लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख
ग्राम–नगर सम्बन्ध, वर्गीय नैतिकता आ सामाजिक पुनर्निर्माण
नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’क ‘अनठिया कुकुर’ मिथिलाक गाम आ नगरक बीच बदलैत सम्बन्ध, आर्थिक विषमता, नैतिक दायित्व, स्त्री–पुरुष सम्बन्ध, न्यायिक प्रक्रिया आ ग्रामोद्धारक आकांक्षाकेँ एक संग कथा-वस्तुमे रूपान्तरित करैत अछि। दिल्लीसँ ग्रामक्षेत्र धरि आवागमन करैत प्रेम आ मालतीक अनुभव उपन्यासक केन्द्रीय सूत्र अछि; विदुरक प्रसंग एहि आदर्शवादी सूत्रक भीतर विश्वास, अवसरवाद आ संस्थागत न्यायक समस्या उठबैत अछि। पाठक एगारह खण्डमे परिवर्तित कथा-केन्द्र भेटैत अछि—कखनो ग्रामजीवनक सामाजिक संरचना, कखनो पारिवारिक अंतरंगता, कखनो मुकदमा आ आर्थिक व्यवहार, आ कखनो युवा पात्रक प्रेम आ विवाह। प्रस्तुत आलेख एहि बहुसूत्रताकेँ उपन्यासक शक्ति आ सीमा दुनू रूपमे परखैत अछि। विदेहक पोथी-सूचीमे ‘अनठिया कुकुर’क विधा ‘उपन्यास’ आ ‘स्वर्ण कमल’क विधा ‘बाल उपन्यास’ रूपमे निर्दिष्ट अछि। तेँ बाल-साहित्यक इतिहाससँ एकर तुलना प्रासंगिक अछि, मुदा एकरा स्वयं बाल-उपन्यास घोषित करब उचित नहि।
कृतिक विधा आ रचनात्मक आधार
‘अनठिया कुकुर’क बाह्य आवरण, आरम्भिक ‘दू शब्द’, कथाक मुद्रित क्रम तथा अन्तिम पृष्ठ एकटा सुसंगठित दीर्घ आख्यानक संकेत दैत अछि। उपलब्ध मुद्रित प्रतिमे कथाक पृष्ठ १ सँ २४५ धरि क्रम उपस्थित अछि आ कथाविन्यास एगारह क्रमांकित खण्डमे विभक्त अछि। पुस्तकक आरम्भिक वक्तव्यपर लेखक नन्द कुमार मिश्रक नाम आ १४ जनवरी २०११क तिथि अंकित अछि। एहि तिथिकेँ लेखकक वक्तव्यक तिथि मानल गेल अछि, प्रकाशनक निश्चित वर्ष नहि; प्रकाशन-वर्षक स्वतंत्र घोषणा एहि प्रतिमे स्पष्ट रूपसँ पुष्ट नहि होइत अछि। मुद्रित प्रकाशक-विवरणमे ‘गोसाईंजी बैद्यनाथ स्मृति मंच’ आ ‘दरभंगा’क उल्लेख भेटैत अछि।
एहि निबन्धक प्राथमिक आधार मूल मुद्रित पाठक क्रम, खण्ड-विभाजन, प्रमुख प्रसंग, पात्रगत सम्बन्ध आ लेखकक आरम्भिक वक्तव्य अछि। अध्ययनमे दृश्य घटनाक पुनर्कथन आ आलोचनात्मक अर्थनिर्णय अलग राखबाक प्रयास अछि।
कृति विधागत रूपेँ सामाजिक उपन्यास अछि। लेखकक ‘दू शब्द’मे ग्राम आ शहरक लोकक बीच मनोवृत्तिक दूरी, शहरी आर्थिक आकर्षण, ग्रामक पिछड़ापन, जातिवाद तथा साम्प्रदायिकताक तनाव आ सामाजिक सुधारक आवश्यकता विशेष रूपसँ उठाओल गेल अछि। एहि दृष्टिकोणसँ पाठक कथाजगतकेँ लेखकक नैतिक-सामाजिक प्रस्तावनाक रूपमे सेहो पढ़ि सकैत अछि। मुदा आलोचनाकेँ प्रस्तावना आ वास्तविक कथा-विधानक बीच अन्तर जँचबाक चाही: लेखक जे परिवर्तनक आकांक्षा व्यक्त करैत छथि, कथा ओकर कलात्मक रूप कतेक निर्वाह करैत अछि, ई मूल प्रश्न अछि।
कथासार : नगर सँ गाम आ पुनः गाम सँ समाज दिस
कथा आरम्भमे रातिक यात्रा, दिल्लीसँ राजनगर दिस प्रस्थान, प्रेम आ मालतीक संगतिक जीवन तथा घरेलू वस्तु-व्यवस्थाक चित्रसँ खुलैत अछि (मुद्रित पृ. १ सँ आगाँ)। एतय रेलगाड़ी, स्टेशन, प्रतीक्षा, परिचित लोक आ घरक सहज संवाद उपन्यासक भौगोलिक दिशा निश्चित करैत अछि। कथाक भावनात्मक केन्द्र केवल पति–पत्नी नहि, हुनका माध्यमसँ खुलैत व्यापक ग्राम-समाज अछि। नगरक सुविधा आ ग्रामक कठिन परिस्थितिक बीच लेखक एकर बाद पुनःपुनः तुलना ठाढ़ करैत छथि।
धनकाहीक सामाजिक परिवेशमे शिक्षा, जातिगत प्रतिष्ठा, श्रम, किसान, स्थानीय पुरोहित, सम्पन्न परिवार आ वंचित जनक अनेक स्थिति सोझाँ अबैत अछि। प्रेमक दृष्टि ग्रामीण संसाधनक उपयोग, व्यावहारिक सहयोग आ सामुदायिक प्रतिष्ठापर टिकल अछि। विदुरक संग मित्रता प्रारम्भमे आशा आ विश्वास जनबैत अछि, मुदा समयक संग आर्थिक व्यवहार आ भूमि–सम्बन्धी विवाद एहि विश्वासपर प्रश्न लगबैत अछि। प्रेमक प्रति सहानुभूति रचबाक लेल कथाकार अनेक विरोधी स्थितिक संचय करैत छथि।
