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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

VIDEHA · प्रथम मैथिली पाक्षिक eJournal

आडम्बर

नित नवल नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’ · Videha अंक ४५२ · 15 October 2026

लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख

लोकजीवन, सामाजिक पाखण्ड आ प्रतिरोधक कथा-संरचना

नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’क ‘आडम्बर’ (२०१७) बीसटा मैथिली कथाक संग्रह अछि, जकर केन्द्रमे मिथिलाक गाम-समाज, पारिवारिक सम्बन्ध, श्राद्ध-भोजक प्रतिष्ठा, जातीय असमानता, चुनावी राजनीति, शिक्षा, श्रम, सम्पत्ति, धार्मिक विश्वास आ सार्वजनिक नैतिकताक प्रश्न अछि। शीर्षक-कथा सामाजिक प्रदर्शनक मनोविज्ञान खोलैत अछि; अन्य कथामे ‘आरक्षण’, ‘लोकतंत्र’, ‘एतेक जाति किएक?’ आ ‘रेल-यात्रा’ समानता तथा संस्थागत व्यवहारक बहसक रूप धारण करैत अछि। ‘बेगार’ वर्गीय निर्भरता, ‘लाश’ सम्पत्ति आ पारिवारिक स्वार्थ, ‘कविक जिनगी’ रचनाकारक सामाजिक स्थिति, आ ‘जानि कऽ बेसाहब’ धन-संग्रह तथा परोपकारक नैतिक द्वन्द्व प्रस्तुत करैत अछि। एहि अध्ययनमे मुद्रित विषय-सूची द्वारा निर्धारित बीसो कथाक क्रम आ पृष्ठसीमा मानिकय पृथक पाठविश्लेषण, कथ्य-शिल्पक परीक्षण, भाषिक स्वरूप, आलोचनात्मक सीमा तथा मैथिली बाल-साहित्यक ऐतिहासिक परिदृश्यसँ विधागत तुलनाक प्रयास कएल गेल अछि। मूल पुस्तकक सामाजिक कथा-साहित्य आ सचेत बाल-किशोर साहित्यक बीच भेदकेँ सुरक्षित रखैत ई लेख तर्क करैत अछि जे ‘आडम्बर’क विशेषता विवादास्पद विषय पर लोकभाषी सार्वजनिक संवाद आरम्भ करब अछि; ओकर सीमा कतिपय ठाम कथाक भीतर प्रत्यक्ष उपदेशक अत्यधिक विस्तार अछि।

प्रस्तावना : शीर्षकक विडम्बना आ कथा-संग्रहक स्वर

‘आडम्बर’ शब्दसँ बाह्य प्रदर्शन, प्रतिष्ठा-प्रेम आ वास्तविक आचरणसँ अलग देखाबटी मूल्यक बोध होइत अछि। संग्रहक शीर्षक एतबे अर्थ तक सीमित नहि रहैत अछि। बीस कथा पढ़लापर ई शब्द सामाजिक संस्थासभक ओहि आन्तरिक विसंगतिपर टिप्पणी बनि जाइत अछि जतय धर्मक आयोजन करुणाक विकल्प बनैत अछि, चुनाव न्यायसँ कटि जाइत अछि, शिक्षा रोजगारक अनिश्चिततासँ टकराइत अछि, आ धन-संग्रह सामाजिक दायित्वकेँ विस्मृत कऽ दैत अछि। कथा-संसारक पात्र सामान्यतः महानगरीय विशेषाधिकार प्राप्त नायक नहि, बल्कि गाँवक किसान, शिक्षक, निर्भर श्रमिक, गरीब परिवार, राजनीतिक आकांक्षी, कवि, रिश्तेदार आ गामक बतकहीमे संलग्न लोक छथि।

एहि कथासभमे हास्य प्रायः ऊपरी परत अछि; भीतरी बुनावटमे असुरक्षा, असमानता, मानवीय अपमान आ आत्मरक्षा चलैत रहैत अछि। व्यंग्यक कथाकार पाठककेँ एकटा निष्कर्ष धरि पहुँचेबाक प्रयत्न करैत छथि, मुदा सँगे ई प्रश्न उठैत रहैत अछि जे साहित्यिक कथा की विमर्शक मंच मात्र अछि, अथवा ओ पात्रक विशिष्ट जीवन-स्थितिसँ स्वतन्त्र कलात्मक अनुभूति सेहो रचैत अछि। संग्रहक उपलब्धि आ सीमा दूनू एहि तनावमे निहित अछि।

पुस्तकक मुद्रित प्रकाशन-विवरण अनुसार प्रथम संस्करण २०१७ मे गोसाउनि बैद्यनाथ स्मृति मंच, उपरदाहा, दरभंगासँ प्रकाशित भेल। मूल्य १५० टाका निर्दिष्ट अछि। पुस्तकक कथा-पृष्ठ १ सँ १६० धरि अंकित अछि। मुखपृष्ठ आ अन्दरक प्रस्तुतिमे लेखकक नाम नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’ देल अछि। आरम्भिक ‘दू शब्द’ तथा ‘लेखकीय’क पश्चात् बीस कथाक अनुक्रम आओर मुद्रित पृष्ठाङ्क देल गेल अछि। एतेक सामग्री समीक्षा लेल महत्वपूर्ण अछि, कारण एहि आधारपर कृति केँ स्वतंत्र कथा-संग्रहक रूपमे पहचानल जाइत अछि, बालकथा-संकलन वा बाल-उपन्यासक रूपमे नहि।

कथासंग्रहक रूपरेखा आ कथा-अनुक्रम

एहि विवेचनक प्राथमिक पाठ २०१७क ‘आडम्बर’क मुद्रित संस्करण अछि। कथाक नाम आ आरम्भिक पृष्ठ विषय-सूचीसँ मिलाओल गेल अछि; यथास्थान जे पृष्ठाङ्क देल गेल अछि, से पुस्तकमे मुद्रित कथा-पृष्ठक अछि। कथावस्तुक विवेचनमे पात्र, प्रसंग, संवाद, अन्त आ कथन-शैलीक पारस्परिक सम्बन्धपर बल देल गेल अछि। पाठविश्लेषणक प्रयोजन लेखकक कथित ‘सन्देश’ दोहरायब मात्र नहि, बल्कि कथाक तनाव, कथाकारक हस्तक्षेप, सामाजिक परिस्थिति आ रचनात्मक परिणतिक परीक्षण करब अछि।

उद्धरणक रूपमे केवल स्पष्ट पठनीय, शब्दशः पुष्ट छोट अंश ग्रहण कएल गेल अछि। जतय पाठक अक्षर-क्रम निश्चित रूपसँ स्थापित नहि भेल, ओतय कथ्यक विश्लेषण परोक्ष वर्णनक माध्यमसँ कएल गेल अछि। एहि कारण विस्तृत कथासारकेँ मूल पाठक स्थानापन्न नहि मानल जाए। विदेहक पुस्तक-सूची, बाल-साहित्य सूची, गद्य-सूची आ समानान्तर साहित्य-इतिहासक सूचीकरण तुलनात्मक सन्दर्भ प्रदान करैत अछि; केवल सूचीमे प्रविष्ट होयब ककरो पुस्तकक सम्पूर्ण अन्तर्वस्तु पढ़ि लेल जाएबाक प्रमाण नहि अछि। तें तुलनात्मक खण्डमे सामग्रीक प्रमाण-स्तरक भेद राखल गेल अछि।

कथा-अनुक्रम आ मुद्रित पृष्ठसीमा

स्रोत : नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’, आडम्बर, कथा-क्रम; अन्तिम पृष्ठक निर्धारण अगिला कथाक आरम्भ तथा अन्तिम कथा-पृष्ठ १६०क आधारपर।

