लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख
लोकसमाज, सुधार आ रंगमंचीय प्रतिरोध
नाटक-संग्रहक स्वरूप
‘नवघर’ बेचन ठाकुरक चारि एकांकीक संग्रह अछि। पल्लवी प्रकाशन, निर्मली (सुपौल) सँ प्रकाशित एहि पुस्तकमे ‘नीशा मुक्ति’, ‘बरहम बाबा’, ‘घोघवाली कनियाँ’ आ ‘रसुन पियोज’ संकलित अछि। उपलब्ध संस्करणमे २०१८ आ २०१७ क परस्पर भिन्न उल्लेख भेटैत अछि; तेँ संस्करण-क्रम सावधानीक विषय अछि।
संग्रहक चारू एकांकी अपन-अपन सामाजिक प्रसङ्ग रचैत अछि। ‘नीशा मुक्ति’ आ ‘घोघवाली कनियाँ’ पाँच-पाँच दृश्यमे फैलल अछि; ‘बरहम बाबा’ आ ‘रसुन पियोज’ अपेक्षाकृत एकल विस्तृत दृश्यपर आधारित अछि। ई अन्तर कथावस्तु, चरित्र-विकास, संघर्षक केन्द्र आ नाटकीय परिणतिपर प्रभाव छोड़ैत अछि।
नामक रूप सेहो उल्लेखनीय अछि। मूल मुद्रणमे ‘नीशा’, ‘बरहम’, ‘घोघवाली’ आ ‘रसुन पियोज’ रूप अछि। ई लोकभाषिक चयन रचनाक ध्वनि, पात्रक सामाजिक स्थिति आ हँसी-विनोदसँ जुड़ल अछि। आलोचनाक अपन भाषामे आवश्यकताअनुसार ‘नशामुक्ति’, ‘घूँघट’ आ ‘लहसुन-प्याज’ जेहन अर्थसूचक शब्द आबि सकैत अछि; मुदा मूल शीर्षकक स्थान ओहि पर्यायसँ लेनाइ पाठशुद्धिक विरुद्ध होयत।
अध्ययनक वैचारिक आधार: पाठ, रंगमंच आ समाज
मैथिली रंगमंचकेँ केवल लिखित संवादक साहित्य मानलापर बेचन ठाकुरक नाटकीय प्रयत्नक विशेषता ओझराइत अछि। हुनकर पाठक भीतर मंचक व्यवहार देखाइत अछि—प्रवेश-निर्गमन, एकसुरमे नाराबाजी, गीत, पात्रक देहगत क्रिया, जनसभाक तैयारी आ दर्शककेँ प्रत्यक्ष सम्बोधित करबाक भङ्गिमा। ताहि लेल एतऽ नाटकक दू स्तर परखल गेल अछि: लिखित दृश्य जे पाठक पढ़ैत छथि, आ सम्भावित प्रस्तुति जाहिमे कलाकारक समय, विराम, मंच-सज्जा आ दर्शकक प्रतिक्रिया अर्थ बदलि सकैत अछि।
विदेहक ‘A Complete Critical Appreciation of Bechan Thakur’ मे समानान्तर रंगमंच, सामाजिक प्रतिनिधित्व आ बेचन ठाकुरक नाट्यकर्मक प्रश्न उठाओल गेल अछि। ओहि आलोचनाक पृष्ठभूमि एतऽ उपयोगी अछि, मुदा ‘नवघर’क सभ प्रसंग पर पहिनेसँ तैआर आन्दोलनवादी निष्कर्ष थोपब उचित नहि। नाटक स्वयं जतय परिवर्तनक ठोस उपाय प्रस्तुत करैत अछि, ओतऽ ओकर उपलब्धि मापल जाए; जतय व्यक्ति जटिलता खोइ कऽ घोषणाक माध्यम बनि जाइत अछि, ओतऽ ओकर सीमासँ सेहो मुँह नहि मोड़ल जाए। विदेहक नाट्य-समीक्षात्मक लेखसमूहक रस, संवाद, लोकधर्मिता आ सामाजिक प्रतिनिधित्व सम्बन्धी प्रश्न एहि विवेचनक तुलनात्मक उपकरण छथि।
ई अध्ययन कोनो ऐतिहासिक घटना, सरकारी घोषणाक सफलताक प्रतिशत वा मंचनक वास्तविक दर्शक-संख्या विषयमे नाटकक संवादकेँ स्वतः तथ्य नहि मानैत अछि। पात्र जे कहैत अछि, से पहिने नाट्यलोकक कथन अछि; तकर बाहरी ऐतिहासिक सत्यापन अलग विषय थिक। एहने अन्तर पाठालोचनाक बुनियादी सावधानी अछि।
‘नीशा मुक्ति’: नशा, हिंसा, लोकशिक्षा आ सामूहिक संकल्प
पहिल दृश्य: परिवारक स्नेहसँ असुरक्षा धरि
पहिल दृश्य शंकरक घरसँ आरम्भ होइत अछि। सुनेना, शान्ति, चानी, सुगर आ खरबनक उपस्थिति, घरेलू बातचीत आ बच्चाक खेलक माध्यमसँ कथा पहिने एकटा साधारण पारिवारिक स्थिति बनबैत अछि। एहि शान्त सतहक भीतर वस्तुगत संकट धीरे-धीरे प्रवेश करैत अछि। बच्चाक खेलब, भोजनक जुगाड़, परिचित घरक निकटता आ नशाक प्रभाव एकसाथ रखल गेल अछि। किछु पात्रक बोलचालमे हिंसक आदत सामान्यीकृत भऽ जाइत अछि; ई नाटकीय विरोध आगाँ संकटकेँ अधिक तीव्र बनबैत अछि।
दोसर दृश्य: मार्ग, रेल-यात्रा आ दुष्परिणामक सार्वजनिकता
दू दृश्यक बीच घरसँ सार्वजनिक क्षेत्रमे गति होइत अछि। शंकर आ खरबनक बाह्य यात्रा, मीनाक संग छात्र-पात्र राजीव आ रौशनक प्रवेश, पुलिसक उपस्थिति आ हादसाक समाचारक माध्यमसँ नाटक सूचित करैत अछि जे व्यक्तिगत दुर्व्यसनक सामाजिक लागत परिवारक चौखटिमे सीमित नहि। घटना अपने मंचपर पूर्ण दृश्यात्मक रूपेँ विकसित होइत नहि दिखैत; बहुत किछु पात्रक कथनसँ सामने अबैत अछि। तकर परिणाम ई जे विषयक विस्तार तीव्र होइत अछि, मुदा अनुभूतिक नाटकीय अन्तरंगता कखनो-कखनो सूचनात्मक संवादमे परिवर्तित होइत अछि।
