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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

VIDEHA · प्रथम मैथिली पाक्षिक eJournal

जंघाजोड़ी

नित नवल आशीष अनचिन्हार · Videha अंक ४५२ · 15 October 2026

लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख

बहरक अनुशासन आ लोकजीवनक प्रतिरोध

सार

‘जंघाजोड़ी’ आशीष अनचिन्हारक दू सय गजलक संग्रह अछि। एहि पोथीक साहित्यिक महत्त्व मात्र एतबामे नहि अछि जे एकटा मैथिली कवि गजल-जेकाँ अनुशासनप्रिय विधाक अभ्यास करैत छथि; एकर विशेषता ईहो अछि जे ओ मिथिलाक लोकबोली, देह-प्रेम, श्रमजीवी वर्गक वंचना, राजनीतिक संस्थाक विडम्बना आ सामाजिक पाखण्डकेँ गजलक संक्षिप्त, पुनरावृत्तिमूलक आ व्यंजनाशील विन्यासमे राखैत छथि। कविक आत्मवक्तव्य बहर, काफिया, रदीफ, गायन आ पाठकीय अर्थनिर्माणक प्रश्न उठबैत अछि; तें संग्रह कविता आ काव्यशास्त्रीय घोषणा, दुनूक रूपमे पढ़बाक माँग करैत अछि। ई अध्ययन गजलसभक भाषिक बनावट, कथ्य, बिम्ब, लय आ व्यंग्यक पृथक पाठ-विश्लेषण करैत अछि; गजल-इतिहासक विदेह-सम्बद्ध वृत्तान्तसँ तुलनाक क्रममे संग्रहक योगदान आ सीमा निर्धारित करैत अछि। निष्कर्ष ई जे अनचिन्हारक उपलब्धि परम्परागत विधागत अनुशासनकेँ लोकभाषिक आधुनिकतासँ जोड़ब अछि, मुदा विधागत आग्रह तथा काव्यगत सिद्धिक बीचक दूरीक आलोचनात्मक परीक्षण आवश्यक अछि।

मुख्य शब्द : मैथिली गजल, आशीष अनचिन्हार, जंघाजोड़ी, बहर, रदीफ-काफिया, व्यंग्य, लोकभाषा, पाठकीय अर्थनिर्माण, विदेह साहित्य आन्दोलन।

प्रस्तावना : पोथी, संरचना आ आलोचनाक प्रश्न

‘जंघाजोड़ी’क रचनात्मक केन्द्रमे एकटा उग्र विरोधाभास सक्रिय अछि : बाहरी बनावट अत्यन्त अनुशासित होबाक घोषणा करैत अछि, जखन कि भीतरक स्वर सत्ता, मर्यादा, शिष्टाचार आ सामाजिक अनुक्रमक निरन्तर परीक्षा लैत अछि। संग्रहमे लगातार दू सय गजल देल गेल अछि; प्रत्येक गजलक संग मात्राक्रम अथवा बहर-सम्बन्धी सूचना जोड़ल गेल अछि। एहि योजना सँ रचनाक पढ़बाक दू बाट खुलैत अछि : भावात्मक ग्रहण आ औपचारिक जाँच। एहि दूनूक मेल एहि पोथीक आलोचनात्मक प्रवेशद्वार थिक।

‘जंघाजोड़ी’ शब्द स्वयं ठेठ बोलचालक शारीरिकता आ हँसी-विनोदक संस्कार जगबैत अछि। शीर्षक उच्चकाव्यक रूढ़ गरिमा सँ हटिकय लोक-उच्चारणक साहस अपनबैत अछि। मुदा एहि साहसकेँ मात्र उत्तेजना कहब पर्याप्त नहि; शीर्षकक अभिप्राय बुझबाक लेल पोथीक भीतर देह-चेतना, व्यंग्य आ आत्मपरिहासक पारस्परिक सम्बन्ध देखब आवश्यक अछि। कविता जखन लघु कलेवरमे पैघ राजनीतिक वाक्य प्रस्तुत करैत अछि, तखन शीर्षकक आकस्मिकता सेहो एकटा सौन्दर्यशास्त्रीय संकेत बनैत अछि।

संग्रहक परिचयमे लेखक अपन मूल नाम आशीष कुमार मिश्र, गाम भटरा घाट, बिस्फी, मधुबनी आ ‘अनचिन्हार आखर’ नामक गजल-केन्द्रित जालपत्रिकाक सम्पादकीय सम्बन्ध बतबैत छथि। ओ ‘अनचिन्हार आखर’क बाद ‘जंघाजोड़ी’केँ अपन दोसर गजल-संग्रह मानैत छथि आ दूनू बीच लगभग नौ वर्षक अन्तरक उल्लेख करैत छथि। एहि आत्मसाक्ष्य सँ लेखकक साधनापथ बुझाइत अछि; यद्यपि दू संग्रहक वास्तविक पाठक सम्पूर्ण तुलनाक स्थान ई कथन स्वयं नहि लऽ सकैत अछि।

रचनाकारक आत्मवक्तव्य : विधा, अनुशासन आ पाठक

‘अनचिन्हारक बात’ संग्रहक मात्र भूमिका नहि, गजल विषयक घोषणापत्रक रूप लैत अछि। कवि गजल कहबाक अधिकारकेँ बहर-काफिया-रदीफक पालनसँ जोड़ैत छथि। हुनक मते भाव आ छन्द परस्पर विकल्प नहि; एकटा सबल अनुभूतिक उपयुक्त काव्य-विन्यास चाही। एतए हुनक तर्कक साहित्यिक बल स्पष्ट अछि : छन्दहीनताकेँ नवीनता मानि लेबाक सहज मार्गसँ ओ अलग राह चुनैत छथि। संगहि हुनक भाषा कतेको ठाम अत्यधिक निर्णायक भऽ जाइत अछि, जकरा कारण अन्य काव्य-विन्यासक स्वतंत्र मूल्याङ्कन लेल अपेक्षित अवकाश सीमित भऽ सकैत अछि।