संग्रहक कथा-दृष्टि : लोकवृत्त, संवाद आ व्यंग्य

‘आडम्बर’क कथा-परिसरकेँ तीन परस्पर गुँथल वृत्तमे देखल जा सकैत अछि। पहिल वृत्त गामक पारिवारिक-सामाजिक व्यवहार अछि, जतय श्राद्ध, भोजन, प्रतिष्ठा, रोग, रिश्तेदारी, विवाह आ मृत्युसँ जुड़ल प्रश्न उपजैत अछि। दोसर वृत्त सार्वजनिक संस्थाक अछि, जतय आरक्षण, चुनाव, जाति, शिक्षा, रेलयात्रा आ वेतनभोगी पेशाक अनुभव प्रवेश करैत अछि। तेसर वृत्त दृष्टान्त तथा नैतिक कल्पनाक अछि, जतय परी-कथा, नरक-यात्रा, कविक स्थिति आ धन-पुण्यक तर्क बहस बनैत अछि। ई विभाजन कठोर नहि, किएक तँ परिवारक भीतर सत्ता अछि आ सार्वजनिक व्यवस्थाक भीतर निजी स्वार्थ।

लेखकक बल संवादपर अछि। पात्र अकसर प्रश्न उठबैत छथि, प्रतिपक्ष तर्क दैत अछि, आ घटना धीरे-धीरे विचार-विनिमयमे रूपान्तरित होइत अछि। एहि शिल्पक सामाजिक लाभ ई जे जाति, शोषण, गरीबी वा धार्मिक विश्वास सन मुद्दा पाठकसँ दूर नहि रहैत अछि। एकर कलात्मक जोखिम सेहो अछि : पात्रक व्यक्तिगत आवाज कतहु-कतहु लेखकक प्रत्यक्ष भाषणमे विलीन होइत देखाइत अछि। कथाकार जखन पात्रक मौन, संकोच, भय, लालच आ असमर्थताकेँ घटना द्वारा व्यक्त करैत छथि, तखन कथा अधिक प्रभावकारी बनैत अछि; जखन ओ समाधान पूर्ण वाक्यमे घोषित कऽ दैत छथि, तखन अर्थक बहुलता सीमित होइत अछि।

मैथिली लोक-उक्ति, गामक रोजमर्रा व्यवहारक शब्द, सहज विनोद, सम्बोधन आ विनम्र-अविनम्र बोलचाल संग्रहक भाषिक पहचान अछि। भाषा मुख्यतः कथ्यकेँ पाठक लग अनबाक माध्यम अछि, सजावटी संस्कृतनिष्ठ गद्य नहि। तथापि राजनीति आ न्याय सम्बन्धी कथामे नीतिगत विचारसँ जुड़ल आधुनिक शब्दावली लोक-प्रयोगक संग-संग चलैत अछि। एहि मिश्रणमे समकालीन समाजक परिवर्तित अनुभव दखल दैत अछि।

बीस कथाक पृथक पाठविश्लेषण

आडम्बर

संग्रहक पहिल कथा श्राद्धक आयोजनसँ आरम्भ होइत अछि। कथाक आरम्भिक पंक्ति—“आइ सांकतेक बाबाक श्राद्ध थिकन्हि ।” (पृ. १)—सम्पूर्ण सामाजिक प्रसंग तुरन्त स्थापित करैत अछि। मुदा कथा शोकक निजत्वसँ बेसी श्राद्धक सामाजिक दृश्य, अतिथि-संख्या, भोज, श्रम आ प्रतिष्ठाक सन्तुलनपर केन्द्रित अछि। सांकतेक पारिवारिक आयोजन गामक सामूहिक निगाहक अधीन भऽ जाइत अछि; ‘सभकेँ देखाबय’ आ ‘काज करय’क बीच दूरी बढ़ैत अछि।

एहि कथाक वास्तविक व्यंग्य कर्मकाण्डक अस्तित्वपर नहि, ओकर प्रदर्शनप्रिय सार्वजनिक रूपपर अछि। बड़का आयोजन मानवीय सहानुभूतिक प्रमाण नहि बनि पबैत अछि। बाप-मायक स्मृतिसँ जुड़ल संस्कार जखन सामाजिक प्रतियोगिता बनैत अछि, तखन मूल्यक उलटफेर देखाइत अछि। कथाक अन्त प्रश्नोत्तर आ तर्कमार्फत आडम्बरक विकल्प सोचबाक आग्रह करैत अछि। ई कहानी शीर्षक-निर्धारणक कारण संकलनक व्याख्यात्मक प्रवेश-द्वार अछि, मुदा कतिपय विस्तृत वार्तालाप कथा-गतिकेँ धीमा सेहो करैत अछि।

रोपल गाछ बबूर

कथाक आरम्भमे भान आ हुनकर पत्नी रीता गामक सहानुभूतिक प्रतीक्षामे छथि। पारिवारिक अन्याय आ सामाजिक व्यवहारक बीच फँसल व्यक्ति सभक छवि एहि प्रसंगमे उभरैत अछि। ‘रोपल गाछ बबूर’ मुहावरात्मक शीर्षक अछि : अपन कएल निर्णय, पूर्व व्यवहार आ ओकर फल परस्पर जुड़ैत अछि। किएक तँ कथा सामाजिक मूल्यांकनक वातावरणमे घटित होइत अछि, एकरा केवल निजी ‘गलतीक दण्ड’ मानब पर्याप्त नहि।

कथामे आत्मनिर्णय, सामाजिक दायित्व आ सम्बन्धक परिणामक बीच सम्बन्ध पर विचार कएल गेल अछि। कथा जखन पुरान निर्णयक स्मरण आ वर्तमान असहायताकेँ जोड़ैत अछि, तखन नैतिकता उपदेशक अपेक्षा जीवनक अनुभव बनैत अछि। अन्तभागमे गाँवक ओर लौटब आ सम्बन्धक पुनर्विचारक प्रसंग कथा केँ पूर्णतः दण्डात्मक बनबाक सँ रोकैत अछि। एतय विचारणीय प्रश्न ईहो अछि जे न्याय करबाक अधिकार कोना सामाजिक जमात अपना हाथमे लैत अछि, आ पीड़ित लोकक आवाज ओकर बीच कतय बचैत अछि।

पश्चाताप

‘पश्चाताप’क केन्द्रमे रोग, निर्धनता आ परिवारक अस्थिरता अछि। राघवक बीमारी, इलाजक कठिनाई, सीमित संसाधन आ अपन लोकसँ सहायता अपेक्षा करबाक बाध्यता कथा केँ तत्काल सामाजिक धरातल प्रदान करैत अछि। गरीबी एहि कथामे कोनो अमूर्त दुर्दशा नहि, बल्कि उपचारक विकल्प घटा दैत वास्तविक परिस्थिति अछि।

कथाक अन्त दिस सामाजिक सम्बन्ध आ अतीतक व्यवहारक जाँच महत्वपूर्ण होइत अछि। पछतावाक भाव मात्र व्यक्तिगत मनःस्थिति बनि नहि रहैत; ओ सहायता, दायित्व आ सामाजिक उपेक्षाक आलोचनासँ जुड़ैत अछि। कथाकारक सहानुभूति पीड़ित परिवारक संग अछि, मुदा आलोचनात्मक प्रश्न ई अछि जे व्यक्तिगत पश्चातापसँ इलाज, जीविका आ सामाजिक सुरक्षा सन संरचनागत समस्याक समाधान कतेक सम्भव अछि। साहित्यिक प्रभाव ओतय बेसी अछि जतय पात्रक असुरक्षा संवादक तुलनामे ठोस घटना द्वारा प्रकट होइत अछि।