तेसर दृश्य: नशाबन्दीक राजनीतिक भाषा आ नैतिक तर्क
तेसर दृश्य सार्वजनिक बहसक मुख्य केन्द्र अछि। पुलिस-पात्र केँदार सिंह आ बदरी सिंह, शंकर आ खरबनक संवादमे सरकारी नीति, व्यक्तिगत हानि, अपराध आ सामाजिक आचरण परस्पर जुड़ैत छथि। नाटकक एकटा महत्त्वपूर्ण मोड़ ओतऽ अछि जतऽ केवल दण्डक बात नहि, मनुष्यक अपन संयमक प्रश्न उठैत अछि। बदरी सिंहक कथन आत्मनियन्त्रणकेँ मानवताक कसौटी बनबैत अछि।
“मन जेते काबूमे रहत, ओते मानवतामे धनिक रहब।” (बदरी सिंह)
एहि वाक्यक अर्थ केवल व्यसन-निषेध नहि, आत्मनिर्णयक नैतिक महत्त्व सेहो अछि। तथापि आदर्शवादी कथन शोषण, रोजगारीक अभाव आ चिकित्सकीय सहायताक संरचनात्मक प्रश्नकेँ समुचित विस्तार नहि दैत। पुलिसक सुसंगत सामाजिक उपदेश कथानकक भीतर प्रभावकारी मंचीय भाषण बनि सकैत अछि, मुदा नाटक ओकर प्रतिवादसँ सीमिते भिड़ैत अछि।
चारिम दृश्य: घरक सङ्कटमे बालकक दखल
चारिम दृश्य फेर शंकरक घर लौटैत अछि। बालक-पात्र, घरेलू तनाव आ दारू छोड़बाक भावनात्मक आग्रह एक नजदीकी नाट्य-समस्या बनबैत छथि। एतऽ बच्चा केवल निरीह पीड़ित नहि, कतेको स्थानपर प्रश्न पुछनिहार आ निर्णयकेँ प्रभावित करबाक स्रोत बनैत अछि। एहि दृष्टिसँ ई अंश बाल-दर्शकक लेल खास प्रभावकारी भऽ सकैत अछि। तथापि बाल-सम्बोधनमे डर, चोट आ पारिवारिक त्रासक स्तरक संवेदनशील मंचन अनिवार्य होयत।
पाँचम दृश्य: विद्यालय, गीत आ सामूहिक अनुशासन
अन्तिम दृश्य शिक्षण-संस्था आ जनजागरणक आयोजनक ओर मुड़ैत अछि। शिक्षक, विद्यार्थी, गीत, नारा, सामूहिक पाठ आ सार्वजनिक प्रशंसाक सङ्ग नाटक सामाजिक संदेशकेँ प्रत्यक्ष रूप दैत अछि। जे संकट पहिने घरक भीतर चुपचाप पसरल छल, से आब मंचपर सामूहिक कार्यक्रम बनि गेल अछि। एहि क्रममे गीत दर्शकक स्मृतिमे संदेश टिकेबाक लोकशिक्षात्मक माध्यम थिक; मुदा भरल पात्र-संख्या आ नाराक आवृत्ति वास्तविक मंचनमे समय-नियोजन माँगैत अछि।
‘नीशा मुक्ति’क विशेषता—घरेलू नाटकसँ सार्वजनिक रंगमंच धरि संक्रमण। ओकर सीमा—अन्तिम दृश्य शिक्षा-अभियानक प्रचार-भाषासँ एतेक प्रभावित अछि जे सामाजिक यथार्थक विरोधाभास सभ पूर्ण रूपेँ नाटकीय संघर्ष नहि बनि पबैत अछि। बच्चाक सहभागी स्थान ओकर बाल-नाट्य सम्भावना बढ़बैत अछि; एकरा विशुद्ध बालनाटक कहलासँ बेसी उचित ‘बाल आ प्रौढ़ दर्शक दुनू लेल उपयुक्त सामाजिक जागरण-एकांकी’कहब होयत।
‘बरहम बाबा’: श्रद्धा, परम्परा आ प्रश्न करबाक अधिकार
स्थल आ स्थितिक स्थापना
‘बरहम बाबा’ आकारमे लघु अछि, मुदा अपन विचार-बिन्दुमे तीक्ष्ण। बरहम बाबाक गहबर, पूजा-सामग्री, स्त्री-पुरुषक धार्मिक जमावड़ा आ बौकुक श्रद्धा आरम्भमे दृश्यकेँ परिचित ग्राम-धार्मिक परिवेश दैत अछि। बुधनक आगमन पुरान विश्वासक समर्थन करैत अछि; फूलो धीरे-धीरे एहि समर्थनक शर्त पुछैत अछि। ताहिसँ धर्मक अस्तित्वपर कोनो सामान्य निषेध नहि, बल्कि विशेष सामाजिक व्यवहारक नैतिक परिणाम प्रश्नमे आबैत अछि।
श्रद्धाक भीतर वर्ग आ जातिक सत्ता
बौकु आ फूलोक विवाद के पूजा करए, के करा सकए, ककरा नामपर बहिष्कार होअए आ सामाजिक अपमानकेँ देवताक आदेशक रूपमे कोना प्रस्तुत कएल जाए—एहि प्रश्नसभक ओर जाइत अछि। ‘जय गंगा’क आवृत्ति आ फूलोक प्रतिप्रश्न एक नाटकीय द्विस्वर रचैत अछि: एक दिस विश्वासक स्वाभाविक भक्तिभाव, दोसर दिस प्रश्नक द्वारा ओकरा न्याय-संगत बनएबाक आग्रह। फूलोक विवेककेँ केवल नास्तिकता कहब त्रुटिपूर्ण होयत; ओकर प्रतिवाद मनुष्यक मान-गरिमाक पक्षमे अछि।