आगाँ न्यायालयी प्रक्रिया, अभियोग, शपथपत्र, साक्ष्य आ कार्यालयी व्यवहार कथाक टकरावकेँ तीव्र करैत अछि। एहिसँ उपन्यास निजी नैतिकतासँ बाहर संस्थागत नैतिकताक प्रश्न धरि बढ़ैत अछि। दोसर दिस किसानक खेत, ग्रामीण श्रमिकक असुरक्षा, दबंगई, चोरी आ आरोप–प्रत्यारोप कथाकेँ जनजीवनक तात्कालिकता दैत अछि। पछिला खण्डसभमे शहरक शिक्षित युवा पात्र, प्रेम आ विवाहपर विचार, बनारसक धार्मिक अनुभव आ पुनः मूल परिवारक प्रसंग कथानककेँ विस्तृत परिधि प्रदान करैत अछि। अन्तमे घर-गामक दैनन्दिन समस्यासँ जुड़ल स्नेह आ ग्रामसुधारक आशा प्रमुख बनैत अछि (पृ. २४४–२४५)।
मुद्रित एगारह खण्डक पृथक पाठविश्लेषण
प्रथम खण्ड : यात्रासँ सामाजिक मानचित्र धरि
प्रथम खण्डक आरम्भ यात्रा-प्रसंगसँ कएल गेल अछि। प्रेम आ मालतीक संगति, स्टेशनक आवागमन, पारिवारिक संवाद, घर-गृहस्थीक व्यावहारिक जरूरत आ सम्बन्धक सहज लय आरम्भिक कथाभूमि तैयार करैत अछि। कथाकार पहिने अनुभवक मूर्त वातावरण बनबैत छथि, तकर बाद धीरे-धीरे स्थानीय सामाजिक समस्या कथामे प्रवेश करैत अछि। एहि संरचनासँ शहरक चलायमान समय आ गामक ठहरल अनुभवक बीच अन्तर उत्पन्न होइत अछि।
मणिकान्त आ सुलेखाक उपस्थिति तथा प्रेमक सामाजिक सहयोगक इच्छा एहि खण्डमे वैयक्तिक स्नेहक विस्तार देखबैत अछि। नायकक व्यवहारमे परोपकारक आकांक्षा प्रखर अछि; तथापि एहि प्रवृत्तिक संग एक जोखिम सेहो जुड़ल अछि—कथा कखनो पात्रक जटिलता छोड़ि ओहि पात्रक नैतिक गुणक घोषणा करऽ लगैत अछि। एखन धरि ई आदर्शवादी पद्धति पाठककेँ आकर्षित करैत अछि, मुदा आगाँ निरन्तर दोहरायलापर कलात्मक तनाव घटा सकैत अछि।
खण्डक अन्तमे संवादक माध्यमसँ ग्राम-सेवाक आवश्यकता आ शिक्षा-संस्कारक विषय सोझाँ अबैत अछि। आरम्भ एकटा निजी यात्रा छल, मुदा समापन सामूहिक प्रश्नक उद्घाटन करैत अछि; इएह ई खण्डक महत्त्वपूर्ण कथात्मक उपलब्धि अछि।
द्वितीय खण्ड : धनकाही, शिक्षा आ सामाजिक असमानता
धनकाही गामक परिचयमे गरीब खेतिहर आ मजदूरक संसाधनाभाव, आवागमनक कठिनाई, विद्यालयी संरचना आ शिक्षक श्रीमत चौधरीक सामाजिक स्थानक चित्र उभरैत अछि। पत्नी सुनीताक उल्लेख घरेलू संसारकेँ शिक्षा आ जनजीवनसँ जोड़ैत अछि। ई खण्ड ग्रामीण विपन्नताकेँ केवल भावुक दृश्य नहि बनबैत, ओकर आर्थिक आधारक संकेत सेहो दैत अछि।
गामक बच्चा, पढ़ाइ, साधन आ अवसरक सम्बन्ध एतय अधिक प्रत्यक्ष अछि। एहि कारण ई अंशक विषय बाल-कल्याणसँ जुड़ैत अछि; मुदा बाल-जीवनक अनुभव, बालक दृष्टिबिन्दु अथवा बच्चाक स्वतन्त्र मनोजगत कथा-विन्यासक केन्द्र नहि बनैत अछि। बाल-साहित्य आ बाल-विषयक सामाजिक उपन्यासक बीच ई सूक्ष्म किन्तु आवश्यक भेद एतहि समझल जा सकैत अछि।
प्रेमक परिवार आ विद्यालयी परिवेशक अन्तरक सहारे लेखक शिक्षा, रोजी-रोटी आ ग्रामीण पिछड़ेपनक परस्पर सम्बन्ध रेखांकित करैत छथि। ई भाग उपन्यासकेँ सामाजिक भूगोल प्रदान करैत अछि, यद्यपि अनेक पात्रक प्रवेश सीमित व्याख्यात्मक विस्तार बनि रहल अछि।
तृतीय खण्ड : व्यवसाय, मित्रता आ विश्वासक आरम्भ
प्रेमक शहरी व्यवसाय, कर्मी आ कार्यालयी व्यवस्था एहि खण्डक आरम्भिक आश्रय अछि। गामक गरीब परिवारसँ जुड़ल विदुरक आगमन कथा-विन्यासमे वर्गीय दूरीकेँ व्यक्तिगत सम्बन्धमे बदलैत अछि। परिचय, आतिथ्य, साथ भोजन आ सम्मानक व्यवहारसँ लोकक बीच भरोसाक सम्भावना उपस्थित होइत अछि।
प्रेम आ विदुरक सम्बन्धकेँ केवल मालिक–आश्रितक समीकरणमे सीमित करब कठिन अछि; कथाकार एकरा मित्रताक आदर्शमे रूपान्तरित करबाक चेष्टा करैत छथि। मुदा आर्थिक शक्ति आ सामाजिक प्रतिष्ठाक असमानता शुरूएसँ ओहि मित्रताकेँ जटिल बनबैत अछि। जे सम्बन्धकेँ पात्र सभ स्वाभाविक उदारता मानैत छथि, पाठक तकर भीतर निर्भरता आ अधिकारक अन्तर सेहो देख सकैत अछि।
