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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

VIDEHA · प्रथम मैथिली पाक्षिक eJournal

नबोनारायण मिश्र समग्र

नित नवल आशीष अनचिन्हार · Videha अंक ४५२ · 15 October 2026

लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख

खण्ड १

सम्पादन, साहित्यिक स्मृति आ बहुविध इतिहास

मैथिली साहित्यक पुनर्पाठ

साहित्य, आन्दोलन आ स्मृतिक संगम

सन्दर्भ-पोथी : नबोनारायण मिश्र समग्र • सम्पादक : आशीष अनचिन्हार • २०२६

सारांश

नबोनारायण मिश्रक साहित्यकेँ एकटा विधाक सीमामे राखि कऽ बुझब सम्भव नहि अछि। हुनक रचना-संसारमे साक्षात्कार, संस्थागत इतिहास, व्यक्तिचित्र, संस्मरण, कथा, व्यङ्ग्य, उत्सवगीत, शोककविता आ भाषिक अधिकारक पक्षधर कविता एक-दोसराक सङ संवाद करैत अछि। आशीष अनचिन्हार सम्पादित «नबोनारायण मिश्र समग्र» एहि बिखरल रचनाकेँ एक ठाम आनैत अछि आ आधुनिक मैथिली साहित्यक ओहि श्रमशील आधारकेँ दृश्य बनबैत अछि जे केवल नामी रचनाकार, पुरस्कार आ प्रकाशित स्वतंत्र पोथीक गणनासँ पकड़मे नहि अबैत अछि। संकलनक विशेष महत्त्व कोलकाताक मैथिली आन्दोलन, पत्र-पत्रिका, सांस्कृतिक संस्था आ कोकिल मञ्चक रङ्गकर्मक अभिलेखीकरणमे अछि।

एहि शोधमे समग्रक साक्षात्कार, आलेख, कथा आ पद्यकेँ अलग-अलग परखल गेल अछि। साक्षात्कारसभमे भाषिक अधिकारक आन्दोलनक जीवन्त साक्ष्य, आलेखसभमे संस्थागत स्मृतिक संरक्षण, कथामे पारिवारिक सम्बन्ध, दहेज, परोपकार, प्रवास आ नैतिक विडम्बना, आ कवितामे सामुदायिक चेतना आ निजी चोटक स्वर भेटैत अछि। एकर साहित्यिक उपलब्धि सङ्गहि सीमा सेहो अछि: कतहु आदर्शोन्मुख समाधान कथाक बहुस्तरीयता घटबैत अछि; कतहु प्रशंसात्मक व्यक्तिचित्र आलोचनात्मक दूरी कम करैत अछि; कतहु कविता प्रत्यक्ष वक्तव्यक अधीन भऽ जाइत अछि। तथापि ई समग्र साहित्यक सामाजिक आधार, मञ्चीय श्रम आ ऐतिहासिक स्मृतिपर विचार करबाक लेल एक महत्त्वपूर्ण प्राथमिक ग्रन्थ अछि।

बीजशब्द : नबोनारायण मिश्र; आशीष अनचिन्हार; मैथिली गद्य; कोलकाता; कोकिल मञ्च; साक्षात्कार; मैथिली आन्दोलन; लोकस्मृति; मैथिली कथा; साहित्येतिहास।

प्रस्तावना : साहित्यक इतिहासमे अदृश्य श्रमक प्रश्न

साहित्यक इतिहास प्रायः रचनाकारक नाम, प्रकाशित कृतिक सूची, साहित्यिक प्रवृत्ति आ पुरस्कारक क्रममे लिखल जाइत अछि। मुदा भाषा-साहित्यक जीवन केवल रचनाक पाठमे नहि, रचनाकेँ सम्भव बनबयवला समाजमे सेहो विद्यमान रहैत अछि। जे गोटे सभागार बुक करैत अछि, मंच बनबैत अछि, कलाकार जुटबैत अछि, निमन्त्रण पहुँचबैत अछि, हस्तलिखित सामग्री बचबैत अछि, पत्रिकाक ग्राहक बनबैत अछि आ आन्दोलनेर रस्ता धरैत अछि, ओकर योगदान बिनु साहित्यक प्रसारक कथा अपूर्ण रहैत अछि। नबोनारायण मिश्रक साहित्य एहने अदृश्य श्रमक ऐतिहासिक उपस्थिति थिक।

नबोनारायण मिश्र केवल कथाकार वा कवि नहि, बल्कि मैथिली सार्वजनिक जीवनक सहभागी, अनुभव-लेखक आ सांस्कृतिक साक्षी छथि। सम्पादकक भूमिकामे स्पष्ट कएल गेल अछि जे हुनक पहिल प्रकाशित रचना १९७७ मे आएल आ दशकसभक अन्तरालपर हुनकर रचनासभ २०२६ मे एकत्र भेल। ई दीर्घ अन्तराल हुनकर साहित्यिक उपेक्षाक अकेल प्रमाण नहि, मुदा एहि प्रश्नकेँ अनिवार्य बनबैत अछि जे प्रकाशनक संस्थागत साधन आ मान्यताक वितरण कोन-कोन रचनाकारकेँ दृश्य बनबैत रहल।

एहि पोथीक ‘समग्र’ पदकेँ आक्षरिक पूर्णताक दावाक रूपमे नहि, प्राप्त सामग्रीक एक ऐतिहासिक संरक्षण-यत्नक रूपमे देखब उचित अछि। सम्पादक स्वयं संकेत करैत छथि जे रचनासभक क्रम, प्रकाशन-विवरण आ उपलब्धतामे अन्तर अछि आ आगू सामग्री जुड़ि सकैत अछि। एहि ईमानदार स्वीकारसँ पोथीक महत्त्व घटैत नहि; उलटे एकर पाठ-इतिहासक जटिलता स्पष्ट होइत अछि।

रचना-संरचना आ आलोचनात्मक दृष्टि

समग्रमे तीनटा साक्षात्कार, पन्द्रहटा आलेख, एगारहटा कथा आ उन्नैसटा पद्य-रचना संकलित अछि। एहि चतुष्पदी संरचनामे साक्षात्कार ऐतिहासिक आवाजकेँ, आलेख संस्मरणात्मक आ संस्थागत व्याख्याकेँ, कथा सामाजिक प्रसङ्गकेँ, आ कविता भावात्मक तथा प्रतिवादी अभिव्यक्तिकेँ उपस्थित करैत अछि। भिन्न-भिन्न विधा होयबो पर सबहक आन्तरिक सूत्र अछि—मैथिली भाषाप्रति निष्ठा, लोकक आपसी जिम्मेवारी आ मानवीय व्यवहारक नैतिक परीक्षा।

आलोचनाक लेल तीन स्तर उपयोगी अछि। पहिल, प्रत्येक रचनाक भीतर कथ्य, दृश्य, पात्र आ शिल्पक सम्बन्ध; दोसर, समान विषयक भिन्न विधामे अभिव्यक्ति; तेसर, मैथिली साहित्येतिहासक ओहि प्रचलित रूपसँ तुलना जाहिमे महान रचनाकार प्रधान आ संगठनक कार्यकर्ता गौण रहैत छथि। एहि तीनू स्तरक भेद बनौने रहने समग्रक साहित्यिक आ ऐतिहासिक मूल्य एक-दोसरामे बिलीन नहि होइत अछि।

साक्षात्कार : मौखिक इतिहास आ भाषिक सार्वजनिकता

तीनू साक्षात्कारक विषय क्रमशः किशोरीकान्त मिश्र, रामलोचन ठाकुर आ डॉ. वीरेन्द्र मल्लिक छथि। प्रश्नोत्तरक रूपक कारणे ई सामग्री लेखकक एकाकी विचार नहि, संवादमे उभरैत बहु-स्वरक दस्तावेज अछि। प्रश्नकर्ताक चयनित प्रश्न सेहो महत्त्वपूर्ण अछि: कोलकाता आगमन, संस्था, सम्पादन, रङ्गमञ्च, आन्दोलन, पत्रिका, युवा पीढ़ी, भाषाक अधिकार आ व्यक्तिगत अनुभव। एहिसँ नबोनारायण मिश्रक सांस्कृतिक प्राथमिकता स्पष्ट होइत अछि।

किशोरीकान्त मिश्रसँ बातचीत : भाषा, शिक्षा आ मुद्रण-संस्कृति

किशोरीकान्त मिश्रक स्मृतिमे मातृभाषाप्रति आकर्षण विद्यालयी वाद-विवादक अनुभवसँ सम्बद्ध अछि। कोलकातामे मिथिला सांस्कृतिक परिषद्सँ जुड़नाइ व्यक्तिगत रुचिकेँ संस्थागत अभियानमे बदलैत अछि। विशेष महत्त्वक बात अछि पत्रिका-प्रकाशनक व्यावहारिक श्रम आ वर्तनीक एकरूपताक चिन्ता। ओहि अनुभवमे मिथिला मिहिर आ मुद्रण-व्यवस्था मात्र तकनीकी प्रसङ्ग नहि, भाषिक मानकीकरणक प्रश्न बनैत अछि।