भूमिकामे गायन आ गजलकेँ समानार्थी मानबाक विरुद्ध तर्क भेटैत अछि। गायकक स्वतंत्र संगीतिक परिश्रम, शास्त्रीय ज्ञान आ रचनाक विधागत पहिचानपर कवि बल दैत छथि। ई दृष्टि उल्लेखनीय अछि, कारणे मुद्रित काव्य, मंचीय पाठ आ संगीतिक प्रस्तुति एकै सौन्दर्यक मानदण्ड नहि रखैत अछि। मुदा कोनो गजल नहि गाएल जा सकबाक सम्भावनाकेँ मात्र हुनक शिल्पगत श्रेष्ठताक प्रमाण मानल नहि जा सकैत अछि; कविक आलोचना पढ़िते समय एहि भिन्नताकेँ मनमे रखनाइ चाही।

कवि ‘मनोरंजन’केँ अपन घोषित अभिप्राय कहैत छथि; तथापि हुनक गजलमे राजनीतिक निराशा, बालश्रम, धनी-गरीबक भेद, धार्मिक पाखण्ड आ दैनन्दिन अन्याय प्रचुर अछि। फलतः मनोरंजन हुनका लग वस्तुस्थितिसँ पलायन नहि, व्यंग्य आ रस मार्फत सामाजिक यथार्थक सामना करबाक युक्ति बनैत अछि। एहि बिन्दुपर पाठक लेखकक घोषित सीमाकेँ स्वयं पाठकर्मसँ विस्तार दैत छथि।

पाठकीय बहुअर्थकता विषयक लेखकक विचार विशेष ध्यानाकर्षक अछि। हुनक तर्क अछि जे सरल भाषामे बनल रचनाक एकटा तत्काल बोधगम्य अर्थ रहि सकैत अछि, मुदा पाठकक अनुभव, समय आ मनःस्थितिक कारणे आन अर्थ खुलि सकैत अछि। एहि अवधारणाकेँ आलोचनामे फलदायी बनाबऽ लेल कविता-भितरक शब्द, प्रसंग आ संरचनाकेँ साथ राखब पड़त; अन्यथा प्रत्येक अनियन्त्रित अर्थ-आरोपकेँ बहुअर्थकता कहि देबाक जोखिम रहत। ‘जंघाजोड़ी’क बहुतेक श्रेष्ठ शेर एहि सन्तुलनक परीक्षा लेल उपयुक्त अछि।

गजलरचना : बहर, पुनरावृत्ति आ शेरक स्वायत्तता

संग्रहक रचनात्मक अनुशासनक सर्वाधिक प्रत्यक्ष चिह्न गजलसभक अन्तमे अंकित मात्राक्रम अछि। कतहु छोट, तीव्र गतिवला पदरचना अछि; कतहु अपेक्षाकृत दीर्घ श्वासक संरचना। लेखक लघु-दीर्घक छूट, विशेष प्रयोजनसँ ग्रहण कएल दीर्घक लघुकरण आ बहरे मीरक उल्लेख सेहो करैत छथि। एहि मुद्रित सूचना सँ पाठक जाँचक आरम्भिक सूत्र पबैत छथि। मुदा केवल घोषित मात्राक्रम अपनहि आप सम्पूर्ण शुद्धता सिद्ध नहि करैत अछि; एक-एक मिसराक उच्चारण, शब्दक व्यवहारगत मात्रा, नियत रदीफ-काफिया आ छूटक सीमाक परीक्षण सेहो जरूरी अछि।

शेरक स्वतन्त्र अर्थ-संभावना एहि संग्रहमे तीव्र अछि। राजनीति, प्रेम, प्रकृति आ निजी कटु अनुभवक चित्र एकै गजलमे एक-दोसरसँ अचानक टकरा सकैत अछि। ई रचनाविन्यास गजलक परम्परागत शेर-प्रधान प्रकृतिसँ मेल खाइत अछि। जखन प्रत्येक शेर अपेक्षाकृत स्वायत्त हो, तखन संग्रहमे विषयक एकरूपता नहियो रहिते एकटा व्यापक दृष्टि आकार लैत अछि। एहि दृष्टिक केन्द्रीय गुण अछि : विरोधाभासकेँ बहुत छोट कथनमे पकड़ब।

रदीफक आवृत्ति कविक भाषा केँ लयात्मक ठोक दैत अछि। ‘दुन्नू दिससँ’, ‘केकरो नै’, ‘किछु बात’, ‘पासी छै’ जेकाँ पदसमूह अलग-अलग भावभूमि केँ जोड़बाक काम करैत अछि। सभ शेरमे पुनः सुनाइत ध्वनि पाठककेँ प्रतीक्षा करबैत अछि; काफिया ओ रदीफक सफल सम्बन्ध तखन बनैत अछि जखन दोहराएल पंक्ति नब अर्थ लऽ कऽ अबैत अछि। एहि संग्रहक सबल गजलमे आवृत्तिक अर्थक्रम बदलैत अछि; निर्बल रचनामे ओ मात्र ध्वन्यात्मक पूर्वानुमेयता बनि रहि जाइत अछि।

पृथक पाठविश्लेषण : सम्बन्धक दू पाट आ विडम्बनाक विस्तार

‘हाथ बढ़लै दुन्नू दिससँ’ : सम्पर्क आ संकट

“हाथ बढ़लै दुन्नू दिससँ

डेग उठलै दुन्नू दिससँ”

आरम्भिक शेरमे द्विपक्षीय गतिक आवेग अछि। हाथ आ डेग सामाजिक सम्पर्कक संकेत देइत अछि; पाठक प्रारम्भमे मिलनक दृश्य देखैत छथि। मुदा आगाँ चलिकय एही दोहराइत पदमे जनतंत्रक लात, जनसमूहक फँसनाइ आ बान्ह टूटलाक बाद लोकक भगनाइ प्रवेश करैत अछि। एके रदीफ पहिने सम्पर्कक आश्वासन, फेर संकटमे समान रूपसँ आक्रान्त होबाक अनुभूति उत्पन्न करैत अछि। एतए बहुअर्थकता कोनो अस्पष्ट शब्दसँ नहि, एके व्याकरणिक संरचनाक भीतर विषय-परिवर्तनसँ जन्मैत अछि।

