विदेह शोध-सूची · मूल PDF

गजेन्द्र ठाकुर — नित नवल योगानन्द झा

Videha Issue 451 · Research article continuation 6

आलेखक विशिष्टता पृष्ठ-सामग्रीक विवरण सँ पत्रक भाषिक आ सार्वजनिक कार्यक्षेत्रक पुनर्निर्माणमे अछि। ‘दैनिक’ शब्दक अर्थ केवल रोज छपब नहि, रोजक सामाजिक चेतनाकेँ मातृभाषामे उपस्थित करब मानल गेल अछि। लेखकक दृष्टिमे ‘स्वदेश’ अपन विरासत छोड़ि गेल, मुदा आर्थिक संस्थाक अभाव ओकर स्थायित्व रोकलक। ई निष्कर्ष साहित्यिक श्रम आ पत्रकारीय संरचनाक बीचक अन्तर याद करबैत अछि।

अधिक अनुसन्धानक लेल सभ उपलब्ध अंकक अनुक्रमणिका, प्रकाशनक तारीख, वितरण-क्षेत्र, संपादकीय जिम्मेवारी, पाठकीय पत्र, विज्ञापन आ लेखकीय मानदेयक व्यवस्थित सूची आवश्यक होयत। एहि विवरण बिना पत्रक सामाजिक पहुँच सम्बन्धी अनुमान सावधानीपूर्वक करबाक चाही। ताहिओ ‘स्वदेश’ सम्बन्धी आलेख मैथिली सार्वजनिक पत्रकारिता-अनुसन्धानक एक महत्त्वपूर्ण परिचयात्मक-समीक्षात्मक स्रोत अछि।

११ | मैथिलीक भाषातात्त्विक अध्ययन आ सुभद्र झा

मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: १४८–१५४

स्वभाषाक संरचनागत स्वतन्त्रताक प्रश्न

एहि आलेखक केन्द्र डॉ. सुभद्र झाक भाषावैज्ञानिक कार्य अछि, विशेषतः ‘The Formation of the Maithili Language’। लेखक मैथिलीकेँ केवल भावनात्मक आत्मपरिचयक आधारपर नहि, ध्वनि, रूप, शब्द, व्याकरणिक कोटि आ भाषा-सम्बन्धक ठोस विश्लेषणपर स्वतन्त्र भाषा सिद्ध करबाक बौद्धिक प्रयत्नक रूपमे एहि ग्रन्थकेँ राखैत छथि। सुभद्र झाक समयक भाषावर्गीकरण सम्बन्धी तर्क आ अंग्रेजीमे प्रस्तुत हुनक मतक उल्लेख लेखकक पक्षक आधार अछि (पृ. १४८–१५०)।

भाषा-परिवार आ तुलना

ग्रन्थकारक अनुसार सुभद्र झा मैथिलीक भौगोलिक विस्तार, उपभाषा, प्रारम्भिक अभिलेख, लिपि, भाषिक विकास आ भोजपुरी, मगही, बंगला, असमी, उड़िया, नेपाली आदि संग तुलना करैत छथि। एहि तुलनाक मूल प्रश्न अछि—कुन गुण साझा ऐतिहासिक स्रोतक देन अछि आ कुन गुण मैथिलीक विशिष्ट व्याकरणिक संगठन देखबैत अछि? भाषाविज्ञानमे राजनीतिक नामकरण आ संरचनागत वर्गीकरण अलग तर्क-पद्धति अछि; लेखकक उद्धृत विचार एहिएँ महत्त्वपूर्ण अछि जे मैथिलीक स्वतन्त्रता भाषिक रूपरचना सँ प्रतिपादित कएल गेल अछि।

मुदा इतिहासक भाषावर्गीकरण समयक संग बदलैत रहल अछि; ताहि कारणेँ पुरान वर्गीकरणकेँ आधुनिक भाषाविज्ञानक अन्तिम सर्वसम्मति मानल नहि जा सकैत अछि। एहि आलेखक योगदान सुभद्र झाक तर्कक प्रतिपादन आ मूल्याङ्कनमे अछि, न कि प्रत्येक ऐतिहासिक वर्गीकरणक आजुक स्थिति घोषित करबामे।

शब्दरचना आ प्रत्ययक प्रश्न

लेखक सुभद्र झाक शब्दरचनात्मक उदाहरण विशेष रुचिसँ दैत छथि। ‘ठी’, ‘औटी’, ‘औरी’ सन शब्दान्तक ऐतिहासिक विकास, कथित मूल काष्ठ, पट्टिका, वटिका आदिक संग तुलना आ ‘बे-’, ‘बद-’, ‘हेड-’ सन उपसर्गक प्रवेश भाषिक सम्पर्कक उदाहरण रूपमे प्रस्तुत अछि (पृ. १५०–१५१)। एतय दू स्तर अलग राखब जरूरी अछि—मैथिलीमे रूप सभक वर्तमान प्रयोग प्रत्यक्ष भाषिक तथ्य थिक; ओकर प्राचीन व्युत्पत्ति अलग ऐतिहासिक परिकल्पना अछि, जकर समर्थन लेल ध्वनिपरिवर्तन आ प्राचीन पाठसाक्ष्य चाही।

सुभद्र झा द्वारा संज्ञाक लघु, गुरु आ गुरुतम रूपक चर्चा मैथिलीक रूपात्मक समृद्धि देखबैत अछि। एहि रूप सभक प्रयोग प्रसंग, सम्मान, आकार, सामीप्य आ बोलीभेदसँ प्रभावित होइत अछि; एकटा रूपक समस्त शब्दपर अनिवार्य विस्तार मानब ठीक नहि। लेखक सुभद्र झाक सावधानीकेँ उल्लेख करैत छथि। एहि अध्यायमे व्याकरणक उदाहरण केवल पदवर्गक सूची नहि, मैथिली समाजक भाषिक जीवनक प्रमाण बनैत अछि।

‘संस्कृतक साँच’क आलोचना

आलेखक उत्तरभागमे मैथिलीक व्याकरणकेँ संस्कृत वा हिन्दी व्याकरणक ढाँचामे जबरदस्ती ढारबाक आलोचना अछि। भाषा-विवेचनक मूल आधार भाषाक वास्तविक प्रयोग होयबाक चाही, पूर्वनिर्धारित शास्त्रीय कोटि नहि—ई एहि खण्डक प्रभावशाली निष्कर्ष अछि। एहि विचारक समकालीन प्रासङ्गिकता उच्च अछि, कारण भाषा-शिक्षण, कोश-निर्माण, वर्तनी-निर्देशन आ संगणकीय भाषासंसाधन सभमे स्रोत-भाषाक विशिष्ट व्यवहार सुरक्षित रखब आवश्यक अछि।