फूलोक प्रतिवाद आ अन्तिम स्वीकृति
फूलो अपन तर्ककेँ दार्शनिक बहसक अमूर्त भाषा नहि दैत; ओ भोजन, बर्दाश्त, गरिमा, अपन प्रसंग आ मनुष्यता—एहि ठोस अनुभवक भाषा बजैत अछि। ओकर एक वाक्य पूरा रचनाक भावात्मक केन्द्र अछि।
“हम प्रेम-श्रद्धाक भूखल छी।” (फूलो)
एहि पंक्तिमे ‘श्रद्धा’ नष्ट नहि होइत अछि; ओकर विषय पुनः परिभाषित होइत अछि। अन्तमे बौकु दोसर बेर विचार करबाक आश्वासन दैत अछि आ पूजा-व्यवस्था प्रति पुनर्विचारक दिशा बनैत अछि। नाटकक प्रभाव एतऽ नैतिक प्रत्युत्तरसँ बनैत अछि, हिंसक प्रतिशोधसँ नहि। एतबे संग सीमा सेहो साफ अछि: फूलोक प्रतिवादक पाछाँक संस्थागत जातिगत संरचना खोलल जाइत नहि; अन्तिम समाधान पात्रक व्यक्तिगत मनपर बहुत आश्रित अछि।
मंचीय दृष्टिसँ ई एकांकी सीमित पात्र, एक स्थल आ स्पष्ट वैचारिक द्वन्द्वक कारणेँ नुक्कड़, विद्यालयी वरिष्ठ-वर्ग आ लघु रंगदलक लेल अनुकूल भऽ सकैत अछि। बाल-पाठकक लेल एकर प्रश्न-प्रवृत्ति महत्त्वपूर्ण अछि, मुदा सामाजिक-धार्मिक पदानुक्रमक अर्थ बुझएबामे प्रस्तोताक प्रसंगानुकूल व्याख्या आवश्यक रहत।
‘घोघवाली कनियाँ’: गृहस्थी सँ सामाजिक पुनर्निर्माण धरि
‘नवघर’क सभसँ विस्तृत एकांकी ‘घोघवाली कनियाँ’ अछि। एकरा केवल घूँघटक विरोधक नाटक मानब कृतिक वास्तविक फैलावकेँ छोट करब होयत। कथा पारिवारिक टूटन, अन्न-पाइक अधिकार, परिजनक जीवन-रक्षा, शिक्षा, ग्रामीण सुधार, स्त्रीक सक्रियता आ पंचायत-स्तरक सामूहिक निर्णय धरि पहुँचैत अछि। शीर्षकक घोघ-प्रतीक आरम्भमे स्त्रीक निजी जीवनपर समाजक नियन्त्रण बुझबैत अछि; आगाँ समाजक समस्त निर्णय-प्रक्रियामे ओकर प्रवेश एहि प्रतीककेँ उलटि दैत अछि।
पहिल दृश्य: सन्तान, कनियाँ आ बुढ़ापा
सतन आ हुनक पत्नी ललिताक पारिवारिक स्थिति सँ दृश्य खुलैत अछि। बेटा जीतन आ परदेशी, हुनकर कनियाँ रामदाइ आ रूपवती, समाजक प्रतिष्ठित व्यक्ति रामरूप आ परिवारक अन्य सदस्य सम्पत्तिक बँटवारा, वृद्धजनक सम्मान आ आत्मनिर्भर जीवन पर बहस करैत छथि। देहक वृद्धावस्था आ मनक पुरान संचित अधिकार एक दोसरासँ जुझैत अछि। ई संघर्ष केवल बेटा बनाम बाप नहि, ‘घर’क परिभाषा पर विवाद अछि: की घर संगहि रहलाक नाम अछि, की समान सम्मान आ न्यायपूर्ण हिस्सेदारीक?
रूपवतीक प्रवेशक संग स्त्रीक स्वतन्त्र निर्णायक स्वर प्रबल होइत अछि। ओ स्थापित पारिवारिक निर्णय मानि लेबाक बाध्यता अस्वीकार करैत अछि आ प्रश्न पुछैत अछि जे कोन निर्णय किनक हितमे कएल गेल। घरक सभ सदस्यक मान्यता, श्रम आ सेवा कतेक समान अछि—ई प्रश्न प्रथम दृश्यकेँ एक साधारण गृहकलहसँ सामाजिक नीतिविचारक दिशा दैत अछि। रूपवतीक सक्रियता कथा आगाँ बढ़बाक मुख्य प्रेरक होइत अछि।
दोसर दृश्य: करुणासँ लिखित अनुबन्ध
दोसर दृश्य परिवारक सम्बन्धकेँ व्यवहारिक नियममे बदलबाक साहस देखबैत अछि। विष्णुदेव, रामप्रसाद, सतन आ परदेशीक उपस्थितिमे परिजन एक विस्तृत प्रस्तावपर विचार करैत छथि। प्रस्तावक कुल बाइस बिन्दु छपल अछि; एहि सूचीमे खेत-पथार, घर, बूढ़-बूढ़ीक भरण-पोषण, परस्पर भेट, पाइक व्यवस्था, व्यक्तिगत सेवा, नियमित देखरेख आ संकटमे सहयोग जेहन विषय सन्निहित छथि। लिखित अनुबन्ध सामाजिक सुधारक ठोस उपकरण बनि उठैत अछि।
“खेत-पथार दुनु भाँइ आधा-आधा लऽ ले।” (समझौताक पहिल बिन्दु)
कथामे एहि सूचीक लाभ ई जे नैतिक अपेक्षा अधिकार आ दायित्वक प्रत्यक्ष भाषा पबैत अछि। मुदा नाटकीय शिल्पमे बाइस बिन्दुक अविराम पाठ एक गम्भीर समस्या सेहो अछि: कथावस्तु रुकि जाइत अछि आ रंगमंच सभाक कार्यवृत्त-जकाँ लागि सकैत अछि। पाठ रूपमे ई दस्तावेजी यथार्थ रचैत अछि; मंचनमे बिन्दुसभकेँ दृश्यात्मक समूह, विचार-विरोध आ प्रतिक्रिया सँ जीवित करबाक जरूरत पड़त।
समझौताक बाद पात्रक स्वीकार-भाषा एतऽ मुख्य अछि।
