लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख
पीड़क पितृत्वसँ नागरिक अधिकार धरि
कृतिद्वयक परिचय
बेचन ठाकुरक ‘बाप भेल पित्ती आ अधिकार’ श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ २०१२ मे प्रकाशित युग्म-नाट्यकृति अछि। पहिल नाटक तीन अङ्कमे बालकक पारिवारिक सङ्घर्ष विकसित करैत अछि; दोसर नाटक नागरिक अधिकार, आवास-सहायता आ भ्रष्टाचार-विरोधक प्रश्न उठबैत अछि।
नाट्यदृष्टि: दुनू नाटकक साझा सूत्र
दुनू कृतिक नायक सत्ता आ संसाधनक केन्द्रसँ बाहर छथि। पहिल नाटकमे मनोज आ संतोष घरक भीतर अधिकारहीन बालक बनैत छथि; दोसरमे मंजूर ग्राम-प्रशासनक आगाँ असहाय निर्धन नागरिक छथि। पहिलमे अपमानक भाषा घरेसँ आरम्भ होइत अछि आ विद्यालयक द्वार बन्द करैत अछि; दोसरमे अपमानक भाषा कुरसी आ भुइँक दूरीसँ आरम्भ होइत अछि आ राज्यक दुआर धरि पसरि जाइत अछि। एहि समरूपतासँ पोथीक युग्म-प्रकाशन एकटा अर्थपूर्ण आलोचनात्मक इकाई बनैत अछि।
तथापि संरचनात्मक भिन्नता सेहो मूलभूत अछि। पहिल नाटक त्रिअङ्की विस्तार, घरेलू प्रतिपक्ष, गीत, दुर्घटना, सफलता आ पुनर्मिलनक भावुक-नैतिक यात्रापर चलैत अछि। दोसर नाटक पनरह दृश्यक अनुक्रममे आवेदनसँ कार्यालय आ कार्यालयसँ सार्वजनिक पहचान धरि एक नागरिक अभियान रचैत अछि। ई भेद सामाजिक यथार्थक दू उपागम—करुणा द्वारा मन-परिवर्तन आ अधिकार द्वारा संस्था-परिवर्तन—केँ स्पष्ट करैत अछि।
‘बाप भेल पित्ती’: कथा, पात्र आ तीन अङ्कक रचना
पिताक असफलताकेँ नाटकक शीर्षकमे केन्द्रित करब आलोचनात्मक रूपेँ महत्त्वपूर्ण अछि। लखनक पहिल पत्नी दिवङ्गत छथि; पुत्र मनोज आ संतोष एखनो बालक छथि। दोसर विवाहक निर्णयक पछाति नव पत्नी मीनाक अपन सन्तानकेँ विशेषाधिकार भेटैत अछि, जखन कि पहिल विवाहक पुत्र शिक्षा आ भोजनक न्यायोचित हिस्सा लेल सङ्घर्ष करैत छथि। शीर्षकक प्रश्न मात्र ‘सौतेली माएक निर्दयता’ नहि; पिताक नैतिक निष्क्रियता सेहो अछि।
प्रतिकथाक रूपमे रामलालक घर उभरैत अछि, जतए दू पत्नी, बच्चासभ आ परस्पर सहयोगक सहअस्तित्व आरम्भमे देखाओल गेल अछि। ई समानान्तर घर लेखक लेल यथार्थक सम्पूर्ण सर्वेक्षण नहि, बल्कि नाटकीय तुलनात्मक प्रतिमान अछि: एक ठाम संसाधन विभाजित अछि, दोसर ठाम सामूहिक देखभालक आदर्श। परस्पर तुलना आकर्षक अछि, मुदा एकरा आदर्श परिवारक सर्वमान्य समाजशास्त्रीय चित्र नहि बुझबाक चाही।
पहिल अङ्क: विवाहक निर्णयसँ विभेदक आरम्भ धरि
दृश्य १: लखन अपन दू पुत्रक पालन-पोषणक चिन्तासँ दोसर विवाहपर विचार करैत छथि। बौहूक चेतावनीमे सौतेल सम्बन्धक जोखिम उपस्थित अछि। भावी दुर्घटनाक बीज एतहि पड़ैत अछि, कारण वयस्कक निर्णयमे बालकक स्पष्ट सहमति वा इच्छा प्रश्न बनि नहि पबैत अछि।
दृश्य २: मदनक घर विवाह-सन्धिक विनिमयक थल बनैत अछि। कुटुमैती, मध्यस्थक आश्वासन आ शीघ्र विवाहक आग्रह सँ नाटक परम्परागत विवाह-ब्यवहारक गति पकड़ैत अछि। स्त्रीक प्रश्न गौण रहि जाइत अछि; एतए विवाह कथानकक यन्त्र अछि, स्त्रीक आत्मवृत्तान्त नहि।
दृश्य ३: शिवमन्दिरक विवाहमे मनोज-संतोषक प्रश्न, नाच-गानक अपेक्षा आ पण्डितक दक्षिणा-केन्द्रित व्यवहार हास्य उपजबैत अछि। बच्चासभक हास्य वयस्कक रीतिकेँ सवालक कटघरामे अनैत अछि; दक्षिणाक प्रसंग धार्मिक कर्मकाण्डक अर्थव्यवस्थापर व्यङ्ग्य रचैत अछि।
दृश्य ४: रामलाल, लक्ष्मी आ सन्तोषीक घरक परिचय शिक्षा-प्रेमी समवेत परिवारक दृश्य रचैत अछि। विद्यालयक फीस देबाक सहज प्रक्रिया आगाँ लखनक परिवारमे शिक्षा-वञ्चनाक प्रतिलोम तैयार करैत अछि।
दृश्य ५: मुखिया रमाकान्त आ वार्ड सदस्य बलदेव आवास-सहायताक बात लऽ कऽ अबैत छथि। धनक लेन-देनक प्रसङ्ग राज्यक ग्रामीण उपस्थितिक आरम्भिक छवि अछि; एतहि आन नाटक ‘अधिकार’क आवास-योजनावला प्रश्नक अप्रत्यक्ष पूर्वाभास देखल जा सकैत अछि। ई अन्तर्पाठीय व्याख्या थिक, घोषित लेखक-योजना नहि।