विद्यापतिक स्मारक-छविक निर्माण, डाक-टिकटक अभियान आ जनगणनामे मैथिली लिखबाक आग्रहसँ स्पष्ट होइत अछि जे भाषा-आन्दोलन साहित्यिक प्रतिष्ठा, प्रतीक-निर्माण आ जनसांख्यिक उपस्थिति—तीनू स्तरपर चलैत रहल। तथापि साक्षात्कारमे व्यक्त ऐतिहासिक दावासभकेँ अन्तिम निर्णीत तथ्य मानि लेब उचित नहि; ओ सहभागी व्यक्तिक स्मृति छथि, जिनक समीक्षा अन्य स्वतंत्र दस्तावेजसँ होएबाक चाही।

रामलोचन ठाकुरसँ बातचीत : आन्दोलन, सम्पादन आ रङ्गमञ्चक त्रिकोण

रामलोचन ठाकुरक उत्तरसभ मैथिली सार्वजनिक जीवनक संस्थागत जाल उद्घाटित करैत अछि। मैथिली मुक्तिमोर्चा, पत्रिका सम्पादन, नाटकक अनुवाद, कविता, आन्दोलनक आयोजन आ नव रचनाकारक प्रोत्साहन—ई सभ अलग-अलग गतिविधि नहि, भाषा-संस्कृतिक एक संयुक्त रणनीति जकाँ उभरैत अछि। प्रकाशनक अभावमे सामूहिक रचनापाठ आ बैसारक महत्त्वक चर्चा साहित्यिक लोकतन्त्रक मूल प्रश्न उठबैत अछि।

एहि साक्षात्कारक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष ई अछि जे साहित्यक इतिहास रचनाक मुद्रित सूची मात्र नहि रहैत; ‘सम्पर्क’ सन बैसार, पत्रिकाक अल्पजीविता, छद्मनामसँ लिखब आ सहयोगी सम्पादन सेहो रचनात्मक संस्कृतिक आधार मानल जाइत अछि। एहि संग अन्तर्विरोध सेहो देखाइत अछि: व्यक्तिगत स्मृति कतेक स्पष्ट, आ संस्थागत तिथि-कथा कतेक विशिष्ट, ताहि लेल शोधमे समकालीन पत्रिका आ आयोजन-विवरणक तुलनात्मक परीक्षण आवश्यक अछि।

डॉ. वीरेन्द्र मल्लिकसँ बातचीत : आलोचना, संचार आ पीढ़ीगत संक्रमण

वीरेन्द्र मल्लिकसँ संवाद साहित्यकारक बौद्धिक आत्मस्थितिक प्रश्न उठबैत अछि। साहित्यक विकास, रङ्गमञ्चक क्षेत्र, रचनाशील समुदाय आ बदलैत परिवेशपर हुनक विचारकेँ नबोनारायण मिश्र व्यापक ऐतिहासिक प्रसङ्गमे रखैत छथि। ई सामग्री विशिष्ट लेखकक आत्मवृत्तान्तसँ आगाँ बढ़ि मैथिली साहित्यिक जगतक परस्पर सम्बन्ध स्पष्ट करैत अछि।

तीनू साक्षात्कारमे प्रश्नकर्ता कतहु आलोचकसँ अधिक सांस्कृतिक आयोजक जकाँ देखाइत छथि। ई कमजोरी आ शक्ति दुनू अछि: निकटताक कारणे भरोसा आ दुर्लभ सूचना भेटैत अछि, मुदा प्रतिप्रश्नक कठोरता सदा समान नहि रहैत अछि। शोधार्थीकेँ एहि द्वैध स्थितिक ध्यान रखनाइ चाही।

आलेख : कोलकाताक जीवित सांस्कृतिक अभिलेख

आलेखखण्ड समग्रक ऐतिहासिक मेरुदण्ड अछि। पन्द्रहटा रचनामे स्मृतिचित्र, व्यक्तित्व-परिचय, संस्थागत लेखाजोखा, पत्रिका-इतिहास, लोककथापर विचार, आत्मस्मरण आ नाट्य-दस्तावेज सभ उपस्थित अछि। नबोनारायण मिश्रक गद्यक मूल प्रवृत्ति बिखरल अनुभवकेँ सामाजिक उपयोगक योग्य स्मृतिमे बदलनाइ अछि। एहि सन्दर्भमे लेखकक ‘हम’ आत्मप्रदर्शनक प्रतीक नहि, बहुतो ठाम सामूहिक अनुभवक प्रवेशद्वार बनैत अछि।

रामलोचन ठाकुर : व्यक्तित्वसँ सामाजिक परम्परा धरि

‘हमरा नजरिमे : श्री रामलोचन ठाकुर’ आ ‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’ केँ संग पढ़लासँ व्यक्तिचित्रक दू रूप देखाइत अछि। पहिलमे साहित्यकार, सम्पादक आ आन्दोलनकारी रामलोचनक सार्वजनिक उपलब्धिपर बल अछि; दोसरमे दीर्घ संस्मरणक माध्यमसँ मित्रता, संवाद, संगठन आ वियोगक निजी आयाम प्रमुख भऽ उठैत अछि। एकही व्यक्तिक चारूकात विद्यमान संस्थासभक कथा धीरे-धीरे व्यक्तिनिष्ठ शोकक कथा बनैत अछि।

एहिमे आलोचनात्मक प्रश्न अछि जे रामलोचनक साहित्यिक रचनाक औपचारिक विवेचन अपेक्षाकृत कम, हुनक अभियानक प्रशंसात्मक विवरण अधिक अछि। मुदा एहि प्रवृत्तिकेँ पूर्णतः असाहित्यिक नहि कहि सकैत छी, कारण मैथिली आन्दोलनीय लेखनमे व्यक्तित्व-निर्माण स्वयं एक सांस्कृतिक क्रिया रहल अछि। आवश्यकता एतबे अछि जे श्रद्धा आ ऐतिहासिक परीक्षणकेँ पृथक राखल जाय।

राजनन्दन लाल दास : पत्रिका, संस्थागत नेतृत्व आ श्रेयक राजनीति

‘युगपुरुष श्री राजनन्दन लाल दास’ आ ‘युगप्रवर्तक राजनन्दन लाल दास’ व्यक्तित्वकेँ साहित्यिक पत्रकारिताक इतिहाससँ जोड़ैत अछि। ‘आखर’, ‘कर्णामृत’, कर्णगोष्ठी आ मैथिली सांस्कृतिक गतिविधिक उल्लेखसँ प्रकाशन-श्रमक निरन्तरता उद्घाटित होइत अछि। एतय लेखकक प्रमुख आग्रह साहित्यक विकासमे पत्रिकाक आयोजन, सम्पादकीय निर्भीकता आ सामुदायिक संरक्षणकेँ उचित स्थान देबाक अछि।

दूनू आलेखक पुनरावृत्तिमे आलोचक लेल एक प्रश्न सेहो अछि—संक्षिप्त श्रद्धाञ्जलि आ विस्तृत परिचयक बीच तथ्यक अन्तर, समान दावाक दोहरान आ स्मृतिजन्य मूल्याङ्कनक मानदण्ड कतेक स्पष्ट अछि? एहि प्रश्नकेँ नकारलासँ लेखकक ऐतिहासिक प्रयत्न बुझब कठिन भऽ जाएत।

प्रबोध बाबू आ लक्ष्मण झा ‘सागर’ : बौद्धिक स्नेहक स्मृतिशास्त्र

‘मिथिला-मैथिलीक प्रबल पक्षधर : प्रो. प्रबोध बाबू’ मे सार्वजनिक योगदान आ व्यक्तिगत सान्निध्यक मेल अछि। लेखक केवल प्राप्त उपलब्धि नहि गनबैत छथि; भेट, अधूर इच्छा, निधन आ अपूरित सांस्कृतिक सम्भावनाक मार्मिक स्थितिक स्मरण करैत छथि। यस्मिन्न बौद्धिक जीवनक मूल्यक एक पक्ष भावनात्मक आ नैतिक बनि उठैत अछि।

‘सर्वगुण सम्पन्न सागरजी’ व्यक्तित्व-चित्रणमे संवादी स्नेह आ मध्यस्थताक प्रसङ्ग विशेष उल्लेखनीय अछि। प्रसिद्ध व्यक्तिक गुणगान करैत लेखक अपन विनम्र उपस्थितिकेँ सेहो दर्ज करैत छथि। एहि शैलीक मूल्य एहि बातमे अछि जे साहित्यिक समुदाय केवल विचारक एकमततासँ नहि, मनमुटाव सुलझेबाक दैनिक प्रयत्नसँ बनैत अछि।