गजलमे प्रेमगत शारीरिक समीपता, राजनीतिक विफलता आ पर्यावरणीय जोखिमक निकटता मात्र संयोग नहि। ‘दुन्नू दिससँ’ माने सम्बन्धक दूनू छोर; ओहि छोरपर शक्ति समान नहि होइतो परिणाम साझा भऽ सकैत अछि। एहि शेर-समुच्चयमे गजलक शेर-स्वायत्तता एकटा समग्र नैतिक दृश्य बनबैत अछि।

‘जे हमरा लेल विपदा अछि’ : विषमताक संक्षिप्त गणित

“जे हमरा लेल विपदा अछि

से हुनका लेल सुविधा अछि”

दू पाँतिक एहि दृश्यकेँ पढ़िते वर्ग-सम्बन्धक असमानता उघड़ैत अछि। एक व्यक्ति वा समूहक संकट दोसराक अवसर बनैत अछि। ‘हमरा’ आ ‘हुनका’क सर्वनाम व्यक्तिविशेषक सीमा लाँघि आर्थिक आ राजनीतिक संरचनाक स्थानापन्न बनि जाइत अछि। कवि शोषणक जटिल विवेचन नहि देइत छथि; एकटा तुलनात्मक वाक्यमे परिणाम प्रस्तुत करैत छथि। अनायास ई अर्थ सामाजिक भीड़, संसाधन-वितरण, बाजार आ सत्ताक प्रसंगमे पसारि सकैत अछि।

गजलक प्रभावक कारण केवल विचार नहि, प्रस्तावनात्मक कड़कपन अछि। इएह शेर जाहि पाठककेँ अपन भोगल विपदा याद देबैत अछि, ताहि पाठक लेल स्वतन्त्र अर्थ खोलैत अछि। मुदा ई बहुअर्थकता मूल नैतिक समीकरणकेँ भंग नहि करैत अछि।

राजनीतिक व्यंग्य : शब्दक चोट आ प्रतिरोधक सीमाबोध

‘मीडिया इच्छाधारी छी हम’ : संस्थागत आत्मस्वीकारक अभिनय

“मीडिया इच्छाधारी छी हम

कारपोरेटक नाती छी हम”

एहि शेरमे मीडिया स्वयं अपन मुखसँ वंशावलि सुनबैत अछि। ‘इच्छाधारी’क पौराणिक-लोकप्रचलित ध्वनि आधुनिक निगम-सम्बन्धक संग आवैत अछि। सार्वजनिक जानकारी देबाक संस्थाकेँ कवि स्वार्थानुकूल रूप बदलयवला प्राणी बनबैत छथि। ‘नाती’ नातेदारिक घरेलू पद अछि, जकर प्रयोग पूँजी आ खबरक निर्भरता केँ घर-परिवारक सम्बन्ध जेकाँ व्यक्त करैत अछि। एतए नवीनता राजनीतिक आरोपमे नहि, आरोपक लोकव्यंग्यात्मक वाक्य-विन्यासमे अछि।

एहि गजलमे बारम्बार ‘छी हम’क प्रयोग आत्मस्वीकारोक्ति बनैत अछि। कवि आलोचनाक बाहरी भाषण नहि दैत छथि; आलोच्य संस्था केँ स्वयं अपन विरोधमे बोलबैत छथि। ई नाटकीय आवाज व्यंग्यक खास शक्ति अछि।

‘दिनगर मुदा तैयो तँ अन्हार बड़’ : धार्मिक चमत्कार आ नागरिक अन्हार

“जै देशमे खाली बलात्कार छै

तै देशमे धर्मक चमत्कार बड़”

एहि शेरक झटका तर्कक कठोर विरोधाभाससँ उत्पन्न होइत अछि : सामाजिक हिंसाक संग धर्मक चमत्कारक सार्वजनिक उत्सव। ‘जै’ आ ‘तै’ शर्त-परिणामक वाक्य-ढाँचाकेँ व्यंग्यक न्यायालय बना दैत अछि। काव्यक निहित प्रश्न ई नहि जे धार्मिक अनुभवक कोनो मूल्य नहि; प्रश्न ई अछि जे नैतिक उत्तरदायित्वक स्थान चमत्कारक तमाशा किएक लऽ लैत अछि। कविता एतए आडम्बर आ सामाजिक हिंसाक सहअस्तित्वकेँ उजागर करैत अछि।

ओही गजलक अन्तमे कवि मात्राक्रमक सन्दर्भमे किछु विशेष छूटक उल्लेख करैत छथि। अतएव प्रभावशाली राजनीतिक अर्थ आ निर्दोष छन्दानुशासनकेँ स्वयंसिद्ध एकतारूपमे नहि लेबाक चाही। एहि दुहरी परखसँ कविताक सौन्दर्य आ औपचारिक अनुशासनक प्रश्न दुनू सुरक्षित रहैत अछि।

‘हुनके विकास, जनता उदास’ : घोषणाक विरुद्ध अल्पशब्दीय प्रतिवाद

“हुनके विकास

जनता उदास”

चारि शब्दमे सत्ताक प्रगति-कथाक प्रति संदेह उपस्थित होइत अछि। ‘हुनके’क सीमित हितग्राही आ ‘जनता’क विस्तृत समुदाय बीच सीधा वैचारिक द्वन्द्व अछि। एहि पाँतिक मार्मिकता विस्तृत रूपकसँ नहि, काटदार न्यूनतम वाक्यसँ बनैत अछि। कविता आगाँ संसद आ सार्वजनिक संस्थाक नैतिक पतन दिस संकेत करैत अछि। एहन लघु गजल पाठककेँ तुरन्त याद रहि सकैत अछि; तथापि कखनो-कखनो घोषणात्मक संक्षेप जटिल यथार्थक सूक्ष्मता घटा सेहो सकैत अछि।

श्रम, बचपन आ वर्ग : सामाजिक यथार्थक लघु दस्तावेज

‘नौकर बनलै गरीब बच्चा’ : बचपनक विस्थापन

“नौकर बनलै गरीब बच्चा

होटल मोटेल ईंटा भट्ठा”