दृश्य ६: मीना अपन पुत्र-पुत्रीक संग खेलक प्रसङ्गमे सौतेल पुत्र सभसँ भिन्न व्यवहार करैत छथि। कृष्णाक प्रश्न—एक्के पिताक सन्तानमे भेद किएक—बाल-न्यायबोधक महत्त्वपूर्ण क्षण अछि। एहि बिन्दुपर बालक स्वयं नैतिक मूल्याङ्कन करैत अछि।
दोसर अङ्क: बाल-अधिकारक निषेध आ असाधारण प्रतिरोध
दृश्य १: रामलालक घरमे अस्वस्थ सोनी आ सन्तोषीक बीच भोजनक प्रसङ्गसँ विवाद उठैत अछि। लक्ष्मी हस्तक्षेप करैत छथि आ रामलाल सामञ्जस्य स्थापित करबैत छथि। नाटककार सहपरिवारक संकटकेँ शीघ्र समाधानमे बदलि दैत छथि; ई आदर्शीकरण तुलना करबाक सुविधा दैत अछि, मुदा मनोवैज्ञानिक जटिलता घटबैत अछि।
दृश्य २: मनोज आ सन्तोष अपन नाम विद्यालयमे लिखेबाक माँग करैत छथि। आर्थिक असमर्थता कहि लखन पाछाँ हटि जाइत छथि, जखन कि मीना अपन सन्तानक पढ़ाइक व्यवस्था करैत छथि। अन्ततः बच्चासभकेँ मारि भगाओल जाइत अछि। ई नाटकक नैतिक केन्द्रीय दृश्य अछि—एक्के घरमे शिक्षाक दू मापदण्ड।
दृश्य ३: घर छोड़ल मनोज-सन्तोषकेँ राधाक भोजन आ सहानुभूति भेटैत अछि। राधा बालकक पुनरुत्थानक पहिल सामाजिक आश्रय बनैत छथि; ओ हुनका पढ़ाइ नहि छोड़बाक प्रेरणा दैत छथि। नाटक घरक बाहर मानवीय सम्बन्धक विकल्प रचैत अछि।
दृश्य ४: दुनू भाय लोकगीत आ थारी-लोटाक तालपर भीख माँगबाक योजना करैत छथि। अपमानक निज अनुभव सार्वजनिक गीत बनि जाइत अछि; भेटल पैसा निजी विलासपर नहि, पढ़ाइपर खर्च करबाक निर्णय राजनीतिक अर्थमे आत्म-अनुशासनक उद्घोष अछि।
“पहिने पढ़ैक जोगार कर बौआ।” — मनोज;
दृश्य ५: मनोज-सन्तोषक अनुपस्थितिमे मीना आ लखनक सम्बन्धक असमान शक्ति स्पष्ट होइत अछि। मीना अपन पुत्र-पुत्रीक विद्यालयीय उपलब्धि पर गर्व करैत छथि, मुदा परिणाम अनुकूल नहि पड़ैत अछि। कथानक दर्शबैत अछि जे धन आ पक्षपात शैक्षिक सफलता सुनिश्चित नहि करैत।
दृश्य ६: रेलवे स्टेशनक दृश्य समयक छलाँग दैत अछि। विद्यालयीय भ्रमणक बस-दुर्घटनामे मनोजक एक हाथ कटि जाइत अछि आ सन्तोष दृष्टि गमा बैसैत छथि। सन्तोषक गीतमे घरक त्याग, शिक्षाक संघर्ष आ दिव्याङ्गता जोड़ल गेल अछि। दुर्घटनासँ उत्पन्न दुःख कथाकेँ करुणरसक गाढ़ रूप दैत अछि, मुदा यथार्थवादी कारण-परिणामक प्रस्तुति एतए तीव्र संक्षिप्त अछि।
“आन्हर भऽ नै पढ़ि सकलौं” — सन्तोषक गीतक अंश;
तेसर अङ्क: असफल अहङ्कार, सफलता आ पुनर्मिलन
दृश्य १: लखन घरेलू श्रम करैत छथि, मीना अपन दू सन्तानक परीक्षाफलसँ उच्च आशा रखैत छथि। रामपरी आ कृष्णाक अनुत्तीर्ण भेला पर मीना हुनका पढ़ाइ रोकबाक निर्णय करैत छथि। शिक्षा एतए अधिकार नहि, केवल प्रतिस्पर्धात्मक सफलताक शर्त बनि जाइत अछि।
दृश्य २: रामलालक परिवारमे बच्चासभक परीक्षाफलक सुखद प्रतिक्रिया शिक्षाक सामूहिक आनन्दक रूपमे प्रस्तुत अछि। ई दृश्य लखनक घरमे दण्डात्मक परिणाम-प्रतिक्रियाक तीक्ष्ण प्रतिलोम बनैत अछि।
दृश्य ३: रेलवे स्टेशनपर सन्तोषक लोकगायन चलैत अछि; मनोज प्रशासनिक सेवाक सफलताक समाचार लऽ कऽ लौटैत छथि। अपन उपलब्धिक श्रेय छोट भाय आ सहायक जनसमुदायकेँ देनाइ कथा-संरचनामे नैतिक प्रतिदानक क्षण अछि।
“हम आजीवन हिनकर आभारी रहबनि।” — मनोज;
दृश्य ४: कलक्टरक आवासपर दीन-हीन रामलालक उपस्थिति आ सन्तोषक संग भेट प्रशासनिक प्रतिष्ठा आ गरीबक सामाजिक आवश्यकताकेँ एकठाम अनैत अछि। मंचपर पहचानक अन्तर, परिचय-पत्र आ सेवा-संबन्ध मानवीय सम्बन्धक नव समीकरण बनबैत अछि।
दृश्य ५: मनोज आ सन्तोष विवाह-प्रस्ताव पर विचार करैत छथि। उच्च पदस्थ स्त्री आ अपेक्षाकृत कम औपचारिक योग्यता वला स्त्रीक बीच मूल्याङ्कनमे पात्रसभ प्रतिष्ठा, गृहस्थ-सम्बन्ध आ पारिवारिक समीपता पर तर्क करैत छथि। ई संवादक मूल्यांकन लैङ्गिक भूमिकासँ मुक्त नहि अछि।
