लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख
गजलक विधागत सीमा आ आलोचनात्मक विवेक
सार
‘सन्दर्भ सहित’ मैथिली गजलक शास्त्रीय संरचना, विधागत पहचान आ आलोचनात्मक उत्तरदायित्वक प्रश्नकेँ केन्द्रमे आनयवला आशीष अनचिन्हारक आलोचनात्मक संकलन अछि। पोथीमे गजल नामसँ प्रस्तुत अनेक रचनाक परीक्षण बहर, काफिया, रदीफ, शेरक संरचना, कथ्य आ भाषिक उच्चारणक आधारपर कएल गेल अछि। ई निबन्ध संकलनक सातू मुख्य आलेखक पृथक पुनर्पाठ करैत अछि; संगहि लेखकक मूल्यांकन-पद्धति, ओकर प्रमाणमूलक उपलब्धि, विवादप्रधान भाषाशैली, अन्य विधासँ गजलक सम्बन्ध, मैथिली गजललेखनक ऐतिहासिक क्रम आ वैकल्पिक आलोचनात्मक सम्भावनाक विवेचन करैत अछि। मूल निष्कर्ष ई जे पोथी मैथिली गजलक आलोचनामे तकनीकी जाँचक आवश्यकता स्थापित करैत अछि, मुदा सौन्दर्यात्मक बहुलता, इतिहासक पुष्टिकरण आ प्रतिपक्षक न्यायसंगत प्रस्तुतिक प्रश्न एखनहुँ विमर्शक माँग करैत अछि।
बीजशब्द : मैथिली गजल, बहर, काफिया, रदीफ, छन्दशास्त्र, विधाविज्ञान, साहित्येतिहास, आलोचना-पद्धति, विदेह, आशीष अनचिन्हार।
प्रस्तावना : विधाक प्रश्नसँ आलोचनाक प्रश्न धरि
मैथिली काव्यपरम्परामे गीत, पद, लोकधुन, मुक्तक आ विभिन्न छन्दात्मक रचनाक समृद्ध सहअस्तित्व रहल अछि। एहि बहुल परिदृश्यमे गजल अपन विशिष्ट शेर-विन्यास, तुकान्त व्यवस्था आ छन्दगत अनुशासन लऽ कऽ उपस्थित होइत अछि। गजलकेँ केवल प्रेम-विरहक स्वर अथवा गेयताक पर्याय मानि लेब ताहि विधाक आन्तरिक रचनाविधानकेँ अदृश्य बना दैत अछि। दोसर दिस, शास्त्रीय कसौटीकेँ मात्र अन्तिम निर्णायक मानि लेलासँ अर्थ, अनुभूति, सामाजिक आलोचना आ काव्यात्मक नवीनताक स्वतन्त्र मूल्यांकन बाधित भऽ सकैत अछि। ई द्वन्द्व ‘सन्दर्भ सहित’क केन्द्रीय आलोचनात्मक भूमि अछि।
आशीष अनचिन्हार अपन संकलनमे स्थापित लेखक, नव रचनाकार, सम्पादक, भूमिकाकार आ सार्वजनिक साहित्यिक वक्ताकेँ एक्के विधागत प्रश्नक समक्ष ठाढ़ करैत छथि। एहि प्रक्रियामे रचनाक प्रसिद्धि अथवा रचनाकारक प्रतिष्ठा पर्याप्त प्रमाण नहि मानल जाइत अछि। ई आग्रह मैथिलीमे आलोचनाकेँ व्यक्तिपूजासँ अलग करबाक दिशा प्रदान करैत अछि। तथापि प्रमाण परखबाक अधिकार आ न्यायपूर्वक सुनबाक उत्तरदायित्व संगहि चलबाक चाही—एहि द्वैतकेँ ध्यानमे राखि पोथीक उपलब्धि आ सीमा दुनूक जाँच आवश्यक अछि।
ई अध्ययन मूल संकलनक सम्पूर्ण विन्यासकेँ आधार बनबैत अछि। सहायक साहित्यक चयन विदेहमे उपलब्ध ग्रन्थसूची आ शोध-अभिलेख धरि सीमित अछि। लेखकक अपन इतिहास-संबन्धी दाबी आ अभिलेखसँ स्वतन्त्र रूपेँ पुष्ट तथ्यकेँ पृथक राखल गेल अछि। मूल पाठक अक्षरशः उद्धरण ओतबे उचित मानल जा सकैत अछि जतए पाठान्तर अथवा अक्षररूपक संशय नहि हो; एतए असन्दिग्ध पाठ-स्थितिक अभावमे प्रत्यक्ष पद्य-पङ्क्तिक बजाय तर्क आ प्रसंगक विश्वसनीय विवेचन प्रस्तुत अछि।
ग्रन्थक रचना, स्वरूप आ सम्पादकीय अभिप्राय
संकलन दू खण्डमे व्यवस्थित अछि। पहिल खण्डमे छहटा विस्तृत आलेख अछि—बैकुण्ठ झाक गजल-संग्रहपर चर्चा, कमलमोहन चुन्नूक भूमिकाक आलोचना, काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क नामसँ गजल कहाएल रचनाक जाँच, अरविन्द ठाकुरक विधान-विरोधी प्रस्तावनासँ विमर्श, मैथिली गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुरक कथित गजलक मूल्यांकन आ अनेक संग्रह-भूमिकाक सामूहिक समीक्षा। दोसर खण्डमे धिरेन्द्र प्रेमर्षि आ सियाराम झा ‘सरस’क सार्वजनिक बातचीतक सन्दर्भमे गजलक शास्त्रीय पक्षपर प्रश्नोत्तरात्मक विवेचन अछि। लेखकक वक्तव्य आ परिचय एहि आलोचनात्मक सामग्रीकेँ एकटा आत्मस्थित साहित्यिक कार्यक्रमक रूप दैत अछि।