एहि खण्डक विशेषता एतय अछि जे आगाँक विवादक बीज सादर स्वागत आ विश्वासक वातावरणमे पड़ैत अछि। घटना-विकासक दृष्टिसँ ई अत्यन्त उपयोगी संक्रमण अछि; कथाक दीर्घकालीन तनाव एहि आरम्भिक आत्मीयतासँ बढ़ैत अछि।
चतुर्थ खण्ड : पुरोहित, प्रतिष्ठा आ सामाजिक मध्यस्थता
पंडित कपिलेश्वर ठाकुरक परिचय द्वारा कथा धार्मिक प्रतिष्ठा, यजमानी, जातिगत व्यवहार आ ग्रामीण प्रभुत्वक अन्तरंग वृत्तमे प्रवेश करैत अछि। पात्रक विनम्रता आ परोपकारी व्यवहारक उल्लेख ओकरा एकरेखीय खलपात्र बनबासँ रोकैत अछि; ताहि संग पंडित–यजमान सम्बन्ध सामाजिक शक्ति-संरचनाक सूक्ष्म संकेत सेहो दैत अछि।
गामक धार्मिक आ आर्थिक सम्बन्ध अलग-अलग कोठरीमे नहि रहैत अछि। जँ कियो पुरोहितक मार्फत निर्णय, आवागमन वा सामाजिक विश्वास स्थापित करैत अछि, तँ ओकर पाछाँ एकटा स्वीकृत परम्परा सक्रिय रहैत अछि। लेखक प्रचलित मर्यादाक भितरहि मनुष्यता आ सहयोगक मूल्य खोजैत छथि; मुदा रूढ़ि पर प्रत्यक्ष आलोचनाक स्थान सीमित अछि।
एहि खण्डमे संवादक विवेचनात्मक प्रकृति बहुत स्पष्ट अछि। पात्र काज करैत-करैत विचार व्यक्त करैत छथि; कखनो विचार घटनाकेँ गतिमान बनबैत अछि, कखनो घटना केवल विचारक उदाहरण भऽ रहि जाइत अछि। एहि दोसर स्थिति सँ कलात्मक घनत्व किछु शिथिल होइत अछि।
पंचम खण्ड : ग्रामीण–शहरी वातावरण आ अर्थनीति
एहि छोट खण्डक आरम्भमे गाम आ शहरक वातावरणक अन्तरपर केन्द्रित कथाकारक टिप्पणी अछि। शहरक सुविधा, गामक अभाव, सामूहिकता, रोजगारी, सेवा आ नागरिक व्यवहारक बीच तुलना खुलि कए अबैत अछि। समाजक नैतिक मूल्यांकनक संग भौतिक संसाधनक जिज्ञासा एतय जुड़ैत अछि।
प्रेमक कर्जा देबाक प्रसंग, बैंकसँ धन आनबाक योजना तथा ग्रामसुधारक आर्थिक आधार एहि अंशकेँ विशेष महत्त्व दैत अछि। सहायता केवल उपदेश बनि नहि रहय; ओकर लेल वित्तीय साधन, समय, ब्याज आ व्यवस्थापन आवश्यक अछि—ई समझ एहि प्रसंगसँ स्पष्ट होइत अछि। मुदा पूँजी जुटाबय आ देयता वहन करबाक वास्तविक जोखिम कथामे जतेक विस्तार चाही ततेक नहि पबैत अछि।
ई खण्ड समग्र रचनाक कार्यक्रमात्मक अन्तःस्वरकेँ अत्यन्त स्पष्ट करैत अछि। आलोचनात्मक प्रश्न ई अछि जे समाज-सुधारक इच्छा कतेक वास्तविक संस्थागत तन्त्र बनि पबैत अछि आ कतेक नायकक उदारतापर निर्भर रहि जाइत अछि।
षष्ठ खण्ड : विदुरक प्रसंग आ विधिक संघर्ष
प्रेमक विरुद्ध दायर कएल गेल आरोप आ अदालतसँ सम्बन्धित कागज-विचार एहि खण्डक मुख्य तनाव अछि। विदुरक संग पूर्वक आत्मीयता स्मरण होइत रहैत अछि; तकर तुलना वर्तमान संदेह आ विरोधसँ भेला पर ‘विश्वासघात’क बोध बलवती होइत अछि। सरकारी डेराक स्वामित्व, नोटिस, मुकदमा आ कागजात कथाकेँ परिवारक सीमासँ बाहर सार्वजनिक संस्थाक बीच लऽ जाइत अछि।
गांगुली बाबूक रूपमे सहानुभूतिपूर्ण परामर्श आ विधिक समझदारीक एक वैकल्पिक पात्र उपस्थित अछि। ई पात्र एकतरफा दुष्ट-संसारक विरुद्ध सामाजिक भरोसाक सम्भावना जोगबैत अछि। तथापि मुकदमाक अनेक व्यावहारिक बारीकी बयानक रूपमे आयल अछि; एहिसँ विधिक वातावरण बनैत अछि, मुदा पाठककेँ दस्तावेजी विवरण आ कथात्मक रोमांचक बीच संतुलनक प्रश्न उठय लगैत अछि।
लेखकक एक विशेष आग्रह न्यायिक सत्यक जीत पर अछि। समूचा प्रकरण नायकक नैतिक प्रतिष्ठाकेँ संकटमे राखैत अछि, मुदा विरोधी पक्षक तर्कक स्वायत्तता अपेक्षाकृत कम अछि। उपन्यासक सामाजिक दृष्टि एतय सबल अछि, मनोवैज्ञानिक बहुपक्षीयता सीमित।
सप्तम खण्ड : किसानक खेत आ ग्राम्य हिंसाक संकेत
भोला बाबू, फेकू राउत आ कृषि-सम्बद्ध प्रसंग एहि खण्डक माध्यमसँ ग्रामसमाजक श्रम-सम्बन्धक एक अलग संसार खोलैत अछि। चरैत पशु, फसलक क्षति, खेतक रखवाली, दबंग व्यक्तिक व्यवहार, क्षमायाचना तथा भयक वातावरण ई देखबैत अछि जे भूमि केवल उत्पादनक साधन नहि, प्रतिष्ठा आ टकरावक केन्द्र सेहो अछि।