दृश्य ६: काली मन्दिरमे मनोज-सोनीक विवाह पारिवारिक कथासूत्र जोड़ैत अछि। पहिल अङ्कक विवाह आ एहि विवाहक तुलना करलापर सामाजिक विश्वास आ परस्पर सम्मानक आदर्श अग्रसर देखाइत अछि, मुदा विवाह-प्रसङ्गक समाधान अत्यन्त शीघ्र अछि।
दृश्य ७: मीनाक रोग आ लखनक असहायता घरेलू प्रभुत्वक पट बदलि दैत अछि। जे सन्तानक आवाज दबाएल गेल छल, तिनकर अनुपस्थिति फेर परिवारक विकलतामे स्मरण होइत अछि। रोगक प्रस्तुति दण्डक नैतिक प्रतिमान बनबाक जोखिम उठबैत अछि।
दृश्य ८: कलक्टरक आवासक हँसी-मजाक, वीरभद्रक उपस्थितिसँ प्रशासनिक जीवनक हलुक लय अबैत अछि। गाम वापसीक बात उठलासँ कथानक भावी पुनर्मिलनक दिशामे बढ़ैत अछि; तथापि किछु हास्य कृति केर प्रमुख बाल-अधिकार प्रश्नसँ ध्यान हटबैत अछि।
दृश्य ९: लखनक घरमे मीनाक गम्भीर अस्वस्थताक समय मनोज-सन्तोष पहुँचैत छथि। पुरान अपमानक स्मृति बनल रहितहुँ ओ लोकनि उपचार लेल आग्रह करैत छथि। ई दृश्य बदला आ देखभालक बीच नैतिक चयन रचैत अछि।
दृश्य १०: अस्पतालमे चिकित्सकीय सहायता, रक्त-मिलान, ऑपरेशन आ सम्बन्धक पहचान कथानकक समापन करैत अछि। मनोज उपचारमे सहयोग दैत छथि आ मीनाक पश्चात्ताप उद्घाटित होइत अछि। क्षमादानक भावुक सुखान्त सामाजिक संदेश दैत अछि, मुदा बालकसभपर भेल हिंसाक संरचनात्मक प्रतिपूर्तिक प्रश्न अनुत्तरित रहि जाइत अछि।
पहिल नाटकक केन्द्रीय आलोचनात्मक प्रश्न
पितृत्वक निष्क्रियता। नाटकक सतहपर मीना स्पष्ट प्रतिनायक जकाँ छथि; मुदा लखनक कृत्यक पुनर्पाठ जरूरी अछि। ओ पुत्रसभक विद्यालय-प्रवेश लेल निर्णायक हस्तक्षेप नहि करैत छथि, घरसँ निकालल गेलापर खोजखबरो समुचित रूपेँ नहि रखैत छथि, आ परिवारक दोसर सत्ताक आगाँ झुकैत छथि। तेँ नाटकक वास्तविक आरोप केवल स्त्रीपर नहि, नैतिक उत्तरदायित्वसँ पलायन करनिहार पितृत्वपर अछि। ई अर्थ शीर्षकसँ पुष्ट होइत अछि।
बालकक कर्तृत्व। मनोज आ सन्तोष करुणाक निष्क्रिय पात्र नहि छथि। अपन घरसँ बहिष्कृत भेला पर ओ गीत रचैत छथि, लोकसँ मदद माँगैत छथि, पैसाक उपयोगपर विमर्श करैत छथि आ शिक्षाकेँ पहिल प्राथमिकता बनबैत छथि। एहि कारण कृति बाल-अनुभवक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज बनैत अछि। मुदा प्रश्न उठैत अछि जे बालककेँ पढ़बाक लेल भीख माँगबाक परिस्थितिमे छोड़ि देबाक कथा, जँ प्रेरक सुखान्त मात्र बनि रहए, तँ सामाजिक सुरक्षा-व्यवस्थाक विफलताकेँ आच्छादित करि सकैत अछि।
दिव्याङ्गताक आलोचना। बस-दुर्घटनाक बाद मनोजक हाथ कटब आ सन्तोषक दृष्टिहीन होएब नाटकमे दुःखक आकस्मिक घनत्व बढ़बैत अछि। सन्तोषक गीत सामाजिक सहानुभूति जुटबैत अछि, आ भाईक शिक्षाक निरन्तरता सुनिश्चित करब ओकर सकारात्मक कर्तृत्व अछि। मुदा दृष्टिहीन सन्तोषक अपन शिक्षाक अवकाश शीघ्र छोड़ि देबाक प्रसङ्गक आलोचना आवश्यक अछि। मंचीय अनुकूलनमे ओकर स्वतन्त्र शिक्षण-संभावना आ पहुँच-व्यवस्थाक प्रश्न जोड़ल जाए सकैत अछि। दिव्याङ्गता केँ केवल दयाक पात्र बनाओल नहि जाए—ई पाठक आधुनिक पुनर्वाचनक एक जरूरी कसौटी अछि।
स्त्री-चरित्रक असन्तुलन। मीनाकेँ प्रायः एकरेखीय क्रूरता, लक्ष्मी-सन्तोषीकेँ सामञ्जस्य, राधाकेँ सेवा आ सोनीकेँ स्नेहक ध्रुव बनाओल गेल अछि। एहि विभाजनसँ मंचीय विरोध तीक्ष्ण होइत अछि, मुदा महिला पात्रसभक सामाजिक दबाव, मानसिक विकल्प आ आर्थिक स्वायत्तताक विस्तार कम भेटैत अछि। अतः सौतेल सम्बन्धक सभ कठिनाइकेँ स्त्रीक स्वभावक दोष मानबाक बदला पारिवारिक सत्ताक संरचनामे देखनाइ अधिक सम्यक् हएत।