समीक्षा आ भविष्यक दिशा

एहि आलेखमे लेखक भाषाशास्त्रीय स्वाधीनता आ सांस्कृतिक आत्मसम्मानक सम्बन्ध प्रकट करैत छथि। समीक्षाक सीमा ई जे तुलनात्मक ध्वनितालिका, क्रियारूपक पूर्ण प्रतिमान, क्षेत्रीय उपभाषाक वास्तविक आँकड़ा आ व्युत्पत्तिक प्रतिस्पर्धी मतक विस्तारसँ परीक्षण एहि संक्षिप्त आलेखमे सम्भव नहि भेल अछि। ताहि कारणेँ ई लेख सुभद्र झाक योगदानक प्रमाणयुक्त परिचय मानल जायत, हुनक सम्पूर्ण भाषाविज्ञानक आधुनिक पुनर्मूल्याङ्कन नहि।

एहिमे उठाओल मूल पद्धतिगत आग्रह स्थायी अछि: मैथिलीकेँ ओकरे वास्तविक ध्वनि, रूप, वाक्य आ सामाजिक व्यवहारक आधारपर बुझल जाय।

१२ | मैथिली साहित्यक विकासमे जयकान्त मिश्रक योगदान

मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: १५५–१६६

साहित्येतिहाससँ सक्रिय भाषा-आन्दोलन धरि

डॉ. जयकान्त मिश्र सम्बन्धी आलेख साहित्येतिहास, अनुसन्धान आ सार्वजनिक आन्दोलनक सम्मिलित अध्ययन अछि। लेखक हुनक शिक्षाजीवन, विश्वविद्यालयीय अनुसन्धान, मैथिली साहित्यक इतिहास लिखबाक प्रयत्न आ साहित्यिक संस्थासँ सम्बन्धक विवरण दैत छथि। अंग्रेजीमे रचित ‘A History of Maithili Literature’क महत्त्व एहि दृष्टिसँ विश्लेषित अछि जे मैथिली साहित्यक प्राचीनता, सातत्य आ व्यापकता बाहरी विद्वत् जगत धरि पहुँचबाक माध्यम भेटल (पृ. १५५–१६०)।

स्रोत-संग्रह आ इतिहास-लेखनक व्यावहारिक श्रम

एहि आलेखमे साहित्येतिहासकेँ कवि-नामक सूची नहि, अभिलेख खोजब, पाठ चिन्हब, कालक्रम निर्धारित करब, भाषाक बदलाव बुझब आ साहित्यक धारा वर्गीकृत करबाक सामूहिक बौद्धिक श्रम मानल गेल अछि। लेखक पूर्ववर्ती साहित्येतिहासक प्रयासक उल्लेख करैत जयकान्त मिश्रक ग्रन्थकेँ अधिक समेकित, तुलनात्मक आ सन्दर्भयुक्त मानैत छथि। एहि निर्णयकेँ सावधानीसँ पढ़ब चाही: ग्रन्थकारक मूल्याङ्कनमे ओकर स्थान अत्यन्त उन्नत अछि, मुदा सम्पूर्ण साहित्येतिहासक तुलनात्मक परीक्षण अलग विस्तृत कार्य थिक।

जयकान्त मिश्रक साहित्येतिहासमे अंग्रेजी माध्यमक उपयोग सम्बन्धी लेखकक चर्चा सांस्कृतिक राजनीति सँ जुड़ैत अछि। अन्तरराष्ट्रीय शैक्षणिक संवादमे अंग्रेजीक माध्यम मैथिलीक परिचय बढ़ा सकैत अछि, मुदा मातृभाषामे वैचारिक शब्दावलीक विकास सेहो अनिवार्य अछि। एहि द्वन्द्वमे भाषाबोधक द्विस्तरीय रणनीति उभरैत अछि—बाह्य पाठक धरि पहुँचब आ आन्तरिक पाठक-संस्कृति बनायब।

भारतीय भाषिक संस्थामे मैथिलीक स्थान

लेखक भारतीय साहित्यिक संस्थामे मैथिलीक प्रतिष्ठाक लेल जयकान्त मिश्रक पत्राचार, दलील आ सार्वजनिक उद्यमक विशेष महत्त्व बतबैत छथि। १९६५ मे साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिली मान्यता सम्बन्धी प्रसंगक उल्लेख आ जवाहरलाल नेहरूक मत सम्बन्धी उद्धरण ग्रन्थक भीतर उपस्थित अछि (पृ. १६३–१६५)। ई प्रसंग मैथिलीक संस्थागत इतिहासक महत्त्वपूर्ण सूत्र अछि; तथापि शासकीय निर्णयक पूर्ण इतिहास स्थापित करबाक लेल साहित्य अकादेमीक मूल अभिलेख, पत्राचार आ सम्बद्ध अन्य कार्यकर्ताक योगदानक स्वतन्त्र जाँच अपेक्षित अछि। लेखक स्वयं एक सामूहिक आन्दोलनक श्रेयकेँ व्यक्ति-विशेषमे सीमित करबाक प्रश्न उठबैत छथि; ई पद्धतिगत सावधानी स्वागतयोग्य अछि।

शिक्षण, सामाजिक पहल आ भाषिक सम्मान

आलेखमे प्राथमिक शिक्षामे मैथिलीक उपयोग, मैथिली महिला विद्यापीठ, आकाशवाणी केन्द्र आ भाषिक आन्दोलनक विविध प्रसंगक उल्लेख अछि। एहिसँ जयकान्त मिश्रक व्यक्तित्व पुस्तकालयमे स्थित अनुसन्धानकर्तासँ बहिर्गत सामाजिक कार्यकर्ता रूपमे प्रकट होइत अछि। मातृभाषाक गौरवक वास्तविक अर्थ ओकर शिक्षण, प्रकाशन, संचार आ प्रशासनिक जीवनमे उपस्थिति अछि—ई सन्देश आलेखमे बारम्बार प्रकट होइत अछि।

आलोचनात्मक संतुलन

एहि आलेखक महत्त्व एकटा बौद्धिक जीवनीकेँ संस्थागत इतिहासक प्रश्नसँ जोड़ब अछि। मुदा व्यक्तिक साधना, आन्दोलनक सामूहिक सफलता आ राज्यक निर्णयक कारणक बीच प्रमाणक स्तर अलग-अलगरूपेँ राखब आवश्यक अछि। लेखकक प्रशंसात्मक उत्साह अनेक ठाम न्यायसंगत उपलब्धिपर आधारित छनि, मुदा विरोधी मत, समयक अन्य प्रमुख अभियानकर्ता आ संस्थागत दस्तावेजक पुनर्समीक्षा सँ लेख अधिक बहुकोणीय बनत।

ताहिओ जयकान्त मिश्रक मूल्याङ्कन एहि बातकेँ स्पष्ट करैत अछि जे मैथिली साहित्यक आधुनिक विकास केवल कृति रचबाक इतिहास नहि, अपन भाषा लेल ज्ञान-व्यवस्था आ सार्वजनिक मान्यता अर्जित करबाक इतिहास सेहो अछि।

