लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख
जाति, शिक्षा आ सामाजिक समताक नाट्य-द्वन्द्व
उपक्रम: समीक्ष्य कृति, प्रश्न आ प्रतिपाद्य
‘ऊँच-नीच’क कथा केवल दू जातिक बीचक बाहरी टकराहट नहि थिक। ओकर भीतरी धुरी अछि—जन्मसँ भेटल सामाजिक दर्जा आ श्रम-शिक्षासँ अर्जित मानवीय योग्यता बीचक अन्तर। नाटक पूछैत अछि जे समाजमे प्रतिष्ठा निर्धारणक आधार वंश आ सम्पत्ति रहत, अथवा व्यवहार, श्रम आ ज्ञान? एहि प्रश्नक उत्तर लेखक पहिने गरीब दम्पतीक दैनन्दिन जीवन, फेर शिक्षा-संस्थान आ साहूकारीक सम्बन्ध, आ अन्तमे प्रेम-विवाह तथा सामुदायिक न्याय-व्यवस्थाक द्वारा खोजैत छथि। एहन रचना केँ केवल जातिवाद-विरोधी सन्देशपर सीमित केलासँ ओकर आर्थिक आ नाट्यगत जटिलता ओझराएत।
पाठक धुरी मङ्गल–मरनी–दुखनक परिवार अछि। हुनका सभक बाँसक काज, कोनी-पथिया बिनब, शुल्क जुटेबाक प्रयत्न, खेत-जमीन आ गहना गुमेबाक बाध्यता—ई सभ कथानकक ठोस भौतिक आधार बनबैत अछि। एकर समक्ष चन्द्रेश झाक सम्पन्न घर, बेटीकेँ चिकित्सक बनेबाक आकांक्षा, साहूकारीसँ लाभ, प्रतिष्ठाक उत्कण्ठा आ जातिगत अहङ्कार उपस्थित अछि। अन्तिम अङ्कमे दुनू घरक सन्तान वयस्क रूपमे भेटैत अछि आ परिवार-द्वयक पुरान सम्बन्ध नव नैतिक कसौटीपर परखल जाइत अछि।
बेचन ठाकुरक ‘ऊँच-नीच’ श्रुति प्रकाशन, दिल्लीसँ २०१३ मे प्रकाशित सामाजिक नाटक अछि। तीन अङ्कमे क्रमशः छओ, नओ आ सात दृश्य अछि।
कथानकक समग्र स्थापत्य: श्रमसँ शिक्षाक बाट आ शिक्षासँ अधिकारक बाट
पहिल अङ्कमे परिवारक भौतिक अभाव आ मरनीक विचारशील व्यवहार नाटकक समस्या निर्धारित करैत अछि। मङ्गल शराबक आदति, बाजारक दाम, बेटाक अध्ययन आ पारिवारिक अपेक्षाक बीच डोलैत अछि। मरनी ओकरा संयम, स्वास्थ्य आ पढ़ाइक दिशामे मोड़ए चाहैत छथि। दुखनक शुल्क-समस्या एहन क्षण बनैत अछि जतए रोजीरोटी आ भविष्य-दूनू आमने-सामने ठाढ़ होइत अछि। गरीब परिवारक हस्तशिल्पमूलक उत्पादक बिक्रीमे ग्राहक आ भूमिपतिक असमान सामर्थ्य भीषण भऽ उठैत अछि। एतऽ आर्थिक सम्बन्ध, सम्मानसूचक सम्बोधन आ असहाय विनती एक्कहि दृश्य-रचनामे जुड़ैत अछि।।
दोसर अङ्क शिक्षा-परियोजनाक दीर्घकालिक दाम स्पष्ट करैत अछि। सफल परिणाम उत्साह दैत अछि, मुदा अगिला कक्षा, महाविद्यालय, प्रशिक्षण आ अभियान्त्रिकी शिक्षाक खर्च परिवारकेँ कर्जाक चक्रमे घोंघियबैत अछि। समृद्ध घरक बेटी उच्च शिक्षाक लेल नगरक दिशामे बढ़ैत अछि, जखन कि दुखनक पढ़ाइ ले मरनीक गहना आ परिवारक डीहक प्रश्न उठैत अछि। एतऽ समान प्रतिभाक सामाजिक असमान प्रवेश-द्वार मुखर होइत अछि। पुरान घरेलू समयक समानान्तर नब शहर–महाविद्यालय–रोजगारक संसार कथानकमे प्रवेश करैत अछि।।
तेसर अङ्कमे शिक्षित सन्तान पुरान जातिगत अनुशासनपर प्रश्न उठबैत अछि। दुखन अभियन्ता अछि; सम्पन्न घरक बेटी चिकित्सकीय शिक्षा प्राप्त कऽ आत्मनिर्णयक आकांक्षा रखैत छथि। प्रेम, नियुक्तिमे पक्षपात, परिवारक मर्जी, सामाजिक अपमानक भय आ प्रत्यक्ष हिंसा—सभटा संघर्ष एकाग्र करैत अछि। अन्तमे सार्वजनिक पञ्चायत ओहि निजी प्रेमसम्बन्धकेँ समुदाय-सम्बन्धी निर्णयमे बदलैत अछि। ई सुखान्त आशा देइत अछि, मुदा आर्थिक क्षतिक प्रतिपूर्ति आ हिंसाक विधिसम्मत परिणामक प्रश्न शेष रखैत अछि।।
दृश्यवार पृथक पाठविश्लेषण
पहिल अङ्क: दृश्य १ — घर-आँगन, श्रम आ मायक तर्क
मङ्गल आ मरनीक कोनी-पथिया बिनबाक क्रममे शुरू भेल गपशप स्वास्थ्य, मद्यपान, परिवार-व्यय आ दुखनक शिक्षापर पहुँचैत अछि। मरनी औपचारिक पढ़ाइ नहियो भेटलापर सुनल सामाजिक उपदेशकेँ अपन जीवनानुभवसँ जोड़ैत छथि। ओ मङ्गलकेँ शराबक खर्च घटेबाक आ बेटाक पढ़ाइक चिन्ता करबाक दिशा देखबैत छथि। ई दृश्य नाटकक नैतिक नायकत्व मायक तर्कशील श्रमपर स्थापित करैत अछि। तथापि मङ्गलक बेटा-प्राथमिकता लिङ्गगत पूर्वाग्रहक उपस्थितिक सेहो संकेत अछि। घरक भीतरक भाषा एतऽ सरल उपदेश नहि, संसाधन-वितरणक बहस बनैत अछि। (ठाकुर, २०१३)।
पहिल अङ्क: दृश्य २ — शुल्क, वस्तु आ असमान मोल-भाव
दुखनक आवेदन वा अध्ययन-सम्बद्ध शुल्क परिवारकेँ हठात् आर्थिक संकटमे धकेलैत अछि। उत्पादक श्रमक वस्तु—कोनी, पथिया—बेचबाक योजना बनैत अछि, मुदा ग्राहकक सामने मङ्गलक मोल-भावक सामर्थ्य कम पड़ैत अछि। एतऽ वस्तुक मूल्य केवल बाजारक मूल्य नहि, एक बालकक भविष्यक प्राणदाम बनि जाइत अछि। ग्राहकक सौदेबाजी आ परिवारक विनती बीचक विषमता पूँजीक सामाजिक शक्ति दिखबैत अछि। नाटक गरीबीकेँ आलस्यक फल नहि, अनिश्चित आय आ असमान लेनदेनक नतीजा रूपमे स्थापित करैत अछि। (ठाकुर, २०१३)।