शारीरिक हिंसा आ दबंगईक संकेतक बावजूद कथाकार समाधानक लेल व्यक्तिगत विवेक, धार्मिक भरोसा आ व्यवहारगत सुधारपर अधिक जोर दैत छथि। एतय किसानक राजनीतिक संगठन वा सामूहिक प्रतिरोधक कल्पना अपेक्षाकृत क्षीण अछि। श्रमिकक अपना स्वरकेँ जेतेक स्वतन्त्रता भेटितैक, पाठकक वर्गीय समझ ओतेक गहीर भऽ सकित छल।
पंचम खण्डक आर्थिक प्रस्ताव आ सप्तम खण्डक कृषि-अनुभवकेँ एकसंग पढ़ला पर उपन्यासक केन्द्रीय कठिनाई प्रकट होइत अछि : सदिच्छासँ विकासक प्रारम्भ सम्भव अछि, मुदा शक्ति-सन्तुलन बदले बिना न्याय सुनिश्चित नहि होइत अछि।
अष्टम खण्ड : आरोप, दफ्तर आ प्रमाणक राजनीति
कम्पनीक सामग्री, लेखा, जाँच आ कागजक माध्यमसँ प्रेमपर संकट गहीर होइत देखाओल गेल अछि। ‘मि. खन्ना’सँ जुड़ल कार्यालयी प्रसंगमे अभियोग आ प्रतिवादक प्रक्रिया कथानककेँ यथार्थक एक नव स्तर पर लऽ जाइत अछि। प्रेमकेँ अपन बेगुनाही सिद्ध करबाक लेल प्रशासकीय भाषासँ जूझऽ पड़ैत अछि।
दफ्तरी कागजक सत्ता आ वैयक्तिक सत्यक बीच अन्तर एतय विशेष उल्लेखनीय अछि। कागज जँ तथ्यक साक्ष्य अछि तँ ओकर दुरुपयोग सम्भव अछि; एहेन दुविधा आधुनिक संस्थागत जीवनक केन्द्रीय समस्या छी। एहि कारण ई खण्ड ग्राम–नगरक साधारण तुलना सँ आगाँ बढ़ि आधुनिक कार्यालयी सत्ताक आलोचनामे परिणत होइत अछि।
मुदा नायकक निर्दोषतापर कथाकारक तीव्र आस्था कखनो नाटकीय अनिश्चितताकेँ अल्प करैत अछि। पाठक घटनाक अन्तिम निष्कर्ष सँ बेसी एतय प्रक्रिया, अपमान आ मानसिक चोटक सूक्ष्म वर्णन देखऽ चाहैत अछि।
नवम खण्ड : शिक्षित युवा, स्त्रीक इच्छा आ विवाह
कथा-केन्द्रमे नायक, कामिनी आ मि. दरबालाक प्रसंग आवैत अछि। रेल-यात्रा, पुस्तक, पढ़ाइ-लिखाइ, पेशागत सम्भावना आ आपसी संवादसँ शिक्षित शहरी समाजक भिन्न लय उपस्थित होइत अछि। कामिनीक बौद्धिक आकांक्षा तथा विवाहक प्रश्न एकटा महत्वपूर्ण स्त्री-विषयक उपकथा रचैत अछि।
एहि अंशमे प्रेमकेँ केवल भावुक आकर्षण नहि, अधिकार, सहमति, मर्यादा आ भविष्यक चयनक प्रश्नक रूपमे देखबाक अवसर अछि। कामिनी अपन इच्छा व्यक्त करैत छथि; तथापि कथाक वर्णन-व्यवस्था कतेको ठाम पुरुष पात्रक नैतिक विचारक वर्चस्व कायम रखैत अछि। स्त्रीक मानसिक द्वन्द्व जँ ओकर अपन दृष्टिसँ अधिक विस्तार पबैत, तँ उपकथा अधिक बहुआयामी होइत।
मुख्य ग्रामोद्धार-कथा सँ ई प्रेम-विषयक शाखा दूर जाइत प्रतीत होइत अछि, मुदा एकर सामाजिक उपयोग अछि : शिक्षा आ शहरी पेशा संग पारिवारिक मर्यादाक टकराव उपन्यासक मूल नैतिक बहसकेँ दोसर पीढ़ी धरि विस्तृत करैत अछि।
दशम खण्ड : परिवार, उत्सव आ निजी सम्बन्धक परीक्षा
कामिनीक जन्मदिन, आगन्तुकक मिलन आ मि. दरबालाक स्वास्थ्य-चिन्ता एहि भागक आरम्भमे घरेलू जीवनक मानवीय रङ्ग प्रदान करैत अछि। उत्सवक वातावरण एकाएक रोग आ चिन्तासँ बदलैत अछि। एहन परिवर्तन उपन्यासमे निजी जीवनक अस्थिरता आ पारस्परिक देखभालक मूल्यकेँ सोझाँ अनैत अछि।
सम्बन्धक सतही प्रसन्नता, अन्तर्निहित आशंका, गुरु–शिष्य अथवा पीढ़ीगत अधिकार आ दाम्पत्य निर्णयक कठिनाईक बीच व्यक्ति स्वयं अपन नैतिक जिम्मेदारी चुनैत अछि। एहि खण्डक संवादसभ बारम्बार आदर्श स्थापित करबाक चेष्टा करैत अछि; मुदा पात्रक मौन, संकोच अथवा आत्म-विरोधक विस्तार किछु आओर रहित तँ अनुभूति अधिक विश्वसनीय बनित।
नवम आ दशम खण्डकेँ संयुक्त रूपसँ पढ़ला पर देखल जा सकैत अछि जे लेखकक सामाजिक नैतिकता खाली सार्वजनिक जीवन धरि सीमित नहि; विवाह आ परिवार ओकर दोसर परीक्षण-भूमि अछि।
एकादश खण्ड : तीर्थ-अनुभव सँ पुनरागमन धरि
अन्तिम खण्ड बनारस, विश्वनाथ-मन्दिर, धर्म-विश्वास, प्रवास आ असहाय व्यक्तिक प्रति सहानुभूतिक प्रसंगसँ आरम्भ होइत अछि। ई धार्मिक भौगोलिकता उपन्यासक ग्राम-सीमा केँ व्यापक भारतीय सांस्कृतिक स्थलसँ जोड़ैत अछि। कष्टमे पड़ल मनुष्यक सहायता करबाक मूल्य लेखकक प्रारम्भिक मानवीय आग्रहसँ मेल खाइत अछि।