ओझा लेखें गाम बताह

ई कथा गामक सार्वजनिक विवेक आ राजनीतिक उपहासक तीक्ष्ण उदाहरण अछि। शीर्षकमे ‘ओझा’ आ ‘गाम बताह’क लोकप्रचलित कथन सामूहिक निर्णयक असंगतिपर व्यंग्य बनि जाइत अछि। ग्रामीण समाजक संवादमे प्रतिनिधित्व, वोट, नेता आ उपयोगिताक प्रश्न उठैत अछि। पात्र सार्वजनिक व्यवस्था सम्बन्धी जिज्ञासा राखैत छथि; व्यंग्य केवल व्यक्तिगत मूर्खतापर नहि, बल्कि सामूहिक राजनीतिक विवशतापर सेहो पड़ैत अछि।

कथाक संवाद-प्रणाली लोकमञ्च सन अछि, जतय एक प्रश्न दोसर प्रश्नकेँ जन्म दैत अछि। एहि तकनीकसँ पाठककेँ गामक वाद-विवादक अनुभूति होइत अछि। सीमा ई जे राजनीतिक प्रतिपादन आ कथा-घटनाक अनुपात कतिपय ठाम असन्तुलित अछि। तइयो कथा गामकेँ ‘राजनीतिसँ दूर’ मानबाक सरलीकृत धारणाकेँ नकारैत अछि : ग्रामीण लोक राजनीति बुझैत, ओकर व्यवहारिक प्रतिफल भोगैत आ आलोचना सेहो करैत छथि।

आरक्षण

‘आरक्षण’मे सामाजिक पिछड़ापन, न्याय, अवसर आ प्रतिनिधित्वक प्रश्न ग्राम्य वार्तालापक ढाँचामे सोझाँ अबैत अछि। कथा आरक्षणकेँ केवल सरकारी नियमक घोषणाक रूपमे नहि, बल्कि बराबरीक अलग-अलग समझक टकरावक रूपमे प्रस्तुत करैत अछि। पात्रक प्रश्न संकेत दैत अछि जे ‘न्याय’क एकटा रूप ऐतिहासिक वंचना दूर करब अछि, तऽ दोसर रूप वर्तमान प्रतिस्पर्धा आ योग्यता सम्बन्धी आशंका। एहि द्वन्द्वसँ कथा समकालीन सामाजिक मानसिकताक दस्तावेज बनैत अछि।

समाजनीतिक प्रसंगक कारण आलोचनामे जरूरी अछि जे पात्रक कथनकेँ स्वतः लेखकक प्रमाणित निष्कर्ष नहि मानल जाए। तर्कक खण्ड आ चरित्रक अनुभवकेँ फराक रखबाक आवश्यकता अछि। कथाक अन्तमे प्रतिनिधित्व आ जनहितक प्रति जे जोर देखाइत अछि, से लोकतान्त्रिक विमर्शक संकेत अछि। मुदा वास्तविक वंचनाकेँ व्यक्तिगत उदाहरणसँ बेसी व्यापक ऐतिहासिक सन्दर्भ चाही; एतय कथाक विवेचनात्मक महत्व ओकर समाधानसँ बेसी प्रश्नोत्तरीमे निहित अछि।

लोकतंत्र

‘लोकतंत्र’क आरम्भ रोजमर्रा हताशा व्यक्त करैत एक पात्रक कथनसँ होइत अछि (पृ. ३७)। एक आम आदमीक कष्ट, रोजी-रोटीक अनिश्चितता आ जनप्रतिनिधिक दूरिक बीच लोकतन्त्रक अर्थ पूछल जाइत अछि। लोकतन्त्र एतय केवल मतदानक नाम नहि, बल्कि नागरिकक जीवनमे न्याय, सम्मान आ व्यवहारिक अधिकारक उपलब्धतासँ परखल गेल अछि।

एहि कथामे सत्ता-विमर्शक भाषा गामक लोकबोलीसँ मिलि जाइत अछि। पात्रसँ पात्रक संवाद प्रशासनिक भाषा पर जनभाषाक प्रतिक्रिया जकाँ काज करैत अछि। अन्तिम खण्डमे आर्थिक निर्भरता आ प्रतिनिधित्वक सम्बन्ध उभरैत अछि। कथा समानताक आदर्श आ अभावग्रस्त जीवनक वास्तविकता बीचक विरोधकेँ तीखा करैत अछि। एकर विचारात्मक विस्तार शक्ति अछि, मुदा अति दीर्घ तर्क-प्रसंग पाठकीय तनाव कम करबाक जोखिम सेहो रखैत अछि।

रेल-यात्रा

‘रेल-यात्रा’मे आरक्षण, यात्रा, सहयात्री आ सार्वजनिक सेवाक व्यवहार एकत्र होइत अछि। सीट, अधिकार आ सुविधा जकाँ सामान्य वस्तु ग्रामीण यात्रीक अनुभवमे सामाजिक प्रतिष्ठा आ प्रशासनिक व्यवहारक प्रश्न बनि उठैत अछि। रेलक डब्बा एक लघु सार्वजनिक समाज अछि, जतय भिन्न अवस्था, वर्ग आ सोचक लोक अल्प समय लेल एक-दोसरसँ भिड़ैत छथि।

कथाक मुख्य विशेषता स्थानक गतिशीलता अछि। गामक स्थिर बतकहीक स्थानपर यात्राक आकस्मिकता तर्कक अवसर प्रदान करैत अछि। मुदा चर्चा बारम्बार नीतिगत विचार दिस मुड़ैत अछि, तें रेलक दृश्य, ध्वनि आ शारीरिक असुविधाक कलात्मक सम्भावना पूरा विस्तार नहि पबैत। एतय कथाकारक अभिप्राय सार्वजनिक नियम आ वास्तविक व्यवहार बीचक फाँक देखेबाक अछि, आ कथा यात्रा केँ सामाजिक परीक्षणक माध्यम बनबैत अछि।

एतेक जाति किएक?

संग्रहक अपेक्षाकृत दीर्घ कथामे जातिक आधार, विभाजन, सामाजिक सम्मान आ मनुष्यता सम्बन्धी तर्कक विस्तार अछि। प्रश्नवाचक शीर्षक स्वयं पाठकसँ संवाद करैत अछि। कथा जातिक संख्या मात्र नहि गनैत, बल्कि लोक-व्यवहारमे ‘हम’ आ ‘ओ’क विभाजन कोना दृढ़ होइत अछि, से बुझबाक प्रयत्न करैत अछि। जनजीवनक सन्दर्भमे सम्मान तथा सामाजिक दूरीक प्रश्न स्पष्ट होइत अछि।

अलग-अलग पात्र जाति सम्बन्धी सामाजिक धारणाक तर्क प्रस्तुत करैत छथि। ई पाठकेँ तत्कालीन विवादक भाषिक दस्तावेज बनबैत अछि, मुदा कथाक प्रत्येक विचारकेँ ऐतिहासिक तथ्यक स्थापित रूप मानब जोखिमपूर्ण होयत। वैज्ञानिक समाज-अध्ययनक दृष्टिसँ जाति श्रम-विभाजनक सरल परिणति मात्र नहि; सत्ता, जन्माधारित पदानुक्रम आ बहिष्कारक संस्था सेहो अछि। कथा जखन एकता आ पारस्परिक सम्मानक ओर मुड़ैत अछि, तखन ओकर नैतिक आकांक्षा स्पष्ट होइत अछि; कथा-वस्तुक विशिष्टता ओहि विचारक पृष्ठभूमिमे देखल जाए।

लाश

‘लाश’ शीर्षक तात्कालिक रूपसँ मृत्युक संकेत दैत अछि, मुदा कथा जीवित लोकक व्यवहारक परीक्षण बनि उठैत अछि। आरम्भमे जमींदारी पृष्ठभूमिक कुमार साहेब, परिवार, सम्पत्ति आ सामाजिक सम्बन्धक उल्लेख अछि। मृत्यु नातेदारीक नैतिकताकेँ सहज बनबैत अछि—ई अपेक्षा कथा क्रमशः तोड़ैत अछि। पारिवारिक दायित्व आ सम्पत्तिक आकर्षणक बीच अन्तर्विरोध बढ़ैत जाइत अछि।