मिथिला विकास परिषद् : संस्थागत सहकार आ प्रतिस्पर्धा

‘मिथिला विकास परिषद्, कोलकाता : जेना हम देखल’ मे संस्थागत एकता आ पारस्परिक अविश्वासक कथा भेटैत अछि। लेखक संस्था-विशेषक उपलब्धि स्वीकार करैत छथि, मुदा विभिन्न संस्थाक बीच उत्पन्न दूरीक आलोचनासँ नहि बचैत छथि। ई आलेख आन्दोलनक इतिहासकेँ केवल गौरवकथासँ बचबैत अछि: संस्था बनब तऽ उपलब्धि अछि, मुदा व्यक्तिक अहं, गुटबन्दी आ कार्यक्रमक बहिष्कार ओकर सामुदायिक लाभ कम कऽ सकैत अछि।

एहि प्रसङ्गक विशेषता ई अछि जे लेखक अपन सम्बद्ध कोकिल मञ्चक स्थितिकेँ सेहो सामने आनैत छथि। तैं ई रचना ऐतिहासिक तथ्यक संग आत्मस्थितिक दस्तावेज अछि, जाहिमे पक्षधरता स्पष्ट रहितो आत्मालोचनाक अवसर बनैत अछि।

पीताम्बर पाठक आ बाबू साहेब चौधरी : भाषा-आन्दोलनक मानवीय चेहरा

‘मैथिली आन्दोलनक नायक : पीताम्बर पाठक’ संस्थागत गतिविधिक पछाँ निरन्तर काज करनिहार व्यक्तिक चरित्रक स्मरण करैत अछि। लेखक नवतुरिया लोककेँ जोड़ब, उत्तराधिकारी तैयार करब आ सामूहिक कार्य-संस्कृतिक चर्चा करैत छथि। स्मृतिमे अचानक निधनक प्रसङ्ग एकर भावात्मक अन्त बनैत अछि, जाहिसँ सार्वजनिक इतिहास निजी क्षतिक अनुभव धरि पहुँचैत अछि।

‘प्रसङ्ग : बाबू साहेब चौधरीक’ भाषिक आन्दोलनक सांस्कृतिक मनोविज्ञानकेँ खोलैत अछि। मैथिली गीत, डहकन, स्त्रीकण्ठ, रंगमञ्च आ मातृभाषाक घरेलू जीवनसँ सम्बन्धक चर्चा भाषाक संरक्षणकेँ केवल सरकारी मान्यतापर निर्भर नहि रखैत। यद्यपि लोकस्त्रीकेँ परम्पराक एकमात्र रक्षक बुझनाइ प्रश्नातीत नहि, तथापि मौखिक संस्कृतिक चिन्ता एहि गद्यक मूल्यवान पक्ष अछि।

कलकत्ताक मैथिली आन्दोलन आ मिथिला दर्शन : पत्रिकाक जनपथ

‘कलकत्ताक मैथिली आन्दोलन आ मिथिला दर्शन’ प्रवासी नगरमे भाषा-संघर्षक जीवित इतिहास चित्रित करैत अछि। पत्रिकाक माध्यमसँ साहित्यकार, कार्यकर्ता, शिक्षक आ प्रवासी समुदाय जुड़ैत छथि। प्रकाशित सामग्रीक विधागत वैविध्य—भाषाविज्ञान, कथा, कविता, एकाङ्की, नाटक—एकटा पत्रिकाकेँ सामूहिक बौद्धिक मंचक रूपमे देखबयवला महत्त्वपूर्ण साक्ष्य अछि।

एहि लेखमे अनेक नाम आ प्रकाशनक प्रसङ्ग एकत्र अछि। ई सूचना-सघनता उपयोगी रहलो पर प्रसङ्गक्रम सदिखन व्यवस्थित नहि; शोधमे सूचीकेँ समकालीन अंकक अनुक्रमसँ मिला देखबाक प्रयोजन बचैत अछि। साहित्यिक पत्रकारिताक इतिहास लेल एहि रचनाक महत्त्व ‘दावा’ मात्र नहि, जाँचल जा सकय योग्य शोधसूत्र प्रदान करब अछि।

‘स्मृति आखर’ : आत्मवृत्तान्तक भीतर रङ्गमञ्च

‘स्मृति आखर’ मे गामक अभिनय-प्रयाससँ महानगरीय मंच धरि जएबाक सांस्कृतिक यात्रा अछि। संस्था कोना बनल, कलाकार कोना जुड़ल, महिलाक मंचीय सहभागिता केना विकसित भेल, प्रशिक्षण आ निर्देशनक श्रम कोना बँटल—एहन प्रसङ्गसँ रङ्गकर्मक सामाजिक आधार प्रत्यक्ष होइत अछि। गङ्गा झाक निर्देशन आ किरण झा तथा अन्य कलाकारक सक्रियताक उल्लेख सामूहिक रंगमञ्चक प्रश्नकेँ केन्द्रमे आनैत अछि।

रचनामे स्वयं लेखकक संस्थागत जिम्मेदारीक विवरण सेहो अछि। एतय आत्मस्मरणक आलोचनात्मक महत्त्व एहि कारण अछि जे लेखक रंगमञ्चक केवल दर्शक नहि, संस्थाक संचालनक सहभागी छथि। मुदा एहि निकटताक कारणे उपलब्धिक विवरणक संग असफलता, दर्शक-वर्ग, रंगभाषा आ मञ्च-प्रयोगपर अतिरिक्त विवेचन अपेक्षित रहि जाइत अछि।

‘मैथिली लोककथा’ : लोकसाहित्यक संरक्षण आ सीमा

‘मैथिली लोककथा’ मे लेखक मौखिक परम्पराक व्यापकता आ प्रकाशित संकलनक अल्पताक बीच दूरी रेखांकित करैत छथि। मौखिक कथा सामाजिक आ पीढ़ीगत स्मृति संचरित करैत अछि, मुदा लिखित संग्रह बिनु ओकर प्रसार सीमित भऽ सकैत अछि। मैथिलीमे लोककथा-संकलनक उपलब्ध उदाहरणक चर्चा संग्रहणक संस्थागत प्रश्न बनैत अछि।

तथापि लोककथा केवल सुरक्षित करबाक वस्तु नहि; कथनक परिस्थिति, कथावाचकक सामाजिक स्थिति, बोलीभेद, स्त्री-पुरुष दृष्टि आ कथाक परिवर्तित रूप सेहो अध्ययनक विषय अछि। समग्रक ई आलेख संग्रहणक आवश्यकता ठीक प्रकारें चिन्हैत अछि, मुदा लोककथाक शक्ति-सम्बन्ध आ रूपभेदपर आगू शोधक प्रचुर सम्भावना छोड़ैत अछि।

‘मिथिला मिहिर आ सम्पादकजी’ : मुद्रित सार्वजनिकताक सौन्दर्य

‘मिथिला मिहिर आ सम्पादकजी’ मे साहित्यिक पत्रकारिता, सम्पादकक व्यक्ति-प्रभाव आ भाषाक मानकीकरणक इतिहास एकत्र होइत अछि। लेखकक ध्यान पत्रिकामे विकसित कथा, उपन्यास, नाटक आ विचारक व्यापक लोकपर अछि। सुबोध गद्यक भीतर इतिहासक अभावक पीड़ा सेहो अछि—नियमित पत्रिकाक छूटल अङ्क, बिखरल योगदान आ सम्पादकीय अनुशासनक प्रश्न।

एहि लेखकेँ किशोरीकान्त मिश्रक साक्षात्कारसँ संग पढ़लासँ स्पष्ट होइत अछि जे वर्तनीक एकरूपता मात्र भाषाशास्त्रीय निर्णय नहि, मुद्रणक श्रम आ सम्पादकीय व्यवहारसँ निर्मित सार्वजनिक अनुबन्ध अछि। एहि दिशामे समग्रक योगदान मौलिक अछि।

‘अनन्य मैथिली हितैषी अजय सिंह’ : स्नेह, शोक आ सार्वजनिकता

अजय सिंहपर केन्द्रित लेखमे व्यक्तिगत परिचयकेँ सामुदायिक कर्मक मूल्याङ्कनसँ जोड़ल गेल अछि। कोविडकालीन मृत्यु आ सांस्कृतिक संस्थाक ह्रासक प्रसङ्ग एक पीढ़ीक अवसानक बोध करबैत अछि। एहने श्रद्धाञ्जलि-पाठ भविष्यक शोधार्थीक लेल सांस्कृतिक सम्बन्धक धागा बचा सकैत अछि, यद्यपि घटना, तिथि आ योगदानक स्वतंत्र पुष्टि ऐतिहासिक अध्ययनक लेल अलग जरूरी रहैत अछि।

‘मैथिली रङ्गमञ्च आ कोलकाता’ : प्रदर्शनक सूचीसँ रंग-इतिहास धरि

ई आलेख समग्रक एकटा आधारभूत दस्तावेजी उपलब्धि अछि। रंगकर्मी, नाटककार, अनुवाद, प्रस्तुति, सभागार आ निर्देशनक क्रम एकत्र करबाक प्रयास मैथिली नाट्यसाहित्यकेँ केवल लिखित नाटकक इतिहाससँ बाहर निकालैत अछि। कोकिल मञ्चसँ जुड़ल प्रस्तुति-विवरणसँ रङ्गमञ्चक सामाजिक जीवन, आयोजनक्षमता आ प्रवासी नगरक सांस्कृतिक भूगोलक अध्ययन सम्भव भऽ सकैत अछि।