पहिल अङ्क: दृश्य ३ — हवेली, अपमान आ प्रतिरोधक पहिल स्वर
मरनी उत्पाद बेचबाक आशासँ चन्द्रेश झाक हवेली पर पहुँचैत छथि। कम दाम, देरीक आरोप, बकायाक दबाव आ स्त्रीपर हाथ उठेबाक धमकी एक्कहि दृश्यमे जकाँ-जकाँ बढ़ैत अछि। सम्पन्न घरक युवती द्वारा हस्तक्षेप स्थिति बदलैत अछि। एतऽ उच्चवर्गीय घर स्वयं एकरूप नहि अछि—पिता शोषणक पक्षमे छथि, बेटी अन्यायकेँ देखैत छथि। नाटककार भविष्यक जातिविरोधी सम्भावनाक बीज एहि पीढ़ीगत अन्तरमे रोपैत छथि। सीमा ई जे निर्णयक अधिकार तुरन्ते भूमिपतिक घरमे केन्द्रित रहैत अछि; मरनीक श्रमक सम्मान ओकर स्वायत्त शक्ति सँ नहि, परिवारक भीतरक हस्तक्षेपसँ अस्थायी रूपमे भेटैत अछि। (ठाकुर, २०१३)।
पहिल अङ्क: दृश्य ४ — शराब, पुरुष-संगति आ मायक भार
मङ्गल सुगर तकबाक बहानासँ रबीयाक संग मद्यपानक दिशामे फुसलि पड़ैत अछि। मद्यपानक बाद बोली आ व्यवहारमे विकृति, आपसी मारपीट आ मरनीक आक्रोश पारिवारिक संकटकेँ दृश्यात्मक बनबैत अछि। दृश्य हास्य आ करुणाक मिश्रण अछि; नशाक भाषिक उच्छृङ्खलता दर्शककेँ हँसाबैत अछि, मुदा शुल्क-जुटानक कठिनाइ ओकर सामाजिक मूल्य पुनः स्मरण करबैत अछि। मरनीक सशर्त क्षमा घरक नैतिक अनुशासन निर्माण करैत अछि। जँ मंचनमे एहि दृश्यकेँ केवल मदिरापानक तमाशा बनाओल जाए तँ परिवारक शिक्षा-संकट ओझरा सकैत अछि। (ठाकुर, २०१३)।
पहिल अङ्क: दृश्य ५ — सूदखोरीक सूक्ष्म नाटक
चन्द्रेशक घरमे लाभ-हानिक आत्मालापक बाद सीतारामसँ सूद-मूलक हिसाब उठैत अछि। बहुते छोट रकम, जोड़-घटाव आ धनी–ऋणीक असमान आसन दैनन्दिन शोषणक हावभाव प्रस्तुत करैत अछि। चन्द्रेशक धार्मिकता आ धनलोलुपता बीच व्यङ्ग्यात्मक अन्तर पाठमे घना बनैत अछि। सार्वजनिक आदर प्राप्त व्यक्तिक भीतर शोषक प्रवृत्तिक उद्घाटन एहि दृश्यक प्रभाव अछि। तथापि सीतारामक एजेंसी सीमित अछि; लेखक आर्थिक नियन्त्रणक तन्त्र देखबैत छथि, मुदा वैकल्पिक सामूहिक प्रतिरोध विस्तृत नहि करैत छथि। (ठाकुर, २०१३)।
पहिल अङ्क: दृश्य ६ — परीक्षा आ ऋणक पूर्वपीठिका
दुखनक परीक्षा, अध्ययन-सामग्री आ आवश्यक खर्च फेर घरक बचतक प्रश्न खड़ा करैत अछि। मरनीक धैर्यपूर्वक बचत आ मङ्गलक बेचैनी एक-दोसरकेँ पूरक सेहो अछि आ टकरबैत सेहो। चन्द्रेशसँ लेनदेन आ अनुग्रहक अपेक्षा गरीबक निर्भरता देखबैत अछि। पहिल अङ्कक समापन पाठककेँ बुझबैत अछि जे केवल योग्य छात्रक मनोबलसँ सामाजिक गतिशीलता सम्भव नहि—संसाधनक निरन्तर व्यवस्था चाही। (ठाकुर, २०१३)।
दोसर अङ्क: दृश्य १ — चाह-दोकानक लोकपरिसर
झिङ्गुरक चाह-दोकान महँगाइ, अध्ययन, युवा भविष्य आ प्रतिस्पर्धाक खुलल सार्वजनिक मंच बनि जाइत अछि। विभिन्न युवाक गप-सपसँ नाटक निजी परिवारसँ निकलि ग्रामीण शिक्षित समाजक विस्तृत चित्र दिशामे बढ़ैत अछि। चाहक दामक छोट प्रश्न शिक्षा-बाजारक पैघ प्रश्नसँ गुँथल अछि। संवादक बहुलता सामाजिक संसार विस्तृत करैत अछि, मुदा कथानकक गति एतऽ शिथिल होएबाक जोखिमो अछि। (ठाकुर, २०१३)।
दोसर अङ्क: दृश्य २ — सम्पन्न घरक बेटी आ शैक्षिक निवेश
चन्द्रेश आ मनीषा बेटीकेँ भेटल शैक्षिक सफलतापर हर्ष व्यक्त करैत छथि। उच्च शिक्षाक लेल दरभङ्गा दिशा प्रस्थानक तैयारी होइत अछि। एकहि नाटकमे दुखनक पढ़ाइ लेल दैनिक मजदूरीक बिक्री आ सम्पन्न बेटी लेल संसाधनक सुरक्षित जोगार तुलना उत्पन्न करैत अछि। बेटी-शिक्षा सकारात्मक प्रयोजन अछि, मुदा पिताक भविष्य-कामनाक केन्द्रमे विवाह-प्रतिष्ठा आ सामाजिक रूपसँ ऊँच घरक चिन्ता सेहो रहैत अछि। बेटीकेँ उच्च शिक्षा देब सामाजिक समानता स्वीकार कऽ लेबाक पर्याय नहि—ई विरोधाभास दृश्यकेँ प्रखर बनबैत अछि। (ठाकुर, २०१३)।
दोसर अङ्क: दृश्य ३ — अगिला पढ़ाइ बनाम मायक स्मृतिगहना
दुखनक परिणाम प्रसन्नताक कारण बनैत अछि, मुदा अगिला पढ़ाइ लेल परिवार अपारदर्शी खर्चक सम्मुख अछि। मरनीक हँसली—माय-बापक स्मृति—गिरवी राखबाक सम्भावना भावनात्मक संघर्ष जन्मबैत अछि। बेटाक भविष्य आ मातृ-स्मृतिक संरक्षणमध्य केकरा प्राथमिकता भेटत? नाटक आर्थिक अभावक नैतिक मूल्य एतऽ महीन रूपमे पकड़ैत अछि। गहना बेचब मात्र पूँजी हस्तान्तरण नहि, पीढ़ीगत स्मृतिक विस्थापन अछि। दुखनक उत्कट पढ़ाइच्छा पाठकीय सहानुभूति दैत अछि, मुदा माताक निर्णय स्वयं संकटसँ मुक्त नहि। (ठाकुर, २०१३)।
दोसर अङ्क: दृश्य ४ — बन्धक-व्यवस्था आ सत्ताक दूरी