एहि शेरमे ‘होटल मोटेल ईंटा भट्ठा’ स्थान-सूचीक रूपमे नहि, श्रमक निरन्तर भूगोलक रूपमे अबैत अछि। गरीबीक कारण बालकक जीवन विद्यालय आ खेलसँ हटिकय व्यावसायिक श्रमस्थलपर फैलि गेल अछि। ‘गरीब बच्चा’ कोनो भव्य प्रतीक नहि; सामाजिक दृष्टिसँ प्रत्यक्ष दृश्य अछि। कविक यथार्थवाद एतए अनुभूति केँ अधिक विशेषणसँ नहि लादैत अछि।

गजलक दोसर शेरमे जीवनक मिठास आ ओकर तुरन्त खट्टा भऽ जेबाक उलटबाँसी अछि। मिठाइक स्वादक तुलना जीवनपर लगैतहि बचपनक क्षणभंगुरता आ श्रमक कठोरता एक-दोसरकेँ काटैत अछि। ‘ईंटा भट्ठा’क ग्रामीण-औद्योगिक सन्दर्भ कविता केँ स्थानीय बनबैत अछि, मुदा प्रश्न व्यापक अछि : विकासक दाबीक बीच सर्वाधिक असुरक्षित जीवनक मूल्य के तय करैत अछि?

‘ने अँगना जोगर ने दलान जोगर’ : निर्धनताक संस्कारगत बहिष्कार

“गरीब लड़किए जकाँ गरीब लड़को

ने बियाह जोगर ने चुमान जोगर”

एहि शेरमे निर्धन लड़का आ लड़की दुनूक तुलना सामाजिक संस्कारसँ बाहर कएल गेल देहक रूपमे होइत अछि। ‘बियाह’ आ ‘चुमान’ आर्थिक हैसियतसँ आबद्ध सामाजिक मान्यता बनि जाइत अछि। रचना वर्ग-संकटक लिंगाधारित अनुभवकेँ खुलबैत अछि, मुदा ओकर समाधान नहि दैत; अस्वीकृत व्यक्तिक स्वरमे समाजक व्यवहारक नैतिक दरिद्रता दर्ज करैत अछि। ई प्रसंग संग्रहक ‘मात्र मनोरंजन’क घोषणाकेँ सबसँ सीधा चुनौती दैत अछि।

देह, नेह आ स्त्री-पात्र : संवेदनाक सामर्थ्य आ दृष्टिक असममिति

‘ओकर हाथसँ फूल अछि देह’ : देहक अनेक अर्थ

“ओकर हाथसँ फूल अछि देह

सदिन गम गम फूल अछि देह”

फूलक बिम्ब देहकेँ कोमलता, गन्ध आ स्पर्शक अर्थ दैत अछि। एहि गजलमे देह प्रेमक मिलन-स्थल, मोनक संग फूलक विभिन्न रूप, आ सामाजिक पहिचानक केन्द्र बनैत अछि। कविक रचनात्मक शक्ति एतए प्रत्यक्ष अछि : मैथिली लोकभाषाक गन्धवाचक पुनरुक्ति गजलक नियत अन्त्यानुप्रास सँ जुड़ि जाइत अछि। देह निष्क्रिय वस्तु नहि, अनुभूति सँ अर्थ पबैत स्थान बनैत अछि।

मुदा संग्रहक प्रेमपरक अनेक गजल स्त्रीक देह, आँचर, ठोर, आँखि आ रूपक वर्णनमे रमैत अछि। एतए स्त्रीक अपन इच्छा, निर्णय वा उत्तर-स्वर अपेक्षाकृत कम उद्घाटित होइत अछि। अतएव देहक सौन्दर्यपर लिखल पाँति मात्रक आधारपर समतामूलक प्रेम-दृष्टि सिद्ध नहि कएल जा सकैत अछि। आत्मीयता आ वस्तुकरण बीचक ई तनाव संग्रहक समीक्षाक एकटा आवश्यक पक्ष अछि।

प्रेमक शब्दावली आ वियोगक निजी प्रतिध्वनि

नेह, नोर, मोन, आँचर, चान, इजोरिया, कजरौटा, फूल, मधुमास जेकाँ शब्द संग्रहमे बारम्बार घुरैत अछि। एहि पुनरावृत्तिमे लोकगीत-परम्पराक भावक्षेत्र सक्रिय भऽ जाइत अछि। मुदा गजल अपन अपेक्षाकृत स्वायत्त शेरक कारण लोकगीतक सतत कथात्मक प्रवाहसँ भिन्न बनावट ग्रहण करैत अछि। प्रेम एतए ओतेक कथा नहि, जतेक क्षणक टकराहट, अपूर्णता आ स्मृतिक लघु प्रस्फुटन अछि।

कखनो अर्थ बहुत संकेतमय रहैत अछि; कखनो सरल संबोधन गीतात्मकता दिस लऽ जाइत अछि। ई द्वैधता कविक भितर दू स्वर देखबैत अछि : एक कठोर व्यंग्यक, दोसर करुण वा चंचल प्रेमक। उत्कृष्ट गजल ओहि ठाम अछि जतए दुनू स्वर एक-दोसरकेँ पूरक बनैत अछि, नहि कि बस अलग-अलग विषय सूची जकाँ लगैत अछि।

लोकभाषा, धार्मिक संकेत आ सांस्कृतिक प्रतिलोम

‘मोनक रूप पासी छै’ : लोकजीवनक पुनर्मूल्याङ्कन

“मोनक रूप पासी छै

देहक रूप पासी छै”

पासी, ताड़ी, लबनी आ भुज्जा-चिखना जेकाँ शब्द गजलक परम्परागत दरबारी शब्दावलीकेँ स्थानीय लोकजीवनक धरातलपर आनैत अछि। एतए ‘पासी’ केवल पेय-पदार्थक सम्बन्धसूचक नहि; कविक रूपक-संसारक एकटा स्वायत्त मूल्य-वाचक पद बनैत अछि। एहि गजलमे वैदिक नामसभक संग लोकजीवनक एहि बिम्बक समीपता उच्च-नीच सांस्कृतिक विभाजनपर विनोदी दबाव उत्पन्न करैत अछि।