एहि सूचीमे विवरणसँ उपलब्ध तारीख आ नाम शोध-सूत्रक रूपमे बहुमूल्य छथि; मुदा एकरा स्वतः सत्यापित कालक्रमक पूर्ण विकल्प नहि बनाओल जाय। नाटकक प्रस्तुति केहन छल, स्त्री-पात्रक अभिनयमे की परिवर्तन भेल, दर्शक कोन वर्गसँ छल, टिकट-व्यवस्था आ नाट्याभ्यासक स्वरूप की छल—एहि प्रश्नक व्यवस्थित उत्तर एहि आलेखसँ पूर्णतः नहि भेटैत अछि। तइयो सूचीकरणक एहि कार्यकेँ साहित्येतिहासमे योग्य स्थान देबाक आवश्यकता अछि।

कथा-खण्डक पृथक पाठविश्लेषण

समग्रक कथा-लेखनमे ग्रामीण जीवन, प्रवासक कठिनाई, परिवारक हित-अहित, विवाहक सामाजिक बन्धन, धन आ श्रमक नैतिकता, सार्वजनिक भाषिक चेतना आ व्यङ्ग्य उपस्थित अछि। बहुतो कथाक अन्तमे नैतिक निष्कर्ष स्पष्ट रहैत अछि; कतहु अन्तिम दृश्य पाठककेँ स्वयं अर्थनिर्माणक अवसर दैत अछि। कथासभक आन्तरिक भिन्नताकेँ सुरक्षित राखि पढ़ल जाए, नहि तँ पूरा कथा-जगत ‘उपदेशात्मक’ कहि कऽ सरल बना देल जाएत।

‘एहनो होइत छै’ : हास्यक दृश्य-रचना

मोहनजीक पहिल सिनेमाघर-यात्रा एहि लघुकथाक विषय अछि। अन्हारमे कुर्सीक आसन नहि खसाएलाक कारणे ओ कुर्सीक बाँहिपर झूलल रहैत छथि; इन्टरवलक उजासमे भ्रमक कारण उद्घाटित होइत अछि। हास्य मुख्यतः शब्दचमत्कारसँ नहि, दृश्यगत विलम्ब आ पाठकक अपूर्ण सूचनासँ पैदा होइत अछि। शीर्षकक अर्थ अन्तमे उलटि जाइत अछि।

एहि कथामे आधुनिक मनोरञ्जनक स्थल आ ग्रामीण अनुभवक अन्तर हलुक व्यङ्ग्यमे उपस्थित अछि। कथाकार पात्रकेँ अपमानित करबाक बजाय ओकर अज्ञानकेँ सामाजिक अनुभवमे बदलैत छथि। संक्षिप्तता, समयबद्ध उद्घाटन आ विनोदी संवाद एकर सफलता अछि।

‘एकटा पाकल आम’ : नेनाक नैतिक दृष्टि

एकटा पाँच वर्षक बालक अपन हिस्सा भेटल आमकेँ पितियौत भाइसँ बाँटबाक आग्रह करैत अछि, जखन पिता अलग गृहस्थी आ अधिक सुविधा पएबाक तर्क दैत छथि। बालकक सहज सहानुभूति बड़काक विभाजनपरक यथार्थवादकेँ प्रश्नांकित करैत अछि। आम एतय केवल खाद्य वस्तु नहि, संयुक्त परिवारक भीतर न्याय आ सहभागिताक प्रतीक अछि।

कथाक विशेष गुण ई अछि जे नैतिक विवादक केन्द्र बच्चाक अनुभव बनैत अछि, न कि कथाकारक उपदेश। तथापि पिताक पक्षकेँ बड़ सहज स्वार्थक रूपमे देखाओल गेल अछि; आर्थिक विवशताक जटिलता कथामे कम खुलैत अछि। लघुकथा रूपमे ई संकुचन एकर प्रभाव बढ़बैत सेहो अछि।

‘यात्राक फेरी’ : प्रवासी जीवनक विनोदी संकट

नोकरीक दबाव, बंगाल बन्दसँ बनल छुट्टीक संयोग, घरक स्मृति, रात्रिक यात्रा, बरसात, असुरक्षा, गामक सामाजिक अपेक्षा आ कार्यालयमे अनुपस्थितिक भय—ई सभ यात्रा-वृत्तान्तक कथामे एकसाथ चलैत अछि। कथा एकटा सीमित छुट्टीकेँ अनन्त दायित्वमे बदलैत अछि। परिवारक आह्वान पात्रकेँ खींचैत अछि, मुदा संस्थागत रोजगार ओकरा बान्हने रहैत अछि।

एहि रचनाक औपचारिक समस्या विस्तार अछि; अनेक प्रसङ्ग रोचक रहितो कथाक तनावकेँ कखनो-कखनो बिखेरैत अछि। फेरो घटनाक क्रम, पत्नी-संवादक पूर्वानुमान, रास्ताक बाधा आ बरियातीमे अटकब, प्रवासक मानसिक विभाजनक प्रामाणिक बोध उत्पन्न करैत अछि। एतय हास्य जीविका आ सम्बन्धक बीच असम्भव चयनसँ उपजैत अछि।

‘कालचक्र’ : उत्तराधिकार, सम्पत्ति आ परिश्रम

पिता-विहीन बालक उपेन्द्रक जीवनमे दायादक सम्पत्ति-लोलुपता, परिवारक संकट, अध्ययन आ कठिन परिश्रमक माध्यमसँ आगाँ बढ़बाक कथा अछि। बालकक निर्बल सामाजिक अवस्थाकेँ आत्मनिर्माणक प्रसङ्गमे बदलल गेल अछि। दायादक चरित्र आ सम्पत्तिपर अधिकारक विवाद मिथिलाक ग्रामीण सामाजिक इतिहासक महत्त्वपूर्ण सूत्र अछि।

कथाक अन्तमे पात्रक आर्थिक-सामाजिक प्रतिष्ठा दृढ़ बनैत अछि। एहि संरचनामे नैतिक प्रतिपूर्ति स्पष्ट अछि; संघर्षक बहुस्तरीय सत्ता-समीक्षा अपेक्षाकृत सीमित रहैत अछि। मुदा श्रम आ शिक्षाकेँ वंशगत सम्पत्तिसँ बेसी महत्त्व देबाक आग्रह समकालीन सामाजिक परिवर्तनक संवेदनशील संकेत अछि।

‘आदर्श विवाह’ : दहेजक बाजार आ युवा प्रतिरोध

धनाढ्य नारायण बाबू अपन बेटीक विवाहमे कएल खर्चक ‘वसूली’ पुत्रक विवाहसँ करबाक मानसिकता राखैत छथि। कन्यागतसँ सहमतिक बाद बाँचल धन नहि भेटलापर विवाह रोकबाक निर्णय लैत छथि। एही निर्णायक क्षणमे बेटा राजन पिता-सत्ताक विरोध करैत अछि, लेन-देनक धन लौटबैत अछि आ दहेज-विहीन विवाहक आग्रह करैत अछि।

ई कथा सामाजिक कुप्रथाक विरोधमे नाटकीय सार्वजनिक वक्तव्यक उपयोग करैत अछि। ताकत एहि बातमे अछि जे प्रतिरोध घरक भीतरसँ उठैत अछि; सीमा एहि बातमे जे दहेजक जटिल सामाजिक संरचनाकेँ एक सजग युवकक नैतिक साहससँ तुरन्त निराकृत देखाओल गेल अछि। परन्तु कथाक समयसन्दर्भमे दहेजक सामान्यीकरणक विरुद्ध एहन दृश्यक सार्वजनिक महत्त्व अस्वीकार नहि कएल जा सकैत अछि।

‘परोपकारक फल’ : विडम्बना आ नैतिक दृढ़ता

हरीबाबूक परोपकारक लाभ लैनिहार लोक हुनके विरुद्ध षड्यन्त्र रचैत अछि; हिंसक डकैतीक परिणाममे हुनक बेटा विनयक मृत्यु भऽ जाइत अछि। परिवार सहयोग बन्द करबाक सलाह दैत अछि, मुदा हरीबाबू परोपकारक प्रतिज्ञासँ नहि हटैत छथि। शीर्षक उपकारक सामान्य फलप्राप्तिक अपेक्षाकेँ दुःखद विडम्बनामे बदलैत अछि।

एहि कथाक गूढ़ प्रश्न ई अछि जे न्यायविहीन समाजमे सद्गुणक अभ्यास केना सम्भव अछि। कथाकार हरीबाबूक नैतिक जिदकेँ मानवताक सर्वोच्च मूल्यक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि। आलोचनात्मक दृष्टिएँ हिंसा आ परोपकारक बीच सम्बन्धक राजनीतिक-आर्थिक विवेचन कम अछि; दुष्ट पात्रसभ सामाजिक प्रकारमे सिमटि जाइत छथि। तथापि दुःखान्त निष्कर्ष कथाकेँ मात्र सुगम उपदेशक स्तरसँ ऊपर उठबैत अछि।