मरनी हँसली लऽ कऽ चन्द्रेश लग पहुँचैत छथि। धनी व्यक्तिक घरक भीतर दूरी, स्वर, प्रकाश आ आशंका धन-सत्ताक नाटकीय सज्जा बनैत अछि। ऋणक शर्त आ अधिक सूद गरीबक वस्तुकेँ धनीक अधिकारमे सरकबैत अछि। पूर्वक पथिया-व्यापारक दृश्यसँ तुलना कएल जाए तँ शोषणक परिमाण बढ़ल अछि: पहिने हस्तशिल्पक मूल्य घटाओल जाइत छल, आब स्मृति-वस्तु बन्धक बनैत अछि। (ठाकुर, २०१३)।
दोसर अङ्क: दृश्य ५ — नामाङ्कनक टाका आ सम्बन्धक दबाव
मङ्गल आ दुखन मरनीक लौटबाक बाट जोहैत छथि; अन्तिम तिथि तथा विलम्ब-शुल्क समयकेँ आर्थिक विरोधी बनबैत अछि। भेटल रकमसँ नामाङ्कन सम्भव होइत अछि, मुदा परिवारक देनदारी समाप्त नहि। पछिला घरेलू हास्यक प्रसङ्ग दृश्यकेँ मानवीय रखैत अछि; तइयो कथाक पैघ चिन्ता उच्च शिक्षा धरि पहुँचनाइ अछि। लेखक पाठककेँ बुझबैत छथि जे गरीबक लेल कालबद्ध आवेदन-प्रणाली स्वयं बाधा बनि सकैत अछि। (ठाकुर, २०१३)।
दोसर अङ्क: दृश्य ६ — उच्च शिक्षाक संग नियन्त्रणक भय
सम्पन्न परिवारमे बेटीकेँ पढ़बाक लेल बाहर पठेबाक निर्णयक संग प्रतिष्ठा आ यौन-नियन्त्रणक आशंका बढ़ैत अछि। समाचारक आधारपर युवतीक स्वतन्त्रता सन्दिग्ध मानबाक प्रवृत्ति उभरैत अछि। मनीषा आ चन्द्रेशक संवादमे स्नेह, संशय, विवाह-प्रबन्धन आ परिवारक प्रतिष्ठाक अन्तर्द्वन्द्व अछि। ई दृश्य संकेत करैत अछि जे आर्थिक साधन होइतो स्त्रीक स्वायत्तता स्वतः सुरक्षित नहि होइत। (ठाकुर, २०१३)।
दोसर अङ्क: दृश्य ७ — अभियान्त्रिकी शिक्षा आ असम्भव शुल्क
दुखन उच्चतर प्राविधिक शिक्षाक लक्ष्य बतबैत अछि। मङ्गल ओकर अभिप्राय बुझबाक प्रयास करैत अछि; ‘पढ़ब’ आ ‘अभियन्ता बनब’ बीच सामाजिक दूरी स्पष्ट अछि। घरक जनजातीय अथवा जातीय पहचान निर्णायक नहि; आर्थिक साधन आ जानकारीक अभाव अधिक सघन संकट बनैत अछि। एहि दृश्यमे पढ़ाइ सामाजिक गतिशीलताक परियोजना बनैत अछि, मुदा धन-अभाव ओकर पथ अस्थिर करैत अछि। (ठाकुर, २०१३)।
दोसर अङ्क: दृश्य ८ — डीहक मूल्य आ हस्ताक्षरक राजनीति
अभियान्त्रिकी शिक्षाक आर्थिक व्यवस्थाक चर्चा अन्ततः चन्द्रेशक कागजी लेनदेन धरि पहुँचैत अछि। दस्तखत आ औंठा-निशानक माध्यमसँ चारि लाख टाका देबाक प्रसङ्ग अछि; बादक स्वगत कथनसँ मङ्गलक डीह आ हँसलीपर अधिकार स्थानान्तरित भेनाइ स्पष्ट होइत अछि। ई नाटकक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मोड़ अछि: शिक्षा-सफलताक सम्भावना जमीनहीन भेनाइ सँ खरीदल जाइत अछि। कागत एतऽ निर्जीव वस्तु नहि, सत्ता-निर्माणक नाट्य-उपकरण अछि। ऋणक शर्तक सूक्ष्म कानूनी विवरण पाठमे पूर्ण पारदर्शी नहि, तेँ एहि सम्बन्धकेँ ‘स्वेच्छापूर्वक समान विनिमय’ कहल गलत होएत। (ठाकुर, २०१३)।
दोसर अङ्क: दृश्य ९ — सरकारी गाछी आ विस्थापित परिवार
मङ्गल आ मरनी आब सरकारी गाछीमे सिरकी तानि रहैत छथि। अपार कष्टक बीच दुखनक नामाङ्कन भेल अछि; गाछीक अस्थायी वास शिक्षा-व्ययक ऐतिहासिक कीमतक दृश्य प्रमाण बनैत अछि। मणिकान्तक सहानुभूति, रबीयाक पुरान दुर्व्यवहारपर पश्चात्ताप आ मरनीक शिक्षापर आग्रह मिलि नाटककेँ सामाजिक समुदायसँ जोड़ैत अछि। एहि दृश्यपर दोसर अङ्क बन्द होइत अछि—परिवार आर्थिक रूपेँ खाली, मुदा भविष्यक भरोसासँ भरल। (ठाकुर, २०१३)।
तेसर अङ्क: दृश्य १ — शिक्षित युवाक पुनर्भेंट
नव स्थानमे चिकित्सकीय शिक्षा प्राप्त युवती आ अभियन्ता दुखनक भेट होइत अछि। शिक्षित मन आ पुरान ग्रामसमाजक जातिगत दूरी बीच द्वन्द्व स्पष्ट होइत अछि। दुखनक माता-पिता द्वारा जमीन गुमेबाक कथा युवतीकेँ अपन पिताक आर्थिक आचरणसँ परिचित करबैत अछि। एतय प्रेमक सम्भावना मात्र आकर्षण नहि, साझा न्यायबोधक दिशामे बढ़ैत अछि। तँओ दुनूक आर्थिक-सामाजिक पृष्ठभूमि बीचक असमानता सहजहि मेटि नहि जाइत। (ठाकुर, २०१३)।
तेसर अङ्क: दृश्य २ — नौकरीमे सौदा, पैरवी आ जाति
रेलवे नियुक्तिक प्रसङ्गमे दुखनसँ भारी रकमक माँग आ जातिक कारण अपमान देखाओल गेल अछि। तकर समानान्तर चन्द्रेश अपन बेटी लेल सामाजिक पहुँच तथा जातीय सम्बन्धक उपयोग करबाक चेष्टा करैत अछि। नाटक दू उम्मीदवारक समक्ष अलग-अलग संस्थागत द्वार खोलैत अछि: एक लग योग्यता अछि मुदा साधन नहि, दोसर लग सम्पर्क अछि। घटना रोजगार-व्यवस्थाक नैतिक विफलता उद्घाटित करैत अछि, मुदा नाटकमे ई प्रसङ्ग समग्र संस्थागत दस्तावेज नहि, एकटा व्यङ्ग्यात्मक सामाजिक दृश्य थिक—एहि अन्तरकेँ राखब जरूरी अछि। (ठाकुर, २०१३)।
तेसर अङ्क: दृश्य ३ — प्रेम आ आन्तरिकीकृत हीनताबोध
दुखन आ सम्पन्न घरक युवतीक आत्मीयता धीरे-धीरे प्रेम-स्वीकार धरि पहुँचैत अछि। दुखन स्वयं अपन जातिगत दर्जाकेँ सम्बन्धक सम्भावनाक विरोधी मानबाक क्षण सँ गुजरैत अछि; युवती एहि हीनताबोधपर प्रश्न उठबैत छथि। एहि दृश्यक नाटकीय बल प्रेम-स्वीकार मात्र नहि, सामाजिक विभाजनक भीतर व्यक्ति-मनक दोहरी आवाज अछि। तथापि प्रेमक अभिव्यक्तिमे भावुक पुनरावृत्ति किछु समय मंचीय गति धीमी करैत अछि। (ठाकुर, २०१३)।