एहि पोथीक स्वरूप परम्परागत एक-विषयक शोधग्रन्थसँ कनेक भिन्न अछि। ई अलग-अलग समयमे लिखल आलोचनात्मक हस्तक्षेपक संकलन अछि; तें एक्के उदाहरणक पुनरावृत्ति, पूर्वक विवादक पुनः स्मरण आ पाठकसँ प्रत्यक्ष सम्बोधन बारम्बार भेटैत अछि। एकर लाभ ई जे विभिन्न प्रसंगमे लेखकक सिद्धान्तक निरन्तरता देखाइत अछि। हानि ई जे कखनो तर्कक प्रसारक स्थान पुनरुक्ति लऽ लैत अछि आ घटनाक विशिष्ट ऐतिहासिक सन्दर्भ अपेक्षाकृत पाछाँ चलि जाइत अछि। एहि ग्रन्थकेँ क्रमिक विवादक साहित्यिक अभिलेख मानल जाए तँ ओकर संरचना अधिक स्पष्ट होइत अछि।
ग्रन्थक शीर्षक ‘सन्दर्भ सहित’ स्वयं आलोचनामे प्रसंग, पूर्वपाठ आ उदाहरणक आवश्यकताक संकेत अछि। लेखकक ध्यान केवल किछु रचना असफल सिद्ध करब नहि, बल्कि गजल कहबाक अधिकारक आधार स्पष्ट करब अछि। यथार्थतः पोथीक सभसँ महत्त्वपूर्ण प्रश्न अछि—विधाक नाम देब लेखकक निजी स्वतन्त्रता अछि कि साझी साहित्यिक परम्पराक प्रति उत्तरदायित्व सेहो? संकलन एहि प्रश्नक उत्तर कठोर विधागत अनुशासनक पक्षमे दैत अछि।
आलोचनाक आधार : बहर, काफिया, रदीफ आ अर्थ
गजलक रचनाविधानमे बहर शेरक दूनू मिसराक वजनक एकरूपताक प्रश्न उठबैत अछि; काफिया तुकान्त ध्वनिक पुनरागमनसँ सम्बद्ध अछि; रदीफ आवर्ती शब्द अथवा पदावली अछि, जकर उपस्थिति प्रत्येक गजलमे अनिवार्य नहि मानल जाइत अछि। मतलामे तुकान्त विन्यासक आरम्भिक संकेत आ मकतामे तखल्लुसक सम्भावना परम्परागत शिल्पकेँ चिन्हित करैत अछि। एहि सभ शब्दक प्रासंगिकता तखने अछि जखन उच्चारण, लघु-गुरु, संयुक्ताक्षर आ भाषिक प्रवाहसँ ओकर सम्बन्ध स्पष्ट हो।
अनचिन्हार विधागत मान्यता आ सौन्दर्यात्मक श्रेष्ठताकेँ दू भिन्न प्रश्न मानबाक आग्रह करैत छथि। हुनकर तर्कक सार ई अछि जे कोनो रचना शिल्पगत कारणेँ गजल नहि भेल तँ से स्वतः खराब कविता नहि भऽ जाइत अछि। ओ गीत, कविता अथवा दोसर विधामे मूल्यवान भऽ सकैत अछि; मुदा ओकर नामकरण पुनर्विचार योग्य रहत। ई अन्तर आलोचनात्मक रूपसँ उपयोगी अछि, कारण विधागत वर्गीकरण आ कलात्मक मूल्यांकनक घालमेल साहित्यिक बहसकेँ भावुक बना दैत अछि।
एतए एकटा जरूरी सूक्ष्म भेद अछि। गजलमे छन्दकेँ कविता-पाठक मात्रात्मक अनुशासन मानब आ गेय प्रस्तुतीक सङ्गीतात्मक तालकेँ ओही कसौटीक स्थानापन्न बना देब अलग-अलग बात अछि। काव्यात्मक मात्रा आ सङ्गीतक मात्रा शब्दरूपेँ समीप लगैत अछि मुदा विश्लेषणक विषय भिन्न अछि। संकलनक उत्तरार्ध एहि भेदपर विशेष बल दैत अछि। तथापि गेय प्रस्तुतीक प्रभाव, स्वर-संवेदना आ पाठकानुभव पूर्णतः अप्रासंगिक नहि; ई सभ विधागत पहचानक पश्चात् सौन्दर्य-मूल्यांकनमे अपन स्थान रखैत अछि।
मैथिली उच्चारणक विशेषता छन्दनिर्णयमे निर्णायक भऽ सकैत अछि। चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वारक भार, ह्रस्व-दीर्घक व्यवहार, शब्दान्त स्वर, संयुक्ताक्षरक ध्वन्यात्मक निष्पादन आ स्थानीय बोलचालक गति शास्त्रीय गणनाक पाछाँ रहनिहार जीवित भाषा अछि। एहि कारण मैथिली गजलक शास्त्रक निर्माण केवल उर्दू अथवा हिन्दीक सूत्रक प्रतिलिपि नहि, बल्कि मैथिलीक उच्चारण-व्यवस्थाक आधारपर समीकरणक परीक्षण सेहो अछि। विदेहमे उपलब्ध अनचिन्हारक पहिलुका गजल-आलोचनाक आलेख एहि दिशाक विकासक प्रमाण प्रस्तुत करैत अछि।
पृथक पाठविश्लेषण : सात आलोचनात्मक हस्तक्षेप
बैकुण्ठ झाक गजल-संग्रह : अन्य विधाक कुशलता आ गजलक स्वतन्त्र शास्त्र
पहिल आलोचनामे बैकुण्ठ झाक लघुकथाकार रूप आ हुनकर गजल नामसँ प्रकाशित रचनाक तुलनामूलक विवेचन अछि। लेखकक मूल प्रश्न ई जे कथासँ लघुकथाक भिन्नता माननिहार रचनाकार गजल आ गीतक बीच समान विधागत दूरी किएक नहि स्वीकार करैत छथि। एहि तुलना द्वारा अनचिन्हार एकटा रोचक सिद्धान्त स्थापित करैत छथि—कोनो विधामे निपुणता दोसर विधाक शास्त्रक स्वतः अधिकारपत्र नहि बनैत अछि। साहित्यिक प्रतिभा स्थानान्तरित भऽ सकैत अछि, मुदा विधागत शिक्षणक आवश्यकता समाप्त नहि होइत अछि।