‘करोड़पतिक कर्मठता’ : उपहासक उलट अर्थ

दिल्लीक मैथिलबहुल क्षेत्रमे जलक लाइनपर उठल विवादसँ एक दम्पतीक नामपर उपहास जुड़ैत अछि। उपहासमे कहल गेल ‘करोड़पति’ बादमे पात्रक परिश्रमसँ वास्तविक उपलब्धिक संकेत बनैत अछि। कथा नगरजीवनक संसाधन-अभाव, सार्वजनिक अनुशासन आ सामाजिक नामकरणक विनोदक उपयोग करैत अछि।

एकर कमजोरी ई अछि जे पत्नीक व्यवहारकेँ लिंगगत सामान्यीकरणक सहारे व्याख्यायित कएल गेल अछि आ श्रमसँ आर्थिक चमत्कार धरि पहुँचबाक अन्तिम वक्र अपेक्षाकृत सरलीकृत अछि। किन्तु सामाजिक खिल्लीकेँ आर्थिक उन्नतिक प्रतीक बनाबयवला रूपान्तरण मनोरञ्जक अछि।

‘मैथिलीक मर्यादा’ : गाँवक सार्वजनिक पठन-संस्कृति

टेलिफोन-संवादपर आधारित ई लघु रचना ग्रामीण सार्वजनिक स्थल—सैलून, चाय-दोकान, पुस्तकालय—केँ भाषा-साहित्यक प्रचारक केन्द्रक रूपमे कल्पित करैत अछि। पात्र बतबैत अछि जे मैथिली पत्रिका नगरमे मात्र नहि, गामक सामुदायिक बैसारमे सेहो उपस्थित रहि सकैत अछि। एहि कथाक सार सरकारी मान्यता नहि, पाठकक निर्माण अछि।

कथात्मक तनाव बहुत कम अछि; ई लगभग भाषिक संकल्पक दृश्य बनि जाइत अछि। मुदा एहि संक्षिप्त संवादमे मैथिली आधुनिक सार्वजनिकताक एक लोकतान्त्रिक सपना निहित अछि—साहित्य केवल शिक्षित विशिष्ट वर्गक सम्पत्ति नहि रहय।

‘सुन्दर-संयोग’ : विवाह-आयोजन, सहयोग आ संयोग

लम्बा कथात्मक विन्यासमे परिवारक विवाह-संयोजन, नौकरीसँ छुट्टीक संकट, गाम-अनुभव, रिश्तेदारीक आग्रह, आर्थिक व्यवस्था आ बरियातीक अनिश्चितता एक-दोसराकेँ घेरैत अछि। अप्रत्याशित परिस्थिति अन्तमे नव रिश्ताक सम्भावना खोलैत अछि। कथा पारिवारिक जीवनक अदृश्य संगठनात्मक श्रमक विस्तृत चित्र अछि।

एहि लेखनमे छोट-छोट व्यवहारक जीवित विवरण अमूल्य अछि—ककरा सूचित करब, ककरा आग्रह करब, काज कोन सम्हारत, समधी पक्षक अपेक्षा केना पूरा करब। जखन ई सभ बहुत विस्तार पाबैत अछि, कथानकक केन्द्र शिथिल भऽ सकैत अछि। कथा आ आत्मसंस्मरणक सीमा एहि रचनामे जानि-बुझि धुँधला होइत बुझाइत अछि।

‘युगधर्म’ : घूरक आगि आ रिश्ताक शीतलता

प्रचण्ड जाड़, गाँवक घूर, सामूहिक बातचीत आ लालबिहारीक पारिवारिक उपेक्षा—एहि कथाक रचनात्मक विन्यास विशेष सफल अछि। बाहर आगिक ताप अछि, मुदा परिवारक भीतर कृतघ्नताक शीतलता। जेठ भाइक द्वारा भाइसभक शिक्षा-व्यवस्था आ जीवननिर्माणमे देल त्यागक बदला उपेक्षा भेटैत अछि।

बड़का दलानक सामूहिक दृश्य कथाक नैतिक संघर्षकेँ स्थानीय संवेदनामे मूर्त करैत अछि। अन्तिम मौन कथामे अनेक व्याख्याक अवसर छोड़ैत अछि; ई खुलापन लेखकक अपेक्षाकृत परिपक्व कथाशिल्पक उदाहरण अछि। सामाजिक हितक भाषा एतय कथाकारक टिप्पणीसँ बेसी दृश्य आ मौनक माध्यमसँ निर्मित होइत अछि।

‘घमण्डक फल’ : स्थानीय शक्ति आ सामाजिक प्रतिशोध

बच्चीबाबूक आर्थिक प्रभुत्व आ अपमानजनक व्यवहार हुनका सामाजिक रूपे अलग करैत अछि। मामूली विवाद न्यायालयी संघर्षमे बदलैत अछि आ समाजसँ समर्थन नहि भेटलापर हुनकर शक्ति क्षीण होइत अछि। कथाक नामहि अन्तक नैतिक दिशा सूचित करैत अछि।

ई रचना संक्षिप्त दृष्टान्तक निकट अछि: घमण्डक दण्ड। समाजक सामूहिक प्रतिशोध स्वयं केतबा न्यायसंगत अछि, एकर परीक्षण कथामे अधिक नहि अछि। तइयो धनबल आ सामाजिक प्रतिष्ठाक अन्तर स्पष्ट करबाक शक्ति एहि लघु कथामे अछि।

पद्यक पृथक विवेचन : गीत, शोक आ प्रतिरोध

समग्रक पद्यरचना बहुविध अछि। कतहु मुक्त-लयक सार्वजनिक वक्तव्य, कतहु दोहराइत टेकवला गीत, कतहु स्मृतिगीत, कतहु भगवती-आराधना, कतहु होलीक हास्य-विनोद भेटैत अछि। एखनक समीक्षात्मक कसौटीपर एकर समग्रकेँ ‘श्रेष्ठ काव्य’ वा ‘केवल प्रचारगीत’—कोनो एक नाम देब ठीक नहि। रचनाक उपलब्धि ओकर विषय, लय, भाषिक ऊर्जा आ सामुदायिक प्रयोजनक अलग-अलग परीक्षणसँ खुलैत अछि।

‘नव वर्षक सन्दर्भमे’ आ ‘अनन्त यात्राक यात्री’ : वियोगक सार्वजनिक मुद्रा

प्रथम प्रकाशित रचनाक रूपमे चिह्नित ‘नव वर्षक सन्दर्भमे’ मे नववर्षक सामूहिक उल्लासक पृष्ठभूमिपर दिवङ्गत ललितबाबूक स्मरण अछि। समयक नव आरम्भ आ व्यक्तिक अनुपस्थितिक टकराहट कविताक मूल भाव-तनाव बनबैत अछि। ‘अनन्त यात्राक यात्री’ मे यात्री-नागार्जुनक सृजन-स्मृति आ सामाजिक प्रतिष्ठाक प्रश्न एकत्र होइत अछि।

दूनू कवितामे निधन मात्र निजी शोक नहि, सांस्कृतिक ह्रासक अनुभूति अछि। तथापि कतिपय स्थलपर गुणगानक प्रत्यक्ष कथन काव्यात्मक रूपकक विकासकेँ सीमित करैत अछि। एहि सीमा बीच ऐतिहासिक संवेदना महत्त्वपूर्ण रहैत अछि।

‘पृथ्वीक भार’, ‘ई कीर्तिमान बनल’ आ ‘विडम्बना’ : आलोचनात्मक लोकस्वर

‘पृथ्वीक भार’ साहित्यिक संस्थाक अल्पायु, स्वार्थपरता आ कृतघ्नताक विरुद्ध आक्रोश दर्ज करैत अछि। ‘ई कीर्तिमान बनल’ सार्वजनिक सफलता आ श्रेय-लोलुपताक विचित्र सहअस्तित्वकेँ उजागर करैत अछि। ‘विडम्बना’ सामाजिक-राजनीतिक प्रसङ्गमे आलोचनात्मक भावकेँ तीव्र करैत अछि। एहि तीनू मे कविताक वक्ता समुदायसँ बाहरक निरीक्षक नहि; भीतरसँ आहत सहभागी छथि।

एहि रचनासभक काव्य-भाषा घोषणात्मक अछि। प्रत्यक्ष सम्बोधन आ प्रश्नवाचक लय वक्तव्यकेँ सार्वजनिक पाठक उपयुक्त बनबैत अछि, मुदा विशिष्ट बिम्बक सघनता हर ठाम नहि भेटैत अछि। लेखकक आक्रोशक ऐतिहासिक मूल्य आ एकर सौन्दर्यात्मक सीमा दुनू स्वीकार करब आवश्यक अछि।