१३ | सजीवनी समालोचना: रामदेव झा

मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: १६७–२०८

समालोचनाक एक विशिष्ट रूपक अवधारणा

ग्रन्थक सभसँ विस्तृत आलेख ‘सजीवनी समालोचना: रामदेव झा’ अछि। डॉ. रामदेव झाक व्यक्तित्वक परिचय, साहित्यिक कृतित्व, पुरान मैथिली पाठक खोज आ सम्पादन, शास्त्रीय विवेचन तथा लेखक-केन्द्रित अनुसन्धानी समालोचनाक व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत अछि। ग्रन्थकार समालोचनाक एहन पद्धति पहिचानैत छथि जाहिमे रचनाकारक जीवन, समकालीन परिवेश, अभिलेख, उपलब्ध पाण्डुलिपि, कृतिसूची आ कृतिक सौन्दर्य—सभ एक-दोसराकेँ आलोकित करैत अछि। ‘सजीवनी’क अर्थ केवल जीवनकथा नहि; पाठक व्याख्याकेँ जीवन-सन्दर्भ दऽ सजीव बनायब अछि (पृ. १६७–१६९)।

डॉ. रामदेव झाक निधन १८ मार्च २०२१ केँ भेल, आ पोथीक समर्पण हुनक स्मृतिमे अछि। ग्रन्थकारक व्यक्तिगत कृतज्ञता एहि आलेखक स्वरतन्तुमे विद्यमान अछि; एहि कारणेँ कृतित्वक मूल्याङ्कनमे आत्मीयताक स्पष्ट अंश अछि। ई आत्मीयता अनुसन्धानी जानकारीक स्रोत सेहो बनि सकैत अछि, मुदा आलोचनात्मक निर्णय लेल ओहिसँ दूरी सेहो आवश्यक अछि।

पुराना पाठक पुनराविष्कार आ सम्पादन

लेखक रामदेव झाक ‘नन्दीपति गीतिमाला’, ‘रामविजय नाट’, ‘हरगौरी विवाह’, ‘कुञ्जविहार’, ‘दशावतार नृत्यम्’, ‘षोडशगीतम्’, ‘मुदित कुवलयाश्व’ आदि पुरान गीत-नाट्य सामग्रीक सम्पादन-प्रकाशनक वर्णन करैत छथि। एहि कार्यक ऐतिहासिक उपयोगिता गहन अछि: उपलब्ध पाठक स्वच्छ प्रतिलिपि बनायब, रचनाकार निर्धारित करब, पाण्डुलिपिक सम्बन्ध पहचानब आ नाट्य-परम्पराक वास्तविक रूप समझब साहित्येतिहासक आधारशिला छथि। केवल आलोचनाक सामान्य निष्कर्ष नहि, मूलसामग्रीक खोज स्वयं ज्ञानक विस्तार अछि।

शंकरदेव आ असम–मिथिला सम्बन्ध

असमक शंकरदेव सम्बन्धी विवेचनमे रामदेव झाक ‘रामविजय’क भूमिकामे कृत व्याख्याक समीक्षा अछि। वैष्णव धार्मिक आन्दोलन, अंकीय नाटक, मैथिलीमिश्रित भाषिक प्रयोग आ मिथिलाक नाट्यपरम्परासँ असमक सम्बन्ध पर विचार कएल गेल अछि (पृ. १७०–१७२)। एहि सम्बन्धक अध्ययन साहित्यक सीमापार संचरणक प्रश्न उठबैत अछि। भाषा-रूपक मिश्रणकेँ ‘अशुद्धता’ नहि, ऐतिहासिक रचनात्मक सम्पर्कक संकेतक रूपमे पढ़ब आवश्यक अछि।

तथापि असमिया, ब्रजबुलि आ मैथिलीमिश्रित नाट्यभाषाक परस्पर वर्गीकरण जटिल ऐतिहासिक समस्या अछि। एहिठाम पुरान पाठ, स्थानीय परम्परा आ आधुनिक भाषावैज्ञानिक मतकेँ अलग-अलग जाँचल जाय तँ दावा अधिक प्रमाणवान भऽ सकैत अछि। ग्रन्थकारक विवेचन एहि अध्ययनक उपयोगी प्रवेशद्वार अछि।

जगज्ज्योतिमल्लक कृतित्व आ लेखकीयता

जगज्ज्योतिमल्लक नाट्य-गीत सम्बन्धी रामदेव झाक अनुसन्धानक चर्चा आलेखक उल्लेखनीय अंश अछि। ‘मुदित कुवलयाश्व’केँ वंशमणिक कृति मानबाक पूर्व मतक परीक्षणमे नाटकक प्रस्तावनाक एक वाक्यांशकेँ पुनः अर्थ दैत ग्रन्थकारक अनुसार रामदेव झा कृतिकार निर्धारित करैत छथि (पृ. १७३–१७५)। ई पाठकेन्द्रित ऐतिहासिक तर्कक उदाहरण अछि। लेखकीयता केवल नाम देखलासँ स्थापित नहि होइत; प्रस्तावना, सूत्रधारक कथन, नाटकक अन्य अंश आ सम्बद्ध कृतिक साक्ष्य मिलायब आवश्यक अछि।

नाटकक अङ्क-विभाजन, जमनिका, प्रस्तावना, रस-योजना, प्रवेश, अभिनय-शैली आदिक शास्त्रीय आधारपर विवेचन रामदेव झाक आलोचनात्मक बहुश्रुति देखबैत अछि। योगानन्द झा शास्त्रीय सिद्धान्तक प्रयोगकेँ इतिहासलेखनक संग जोड़ैत छथि; एही मेलक कारणेँ आलोचना विवरणमात्र नहि रहि कृतिक कलात्मक व्यवहारक विश्लेषण बनैत अछि।

जगत्प्रकाशमल्ल आ नाट्य-गीतक वर्गीकरण

आलेखमे जगत्प्रकाशमल्लक गीत, नाटक, रचनास्रोत, रस-विन्यास आ गीतविधाक वर्गीकरणक चर्चा अछि (पृ. १७७–१८०)। ग्रन्थकार रामदेव झाक गीत-वर्गीकरण, विशेषतः नाट्यगीत आ मुक्तकगीतक भेद, आ शृङ्गार तथा भक्तिक भावभूमिक विवेचन पर ध्यान दैत छथि। एहिठाम कृतिक इतिहासकेँ संगीत, प्रस्तुति आ काव्यरूपक दृष्टिसँ देखबाक महत्त्व स्पष्ट होइत अछि। गेयपदक केवल मुद्रित पाठक आधारपर पूर्ण मूल्याङ्कन कठिन अछि; अभिनय-परम्परा, राग-सन्दर्भ आ उपलब्ध संगीतपरम्पराक जानकारीसँ अध्ययन आर समृद्ध भऽ सकैत अछि।