अहि समीक्षामे छन्द-गणनाक समस्या काव्यात्मक अर्थसँ जोड़ल गेल अछि। उच्चारण आ संयुक्ताक्षरक व्यवहारपर बल देलाक बाद समीक्षक रचनामे भक्ति, वैचारिक असंगति आ नव प्रतीकक सम्भावना सेहो चिन्हित करैत छथि। एहि क्रममे ओ किछु चित्रात्मक प्रयोगकेँ स्वागतयोग्य मानैत छथि। ई महत्त्वपूर्ण पक्ष अछि, कारण एतए लेखक केवल नियम-रक्षक नहि रहि जाइत छथि; ओ रचनाक प्रतीकात्मक उर्वरताकेँ सेहो ग्रहण करैत छथि।
तथापि बैकुण्ठ झाक उपलब्धि वा त्रुटिक निर्णायक श्रेणीकरण लेल अधिक विस्तृत तुलनात्मक छन्द-विच्छेद, पूर्ण गजल-विन्यास आ विरोधी उदाहरणक आवश्यकता छल। कुछेक पङ्क्तिक आधारपर सम्पूर्ण संग्रहक विधागत स्थिति निश्चित करब सम्भव अवश्य हो सकैत अछि, मुदा पाठककेँ सम्पूर्ण परीक्षणक पुनरुत्पादन करबाक सुविधा देब उत्तम आलोचनाक अंश होएत। एहि समीक्षा मे लेखकक तर्क तेज अछि, पर तकनीकी परीक्षणक विस्तृत पुनर्प्रदर्शन अपेक्षाकृत सीमित।
कमलमोहन चुन्नूक भूमिका : आलोचकक अधिकार आ आत्ममूल्यांकनक विवाद
दोसर आलोचनामे ध्यान गजलक संग्रहसँ हटि ओकर भूमिकाक वैचारिक संरचनापर केन्द्रित अछि। कमलमोहन चुन्नूक भूमिका अनचिन्हार लेल एहि कारण उल्लेखनीय अछि जे ओहिमे रचनाक अपन मूल्य स्वयं प्रकट करबाक तर्कक सहारे आलोचकक भूमिकाकेँ सीमित कएल जा रहल बुझाइत अछि। अनचिन्हार एहि विचारक विरुद्ध आलोचनाकेँ सार्वजनिक परीक्षण, साहित्यिक संवाद आ ज्ञानात्मक उत्तरदायित्वक रूपमे स्थापित करबाक प्रयास करैत छथि।
एहि विमर्शक सबसँ सशक्त तत्त्व अछि उदाहरणक माँग। जँ कोनो रचनाकार मानैत छथि जे छन्दक पालनसँ कथ्य नष्ट भऽ जाइत अछि तँ ओकर पक्षमे लिखित रचना, शेर अथवा ठोस पाठ-साक्ष्य प्रस्तुत कएल जएबाक चाही—ई आग्रह आलोचनाक सामान्य न्यायसङ्गत नियम अछि। लेखक उलट उदाहरण रूपमे एहन शाइरक उल्लेख करैत छथि जिनकर गजल छन्दबद्ध रहितो राजनीतिक, सामाजिक आ मानवीय अनुभव व्यक्त करैत अछि। एहन तुलनासँ ‘रूप बनाम कथ्य’क कठोर विरोध अपर्याप्त सिद्ध होइत अछि।
किन्तु एतय व्यक्ति-सम्बन्धी तिक्त व्यङ्ग्य, उद्देश्यपर आरोप आ प्रतिपक्षक मनोवृत्तिक अनुमान आलोचनाक प्रदर्शनीय साक्ष्यकेँ दुर्बल करैत अछि। तर्कक मूल्यांकन लेखकक वैयक्तिक अभिप्रायसँ पृथक रहबाक चाही। एहि आलेखक आधारभूत सिद्धान्त टिकाऊ अछि—भूमिका साहित्यिक बहससँ मुक्त क्षेत्र नहि—मुदा ओकर श्रेष्ठ सम्भावना तखने खुलैत अछि जखन विवादक असहमति अपेक्षाकृत संयमित प्रमाण-भाषामे व्यक्त हो।
काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क गीत : नामकरण, सम्पादन आ ऐतिहासिक साक्ष्य
तेसर आलेख काञ्चीनाथ झा ‘किरण’क भक्ति आ शृङ्गार गीतक सम्पादित संकलनक समीक्षा करैत गजल नामसँ चिह्नित किछु रचनाक रूपपर प्रश्न उठबैत अछि। चर्चा केवल बहरक नहि; मूल पाठक सम्पादकीय वर्गीकरण, भूमिकामे विधा-परिचयक अभाव, एकहि रचनाक पुनरावृत्ति आ पूर्ववर्ती काव्यपरम्पराक अनुगमनक स्वरूप सेहो समीक्षाक विषय बनैत अछि। एहि कारण ई आलेख विधाविज्ञानक संग पाठसम्पादनक आलोचना सेहो अछि।
अनचिन्हारक प्रश्न ई जे राग-रागिनी अथवा गेयता सँ सम्बन्धित संज्ञाक समानता साहित्यिक विधागत नामकरणक प्रमाण नहि बनि सकैत अछि। एहि ठाम गीत आ गजलक बीच भेदक विवेचन विशेष महत्त्व रखैत अछि। संकलनक ऐतिहासिक लेखकीय मूल्य अस्वीकार नहि कएल गेल अछि; आपत्ति एतबे अछि जे ओहि विशिष्ट रचनाकेँ गजलक इतिहासमे प्रमाणस्वरूप स्थापित करब विधागत भ्रम बढ़ा सकैत अछि।