तेसर अङ्क: दृश्य ४ — शिक्षित बेटी आ कुल-प्रतिष्ठाक दीवार
घरमे विवाह-विचार शुरू भेलापर युवती समानता आ निजी इच्छाक आधारपर निर्णयक पक्ष लैत छथि। पिता कुल, जाति आ प्रतिष्ठाकेँ सर्वोच्च मानैत छथि। मनीषा आरम्भमे अपेक्षाकृत सहानुभूतिशील देखाइतो दुखनक जाति बुझिते स्वयं सशङ्क भऽ जाइत छथि। एहिमे नाटक एकटा महत्त्वपूर्ण सत्य पकड़ैत अछि: सैद्धान्तिक उदारता आ अपन घरक विवाहक प्रसङ्गमे व्यावहारिक उदारता अलग वस्तु अछि। चिकित्सक युवतीक व्यक्तित्व बौद्धिक स्वतन्त्रताक रूपमे उभरैत अछि। (ठाकुर, २०१३)।
तेसर अङ्क: दृश्य ५ — जातीय अपमानसँ योजनाबद्ध हिंसा
चन्द्रेशक स्वाभिमान आ प्रतिष्ठाभय क्रोधमे बदलैत अछि। दुखनकेँ शिक्षा प्राप्त करबाक लेल पूर्व आर्थिक लेनदेनक स्मृति उलटा ‘उपकार’क दम्भ बनैत अछि। साथीक सहयोगसँ उत्पन्न झगड़ा आ मारपीटक घटना जातिगत शक्ति-प्रदर्शनक चरम रूप अछि। कथा एतऽ सत्याग्रह-समान तर्कवादसँ आगाँ शारीरिक हिंसाक धरातलपर पहुँचैत अछि। पठनीय प्रश्न ई अछि जे हिंसा उपरान्त न्याय निजी मेल-मिलापक सीमामे रहि सकत अथवा उत्तरदायित्वक औपचारिक संरचना चाहत। (ठाकुर, २०१३)।
तेसर अङ्क: दृश्य ६ — शिक्षाक अर्थ आ सामुदायिक न्याय-खोज
मारपीटक बाद घायल दुखन अपन प्रेम आ जातिभेदविरोधी दृष्टि स्पष्ट करैत अछि। मरनीक मातृ-चिन्ता, मङ्गलक धीरज आ मणिकान्तक विवेक एक संग उपस्थित अछि। निर्णय तुरन्त प्रतिशोधक नहि, साझा विचार आ पंचायत दिशामे बढ़ैत अछि। एहि दृश्यसँ शिक्षा केवल नौकरीक साधन नहि, सामाजिक समानताक आलोचनात्मक चेतना रूपमे पुनर्परिभाषित होइत अछि। मुदा नाटकक संवाद कखनहुँ भाषणात्मक भऽ जाइत अछि—आन्तरिक मनोदशाक सूक्ष्मता घटैत अछि। (ठाकुर, २०१३)।
तेसर अङ्क: दृश्य ७ — पञ्चायत, समता आ सुखान्तक सीमा
विद्यालय-परिसरमे बैसल पञ्चायत निजी विवादकेँ सार्वजनिक न्यायप्रश्न बनबैत अछि। सरपञ्च मोतीलाल दलित पात्रक पक्ष सुनैत छथि, जाति-धनसँ अलग गुण आ मानवीय सम्मानक आग्रह करैत छथि, आ विवाहक पक्षमे निर्णय दैत छथि। चन्द्रेशक स्वीकार, जयमाला, समधी-मिलन आ सामूहिक आशीर्वादसँ नाटक समाप्त होइत अछि। दृश्य लोक-रंगमंचक सामूहिक उत्सवभाव सृजैत अछि; रबीयाक हास्य-उपकथा कथाक तनाव घटबैत अछि। तथापि मारपीटक दण्ड, गैरबराबर आर्थिक सौदाक सुधार आ दलित परिवारक गुमल भूमि वापस करबाक प्रश्न अन्तिम समाधानमे स्पष्ट रूपेँ सुलझल नहि देखाइत अछि। एही कारण ई समताक आदर्शात्मक सुखान्त अछि, सम्पूर्ण सामाजिक न्याय सम्पन्न भऽ गेलाक तथ्यात्मक प्रमाण नहि। (ठाकुर, २०१३)।
पात्र-विवेचन: विरोधाभास, अभिलाषा आ कर्म
मरनी: अनौपचारिक ज्ञान, श्रम आ नैतिक दृढ़ता
मरनीकेँ केवल त्यागमयी मायक प्रतिमान बनाय देब ओकर नाट्यगत सक्रियताकेँ छोट करब होएत। ओ मङ्गलक मद्यपानपर प्रश्न उठबैत छथि, लोकसँ सुनल स्वास्थ्यविचार अपनबैत छथि, सन्तानक शिक्षाक पक्षमे संसाधन जुटबैत छथि, बाजारक ग्राहकसँ मोल-भाव करैत छथि, अपमानक सामने प्रतिवाद करैत छथि आ अन्ततः अपन माय-बापक स्मृतिगहना धरि जोखिममे रखैत छथि। एहि कर्मक अर्थ अछि जे स्त्रीक ज्ञान केवल विद्यालयक प्रमाणपत्रसँ नहि निर्धारित होइत अछि। श्रम, अनुभूति आ तर्क-क्षमता परिवारक प्रमुख बौद्धिक संसाधन बनैत अछि।
तथापि ‘उदार माए’क छविमे जोखिम अछि। नाटक कतेको बेर मरनीसँ परिवारक त्यागक असीमित अपेक्षा करैत अछि; अपन देह, स्मृति, सम्पत्ति आ भावनाकेँ बचा राखबाक हुनकर स्वतन्त्र इच्छा सन्तानक अभिलाषाक अधीन चलि जाइत अछि। एक स्त्रीवादी पुनर्पाठ एहिसँ प्रश्न करैत अछि—गरीब मायक बलिदानक महिमामण्डन आ ओकर श्रमक न्यायपूर्ण सामाजिक मान्यता एक्कहि बात नहि थिक।
मङ्गल: पितृत्व, कमजोरी आ परिवर्तित जिम्मेवारी
मङ्गल एकरेखीय सज्जन पात्र नहि छथि। मद्यपानक आदत, पितृसत्तात्मक बोल, असंगठित निर्णय आ रबीयाक संगति हुनक कमजोरी अछि। दोसर दिस बेटाक अध्ययन लेल बचत, श्रमक निरन्तरता, पारिवारिक उद्वेग आ अन्तिम अङ्कमे विचारपूर्वक सामुदायिक समाधान खोजब हुनक जिम्मेदारीक उभरैत पक्ष अछि। एहि द्वैतक कारण ओ विश्वसनीय ग्राम्य पात्र बनैत छथि। हुनकर स्वाभिमानक सीमा खास महत्त्व रखैत अछि—व्यवसायिक ग्राहकक समक्ष ओ झुकैत छथि, मुदा बेटाक विकासक प्रसङ्गमे दृढ़ बनैत छथि।
दुखन: प्रतिभाक कथा आ सामाजिक गतिशीलताक विरोधाभास