नन्दीपति आ वंशावलीसँ कालनिर्धारण

नन्दीपति सम्बन्धी आलोचनामे नाट्य-प्रस्तावनाक वंश-सन्दर्भ आ पञ्जी-प्रबन्धक सहायता सँ पूर्व स्वीकृत वंशक्रमक परीक्षणक वर्णन अछि (पृ. १८१–१८३)। एहि उदाहरणमे समालोचकक काम सौन्दर्य-निर्णय धरि सीमित नहि; इतिहासक आधाररूप अभिलेखक अर्थनिर्धारण अछि। मुदा पञ्जी, वंशावली, साहित्यिक प्रस्तावना आ ऐतिहासिक कालक्रम सदा परस्पर निर्विरोध नहि होइत; साक्ष्यक प्रकृति, संभावित प्रतिलिपिक त्रुटि आ नामसाम्यक प्रश्न सदैव ध्यानमे रहबाक चाही।

जीवन झा: रंगमंचक संक्रमण

कविवर जीवन झाक नाटक पर चर्चा एहि दीर्घ आलेखक अन्य महत्वपूर्ण खण्ड अछि। कीर्तनिया रंगमंचक क्षय, पारसी थिएटरक प्रचलन, रामलीलाक मंचरूप आ मैथिली नाटकक नव संरचनाक सम्बन्धमे रामदेव झाक निष्कर्ष सोझाँ अबैत अछि (पृ. १८४–१९०)। ‘सीतापरिणय’क पृष्ठभूमिमे जनकपुर-लीलाक सांस्कृतिक स्थान आ रामलीलामे मैथिलीक संवाद-भाषाक चर्चा एहि तर्ककेँ सन्दर्भ दैत अछि। कथित आधारस्रोत आ मौलिक कृतिक भेद निर्धारित करबाक लेल नाटकक कथानक, पात्र, अङ्कसंरचना आ भाषा सभ पर विचार आवश्यक अछि।

जीवन झाक ‘सामवती पुनर्जन्म’क मौलिकता सम्बन्धी पुरान मतक प्रतिपरीक्षा, तथा मैथिली ‘सट्टक’क अनुपलब्ध भागक अन्वेषणक चर्चा पाठसंरक्षणक संस्थागत महत्त्व उजागर करैत अछि। ई प्रसंग देखबैत अछि जे रचनाकारक प्रतिष्ठा साहित्यिक इतिहासमे पुनः-पुनः बदलि सकैत अछि, कारण नूतन पाठसाक्ष्य पूर्व निर्णयकेँ संशोधित करैत रहैत अछि।

जनार्दन झा ‘जनसीदन’ आ आधुनिक कथाक प्रारम्भ

ग्रन्थकार रामदेव झाक जनार्दन झा सम्बन्धी जीवनाधारित समालोचनाक विस्तारसँ चर्चा करैत छथि। पारिवारिक साक्ष्य, आत्मपरिचय, पुत्र-पौत्रसँ प्राप्त सूचना आ साहित्यिक रचनाक आधारपर जीवनचर्याक पुनर्निर्माणक वर्णन अछि। ‘ताराक वैधव्य’केँ आरम्भिक आधुनिक कथा रूपमे स्थापित करबाक तर्क कथानक, पात्र, संवाद, वातावरण आ परिणतिक विश्लेषणसँ समर्थित बताओल गेल अछि (पृ. १९३–२००)।

‘प्रथम कथा’ सन पद अत्यन्त ऐतिहासिक भार वहैत अछि; ताहि लेल तारिख, पत्रिका-अङ्क, पूर्ववर्ती दुर्लभ रचना आ पाठक विधागत लक्षणक मिलान जरूरी अछि। लेखकक प्रस्तुति सँ रामदेव झाक तर्क बुझल जाइत अछि, मुदा अन्य सम्भावित प्रारम्भिक कथा सभक प्रत्यक्ष जाँच बिना ‘प्रथम’क दावाकेँ अन्तिम ऐतिहासिक फैसला मानब सँ बचबाक चाही।

सीताराम झा आ काव्यरचनाक वैज्ञानिक वर्गीकरण

सीताराम झा सम्बन्धी विवेचनमे रामदेव झाक कविता-विभाजन—मुक्तक, विवरणात्मक/इतिवृत्तात्मक आ प्रबन्धात्मक काव्य—क उपयोगिता पर चर्चा अछि (पृ. २०१–२०३)। कृतिक विषयक अनुकूल ओकर शिल्पगत समुदाय पहिचानब समालोचनाकेँ लेखकक सामान्य प्रशंसासँ अलग करैत अछि। ‘अम्बचरित’क विवेचन, मातृभक्ति आ भक्तिमय काव्यभावक सम्बन्ध ओहि वर्गीकरणक महत्त्व बढ़बैत अछि।

सुभद्र झा आ सम्पादनक कठोर कसौटी

दीर्घ आलेखक उत्तरार्धमे रामदेव झाक सुभद्र झा सम्बन्धी समालोचनाक चर्चा अछि। भाषातात्त्विक ग्रन्थ, व्याकरण-विवेचन, विद्यापति गीतसंग्रह, पाठ-संशोधन, सम्पादनक उद्देश्य आ उपलब्धि पर समीक्षकक निर्णय मिश्रित अछि। किछु कृतिक विशेष महत्त्व मानल गेल अछि, तऽ किछुक सम्पादनप्रविधि अथवा प्रयोजनपर प्रश्न उठाओल गेल अछि। ‘Songs of Vidyapati’मे पाठ-संशोधनक योग्यता आ ‘विद्यापति गीत संग्रह’क उपयोगितापर भिन्न निर्णयक उल्लेख (पृ. २०४–२०८) एहि बातक उदाहरण अछि जे आत्मीय समालोचनामे सेहो आलोचनात्मक असहमति सम्भव अछि।

सम्पूर्ण आलेखक आलोचनात्मक मूल्याङ्कन

एहि लम्बा अध्ययनक महत्त्व ओकर दृष्टि-व्यापकतामे अछि। एकहि रामदेव झाक अनुसन्धानक माध्यमसँ असम, नेपाल, मिथिला, मध्यकालीन नाट्य, काव्य, व्याकरण, लोकसाहित्य, सम्पादन आ साहित्येतिहासक अनेक सूत्र जुड़ैत अछि। लेखक अनेक ठाम मूल उद्धरण, वंश-साक्ष्य आ पूर्वनिर्णयक तुलना करैत छथि। पुस्तकक प्रस्तावनामे प्रतिपादित ‘आलोचक सेतु छथि’—एहि धारणा एहि आलेखमे अपेक्षाकृत स्पष्ट रूपेँ क्रियाशील देखाइत अछि।