अन्तिम खण्डमे मृतदेहक उपस्थिति आ जीवन्त सम्बन्धक शिथिलता व्यंग्यक अत्यन्त तीखा बिन्दु बनैत अछि। देहक प्रति सम्मान जतय आवश्यक अछि, ततय व्यक्तिक जीवनकालीन सम्बन्ध आ उत्तराधिकारक स्वार्थ अधिक मुखर भऽ उठैत अछि। ‘लाश’क महत्त्व एहि असहज बिम्बमे अछि : मृतक मात्र वस्तु नहि, ओ परिवारक मूल्य-परीक्षाक मौन केन्द्र बनि जाइत अछि। नैतिक कथन सापेक्षतः स्पष्ट अछि, मुदा दृश्यात्मक विडम्बना ओकर अपेक्षाकृत स्थायी कलात्मक उपलब्धि बनैत अछि।

हर्ट एटैक

एहि कथामे मनोहर बाबू नामक विद्यालय-सम्बद्ध पात्रक जीवन, पद, आय आ परिवारक आकांक्षा सँ जुड़ल प्रसंग अबैत अछि। अंग्रेजी चिकित्सा-शब्दक शीर्षक पारम्परिक सामाजिक कथा-संसारमे आधुनिक शहरी-मध्यवर्गीय असुरक्षाक प्रवेश करबैत अछि। स्वास्थ्य, धन आ आकांक्षाक सम्बन्ध कथा-घटनाक केन्द्रमे अछि।

अन्त दिस आकस्मिक हृदयाघातक प्रभाव जीवनक योजनासभकेँ प्रश्नांकित करैत अछि। प्राप्ति आ संचयक परिमाण जीवनपर नियंत्रणक आश्वासन नहि दऽ पबैत—ई बोध कथा केँ नैतिक व्यंग्यक दिशा दैत अछि। रचनात्मक स्तरपर आकस्मिक परिणति प्रभावशाली अछि; मुदा यदि घटना मात्र नैतिक ‘दण्ड’ बुझल जाए तँ रोग आ मृत्यु सम्बन्धी जटिल मानवीय अनुभव सरलीकृत भऽ सकैत अछि। कथा पढ़ैत एहि दूनू सम्भावनाक बीच फराक राखब आवश्यक अछि।

बेगार

‘बेगार’क आरम्भे व्यवस्था आ वास्तविकताक अन्तर रेखांकित करैत अछि : “आइ-काल्हि सरकारी नियमक मुताबिक केओ व्यक्ति बेगार अर्थात् बंधुआ मजदूर नहि राखि सकैत अछि ।” (पृ. ८५)। अगिला घटनामे ग्राम्य सामर्थ्यवान परिवार आ निर्भर श्रमिकक जीवन-सम्बन्धक चित्र अछि। औपचारिक नियम लागू होयबाक घोषणा आ सामाजिक निर्भरता समाप्त भऽ जएबाक बीच जे अन्तर अछि, कथाक तनाव ओहि ठाम सँ जन्मैत अछि।

ई कथा विशेष महत्त्वक अछि कारण एहिमे शोषण मात्र क्रूर मालिकक मनोवृत्ति नहि, बल्कि गरीबी, कर्ज, रोजी-रोटी आ सामाजिक हैसियतक सम्बन्धसँ संचालित होइत अछि। कमला आ विश्वनाथ बाबूक परिवारसँ जुड़ल प्रसंग श्रमिकक गरिमा आ निर्णयाधिकारक प्रश्न उठबैत अछि। अन्तमे ‘बेगार’ शब्दक सामाजिक अर्थ कानूनी निषेधसँ बड़ होइत देखाइत अछि। कथा व्यक्तिक व्यवहारमे परिवर्तनक नैतिक सम्भावना देखबैत अछि, मुदा संरचनागत शोषण समाप्त करबाक लेल व्यापक आर्थिक सम्बन्ध बदलबाक आवश्यकता अनुत्तरित रहि जाइत अछि।

परी-कथा

‘परी-कथा’ संग्रहक यथार्थवादी सामाजिक वृत्तसँ अलग किस्सागोईक प्रयोग प्रस्तुत करैत अछि। प्रारम्भमे राजा, राजकुमार आ पारम्परिक कथा-परिस्थितिक परिचय दऽ पाठकेँ परिचित लोककथात्मक धरातल पर लऽ जाओल गेल अछि। राजसत्ता आ राजपरिवारक प्रसंगक भीतर मानवीय इच्छा, विवेक आ सम्बन्धक परीक्षा चलैत अछि।

शीर्षकमे ‘परी’ होयबाक कारण कथा केँ स्वभावतः बाल-साहित्यक श्रेणीमे राखि देब साहित्य-विधाक गलत पहिचान होयत। परी-कथा बाल-पाठक द्वारा सेहो ग्रहण कएल जा सकैत अछि, मुदा एकर वास्तविक विधा पाठकीय विन्यास, भाषिक स्तर, भय-आश्चर्य, नीतिक प्रस्तुति आ कथा-विस्तार पर निर्भर करैत अछि। एहि कथामे राजकुमार सम्बन्धी रूपक आ नैतिक तर्क प्रौढ़ पाठक लेल सेहो सुसंगत अछि। लोककथाक संरचनाक नव सामाजिक अर्थ निकालब एकर विशेषता अछि; अन्तक अधिक स्पष्ट विवेचन ओकर रहस्यभाव घटबैत अछि।

कुकुरुक नाङरि

शीर्षकक विचित्र, लोकबोलीपर आधारित छवि पाठकीय जिज्ञासा जगबैत अछि। कथा धनी गृहस्थ, ग्रामीण निर्भरता, सामाजिक अपमान आ मनुष्यक आचरणक प्रसंगसँ निर्मित अछि। पशुसम्बन्धी रूपकक उपयोग मानवीय व्यवहारपर चोट करबाक परम्परासँ जुड़ल अछि; एतय ‘कुकुर’ बिम्ब केकरा लेल आ कोन परिस्थितिमे प्रयुक्त होइत अछि, से कथा-सन्दर्भ देखिकय बुझल चाही।

ई कथा असमान शक्ति-संबन्धक बीच व्यक्ति कोना छोट कहल जाइत अछि, आ कतेक हद धरि अपन स्वाभिमान बचबैत अछि, एहि प्रश्नकेँ उठबैत अछि। पात्रक व्यवहारक सामाजिक कारणक जांच ओकर नैतिक वर्गीकरणसँ अधिक उपयोगी अछि। अन्तमे मानवीय गरिमाक आग्रह स्पष्ट अछि; कथाकार उपहासक भाषा केँ समाजपर उलटा कऽ प्रयोग करैत छथि। तथापि पशु-उपमाक नैतिक असर पर प्रश्न करब जरूरी अछि, किएक तँ अपमानक आलोचना कखनो-कखनो अपन भाषामे अपमानक छवि पुनरुत्पन्न करैत अछि।

लति

‘लति’क आरम्भमे गामक बाटपर अनियन्त्रित हँसी, असंगत व्यवहार आ मादकता-सदृश अवस्थाक दृश्य अछि। एक पात्रक शरीर आ बोली सामाजिक दृष्टिक सोझाँ तमाशा बनि जाइत अछि। किन्तु ‘लति’ केँ केवल व्यक्तिगत दुर्गुण मानलासँ कथा केँ सीमित करब होयत; एहि अवस्थासँ परिवार, आर्थिक दायित्व आ सामाजिक लज्जाक प्रश्न जुड़ल अछि।

विस्तारमे व्यक्ति आ परिवारक दृष्टि आमने-सामने अबैत अछि। स्वभाव बदलबाक कथा-आकांक्षा नैतिक सुधारक परिचित ढाँचा बनबैत अछि, मुदा व्यसन वा बारम्बार दोहराओल आचरणक मनोवैज्ञानिक-सामाजिक कारणक जटिलता पूरा नहि उभरैत। एतय आलोचक लेल जरूरी अछि जे व्यंग्यक पात्रकेँ केवल हास्यक वस्तु नहि मानल जाए। कथा समाजक व्यवहारक प्रमाण दैत अछि कि अनियन्त्रित लत परिवारक भीतर केना संकट बनैत अछि; करुणा आ आरोपक सन्तुलन ओकर मुख्य कसौटी अछि।