‘नवगीत’ : भ्रष्टाचार-विरोधक टेक

‘नवगीत’ मे पुनरावृत्त टेक जन-उच्चारणक स्वर बनबैत अछि; नेता-अफसरक भ्रष्टाचार, महँगाई, असमान वितरण आ सामान्य लोकक विवशता विषय बनैत अछि। सम्पादकीय टिप्पणीमे एहि रचनाक गीतात्मक वर्गीकरणक प्रश्न सेहो उठल अछि। एहि प्रसङ्गसँ एक महत्त्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट अछि: छन्दनाम आ विधानाम अपने-आप काव्य-रूपक प्रमाण नहि; रचनाक अन्तर्लय, टेक, आवृत्ति आ प्रस्तुति-क्षमता देखबाक चाही।

‘फगुआ’, ‘कनियाँ महारानीक आरती’ आ ‘फगुआक प्रेमोपहार’ : उत्सवक बहुवचन

‘फगुआ’ मे ऋतु, रङ्ग, भोजन, संगीत आ सामुदायिक मेलक दृश्य अछि। ‘कनियाँ महारानीक आरती’ मे धार्मिक आरतीक भंगिमा घरेलू प्रेम आ उत्सवी विनोदमे रूपान्तरित होइत अछि; धार्मिक शब्दावलीक लोक-हास्यात्मक प्रयोग ओकर प्रमुख कलात्मक युक्ति अछि। ‘फगुआक प्रेमोपहार’ विशिष्ट व्यक्तिसभ लेल लिखल लघु संबोधनक शृंखला अछि, जाहिमे उत्सवक अवसर सामाजिक सम्बन्धक दर्जाक माध्यम बनैत अछि।

एहि रचनासभक मूल्य केवल उच्च काव्यात्मक कसौटीपर नहि, मैथिली सार्वजनिक संस्कृतिक जीवित प्रयोगमे सेहो अछि। विशेषतः प्रेमोपहारक नामावली कोलकाताक सामाजिक जालक एक छोट अभिलेखक रूपमे देखल जा सकैत अछि।

‘एकटा साहित्यिक दीप’, ‘श्रद्धाञ्जलि’ आ ‘शोक गीत’ : स्मृति-संरक्षणक काव्य

एहि कवितासभमे श्रद्धाञ्जलि मात्र भावुकता नहि, दिवङ्गत साहित्यसेवीक काजक सूची आ समाजक ऋणस्वीकार अछि। ‘एकटा साहित्यिक दीप’ मे दीपकक परम्परागत प्रतीक साहित्यिक साधनाक निरन्तरता व्यक्त करैत अछि। ‘श्रद्धाञ्जलि’ मे नामक अक्षरानुसार विन्यास शोकक औपचारिक शिल्प बनैत अछि। ‘शोक गीत’ सांस्कृतिक प्रतीक, आयोजन आ मैथिलीकेँ मान्यता दिलेबाक अभियानक स्मृति जोड़ैत अछि।

एहि रचनासभमे संस्मरणात्मक जानकारी आ भावात्मक आवेगक मेल उपयोगी अछि, किन्तु काव्यक स्वायत्तता कतहु तथ्य-उल्लेखक भारसँ दबि जाइत अछि। एखनक पाठक लेल ई कवितासभ एकसाथ साहित्य आ स्मृतिलेख छथि।

‘भगवती-वन्दना’क दू रूप : लोकभक्ति आ आत्मपरीक्षण

दू अलग स्थानपर संकलित भगवती-वन्दनामे शरणागतिक विन्यास, पापक आत्मस्वीकार, दुःखक अभिव्यक्ति आ मातृदेवीक प्रति भरोसाक स्वर अछि। एहिमे परम्परागत भक्तिकाव्यक भाषा अपन आधुनिक सामाजिक आ निजी व्यग्रताकेँ स्थान दैत अछि। दोहराइत सम्बोधन श्रोता-केंद्रित लय बनबैत अछि।

एहि कविता-द्वयक साहित्यिक महत्त्व मौलिक दार्शनिक सिद्धान्तमे नहि, भावक स्थानीय अनुकूलनमे अछि। निजी कातरता आ देवीक सार्वजनिक छविक बीच कविता लोकधार्मिक संवेदनाक सेतु बनैत अछि।

‘किछु लोक’, ‘ई नञि उचित विचार’ आ ‘मैथिलीक उक्ति : सन्तानक प्रति’ : असहमतिक कविता

‘किछु लोक’ मे विश्वशान्ति आ हिंसाक प्रश्न उठैत अछि; ‘ई नञि उचित विचार’ मे साहित्यिक-वैचारिक मतभेदक प्रत्यक्ष सम्बोधन अछि; ‘मैथिलीक उक्ति : सन्तानक प्रति’ मे मातृभाषा स्वयं आवाज पाबि अपन सन्तानकेँ प्रश्न करैत अछि। अन्तिम रचनामे भाषा-मानवीकरण विशेष प्रभावी शिल्पक सम्भावना खोलैत अछि।

एहि तीनू रचनामे सामुदायिक विवेककेँ जगायबाक दृढ़ आग्रह अछि। तथापि समसामयिक राजनीतिक कथनकेँ कविता मानि लेबाक बदला कवितात्मक जटिलता, विडम्बना आ अन्तरस्वरक कसौटीपर परखब जरूरी अछि। लेखकक निष्ठा निर्विवाद, मुदा निष्ठा स्वयं शिल्पक विकल्प नहि।

‘स्वीकार करू प्रेमालिङ्गन’ आ ‘मैथिली-महोत्सव’ : अलग-अलग सार्वजनिक क्षण

‘स्वीकार करू प्रेमालिङ्गन’ वसन्तक सौन्दर्य, घरेलू प्रणय आ फगुआक अवसरकेँ मिलबैत अछि। एकर अन्तर्गत अलग शीर्षक-प्रयोगक सम्पादकीय संकेत पाठपरम्पराक रुचिकर समस्या अछि: एक रचना भिन्न नामसँ प्रसारित होइत रहल हो सकैत अछि। ‘मैथिली-महोत्सव’ संविधानमे मैथिलीकेँ स्थान भेटबाक सामुदायिक उत्साहकेँ गीतक रूप दैत अछि।

पहिल कविता निजी आकर्षणक लोकशैली अछि, दोसर सार्वजनिक उपलब्धिक अभिनन्दनगीत। दुनूमे सरल टेक-आधारित भाषाक कारणे सामूहिक पाठक सुविधा अछि। तुलना करैत स्पष्ट होइत अछि जे लेखकक कविता निजी आ सामुदायिक दुनू समारोहमे स्थान लैत अछि।

काव्यशास्त्रीय आ आख्यानशास्त्रीय समेकित परीक्षण

नबोनारायण मिश्रक कथामे कथानक प्रायः व्यक्ति-आचरणक नैतिक फलतक पहुँचैत अछि। ‘एकटा पाकल आम’ मे बालकक भावनात्मक प्रश्न, ‘आदर्श विवाह’ मे सार्वजनिक प्रतिरोध आ ‘घमण्डक फल’ मे दण्ड-सिद्धि एक तरहक नैतिक परिणतिक तीन अलग मॉडल छथि। एहि तुलनामे ‘युगधर्म’ अपेक्षाकृत गम्भीर काव्यात्मक उपलब्धि अछि, कारण प्रकृति-वर्णन, स्थान-रचना आ पात्रक मौन मिलि जे अर्थ बनबैत अछि, से सुस्पष्ट उपदेशसँ अधिक बहुअर्थी अछि।

रसक दृष्टिएँ विनोद, करुणा, आक्रोश आ भक्ति उपस्थित अछि। ‘एहनो होइत छै’क हास्य उलटप्रकाशपर, ‘परोपकारक फल’क करुणा नैतिक दृढ़तापर, ‘कनियाँ महारानीक आरती’क हास्य परम्परागत आरतीक रूपान्तरणपर आ ‘युगधर्म’क करुणा विपरीत ताप-बिम्बपर आधारित अछि। ध्वनिक दृष्टिएँ सर्वाधिक प्रभाव ताहि क्षणमे अछि जतय लेखक निष्कर्षकेँ कहब नहि, दृश्यकेँ कार्य करबाक अवसर दैत छथि।

कथा-भाषामे संवादक मैथिलीय सहजता, सामाजिक सम्बोधन आ घरेलू व्यवहारक विवरण प्रमाणिकता उत्पन्न करैत अछि। मुदा लेखकक व्याख्यात्मक वाक्य अनेक ठाम पात्रक स्वतन्त्रता सीमित करैत अछि। अन्तिम नैतिक टिप्पणी घटैत तँ ई कथासभमे रहल विडम्बना अधिक गाढ़ भऽ सकैत छल। कवितामे गीतक लय कएक ठाम अपेक्षाकृत स्वाभाविक अछि, मुक्तछन्दमे वक्तव्यक दबाव अधिक देखाइत अछि।

स्त्री-पात्रक दृष्टिसँ मूल्याङ्कन करैत द्वन्द्व अछि। एक दिस बालक द्वारा पितृक विभाजन-विरोध, दहेजक विरुद्ध युवकक प्रतिरोध आ मंचक महिलाक सक्रियताक उल्लेख प्रगतिशील सम्भावना खोलैत अछि; दोसर दिस कतिपय कथामे पत्नीकेँ झगड़ालू वा घरेलू दबावक प्रतीक रूपमे सीमित कएल गेल अछि। ई विरोधाभास लेखकक रचनाप्रक्रियामे परम्परा आ सुधारवादी नैतिकताक सहअस्तित्व स्पष्ट करैत अछि।

मैथिली साहित्यक इतिहाससँ तुलनात्मक विवेचन

मैथिली साहित्यक इतिहासक एक प्रबल प्रवाह विद्यापति, ज्योतिरीश्वर, आधुनिक गद्यक विकास, यात्री-नागार्जुन, हरिमोहन झा, राजकमल चौधरी आ नव साहित्यिक आन्दोलनसभक माध्यमसँ लिखल जाइत अछि। एहि इतिहासक केन्द्र रचनाक भाषा-शिल्प आ लेखकक वैचारिक नवान्वेषण रहैत अछि। नबोनारायण मिश्र एहि परम्परामे केवल एक नव रचनाकार नहि जोड़ैत छथि; ओ इतिहासक प्रश्न बदलि दैत छथि—साहित्यकेँ जीवित रखनिहार संस्था, प्रदर्शन, सम्पादक, पुस्तक-वितरण आ पाठकवर्गक भूमिका केतबा अछि?