आखिरी पृष्ठसभमे प्रेम–मालती, विदुर, मणिकान्त, सुलेखा, आ पारिवारिक सम्बन्धक सूत्र पुनः एकत्र होइत अछि। नगरक व्यापार आ गामक आर्थिक सहयोगक बीच सन्तुलन बनबैत ग्रामसुधारक अभिलाषा अखन जीवित अछि। अन्त पूर्ण राजनीतिक परिवर्तनक दावा नहि करैत; ओ प्रतिदिनक व्यवहार, विश्वास आ सहायता सँ उत्पन्न आशापर टिकैत अछि।
अन्तक ई पुनरागमन अर्थपूर्ण अछि : आरम्भक यात्रा जतय गाम दिस छल, अन्तक यात्रा गामक प्रति दायित्वक पुनर्पुष्टि बनैत अछि। तथापि जटिल सामाजिक असमानता नैतिक सदिच्छासँ कतेक मिट सकैत अछि, ई प्रश्न खुलल रहैत अछि।
सामाजिक आलोचनाक प्रमुख प्रतिमान
गाम–शहर : द्वैध नहि, परस्पर निर्भरता
आरम्भिक वक्तव्य शहरक सम्पन्नता आ ग्रामक वंचनाक तीख विपर्यास रखैत अछि। मुदा कथामे प्रेमक व्यवसाय नगरमे अछि आ सुधारक लक्ष्य गाममे; आर्थिक साधन एक ठाम अर्जित होइत अछि, सामाजिक उपयोग दोसर ठाम चाहल जाइत अछि। तेँ गाम आ शहर दुश्मन संसार नहि, परस्पर निर्भर आर्थिक तन्त्रक दू छोर छथि। एहि तथ्यसँ उपन्यासक घोषित नैतिक द्वैत अधिक जटिल बनि जाइत अछि। शहरकेँ केवल लोभक केन्द्र मानब आ गामकेँ केवल पवित्र सामूहिकता मानब—दुनू अत्युक्ति होएत; पाठक स्वयं एहि दू अवधारणाक बीच तनावक साक्षी बनैत अछि।
प्रेमक यात्रासभ केवल स्थानान्तरण नहि, सामाजिक चेतनाक आवागमन छथि। रेल-स्टेशन, होटल, दफ्तर, खेत आ आँगन एकरे कथाक्षेत्रक भिन्न-भिन्न मंच छथि। एहि दृश्य-परिवर्तनसँ लेखक आधुनिक मिथिलाक विस्थापन, प्रवासी आजीविका आ ग्रामक अधूरा सुविधासभक चित्र तैयार करैत छथि।
वर्गीय दायित्व, दान आ संरचनात्मक परिवर्तन
प्रेमक परोपकार अत्यन्त सदिच्छापूर्ण अछि। तथापि आर्थिक समर्थक हाथसँ सहायता पाबि रहल पात्रक स्थिति लेखकक आदर्शवादक आलोचनात्मक परीक्षण माँगैत अछि। जँ गांवक परिवर्तन एक समर्थ नायकक ऋण, सेवा, उपदेश अथवा नैतिक प्रेरणापर निर्भर अछि, तँ ग्रामवासीक स्वाधीन सामाजिक शक्ति कतेक विकसित होइत अछि? एहि उपन्यासक वर्गीय प्रश्न एतहि स्थित अछि।
ग्राम-विकासमे कर्जाक भूमिका, किसानक जोखिम, फसलक सुरक्षा, विद्यालयक उपलब्धता आ न्यायिक पहुँच परस्पर गाँथल प्रश्न छथि। एहि कारण सुधार केवल व्यक्तिगत पुण्यक फल नहि भऽ सकैत; सामूहिक निर्णय, पारदर्शी वित्त, न्यायिक सुरक्षा आ स्थानीय संस्थागत जवाबदेहीक जरूरत अछि। एहि मापदण्डपर लेखकक कल्पना प्रेरक होइतो किछु ठाम अपूर्ण देखाइत अछि।
जाति, धर्म आ सामाजिक पदानुक्रम
लेखकीय वक्तव्य जातिगत विद्वेष आ साम्प्रदायिक संकीर्णताक प्रतिरोधक स्पष्ट आकांक्षा दैत अछि। उपन्यासमे पुरोहित, सम्पन्न ग्रामीण, शिक्षक आ कृषकक सह-अस्तित्व समाजक पदानुक्रमक झलक उपस्थित करैत अछि। मुदा जातिक अनुभव पीड़ित पात्रक अपना स्मृति, भाषा आ संघर्षक रूपमे व्यापक स्थान नहि पबैत अछि। सामाजिक सद्भावक उपदेश आ जातिव्यवस्थाक शक्ति-विश्लेषण एक वस्तु नहि। एहि अन्तरक स्वीकारसँ कृतिक मानवीय अभिप्राय छोट नहि होइत, बल्कि ओकर ऐतिहासिक सीमाक पहचान होइत अछि।
न्यायपालिका आ दस्तावेजी सत्य
मुकदमा, नोटिस, शपथपत्र, दफ्तरक सामान, अभियोग आ प्रमाण सम्बन्धी प्रसंग आधुनिक सामाजिक यथार्थक महत्त्वपूर्ण पक्ष छथि। आर्थिक शक्तिक असमानता केवल खेतमे नहि, अदालत आ कार्यालयमे सेहो निर्णायक भऽ सकैत अछि। प्रेम पर लगल आरोपक प्रसंगमे उपन्यास व्यक्तिगत प्रतिष्ठाक टूटन आ संस्थाक निष्पक्षताक प्रश्न उठबैत अछि। तथापि अदालतक कथा प्रक्रियागत जटिलता सँ परिचित करैत काल कखनो अत्यधिक व्याख्यात्मक बनि जाइत अछि।
स्त्री-पात्र : सहचरितासँ स्वायत्तताक संघर्ष