कविक जिनगी

एहि कथामे रचनाकारक सामाजिक स्थिति एक महत्त्वपूर्ण विषय बनैत अछि। आरम्भिक उपमा—“कविक जिनगी ठीक ओहि डिबिया सन होइत अछि जे दोसरकेँ तँ प्रकाशित करैत अछि, मुदा स्वयं ओकरा चारू कात अन्हार रहैत छैक ।” (पृ. १२४)—कथाक करुण-व्यंग्यात्मक केन्द्र अछि। प्रकाशक उपमा रचनाक लोकहित आ कविक निजी अभावक विरोध स्थापित करैत अछि।

कथा रचनात्मक श्रमक अस्थिर सम्मान, कविक आत्मबोध आ सार्वजनिक उपेक्षाक प्रश्न उठबैत अछि। काव्य-प्रतिभाक प्रतीकात्मक आदर्श आ रोजमर्रा आर्थिक सम्मानक बीच तनाव साहित्यिक संस्थाक सामाजिक इतिहाससँ जुड़ल अछि। ई कथा आत्मपरक साहित्यिक दृष्टान्त सेहो कहल जा सकैत अछि। एहि रूपमे ओकर महत्त्व केवल कविक महिमामण्डनमे नहि, बल्कि साहित्यक सामाजिक उपयोग आ साहित्यकारक वास्तविक जीवन बीचक असंगतिपर प्रश्न करबमे अछि। अन्तमे संस्थागत मान्यता सम्बन्धी प्रसंगक कारण व्यक्तिगत पीड़ा सार्वजनिक प्रश्न बनैत अछि।

उद्यान

‘उद्यान’मे परिवारक निजी सम्बन्ध आ सार्वजनिक भूमिकासँ बनल तनाव अछि। पिता-पुत्री, विवाह, धनक स्थिति आ बदलैत मानवीय समीकरणक प्रसंग कथा केँ घरेलू भावभूमि दैत अछि। उद्यानक शीर्षक सहज रूपसँ सौन्दर्य, जीवन-विकास आ सम्भावनाक बोध करबैत अछि; कथाक भीतर सामाजिक व्यवहारक प्रश्न एहि रमणीय संकेतकेँ विडम्बनात्मक बनबैत अछि।

कथा आकारमे छोट अछि, तें घटना आ परिणामक गति अपेक्षाकृत तीव्र अछि। निजी सम्बन्धमे शक्ति आ अपेक्षाक सवाल जटिल अछि : परिवारक ‘कल्याण’क परिभाषा ककरा अधिकारसँ बनैत अछि? कथा कतहु समाधानक रूपमे व्यक्तिक नैतिक सुधारपर भरोसा करैत अछि। शीर्षकक प्रतीक यदि आरो बेसी दृश्यात्मक विस्तार पबितए, तँ भावात्मक परिणाम सघन भऽ सकित छल; मुदा संक्षिप्तता सेहो कथा केँ अनावश्यक प्रसंगसँ बचबैत अछि।

नरकक यात्रा

ई कथा धर्म, कर्मफल आ स्वर्ग-नरकक विश्वासक सहारा लऽ सामाजिक आचरणक जाँच करैत अछि। प्रारम्भिक वाक्य—“लोक कहैत अछि, मरनोपरान्त प्राणी स्वर्ग वा नरक जाइत अछि ।” (पृ. १३८)—लोकविश्वासकेँ आधार बनबैत अछि, प्रमाणित परलोक-विज्ञान प्रस्तुत नहि करैत। कथाक रूपकीय यात्रा व्यक्ति द्वारा कएल कर्म, आत्मपरीक्षण आ धार्मिक भाषाक सामाजिक उपयोग पर व्यंग्यक सम्भावना जगबैत अछि।

नरकक दृश्य वास्तविक भूगोल नहि, नैतिक कल्पना अछि। धर्मग्रन्थीय कल्पना आ दैनिक जीवनक अनैतिक व्यवहार एक-दोसरकेँ आलोकित करैत अछि। अन्तमे धार्मिक स्मरण आ प्रार्थनाक ओर जएबाक संकेत कथा केँ परिचित नीतिपरक अन्त दैत अछि। साहित्यिक दृष्टिसँ महत्त्वपूर्ण ई जे डर पैदा करब आ आत्मालोचन जगायब—दूनू अलग क्रिया अछि। कथा एही द्वन्द्वमे लोकधर्मक विश्वासक संरचना उजागर करैत अछि।

संकेत

‘संकेत’मे परिचित परिवार, कवि आ व्यक्तिगत सम्बन्धक प्रसंग कथा शुरू करैत अछि। घर-परिवारक साधारण बातचीत आ संकेतक अप्रत्यक्ष भाषा मिलि कऽ कथा केँ अन्तरंग बनबैत अछि। कथाकार स्पष्ट तर्कक बदलामे एतय धीरे-धीरे खुलैत स्थिति आ सम्बन्धक अनुमान पर अपेक्षाकृत अधिक भरोसा करैत छथि।

अन्तमे जीवनक अनिश्चितता, मानवीय स्नेह आ लोक-व्यवहार पर विचार उभरैत अछि। कथाक अर्थ शीर्षकसँ जुड़ल अछि—सभ महत्वपूर्ण बात घोषित वाक्यमे नहि कहल जाइत; व्यवहार सेहो संकेत दैत अछि। जँ एहि कथाकेँ संग्रहक राजनीतिक व्यंग्यसभक संग राखल जाए, तँ शिल्पक एक अलग सम्भावना देखाइत अछि : अपेक्षाकृत कम प्रत्यक्ष भाषण आ अधिक मनोभावात्मक तनाव। तथापि समापनमे कथाकारक नैतिक व्याख्या फेर स्पष्ट भऽ उठैत अछि।

अरजल भोग

‘अरजल भोग’मे ग्रामीण सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक उत्सव, सम्पत्ति आ सम्बन्धक व्यंग्यात्मक प्रश्न अछि। आरम्भमे चन्दाक परिवार आ विवाह-संबन्धी आकांक्षा सोझाँ अबैत अछि। आयोजनक चहल-पहल बाहरी उल्लासक छवि बनबैत अछि, मुदा लोकक इरादा आ संसाधनक असमानता एहि खुशीक भीतर अलग-अलग अर्थ पैदा करैत अछि।

एहि कथाक आलोचनात्मक महत्त्व ई जे भोज आ उत्सव केवल भोजनक दृश्य नहि, सामाजिक पदानुक्रमक प्रदर्शन सेहो छथि। परिवारक समृद्धिक कल्पना, नातेदारीक अपेक्षा आ खर्चक दवाब एकत्र होइत अछि। अन्तमे विवाह सम्बन्धी निर्णय आ सजावट-विस्तारक प्रसंग समाजक मूल्यांकनक प्रश्नकेँ खुला रखैत अछि। कथा ‘आडम्बर’ शीर्षक-कथाक सामाजिक प्रदर्शनक विषयसँ अन्तरपाठीय सम्बन्ध स्थापित करैत अछि, मुदा एतय बहस सामुदायिक धार्मिक कर्मसँ हटि निजी पारिवारिक उत्सवमे केन्द्रित अछि।

जानि कऽ बेसाहब

अन्तिम कथा आधुनिक दूरदर्शनक लोकप्रिय प्रश्नोत्तरी कार्यक्रमक उल्लेखसँ शुरू होइत अछि : “एक दिन टी.भी. देखैत छलहुँ । कार्यक्रम छलैक ‘कौन बनेगा करोड़पति’ ।” (पृ. १५६)। धनक सम्भावित प्राप्ति एक नैतिक कल्पनाक प्रवेशद्वार बनैत अछि। कथा क्रमशः धनार्जन, भोग, दान, अतिथि-सत्कार, दीनता आ पुण्यक तर्क पर पहुँचैत अछि।