माध्यमक प्रश्न। अङ्क तीनमे आरम्भिक विद्यालय-दृश्यसँ प्रशासनिक सेवाक सफलता धरि कथाक छलाँग व्यापक अछि। समय-परिवर्तनक सङ्केत अपेक्षाकृत कम भेटैत अछि; ओतए गीत, पुनरावृत्ति आ प्रतीकात्मक पात्र-प्रवेश घटनाक बीच पुलक काज करैत अछि। नाटकक शिल्प एतए यथार्थक सावधान क्रमिकता नहि, लोकनाट्यक त्वरित न्याय-बोध चुनैत अछि।
‘अधिकार’: पनरह दृश्यक नागरिक-नाट्य
‘अधिकार’क नायक मंजूर बाढ़िसँ क्षतिग्रस्त आश्रय, अल्प आय आ ग्रामीण सत्ताक भ्रष्ट व्यवहारसँ पीड़ित रिक्शाचालक छथि। मुखिया चन्दन आ हुनक निकटस्थ अमरनाथ आवास-सहायता लेल घूस माँगैत छथि; विनोद नामक सहयोगी मंजूरकेँ आवेदन-प्रक्रियामे सहायता करैत छथि। मंजूर ब्लॉक, अनुमण्डल, जिला, नेता आ सूचना-आयुक्त धरि जाएब स्वीकार करैत छथि। अन्तिम चरणमे अखबारी चर्चा, सम्मान समारोह आ मुखियाक पश्चात्तापसँ कथा पूर्ण होइत अछि।
‘अधिकार’क शीर्षक निजी लाभक आग्रहसँ पैघ अछि। मंजूरक अनुभव ई प्रश्न उठबैत अछि जे लिखित योजना आ व्यवहारिक पहुँचक बीच जे दूरी अछि, ओकरा कम के करत। एहि नाटकमे अधिकार केवल कानूनी पद नहि, नागरिकक बोलबाक साहस, प्रमाण माँगबाक क्षमता आ अपमान अस्वीकार करबाक सामर्थ्यक नाम अछि। तथापि नाटकक आवेदनसभमे उल्लिखित अति-संक्षिप्त जवाब-अवधि आ संस्था-प्रक्रियाकेँ विधिक रूपसँ प्रमाणित नियम नहि, नाटकीय प्रतिपादन बुझबाक चाही।
दृश्यवार पाठ-परीक्षण
दृश्य १: मुखिया चन्दनक दलानमे मंजूर जमीनपर बैसैत छथि आ कुर्सीकेँ उच्च पदक प्रतीक मानैत छथि। बीस हजार टाकाक आवास-सहायतामे पाँच हजार घूसक माँग सत्ताक अन्याय उजागर करैत अछि। कुर्सी आ भुइँक दूरी एहि नाटकक पहिल प्रभावकारी दृश्य-रूपक अछि।
दृश्य २: विनोदक संग संवादमे मंजूर पहिल बेर व्यावहारिक कानूनी उपायक दिशा पबैत छथि। ओ पढ़ल-लिखल नहि छथि, ताहू पर अपने पक्षक नैतिक वैधता बुझैत छथि। विनोद लिखित आवेदन द्वारा साक्षरता आ अधिकारक बीच सेतु बनैत छथि।
दृश्य ३: मुखिया समक्ष पहिल लिखित निवेदनमे आवासक आवश्यकता आ सूचनाक माँग एकसाथ उपस्थित अछि। चन्दनक उपहास संस्थागत निरङ्कुशताक मंचीय प्रदर्शन अछि। मंजूरक विरोध आब विनतीसँ लिखित प्रतिवादमे बदलि जाइत अछि।
दृश्य ४: विनोद बी.डी.ओ., एस.डी.ओ. आ डी.एम. लेल आवेदन बनबैत छथि। प्रशासनिक शृङ्खला नाटकमे एक प्रकारक सीढ़ी बनैत अछि—प्रत्येक नव दुआर आशा आ भय दुनू बढ़बैत अछि।
दृश्य ५: खण्ड विकास कार्यालयमे निवेदन उपेक्षित होइत अछि; आवेदन कूड़ामे फेकि देबाक क्रिया कागजी अधिकारक अवमाननाक सटीक दृश्य-बिम्ब अछि। एहि दृश्यसँ नाटकक संघर्ष सरकारी भाषा बनाम जीवित भूखक संघर्ष बनैत अछि।
दृश्य ६: अनुमण्डल कार्यालयक चक्कर न्याय लेल लगातार श्रमक लागत स्पष्ट करैत अछि। पहिने सँ निर्धन नागरिककेँ रोजी छोड़ि कार्यालय पहुँचनाइ स्वयं एकटा दण्ड थिक; एहि दृश्ये प्रशासनिक यात्राक आर्थिक पक्षक संकेत भेटैत अछि।
दृश्य ७: समाहरणालयमे कलक्टर चन्द्रकान्तक समक्ष मंजूरक निवेदन सेहो अपेक्षित फल नहि दैत अछि। निम्न कर्मचारीक व्यवहार आ ऊपरक उपेक्षा मिलि संस्थागत असंवेदनशीलता देखबैत अछि; एक कार्यालयक गलती नहि, क्रमिक व्यवस्था कृतिक आलोच्य बनैत अछि।
दृश्य ८: पन्द्रह दिनक थकानक बाद विनोद पहिने हार मानबाक सलाह दैत छथि, मुदा मंजूर आगू बढ़बाक इच्छा रखैत छथि। एतए नायकक धैर्य सहायक पात्रक यथार्थबोधसँ टकराइत अछि।
दृश्य ९: श्यामानन्दसँ भेंट होइत अछि आ सूचना-आयुक्त लेल निवेदनक बाट खुलैत अछि। न्याय-प्राप्तिमे लोकमध्यस्थक भूमिका देखाओल गेल अछि; मुदा एहन ‘भला नेता’क आकस्मिक हस्तक्षेपपर निर्भरता संस्थागत आलोचनाकेँ आंशिक रूपेँ व्यक्तिगत सद्भावपर टिका दैत अछि।
दृश्य १०: मंजूरक घरक अभाव, पत्नी नजीमाक चिन्ता, बटखर्चाक कमी आ एक मुठी मुरही नागरिक आन्दोलनक वास्तविक आर्थिक धरातल बनबैत अछि। ई नाटकक सभसँ मार्मिक दृश्यसभमे एक अछि, कारण प्रशासनिक प्रक्रिया घरेक भुखसँ जोड़ल गेल अछि।