एहि विशाल विवेचनक सीमा सेहो समान रूपेँ विचारणीय अछि। ग्रन्थकार बहुते विषयमे रामदेव झाक निष्कर्षकेँ सार्थक माने छथि, मुदा किछु विवादित निष्कर्षक प्रतिपक्ष, मूल पाण्डुलिपिक पाठभेद आ आधुनिक बाह्य शोधक स्वतन्त्र पुनर्तुलना एहि एक आलेखमे नहि भेटैत अछि। विस्तारक कारणेँ कतिपय स्थलमे उद्धृत जीवनीग्रन्थक अध्याय-दर-अध्याय परिचय अधिक आ तुलनात्मक सैद्धान्तिक विश्लेषण कम होइत अछि। तथापि मैथिलीमे ‘सजीवनी समालोचना’क स्वरूप पहिचानय लेल ई आलेख अत्यन्त उपयोगी अछि: इतिहास, पाठसमीक्षा आ सौन्दर्यनिर्णयक त्रिवेणी एकर मूल उपलब्धि अछि।

१४ | मैथिली लोकगाथा–अनुसन्धान आ मणिपद्म

मूल पोथीक मुद्रित पृष्ठ: २०९–२२४

लोकगाथाक विधागत स्वरूप

अन्तिम आलेखमे लेखक लोकगाथाकेँ लोकसाहित्यक महाकाव्य मानैत छथि। गेयधर्मिता, व्यापक कथावस्तु, लोकनायक, सामूहिक स्मृति, सामाजिक संघर्ष आ जातीय-लोकदेवताक प्रतिष्ठा—ई तत्त्व लोकगाथाक विशिष्टता बनैत अछि। शास्त्रीय महाकाव्यक एकरूपी छन्दबन्ध नहि रहितो लोकगाथाक गेय लय ओकर जीवन्त स्वरूप बनबैत अछि। लोकगाथा लिखित रचनाक तरह स्थिर नहि; गायक, काल, क्षेत्र आ श्रोतासमुदायक अनुसार बदलैत रहैत अछि (पृ. २०९–२११)।

मिथिलामे सलहेस, लोरिक, दीना-भदरी, कारिख, दुलरा दयाल, रइया रनपाल, नैका बनिजारा, श्यामसिंह, गोपीचन्द, गनीनाथ-गोविन्द, बेनीराम आदि लोकनायकक गाथाक उल्लेखसँ स्पष्ट अछि जे ई विधा मिथिलाक अनेक जाति आ समुदायमे विस्तारित अछि। लेखक गाथाक भेदमे एक पात्रक खण्डचरित आ विशाल सामूहिक कथागठनकेँ अलग करैत छथि। एहि आधारपर ‘लोकगाथा’ आ ‘गाथागीत’क सम्भावित अन्तरक चर्चा कएल गेल अछि। वर्गीकरणक ई उपयुक्त आरम्भ अछि, मुदा जीवित गायकपरम्परामे एक कथा अनेक रूपमे प्राप्त होइत अछि, तेँ कोनो स्थायी सीमा कड़ाईसँ थोपब उचित नहि।

लिखित अभिलेख आ क्षेत्रीय अन्वेषणक इतिहास

लेखक ‘वर्णरत्नाकर’मे लोकनाच-गानक सन्दर्भ, ग्रियर्सन द्वारा सलहेसक संकलन, परवर्ती शोधकर्ता लोकनिक प्रयास आ विविध लोकगाथाक प्रकाशनक इतिहासक परिचय दैत छथि। एहि विवेचनमे मूल अभिलेख-संग्रहक कठिनता प्रखर रूपेँ उपस्थित अछि। मौखिक परम्पराक गीत जखन लिपिबद्ध होइत अछि, तखन गायकक उच्चारण, राग, कथामे फेरबदल, प्रदर्शनक सामाजिक क्षण आ श्रोताक प्रतिक्रिया बहुत किछु छूटि जाइत अछि। एहि कारणेँ केवल मुद्रित पाठक आधारपर लोकगाथाक सम्पूर्ण अर्थ निर्धारित करब कठिन अछि।

लेखक महेन्द्र नारायण राम, फूलो पासवान, रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’, ताराकान्त मिश्र, विश्वेश्वर मिश्र आ अन्य अन्वेषकक योगदानक उल्लेख करैत छथि। किछु शोधक मूलपाठ-संग्रहक बल, किछुक साहित्यिक विवेचन आ किछुक वर्गीकरणक उपयोगिता देखाओल गेल अछि (पृ. २१३–२१८)। एहि सूचीसँ लोकगाथा-अनुसन्धानक एक विकसित परम्पराक आभास भेटैत अछि। ई आलेख भिन्न-भिन्न विद्वानक योगदानक परिचय-द्वार अछि; सम्पूर्ण ग्रन्थसूची वा अप्रमाणित पाण्डुलिपिक अन्तिम लेखा नहि।

मणिपद्मक कार्यक विशिष्टता

मणिपद्मक चर्चा एहि आलेखक निर्णायक चरण अछि। लेखकक अनुसार मणिपद्म लोकगाथाक कथ्य, लोकपात्रक संसार, सामाजिक व्यवहार आ विशिष्ट लोकभाषाकेँ गम्भीरतासँ ग्रहण करैत छथि। ओ मूल मौखिक सामग्रीक आधार लैत, ओकर रस ग्रहण करैत आ साहित्यिक कल्पनाक सहायता सँ शिष्ट साहित्यक कथा-उपन्यास, निबन्ध आदि विधामे नूतन रचना प्रस्तुत करैत छथि (पृ. २१९–२२३)। एतय मणिपद्मक सामर्थ्य लोक आ शिष्ट साहित्यक बीच संवाद बनयब अछि।

ई रूपान्तरणक सफलता आ ओकर समस्या दुनू अछि। लोकगाथाक गायकदत्त रूपक स्थानपर साहित्यकारक संस्करण पाठक धरि पहुँचैत अछि, ताहिसँ लोकनायकक लोकप्रियता बढ़ैत अछि। मुदा मूल गाथाक मौखिक पाठ, भिन्न क्षेत्रीय संस्करण आ गायनपरक सामाजिक परिप्रेक्ष्य पाछाँ छूटबाक संकट बढ़ि सकैत अछि। लेखक एहि द्वन्द्वकेँ महत्त्वपूर्ण ढंगसँ चिन्हैत छथि—मणिपद्मक साहित्यिक प्रस्तुति मूल्यवान अछि, मुदा ओकरा मूल लोकगाथाक निर्विवाद पाठक स्थान नहि देल जा सकैत अछि।