दुखनक यात्रा शुल्क भरबाक मोहताज छात्रसँ अभियन्ता धरि जाइत अछि। एहि रेखामे बचपनक मेहनत, युवाक शिक्षा आ वयस्कक आत्मनिर्णय समाहित अछि। मुदा ओकर उपलब्धि व्यक्तिवादी ‘मेहनत करब तऽ सभ सम्भव’ बला कथा नहि: मायक गहना, डीहक परित्याग आ परिवारक विस्थापन एहि सफलताक सामूहिक दाम अछि। तेसर अङ्कमे ऊँच-नीचक प्रश्नकेँ निजी सम्बन्धमे लागू करब ओकर आलोचनात्मक परिपक्वताक सूचक अछि। दुखन समाजक मानदण्डसँ विद्रोह करैत अछि, मुदा कथाक किछु मोड़पर ओकर एजेंसी सार्वजनिक पंचायतक निर्णयसँ परिभाषित रहि जाइत अछि।
चन्द्रेश झा: दानक आवरणमे अधिग्रहण
चन्द्रेश धनक संचय, समाजमे सम्मान, बेटीकेँ श्रेष्ठ शिक्षा देब आ कुल-प्रतिष्ठा बचायब चाहैत छथि। हुनकर स्वतःसन्तुष्ट धारणा गरीबक दैनन्दिन कठिनाइकेँ बेसी दाम वा बकायाक प्रश्नक रूपमे देखैत अछि। ओ धनी पिता छथि, मुदा न्यायशील समाजपिता नहि। एकर समक्ष बेटीक विवाहविषयक स्वायत्तताक प्रश्न हुनक अधिकारक सीमा दर्शबैत अछि। चरित्रक महत्त्व एतऽ ई नहि जे ओ ‘खराब व्यक्ति’ छथि, बल्कि ई जे श्रेणीबद्ध समाजक लाभ ओहन व्यक्तिमे जमैत अछि, जे अपन व्यवहारकेँ सामान्य मानि लेइत अछि। अन्तिम मतपरिवर्तन भावनात्मक छूट दैत अछि, मुदा आरम्भिक शोषणक परिणामकेँ सहजहि समाप्त नहि करैत।
शिक्षित युवती, मनीषा आ पीढ़ीगत स्त्री-अन्तर
सम्पन्न परिवारक युवती चिकित्सकक प्रशिक्षण आ जीवनसाथीक निर्णयक अधिकार दूनू चाहैत छथि। पिता अपन आर्थिक निवेशकेँ विवाह-नियन्त्रणक आधार बनबैत छथि; बेटी शिक्षाकेँ नैतिक स्वायत्तताक आधार बनबैत छथि। मनीषाक व्यवहार बेसी जटिल अछि—ओ पिता-आक्रोशकेँ कखनहुँ नरम करैत छथि, मुदा बेटी द्वारा जाति-सीमा पार कएलापर परम्परागत पूर्वाग्रह सँ बाहर नहि रहि पबैत छथि। एहि त्रिकोणमे नाटक स्त्री-अनुभवक एकरूपता पर प्रश्न करैत अछि।
मणिकान्त, मोतीलाल, रबीया आ सहायक समाज
मणिकान्त मध्यस्थ विवेकक, मोतीलाल सार्वजनिक निर्णयक, आ रबीया लोकहास्यक प्रवाहक प्रतिनिधि बनैत छथि। मणिकान्त श्रमजीवीक कष्ट सुनबाक आ संवादक अवसर देबाक पात्र छथि। मोतीलाल पञ्चायतकेँ सार्वजनिक न्यायमंच बनबैत छथि, मुदा हुनकर निर्णय व्यक्तिगत उदारतापर कतेक निर्भर अछि, ई प्रश्न शेष अछि। रबीया हास्य उत्पन्न करैत छथि, आ शराबक प्रसङ्गमे मङ्गलक विपरीत विकल्प सेहो बनैत छथि। एहन हास्यक संग सावधानी आवश्यक अछि—दलित वा श्रमजीवी पात्रक अस्मिताकेँ मात्र मसखरीक सामग्री नहि बनाओल जाए।
सामाजिक प्रश्नक गहन विश्लेषण
जाति आ वर्ग: दू भिन्न, परस्पर सम्बद्ध सत्ता
नाटकक शीर्षकक ‘ऊँच’ आ ‘नीच’ पद केवल सामाजिक सम्बोधन नहि, संसाधनक विभाजनक प्रणाली अछि। कोन लोक उत्पादक श्रम करत, कोन लोक मूल्य निर्धारित करत, केकरा कर्जक शर्त सुनाओल जाएत, केकर शिक्षा सहज होएत आ केकर विवाह सम्मानजनक कहल जाएत—ई पाँच अलग प्रश्न एक्कहि जाति-वर्ग सम्बन्धमे जुड़ैत अछि। दुखनक अभियन्ता भऽ जेबो ओकर पूर्व सामाजिक दर्जाक कलङ्क क्षणमात्रमे मेटि नहि सकैत अछि। ओ रोजगारमे सेहो भेदभाव भोगैत अछि, आ प्रेमसम्बन्धमे सेहो। एहि अर्थमे ‘योग्यता’ जातिक स्वचालित विनाश नहि करैत; सामाजिक संस्थाक संरचना बदलबाक अतिरिक्त आवश्यकता नाटकक घटनासँ सामने अबैत अछि।
तथापि लेखक वर्गक विश्लेषण कतेको स्थानपर विशिष्ट धनी पुरुषक लोभपर केन्द्रित रखैत छथि। चन्द्रेशक व्यक्तिगत उदारता आ पञ्चायतक स्वीकारसँ कथाक अन्त होइत अछि। जँ जाति असमान भूमि-अधिकार, पदानुक्रम आ प्रतिष्ठाक संस्थागत रूप अछि, तँ एक विवाह ओकर अन्तिम समाधान नहि होएत। ई अन्तर नाटकक आदर्श आ ओकर सामाजिक यथार्थक बीच सार्थक आलोचनात्मक तनाव अछि।
श्रम, वस्तु आ जमीनक क्रमिक विस्थापन
पथिया आ कोनीसँ आरम्भ भेल आर्थिक उपकथा हँसली धरि पहुँचैत अछि आ फेर डीहक विक्रयक रूप लैत अछि। वस्तु-क्रम नाटकक राजनीतिक अर्थव्यवस्था रचैत अछि: दैनिक उत्पादन → बचत → स्मृतिगहना → घर-जमीन → अस्थायी सिरकी। एहि क्रममे परिवार भौतिक सम्पत्तिसँ वञ्चित होइत अछि, मुदा सन्तानक शिक्षा-पूँजी अर्जित करैत अछि। लेखक शिक्षा-सफलताक महत्त्व घटबैत नहि छथि; ओ देखबैत छथि जे हाशियाक परिवारक लेल ओकर दाम दुहरा अछि—शुल्क देब आ सामाजिक जोखिम सहब। चन्द्रेशक घरमे बढ़ैत धन आ मङ्गलक घरमे घटैत अचल सम्पत्ति समानान्तर दृश्य-योजना बनबैत अछि।
शिक्षा: मुक्तिक आशा आ संस्थागत असमानता