तथापि ई पुनर्मूल्याङ्कन केहन समाज-दृष्टि गढ़ैत अछि, से प्रश्न खुलल रहैत अछि। लोक-शब्दक बारम्बार प्रयोग अपनहि आप लोकसमुदायक सम्पूर्ण प्रतिनिधित्व नहि दैत अछि। ओकरा कविताक वक्ता, प्रसंग आ मूल्यनिर्णयसँ जोड़ि कऽ देखनाइ चाही। साहित्यिक उपलब्धि एतए अभिजात शब्द-संहिता तोड़ि लोकानुभवकेँ गजलक भाषामे प्रतिष्ठा देब अछि।

राम-रहमान, मन्दिर-मस्जिद आ धर्मक राजनीतिक उपयोग

संग्रहक किछु गजल धार्मिक नामक बीच दूरीक अपेक्षा विनिमयक सम्भावना रखैत अछि, जखन कि अन्य शेर धर्मक नामपर हिंसा आ तमाशापर व्यंग्य करैत अछि। एहि कारण कविक धार्मिक संसारकेँ एकरेखीय विरोध वा आस्था-दर्शनक नाम दऽ सीमित करब उचित नहि। कविता सामाजिक पाखण्डक निन्दा करैत मानवीय सहअस्तित्वक संकेत देबैत अछि। लोकप्रयोग, पौराणिक संकेत आ समकालीन राजनीति मिलिकय गजलक कथ्य विस्तार करैत अछि।

शीर्षकक स्वसन्दर्भ : हास्य, हिंसा आ देहभाषा

“जंघाजोड़ी देखि कऽ

जांघो सभ खूब हँसल”

एहि शेरमे पुस्तकक नाम अपनहि रचनात्मक संसारक भीतर वापस अबैत अछि। ‘देखि कऽ’ दृष्टिक क्षण अछि; ‘जांघो सभ खूब हँसल’ शारीरिक अंगक मानवीकरण। हँसी एतए विनोद, असहजता आ शिष्टाचार-विघटनक मिश्रित क्रिया बनैत अछि। एहि पाँतिसँ पूर्व रक्तरंजित राजकीय बिम्ब अवस्थित अछि; तें शीर्षकक खेल केवल देहक चुटकुला नहि, हिंस्र सार्वजनिक जीवनक बगलमे उत्पन्न विचित्र हँसीक संकेत सेहो बनैत अछि।

शरीरक अंगकेँ हँसाबयवला वाक्य मर्यादित शुद्धतावादक भाषामे सहज नहि लगैत अछि। अनचिन्हार एहि असहजता केँ चुनैत छथि। मुदा प्रत्येक असहज शब्द साहित्यिक नवोन्मेष नहि होइत अछि; एतए ओकर सार्थकता राजकीय-हिंसात्मक प्रसंगसँ अर्थगत टकराहटमे छैक। शीर्षकक आलोचनात्मक पठनीयता एहि रचनासँ विशेष रूपेँ स्पष्ट होइत अछि।

भाषिक बनावट : छोट वाक्य, पुनरुक्ति आ अर्थक विस्फोट

अनचिन्हारक भाषा निरन्तर उच्च साहित्यिक संस्कृतनिष्ठ वाक्य-रचनाक प्रयोग नहि करैत अछि। लोकबोलीक ‘कने’, ‘जकाँ’, ‘हुनके’, ‘हमरा’, ‘दुन्नू’, ‘नोर’, ‘मोन’ आ बाजार-राजनीतिक पद एक-दोसरसँ निर्भय भेटैत अछि। एहि मिश्रणमे भाषिक स्वाभाविकता अछि। शेरक छोट आकारक कारण एक-एक शब्दक भार बढ़ैत अछि; ‘विपदा’क सामने ‘सुविधा’, ‘विकास’क सामने ‘उदास’ आ ‘धर्मक चमत्कार’क सामने हिंसाक चित्र तीव्र द्वन्द्व बनैत अछि।

रूपात्मक स्तरपर समान ध्वनि-क्रम पाठकक स्मृतिमे ठहरैत अछि। आनफेर, पुनरुक्ति अनिवार्यतः नब अर्थ नहि जोड़ैत; कखनो अनुप्रासक चकाचौंधि शब्दार्थक सूक्ष्मताकेँ ढाँपि दैत अछि। एहि जोखिमक उदाहरण संग्रहक अत्यन्त छोट, अधिकतर ध्वनि-साम्यपर टिकैत गजलसभमे देखाइत अछि। सफलताक कसौटी ई होबाक चाही जे पुनरावृत्ति प्रत्येक आगमनपर किछु अर्थगत परिवर्तन करैत अछि वा नहि।

आन एकटा प्रश्न ध्वन्यात्मक अनुशासन आ बोलचालक सम्बन्धक अछि। मैथिली उच्चारणमे शब्द-सन्धि, दीर्घ-लघु, स्थानीय स्वरविस्तार आ उच्चारणभेद अनेक सम्भावना खोलैत अछि। संग्रहमे अंकित मात्राक्रम पाठककेँ एकटा प्रस्तावित पाठ-विधान दैत अछि; तकर अतिरिक्त मौखिक पाठमे घटैत-बढ़ैत ध्वनिक परीक्षण परिश्रम माँगैत अछि। तें गजलकेँ केवल लिखित चिह्नक गणित वा केवल गायकक सहज सुरमे सीमित करब दूनू अनुपयुक्त हएत।

पाठकीय बहुअर्थकता : घोषणासँ रचनात्मक क्रियाधरि

कवि भूमिकामे पाठककेँ अर्थनिर्माणक प्रमुख भागीदार मानैत छथि। एहि सूत्रक वास्तविक उपयोग ‘जे हमरा लेल विपदा अछि’ जेकाँ शेरमे भेटैत अछि : वक्ता-परिवर्तनसँ संकट-लाभक अनेक सामाजिक दृश्य खुलैत अछि। ‘हाथ बढ़लै दुन्नू दिससँ’ मे सेहो रदीफ अलग-अलग प्रसंगसँ नब अर्थ लैत अछि। मुदा सभ गजल समान रूपसँ बहुअर्थी नहि। उदाहरणार्थ तीक्ष्ण राजनीतिक नारा एहन निश्चयात्मक कथन देइत अछि जकर अर्थ-दिशा तुलनात्मक रूपसँ स्थिर रहैत अछि।