संकलन बनाम पुनर्सृजन

आलेखक कठोरतम आलोचनात्मक प्रश्न यही अछि जे लोकगाथाक अनुसन्धाता मूल गाथा रक्षित करैत छथि कि ओकरा अपन शिल्पमे बदलैत छथि। दुनू काम उपयोगी छथि, मुदा दुनूक उद्देश्य अलग अछि। संकलनमे प्रदर्शनक स्थान, दिनाङ्क, गायकक परिचय, बोली, ध्वनिमुद्रण, गायनक अवसर, कथावैविध्य आ पाठान्तरक दस्तावेजीकरण जरूरी होइत अछि। पुनर्सृजनमे रचनाकारक कल्पना आ सौन्दर्य-बोध प्रधान होइत अछि। एहि भेदकेँ भूललासँ लोकइतिहासक स्रोत आ ललित साहित्यक पाठ एक-दोसराकेँ प्रतिस्थापित कऽ देत।

ग्रन्थकार मणिपद्मक योगदानक ऊँच प्रशंसा करितहुँ मूल गाथा सभक दुर्लभता आ शोध-सामग्रीक प्रकाशनक संकट स्वीकार करैत छथि। एकर कारणेँ अन्तिम आलेख केवल श्रद्धाञ्जलि नहि रहि लोकसाहित्य-अनुसन्धानक ठोस कार्यक्रम सुझबैत अछि। लोकगाथा संग्रहक मूलस्वरूपक प्रकाशन, क्षेत्रीय पाठान्तरक तुलना आ भाषा-रूपक संरक्षण नहि होयत तँ अगिला पीढ़ी लोकजीवनक ऐतिहासिक साक्ष्यसँ वञ्चित रहि सकैत अछि।

जातीय लोकदेवता आ साझा मैथिली संसार

सलहेस, दीना-भदरी आदि लोकनायकक लोकप्रियता अलग-अलग जातीय समूहक स्मृति सँ जुड़ल अछि। लेखक एतय लोकगाथाक सामूहिक पहचान निर्माणक शक्तिकेँ रेखाङ्कित करैत छथि। ई एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक स्थिति थिक; मुदा ‘जातीय समन्वय’क निष्कर्षक संग विविध समुदायक असमान सामाजिक स्थिति, प्रतिरोध आ संघर्षक स्वतन्त्र अध्ययन सेहो अपेक्षित अछि। लोकगाथा केवल समरसताक स्वर नहि, दमनक विरुद्ध जनस्मृतिहुक वाणी भऽ सकैत अछि।

समग्र मूल्याङ्कन

ग्रन्थक समापन एहि आलेखसँ होयब अर्थपूर्ण अछि। पहिल आलेखमे नदीक सांस्कृतिक वन्दना छल; अन्तिम आलेखमे लोकक कण्ठमे बचल भाषिक-सांस्कृतिक स्मृतिक संरक्षणक आह्वान अछि। इतिहासक जड़ वस्तुसँ जीवन्त मौखिक परम्परा धरि ई संग्रह अपन अनुसन्धानक चक्र पूर्ण करैत अछि। मणिपद्मक मूल्याङ्कनक सभसँ मजबूत पक्ष ई अछि जे लेखक रचनात्मक प्रतिभा आ मूलस्रोतक प्रामाणिकता बीच भेद करैत छथि। लोकसाहित्यक शोधमे ई भेद भविष्यक सभ अध्ययन लेल उपयोगी कसौटी अछि।

समेकित आलोचनात्मक निष्कर्ष

१. चौदहो आलेखक साझा अनुसन्धान-प्रवृत्ति

ग्रन्थक चौदह आलेख अलग-अलग विषयपर अछि, मुदा एकटा गहन एकसूत्रता स्पष्ट अछि—मैथिली साहित्यक ज्ञान आ सम्पदाकेँ सुरक्षित राखि ओकर उपयोग सामाजिक परिवर्तन, भाषिक आत्मसम्मान आ सौन्दर्यबोधक विकासमे करब। पहिल छह आलेखमे परम्परा-रक्षा आ आधुनिकता, भक्ति आ सामाजिक सुधार, शास्त्रीय छन्द आ युगीन संवेदना बारम्बार आमने-सोझाँ अबैत अछि। गद्य-विभागमे यात्रा, निबन्ध आ उपन्यासक कथावस्तु मैथिलीक समाजदर्शनक माध्यम बनैत अछि। अन्तिम पाँच आलेख आधुनिक साहित्यिक संस्थाक संरचना पर ध्यान दैत अछि।

एहि दृष्टिसँ ‘चतुर्दश सूत्र’केँ केवल अवसरानुकूल समीक्षासंग्रह कहब ओकरे विविध बौद्धिक उद्देश्यकेँ घटायब होयत। ई संग्रह एकटा विशिष्ट आलोचनात्मक विचारधारा प्रकट करैत अछि, जाहिमे साहित्यक सौन्दर्य समाजसँ कटि नहि सकैत अछि, आ भाषाक विकास केवल श्रेष्ठ कविक रचनासँ नहि, पत्रकारिता, भाषा-अनुसन्धान, पाठ-सम्पादन, विद्यालय, पुस्तकालय आ लोकज्ञानक संरक्षणसँ सेहो निर्धारित होइत अछि।

२. परम्परा आ नवीनताक वास्तविक द्वन्द्व

गंगावन्दना, स्नेहलता, स्वयंप्रभा, मोहन आ जयमन्त मिश्रक काव्यविवेचनमे परम्पराक गहन प्रभाव अछि। तथापि ग्रन्थकार केवल परम्पराक पुनरुक्तिक प्रशंसा नहि करैत छथि। स्वयंप्रभामे दहेज-विरोध, हरिमोहन झाक कथाकाव्यमे अनमेल विवाह आ खाद्य-अखाद्यक व्यंग्य, मोहनमे राष्ट्रीय कर्तव्य, जयमन्त मिश्रमे युगीन असमञ्जस आ गंगावन्दनाक अन्तमे पर्यावरण-प्रश्न—ई सभ देखबैत अछि जे पुरान रूपमे नव सामाजिक अर्थ सम्भव अछि। शिल्पक आधुनिकताकेँ विचारक आधुनिकतासँ अलग जाँचबाक आग्रह संग्रहक एक महत्वपूर्ण आलोचनात्मक उपलब्धि अछि।

३. साहित्यिक समाजदर्शनक शक्ति आ सीमा

हरिमोहन झा, प्रदीप, मायानन्द मिश्र आ विदितजी पर लिखल आलेख सामाजिक समस्या सभक विविध चित्र प्रस्तुत करैत अछि। विवाहक बाजार, नारीक असमान स्थिति, अन्धविश्वास, जातिवाद, पलायन, भाषिक हीनता आ आर्थिक निष्क्रियता साहित्यक पाठमे उपस्थित अछि। लेखक अनेक ठाम समाजोद्धारक आग्रही छथि। किन्तु नैतिक उपदेश आ वास्तविक संस्थागत परिवर्तनक बीच पर्याप्त दूरी अछि। काव्यमे निन्दा करब आ समाजमे समस्या निवारण करब अलग कार्य छथि; एहि भेदकेँ ध्यानमे राखि रचनाक प्रभावक मूल्याङ्कन करबाक चाही।