एहि आलेखमे सम्पादकक उत्तरदायित्वक चर्चा आलोचनाकेँ नव आयाम दैत अछि। पुरान सामग्रीक नब सम्पादन करैत समय मूल रचनाक शीर्षक, परम्परा, पाठान्तर आ रचनाविधानक सम्बन्ध स्पष्ट करब आवश्यक अछि। तथापि किछु पारम्परिक पदरूपमे गजल-प्रभाव, गेय संरचना अथवा रागात्मक विन्यास रहि सकैत अछि; ताहि सम्भावनाक अध्ययन ‘गजल नहि’क निर्णयक बादो आवश्यक रहैत अछि। एहि दिशा मे अधिक ध्वन्यात्मक आ सांस्कृतिक तुलना आलोचनाकेँ समृद्ध कऽ सकैत छल।
अरविन्द ठाकुरक भूमिका : अनुशासन, विद्रोह आ नवीनताक द्वन्द्व
चारिम आलेख संकलनक सबसँ व्यापक सैद्धान्तिक बहस अछि। अरविन्द ठाकुरक साहित्यकेँ संहिताक अधीन नहि मानबाक प्रस्तावनाकेँ अनचिन्हार प्रश्नांकित करैत छथि। हुनका लेल प्रत्येक विधाक स्वीकृत संरचना कोनो कारागार नहि, बल्कि साझा अर्थनिर्माणक आधार अछि। विधाक नियमसँ संवाद करैत नवीनता सम्भव अछि; बिना वैकल्पिक रचनात्मक सिद्धान्त प्रस्तुत केने नियम भङ्ग करब मात्र मौलिकता सिद्ध नहि करैत अछि। एहि तर्कक मार्फत पोथी नव प्रयोग आ अव्यवस्थित विधा-भङ्गक बीच अन्तर करबाक आग्रह करैत अछि।
लेखक वेद, छन्द, संस्कृत उद्धरण, लोकदृष्टान्त आ शास्त्रीय परम्पराक बहुल सन्दर्भ दैत छथि। विशेष बात ई जे ‘संहिता’ पर चर्चा करैत-करैत ई आलेख संहिताक अर्थक विस्फार करैत साहित्यक सामाजिक नियमन, अभिव्यक्तिक मर्यादा आ भाषिक संरचनाकेँ एकहि बहसमे आनय चाहैत अछि। ई बौद्धिक प्रसार पोथीक महत्त्वपूर्ण गुण अछि, मुदा कखनो एहि प्रसारमे विधागत नियम आ सामाजिक-नैतिक नियमन समानार्थी बुझाए लगैत अछि, जबकि दुनूक उद्गम आ प्रभाव अलग अछि।
आलोचनाक एकटा मुख्य उपलब्धि भाषानुकूलनक सिद्धान्त अछि। अरबी, फारसी, उर्दू आ मैथिलीमे बहरक रूपान्तरणक चर्चा करैत लेखक एतय अन्धानुकरणक विरोध करैत छथि। एहि आधारपर कहल जा सकैत अछि जे हुनकर अनुशासनवाद नितान्त जड़ नहि; ओ परम्पराक परिवर्तन स्वीकार करैत छथि, किन्तु परिवर्तनक पहचान लेल स्पष्ट नव रूपविधान चाहैत छथि। एहि बातकेँ काव्यशास्त्रीय दृष्टिएँ सकारात्मक मानब चाही। दोसर दिस, प्रयोगधर्मी गजलकेँ केवल नाम-बदलावक प्रश्नमे सीमित करब नव विधागत अन्तर्सम्बन्धक मूल्यांकनकेँ संकुचित कऽ सकैत अछि।
आलेखक अनेक खण्डमे प्रतिपक्षक कथन राखि तकर उत्तर देबाक पद्धति अपनाएल गेल अछि। ई बहसकेँ पाठसापेक्ष बनबैत अछि; पाठक विवादक दूनू पक्षक सूत्र देखैत छथि। मुदा चयनित कथनक सन्दर्भ, ओकर सम्भावित भिन्न अर्थ आ समर्थक साक्ष्यक अधिक उदार प्रस्तुति रहितै तँ विमर्श आओर सन्तुलित होइत। एहि अध्यायक ऐतिहासिक महत्त्व एकरेमे अछि जे ई मैथिली गजलकेँ रचना-शिक्षणसँ उठाकऽ साहित्यिक सिद्धान्तक सार्वजनिक प्रश्न बनबैत अछि।
मैथिली गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुर : प्रभावशाली गीत आ गजल रूपक भेद
पाँचम आलेखमे समीक्षाक विषय मैथिली गीतकार रवीन्द्रनाथ ठाकुरक गजल नामसँ सम्बद्ध रचना अछि। एतय आलोचक इतिहासक एकटा सूक्ष्म प्रश्न उठबैत छथि—कोनो प्रतिष्ठित गीतकारक रचनापर ‘गजल’ नाम अंकित होएब ओकर शास्त्रीय विधागत स्वरूपक पर्याप्त प्रमाण अछि कि नहि। उत्तरमे ओ मैथिली गजलक पहिलुका उदाहरणक शेर-विन्यास आ छन्दबद्धताक तुलना गीतात्मक रचनासँ करैत छथि। एहि प्रकार संकलन प्रभावशाली लेखक आ विधागत प्रमाणक बीच आवश्यक दूरी बनबैत अछि।
जीवन झा, सीताराम झा, काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’, योगानन्द हीरा आ जगदीशचन्द्र ठाकुर ‘अनिल’क उदाहरणक सहारे लेखक देखबैत छथि जे गजलमे भक्ति-विरह, राजनीतिक विसङ्गति, श्रमिक अथवा जनजीवनक अनुभूति, अभाव आ सामाजिक विद्रूपता समेटल जा सकैत अछि। ई तुलना महत्वपूर्ण अछि, कारण ओ रूपक अनुशासनकेँ कथ्यक शत्रु नहि बल्कि अभिव्यक्तिक उपकरण मानैत अछि। समाजबोध आ छन्दशुद्धताक संयोग एहि आलेखक सकारात्मक काव्य-दृष्टि अछि।