दृश्य ११: सूचना-आयुक्तक कार्यालयमे मंजूरक प्रयत्नकेँ प्रशंसा भेटैत अछि। पत्रकारसभ हुनकर कथा सार्वजनिक करैत छथि। एहि दृश्यसँ निजी शिकायत सार्वजनिक नागरिक उदाहरणमे रूपान्तरित होइत अछि, यद्यपि निर्णायक आधिकारिक आदेशक विवरण कथामे विस्तारसँ नहि देल गेल अछि।
दृश्य १२: समाचार-माध्यमक प्रतिनिधि अखिलेशक ध्यान मंजूरक दिस आकर्षित होइत अछि। मीडिया एकरा असाधारण नागरिकक कथा बनबैत अछि; नाटकमे प्रचारक शक्ति प्रेरक अछि, मुदा सुर्खीक सफलता आ वास्तविक संस्थागत सुधारक दूरी पर विचार जरूरी अछि।
दृश्य १३: मंजूरक परिवारक दिल्ली-यात्राक तैयारीमे बच्चासभक चञ्चल प्रश्न आ घरेलू विनोद अछि। नाजीमा, सलमा आदिक बातचीत नागरिक उपलब्धिक सामूहिक आनन्द देखबैत अछि, मुदा स्त्रीक स्वतन्त्र अधिकार-बोध एतए सीमित रहैत अछि।
दृश्य १४: दिल्लीक समारोहमे मंजूरकेँ पुरस्कार देल जाइत अछि। हुनक भाषणमे भ्रष्टाचारक जन्म आ पालन-पोषणमे सार्वजनिक सहभागिताक प्रश्न राखल गेल अछि। ई नाटकक वैचारिक उत्कर्ष अछि; मुदा प्रशस्ति-संवाद दीर्घ भऽ कऽ नाटकीय टकराव घटबैत अछि।
दृश्य १५: मुखिया बीस हजारक सहायता आ अपन दिससँ पाँच हजार देबाक प्रस्ताव लऽ कऽ अबैत छथि। मंजूर पहिने अवैध धन अस्वीकार करैत छथि, तकर बाद क्षमा लेल सार्वजनिक सद्व्यवहारक शर्त रखैत छथि। अन्तिम विनोद-वक्तव्य शिक्षा आ भ्रष्टाचार-निरोधकेँ जोड़ैत अछि।
“हमरा हरामक पाइ नै चाही” — मंजूर;
“जय हिन्द ! जय भारत !! जय शिक्षा !!!” — अन्तिम उच्चार;
‘अधिकार’क शिल्प आ नायकत्व
लोकतान्त्रिक नायकक निर्माण। मंजूरक विशेषता उच्च शिक्षा, आर्थिक शक्ति वा वंशगत प्रतिष्ठामे नहि, अपन न्यायसंगत माँग छोड़ि नहि देबाक संकल्पमे अछि। पहिल दृश्य सँ अन्तिम दृश्य धरि हुनकर भाषिक संकोच घटैत अछि। ओ प्रारम्भमे कुर्सीपर बैसबाक अधिकारी अपनेकेँ नहि मानैत छथि; अन्तमे समाजसँ वचन लैत छथि जे सभक संग नीक व्यवहार होअए। ई आत्म-सम्मानक धीमा अर्जन नाटकक सबसँ विश्वसनीय अन्तःक्रम अछि।
अभिलेख, आवेदन आ मंचीय वस्तु। एहि नाटकमे कागज, फाइल, दरखास, कुरसी, सिक्योरिटी-दुआर आ समारोहक मालासभ केवल सजावट नहि, सत्ताक मूर्त संकेत अछि। चन्दनक कुर्सी आ मंजूरक जमीन पर बैसब, अधिकारीक फाइल आ कूड़ामे आवेदन फेकब, अन्तमे नागरिककेँ माला पहिराएब—ई क्रम वस्तु-चिह्नद्वारा अर्थक परिवर्तन करैत अछि। सीमित साधनवला रंगमंचक लेल ई शिल्प उपयोगी अछि।
मध्यस्थक नैतिकता। विनोद बिना मंजूरक सङ्घर्ष एतेक आगू नहि बढ़ैत। ई सहयोग अशिक्षित जनक नागरिक अधिकारपर प्रश्न उठबैत अछि: अधिकार संविधानसम्मत होएबाक अतिरिक्त आवेदन लिखि सकबाक व्यावहारिक क्षमता सेहो माँगैत अछि। मुदा विनोदक सहायता नायकक स्वतन्त्रताकेँ शून्य नहि करैत—अन्तिम निर्णय, यात्रा आ कष्ट मंजूर स्वयं सहैत छथि।
धर्म-सामाजिक बहुस्वरता। मंजूर, नजीमा आ हुनकर बालकसभक घरेलू दृश्यक संग विनोद, श्यामानन्द आ आन अधिकारीक सह-अस्तित्व नाटककेँ साझा नागरिक प्रश्नक भूमिमे अनैत अछि। पात्रक नामसँ सांस्कृतिक वैविध्य उपस्थित अवश्य अछि, मुदा कृतिक मूल द्वन्द्व सम्प्रदाय-आधारित नहि, आर्थिक-वर्गीय आ प्रशासनिक अछि। एहि विश्लेषणमे पाठसँ आगाँ जाति अथवा समुदाय सम्बन्धी असत्यापित अनुमान नहि कएल गेल अछि।
सुखान्तक सीमा। अधिकारीसभक प्रारम्भिक विफलताक उपरान्त पत्रकारिता, पुरस्कार आ मुखियाक त्वरित पश्चात्ताप सबटा समस्या सुलझाओल-सन करैत अछि। ई लोकनाट्यक नैतिक विजयक ढाँचा अछि। तथापि तकर मूल्य पर किछु प्रश्न आवश्यक अछि: आवेदनक अभिलेखीय स्थिति की भेल, घूसक शिकायतपर कोन प्रक्रिया चलल, आन पात्रसभक अनुभव बदलल कि नहि? नाटक एहि संस्थागत उत्तरसभपर अपेक्षाकृत मौन अछि।