एहि संरचनामे पारम्परिक नैतिक दृष्टान्त आ आधुनिक उपभोक्तावादी आकांक्षा आमने-सामने अछि। अन्तमे सेठजी आ महात्माजीक संवादक माध्यमसँ सत्कर्म आ वास्तविक सहायताक प्रश्न उठैत अछि। नैतिक निर्णयक महत्त्व धनक प्रदर्शनसँ बेसी जीवनक व्यवहारमे ठहरैत अछि। एहि कथा केँ आडम्बर-विरोधी संग्रहक समापनक रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि : जाहि मूल्यक नामपर लोक आदर चाहैत अछि, ताहि मूल्यक पालन व्यवहारमे कतेक कएल जाइत अछि? जँ कथा बहुत स्पष्ट शिक्षा सुनबैत अछि, तथापि शीर्षकसँ अन्त धरि विचारक एकता एकरा संग्रहक सुसंगत अन्त प्रदान करैत अछि।

कथा-शिल्पक समेकित मूल्यांकन

शीर्षक-व्यवस्था, विडम्बना आ वैचारिक एकता

बीस शीर्षकक एक संग अवलोकन केलासँ एक विशिष्ट द्वैध स्पष्ट होइत अछि। ‘आडम्बर’, ‘बेगार’, ‘लाश’, ‘आरक्षण’, ‘लोकतंत्र’ आ ‘संकेत’ सन शीर्षक सामाजिक संस्थाक जटिलता तथा अमूर्त विचार दिस निर्देश करैत अछि; ‘रोपल गाछ बबूर’, ‘ओझा लेखें गाम बताह’, ‘कुकुरुक नाङरि’ आ ‘जानि कऽ बेसाहब’ लोक-उक्ति आ जनभाषाक स्मृतिसँ उपजल अछि। ‘परी-कथा’ आ ‘नरकक यात्रा’ मे दृष्टान्तक सम्भावना, ‘हर्ट एटैक’ आ ‘रेल-यात्रा’मे समकालीन जीवनानुभवक स्वर अछि। ई विविधता कथाकारक विषय-क्षेत्रक विस्तार सिद्ध करैत अछि।

संग्रहक वैचारिक एकता ओहि आवर्ती प्रश्नमे अछि : सार्वजनिक रूपसँ जकरा पुण्य, न्याय, प्रतिष्ठा, विकास वा नैतिकता कहल जाइत अछि, वास्तविक जीवनमे ओकर रूप की अछि? एहि प्रश्नक कारण अलग-अलग कथा एक दोसरकेँ उजागर करैत अछि। ‘आडम्बर’ आ ‘अरजल भोग’मे उत्सवक प्रदर्शन, ‘आरक्षण’ आ ‘एतेक जाति किएक?’मे न्याय तथा सामाजिक विभाजन, ‘लाश’ आ ‘हर्ट एटैक’मे जीवन-मृत्यु आ सम्पत्ति, ‘बेगार’ आ ‘लोकतंत्र’मे अधिकार तथा जीवन-स्थितिक विरोध देखल जा सकैत अछि।

संवाद, कथावाचक आ दृश्य-निर्माण

कथाकारक प्रिय संरचना बहस अछि। पात्र प्रश्न करैत छथि, एकाधिक उत्तर अबैत अछि, तकर बाद कथा नैतिक निष्कर्षक ओर अग्रसर होइत अछि। ई मौखिक कथन-परम्पराक निकट अछि : दरबारक वाद, चौपालक गप्प, घरक नोकझोंक, यात्राक सहचर्य—सभ स्थानपर कथाक सूत्र बोलचाल होइत अछि। एहि शिल्पसँ भाषा सजीव रहैत अछि आ वैचारिक विषय सामान्य पाठक लेल ग्राह्य बनैत अछि।

मुदा अनेक कथामे बोलबैत पात्रक विशिष्ट चरित्र-विकास सैद्धान्तिक चर्चाक दबावमे दबि जाइत अछि। ‘एतेक जाति किएक?’मे विचारक विस्तृत व्याख्या, ‘आरक्षण’ आ ‘लोकतंत्र’मे राजनीतिक विमर्श, ‘जानि कऽ बेसाहब’मे धार्मिक नैतिक बहस—ई सभ केन्द्रीय कथात्मक आकर्षण छथि, मुदा कथाकारक प्रत्यक्ष पक्षधरता कखनो-कखनो पाठककेँ स्वतन्त्र व्याख्याक अवकाश कम दैत अछि। विपरीत रूपसँ ‘लाश’क मृतदेह, ‘बेगार’क आर्थिक निर्भरता आ ‘कविक जिनगी’क प्रकाश-अन्हार उपमा एहन दृश्यात्मक वा प्रतीकात्मक बिन्दु छथि जे निष्कर्ष कहबाक बदला पाठकीय अनुभव रचैत छथि।

भाषा : मैथिली गामक बोली आ सार्वजनिक विचार

मैथिली कथावस्तुमे अपन लोक-जीवनसँ जुड़ल सम्बोधन, प्रश्नवाचक विन्यास, उक्ति, तर्कक लय आ सामाजिक दूरीक सूक्ष्म स्तर विद्यमान अछि। प्रामाणिक बोलीक अनुभूति मात्र दुर्लभ शब्दक अधिकता सँ नहि, बल्कि जीवन-प्रसंग, पात्रक सामाजिक स्थिति आ संवादक लहजासँ बनैत अछि। ‘आडम्बर’मे भोज-व्यवस्था आ तिरस्कार, ‘लोकतंत्र’मे जनसत्ता पर क्षोभ, ‘बेगार’मे कानून-व्यवहारक विरोध—एहिसभमे भाषा सामाजिक ज्ञानक वाहक अछि।

जतय प्रशासन, न्याय वा शिक्षा सम्बन्धी चर्चा अबैत अछि, ओतय राजनीतिक-सामाजिक शब्दावली संग मैथिलीक लोक-लयक सहअस्तित्व एहि युगक भाषिक अवस्था देखबैत अछि। भाषिक दृष्टिसँ ई संग्रह दस्तावेजात्मक महत्त्व रखैत अछि। तथापि चरित्रानुकूल बोलीक भिन्नता आ दृश्य-विशिष्ट ध्वनि-चित्रण अधिक विकसित होइत, तँ कथानकक बहुस्तरता बढ़ितए।

स्त्री-पात्र, परिवार आ आलोचनात्मक सीमा

रीता, कमला, सीमा आदि स्त्री-पात्रक उपस्थिति समाजक निर्णयक भीतर स्त्रीक संवेदनात्मक स्थिति देखबाक अवसर दैत अछि। मुदा अनेक कथामे राजनीतिक वा सार्वजनिक नैतिक तर्कक प्रमुख वाहक पुरुष पात्र छथि। सामाजिक अन्यायक प्रश्न उठेबाक बावजूद स्त्रीक आर्थिक निर्णयाधिकार, इच्छा, वैवाहिक संस्था आ स्वतन्त्र कथात्मक दृष्टिकोणकेँ सर्वत्र समान विस्तार नहि भेटैत अछि। एहि असन्तुलनपर विमर्श करब ग्रन्थक अस्वीकार नहि; वरन् ओकर सामाजिक यथार्थवादक आलोचनात्मक जाँच अछि।