कखनहुँ लेखकक अनुराग आलोचनात्मक प्रतिवादकेँ सीमित करैत अछि। सन्तकविक पद अथवा भाषा-आन्दोलनक नायकक मूल्याङ्कनमे प्रशंसा अधिक अछि, जखन कि वर्ग, जाति, लिङ्ग, आर्थिक शक्ति आ संस्थागत असफलताक वैकल्पिक पाठ पर अपेक्षाकृत कम विचार भेटैत अछि। मुदा लेखकक स्वयं प्रस्तुत कएल अनेक साक्ष्य वैकल्पिक प्रश्न उठाबय लेल पर्याप्त सामग्री उपलब्ध करबैत अछि। एही कारणेँ पोथी पढ़ब एकटाक निश्चित मत मानि लेब नहि, चर्चा आगाँ बढ़ायब अछि।

४. ‘सजीवनी समालोचना’ आ स्रोतक सम्मान

रामदेव झा सम्बन्धी आलेख एहि पोथीक आलोचनादर्शनक केन्द्रीय रूपक बनैत अछि। ओतए कृति, रचनाकार, परिवेश, प्राचीन पाठक उपलब्धि आ ऐतिहासिक विवाद समेकित रूपमे सोझाँ अबैत अछि। सुभद्र झा सम्बन्धी भाषावैज्ञानिक आलेख आ मणिपद्म सम्बन्धी लोकगाथा आलेख एहि सिद्धान्तकेँ अलग-अलग दिशा सँ समर्थित करैत अछि—कोनो साहित्यक आलोचना ओकर भाषा, अभिलेख आ जीवन्त परम्परासँ कटि नहि सकैत अछि।

तथापि जीवनीक आत्मीयता आ शोधक निष्पक्षता हर समय एक नहि होइत। स्मृतिपरक सूचना, पारिवारिक साक्ष्य, शास्त्रीय उद्धरण, पुरान पाण्डुलिपि आ बादक इतिहासकारक निर्णय प्रमाणक अलग स्तर छथि। भविष्यक पाठालोचनामे ई स्तर स्पष्ट करबाक अनिवार्यता अछि। पुस्तक जखन एहि प्रमाणक चर्चा करैत अछि, तखन ओकर महत्त्व बढ़ैत अछि; जखन ओहि प्रमाणक प्रतिपक्ष नहि देखैत अछि, तखन अनुसन्धानक किछु दरवाजा खुलले रहि जाइत अछि।

५. पत्रकारिता, शब्द, लोकसाहित्य: मैथिलीक सार्वजनिक क्षेत्र

‘स्वदेश’क पत्रकारिता, सुभद्र झाक रूपविज्ञान, जयकान्त मिश्रक साहित्येतिहास आ मणिपद्मक लोकसाहित्यक अध्ययन अलग-अलग उपविषय नहि, भाषा-सार्वजनिकताक चारु आधार मानल जा सकैत अछि। ‘स्वदेश’ मैथिलीकेँ रोजक समाचार देबाक भाषा बनबैत अछि; भाषाविज्ञान ओकर स्वतन्त्र संरचना प्रकट करैत अछि; साहित्येतिहास ओकर कालगत स्मृति बनबैत अछि; लोकगाथा ओकर जनसमुदायक अनौपचारिक ज्ञानक निधि अछि। एहि चतुष्कोणसँ संग्रहक गहनतम बौद्धिक विचार उभरैत अछि—भाषा तखने समृद्ध होइत अछि जखन ओकरा साहित्य लिखबाक संगहि अध्ययन, संचार, शिक्षण आ लोकस्मृति संरक्षित करबाक साधन भेटैत अछि।

६. भाषाशैली, सन्दर्भ आ सम्पादकीय परीक्षण

ग्रन्थकारक मैथिलीमे संस्कृतनिष्ठ आलोचनात्मक शब्दावली, दीर्घ वाक्य, परम्परित ‘विवेचन–विश्लेषण–मूल्याङ्कन’क संरचना आ मूल उद्धरणक नियमित उपयोग भेटैत अछि। शास्त्रीय काव्यविवेचनमे ई शैली सहज कार्य करैत अछि; गद्य आ लोकसाहित्यक विवेचनमे अनेक स्थानपर स्पष्ट कथासार आ बोलचालक उदाहरण एकरा सुगम बनबैत अछि। मुदा अतिविस्तृत नामावली वा कथासारक कारणेँ कखनो समालोचनाक मूल प्रश्न ओझरा जाइत अछि। एहन स्थानपर उपशीर्षक, प्रमाणक सारणी, मूलस्रोत-सूची आ तुलनात्मक निष्कर्ष अधिक उपयोगी होइत।

चतुर्दश सूत्रक प्रकाशकीय विवरणमे मूल्य ३०० टाका, जखन कि पछिला आवरणपर ४०० टाका अंकित अछि। ई मुद्रित मूल्य-सूचनाक अन्तर ग्रन्थसूची तैयार करैत काल ध्यान देबाक योग्य अछि; एकर कारण निश्चित करबाक पर्याप्त प्रकाशकीय सूचना नहि भेटैत अछि।

७. एकर बाद करबाक यथार्थपरक अनुसन्धान

‘चतुर्दश सूत्र’केँ भविष्यक शोध लेल उपयोगी बनाबय हेतु किछु ठोस कार्यक्षेत्र स्वतः प्रकट होइत अछि। कविताक सन्दर्भमे मूल पदक पाठ-सम्पादन, पाठभेद आ छन्दक तुलनात्मक गणना चाही। गद्यक सन्दर्भमे ‘श्यामली’ आ ‘पथचारी’क सम्भावित सम्बन्धक पुस्तक-दर-पुस्तक परीक्षण, ‘ग्राम–गणराज्य’क सत्रहो उल्लासक कथन-रचना आ समकालीन सामाजिक आँकड़ासँ तुलना उपयुक्त होयत। मायानन्द मिश्रक विकीर्ण निबन्ध, ‘स्वदेश’क मूल अङ्क आ रामदेव झाक सम्पादित दुर्लभ गीत-नाटकक डिजिटल अभिलेखन अत्यन्त उपयोगी कार्य अछि। लोकगाथा-अनुसन्धानमे गायनक ध्वनिमुद्रण, क्षेत्र, प्रदर्शनक काल, गायक-परिचय, पाठान्तर आ साहित्यिक पुनर्सृजनक अलग-अलग संस्करण सुरक्षित करब चाही।

ई प्रस्ताव सभ वर्तमान अध्ययनमे कएल गेल सत्यापित कार्यक दावास्वरूप नहि, मूल पोथी पढ़लापर निकलल अनुसन्धानक सम्भावना रूपमे प्रस्तुत अछि।