मालती घरेलू संसार, सामाजिक सहायताक व्यवहार आ प्रेमक मानसिक बलक महत्त्वपूर्ण केन्द्र अछि। सुलेखा आ सुनीता परिवारक भीतर अपन सम्बन्ध-सम्पदा लऽ अबैत छथि। कामिनीक प्रसंग शिक्षा, पेशागत पहचान आ वैवाहिक चयनक प्रश्न जोड़ैत अछि। एहि व्यापक उपस्थिति बावजूद अधिकांश निर्णायक सार्वजनिक योजना पुरुष पात्रक नियन्त्रणमे रहैत अछि; ई उपन्यासक लैंगिक सीमा अछि।
विशेषतः कामिनीक प्रसंग देखबैत अछि जे शिक्षित स्त्रीक आकांक्षा केवल विवाहक वस्तु नहि, अपन इच्छा आ भविष्यक दावेदार अछि। तथापि ओकर स्वायत्तताकेँ कथावाचक जतेक अवकाश दैत छथि, ताहिसँ बेसी अवकाशक संभावना बनल रहैत अछि। पितृसत्तात्मक सम्बन्धक आलोचना उपन्यासक भीतर सँ सम्भव अछि; एकरा बाह्य सिद्धान्त थोपबाक आवश्यकता नहि।
कथन-शिल्प, संवाद, भाषा आ शीर्षक-प्रतीक
बहुकेंद्रीय कथाविन्यासक शक्ति आ कठिनाई
दीर्घ आख्यानक पहिल उपलब्धि एकर बहुविस्तृत कथा-समाज अछि। प्रेम–मालतीक केन्द्र सँ विदुर, मणिकान्त–सुलेखा, ग्राम-पुरोहित, किसान, कार्यालयी जन, नायक–कामिनी आ तीर्थयात्रीक वृत्त धरि बढ़ैत कथा अलग-अलग सामाजिक ठाम जोड़ैत अछि। मुदा एक पात्रसँ दोसर पात्रक जीवनमे संक्रमण सभ ठाम समशक्तिशाली नहि। किछु उपकथा मुख्य विकास-रूपरेखा सँ दूर जा कए स्वतन्त्र नैतिक उपन्यास जकाँ लागैत अछि।
क्रमांकित खण्ड समग्र पाठकेँ पाठकीय विराम दैत अछि। कतहु खण्डक अन्त तत्कालिक भावनात्मक निष्कर्ष बनैत अछि, कतहु नवी कथा बिना पर्याप्त पूर्वसंकेतक उभरैत अछि। एहि संरचनाक सफल पक्ष जीवनक व्यापक दृश्य अछि, असफल पक्ष ढीलापन आ कथागत पुनरावृत्ति।
संवाद-प्रधान गद्य : जीवन्त बोली वा प्रवचन?
संवादसभ पात्रक पारस्परिक समीपता स्थापित करैत अछि। प्रश्नोत्तर, सम्बोधन, क्षमायाचना, सलाह आ आश्वासन मार्फत पाठक ग्रामीण आ शहरी व्यवहारक अनेक रङ्ग पबैत अछि। मुदा कएक स्थानपर संवाद व्यक्तिक स्वभाव सँ बेसी लेखकक नैतिक मतक वाहक होइत अछि। एहेन स्थिति मे पात्रक आवाज एक-दोसरासँ पर्याप्त पृथक नहि रहि पबैत। ई बात विशेषतः प्रेमक समाज-सुधार सम्बन्धी भाषण आ किछु विवाद-निराकरण प्रसंगपर लागू होइत अछि।
नैतिक विचारकेँ कथा-बिन्दु बनयबाक उपन्यासक अपन परम्परा अछि। मुदा उपन्यासक कलात्मकता त्यखन बढ़ैत अछि जखन विचार पात्रक कर्म, असफलता, संकोच अथवा गलत निर्णयसँ स्वतः उत्पन्न हो। ‘अनठिया कुकुर’मे सफल प्रसंग ओ छथि जतय आर्थिक निर्णयक वास्तविक परिणाम देखाइत अछि; अपेक्षाकृत कमजोर प्रसंग ओ छथि जतय कथानक परिणाम कहबाक बदला अभिप्रेत सदाचार समझाबऽ लगैत अछि।
भाषिक स्तर आ सम्पादन-संभावना
पाठमे बोलचालक मैथिली, सामाजिक सम्बोधन, कार्यालयी शब्दावली, रेल–दफ्तर सम्बन्धी आधुनिक पद आ धार्मिक शब्दभण्डार एक संग उपस्थित अछि। एतयसँ कृतिक सामाजिक संसारक विविधता बढ़ैत अछि। संगहि एहन बहुभाषिक शब्दावलीक एकसमान वर्तनी आ विराम-चिह्न पाठक-सुगमताक लेल आवश्यक अछि। भविष्यक समालोचित संस्करणमे पात्रनाम, संवाद-चिह्न, प्रसंग-विभाजन आ तकनीकी पदक रूपक सम्पादकीय एकरूपता उपयोगी रहत।
भाषाक जीवन्तता ओकर स्थानीय लहजासँ बनैत अछि। सम्पादनक लक्ष्य एहि लहजाकेँ हिन्दी अथवा कोनो बाह्य मानकीकरणमे विलीन करब नहि, बल्कि लेखकक अपन मुहावरा आ पात्रगत स्वरकेँ स्पष्ट रूपमे पाठक धरि पहुँचायब होयबाक चाही।
‘अनठिया कुकुर’ शीर्षकक अर्थ-संभावना
शीर्षकमे ‘कुकुर’क बिम्ब सामाजिक व्यवहारक रूपक बनि सकैत अछि। लेखकक आरम्भिक वक्तव्य शहरक आकर्षण, स्वार्थक लपेट, ग्राम-सम्बन्धक क्षरण आ अवसरवादक चिंता व्यक्त करैत अछि; कथा मे सेहो विश्वासभंग, लूट, छल आ सार्वजनिक प्रतिष्ठाक संकट उपस्थित अछि। एहि प्रसंगसभक आलोकमे शीर्षककेँ समाजक अनियन्त्रित स्वार्थक व्यंग्यात्मक चिह्नक रूपमे पढ़ब सम्भव अछि।
मुदा एकरे एकमात्र निश्चित व्युत्पत्ति अथवा कथाभितरक कोनो एक पात्रक नामकरण मानि लेब अनुचित होएत। शीर्षकक रूपकात्मक शक्ति एहि कारणो महत्त्वपूर्ण अछि जे कृति सरल पशु-कथा नहि, मानवीय सम्बन्धक नैतिक संघर्ष प्रस्तुत करैत अछि।