दोसर सीमा कथाक अन्तिम वाक्यसभमे शिक्षात्मक निष्कर्षक आवृत्ति अछि। नैतिक आग्रहक अपन साहित्यिक परम्परा अछि, मुदा आधुनिक लघुकथाक महत्त्व प्रश्न खुला रखब, भावात्मक अनिश्चितता पैदा करब आ पाठककेँ विचारक सहलेखक बनयबाक क्षमता सेहो अछि। ‘आडम्बर’ इन दू प्रवृत्तिक बीच झूलैत अछि। ओकर संगति सार्वजनिक शिक्षामूलक कहानीमे अछि, मुदा सर्वोत्तम दृश्य एकरा उपदेशक सीमासँ बाहर लऽ जाइत अछि।

मैथिली बाल-साहित्यक इतिहाससँ तुलनात्मक विवेचन

विधा-निर्धारण : सामाजिक कथा आ बाल-कथा बीचक आवश्यक भेद

‘आडम्बर’क मूल्यांकनमे एकटा बुनियादी सावधानी जरूरी अछि : लेखकक अन्य कृति ‘स्वर्ण कमल’ विदेह पोथी-सूचीमे बाल-उपन्यासक रूपमे दर्ज अछि, मुदा ‘आडम्बर’क प्रकाशन-विवरण आ विषय-सूची स्पष्ट रूपसँ एकरा कथा-संग्रह कहैत अछि। एहि तथ्यक कारण लेखकक सम्पूर्ण साहित्यकेँ ‘बाल-साहित्य’ नहि मानल जा सकैत अछि। ‘परी-कथा’ सन शीर्षक वा नैतिक कथा-रूप बाल-पाठक लेल सुलभ भऽ सकैत अछि, मुदा पाठक-वय, पाठकीय पूर्वज्ञान, कथाक संरचना, हिंसात्मक वा जटिल सामाजिक प्रसंग आ भाषाक कठिनाई सभ मिलि कऽ विधागत वर्गीकरण निर्धारित करैत अछि।

बाल-साहित्यक मूल कसौटी केवल ‘सिखेनाइ’ नहि अछि। बाल-कथा बालकक अनुभव-केन्द्र, खेल, जिज्ञासा, कल्पना, तात्कालिक दृश्य, स्वायत्त प्रश्न आ संवेदनात्मक ग्रहणशीलताकेँ स्थान दैत अछि। एक वयस्क सामाजिक कथा जँ नैतिक शिक्षा दैत अछि तँ ओ अवश्य बाल-कथा नहि भऽ जाइत। ‘आडम्बर’क आरक्षण, जाति, बंधुआ श्रम, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सम्पत्ति-संघर्ष आ धार्मिक नैतिकता-विषयक अनेक वार्तालाप प्रौढ़ सामाजिक अनुभवक आधारपर अधिक स्पष्ट होइत अछि। एही कारण एकर बाल-साहित्यसँ सम्बन्ध ‘विधागत तुलना’क अछि, प्रत्यक्ष श्रेणीकरणक नहि।

लोककथा, मुद्रित बाल-पोथी आ डिजिटल संरक्षण

मैथिली बाल-कथनक इतिहासक आरम्भिक आधार मौखिक लोककथा, नेना-गीत, घरक बुजुर्गक किस्सा, लोक-प्राणी कथा आ नैतिक दृष्टान्तक परम्परामे देखल जा सकैत अछि। आधुनिक मुद्रित बाल-पोथी एहि मौखिक सम्पदाकेँ चित्र, पाठ्यक्रम, विज्ञान, साहस-कथा, बाल-नाटक आ अनुवादक माध्यमसँ विस्तृत करैत अछि। एहि इतिहासकेँ एकल रैखिक विकास मानब उचित नहि; मौखिक, मुद्रित आ डिजिटल रूप आजुओ एक संग विद्यमान अछि।

विदेहक ‘शिशु उत्सव’ तथा बाल-साहित्य सूचीमे अनुवादित चित्रकथा, मौलिक बाल-कथा, बाल कविता, नाटक, विज्ञान-सम्बद्ध रचना आ उपन्यासक अनेक प्रविष्टि भेटैत अछि। एहिमे मुन्नी कामतक ‘चुक्का’ (बाल कथा-संग्रह), सुजीत कुमार झाक ‘कोइली घूरि आउ’ (बाल लघु-विहनि कथा-संग्रह), योगेन्द्र पाठक ‘वियोगी’क ‘विज्ञानक बतकही’, तथा प्रीति ठाकुरक अनूदित चित्रकथा-श्रृंखला सन श्रेणी-दृष्टान्त सम्मिलित अछि। ई सूची प्रमाण दैत अछि जे वर्तमान मैथिली बाल-साहित्य एकरूप उपदेशात्मक कथामे सीमित नहि, बल्कि चित्र, विज्ञान, मंच, अनुवाद आ अलग-अलग पाठक-वयकेँ समेटैत अछि। एहि रचनाक स्वतन्त्र अन्तर्वस्तु-विश्लेषण एहि निबन्धक दायरासँ बाहर अछि; इएह तथ्य सूचीपर आधारित ऐतिहासिक तुलना आ प्रत्यक्ष पाठसमीक्षा बीचक भेद स्पष्ट करैत अछि।

नन्दक सामाजिक कथा आ ‘स्वर्ण कमल’क विधागत अन्तर

विदेह पोथी-सूची ‘स्वर्ण कमल’केँ नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’क बाल-उपन्यास कहैत अछि, जखन कि ‘आडम्बर’केँ कथा-संग्रह। लेखकक एकहि नामसँ प्रकाशित ई अलग-अलग विधागत पहिचान विशेष अर्थपूर्ण अछि। एक ओर बाल-उपन्यासमे कथा-यात्रा, आश्चर्य, बालकक कल्पना आ रचनात्मक आत्मनिर्भरता अपेक्षित रहैत अछि; दोसर ओर ‘आडम्बर’क सामाजिक कथा सभ वयस्क सामाजिक संस्थाक प्रश्नोत्तर, विवेक आ सामाजिक अनुभव पर आश्रित अछि।

‘परी-कथा’ जकाँ कृति एहि विभाजनक सीमाक्षेत्र उजागर करैत अछि। पारम्परिक राजा-राजकुमारक कथा बाल-पाठककेँ आकर्षित कऽ सकैत अछि, मुदा एकर भीतरक नीतिशास्त्रीय विमर्श आ सामाजिक व्यंग्य ओकर वयस्क स्तरक पुनर्पाठ सम्भव बनबैत अछि। एहि लचीलेपनकेँ मानि कऽ सेहो लेखकक स्वीकृत बाल-उपन्यास आ सामाजिक कथा-संग्रहकेँ एक विधा घोषित करब उचित नहि होयत।

नीतिपरकता, बाल-दृष्टि आ नागरिक शिक्षा

‘आडम्बर’क अनेक कथामे न्याय, श्रमक सम्मान, समानता, करुणा, विवेक आ लोभक आलोचना सन प्रश्न अछि। एहि विषयसभक नागरिक शिक्षा आ किशोर पाठक्रममे निश्चित उपयोग सम्भव अछि। उदाहरणस्वरूप ‘बेगार’ श्रमिक अधिकार पर, ‘एतेक जाति किएक?’ पूर्वाग्रह पर, ‘कविक जिनगी’ रचनात्मक श्रम पर, आ ‘नरकक यात्रा’ नैतिक निर्णय पर चर्चा करबाक सामग्री दऽ सकैत अछि। मुदा पाठ्य-उपयोग आ साहित्यिक विधा एक नहि।

एकटा बालक-केंद्रित नव प्रस्तुति लेल संक्षिप्त दृश्य, वयसापेक्ष पृष्ठभूमि, जातिगत वा वर्गीय उत्पीड़नक संवेदनशील भाषिक रूप, खुला प्रश्न, सहज पात्र-परिचय, आ चित्रकथा वा नाट्यरूपान्तरणक आवश्यकता होयत। मूल कहानीक सभ नैतिक दावाकेँ निर्विवाद सत्यक रूपमे पढ़ेबाक बदला बच्चासँ प्रश्न पूछल जाए—ककरा संग अन्याय भेल, किएक भेल, दोसर उपाय की होइत, आ पात्र अपन निर्णय कतेक स्वतन्त्रतासँ लेलनि?—तँ ‘आडम्बर’ सामाजिक शिक्षा लेल उपयोगी सह-पाठ बनि सकैत अछि। ई सम्भावित उपयोग मूल पाठक बाल-साहित्य होयबाक दावा नहि करैत अछि।