“हमरा कोनो दिक्कत नै अछि। हमरा मनोनाय अछि।” (जीतन)
एहि सहमति-पद्धतिमे नाटक विवेकपूर्ण लोकतन्त्रक एक लघु घरेलू रूप कल्पित करैत अछि। तथापि असली जीवनमे भूमि-विभाजन आ वृद्धजनक देखभाल मात्र सहमतिसँ हल नहि होइत; कानून, पंजीकरण, देयताक पालन आ शक्ति-सन्तुलन विषयपर नाटकक चर्चा अति सीमित अछि। एहि सीमाकेँ ओहि पाठक ऐतिहासिक असफलता नहि, ओकर यूटोपियाई सुधार-स्वरूपक विशेषता बुझबाक चाही।
तेसर दृश्य: बालकक कल्पना, पढ़ाई आ खेनेबाक अधिकार
तेसर दृश्यमे जीतन, रामदाइ, सतन, ललिता आ शशिक माध्यमसँ पीढ़ीक सम्बन्ध बदलैत अछि। छोट बालक/बालिकाक खेल, निःशुल्क समय, ज्ञानक पियास, कलात्मक रचना आ स्वतन्त्र अभिव्यक्ति पर विशेष जोर पड़ैत अछि। आँगन, शाला, गप-सप आ पैघ लोकक निर्देश–एहि सभक बीच बालमन अपन जगह खोजैत अछि। ई हिस्सा संग्रहकेँ बाल-साहित्यक प्रश्नसँ सभसँ ठोस रूपेँ जोड़ैत अछि।
सतन बच्चाक खेलब आ पढ़बाक प्रसंगमे जोरजबरदस्तीसँ सावधान करैत अछि। ओ बिनु दमनक ज्ञान-विकासक सम्भावनाक पक्ष लैत अछि। एहि दृश्यसँ ई विचार उभरैत अछि जे बालककेँ केवल भविष्यमे कमाइ कयनिहार प्रौढ़क प्रारूप मानब गलत अछि; ओकर एखनुक उत्सुकता, कल्पनाशीलता आ स्वतन्त्र अनुभव सेहो मूल्यवान अछि।
मुदा नाटकक शिक्षा-सम्बन्धी बात जेना-जेना विस्तार पबैत अछि, संवाद बीच-बीचमे तर्कप्रधान भाषण बनि जाइत अछि। बालक स्वयं जखन प्रश्न पुछैत अछि, दृश्य जीवित होइत अछि; जखन पैघ पात्र ओकरा बदला निरन्तर सीख दैत अछि, बालकक स्वाधीन नाटकीय स्वर कमजोर पड़ैत अछि। ई अन्तर विद्यालयी मंचनमे विशेष ध्यान देबाक प्रश्न अछि।
चारिम दृश्य: नव स्त्री-स्वर आ घरक अर्थ
चारिम दृश्य परदेशी-रूपवतीक भीतरक संवादसँ आरम्भ होइत अछि। रूपवती नव-समयक जीवनपद्धति, अपन सार्वजनिक परिचय, घरक कामक सम्मान आ घरेलू अन्ध-परम्परापर प्रश्न उठबैत अछि। ओ आपन अस्तित्व एक गोपनीय गृहिणीक रूपमे मात्र सीमित मानए लेल तैयार नहि।
“हम कोनो मामूली जनानी छी।” (रूपवती)
एहि स्वतःमानक स्वरकेँ केवल अभिमान कहि देब गलत होयत। ई पहिचानक हकक माँग अछि। तथापि आलोचनात्मक प्रश्न उठैत अछि जे रूपवतीक आधुनिकता कखनो वस्त्र, रूपसज्जा आ सामाजिक प्रदर्शनक संकेतमे सिमटि रहल अछि कि नहि। नाटकीय प्रतिवादकेँ ठोस आर्थिक आ राजनीतिक सक्रियतासँ जोड़ल गेल अछि, से एकर सम्भावित कमजोरीकेँ सँभालैत अछि।
चौथ दृश्य अन्त धरि घरेलू अधिकार, सास-ससुरक दशा, परिवारक सार्वजनिक प्रतिमा आ नारीक कर्तृत्व पर बहस करैत अछि। नाटक एकल परिवार बनाम संयुक्त परिवारक सुविधाजनक नैतिक द्विभाजन नहि करैत; ओ सम्मान, न्याय आ दायित्वक कसौटीपर दुनूक आलोचना सम्भव करैत अछि। यद्यपि किछु संवादमे पात्रक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन बड़ शीघ्र घटित होइत अछि, रूपवतीक असहमतिक ऊर्जा कथाकेँ सजीव बनओने रहैत अछि।
पाँचम दृश्य: पंचायत, स्त्रीक प्रस्तुति आ सार्वजनिक स्वीकृति
पाँचम दृश्य पंचायत-भवनमे आयोजित सामूहिक बैठक अछि। एतऽ पहिले जे विषय घरक भीतर दबल रहैत छल—परिवारक अनबन, स्त्रीक उपस्थिति, वृद्धजनक देखभाल—से सार्वजनिक विमर्शक विषय बनैत अछि। सरपंच, रामप्रसाद, विष्णुदेव, रूपवती, परदेशी आ आन पात्रक जमावड़ा नाटकक नैतिक लक्ष्यकेँ समाजक सामने रखैत अछि।
एहि रचनाक पूर्ण यात्राकेँ देखी तऽ नाटक निजी पीड़ासँ सार्वजनिक जवाबदेहीक ओर बढ़ैत अछि। मुदा पाँचम दृश्यकेँ पढ़ैत काल नाटकीय संघर्ष बहुत हद धरि निर्णय-सभा आ स्वीकृति-सभामे घुलि जाइत अछि। पात्रक स्वतन्त्र स्वरक स्थानपर कखनो-कखनो परामर्शक क्रम हावी भऽ जाइत अछि। ई सीमा नाटकक सामाजिक प्रतिबद्धता केँ खारिज नहि करैत, केवल ई देखबैत अछि जे सुधरब आ नाटक बनब एक बात नहि।