एहि भिन्नताकेँ कमजोरी मानबाक बदला गजलक बहुविध कार्य बुझनाइ उचित अछि। कोनो शेर प्रश्न पैदा करैत अछि; कोनो तत्काल प्रतिरोधक घोषवाक्य जेकाँ काम करैत अछि; कोनो प्रेमक स्मृति सुरक्षित रखैत अछि। आलोचनात्मक कसौटी सभपर एक्कहि प्रकारेँ लागू नहि भऽ सकैत अछि। लेखकक बहुअर्थकता-सिद्धान्त संग्रहक सर्वश्रेष्ठ शेर बुझबा लेल उपयोगी अछि, मुदा ओकरा सर्वग्राही प्रमाणपत्र बना देल जाए तऽ कविता-विशेषक स्वरूप ओझरा जाएत।

मैथिली गजलक साहित्यिक इतिहासमे ‘जंघाजोड़ी’

मैथिली गजलक इतिहासकेँ उर्दू गजलक अनुकृति मात्रक रूपमे वर्णित करब आलोचनात्मक रूपेँ अपर्याप्त अछि। एक भाषासँ दोसरा भाषामे विधा अबैत काल मात्र बहर वा काफियाक अनुकरण नहि होइत; स्थानीय वाक्य-विन्यास, सामाजिक प्रश्न, उपमा-परम्परा आ पाठकीय अभिरुचि ओकर नव रूप बनबैत अछि। ‘जंघाजोड़ी’ एहि सांस्कृतिक रूपान्तरणक एकटा देखबाक योग्य उदाहरण अछि : औपचारिक अनुशासनक दावा परम्परासँ सम्बन्ध रखैत अछि, आ कथ्यक लोकव्यंग्य आधुनिक मैथिली जीवनमे टिकैत अछि।

विदेहक उपलब्ध साहित्येतिहासपरक विवेचनमे पण्डित जीवन झा सँ प्रारम्भ होइत एकटा परम्परा-रेखा प्रस्तुत अछि; ताहिमे कविवर सीताराम झा, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’, विजयनाथ झा आ योगानन्द हीराक नाम जोड़ल गेल अछि। एहि क्रमकेँ निर्विवाद सर्वसम्मति नहि, विदेह-सम्बद्ध इतिहासलेखनक प्रस्तावक रूपमे ग्रहण करबाक चाही। एहि पृष्ठभूमिमे अनचिन्हारक पीढ़ीक विशिष्टता विधाक पुनः अनुशासन, कविक प्रशिक्षण, पाठकक तकनीकी सहभागिता आ जालमाध्यमक प्रसारक प्रश्नकेँ संगहि उठाएब अछि।

वर्तमान संग्रहक भूमिकामे लेखक स्वयं ‘अनचिन्हार आखर’ आ ‘मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास’क उल्लेख करैत छथि। रचनाक अन्तमे मात्राक्रम देबाक कारण ओ पाठककेँ बहर बुझबाक क्षमता विकसित करब मानैत छथि। एहि कारण संग्रह काव्यक संग एकटा अनौपचारिक काव्य-शिक्षालयक रूप सेहो धारण करैत अछि। जँ प्राचीन मैथिली पद-परम्परा सामूहिक गायन, राग आ लोकानुष्ठानक स्मृतिसँ संवाद करैत छल, तऽ एहि संग्रहमे छन्दक तर्क, भाषिक साक्षरता आ मुद्रित पाठपर आधारित नव पाठक-समुदाय आगाँ अबैत अछि। दुनू परम्परा बीच समरूपता नहि, बल्कि माध्यम आ उपयोगक रूपान्तरण अछि।

मैथिली कविता आ गजलक आधुनिक संयोगक बहस मे लेखकक स्थानकेँ केवल प्रथमत्वक दाबीसँ नहि मापल जा सकैत अछि। ऐतिहासिक योगदानक प्रमाण समुचित तिथिक्रम, प्रकाशित पाठ आ तुलनात्मक शिल्प-परीक्षणसँ प्राप्त होइत अछि। अनचिन्हारक महत्त्व ई अछि जे ओ विधा-चर्चाकेँ अपन रचना-संग्रहक भीतर स्थापीत करैत छथि; परम्पराक इतिहास आ स्वयं रचनाक सौन्दर्यक प्रश्नकेँ पाठक लग एकसंग पहुँचबैत छथि।

तुलनात्मक विवेचन : उर्दू गजल, मैथिली पद-परम्परा आ आधुनिक जनकाव्य

गजलक पारम्परिक संरचनामे मतलाक ध्वन्यात्मक स्थापना, शेरक अपेक्षाकृत स्वायत्तता, काफिया-रदीफक पुनरागमन आ बहरक अनुशासन महत्त्वपूर्ण अछि। ‘जंघाजोड़ी’ एहि संरचनाक संग अपन रूपात्मक सम्बन्ध स्पष्ट करैत अछि। उर्दू गजलक ऐतिहासिक उदाहरण लेखकक भूमिकामे उपस्थित अछि, मुदा एहि नामसभक उल्लेख सँ सिधेँ शिल्पगत समानता सिद्ध नहि होइत। समान विधा होयब आ समान काव्य-मिजाज होयब भिन्न विषय अछि।

मैथिली लोकगीत आ पदक भाषामे प्रेम, विरह, ऋतु, अङ्ग-उपमा, घर-आँगन आ सामाजिक संस्कारक घनी परम्परा अछि। अनचिन्हार एहि बिम्बसभकेँ नव सामाजिक प्रसंगक संगे जोड़ैत छथि। ‘देह’, ‘नोर’, ‘चान’ आ ‘आँचर’क शब्दसंसार लोकगीतक स्मृति जगबैत अछि, मुदा रदीफक नियमित प्रत्यावर्तन आ एक शेरसँ दोसर शेरक विषय-उछाल गजलकेँ स्वतंत्र रूप दैत अछि। एहि अर्थमे ई संग्रह लोकगीतक विस्तार नहि, लोकभाषिक संसाधन सँ समृद्ध गजल अछि।

