्वदेश’ केवल साहित्य-पत्र नहि छल; ओ मैथिलीमे नागरिक जीवनक सम्पूर्ण सूचना-विनिमयक प्रयोग छल (पृ. १३८–१४१)।
एहि पत्रक व्यंग्यलेखन विशेष उल्लेखनीय अछि। ग्राम्य बोली, कहबी, लोकसुलभ वाक्यगति आ परिहासपूर्ण पात्रक माध्यमसँ पत्र मैथिलीक ‘अखबारी’ सम्भावना विकसित करैत छल। लेखक ठीक देखैत छथि जे भाषा-मानकीकरणक अर्थ केवल संस्कृतनिष्ठ सम्पादकीय नहि; लोकक बोलीकेँ सम्मानपूर्वक सार्वजनिक मुद्रित रूप देब सेहो अछि। एना लोकभाषा आ जनपत्रकारिता परस्पर एक-दोसराकेँ विकसित करैत छथि।
दोसर प्रयोग: आर्थिक आधारक प्रश्न
आलेखक परवर्ती भागमे ‘स्वदेश’क पुनर्प्रयासक विवेचन अछि। ‘स्वदेश गोष्ठी’क उद्यम, सम्पादकीय सहयोगक माँग, पत्रक आकार आ नियमिततापर आर्थिक बाधाक प्रभाव, मुद्रण-व्यवस्था, कामगार आ वितरण-संरचनाक कठिनता सभक उल्लेख अछि। किछु अंकमे सम्पादकीयक अभाव आ अनियमितता देखाबैत लेखक केवल भावनात्मक महत्त्व नहि, संस्थागत दुर्बलताक कारण सेहो देखबैत छथि (पृ. १४२–१४७)।
पत्रक लोकमत, स्थानीय, विश्वमंच, व्यंग्य, विचार-चर्चा आदिक स्तम्भ समाचारपत्रक बहुस्तरीय रूप बनबैत छल। चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’क व्यंग्य-स्तम्भक विविध शीर्षक आ मैथिली लेखकसभक रचनाक चर्चा पत्रकेँ एक साझा बौद्धिक चौक बनबैत अछि। पत्रमे छपल विभिन्न लेखकक प्रथम अथवा पूर्वप्रकाशित सामग्रीक उल्लेख भविष्यक साहित्येतिहासक लेल महत्त्वपूर्ण सन्दर्भ अछि, मुदा ओकर कालक्रमक अन्तिम स्थापना मूल अंकसभकेँ मिलाय कऽ करबाक चाही।
शोधपद्धतिक उपलब्धि