कथाशिल्पक तुलनामे हरिमोहन झाक सामाजिक विनोद अधिक सतत मनोवैज्ञानिक व्यङ्ग्यक परिचय दैत अछि, जखन नबोनारायणक ‘एहनो होइत छै’ दृश्यगत भूलपर अवलम्बित लघु हास्य अछि। यात्री-नागार्जुनक जनधर्मी कवितामे भाषा आ व्यङ्ग्यक बहुअर्थकता तीव्र देखल जाइत अछि, जखन नबोनारायणक राजनीतिक कविता प्रायः तात्कालिक सार्वजनिक घोषणाक नजदीक रहैत अछि। ई तुलना प्रभाव वा अनुकरणक दावा नहि, रूपविधानक अन्तर बुझबाक आलोचनात्मक उपक्रम अछि।

महेन्द्र मलंगिया आ मैथिली रंगपरम्परामे नाट्यलेखनक अर्थ स्वतन्त्र शिल्प-सृजन अछि; कोकिल मञ्चक प्रसङ्गमे नबोनारायणक महत्त्व लिखित नाटकसँ आगाँ मंचन, संगठन आ दर्शक-समाजक निर्माणमे अछि। एकरा कमतर योगदान कहब साहित्येतिहासक एकांगी दृष्टि होयत। ‘मंच पर की खेलल गेल’ आ ‘मंच सम्भव कोना भेल’—दूनू प्रश्न बराबर आवश्यक छथि।

मैथिली साहित्यक प्रवासी भूगोलमे कोलकाता विशिष्ट केन्द्रक रूपमे उभरैत अछि। एहि नगरमे रोजगार, मुद्रण, उच्चशिक्षा, संस्था, पुस्तक-वितरण, आन्दोलन आ रंगमञ्चक सम्बन्ध मैथिली साहित्यक सार्वजनिक आकार बनबैत अछि। नबोनारायणक गद्य शहरकेँ केवल प्रवासक पीड़ा नहि, सांस्कृतिक श्रमिक आ सृजनात्मक सम्भावनाक केन्द्रक रूपमे देखबैत अछि। एहि आधारपर हुनकर संग्रह ‘मैथिली साहित्य’ आ ‘मैथिली आन्दोलन’क कृत्रिम विभाजन प्रश्नांकित करैत अछि।

विदेहक समानान्तर साहित्येतिहासक उपक्रममे उपेक्षित रचनाकार, लघु पत्रिका, लोकसाहित्य, रङ्गमञ्च आ भाषिक विविधताक अध्ययनकेँ महत्व देल जाइत अछि। एहि आलोचनात्मक रूपरेखाक संग समग्रक प्राकृतिक संवाद अछि, किन्तु दूनूकेँ तादात्म्य मानल जाय से उचित नहि। ऐतिहासिक साक्ष्य, पाठ-स्वरूप आ सामाजिक प्रतिनिधित्वक मानदण्डपर प्रत्येक दावाक पुनः परीक्षण आवश्यक अछि।

साहित्यिक पत्रकारिता, संस्था आ इतिहासलेखनक प्रमाण-संरचना

समग्रमे ‘मिथिला मिहिर’, ‘मिथिला दर्शन’, ‘आखर’, ‘कर्णामृत’ आ अन्य पत्रिका मात्र शीर्षक रूपमे नहि, सामुदायिक स्मृतिसंस्थाक रूपमे आओत अछि। पत्रिकाक प्रकाशनक निरन्तरता, सम्पादकक परिश्रम, अंकक सामग्री आ पाठक-निर्माण मिलि भाषा आन्दोलनक अवयव बनैत अछि। जे साहित्यिक इतिहास छपल महान पोथी मात्र पढ़ैत अछि, ओ पत्रिकाक ई योगदान छीन लैत अछि।

तथापि ऐतिहासिक अनुशीलनमे विभिन्न प्रमाणकेँ एकसमान दर्जा नहि देब उचित: स्वयं लेखकक प्रत्यक्ष सहभागिता, साक्षात्कारदाताक स्मृति, संपादकक परिचय, कार्यक्रमक विवरण आ बादक स्मरण—सभक विश्वसनीयताक स्वरूप अलग अछि। एहि संग्रहक उपयोग करैत काल कालक्रम, वैकल्पिक स्मृति आ वास्तविक प्रकाशनक अस्तित्वक पृथक पुष्टि करबाक चाही। एहि सावधानीसँ संग्रहक महत्त्व कम नहि होइत; प्रमाणक श्रेणी अधिक स्पष्ट होइत अछि।

संस्थागत इतिहासक आलोचनात्मक पाठमे सामाजिक समावेशनक प्रश्न सेहो आवश्यक अछि। कोन कलाकारक नाम बार-बार आएल? स्त्री-अभिनेत्री, तकनीकी सहयोगी, स्वैच्छिक आयोजक, दलित-पिछड़ा समूह आ सामान्य दर्शकमे के कतेक दृश्य अछि? जे सामग्री नामोल्लेख करैत अछि, ओहि सामग्रीक मौन क्षेत्र सेहो इतिहासक विषय अछि। एहि दृष्टिएँ समग्र भविष्यक सामाजिक-सांस्कृतिक शोध लेल प्रेरक काज करैत अछि।

सम्पादनक उपलब्धि आ पाठगत सावधानी

आशीष अनचिन्हारक सम्पादकीय श्रमक सर्वाधिक महत्त्व बिखरल सामग्रीक संरक्षण अछि। व्यक्तिगत लेख, स्मृतिग्रन्थ, पत्रिका, साक्षात्कार, पुरान प्रकाशन आ अप्रचुर उपलब्ध सामग्री एक संग भेटनाइ पाठक आ शोधार्थीक लेल बड़ी सुविधा अछि। सम्पादक भूमिकामे ई स्वीकार सेहो करैत छथि जे सामग्रीक मूल प्रकाशन-सूचना सर्वत्र समान रूपे उपलब्ध नहि आ भविष्यत् रचना जुड़ब सम्भव अछि।

समालोचनात्मक संस्करणक अगिला चरणमे रचनाक प्रथम प्रकाशन-वर्ष, पत्रिकाक अङ्क, मूल शीर्षकक पाठभेद, लेखन-तिथि आ पुनर्प्रकाशनक जानकारी एकरूप ढंगसँ जुटाओल जाय। भिन्न शीर्षक अन्तर्गत उपलब्ध समान कविताक सम्बन्ध, रचनाक क्रम, एकहि प्रसङ्गक अनेक वृत्तान्त आ संस्थागत तिथिक भिन्न साक्ष्यक तुलनात्मक निबन्धन विशेष उपयोगी होयत।

एहि समीक्षामे शब्दशः उद्धरणक अपेक्षा पात्र, घटनाक्रम, साक्षात्कार-विषय आ विचारक सन्दर्भसिद्ध विवेचन अपनाओल गेल अछि। उपलब्ध रचनासभक पाठरूप सर्वत्र समान रूपे स्थिर नहि रहलासँ असन्दिग्ध मूल शब्दावलीक पूर्ण निश्चय बिना प्रत्यक्ष उद्धरण प्रस्तुत नहि कएल गेल अछि। एहि संयमक उद्देश्य इतिहासक विश्वसनीयता सुरक्षित रखब अछि।

समग्र मूल्याङ्कन : उपलब्धि, सीमा आ भविष्यक सम्भावना

नबोनारायण मिश्रक साहित्यिक उपलब्धिक तीन प्रमुख स्तर अछि। पहिल, मैथिली सांस्कृतिक संस्थाक श्रम आ कार्यक्रमक इतिहासकेँ शब्द देब; दोसर, लघु कथा आ सामाजिक प्रसङ्गमे नैतिक विरोधाभासक प्रभावी स्थितिसभ निर्माण करब; तेसर, कविता आ गीतक माध्यमसँ भाषिक आ सामुदायिक भावनाकेँ स्वर देब। एहि तीनूमे सबसँ विशिष्ट स्थान आलेख आ साक्षात्कारक अछि, कारण ओतय लेखकक प्रत्यक्ष सहभागिता ओहि संसारक उपेक्षित इतिहास खोलैत अछि।