‘घोघवाली कनियाँ’क मूल महत्त्व ई अछि जे ओ ‘नवघर’क कल्पना प्रस्तुत करैत अछि—एहन घर जतऽ स्त्री, बालक आ वृद्ध व्यक्ति सभकेँ अपन गरिमा सहित अधिकार भेटए। शीर्षकक घोघ घरक भीतरी अन्धकारक प्रतीक अछि; रूपवतीक सक्रियता ओकर प्रतिपाठ। एहि रचनाक नाट्य-सुधार लेल बाइस बिन्दुक अनुबन्ध, लम्बा उपदेश आ अनेक पात्रक उपस्थिति संक्षेपित कऽ परस्पर संघर्षकेँ अधिक देहगत आ क्रियात्मक बनएबाक अवसर अछि।
‘रसुन पियोज’: महँगाइ, उपहास आ नामकरणक सत्ता
पहिल बहस: बजारक नामसँ मनुष्यमूल्य धरि
चौथ एकांकीमे रमण, सुमन, अमन आ पवन ताश खेलैत छथि। दर्शक-पात्र फेकू, कैलू, गन्नू आ चुल्लाइ उपस्थित छथि। एहि आरम्भिक वातावरणक सहज मनोरंजनकेँ फेकू बजारक महँगाइक चर्चा सँ बाधित करैत अछि। रसुन आ पियोजक दाम वृद्धिक उदाहरण आर्थिक यथार्थक सामान्य लोकभाषिक माप अछि।
“रसुन बीस टके किलो छलै, से अस्सी भऽ गेलै” (फेकू)
मुदा जे शब्द पहिने खाद्यवस्तुक दाम छल, सएह धीरे-धीरे फेकूक अपमानजनक पुकार बनि जाइत अछि। एहि संक्रमणमे नाटक उपनाम, वर्गीय तिरस्कार आ समूह-हास्यक हिंसा पर चोट करैत अछि। गपशपक स्थान रंगमंच बनैत अछि—हँसीक सार्वजनिकता एक व्यक्तिक मान-गरिमा छीनि सकैत अछि।
सामूहिक हँसीक संरचना
“रसुन-पियोज”क ध्वन्यात्मक पुनरावृत्ति हास्य-सृष्टि करैत अछि। पात्रसभ नामकेँ नारा बनबैत छथि; हँसी बढ़ैत अछि आ फेकूक आक्रोशो तीव्र होइत अछि। ई दृश्य हास्यक दूहेरा स्वभावकेँ सामने अनैत अछि—हँसी मिलनक माध्यम होइत अछि, मुदा अन्यायपूर्ण समूहबद्धताक हथियार सेहो। कथ्यक केन्द्र तथाकथित मजाकक वैधता अछि: कोन हास्य ककरा पीड़ित करैत अछि?
फेकूक आत्मप्रतिष्ठाक दावा नाटकक मर्म अछि।
“हम केकरोसँ कखनो कम छी।” (फेकू)
एहि वाक्यकेँ जाति वा आर्थिक वर्गक सम्पूर्ण इतिहासक प्रमाण मानब नहि चाही; मुदा अपमानक सामना करैत सामान्य व्यक्ति अपन बराबरी घोषणा करैत अछि, से स्पष्ट अछि। उपहासक विरुद्ध ई वैयक्तिक प्रतिरोध शेष समाजक नैतिक चेतनाक परीक्षण बनैत अछि।
सामाजिक निर्णय आ व्यंग्यक अन्त
पछिला खण्डमे पड़ोसी आ पंचायती पात्रसभक हस्तक्षेप विवादकेँ निजी तकरारसँ जन-समस्या बनबैत अछि। नाटक उपहासक वैधतापर सामूहिक असहमति उत्पन्न करबाक बदला कतहु उपनामकेँ जनसामान्यक आदत रूपमे स्वीकार कए लेबाक बाट देखबैत अछि। एहि अन्तमे नैतिक दुविधा अछि: अपमानजनक पुकारकेँ व्यापक करि देनाइ की अपमान समाप्त करैत अछि, अथवा अपमानक सामाजिक सत्ता केँ सामान्य बनबैत अछि?
अन्तिम पृष्ठ पर निर्णयक बाद फेकूक नाम फेर जनसमूहमे बाजल जाइत अछि। एहि दृश्यकेँ सहज परिहासक मेल-मिलापक सुखान्त रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि; मुदा आलोचनात्मक पुनर्पाठमे पीड़ितक सम्मतिक प्रश्न बेसी महत्त्वपूर्ण भऽ जाइत अछि। सामाजिक हँसीकेँ नैतिक निष्कर्ष मानबाक बदला नाटकक खुले द्वन्द्व रूपमे राखल जाए तँ रचनाक अर्थ अधिक समृद्ध होइत अछि।
‘रसुन पियोज’ अपन न्यूनतम मंच-सज्जा, सहज पात्र-प्रवेश, दैनन्दिन बोलचाल आ प्रत्यावर्ती उपनामक कारणेँ रंगमंचीय दृष्टिसँ असरकारी अछि। किछु दीर्घ भाषण आ एकर बाहरी नैतिक समाधान ओकर व्यंग्यकेँ थोड़े शिथिल करैत अछि। बाल-किशोर दर्शकक लेल ई पाठ भाषाक हिंसा, साथीसँ मजाक करबाक सीमा आ आत्म-सम्मानक प्रश्न पर नाट्य-संवाद खोलि सकैत अछि; मुदा अपमानित पात्रक पक्षमे विवेकपूर्ण चर्चा बिना हँसीक दृश्य उलटा असर सेहो कऽ सकैत अछि।
चारू एकांकीक अन्तर्सम्बन्धित साहित्यिक समीक्षा
घर, समाज आ सार्वजनिक सभाक आवागमन