दुखनक विद्यालयी जीवनक बाधा शुल्क आ परीक्षा-तिथि अछि; महाविद्यालयीक बाधा बड़ राशि; रोजगारक बाधा पैरवी आ रिश्वतक माँग। शिक्षा संस्था ओकरा बौद्धिक योग्यता दैत अछि, मुदा जाति-वर्गक पुरान तन्त्र नव दरवज्जापर भेटैत अछि। समृद्ध बेटी उच्च शिक्षाक लाभ लैत छथि, मुदा घरमे जाति-आधारित विवाह-नियन्त्रणसँ जूझैत छथि। दूनू शिक्षायात्राक तुलना उपयोगी अछि: शिक्षा स्त्री आ दलित युवक दूनूक लेल मुक्ति-सम्भावना अछि, तथापि मुक्तिक शत्रु अलग-अलग रूपमे लौटैत अछि।
पितृसत्ता, स्त्री-कर्तृत्व आ प्रेम-विवाह
मरनीक निर्णयक अधिकार परिवारक अर्थ-संकट सीमित करैत अछि। शिक्षित युवतीक निर्णयक अधिकार पिता कुलप्रतिष्ठा सीमित करैत छथि। दूनू स्त्री अलग वर्गीय स्थानपर रहितो स्वायत्तताक संघर्षमे जुड़ल छथि। प्रेम-विवाहक कथानक जाति-सीमा तोड़ैत अछि, मुदा स्त्रीक अधिकारकेँ केवल प्रियतमक चयन तक सीमित नहि राखब चाही। ओकर पेशागत भविष्य, देहपर हिंसाक भय, घरक सम्पत्तिमे अधिकार आ समाजक सार्वजनिक भागीदारी सेहो प्रश्न थिक। नाटक एहि सभ प्रश्नक संकेत दैत अछि; हर प्रश्नकेँ पूरा विकास देबाक जगह नहि दैत।
धर्म, दिखाबा आ आर्थिक नैतिकता
धनी पात्रक धार्मिक आचरणक चर्चा आ गरीबक प्रति कठोर व्यवहार बीचक दूरी नाटकमे व्यङ्ग्य रचैत अछि। धार्मिक यात्रा वा पूजा सामाजिक दायित्वसँ मुक्तिक प्रमाण नहि—ई विचार चन्द्रेशक लोभसँ उत्पन्न विरोधाभासक भीतर उभरैत अछि। नाटक धार्मिक विश्वास पर समग्र आक्रमण नहि करैत; ओ आचरणक नैतिक विसंगति देखबैत अछि। एहि कारण एकरा नैतिक व्यङ्ग्यक रूपमे पढ़ब अधिक प्रमाणसङ्गत अछि।
नाट्यशिल्प, रंग-भाषा आ मंचनीयता
बेचन ठाकुरक रचना दृश्य-आधारित, संवादप्रधान आ ग्रामीण जीवनक क्षुद्र वस्तु-स्थिति सँ संचालित अछि। हस्तशिल्प, कुरसी, डायरी, कागज, हस्ताक्षर, गहना, रुपया, सिरकी, विद्यालय आ पञ्चायती आसन बारम्बार अर्थ-बाहक मंच-सामग्री बनैत अछि। वस्तु-प्रयोगक अर्थपूर्ण क्रम पात्रक सामाजिक दूरी दर्शककेँ बिना विशद व्याख्यान सेहो बुझा सकैत अछि। उदाहरणार्थ मङ्गलक घरक कार्यरत हाथ आ चन्द्रेशक दलानक आरामक आसन एक्कहि मंच-संरचनामे प्रभावकारी विरोध प्रस्तुत कऽ सकैत अछि।
संवाद स्थानीय जीवनक उद्गार आ मुहावराक कारण भूमिसँ जुड़ल अछि। साधारण गप-सप एकटा आर्थिक वा नैतिक मुद्दाक दिशामे मुड़ि जाइत अछि। मरनीक प्रश्नोत्तर, मङ्गलक शराब-सम्बद्ध असंगति, रबीयाक विनोद, चन्द्रेशक आदेशक भाषा आ मोतीलालक पञ्चायती घोषणा एक-दोसरसँ भिन्न सामाजिक स्वर रचैत अछि। तेसर अङ्कमे नौकरीक प्रसङ्गमे मैथिली आ हिन्दीभाषी प्रशासनिक संवादक अन्तर सेहो सामाजिक प्रभुत्वक ध्वनि बनि उठैत अछि।
शिल्पक सीमा सेहो चिन्हित होएबाक चाही। अनेक दृश्य पात्रद्वारा नीतिक प्रत्यक्ष उद्घोषणा पर टिकैत अछि; एक्कहि मन्तव्यक पुनरावृत्ति पात्रक भितरी द्वन्द्वक जटिलताकेँ कम करैत अछि। दोसर अङ्कक किछु विस्तृत गप-सप, तेसर अङ्कक प्रेम-स्वीकार आ अन्तिम पञ्चायती भाषणकेँ मंचनमे सटीक सम्पादनक आवश्यकता भऽ सकैत अछि। किन्तु मूल प्रकाशित पाठक आलोचना आ रंगमंचीय संक्षिप्तीकरणक प्रस्ताव अलग प्रक्रिया अछि; मूल रचनाकेँ अभिलेखीय रूपमे अक्षुण्ण राखब आवश्यक अछि।
नाटकमे हास्य सामाजिक शक्ति-सम्बन्धपर खुलि सकैत अछि। मद्यपान आ रबीयाक भूख-सम्बद्ध हास्य अभिनयमे अतिरेक भेला पर उत्पीड़नक गंभीरता कम कऽ सकैत अछि; संयमित अभिनय एहि विरोधाभासकेँ अधिक अर्थवान बनाओत। स्त्री पात्रक सम्मानपूर्ण प्रस्तुति, जातिसूचक अपमानक आलोचनात्मक सन्दर्भ, हिंसाक गैर-रोमानीकरण आ पञ्चायतमे सन्तुलित देह-स्थिति मंच-निर्देशनक केन्द्रीय काज बनत।
समय-विस्तार महत्वपूर्ण अछि: प्राथमिक शिक्षासँ व्यावसायिक रोजगार धरि नायकक आयु बदलैत अछि। तीन अङ्कक स्थापत्य एहि काल-विस्तारकेँ सम्भव बनबैत अछि, मुदा दृश्य-सन्धिक बीच समयक संक्रमण, पाठकीय धैर्य आ पात्रक परिपक्वताक क्रम स्पष्ट करबाक भार मंचक प्रकाश-ध्वनि आ अभिनयपर रहत। एहि संदर्भमे ‘ऊँच-नीच’ पुस्तक-पाठ आ लोकमंचक बीच सहज गमनशील, मुदा सम्पादन-संवेदनशील नाटक थिक।
मैथिली बाल-साहित्यक इतिहास: तुलनात्मक विवेचन
मौखिक शिशु-लोकसाहित्यसँ लिखित विधा धरि
फूलचन्द्र झा ‘प्रवीण’क ‘मैथिली शिशु लोक साहित्य’ (विदेह, अङ्क ५०, २०१०) शिशु-गीत आ लोकपरम्पराक मौखिक प्रसारपर बल दैत अछि। ओ लालन-पालन, खेल-मनोरंजन आ ज्ञानोपयोगी लोक-साहित्यक भेद प्रस्तुत करैत छथि। ई परम्परा परिवारकेँ बाल-समाजीकरणक पहिल शिक्षालय मानैत अछि। ‘ऊँच-नीच’क मङ्गल-मरनीक घर एहि लोक-ज्ञानक पारम्परिक स्थानक आधुनिक रूप देखबैत अछि, मुदा ओकर प्रमुख लक्ष्य शिशु-मनोरंजन नहि; विद्यालयी प्रमाणपत्र, सामाजिक असमानता आ नागरिक प्रतिष्ठाक प्रश्न अछि। एहि कारण दूनू विधाक स्रोत-परिवेश समान होइतो पाठकीय उद्देश्य भिन्न अछि।