समकालीन विदेह-सन्दर्भमे बाल-साहित्यक बहुधारात्मकता

विदेहक शिशु उत्सवमे बाल गीत, चित्रकथा, विज्ञान-कथन, लोककथा, अनुवाद, नाटक आ किशोरक रचनाक स्वतंत्र प्रविष्टि समकालीन संग्रहण-प्रक्रियाक संकेत अछि। गजेन्द्र ठाकुरक अनेक बाल-उपन्यासक सूची, नव किशोर-कथा तथा बाल-चित्रकथाक उल्लेखसँ ई स्पष्ट अछि जे बाल-पाठकक विषयक्षेत्र विज्ञान, कल्पना, सामाजिक जीवन आ समकालीन प्रौद्योगिकी धरि बढ़ल अछि। ई प्रविष्टि साहित्य-इतिहास लिखबाक सामग्री उपलब्ध करबैत अछि; मुदा केवल सूची-संख्या सँ साहित्यिक गुणवत्ता अथवा ऐतिहासिक ‘प्रथम’क दावा स्थापित नहि कएल जा सकैत।

एहि पृष्ठभूमिमे ‘आडम्बर’क ऐतिहासिक स्थान सामाजिक व्यंग्यक वयस्क कथा-परम्परामे अधिक सुस्पष्ट अछि। बाल-साहित्यक इतिहाससँ एकर सम्बन्ध मुख्यतः साझा मौखिकता, नीतिपरक प्रश्न, लोकभाषा आ कथन-विधानक स्तरपर अछि। दोसर दिस बाल-साहित्यमे बालकक आत्मदृष्टि आ खेल-कल्पनाक जी व्यापकता चाही, से संग्रहक मूल केन्द्र नहि। ई भेद मानल जाए तँ लेखकक बहुविध रचनाशीलताक सम्यक् सम्मान सम्भव अछि।

सामाजिक इतिहासक दस्तावेज आ साहित्यिक स्वायत्तता

‘आडम्बर’केँ केवल नैतिक सुधारक लघु पुस्तिका कहि देब एकर साहित्यिक आयाम घटायब होयत; एकरा पूर्ण विकसित बहुस्तरीय आधुनिकतावादी कथाशिल्पक समान मानब सेहो अतिशयोक्ति होयत। ई संग्रह सामाजिक यथार्थ, व्यंग्य, दृष्टान्त आ बहसमूलक गद्यक संगमपर अछि। समाजक सामान्य चरित्रसभकेँ कथा-केन्द्रमे अनबाक कारण एकर दस्तावेजी महत्व अछि। पाठक ग्रामीण समाजक पाखण्ड, परिवारक निर्भरता, लोकतन्त्रक दैनन्दिन अनुभव आ साहित्यकारक जीविकाक प्रश्नसँ सामना करैत अछि।

एहि दस्तावेजीय शक्तिक संग एक आलोचनात्मक दायित्व जुड़ैत अछि : पात्रक मान्यता आ सामाजिक तथ्य अलग रखब। जातिक इतिहास, आरक्षणक प्रभाव, श्रमक कानूनी स्थिति वा चिकित्सकीय कारणक सत्यापन साहित्यिक पाठकेँ मात्र उद्धृत करिकय नहि भऽ सकैत। कथा विचार, अनुभव आ मूल्य-संघर्षक साक्ष्य अछि; ओ स्वयं समाजशास्त्रीय सर्वेक्षण वा विधिक प्रतिवेदन नहि। एहि सीमाबोधसँ साहित्यिक विश्लेषण आ सामाजिक अनुसंधानक सम्बन्ध अधिक विश्वसनीय बनैत अछि।

लोक-समाजक भीतर ‘न्याय’क आकांक्षा लेखकक नैतिक केन्द्र अछि। मुदा ई न्याय कतहु व्यक्तिक सुधार, कतहु समुदायिक कर्तव्य, कतहु राजनीतिक अधिकार, कतहु परोपकारक रूप धारण करैत अछि। एहि भिन्नताकेँ एक शब्दमे समेटबाक बजाय कथाक विशेष परिस्थिति अनुसार परखब उचित अछि। ‘लाश’मे करुणाक अभाव आ ‘बेगार’मे आर्थिक पराधीनता एकहि नैतिक भाषासँ वर्णित होइत अछि, मुदा हुनका सामाजिक कारण एक समान नहि। एही अन्तरक आलोचनात्मक पहिचान पाठककेँ संग्रहक भीतरक विविधता समझबैत अछि।

निष्कर्ष

नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’क ‘आडम्बर’ मैथिली सामाजिक कथा-साहित्यक एहन संग्रह अछि जकरा केन्द्रमे सार्वजनिक सदाचारक दावा आ वास्तविक आचरणक विरोध अछि। श्राद्धक आडम्बर सँ आरम्भ भेल कथा-यात्रा पारिवारिक असमानता, जाति, लोकतन्त्र, रेल-व्यवस्था, बेगार, कविक जीवन, धार्मिक विश्वास आ धन-नैतिकता धरि पहुँचैत अछि। बीस कथाक आवर्ती सूत्र लोकजीवनक सामान्य दृश्यसँ गम्भीर सामाजिक प्रश्न उठेबाक क्षमता अछि। एहि अर्थमे शीर्षक केवल पहिल कथा नहि, सम्पूर्ण संग्रहक नैतिक व्याकरण बनि उठैत अछि।

कृतिक सर्वाधिक सशक्त उपलब्धि लोकबोलीक सहज संवाद, सामान्य पात्रक सामाजिक अनुभव आ विडम्बनाक पहचान अछि। ‘लाश’क मौन मृत्यु-दृश्य, ‘बेगार’क कानून आ जीवन बीचक दूरी, ‘कविक जिनगी’क डिबिया-उपमा तथा ‘जानि कऽ बेसाहब’क धन-पुण्यक अन्तिम बहस संग्रहक भिन्न-भिन्न रचनात्मक दिशाक प्रमाण अछि। सीमामे उपदेशात्मकता, अन्तिम नैतिक निर्णयक अधिक स्पष्टता, समाजनीतिक तर्कक दीर्घता आ स्त्री-अनुभवक अपेक्षाकृत सीमित आत्मस्वर शामिल अछि। एहि कमजोरीक स्वीकारोक्ति ओकर सामाजिक प्रतिबद्धता घटबैत नहि; उलटे एकर कलात्मक स्थिति अधिक सटीक बनबैत अछि।

बाल-साहित्यक इतिहाससँ तुलना ई निष्कर्ष पुष्ट करैत अछि जे नैतिक कथ्य होयब मात्र बाल-साहित्य होयबाक मानदण्ड नहि अछि। ‘आडम्बर’ मूलतः प्रौढ़ सामाजिक कथा-संग्रह अछि, जकर चुनिन्दा प्रसंग किशोर नागरिक-शिक्षामे पुनर्पाठ योग्य भऽ सकैत अछि; लेखकक ‘स्वर्ण कमल’ सन सूचीबद्ध बाल-उपन्यास अलग विधागत अध्ययन चाहैत अछि। एहि स्पष्ट विधा-भेदक संग ‘आडम्बर’केँ मैथिली लोकजीवन, सामाजिक व्यंग्य आ संवादमूलक कथा-परम्पराक महत्वपूर्ण पाठक रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि।

दोसर खण्ड

समाज, स्त्री-अस्मिता आ उपन्यास

गुदड़ीक लाल · अनठिया कुकुर · सुजाता · सुकन्या · परिवार