किन्तु आलोचनात्मक रूपसँ ईहो जरूरी अछि जे गीतकेँ गजल नहि मानबाक निर्णय गीतक आन्तरिक सौन्दर्यकेँ घटा नहि देत। समीक्षक अन्ततः रचनाक गीतात्मक मूल्य स्वीकार करैत छथि; एहि स्वीकृतिक कारण आलेख एकतरफा खण्डन नहि रहि जाइत अछि। एतय मैथिली गीतक नादात्मकता, पदानुक्रम आ लोक-लयक स्वतन्त्र परीक्षण आओर विकसित कएल जाइत तँ शैलिगत तुलना अधिक पूर्ण होइत।
विभिन्न संग्रहक सामूहिक समीक्षा : साहित्यिक नामकरणक सार्वजनिक कसौटी
छठम आलेखमे गजल कहल गेल अनेक संग्रह, भूमिकाकारक वक्तव्य आ प्रचलित भ्रान्तिक तुलनात्मक परीक्षण कएल गेल अछि। एहि विविध सामग्रीक कारण आलोचनाकेँ एकटा साझा पद्धतिसँ देखबाक अवसर भेटैत अछि। मुख्य कसौटी पुनः बहर–काफियाक अनुशासन अछि; मुदा किछु संग्रहमे काफिया-रदीफक सफल विन्यास, भाषा-प्रयोगक सम्भावना अथवा गीतरूपक पठनीयताकेँ लेखक मान्यता सेहो दैत छथि। एहि सूक्ष्म स्वीकारोक्तिसँ बुझाइत अछि जे हुनकर मूल्यांकन सर्वथा द्विआधारी नहि अछि।
एहि प्रसंगमे तारानन्द झा ‘तरुण’, मनोज शाण्डिल्य, रामेश्वर निशान्त, सतीश साजन आ सामूहिक गजल-संकलनक उदाहरण रचनाक नामकरण, भूमिकाक तर्क आ सम्पादकीय जिम्मेदारीक विभिन्न समस्या सामने आनैत अछि। कोनो भूमिकाकार उच्च स्वरक स्वतन्त्रताक पक्षमे छथि तँ कोनो रचनाकेँ परम्परागत छन्दसँ छूट देबाक माँग करैत छथि। अनचिन्हार एहि दावीक तर्कगत असंगतिक अन्वेषण करैत छथि। एहि ठाम आलोचनाक वास्तविक विषय केवल कवि नहि, बल्कि साहित्यिक मान्यता गढ़निहार सम्पादकीय संस्था अछि।
सामूहिक विवेचनक सीमा स्रोत-विस्तारक असमानता अछि। कतहु पूरा संग्रहक रचनात्मक शिल्पपर विचार अछि, कतहु प्रमुखतः भूमिकाक कथनपर आपत्ति। एहन स्थिति मे सबटा कृतिकेँ एकहि प्रकारक असफलता-निर्णयक अन्तर्गत रखबाक सावधानी चाही। श्रेष्ठ विधागत आलोचनाकेँ पुस्तक-वार प्रमाण-श्रृंखला, छन्द-विच्छेद, पाठान्तर आ स्वतन्त्र सौन्दर्य-मूल्यांकनक मध्य सम्बन्ध स्पष्ट करबाक चाही।
दू साहित्यकारक बातचीत : मौखिक वक्तव्यक पाठीय परीक्षा
दोसर खण्डमे धिरेन्द्र प्रेमर्षि आ सियाराम झा ‘सरस’क सार्वजनिक बातचीतसँ उठल गजल-विषयक तर्कक समीक्षा अछि। ई लेख संकलनक माध्यम-परिवर्तनक साक्षी अछि। एतय स्थिर पुस्तक आ लिखित भूमिकाक स्थानपर तत्कालिक मौखिक कथन आलोचनाक सामग्री बनैत अछि। लेखक छन्दक मात्रा आ सङ्गीतक मात्रा, लिखित काव्य-विन्यास आ गायन, रचनाक लोकप्रियता आ विधागत वैधता—एहि तीनू भेदकेँ विशेष रूपसँ स्पष्ट करैत छथि।
लेखकक प्रतिप्रश्न पाठककेँ ई सोचबाक प्रेरणा दैत अछि जे गाएल जा सकबाक सम्भावना मात्र गजल बनबाक कसौटी नहि; दोहा, गीत आ आन छन्द सेहो गाओल जाइत अछि। एतय साहित्यक रूपात्मक व्याकरण आ प्रस्तुतीकरणक सौन्दर्यक क्रम पृथक होइत अछि। वस्तुतः ई अन्तर प्रदर्शनक क्षेत्रमे विधागत पहचानक वैज्ञानिक जाँच लेल महत्त्वपूर्ण अछि।
मौखिक बातचीतक आलोचना करैत सन्दर्भ, कथनक पूरा आशय आ वक्ताक वक्तव्यक समय-विशिष्टता विशेष जरूरी होइत अछि। पुस्तकमे व्यक्तिक क्षमता अथवा उद्देश्यपर तीव्र टिप्पणी विमर्शक प्रमाणिक पक्षकेँ गौण करबाक जोखिम उत्पन्न करैत अछि। शास्त्रीय नियमक व्याख्या एतय उपयोगी अछि; मुदा अधिक सन्तुलित सम्पादन, मूल कथनक समग्रता आ उत्तरक अनुपातबद्धता ओकर सार्वजनिक बौद्धिक मूल्य बढ़बैत।
साहित्येतिहासक तुलनात्मक विवेचन
आरम्भिक शिल्प-साक्ष्यसँ समकालीन विवाद धरि
‘सन्दर्भ सहित’ मैथिली गजलक इतिहासक आरम्भिक चरणकेँ जीवन झाक नामसँ जोड़ैत अछि आ हुनकर शेरक शिल्पगत नियमितताकेँ प्रारम्भिक प्रमाण मानैत अछि। ओहि क्रममे सीताराम झा आ ‘मधुप’सँ लऽ कऽ उत्तरवर्ती शाइर धरि गजलक आन्तरिक अनुशासनक निरन्तरता खोजल जाइत अछि। एहि ऐतिहासिक पुनर्निर्माणक विशिष्टता ई जे लेखक प्रसिद्धि अथवा प्रकाशन-वर्षक बजाय छन्दात्मक उदाहरणसँ विधाक इतिहास सिद्ध करबाक प्रयास करैत छथि। ई दिशा स्रोताधारित इतिहासक दृष्टिएँ उपयोगी अछि।