संवाद, करुणा आ प्रतिरोध
दुनू नाटकक चयनित संवादमे परिवारक करुणा आ नागरिक प्रतिरोधक अलग-अलग भङ्गिमा भेटैत अछि। कथ्यक निर्णायक क्षणपर पात्रक वाणी नाटकीय अर्थकेँ तीव्र करैत अछि।
‘पहिने पढ़ैक जोगार कर बौआ’ कथन पैसाक उपयोगमे बालनायकक प्राथमिकता बतबैत अछि। ‘आन्हर भऽ नै पढ़ि सकलौं’ आत्मवृत्तान्त शिक्षाक इच्छासँ विच्छेदक पीड़ा बनैत अछि। दुनूकेँ संग पढ़लापर शिक्षा कतेक आवश्यक अछि आ पहुँचक साधन नष्ट भेला पर इच्छा अपने कतेक अपूर्ण रहि जाइत अछि, से स्पष्ट होइत अछि। मनोज द्वारा सफलता केर श्रेय सन्तोषकेँ देब सामाजिक प्रतिदानक नैतिक धुरी अछि।
‘अधिकार’मे ‘हमरा हरामक पाइ नै चाही’ राज्य-सहायताक उद्देश्य आ अनुचित व्यक्तिगत लाभक बीच नायकक भेद बतबैत अछि। ‘जय हिन्द ! जय भारत !! जय शिक्षा !!!’ नागरिक अधिकारक विमर्शकेँ अन्ततः शिक्षा-केन्द्रित सामूहिक आदर्शमे परिणत करैत अछि। मुदा शिल्प-दृष्टिसँ अन्तिम घोषवाक्य संवादक बहुअर्थता घटा कऽ एकरेखीय उपदेश बनबाक सम्भावना सेहो राखैत अछि।
बाल-साहित्यक इतिहासक तुलनात्मक प्रसङ्ग
बालनाटकक कोटि निर्धारित करैत समय विषय मात्र नहि, लक्षित पाठक, भाषिक जटिलता, मंचनक समय, हिंसा-दृश्यक प्रस्तुति, बालपात्रक क्रियाशीलता आ बाल-दर्शकक भावनात्मक वहन-क्षमताकेँ देखबाक होइत अछि। ‘बाप भेल पित्ती’ मे बालक कथाक केन्द्र छथि; किछु प्रसङ्ग बालमञ्च पर अपनाएल जा सकैत अछि। मुदा सम्पूर्ण त्रिअङ्की नाटकमे वयस्क विवाह, पारिवारिक हिंसा, भिक्षाटन, गम्भीर दुर्घटना, चिकित्सा आ विवाह-सुखान्तक दीर्घ विस्तार अछि। तेँ एकरा सीधा विशुद्ध बालनाटक घोषित करब विधागत दृष्टिसँ अशुद्ध होएत। ‘अधिकार’मे बालपात्र सहायक छथि; ओकर मूल केन्द्र अधिकार-अभियान आ प्रशासनिक व्यवहार अछि।
विदेहक उपलब्ध सन्दर्भ-संसार एहि भेदकेँ ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करैत अछि। फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’क ‘मैथिली शिशु लोक साहित्य’ (विदेह, अङ्क ५०, २०१०) आ योगानन्द झाक ‘मैथिली बाललोककथा: स्थिति आ अपेक्षा’ (अङ्क ७६, २०११) बाल-लोकपरम्पराकेँ अध्ययनक विषय बनबैत अछि। दुर्गानन्द मण्डलक ‘नेना लेल सुन्दर चित्रकथा’ (अङ्क ११६, २०१२) बाल-पाठकक दृश्य-संसारक विमर्शक प्रमाण अछि। एहि लेखसभक विदेह-अभिलेखमे स्पष्ट प्रविष्टि उपलब्ध अछि; मुदा एतए अप्राप्त मूल लेखक विस्तृत तर्क हुनकर नामपर आरोपित नहि कएल गेल अछि।
२०१२ क ‘सगर राति दीप जरय’क विदेह प्रतिवेदनमे बेचन ठाकुरक एहि पोथीक लोकार्पण-सूचना भेटैत अछि। एही प्रतिवेदनमे ‘बाल मण्डली/किशोर जगत’, ‘विदेह शिशु उत्सव’ आ आन नाट्यकृतिक उल्लेख सेहो अछि। एहिसँ बाल/किशोर साहित्य आ वयस्क सामाजिक नाटकक समकालीन प्रकाशन-परिसरक साक्ष्य भेटैत अछि; मुदा एहि एकल प्रतिवेदनसँ समूचा मैथिली बाल-साहित्यक ‘पहिल’ वा ‘सबसे पैघ’ इतिहास निर्धारित नहि कएल जा सकैत।
रमेश रञ्जनक ‘मैथिली बालनाटक सीमा विस्तार करैत — चौआरि’ (विदेह, अङ्क १२६, १५ मार्च २०१३) जकाँ नामित आलोचनात्मक प्रविष्टि बालनाटककेँ पृथक अध्ययन-विषयक रूपमे दर्शबैत अछि। २०२६ मे गजेन्द्र ठाकुरक ‘मैथिली बाल-उपन्यासक समीक्षाशास्त्र’ (विदेह, अङ्क ४४७) बाल-पाठकक कर्तृत्व, सामाजिक दृष्टि आ उपयुक्तताक प्रश्नकेँ विस्तार दैत अछि। एही अङ्कक ‘नाट्य-नवग्रह’ बाल आ प्रौढ़ नाटकक पारस्परिक अन्तर-विचारक एकटा उपयोगी तुलनात्मक आधार प्रदान करैत अछि। ई अध्ययनसभ २०१२ क नाटकसँ कालक्रममे पछाति प्रकाशित भेल अछि; तेँ हुनकर अवधारणा इहाँ उत्तरकालीन समीक्षा-कसौटीक रूपमे लगाओल गेल अछि, नाटककारक तत्कालीन घोषित मंशाक रूपमे नहि।
बाल-अनुभव आ नागरिक-अनुभव: तुलनात्मक कसौटी