चारू नाटकक एकटा साझा गति अछि—घटना घर अथवा परिचित संगति सँ उठैत अछि आ अन्तिम अर्थ सार्वजनिक समाजमे तय होइत अछि। ‘नीशा मुक्ति’मे परिवारक व्यसन सामाजिक अभियान बनैत अछि; ‘बरहम बाबा’मे निजी श्रद्धा समाजक न्याय-प्रश्न बनैत अछि; ‘घोघवाली कनियाँ’मे घरेलू समझौता पंचायतमे सार्वजनिक होइत अछि; ‘रसुन पियोज’मे साथी-पड़ोसीक मजाक सभा-दरबारक विवाद बनैत अछि। एतऽ सभा समाधानक संस्थान सेहो अछि आ सम्भावित दबावक स्थल सेहो। लेखकक सामाजिक नाटकक शक्ति एहि मञ्चीकरणमे अछि।
प्रश्न पुछनिहार पात्र बनाम निर्णय सुनाबनिहार पात्र
जतऽ फूलो, रूपवती वा बालक-पात्र प्रश्न पुछैत छथि, ओतऽ संवादक भीतर वास्तविक नाटकीय ऊर्जा अछि। जतऽ पुलिस अधिकारी, सामाजिक प्रतिनिधि अथवा पंचायतक नेतृत्व पूर्वनिर्धारित निष्कर्ष सुनबैत छथि, ओतऽ नाटकक स्वाभाविक प्रतिपक्ष सिकुड़ि जाइत अछि। लेखकक लिखन-पद्धतिक सभसँ पैघ नाट्य-द्वन्द्व एहि दू प्रवृत्तिक बीच अछि: लोकतान्त्रिक प्रश्नक खुलल प्रक्रिया आ सुधारवादी घोषणाक बन्द परिणाम।
लोकबोली, पुनरुक्ति आ ध्वन्यात्मक लय
बेचन ठाकुरक पात्र अपन लोकसमाजक आडम्बररहित भाषा बजैत छथि। ‘बरहम बाबा’मे श्रद्धात्मक उच्चारण, ‘नीशा मुक्ति’मे जनजागरण-गीत, ‘घोघवाली कनियाँ’मे पारिवारिक सम्बोधन आ ‘रसुन पियोज’मे उपनामक बारम्बार पुनरुक्ति पृथक श्रव्य-पहिचान बनबैत अछि। एहि भाषामे परिनिष्ठित शास्त्रीय एकरूपतासँ बेसी पात्रक अनुभवजन्य स्वर महत्त्वपूर्ण अछि। लोकशब्दकेँ मानकीकृत रूपमे सुधारि देलापर अनेक प्रसंगक मंचीय लय आ सामाजिक निहितार्थ घटि जाएत।
नारी-पात्रक सक्रियता आ प्रतिनिधित्वक सीमा
फूलो आ रूपवती वैचारिक प्रतिपक्ष रचैत छथि; सुनेना, ललिता आ आन स्त्री-पात्र गृहस्थी, पोषण आ परिवर्तनक प्रक्रियामे संलग्न छथि। ई स्त्रीक उपस्थिति मात्र भावुक पार्श्वचित्र नहि। मुदा स्त्रीक अधिकारक प्रश्नक पर्याप्त गहराइ तखन बनत जखन ई पात्र अपन असहमति, आर्थिक शर्त आ सामाजिक जोखिम स्वयं स्पष्ट करथि। ‘घोघवाली कनियाँ’क सुधारवादी सहमति एहि दिशा मे संकेत तँ दैत अछि, मुदा अनेक ठाम पुरुष-समाजक निर्णयक स्वीकृतिक अपेक्षा करैत अछि।
सुधारवादी आशा आ जीवन-जटिलताक अनसुलझल अन्त
संग्रहक सुखान्त सभमे सामाजिक सुधारक प्रति लेखकक निष्ठा भेटैत अछि। तथापि शराबक लत, जातिगत बहिष्कार, वृद्धजनक अधिकार, स्त्रीक स्वातन्त्र्य आ सामाजिक उपहास एहन समस्या अछि जकर समाधान एक गो भाषण, एक लिखित प्रतिज्ञा वा एक पंचायत-निर्णयसँ पूर्ण नहि होइत। नाटकक नैतिक इच्छा आ सामाजिक प्रक्रियाक कठिनता बीच दूरी आलोचनाक मूल कसौटी रहबाक चाही। एहि दूरीकेँ चिह्नित करब लेखकक उद्देश्यकेँ कम नहि करैत; उलटा ओकर ऐतिहासिक-रचनात्मक महत्त्वकेँ यथार्थ आधार दैत अछि।
मैथिली बाल-साहित्यक इतिहासमे ‘नवघर’क स्थान: तुलनात्मक विवेचन
बाल-साहित्यक इतिहास लिखैत समय पहिने शिशु लोक-साहित्य आ लिखित आधुनिक बाल-नाट्यक भेद बुझब जरूरी अछि। विदेहमे फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’क ‘मैथिली शिशु लोक साहित्य’ (अङ्क ५०, २०१०) लोरी, खेल, लोककण्ठ आ पीढ़ीसँ पीढ़ी पहुँचैत स्मृतिक परम्परा पर प्रकाश दैत अछि। एहि ऐतिहासिक पृष्ठभूमिसँ ‘नवघर’क सम्बन्ध कोनो सीधा स्रोत-अनुकरणक प्रमाण नहि, बल्कि लोकस्वर आ दर्शक-सहभागिताक साझा धरातल अछि। गीत आ समूह-उच्चारण आधुनिक सामाजिक एकांकीमे पुरान मौखिक परम्पराक नाटकीय क्षमता स्मरण करबैत अछि।
योगानन्द झाक ‘मैथिली बाललोककथा: स्थिति आ अपेक्षा’ (विदेह अङ्क ७६, २०११) आ रमेश रञ्जनक ‘मैथिली बालनाटक सीमा विस्तार करैत—चौआरि’ शीर्षकसँ चिन्हित लेख (अङ्क १२६, २०१३) विदेहक बाल-साहित्य विमर्शक इतिहासमे बालकथा आ बालनाट्यकेँ अलग आलोचनात्मक विषय रूपमे सामने अनैत छथि। नाटकक अपेक्षा केवल सीख देनाइ नहि; बालकक प्रश्न, खेल-भाव, स्वनिर्णय आ कल्पनाशील दृष्टिकोणकेँ मंचपर सार्थक स्थान देनाइ अछि। एही कसौटीपर ‘नवघर’क चारू नाटकक मूल्य अलग-अलग निकलैत अछि।