मैथिली बाल-साहित्यक परम्परामे तुलनात्मक स्थिति
बालक उपस्थिति, विद्यालयक चर्चा वा शैक्षिक सुधारक उद्देश्य मात्रसँ कृति बाल-साहित्य नहि बनैत अछि। बाल-साहित्यक पाठक-समुदाय, कथात्मक दृष्टिबिन्दु, भाषिक गति, कल्पनाशीलता, आयु-अनुरूप जटिलता तथा अनुभवक केन्द्रकेँ पृथक देखबाक आवश्यकता अछि। ‘अनठिया कुकुर’मे दीर्घ मुकदमा, व्यावसायिक ऋण, भूमि-विवाद, दाम्पत्य आ वयस्क प्रेमक जटिलता मुख्य कथात्मक तत्त्व छथि। एहि कारण एकर प्राथमिक पाठक-वर्ग वयस्क सामाजिक उपन्यासक पाठक छथि।
विदेहक ‘शिशु उत्सव’ संग्रह-व्यवस्थासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे मैथिली बाल-साहित्य एकमात्र नीतिकथा तक सीमित नहि। ओतय शिशुगीत, बाल-कविता, विहनि कथा, चित्रकथा, बाल-उपन्यास, नाटक, विज्ञानक लोकप्रिय प्रस्तुति आ अनुवादित चित्रात्मक पोथीक भिन्न-भिन्न विधानक सूची उपलब्ध अछि। एहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे मैथिलीमे बालक लेल रचनाक भिन्न परम्परा डिजिटल स्तरपर परस्पर तुलनीय रूपेँ संकलित कएल जा रहल अछि।
विदेहक सूचीमे प्रीति ठाकुरक अनूदित ‘छोट आ पैघ’क पहिल संस्करण २००२ तथा ‘माल-जाल आ जानवर दिस देखू’क पहिल संस्करण २००३ उल्लिखित अछि। ‘गोनू झा आ आन मैथिली चित्रकथा’ (२००८), ‘मैथिली चित्रकथा’ (२००९), ‘मिथिलाक लोकदेवता’ (२०१०) आ ‘विद्यापतिक पुरुष परीक्षा’ (२०१२)क सूची चित्रकथा, लोकस्मृति आ शास्त्रीय कथाक बाल-रूपान्तरणक क्रमक निदर्शन दैत अछि। ई काल-चिह्न सम्बन्धित सूची-प्रविष्टिक छथि; एकर आधारपर समूचा मैथिली बाल-साहित्यक प्रथमत्व वा सम्पूर्ण कालक्रम निर्धारित नहि कएल जा सकैत अछि।
जगदीश प्रसाद मण्डलक ‘नै धाड़ैए’ आ जगदानन्द झा ‘मनु’क ‘चोनहा’ केँ विदेह बाल-उपन्यासक रूपमे चिन्हित करैत अछि; नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’क ‘स्वर्ण कमल’ सेहो स्पष्टतः बाल-उपन्यासक रूपमे अंकित अछि। एकरे उलट ‘अनठिया कुकुर’ सामान्य उपन्यासक वर्गमे अछि। एतय सभसँ विश्वसनीय तुलनात्मक तथ्य विषयक समानता नहि, ग्रन्थ-सूचीमे स्पष्ट विधागत विभाजन अछि। ‘स्वर्ण कमल’ सँ रचनाकारक बाल-पाठकक प्रति रुचि प्रमाणित होइत अछि; ‘अनठिया कुकुर’ सँ ओही लेखकक वयस्क सामाजिक आख्यानक विस्तार।
नीता झाक ‘बिलाइ मौसी’ बाल-लघुकथा-संग्रह, मुन्नाजीक ‘तीन टा बाल नाटक’ तथा प्रीति ठाकुरक चित्रकथा-अभियान बाल-पाठकक लेल विधागत विविधता दर्शबैत अछि। एहि उदाहरणसभक विशिष्ट कथा-चरित्र अथवा भाषिक गुणवत्तापर एतय निश्चित निर्णय नहि देल जाइत अछि, कारण तुलना लेल प्रकाशित ग्रन्थ-सूची साक्ष्य अछि, ओहि समस्त मूल पोथीक पंक्तिवार तुलनात्मक पाठ नहि। तथापि परम्पराक वर्णनक लेल एहि विधागत तथ्यक उपयोग वैध अछि।
बाल-साहित्यक इतिहास लिखबाक समय लोकखिस्सा, मौखिक संस्कार, शिशुगीत, विद्यालयी साहित्य, बाल-उपन्यास आ डिजिटल चित्रकथाकेँ एकरे रेखीय विकासक रूपमे देखब पर्याप्त नहि। एहि सभ विधाक पाठक-आयु, पाठ-संस्कृति, वितरण आ कलात्मक अपेक्षा अलग छथि। ‘अनठिया कुकुर’क ग्रामीण शिक्षाक आग्रह बालक सामाजिक परिस्थितिसँ संवाद स्थापित करैत अछि; मुदा विधागत आधारपर ई बाल-साहित्यक इतिहासक मुख्य वस्तु नहि, ओकर पड़ोसी सामाजिक गद्यक अध्ययन-वस्तु अछि।
रचनाकारक अन्य कृतिसभक सापेक्ष स्थिति
विदेहक पोथी-सूचीमे ‘गामघर’ कथा-संग्रह, ‘सुजाता’, ‘गुदरीक लाल’, ‘सुकन्या’ उपन्यास, ‘आडम्बर’ कथा-संग्रह, ‘दिल्लीक पार्क’ शब्द-चित्र, ‘परिवार’ संस्मरणात्मक उपन्यास आ ‘स्वर्ण कमल’ बाल-उपन्यास रूपमे उल्लिखित अछि। एहि सूचीसँ रचनाकारक गद्य-विधागत विस्तृति ज्ञात होइत अछि। ‘अनठिया कुकुर’क शहरी–ग्रामीण आवागमन, परिवार, रोजगार आ नैतिक संघर्षक रुचिकेँ एहि व्यापक रचनाकार-परिप्रेक्ष्यमे रखब उपयोगी अछि।