अन्तिम मूल्याङ्कन

‘चतुर्दश सूत्र’क सभसँ महत्वपूर्ण उपलब्धि ई अछि जे ई मैथिलीकेँ केवल भावनात्मक मातृभाषाक रूपमे नहि, समृद्ध साहित्यिक विधा, सामाजिक आलोचना, वैज्ञानिक भाषा-अध्ययन, संस्थागत साहित्येतिहास आ मौखिक लोकज्ञानक विराट परिसरमे पढ़ैत अछि। लेखक पुरान आ नवक बीच वैमनस्य नहि, संवाद चाहैत छथि। परम्परित काव्यक सामाजिक अर्थ निकालैत, आधुनिक कथा-गद्यक नैतिक संघर्ष देखैत आ भाषा-संरक्षणक व्यावहारिक प्रश्न उठबैत ई संग्रह आलोचनाक व्यापक सम्भावना प्रमाणित करैत अछि।

एहि कृतिक उपलब्धिक संगहि एकर आलोचनात्मक सीमा देखब सेहो आवश्यक अछि। इतिहासक व्यापक कथन, व्यक्तित्वक प्रशंसात्मक निर्णय आ स्रोतक परोक्ष उल्लेख सर्वत्र एके स्तरक प्रमाण नहि रखैत अछि। किछु आलेखमे कथासारक विस्तार विश्लेषणक स्थान घेरि लैत अछि। ताहि लेल पोथीकेँ अन्तिम, निर्विवाद इतिहास मानब उचित नहि; ओकरा आधारसामग्रीसँ सम्पन्न, बहुविध प्रश्न उठबयवला आलोचनात्मक ग्रन्थ मानब अधिक न्यायसंगत अछि।

समग्र निष्कर्षमे कहल जा सकैत अछि जे डॉ. योगानन्द झाक ई संग्रह मैथिली साहित्यिक अनुसन्धानक एक व्यापक मानचित्र अछि। एकर चौदहो आलेखकेँ अलग-अलग सन्दर्भमे पढ़लासँ कृति-विशेषक महत्त्व भेटैत अछि; एकठाम पढ़लासँ मैथिली भाषा-साहित्यक पाठ, प्रमाण, समाज, इतिहास आ लोकपरम्पराक आन्तरिक एकता स्पष्ट भऽ उठैत अछि। ई एकता—आ ओकर भीतर लुकायल मतभेद—पोथीक स्थायी समीक्षात्मक मूल्य थिक।

पुस्तकक अध्ययनाधार

ग्रन्थसूची

प्रमुख समीक्षित ग्रन्थ

01. झा, योगानन्द। लोकजीवन ओ लोकसाहित्य। प्रथम संस्करण १९८६; द्वितीय संस्करण २०१८। शेखर प्रकाशन, पटना।

02. झा, रामदेव (सम्पादक); झा, योगानन्द (सहायक सम्पादक)। संकल्प, अङ्क ५ : विद्यापति-स्मृति-पर्व-समारोहक स्मारिका। समारोह १९८८; आयोजन ४–६ फरवरी १९८९। संकल्पलोक, लहेरियासराय, दरभंगा।

03. झा, योगानन्द। आलेख सञ्चयन। प्रथम संस्करण २००२। मिथिला रिसर्च सोसाइटी, कबिलपुर–लहेरियासराय, दरभंगा।

04. झा, योगानन्द (सम्पादक)। मैथिली शाक्त साहित्य (शास्त्रीय भगवती गीत)। द्वितीय संस्करण २००२। उर्वशी प्रकाशन, पटना।

05. झा, योगानन्द। मैथिली पत्रकारिता के सौ वर्ष। प्रथम संस्करण २००६।

06. झा, योगानन्द (संकलन–सम्पादन)। गहबर गीत। प्रथम संस्करण २००७। मिथिला रिसर्च सोसाइटी, कबिलपुर–लहेरियासराय, दरभंगा।

07. झा, योगानन्द। लोक, साहित्य ओ शब्द-सम्पदा। प्रथम संस्करण २००७; द्वितीय संस्करण (पेपरबैक) २०२४। शशि प्रकाशन, सुपौल। ISBN 978-93-92691-35-5।

08. झा, योगानन्द। मैथिलीक पारम्परिक जातीय व्यवसायिक शब्दावली। प्रथम संस्करण २००९। मिथिला रिसर्च सोसाइटी, दरभंगा।

09. झा, योगानन्द। कथा–लोककथा। प्रथम संस्करण २०१०। मिथिला रिसर्च सोसाइटी, कबिलपुर–लहेरियासराय, दरभंगा।

10. ठाकुर, कपिलदेव ‘स्नेहलता’ (मूल कवि); झा, योगानन्द (संकलन–सम्पादन)। सीतावतरण (प्रबन्धकाव्य)। प्रथम संस्करण २०११। लोक कला संस्कृति संस्थान, विदेहनगर–डरोड़ी, समस्तीपुर।

11. गाँधी, मोहनदास करमचन्द (मूल लेखक); झा, योगानन्द (मैथिली अनुवाद)। मंगल-प्रभात। प्रथम संस्करण २०१३। मिथिला रिसर्च सोसाइटी, दरभंगा।

12. कीर्तिवर्द्धन, ए. (मूल हिन्दी लेखक); झा, योगानन्द (मैथिली अनुवाद)। भोरे-भोर। प्रथम संस्करण २०१४। विद्यालक्ष्मी प्रकाशन, मुजफ्फरनगर।

13. झा, योगानन्द। चतुर्दश सूत्र। प्रथम संस्करण २०२३। शशि प्रकाशन, सुपौल। ISBN 978-93-92691-34-8।

सम्बद्ध मुद्रित ग्रन्थ

01. मिश्र, चन्द्रनाथ ‘अमर’। मैथिली पत्रकारिताक इतिहास। १९८१। मैथिली अकादमी, पटना।

02. Gandhi, M. K. From Yeravda Mandir: Ashram Observances. Translated from Gujarati by Valji Govindji Desai. 1932. Navajivan Trust, Ahmedabad.

03. Jha, Pankaj. A Political History of Literature: Vidyapati and the Fifteenth Century. Oxford University Press, New Delhi, 2019. Print ISBN 9780199489558.

04. Hemachandra. The Deśīnāmamālā of Hemachandra. Second edition, edited by R. Pischel; introduction and glossary by P. V. Ramanujaswami. Bhandarkar Oriental Research Institute, Poona, 1938.

मैथिली पत्रकारिता के सौ वर्षक २००६क संस्करणक प्रकाशक-नाम उपलब्ध प्रकाशन-विवरणसँ सुनिश्चित नहि भेल अछि; तेँ अप्रमाणित प्रकाशक-नाम नहि जोड़ल गेल अछि।