संकलनमे गजल-विमर्शक आरम्भ आ विस्तारक सन्दर्भमे तारानन्द वियोगीक पूर्ववर्ती हस्तक्षेप, रामदेव झाक सैद्धान्तिक प्रयत्न आ नव सहस्राब्दीक उत्तरार्धमे ‘अनचिन्हार आखर’क सक्रियताक क्रम प्रस्तुत अछि। २००८ क आसपासक डिजिटल गजल-विमर्श आ २००९ सँ ‘मैथिली गजल शास्त्र’क विकास विदेहमे प्रकाशित अनचिन्हारक स्वतन्त्र आलेखसँ सेहो पुष्ट होइत अछि। तथापि संकलनमे आएल प्राचीनता, प्रथमत्व, रचनाकार-संख्या आ लेख-संख्याक परिमाणात्मक दाबीकेँ स्वतन्त्र ग्रन्थसूची-आधारित गणना बिना स्थापित इतिहासक अन्तिम निष्कर्ष नहि मानबाक चाही।
साहित्येतिहास केवल तिथिक क्रम नहि, अवधारणाक विकास सेहो अछि। आरम्भिक गजलकारक शेरमे रूपक अन्तर्गत रहि कथ्यक विविधता; परवर्ती दशामे गीत आ गजलक नामकरणक विवाद; आ डिजिटल युगमे छन्दक नियमक सामूहिक शिक्षण—ई तीनू चरण अलग-अलग प्रकृतिक ऐतिहासिक प्रक्रिया अछि। पहिल चरण रचनाक उदाहरण दैत अछि, दोसर चरण विधागत पहिचानक विवाद पैदा करैत अछि, तेसर चरण आलोचना आ पाठशिक्षणक लोकतान्त्रिक प्रसार सम्भव करैत अछि। एहि रूपमे अनचिन्हारक ग्रन्थ इतिहासक एकटा विवादशील, मुदा उपेक्षणीय नहि, दस्तावेज अछि।
विदेहक अभिलेखमे समवर्ती विमर्श
विदेहक शोध-अभिलेखमे अनचिन्हारक काफिया आ बहर विषयक आरम्भिक आलेख, गजल व्याकरणक प्रारम्भिक प्रयोगपर स्वतन्त्र विवेचन, नरेन्द्रक मैथिली–हिन्दी गजलक तुलनात्मक समीक्षा, मैथिली गजलक बयान-सन्दर्भ, दुष्यंत कुमारक गजलक मिजाजसँ सम्बन्धित विमर्श आ गीत-सङ्गीतक इतिहासक प्रश्न दर्ज अछि। एहि अभिलेखक महत्त्व ई जे ‘सन्दर्भ सहित’मे व्यक्त मत एकटा एकाकी, तात्कालिक प्रतिक्रिया नहि; ओकर पाछाँ निरन्तर विकसित होइत तकनीकी, तुलनात्मक आ सामाजिक आलोचनाक काज चलि रहल छल।
एकर संगहि विदेहमे उपलब्ध ‘मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास’, ‘मैथिली गजलक रेडी रेकोनर’, ‘अनचिन्हार आखर’ आ ‘शब्द-अर्थ-शक्ति’ सन ग्रन्थक सूचीक उपस्थिति एहि आलोचनाकेँ लेखकक व्यापक रचनात्मक परियोजनासँ जोड़ैत अछि। एहि ग्रन्थसभक शीर्षक, प्रकृति आ विदेहमे उपलब्धताक पुष्टि अभिलेखसँ होइत अछि; मुदा एतय ओहि प्रत्येक ग्रन्थक सम्पूर्ण पाठक स्वतन्त्र परीक्षणक दावा नहि कएल जा रहल अछि। ई भेद आलोचनात्मक विवेकक अनिवार्य शर्त अछि।
साहित्येतिहासक दोसर सावधानी ‘मुख्यधारा’ आ ‘समानान्तर’क द्विभाजनसँ सम्बद्ध अछि। वैकल्पिक मंचक भूमिका निर्विवाद रूपेँ महत्त्वपूर्ण भऽ सकैत अछि, मुदा प्रत्येक पूर्ववर्ती रचनाकारकेँ एकरूप समूह मानि लेब इतिहासक आन्तरिक अन्तरकेँ अस्पष्ट बना दैत अछि। साहित्यिक परिवर्तनमे सहमति, असहमति, रूपान्तरण, परम्परागत छन्दक पुनर्पाठ आ नब भाषिक प्रयोग सभक सहभागिता रहैत अछि। तें सम्यक् इतिहासकेँ केवल पक्ष-विपक्षक इतिहास नहि, पाठ-परम्पराक बहुविकल्पी इतिहास बनबाक चाही।
तुलनात्मक सौन्दर्यशास्त्र : रूप, कथ्य आ विधागत स्वातन्त्र्य
रूप आ कथ्यक सम्बन्धपर ‘सन्दर्भ सहित’ एकटा उपयोगी सुधार प्रस्तुत करैत अछि। शास्त्रीय अनुशासनकेँ रचनात्मक प्रतिबन्ध माननिहार दृष्टिक विरुद्ध संकलन अनेक विषयक गजलक संकेत दैत अछि—विरह, पारिवारिक अभाव, सामाजिक विसङ्गति, राजनीतिक क्षोभ आ मानवीय गरिमा। ई दृष्टान्त सभ बतबैत अछि जे पूर्वनिर्धारित छन्द-विन्यास आवश्यक रूपसँ काव्यकेँ निष्प्राण नहि करैत अछि। कविता कथ्यक प्रभाव आ रूपात्मक चयनक परस्पर क्रियासँ जनमैत अछि; कोनो एकटा पक्ष दोसर पक्षक स्थायी शत्रु नहि।