पहिल कसौटी बालकक बोलबाक अधिकार अछि। ‘बाप भेल पित्ती’मे कृष्णा अपन मायसँ एक्के पिताक संतानक प्रति भेदभावक प्रश्न करैत अछि; मनोज-सन्तोष विद्यालयक नामाङ्कन माँगैत छथि आ पाठकीय सहानुभूतिसँ आगाँ अपन निर्णय लैत छथि। ‘अधिकार’मे मंजूर प्रौढ़ छथि; तिनकर आवेदन सेहो अपमानित मनुष्यक आवाज पुनः हासिल करबाक कथा अछि। दुनू नाटक नागरिक शिक्षा लेल उपयोगी भऽ सकैत अछि, मुदा बालक आ प्रौढ़क अनुभूतिक अलग आकार बनल रहबाक चाही।
दोसर कसौटी गीत आ मंचीय सहभागिता अछि। पहिल नाटकक सार्वजनिक गायनक दृश्य बाल/किशोर रंगमञ्च लेल विशेष अनुकूल बनि सकैत अछि, कारण गीत कथन, लय, सामूहिक श्रोता आ न्याय-माँगकेँ एकठाम करैत अछि। दोसर नाटकमे दरखास पढ़ब, कार्यालय-द्वार पार करब आ सार्वजनिक सम्मान मुख्य मंचीय क्रिया अछि। एहि कारण लघु शैक्षिक रूपान्तर सम्भव अछि, मुदा पूर्ण नाटकक लक्ष्य-वर्ग स्वतः बदलि नहि जाइत।
तेसर कसौटी कष्टक प्रस्तुति अछि। बाल-दर्शक लेल घरसँ निकालब, हिंसा, दुर्घटना आ दिव्याङ्गताक प्रसङ्गकेँ संवेदनशीलता तथा आयु-अनुकूल दृश्य-योजनासँ खेलाएब आवश्यक अछि। कृतिक मौलिक यथार्थक पीड़ा घटाएब नहि, ओकर प्रदर्शनक मात्रा आ दृष्टिकोण सावधान करब अपेक्षित अछि। नाटककेँ नैतिक पाठक एकरेखीय माध्यम बनौनाइ बालकक अपन प्रश्न करबाक अधिकार घटा सकैत अछि।
रस, भाषा, रंग-विधान आ लोकसमाज
करुण आ प्रतिकार। ‘बाप भेल पित्ती’मे करुणरसक स्रोत बालकक भूख, तिरस्कार आ दुर्घटना अछि। बालकक गीत एहि करुणाकेँ सामूहिक करुणामे बदलैत अछि। तेसर अङ्कक सफलतासँ वीर-उत्साह आ शान्त-सुलहक भाव उपस्थित होइत अछि। ‘अधिकार’मे प्रारम्भिक दैन्यक संग प्रतिरोधक उत्साह बढ़ैत अछि; मंजूरक फाइल-दर-फाइल अभियान वीररसक लोक-नागरिक रूप रचैत अछि।
हास्य आ व्यङ्ग्य। विवाहक रीति, पण्डितक दक्षिणा, बालकक चञ्चल बोली, वीरभद्रक मिश्रित भाषा आ दिल्लीक यात्राक हास्य नाटकसभक गम्भीर कथ्यकेँ बीच-बीचमे विराम दैत अछि। तथापि किछु हास्य अत्यधिक लम्बा होइत अछि आ पात्रकेँ चुटकुलाक वाहन बनबैत अछि। शिल्पगत संयमसँ नाटकीय गति आ सामाजिक आलोचना दुनू तीक्ष्ण भऽ सकैत अछि।
बोलीक विविधता। ग्रामीण मैथिली मूल संवादक आधार अछि; प्रशासनिक शब्दावली, हिन्दी-प्रभावित पद, अंग्रेजी पदनाम आ संस्कृत-आश्रित मन्त्र ओकर भीतर आवाजाही करैत अछि। एहि मिश्रणकेँ सरलीकृत ‘शुद्ध-अशुद्ध’क दोहरी कसौटीपर नहि, पात्रक वर्ग, पेशा, स्थिति आ विडम्बनाक रूपमे पढ़बाक चाही। उद्धरणमे मूल वर्तनी सुरक्षित रखल गेल अछि, जखन कि आलोचनात्मक गद्य मानक मैथिलीमे प्रस्तुत अछि।
मंचीय व्यावहारिकता। घरक दलान, बाट, विद्यालय, स्टेशन, अस्पताल, कार्यालय आ समारोह कएटा दृश्यस्थल बनबैत अछि। कम बजटक मञ्चनमे स्थिर चौकी-कुर्सी, प्रकाश-परिवर्तन आ ध्वनि-सङ्केतसँ स्थल-परिवर्तन सम्भव होएत। मुदा पहिल नाटकक अस्पताल/दुर्घटना आ दोसरक दिल्लीक सार्वजनिक समारोह अतिरिक्त नाट्य-सम्पादन माँगैत अछि। नाट्य-पाठ आ सफल मञ्चनकेँ समान नहि मानबाक चाही।
द्वन्द्व, अन्तर्विरोध आ आलोचनात्मक सीमा
१. परिवारक आदर्शीकरण: रामलालक परिवार तुलनाक मूल्यवान उपकरण अछि, मुदा अत्यन्त सहज सुलहसँ गम्भीर गृहस्थ-विवादक वास्तविक गहराइ घटैत अछि। दोसर दिस मीनाक व्यक्तित्वमे लगभग निरन्तर नकारात्मकता विरोधी पात्रकेँ सपाट बनबैत अछि।
२. उपलब्धिक न्याय: मनोजक प्रशासनिक सफलता बाल-दुःखक ऐतिहासिक प्रतिकार जकाँ रचल गेल अछि। मुदा असंख्य वञ्चित बालक उच्च पदपर नहि पहुँचथि; तिनकर अधिकारो कम नहि होइत। शिक्षा-न्यायक नैतिकता उपलब्धि-आधारित पुरस्कारसँ अधिक व्यापक अछि।
३. दिव्याङ्ग जीवन: सन्तोषक अन्धत्वक पछाति ओकर अध्ययनक निरन्तरता प्रश्नांकित अछि। भाईक सेवा द्वारा आत्मसम्मान स्थापित करबाक प्रसङ्ग भावुक अछि, मुदा स्वतन्त्र संसाधन, शिक्षण आ सार्वजनिक पहुँचक प्रश्न आर विस्तार माँगैत अछि।