आधुनिक प्रतिरोधी काव्यक तुलनामे एहि संग्रहक राजनैतिक शेर छोट, तीव्र आ प्रायः व्यंग्यप्रधान अछि। विरोध कखनो उद्घोषणात्मक होइत अछि, कखनो संस्थागत आत्मस्वीकारक नाटकीय आवाज बनैत अछि। ओकर सरोकार दुष्कर मजदूरी, नेताक पाखण्ड, विकासक असमान लाभ, बाजारक क्रूरता आ बोलबाक नैतिक अधिकार अछि। तथापि वैचारिक स्तरपर एकर कोनो एकमात्र कार्यक्रम नहि; प्रेम, देह आ हँसीक निरन्तर उपस्थितिसँ संग्रह व्यापक मानवीय व्यवहारक पाठ बनैत अछि।

कविक आत्मनियमनक दावा आ आन्तरिक आलोचनाक आवश्यकता

लेखक ‘नव प्रयोग’क शब्दकेँ सहज प्रतिष्ठा देबय सँ मना करैत छथि आ छन्दक विधान सीखलाक बादे प्रयोगक पक्ष लैत छथि। एहि कथनमे शिक्षणपरक सावधानी अछि। मुदा स्वयं संग्रहमे पौराणिक संकेतक आधुनिक पुनःप्रयोग, मीडिया-राजनीतिक आत्मपरिहास, शरीरक मानवीकरण आ अत्यल्प शब्दक राजनैतिक शेर साहित्यिक अर्थमे प्रयोगधर्मिताक संकेत देइत अछि। अतएव लेखकक ‘प्रयोग नहि’ कहबाक अर्थ सम्भवतः नब बहर गढ़बाक दाबी नहि करब अछि; समस्त काव्यात्मक नवीनताक अभाव नहि। आलोचना एतए लेखकक वाक्य आ कृतिमे भेद करैत अछि।

ठीक एहने ढंगसँ प्रत्येक गजलक संग मात्राक्रम देब प्रशंसनीय अछि, मुदा गजलसभक अन्तमे स्वयं उल्लिखित छूट पाठककेँ स्वतन्त्र छन्दपरीक्षाक लेल प्रेरित करैत अछि। ई तथ्य लेखकक विरुद्ध दोषसिद्धि नहि, बल्कि विधागत पारदर्शिताक अवसर अछि। विश्लेषणक पर्याप्त आधार बिना शतप्रतिशत शिल्पशुद्धताक घोषणा करब अथवा छूटकेँ स्वतः त्रुटि कहि खारिज करब दुनू अतिशयता हएत।

राजनीतिक स्वरक सीमासभ सेहो स्पष्ट अछि। कखनो व्यंग्यक तीव्रता चरित्रकेँ एकात्मक बनबैत अछि; सार्वजनिक जीवनक सभ जटिलता चोर, ठक वा पाखण्डीक छविमे समाइत अछि। कखनो प्रेमक शब्दावलि एके उपमान पर घुरि अबैत अछि। किन्तु अनेक ठाम मामूली शब्दक अनपेक्षित संयोग नब बिम्ब उत्पन्न करैत अछि। एहि कारण संग्रहक समग्र मूल्याङ्कन ‘सभटा श्रेष्ठ’ अथवा ‘सभटा दोषपूर्ण’ जेकाँ ध्रुवीकरणसँ बचबाक चाही।

गजलकार आ पाठकक नैतिक सम्बन्ध

‘घूस खा कऽ गरीबपर’ : कविक आत्मालोचनात्मक व्यंग्य

“घूस खा कऽ गरीबपर जिंदा गजल लिखू

होटल बैसि कऽ चिकेन अंडा गजल लिखू”

एहि शेरमे काव्य-व्यवसाय स्वयं आलोचनाक विषय अछि। वक्ता जे निर्देश दैत अछि से प्रत्यक्ष अर्थमे असंगत आ नैतिक रूपेँ आपत्तिजनक अछि; पाठक एहि उलट अभिप्रायकेँ पकड़ैत छथि। कवि प्रगतिशील नारा आ निजी आचरणक फाँक देखबैत छथि। भूमिकामे लेखक रचनात्मक कथन आ व्यक्तिगत आचरणक संगतिक बात उठबैत छथि; एहि शेरसँ ओ विचार काव्यात्मक रूप ग्रहण करैत अछि। एतए व्यंग्यक लक्ष्य गरीबी नहि, गरीबक नामपर प्रतिष्ठा खरीदनिहार साहित्यिक पाखण्ड अछि।

व्यंग्य एतए अपन परम्पराक ओहि स्थिर जोखिमसँ बचैत अछि जे कवि सदैव उपदेशक होइ। निर्देशात्मक ‘लिखू’क पुनरावृत्तिसँ वक्ता पाखण्डीक मुखौटा पहिरैत अछि आ पाठककेँ अर्थ उलटबाक श्रम देइत अछि। ई संग्रहक सबसँ प्रभावशाली स्व-आलोचनात्मक रणनीतिमे सँ एक अछि।

‘कहल करियौ किछु बात’ : संवादक पक्षधर अन्त

“कहल करियौ किछु बात

सुनल करियौ किछु बात”

संग्रहक अन्तिम गजल बोलब आ सुनबाक आवृत्तिसँ मानवीय सम्बन्धक आवश्यकता याद दियबैत अछि। लेखकक लम्बा आत्मवक्तव्य आ दू सय लघु रचनाक बाद ‘किछु बात’ कहल आ सुनल दुनूक आह्वान बनैत अछि। विचारक सार्वजनीन तत्त्व एतए अछि जे आलोचना, प्रेम आ समाज तीनू बातचीत बिना अधूरा अछि। एहि समापनक सौन्दर्य कठोर राजनीतिक शेरसभक बाद संवादक अपेक्षाकृत कोमल मुद्रा धारण करबमे निहित अछि।