योगानन्द झाक ‘मैथिली बाललोककथा: स्थिति आ अपेक्षा’ (विदेह, अङ्क ७६, २०११) कथा-रुचि, सहज भाषा, ज्ञान आ मनोरंजनक विविध उदाहरण देइत अछि। ओ लोककथा-संचयनमे कथाक मूल भाषा सुरक्षित रखबाक महत्त्व देखबैत छथि। एहि प्रतिमानसँ ‘ऊँच-नीच’क ग्रामीण बोलीक साहित्यिक मूल्य समझल जा सकैत अछि; मुदा लोककथाक संक्षिप्त कौतूहल-विधान आ एहि नाटकक दीर्घ सामाजिक द्वन्द्व एक्कहि प्रकारक पाठ नहि अछि।
चित्रकथा, बालनाटक आ दलित नायकत्वक दृश्यपरम्परा
दुर्गानन्द मण्डलक २०१२क विदेह-लेख ‘नेना लेल सुन्दर चित्रकथा’ प्रीति ठाकुरक चित्रकथा मार्फत गोनू झा, सलहेस, दीना-भदरी, छेछन आदि लोकचरित्रकेँ नव पीढ़ी लग पहुँचेबाक प्रशंसा करैत अछि। उक्त समीक्षामे सामाजिक रूपसँ हाशियाक नायक आ अन्तरजातीय प्रेमक कथाक उल्लेख भेटैत अछि। एतऽ सादृश्य महत्त्वपूर्ण अछि: ‘ऊँच-नीच’मे दुखन आधुनिक शिक्षित दलित नायक अछि, जखन कि अनेक चित्रकथा लोकस्मृति आ लोकनायकक द्वारा मानवीय सम्मानक प्रश्न उठबैत अछि। विधा आ प्रस्तुति अलग, मुदा वर्चस्वक प्रतिमानक विरुद्ध कथा-नायक चयनक सांस्कृतिक प्रयत्न तुलना योग्य अछि।
विदेहक पोथी-संग्रहमे मुन्ना जीक ‘तीन टा बाल नाटक’ अलगसँ ‘मैथिली बाल साहित्य’ वर्गमे सूचीबद्ध अछि; एहि संग्रहमे बेचन ठाकुरक ‘ऊँच-नीच’केँ स्पष्ट रूपमे ‘नाटक’ लिखल गेल अछि। एतऽ सूचीकरण स्वयं उपयोगी विधागत साक्ष्य अछि। बालनाटक कहबाक कसौटी केवल बाल-चरित्रक उपस्थिति नहि: बाल अभिनेता द्वारा सम्भव मंचन, सीमित अवधि, वयसोपयुक्त हिंसा-चित्रण, बाल-मनक सक्रियता, भाषाक ग्रहणीयता आ चरित्रक अनुभवजन्य गति सेहो अपेक्षित अछि। ई कसौटी पर ‘ऊँच-नीच’किशोर दर्शक लेल चुनिन्दा दृश्य सहित उपयोगी, मुदा सम्पूर्ण रूपमे व्यापक सामाजिक रंग-रचना अछि।
समकालीन आलोचना आ बाल-साहित्यक विस्तारित सीमाना
विदेहक शोध-सूचीमे रमेश रञ्जनक ‘मैथिली बालनाटक सीमा विस्तार करैत—चौआरि’ शीर्षक लेख (अङ्क १२६, २०१३) दर्ज अछि। ई अभिलेख बालनाटकक पृथक आलोचनात्मक शब्दावलीक उपलब्धताक संकेत देइत अछि; उपलब्ध पृष्ठक शीर्षक आ भीतरक सामग्रीक असंगति देखते एहि लेखसँ बिना पाठसमर्थन कोनो विशेष वैचारिक स्थापना आरोपित नहि कएल गेल अछि। २०२६ मे प्रकाशित ‘मैथिली बाल-उपन्यासक समीक्षाशास्त्र’ बाल-पाठकक कर्तृत्व, जातिगत प्रतिनिधित्व, लोकगाथा आ औचित्य-विचारक आलोचनात्मक भाषा विस्तृत करैत अछि। एहि पछिला विमर्शकेँ २०१३क कृतिपर इतिहाससम्मत सावधानीसँ लागू कएल जा सकैत अछि; वर्तमान सिद्धान्तक प्रभाव पूर्वकालीन लेखकपर सिद्ध मानल नहि जाए। [५, ६]
एहि तुलनाक निष्कर्ष तीन स्तरक अछि। पहिल, ‘ऊँच-नीच’मे विद्यार्थी दुखनक जीवन-कथा बाल-अधिकार आ शिक्षा-अधिकारक अध्ययन लेल विशिष्ट उपयोगी अछि। दोसर, जाति-आधारित अपमानक नाट्यचित्र किशोर दर्शककेँ सामाजिक असमानताक कठिन प्रश्न पुछबाक अवसर दैत अछि। तेसर, प्रौढ़ मद्यपान, शारीरिक हिंसा, साहूकारी-लेनदेन, दीर्घकालिक प्रेम आ पञ्चायतक निर्णय एकरा सामान्य आरम्भिक बालनाटक बनबासँ रोकैत अछि। अतः पाठकवर्गक निर्धारण वयस आ शिक्षण-उद्देश्यसँ करबाक चाही, लेखकक विधागत पहिचान उलटाकऽ नहि।
बेचन ठाकुरक रंग-परम्परा आ विदेहक आलोचनात्मक सन्दर्भ
आशीष अनचिन्हार २०११ मे प्रकाशित ‘बेचन ठाकुरजीक नाटक छीनरदेवी’क समीक्षामे नाटककारक रंग-निर्देशन, गामक मंचक परम्परा आ सामाजिक अन्धविश्वास-विरोधी स्वरपर विचार करैत छथि। ओ बेचन ठाकुरक नाटक सभक मंचनपरक प्रकृति आ साहित्य–रंगक परस्पर सम्बन्ध चिन्हित करैत छथि। ई पूर्ववर्ती समीक्षा ‘ऊँच-नीच’केँ पढ़बाक लेल ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करैत अछि—बेचन ठाकुरक नाटक केवल पोथीक भीतर सिमटल रचना नहि, लोकमंचक सम्भावनासँ जुड़ल सामाजिक लेखन अछि। मुदा ‘छीनरदेवी’क विषय आ ‘ऊँच-नीच’क शिक्षा–जाति–सम्पत्ति विमर्श अलग अछि; दुईटा कृतिक विषयगत एकरूपता मानब भूल होएत।
विदेहमे प्रकाशित दलित साहित्यक सौन्दर्य-विमर्श आ नाट्य-समीक्षाक नव प्रयास मैथिलीमे श्रेणीक्रमक आलोचना आ मंच-प्रदर्शनक प्रश्नक समकालीन शब्दावली देइत अछि। ई सन्दर्भ एहि नाटकक पात्रकेँ दया-प्राप्त गरीब नहि, सामाजिक अधिकारक दावेदार मानि पढ़बाक अवसर दैत अछि। तथापि परवर्ती समीक्षा-ग्रन्थकेँ मूल नाटकक प्रामाणिक अर्थक निर्णायक प्रमाण नहि, तुलनात्मक आलोचनात्मक उपकरण मानल गेल अछि। [८, ९]
पाठक आलोचनात्मक उपलब्धि आ सीमा