४. लैङ्गिक पूर्वधारणा: मीनाक एकल-नकारात्मक प्रस्तुति, स्त्रीक चरित्रनिर्माणमे विवाह/सेवाक केन्द्रीयता आ आदर्श पत्नी-छविक प्रधानता पर आलोचनात्मक ध्यान जरूरी अछि। महिला पात्रक वैकल्पिक दृष्टि जोड़लापर कथाक सामाजिक क्षमता बढ़त।
५. अधिकारक प्रक्रियागत प्रस्तुति: ‘अधिकार’मे सूचना-अधिकारक प्रावधानक रूपरेखा नाटकीय सरलतासँ देल गेल अछि। तेँ एकरा कानूनी आवेदनक प्रमाणित नमूना नहि, अधिकारचेतनाक सांस्कृतिक पाठ बुझबाक चाही। शोधक विषय कानूनक इतिहास बनत तँ पृथक आधिकारिक अभिलेखक जाँच आवश्यक हएत।
६. वैयक्तिक सम्मानक समाधान: मंजूरक संघर्षक पुरस्कार आ मुखियाक क्षमा-याचनाक सुखान्त नाटकीय आश्वासन दैत अछि, मुदा व्यवस्था-सुधारक मापदण्ड पर अपर्याप्त अछि। भ्रष्टाचारक स्थायी प्रतिरोध लेल सामूहिक निगरानी आ सार्वजनिक उत्तरदायित्वक चित्र आओर पैघ भऽ सकैत छल।
७. दीर्घ व्याख्यात्मक संवाद: दोसर नाटकमे आवेदन-प्रपत्र आ अन्तिम भाषणक विस्तार कखनो-कखनो क्रियाशील नाट्यसँ अधिक घोषणात्मक वक्तव्य बनैत अछि। अभिनय-प्रधान प्रस्तुति लेल एहि अंशसभक छँटाइ होय तँ मूल तर्क बचा कऽ गति सुधरि सकैत अछि।
विदेहक समकालीन सन्दर्भ आ पाठकक स्थान
मूल पोथीक मे सम्पादक गजेन्द्र ठाकुर बेचन ठाकुरक नाट्य-कार्य, ग्रामीण रंगमञ्च आ मैथिली नाटकक आलोचना-परिसरक विषयमे विस्तृत टिप्पणी करैत छथि। ई टिप्पणी लेखकक नाटकक भीतरक संवाद नहि, पोथीक स्वतन्त्र सम्पादकीय परिपाठ अछि। एहिमे ‘अधिकार’क सामाजिक प्रसङ्ग तथा समकालीन रंगमञ्चक संस्थागत असमानता सम्बन्धी दाबी अछि; शोधमे ओकरा सम्पादकीय दृष्टिकोणक रूपमे पढ़बाक चाही।
विदेहक २०१२ क लोकार्पण-प्रतिवेदन पोथीक तत्कालीन परिसंचरणक बाह्य साक्ष्य दैत अछि। एहि आधारपर ई कहब संगत अछि जे पुस्तक मुद्रित प्रकाशनक संग सार्वजनिक साहित्यिक मंचपर सेहो उपस्थित छल। मुदा उपलब्ध प्रमाण मात्रसँ सभ प्रदर्शनक स्थान, संख्या, दर्शक-वर्ग वा प्रतिक्रिया निर्धारित करब सम्भव नहि; एहि विषयमे अलग मञ्चन-अभिलेखक आवश्यकता अछि।
निष्कर्ष
‘बाप भेल पित्ती आ अधिकार’क समग्र उपलब्धि ई अछि जे ई मैथिली रंग-भाषामे अधिकारहीन मनुष्यक दुःख आ प्रतिवादकेँ सार्वजनिक दृश्य बनबैत अछि। पहिल नाटकमे अनाथ-सन छोड़ल बालक घरक बाहर जनसमुदायक सहानुभूति पबैत अछि आ अध्ययनक स्वप्न बचबैत अछि; दोसर नाटकमे निर्धन रिक्शाचालक ग्रामसत्ता आ अधिकारीक उपेक्षाक बीच अपन नागरिक गरिमा सुरक्षित रखैत अछि। दुनू रचनाक अन्त सुखान्त अछि, मुदा ओकरा धरि पहुँचबाक बाट भूख, अपमान, श्रम आ संस्थागत असमानतासँ भरल अछि।
साहित्यिक मूल्यांकनमे सम्यक् निष्कर्ष दू स्तरपर अछि। कथ्यक स्तरपर बेचन ठाकुर बालशिक्षा, अभिभावकीय उत्तरदायित्व, सामाजिक सहयोग, भ्रष्टाचार-विरोध आ अधिकारचेतनाक समर्थ पक्षधर छथि। शिल्पक स्तरपर लोकबोली, संवाद-प्रधान विन्यास, गीत, दृश्य-वस्तुक प्रतीकात्मकता आ सार्वजनिक नायकक निर्माण हुनकर विशेषता अछि; तहिना चरित्रक एकरेखीयता, असाधारण संयोग, अत्यधिक उपदेश आ संस्थागत समस्याक शीघ्र व्यक्तिगत समाधान हुनकर सीमा अछि।
बाल-साहित्यक इतिहासमे पहिल नाटककेँ ‘बाल-अनुभव केन्द्रित सामाजिक नाट्य’क स्थान देब उचित अछि; विशुद्ध बालनाटकक कोटिमे राखबाक लेल लक्षित उमेर आ मंचनीय रूपान्तरक अतिरिक्त प्रमाण चाही। दोसर नाटक बाल-अधिकारक प्रत्यक्ष पाठ नहि, मुदा किशोर/युवा नागरिक-शिक्षामे उपयोगी वैचारिक संसाधन बनि सकैत अछि। ई विधागत सूक्ष्मता राखलापर पोथी मैथिली सामाजिक रंगमञ्च आ बाल-न्यायचेतना दुनू क्षेत्रक बीच एकटा महत्त्वपूर्ण संवाद-सेतु सिद्ध होइत अछि।