‘नीशा मुक्ति’क प्रारम्भिक बाल-पात्र आ अन्तिम विद्यालयी आयोजन युवा-दर्शक लेल उपयोगी अछि, मुदा रेल-हादसा आ व्यसन-सम्बन्धी पीड़ाक भावात्मक तीव्रता आयु-वर्गक अनुसार मंचीय रूपान्तरण माँगैत अछि। ‘बरहम बाबा’ प्रश्न-कौशल सिखेबाक उपयुक्त पाठ भऽ सकैत अछि, जँ संवादकेँ सामाजिक सम्मानक धरातलपर प्रस्तुत कएल जाए। ‘घोघवाली कनियाँ’क तेसर दृश्यक बालक-केंद्रित शिक्षाविचार बाल-पाठक लेल विशेष मूल्यवान अछि; मुदा शेष दृश्यसभक लम्बा सम्पत्ति-विवाद आ पंचायत-निर्णय छोट बच्चाक सहज अनुभूतिसँ दूर पड़ि सकैत अछि। ‘रसुन पियोज’किशोरावस्थाक समूह-हँसी, उपनाम आ अपमानक प्रश्न लेल प्रासंगिक अछि, जँ प्रस्तुति एहन हो जे पीड़ितक पीड़ा ओझराए नहि।
विदेहमे प्रकाशित ‘मैथिली बाल-उपन्यासक समीक्षाशास्त्र’ (२०२६) बाल-कथाक मूल्याङ्कनमे बालकक सक्रियता, लोक-स्मृति, सामाजिक प्रतिनिधित्व आ भाषा-संस्कारक महत्त्वक चर्चा करैत अछि। उपन्यास आ नाटकक विधागत भेद स्पष्ट रखितो एहि कसौटीक सहायसँ ‘नवघर’केँ परखि सकैत छी: पात्रक सक्रियता कतेक? सीख कथाक भीतर सँ उपजैत अछि कि बाहरसँ आरोपित? बालककेँ निर्णय लेबाक अधिकार अछि कि ओ केवल पैघ लोकक वचन सुनैत अछि? ई प्रश्न नाटकसभक मूल्याङ्कनमे रचनात्मक परिणाम दैत अछि।
‘नाट्य-नवग्रह’ (विदेह अङ्क ४४७, २०२६) मे बालनाटक आ प्रौढ़ नाटकक भेद, संवादक खेलभाव, प्रत्यक्ष सहभागिता आ विचारोत्तेजक मंच-विधान पर उपयोगी विचार भेटैत अछि। ओहि तुलनामे ‘नवघर’क मूल प्रवृत्ति सामाजिक-समस्या-प्रधान प्रौढ़ एकांकी दिस अछि, मुदा दृश्यविशेषमे बाल-किशोर रंगशिक्षाक योग्य सामग्री प्रचुर अछि। तेँ एकर उचित साहित्येतिहासिक परिचय—सामाजिक एकांकीक संग्रह जकर भीतर बाल-नाट्य प्रयोगक सार्थक बीज विद्यमान अछि—एतबे होयत, न कि प्रमाणविहीन रूपमे सम्पूर्ण संग्रहकेँ शुद्ध बालनाट्यक मूलप्रतिमान घोषित करब।
कालक्रमक प्रश्नमे सेहो संयम आवश्यक अछि। विदेहक उपलब्ध बाल-साहित्य लेख २०१०, २०११ आ २०१३ क विमर्शकेँ दस्तावेजीकृत करैत छथि, जखन कि ‘नवघर’क उपलब्ध संस्करण-पृष्ठपर २०१७ आ २०१८ दूनू अंकित अछि। एहि आधारपर मैथिली बालनाटकक ‘पहिल’ रचना, पहिल प्रयोग वा निश्चित आरम्भ-बिन्दुक घोषणा नहि कएल जा सकैत। साहित्येतिहासमे विधाक उद्भव आ कोनो संग्रहक प्रकाशित प्रति दुनू अलग प्रमाणक विषय छथि।
रंगमंचीय सम्भावना: प्रस्तुति, दर्शक आ रूपान्तरण
‘नवघर’क रंगरचनामे लोकभाषा मुख्य दृश्य-सम्पत्ति अछि। अल्प साधनबलसँ ‘बरहम बाबा’ आ ‘रसुन पियोज’ मंचित भऽ सकैत अछि: पहिलक लेल एक गहबरक सांकेतिक स्थान आ पूजा-सामग्री, दोसरक लेल ताशक स्थान, प्रवेश-निर्गमन आ हँसीक लय पर्याप्त होयत। एहि दू नाटकमे संवादक लय निखारल जाए तँ विचारक तीखापन बढ़त।
‘नीशा मुक्ति’मे स्थल-परिवर्तन, रेलसँ सम्बद्ध कथा, पुलिसक प्रवेश, विद्यालयी समूह आ गीत-नारा मंचक समय आ संसाधन माँगैत अछि। असल चुनौती घटना दुरन्तक दृश्यात्मकता आ घोषणामूलक अन्तक सन्तुलन अछि। समूह-अभिनयमे बालकक सुरक्षा, हिंसक प्रसंगक सांकेतिक प्रस्तुति आ व्यसन-पीड़ितक गरिमाक रक्षा प्राथमिक रहबाक चाही।
‘घोघवाली कनियाँ’क पाँच दृश्य आ पात्र-बहुल संवाद लघु मंचनमे सम्पादन माँगैत अछि। बाइस बिन्दुक अनुबन्धकेँ नाटकमे देहगत अभिव्यक्ति, कागजपर हस्ताक्षर, हित-संघर्ष आ मौन प्रतिक्रियाक मददसँ दृश्यात्मक बनाओल जा सकैत अछि। मुदा मूल पाठक उद्धरण वा अनुसंधानपरक पाठमे कोनो संवाद हटाएल नहि जाए; मंचीय रूपान्तरण मूल पाठसँ पृथक सर्जनात्मक काम होयत।
बाल-समूहसँ अभिनय कराओल जाए तँ आयुवर्ग अनुसार दृश्य चुनब आवश्यक अछि। १०–१४ बरखक किशोर लेल ‘रसुन पियोज’क नामकरण-विवाद, ‘बरहम बाबा’क प्रतिप्रश्न आ ‘घोघवाली कनियाँ’क शिक्षाविषयक खण्ड अधिक कार्यक्षम लगैत अछि; एहि आयु-निर्देशकेँ ऐतिहासिक तथ्य नहि, प्रस्तुति-सुविधाक आलोचनात्मक प्रस्ताव बुझल जाए। प्रत्येक दृश्य बाद दर्शकसँ ‘अहाँ होइतहुँ तँ की करितहुँ?’ पूछब नाटकक निष्कर्षकेँ एकतरफा उपदेशसँ सामूहिक विवेक-विमर्श दिस लऽ जा सकैत अछि।