प्रथम उपलब्धि पात्रक वर्गीय अन्तरक दृश्यात्मक स्थापन अछि। मङ्गलक घरमे पथिया बिनबाक ठठेरी आ चन्द्रेशक आरामक दलान जखन एक्कहि सामाजिक भूगोलमे रहैत अछि, तखन ‘ऊँच-नीच’ शीर्षक भौतिक अर्थ प्राप्त करैत अछि। दोसर उपलब्धि मरनीक सक्रियता अछि; ओ परिवारक कर्तव्यक पहिल संगठक छथि आ कठिन समयमे सामाजिक तर्कक पहिल स्रोत सेहो। तेसर उपलब्धि शिक्षाक दीर्घकालिक खर्चक चित्रण अछि—बालकक भविष्य सामान्य अभिलाषा नहि, पीढ़ीक श्रम-निवेशक विषय अछि। चारिम उपलब्धि आर्थिक रूपान्तरण आ जातिगत असमानताक अनुपातहीन सम्बन्ध अछि: बेटा अभियन्ता बनैत अछि, मुदा सम्बन्ध आ रोजगारक दरवज्जापर जातिक प्रश्न फेर उपस्थित अछि।
पाँचम उपलब्धि सार्वजनिक पञ्चायतक रंगमंचीय प्रयोग अछि। विद्यालयक परिसरमे बैसल पंचायत स्थल-प्रतीक रूपमे प्रभावशाली अछि—जतए पढ़ाइ सामाजिक प्रश्न उठेबाक कौशल दैत अछि, ओतहि सामाजिक न्यायपर बहस होइत अछि। छठम उपलब्धि बेटीकेँ शिक्षित बनाबय चाहनिहार पिताक आधुनिकता आ अन्तरजातीय विवाहसँ आतंकित कुल-रक्षाक पुरान आग्रह बीच विरोधाभासक चित्रण अछि।
सीमाक पहिल पक्ष उपदेशक पुनरावृत्ति अछि। अनेक संवाद सामाजिक सुधारक सैद्धान्तिक तर्क स्पष्ट करैत छथि, मुदा पात्रक स्वाभाविक अनुभव कखनहुँ विचारक वाहक बनि रहि जाइत अछि। दोसर सीमा हिंसाक परिणामक सरलीकरण अछि। दुखनपर सामूहिक आक्रमण एक पैघ अन्याय अछि, जकर बाद पञ्चायत तुरन्त विवाहक समाधान देइत अछि; आपराधिक उत्तरदायित्व, पीड़ितक सुरक्षित पुनर्वास आ संस्थागत अन्यायपर विस्तृत विचार नहि उभरैत। तेसर सीमा सम्पत्तिक प्रश्नक अधूरापन अछि—डीह आ हँसलीक लूट-समान असमान लेनदेन निजी मेल-मिलापक कारण स्वतः न्यायसङ्गत नहि भऽ जाइत।
चारिम सीमा स्त्री-स्वतन्त्रताक विवाहकेन्द्रित परिभाषा अछि। चिकित्सक युवतीक शिक्षित नागरिक रूप होइतो अन्तिम सुखान्तमे पेशागत जीवन आ दीर्घकालीन स्वायत्तता गौण भऽ सकैत अछि। पाँचम सीमा दलित सामूहिक संगठनक कम दृश्यता अछि; नायकक व्यक्तिगत प्रतिभा आ प्रेमक साहस अधिक उजागर अछि, सामूहिक सुधारक रूपरेखा कम। ई आलोचना नाटकक ऐतिहासिक योगदान नकारैत नहि, बल्कि ओकर नीतिपरक सुखान्तक सीमा पहचानैत अछि।
शैक्षिक आ नाट्य-प्रयोगक सम्भावना
उच्च माध्यमिक आ विश्वविद्यालय स्तरपर एहि नाटकक चुनिन्दा दृश्य आर्थिक असमानता, श्रमक सम्मान, शैक्षिक पहुँच, जातिगत पूर्वाग्रह, विवाहमे सहमति आ समुदायिक न्यायपर चर्चाक आधार बनि सकैत अछि। मङ्गल–मरनीक घरेलू बहसक संग चन्द्रेशक बाजार-दृश्य पढ़ाओल जाए तँ विद्यार्थी समझि सकत जे निजी परिवारक शिक्षा-इच्छा बाजारक असमानता सँ कोना प्रभावित होइत अछि। दोसर अङ्कक हँसली–डीह–सिरकी क्रम संसाधन-अधिकारक दृश्य-व्याकरण सिखेबाक अवसर दैत अछि। तेसर अङ्कक रोजगार आ पञ्चायत प्रसङ्ग संस्थागत न्याय आ निजी मेल-मिलाप बीचक अन्तर स्पष्ट करए सकैत अछि।
पूर्ण रंगमंचीय प्रस्तुति लेल अङ्कान्तक समय-छलाङ्ग स्पष्ट करब, संवादक पुनरावृत्तिक सन्तुलन, जातिसूचक अपमानक संवेदनशील अभिनय, हिंसाक नियंत्रित मंचांकन आ अन्तिम निर्णयक बाद आर्थिक न्यायक अनुत्तरित प्रश्नकेँ दर्शक-संवादमे खोलब उपयोगी होएत। विद्यार्थी मंचनक सन्दर्भमे मूल नाटकक हिंसक आ प्रौढ़ प्रसङ्गक वयसोपयुक्त प्रस्तुति आवश्यक अछि। एहि प्रयोगक उद्देश्य मूल पाठक भाषाकेँ फेर सँ लिखि देब नहि, बल्कि सामाजिक चिन्तनक विविध स्तर बुझब थिक।
उपसंहार
‘ऊँच-नीच’क महत्त्व एहि बातमे अछि जे ई एकटा गरीब परिवारक शिक्षायात्राकेँ मिथिलाक सामाजिक श्रेणीक्रमक मूल प्रश्न बनबैत अछि। मङ्गल–मरनीक श्रम, दुखनक उच्च शिक्षाक प्यास, चन्द्रेशक संचयी धनतन्त्र आ युवतीक आत्मनिर्णयक पक्ष मिलि एक सामाजिक त्रिभुज रचैत अछि: ज्ञान, सम्पत्ति आ सम्मान। नाटक बारम्बार सिद्ध करैत अछि जे शिक्षा मनुष्यकेँ क्षमता दैत अछि, मुदा समाज ओहि क्षमताकेँ सम्मान देबाक संस्कार सीखबाक आवश्यकता रखैत अछि। ई रचनाक नैतिक उपलब्धि थिक।
आलोचनात्मक निष्कर्ष अधिक कठोर अछि। विवाह-मिलन जातिभेदक विरुद्ध प्रतीकात्मक विजय अवश्य अछि, मुदा जमीनक अधिग्रहण, ऋणक दबाव, रोजगारमे पक्षपात आ शारीरिक हिंसाक सम्पूर्ण प्रतिकार नहि। नाटक अतः सामाजिक न्याय सम्पन्न भऽ गेलाक दस्तावेज नहि; सामाजिक न्यायक आवश्यकता रंगमंचपर तीव्र रूपमे रखनिहार कृति अछि। मैथिली बाल-साहित्यक इतिहासक संग एकर सार्थक सम्बन्ध शिक्षाक प्रश्न आ युवा कर्तृत्वमे निहित अछि, मूल विधागत पहिचान प्रौढ़ सामाजिक नाटक रूपेँ सुरक्षित रहैत अछि। एहने विभाजित, प्रमाणाधारित पाठक आधारपर ‘ऊँच-नीच’ मैथिलीकेँ जाति-वर्गसम्बद्ध जनजीवनक एक महत्त्वपूर्ण रंगमंचीय अभिव्यक्ति प्रदान करैत अछि।