तथापि शास्त्रीय रूपक उपस्थिति मात्र सौन्दर्य-मूल्यक सुनिश्चित प्रमाण सेहो नहि। एकर प्रमाणक आवश्यकता अछि जे विधागत योग्यताक परीक्षा पार करल रचना विषयक गाम्भीर्य, बिम्बक नवीनता, ध्वन्यात्मक सूक्ष्मता आ अनुभवक जटिलता सेहो वहन करैत हो। अनचिन्हारक आलोचना जखन शिल्पगत दोषक उद्घाटनक बाद प्रतीक, सामाजिकता आ भावभूमि दिस मुड़ैत अछि, तखने ओकर साहित्यिक सम्भावना सर्वाधिक खुलैत अछि। एहि दोहरी पद्धतिक आओर नियमित विकास मैथिली गजल-समालोचना लेल फलदायक होएत।
गीत आ गजलमे अन्तर्सम्बन्धक प्रश्न सेहो महत्त्वपूर्ण अछि। दूनू रूप गेय भऽ सकैत अछि, दूनूमे तुकान्त अथवा आवृत्ति सम्भव अछि, दूनू लोकभाषा आ शास्त्रीय संस्कारसँ पोषित भऽ सकैत अछि। तथापि गीतक पदबद्ध प्रवाह आ गजलक शेरगत आंशिक स्वायत्तता, मतला-आधारित तुकान्त-व्यवस्था आ बहरगत अनुशासन एकर भिन्न विन्यास रचैत अछि। एहि भेदकेँ स्वीकार करैतो सांस्कृतिक सम्पर्कक अध्ययनेक दरबाजा बन्द नहि करबाक चाही। गजल लेल विधागत सीमा आ गीत लेल स्वतन्त्र गौरव दूनू एकसंग सुरक्षित राखल जा सकैत अछि।
भाषा, व्यङ्ग्य, पुनरावृत्ति आ आलोचनात्मक वाणी
अनचिन्हारक गद्य संवादप्रधान, प्रश्नोन्मुख आ विवादक तापसँ संचालित अछि। ओ पाठकसँ सीधा प्रश्न करैत छथि, लोकजीवनक उपमान आनैत छथि, छन्दक गणनाक व्यवहारिक उदाहरण दैत छथि आ रचनाकारक कथनक प्रत्यक्ष प्रतिवाद करैत छथि। एहि शैलीक गुण अछि सहज पहुँच। छन्दक तकनीकी विषय केवल विशेषज्ञक रहस्य नहि रहि साधारण पाठक लेल विचारणीय प्रश्न बनैत अछि। खीरक निर्माणक तुलनासँ विधाक अनिवार्य अवयव आ वैकल्पिक अलङ्कारक अन्तर बुझएबाक प्रयास एहि लोकाभिमुख आलोचनात्मक प्रवृत्तिक निदर्शन अछि।
एहि शैलीक दोसर पक्ष तिक्त उपहास अछि। व्यक्तिक उद्देश्य, योग्यता अथवा निजी हितपर संकेत करैत काल तर्क आ अनुमानक दूरी घटि जाइत अछि। फलतः एकटा प्रमाणिक तकनीकी आपत्ति सेहो वैयक्तिक विवाद जकाँ ग्रहण कएल जा सकैत अछि। आलोचनाक प्रभाव केवल तर्कक कठोरतासँ नहि, प्रतिपक्षक सर्वोत्तम सम्भव अर्थ बुझि ओकर उत्तर देबाक क्षमतासँ सेहो बनैत अछि। एहि दृष्टिएँ ‘सन्दर्भ सहित’क भाषा कखनो अपन प्रमाणात्मक योगदानक विरुद्ध काज करैत देखाइत अछि।
एक्के शेर अथवा छन्द-उदाहरणक पुनरागमन लेखकक स्पष्ट सम्पादकीय रणनीतिक अंश बुझाइत अछि। प्रत्येक अलग आलेखक पाठक धरि न्यूनतम प्रमाण पहुँचेबाक उद्देश्यसँ ई पुनरावृत्ति उपयोगी छल। मुदा संकलनरूपमे पढ़ैत काल ई पद्धति समालोचनाक क्रमागत विकासकेँ अस्पष्ट सेहो करैत अछि। भविष्यक संशोधित संस्करणमे सामान्य विधा-परिचयकेँ आरम्भमे संगठित कऽ प्रत्येक आलेखमे नब पाठीय समस्या आ नवीन उदाहरणकेँ अधिक स्थान देल जाए तँ ग्रन्थक अध्ययन-सुलभता बढ़त।
आलोचनाक ज्ञानमीमांसा : उपलब्धि आ मर्यादा
एहि पोथीक निर्णायक उपलब्धि विधागत दावीक प्रमाण माँगब अछि। लेखक, भूमिकाकार, सम्पादक अथवा लोकप्रियता—एहि सभमे सँ कोनो एकटा वस्तु अपने-आप गजलक कसौटी नहि बनैत अछि। रचनाक रूपक परीक्षा, प्रयोगक इतिहास, भाषिक उच्चारण आ विचारक सन्दर्भ एकसंग देखबाक आग्रह मैथिली आलोचनामे अनुशासनक महत्त्वपूर्ण पुनर्स्थापना अछि।
दोसरा पक्षमे किछु प्रश्न शेष रहैत अछि। पहिल, गजलक परम्परागत परिभाषा आ आधुनिक प्रयोगशील परिभाषा कतेक दूर धरि बहुवचनमे सहअस्तित्व रखि सकैत अछि? दोसर, छन्दशुद्ध रचना कला-दृष्टिएँ कमज़ोर भेल तँ ओकर मूल्यांकनक अगिला स्तर की होएत? तेसर, गेयता आ जनस्वीकृतिक भूमिका विधागत कसौटीक पश्चात् केहन प्रकारेँ जाँचल जएत? चारिम, विविध बोलचालमे शब्दक उच्चारण अलग भेलासँ एकहि मिसराक वजनक प्रश्न केना सुलझत? पाँचम, इतिहासक परिमाणात्मक विवरण लेल स्रोत-विस्तार, तिथि-निर्धारण आ सम्पूर्ण कृतिसूचीक केहन प्रमाण अपेक्षित अछि?