निष्कर्ष : मैथिली गजलक लोकोन्मुख आधुनिकता

‘जंघाजोड़ी’क मूल साहित्यिक उपलब्धि गजलक औपचारिक आत्मचेतनाकेँ मैथिली लोकजीवनक खुरदुरा, असमान आ हास्य-विडम्बनामय अनुभवसँ मिलाएब अछि। बहरक नियम, काफिया-रदीफक पुनरागमन, छोट शेर, स्थानीय शब्दक स्पर्श आ सार्वजनिक संस्थापर तीक्ष्ण टिप्पणी एकटा चिन्हार शैली गढ़ैत अछि। संग्रहक केन्द्रमे कवि अपन पाठककेँ केवल रसग्राही नहि, शिल्प-जाँचक सहभागी मानैत छथि।

एहि रचनासंसारक सर्वोत्तम शेर ओ अछि जतए अर्थक संक्षिप्तता, ध्वनिक अनुशासन आ सामाजिक दृष्टि परस्पर बल दैत अछि। सबसँ कम सफल स्थान ओ छथि जतए पुनरावृत्ति नव अर्थ नहि देइत, आरोप समग्र यथार्थकेँ सरल करैत अछि, अथवा देह-वर्णनक भीतर स्त्रीक स्वतंत्र स्वर अस्पष्ट रहि जाइत अछि। संग्रहक वास्तविक सम्मान एहि भिन्नताकेँ स्पष्ट करबमे अछि, न कि सभ रचनापर समान प्रशंसाक परत चढ़ाएबमे।

मैथिली गजलक इतिहासमे अनचिन्हारक योगदान विधा-सम्मत लेखनक आग्रह, रचनाक संगे तकनीकी विवरण देबाक अभ्यास आ जालमाध्यमक साहित्यिक संवादसँ जुड़ल अछि। ‘जंघाजोड़ी’ एहि प्रयत्नक महत्त्वपूर्ण काव्यात्मक उदाहरण अछि। ई पोथी सिद्ध करैत अछि जे अनुशासन आ प्रतिरोध परस्पर विरोधी नहि; छन्दक भीतरहु समाजक असुविधाजनक प्रश्न उठि सकैत अछि। एकर अन्तिम महत्त्व एहि सम्भावनाक साहित्यिक साक्ष्यमे अछि।

सन्दर्भसूची

प्राथमिक कृति : अनचिन्हार, आशीष। ‘जंघाजोड़ी : गजल संग्रह’। विदेह, मैथिली साहित्य आन्दोलनक प्रकाशन-संग्रह। पुस्तकमे उपलब्ध प्रकाशकीय विवरणमे २०१२ आ २०२२ क अभिलेखीय अधिकार-वर्ष उल्लेखित अछि; एहि वर्षसभकेँ एकमात्र प्रथम प्रकाशन-वर्षक रूपमे ग्रहण नहि कएल गेल अछि।

अनचिन्हार, आशीष। ‘अनचिन्हार आखर’ (गजल, रुबाइ आ कता-संग्रह)। विदेहक पुस्तक-सूचीमे पंजीकृत; ‘जंघाजोड़ी’क लेखकक भूमिकामे पूर्ववर्ती संग्रहक रूपमे उल्लेख।

अनचिन्हार, आशीष। ‘मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास’। विदेह पुस्तक-संग्रहमे सूचीबद्ध; ‘जंघाजोड़ी’क भूमिकामे सैद्धान्तिक मार्गदर्शक कृतिक रूपमे निर्देश।

अनचिन्हार, आशीष। ‘मैथिली गजलक रेडी रेकोनर’। विदेह पुस्तक-संग्रहमे सूचीबद्ध; विधागत प्रशिक्षणक ग्रन्थ-सन्दर्भ।

अनचिन्हार, आशीष। ‘शब्द-अर्थ-शक्ति’। विदेह पुस्तक-संग्रहमे सूचीबद्ध; मैथिली गजल-आलोचनासँ सम्बद्ध कृति।

अनचिन्हार, आशीष। ‘संदर्भ सहित’। विदेह पुस्तक-संग्रहमे सूचीबद्ध; गजल-आलोचनासँ सम्बद्ध कृति।

अनचिन्हार, आशीष। ‘कुमारि इच्छा’ (गजल-संग्रह)। विदेह पुस्तक-संग्रहमे सूचीबद्ध; रचनाकारक अन्य काव्यकृति।

ठाकुर, गजेन्द्र आ अनचिन्हार, आशीष (संयुक्त सम्पादन)। ‘मैथिली गजल : आगमन ओ प्रस्थान बिंदु’। विदेह पुस्तक-संग्रहमे सूचीबद्ध; मैथिली गजल-आलोचनाक सन्दर्भ।

ठाकुर, गजेन्द्र आ अनचिन्हार, आशीष (संयुक्त सम्पादन)। ‘मैथिलीक प्रतिनिधि गजल’। विदेह पुस्तक-संग्रहमे सूचीबद्ध; गजलक परम्परा आ प्रतिनिधि रचनाक ऐतिहासिक सन्दर्भ।

विदेह। ‘विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका : पोथी-संग्रह’। प्रकाशकक ग्रन्थ-सूची; अनचिन्हारक प्रकाशित रचनासभक सूची आ सम्बन्धित गजल-साहित्यक प्रकाशकीय अभिलेख। https://videha-ejournal.github.io/videha/pothi.htm

विदेह। ‘A Parallel History of Mithila & Maithili Literature’। विदेहक साहित्येतिहासपरक शोध-विवेचन; मैथिली गजलक परम्परा-रेखाक सम्बन्धमे प्रस्तुत मत। https://videha-ejournal.github.io/videha/research/2026/438/a-parallel-history-of-mithila-maithili-literature.htm

विदेह। ‘विदेह शोध-लेख : अंक १ सँ ४५१ धरि’। शोध-सूची; आशीष अनचिन्हारक गजल-व्याकरण, गजल-आलोचना आ मैथिली साहित्येतिहास सम्बन्धी प्रकाशित लेखसभक प्रकाशकीय सूची। https://videha-ejournal.github.io/videha/research/videha-scholar-research-book.html

विदेह। ‘Critical Appreciation of Ashish Anchinhar’। रचनाकारक जीवन, कृति, गजल-विधान आ आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्यपर विदेह-सम्बद्ध विवेचन। https://videha-ejournal.github.io/videha/new_page_56.htm