कथा-खण्डमे ‘एकटा पाकल आम’क संक्षिप्त नैतिक प्रश्न, ‘एहनो होइत छै’क हँसी, ‘आदर्श विवाह’क प्रतिरोध, ‘परोपकारक फल’क दुःखान्त जिद आ ‘युगधर्म’क मौन विशेष ध्यान खींचैत अछि। ‘यात्राक फेरी’ आ ‘सुन्दर-संयोग’ मे जीवनानुभवक विस्तार रोचक अछि, मुदा कथाशिल्पक कसाव कम पड़ैत अछि। पद्यक तीव्र सार्वजनिकता ऐतिहासिक साक्ष्यक रूपमे प्रभावी अछि; काव्यरूपक जटिलता सभ ठाम समान नहि।

समग्रक वैचारिक सीमा मुख्यतः नीतिपरक सहज समाधान, श्रद्धाभावक अतिक्रमण आ सामाजिक सम्बन्धक कतिपय पारम्परिक रूढ़ रूपरेखामे देखाइत अछि। लेखकक विचारमे प्रबल मातृभाषा-निष्ठा अछि, मुदा साहित्यिक असहमति, वैकल्पिक दृष्टि आ हाशियाक अनुभूतिक लेल अधिक स्थान होइत तँ चित्र आरो व्यापक बनित। एहि आलोचनाक उद्देश्य अवमूल्यन नहि, योगदानक सही रूपरेखा बनायब अछि।

अन्ततः ‘नबोनारायण मिश्र समग्र’ एकटा लेखकक स्वतंत्र साहित्यिक मापकसँ बेशी मैथिली भाषिक सार्वजनिक जीवनक सामूहिक आत्मकथाक अंश अछि। मैथिली साहित्येतिहास जखन शहरक मंच, संस्थाक बैठक, पत्रिकाक सम्पादक, अघोषित श्रमिक, गाँवक पाठक, लोककथा आ भाषिक आन्दोलनक आपसी सम्बन्धमे लिखल जाएत, तखन एहि संग्रहक वास्तविक मूल्य स्पष्ट होयत। ई पोथी अतीतक स्थिर स्मारक नहि, भविष्यक शोधक प्रश्नावली सेहो अछि।

विस्तृत सन्दर्भसूची

मिश्र, नबोनारायण। नबोनारायण मिश्र समग्र। सम्पादक : आशीष अनचिन्हार। मैथिली, २०२६। एहि शोधक मूल आधारग्रन्थ।

अनचिन्हार, आशीष। ‘यात्रा : एक एहन लेखक केर जिनका लेखक बनबाक लोल नहि छन्हि’। नबोनारायण मिश्र समग्रमेक सम्पादकीय भूमिका, २०२६।

मिश्र, नबोनारायण। ‘किशोरीकान्त मिश्रसँ साक्षात्कार’; ‘रामलोचन ठाकुरसँ साक्षात्कार’; ‘डॉ. वीरेन्द्र मल्लिकसँ साक्षात्कार’। नबोनारायण मिश्र समग्र, सम्पादक : आशीष अनचिन्हार, २०२६।

मिश्र, नबोनारायण। ‘हमरा नजरिमे : श्री रामलोचन ठाकुर’; ‘युगपुरुष श्री राजनन्दन लाल दास’; ‘युगप्रवर्तक राजनन्दन लाल दास’; ‘मिथिला-मैथिलीक प्रबल पक्षधर : प्रो. प्रबोध बाबू’; ‘सर्वगुण सम्पन्न सागरजी’। नबोनारायण मिश्र समग्र, २०२६।

मिश्र, नबोनारायण। ‘मिथिला विकास परिषद्, कोलकाता : जेना हम देखल’; ‘मैथिली आन्दोलनक नायक : पीताम्बर पाठक’; ‘कलकत्ताक मैथिली आन्दोलन आ मिथिला दर्शन’; ‘स्मृति आखर’; ‘प्रसङ्ग : बाबू साहेब चौधरीक’। नबोनारायण मिश्र समग्र, २०२६।

मिश्र, नबोनारायण। ‘मैथिली लोककथा’; ‘मिथिला मिहिर आ सम्पादकजी’; ‘अनन्य मैथिली हितैषी अजय सिंह’; ‘हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता’; ‘मैथिली रङ्गमञ्च आ कोलकाता’। नबोनारायण मिश्र समग्र, २०२६।

मिश्र, नबोनारायण। ‘एहनो होइत छै’; ‘एकटा पाकल आम’; ‘यात्राक फेरी’; ‘कालचक्र’; ‘आदर्श विवाह’; ‘परोपकारक फल’; ‘करोड़पतिक कर्मठता’; ‘मैथिलीक मर्यादा’; ‘सुन्दर-संयोग’; ‘युगधर्म’; ‘घमण्डक फल’। कथा-खण्ड, नबोनारायण मिश्र समग्र, २०२६।

मिश्र, नबोनारायण। ‘नव वर्षक सन्दर्भमे’; ‘पृथ्वीक भार’; ‘ई कीर्तिमान बनल’; ‘नवगीत’; ‘विडम्बना’; ‘अनन्त यात्राक यात्री’; ‘फगुआ’; ‘कनियाँ महारानीक आरती’; ‘एकटा साहित्यिक दीप’; ‘श्रद्धाञ्जलि’। पद्य-खण्ड, नबोनारायण मिश्र समग्र, २०२६।

मिश्र, नबोनारायण। ‘भगवती-वन्दना’ (दू रचना); ‘किछु लोक’; ‘स्वीकार करू प्रेमालिङ्गन’; ‘ई नञि उचित विचार’; ‘मैथिलीक उक्ति : सन्तानक प्रति’; ‘मैथिली-महोत्सव’; ‘शोक गीत’; ‘फगुआक प्रेमोपहार’। पद्य-खण्ड, नबोनारायण मिश्र समग्र, २०२६।

विदेह। ‘नबोनारायण मिश्र समग्र’क ग्रन्थ-सूची प्रविष्टि। विदेह मैथिली पोथीक अभिलेखागार। https://videha-ejournal.github.io/videha/pothi.htm

विदेह। ‘नबोनारायण मिश्र समग्र’क गद्य-सूची प्रविष्टि। विदेह, गद्य-संसाधन। https://videha-ejournal.github.io/videha/prose.htm

विदेह। ‘नबोनारायण मिश्र’क लेखक-परिचय आ रङ्गमञ्च-संबन्धी जानकारी। विदेह रत्न-सूची। https://videha-ejournal.github.io/videha/ratna.htm

विदेह। मैथिली साहित्य, नाटक, लोकसाहित्य, भाषा आ आलोचनासम्बन्धी विदेह शोध-सूची। https://videha-ejournal.github.io/videha/research/index.html

विदेह। ‘विदेह शोध-लेख : अंक १ सँ ४५१ धरि’। शोध-संहति, आलोचनात्मक आ साहित्येतिहास-संबन्धी प्रविष्टिसभ। https://videha-ejournal.github.io/videha/research/videha-scholar-research-book.html

मिश्र, नबोनारायण। ‘हमर संस्मरण रमणजीक संग’। विदेह, अङ्क ४४८, १५ अगस्त २०२६; विदेह शोध-सूचीमे दर्ज स्वतंत्र रचना। https://videha-ejournal.github.io/videha/research/index.html

विदेह। ‘रामलोचन ठाकुर विशेषांक’। अङ्क ३१९, १ अप्रैल २०२१; समग्रमे पुनर्संकलित लेखकक आलेखक प्रकाशन-सूचनाक अनुसार। विदेहक अङ्क-अभिलेख।

विदेह। ‘राजनन्दन लाल दास विशेषांक’। अङ्क ३३३, १ नवम्बर २०२१; समग्रमे पुनर्संकलित आलेखक प्रकाशन-सूचनाक अनुसार। विदेहक अङ्क-अभिलेख।

विदेह। ‘लक्ष्मण झा सागर विशेषांक’। अङ्क ३८२, १५ नवम्बर २०२३; समग्रमे पुनर्संकलित आलेखक प्रकाशन-सूचनाक अनुसार। विदेहक अङ्क-अभिलेख।

विदेह। ‘मिथिला विकास परिषद् विशेषांक’। अङ्क ४०८, १५ दिसम्बर २०२४; समग्रमे पुनर्संकलित आलेखक प्रकाशन-सूचनाक अनुसार। विदेहक अङ्क-अभिलेख।

विदेह। मैथिली नाट्यमञ्चक आलोचनात्मक विवेचनासम्बन्धी लेख-शृंखला; विदेह शोध-सूचीमे निर्दिष्ट कुणाल-कृत नाटकपर अध्ययन। https://videha-ejournal.github.io/videha/research/index.html