उपलब्धि, अन्तर्विरोध आ आलोचनात्मक निर्णय
‘नवघर’क पहिल उपलब्धि सामाजिक प्रसंगक चयन अछि। लेखक घरक भीतर घटित साधारण घटना—भोजन, बालकक खेल, रिश्ताक जिम्मेवारी, उपनामक मजाक—केँ वृहत्तर अधिकार-प्रश्नसँ जोड़ैत छथि। दोसर उपलब्धि लोकभाषाक अविरलता अछि। तेसर, फूलो आ रूपवती जेहन पात्रकेँ प्रश्न पुछबाक नाटकीय अधिकार देनाइ अछि। चारिम, सामाजिक सभा, लोक-गीत आ जनसमूहकेँ कथा-संरचनाक भाग बनएबाक कौशल अछि।
मुख्य सीमामे किछु पात्रक एकरेखीयता, एक्कहि विचारक बारम्बार व्याख्या, दीर्घ अनुबन्ध-पाठ, आकस्मिक सहमति आ न्यायप्रक्रियाक अतिशीघ्र समाधान अछि। सुधारवादी नाटकमे स्पष्ट नैतिक पक्ष होएब दोष नहि; दोष तखन बनैत अछि जखन विरोधी पात्र सामाजिक परिस्थितिक स्थानपर केवल अज्ञानक प्रतीक रहि जाइत अछि आ संघर्षक जटिलता घटि जाइत अछि। एहि संग्रहमे ठाम-ठाम एहन संकट अछि।
लोक-हास्यक सीमापर विशेष विचार आवश्यक अछि। ‘रसुन पियोज’मे हँसीकेँ मात्र सृजनशील ऊर्जा बुझि लेनाइ पर्याप्त नहि; नामकरणक माध्यमसँ व्यक्ति कतेक अपमानित भऽ सकैत अछि, तकर पहचानो जरूरी अछि। एक्के तरहें ‘बरहम बाबा’मे श्रद्धाक आड़मे सामाजिक तिरस्कार नाटकक विषय बनैत अछि। एहि दुनू रचनाक संयोजन एकटा पैघ नैतिक सूत्र दैत अछि: धर्मक नाम पर हो अथवा मजाकक नाम पर, व्यक्ति-गरिमाक उल्लङ्घनकेँ सामान्य मानब उचित नहि।
समीक्षाक परिणाममे ‘नवघर’केँ मैथिली सामाजिक एकांकीक महत्त्वपूर्ण उदाहरण कहि सकैत छी, जाहिमे समानान्तर रंग-चिन्तनक प्रबल प्रवृत्ति आ सामुदायिक लोकशिक्षाक विश्वास भेटैत अछि। एकर श्रेष्ठता संवादक जीवन्त प्रश्न, लोक-सामाजिक दृश्य आ पात्रक आत्मसम्मानक माँगमे अछि; ओकर कमजोरी समाधानक पूर्वनिर्धारित भाषणमे। ई द्वन्द्वेँ संग्रहकेँ आलोचना योग्य बनबैत अछि।
निष्कर्ष
बेचन ठाकुरक ‘नवघर’क चारू नाटक समेकित रूपेँ आधुनिक मिथिलाक नैतिक जीवनक चारि समस्या खोलैत अछि। ‘नीशा मुक्ति’ असंयमक निजी-लोकक्षति सँ जन-शिक्षा धरि जाइत अछि; ‘बरहम बाबा’ श्रद्धाकेँ मानवीय समानताक सामने राखैत अछि; ‘घोघवाली कनियाँ’ घरेलू सत्ता आ सामाजिक न्याय बीच नवा समझौता खोजैत अछि; ‘रसुन पियोज’ सामूहिक हँसीक भीतर छिपल अपमान पर प्रश्न करैत अछि। ई केवल सुधारक घोषणा सभ नहि, नाटकीय विवादक अनेक समृद्ध सम्भावना सेहो अछि।
बाल-साहित्यक दृष्टिसँ एहि संग्रहक सही स्थान मिश्रित अछि: किछु दृश्य बालकक अनुभव आ भागीदारीकेँ प्रत्यक्ष रूप दैत अछि, आन दृश्यसभ प्रौढ़ सामाजिक संस्था आ परिवारक दायित्व पर केन्द्रित अछि। एहि भेदक स्वीकारे विधागत ईमानदारी थिक। मैथिली एकांकीक इतिहासमे संग्रहक योगदान लोकभाषा, सामाजिक न्याय आ मंचक सामूहिक प्रकृतिक संगममे निहित अछि। आगाँ एकर मंचन-अभिलेख, पाठान्तर, समकालीन समीक्षा आ दर्शक-अनुभवक दस्तावेज उपलब्ध भेलापर एहि निष्कर्षकेँ आर विशिष्ट रूपेँ जाँचल जा सकत।
संवादक चयनित स्वर
एहि संक्षिप्त संवादसभमे पात्रक मूल स्वर आ नाटकीय परिस्थिति विशेष तीव्रतासँ मुखर होइत अछि।
• नीशा मुक्ति — बदरी सिंह: “मन जेते काबूमे रहत, ओते मानवतामे धनिक रहब।”
• बरहम बाबा — फूलो: “हम प्रेम-श्रद्धाक भूखल छी।”
• घोघवाली कनियाँ — समझौताक पहिल बिन्दु: “खेत-पथार दुनु भाँइ आधा-आधा लऽ ले।”
• घोघवाली कनियाँ — जीतन: “हमरा कोनो दिक्कत नै अछि। हमरा मनोनाय अछि।”
• घोघवाली कनियाँ — रूपवती: “हम कोनो मामूली जनानी छी।”
• रसुन पियोज — फेकू: “रसुन बीस टके किलो छलै, से अस्सी भऽ गेलै”
• रसुन पियोज — फेकू: “हम केकरोसँ कखनो कम छी।”