अहि प्रश्नक उत्तर अनचिन्हारक स्थापनाक सरल खण्डनसँ नहि, ओकर अनुसन्धानी विस्तारसँ सम्भव अछि। एकटा सक्षम आलोचनात्मक पद्धति पहिने रचनाक पाठ निर्धारित करत; फेर छन्द आ काफियाक परीक्षण करत; तकर बाद अर्थ, बिम्ब, सामाजिक अनुभव आ रचना-सन्दर्भ देखत; आ अन्तमे ऐतिहासिक दावीक स्रोतगत विश्वसनीयताक जाँच करत। एहि चारि स्तरीय क्रममे ‘गजल अछि कि नहि’ आ ‘श्रेष्ठ काव्य अछि कि नहि’क उत्तर अलग-अलग, मुदा परस्पर सम्बद्ध रूपमे भेटि सकैत अछि।
निष्कर्ष : विधाक रक्षा सँ साहित्यिक विवेक धरि
‘सन्दर्भ सहित’क स्थान मैथिली साहित्यक ओहि आलोचनात्मक धारामे अछि जतए विधाक प्रतिष्ठा रचनाकारक प्रतिष्ठासँ ऊपर राखल जाइत अछि। ई पोथी गजलकेँ केवल एकटा भावधर्म अथवा संगीतात्मक प्रस्तुति नहि मानि छन्द, ध्वनि आ शेर-विन्यासक विशिष्ट काव्यरूप रूपमे परीक्षण करबाक आग्रह करैत अछि। सातू आलेख मिलि मैथिली गजलक आलोचनाकेँ पाठ, भूमिका, सम्पादन, मौखिक विमर्श आ ऐतिहासिक दावीक विविध धरातलपर विस्तारित करैत अछि।
ग्रन्थक सबसँ मजबूत योगदान शास्त्रीय कसौटीक सार्वजनिककरण, उदाहरणक माँग, गीत–गजलक भेदक स्थापना आ रचनाक विधागत पहचान आ काव्य-मूल्यक पृथक्करण अछि। एकर सीमा कखनो व्यक्तिनिष्ठ प्रतिवाद, ऐतिहासिक संख्या-सम्बन्धी अपुष्ट प्रस्तुति, पुनरावृत्ति आ सौन्दर्यात्मक विश्लेषणक अपेक्षाकृत अल्प विस्तारमे देखाइत अछि। तथापि एहि सीमा सभकेँ चिन्हित करब पोथीक महत्त्व घटाएब नहि; उलटे एकर प्रतिपादित प्रमाणप्रधान मूल्यकेँ ओकरे ऊपर लागू करब अछि।
मैथिली गजलक आगामी आलोचनाक लेल एहि संकलनसँ दू शिक्षा मिलैत अछि—रूपक प्रश्नसँ भागल नहि जाए आ रूपक प्रश्नपर आलोचना समाप्त सेहो नहि कएल जाए। कविता अनुशासित भाषा आ जीवित अनुभवक सम्मिलित साधना अछि। अनचिन्हारक हस्तक्षेप एहि साधनाक पहिल पक्षकेँ दृढ़तासँ सामने अनैत अछि; दोसर पक्षकेँ बराबर विकसित करब नव पीढ़ीक आलोचकक काज अछि। एहि अर्थमे ‘सन्दर्भ सहित’ बन्द निर्णय नहि, मैथिली गजलपर अधिक कठोर, बहुविषयक आ प्रमाणसचेत बहसक एकटा सशक्त आरम्भिक आधार बनैत अछि।
सन्दर्भसूची
मूलाधार आ सहायक सन्दर्भ सभ विदेहक प्रकाशित ग्रन्थसूची आ शोध-अभिलेखसँ चुनल गेल अछि। सूचीमे देल अन्य पोथीक विवरण ग्रन्थसूचीय साक्ष्य अछि; ओकर सम्पूर्ण पाठक स्वतन्त्र परिशीलनक दावा एहि निबन्धमे नहि कएल गेल अछि।
01. अनचिन्हार, आशीष। सन्दर्भ सहित : गजलक आलोचना–समालोचना–समीक्षा ओ गजलपर आलेख। विदेह साहित्यिक अभिलेख; प्रस्तुत मूल पोथी।
02. अनचिन्हार, आशीष। मैथिली गजलक व्याकरण ओ इतिहास। विदेह पोथी-अभिलेख, ग्रन्थसूचीमे उपलब्ध।
03. अनचिन्हार, आशीष। अनचिन्हार आखर : गजल, रुबाइ आ कताक संग्रह। विदेह पोथी-अभिलेख, ग्रन्थसूचीमे उपलब्ध।
04. अनचिन्हार, आशीष। मैथिली गजलक रेडी रेकोनर। विदेह पोथी-अभिलेख, ग्रन्थसूचीमे उपलब्ध।
05. अनचिन्हार, आशीष। शब्द–अर्थ–शक्ति। विदेह पोथी-अभिलेख, ग्रन्थसूचीमे उपलब्ध।
06. अनचिन्हार, आशीष। ‘काफिया’। विदेह, अङ्क ११२; विदेह शोध-अभिलेख।
07. अनचिन्हार, आशीष। ‘काफिया आ बहर’। विदेह, अङ्क ११३; विदेह शोध-अभिलेख।
08. अनचिन्हार, आशीष। ‘मैथिली काव्यशास्त्रमे झारू छंदक अवधारणा : स्वरूप आ तत्व निर्धारण’। विदेह, अङ्क १५७, २०१४।
09. अनचिन्हार, आशीष। ‘मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग’। विदेह, अङ्क १६५, २०१४।
10. अनचिन्हार, आशीष। ‘बयानक सन्दर्भमे मैथिली गजल’। विदेह, अङ्क २५१, २०१८।
11. अनचिन्हार, आशीष। ‘नरेन्द्रजीक मैथिली आ हिन्दी गजलक तुलनात्मक विवेचना’। विदेह, अङ्क २५२, २०१८।
12. अनचिन्हार, आशीष। ‘दुष्यंत कुमारक गजलक मिजाज सन गजल मैथिलीमे कहिया लीखल जेतै’। विदेह, अङ्क ३०७, २०२०।
13. अनचिन्हार, आशीष। ‘एकटा मैथिली गजल जे बदलि देलकै मैथिली गीत-सङ्गीतक इतिहास’। विदेह, अङ्क ३१२, २०२०।
14. अनचिन्हार, आशीष। ‘किछु लीखि देलासँ, किछुओ लीखि देलासँ गजल नहि होइत छै’। विदेह, अङ्क ४३७, २०२६।
15. विदेह सम्पादकीय अभिलेख। ‘विदेह पोथी’—मैथिली ग्रन्थ-सूची। https://videha-ejournal.github.io/videha/pothi.htm
16. विदेह शोध-अभिलेख। ‘विदेह शोध-लेख : अंक १ सँ ४५१ धरि’। https://videha-ejournal.github.io/videha/research/videha-scholar-research-book.html
17. अनचिन्हार, आशीष। ‘मैथिली गजल व्याकरणक शुरूआती प्रयोग’। विदेहक मूल आलेख : https://www.videha.co.in/research/2014/165/मैथिली-गजल-व्याकरणक-शुरूआती-प्रयोग.htm