मुदा पोथीक शीर्षकसँ मात्र विषयक समानता वा प्रभावक सिद्धान्त सिद्ध नहि होइत। उदाहरणार्थ ‘गामघर’ शीर्षक ग्राम्य विषयक सङ्केत दैत अछि, मुदा मूल कथा पढ़ने बिना ओकर पात्रक स्वभाव आ ‘अनठिया कुकुर’क संग ठोस साम्य घोषित नहि कएल जा सकैत अछि। आलोचनामे अनुमानक ई सीमा स्वीकार करब आवश्यक अछि। एहि शोध-निबन्धक निष्कर्ष ‘अनठिया कुकुर’क प्रत्यक्ष मुद्रित पाठपर अधिक, लेखकक आन कृतिसँ तुलनाक सन्दर्भमे विदेहक सत्यापित ग्रन्थ-सूचीपर आधारित अछि।
आलोचनात्मक मूल्यांकन : उपलब्धि आ सीमा
कृतिक पहिल उपलब्धि कथाकारक व्यापक सामाजिक चिन्ता अछि। प्रेम आ मालतीक परिवारक निजी जीवन समस्त कथा नहि; ओकर विस्तार गरीब किसान, शिक्षक, पुरोहित, शहरी कर्मचारी, अभियुक्त, वकील–न्यायालय, शिक्षित युवती आ धार्मिक तीर्थयात्री धरि अछि। एहि सामाजिक विस्तारमे मैथिल जीवनक आर्थिक आ नैतिक प्रश्न परस्पर सम्बन्धित बनैत अछि।
दोसर उपलब्धि ग्रामसुधारक प्रश्नकेँ केवल भावुक संवेदनासँ आगाँ आर्थिक लेन-देन, रोजगार, कर्ज, भूमिक विवाद आ न्यायिक सुरक्षासँ जोड़ब अछि। एहि कारण उपन्यासक यथार्थदृष्टि अनेक ठाम ठोस होइत अछि। तेसर उपलब्धि संवादक सहज प्रवाह अछि, जे पात्रसभक परस्पर घनिष्ठता आ विश्वासक टूटन पाठककेँ अनुभव करबैत अछि।
कृतिक महत्त्वपूर्ण सीमा नैतिक आदर्शवादक आवृत्ति अछि। प्रेमक सदाशयता कखनो अतेक निर्णायक होइत अछि जे दोसर पात्रक प्रेरणा आ असमंजसक स्वतंत्र गहराइ कम भऽ जाइत अछि। खल-वृत्तिक पात्रक मानस जँ अपेक्षाकृत अधिक खुलित, तँ सामाजिक संघर्ष नाटकीय विरोधाभाससँ समृद्ध होइत।
दोसर सीमा कथाकेन्द्रक असमानता अछि। मुख्य ग्राम–नगर धुरी सँ पृथक युवा-प्रेमक शाखा अपन मूल्य राखितो कथा-विन्यासमे अपेक्षित संगति माँगैत अछि। तेसर सीमा स्त्री-पात्रक सीमित निर्णायक स्थान अछि। मालती आ कामिनी महत्त्वपूर्ण छथि, मुदा बहुत रास सामाजिक परिणाम पुरुषक प्रस्ताव आ निर्णयक आसपास संगठित रहैत अछि। चारिम सीमा सामाजिक संरचनाक समाधानमे व्यक्तिगत उदारता पर अत्यधिक भरोसा अछि।
एहि सभ आलोचनाक बादो ‘अनठिया कुकुर’ केँ केवल उपदेशात्मक गद्य कहि खारिज करब अन्याय होएत। एहि पोथीक लोकजीवन, भाषिक परिवेश, परिवारक सम्बन्ध, आधुनिक दफ्तरक संकट आ ग्रामोद्धारक ईमानदार इच्छा मैथिली सामाजिक उपन्यासक चर्चामे विशिष्ट प्रश्न उपस्थित करैत अछि। साहित्यिक मूल्यांकनक काम एहि सामाजिक अभिलाषाक सम्मान करैत ओकर कलात्मक निर्वाहक कठोर परीक्षण करब छी।
निष्कर्ष
‘अनठिया कुकुर’ एकटा सामाजिक उत्तरदायित्व केन्द्रित मैथिली उपन्यास अछि, जकर कथात्मक प्रेरणा गाम–शहरक दूरीकेँ मानवीय सहयोगसँ पाटबाक विश्वासमे स्थित अछि। प्रेम–मालतीक जीवन, विदुरक संग सम्बन्धक विचलन, किसानक असुरक्षा, कागजी न्याय आ युवापीढ़ीक भावनात्मक संघर्ष उपन्यासक अलग-अलग बहस नहि; सभ मिलि प्रश्न करैत अछि जे आधुनिक समाजमे भरोसा, मर्यादा, धन आ न्यायक सम्बन्ध केहन हो।
ई कृति बहुत किछु व्यक्तिक नैतिक सुधरसँ प्राप्त करबाक आशामे लिखल गेल प्रतीत होइत अछि। सामाजिक दृष्टिसँ ई आशा महत्त्वपूर्ण अछि; साहित्यिक दृष्टिसँ इएह एकर सीमा सेहो बनि जाइत अछि, जखन जटिल संरचनात्मक परिस्थिति सहज सद्भावक निष्कर्षमे बदलि जाइत अछि। उपन्यासक वास्तविक योगदान एहि विरोधाभासक संग पढ़लापर बेसी स्पष्ट होइत अछि।
मैथिली बाल-साहित्यक विकासक सन्दर्भमे एकर स्थान सीधा बाल-उपन्यासक नहि, बल्कि ओहि वयस्क सामाजिक साहित्यक अछि जे शिक्षाक अवसर आ बालक भविष्यक परिस्थिति पर गम्भीर प्रश्न उठबैत अछि। लेखकक ‘स्वर्ण कमल’क विधागत पृथक पहचान एकरा आरो स्पष्ट करैत अछि। एहेन भेद राखि कए कएल गेल अध्ययन साहित्येतिहास आ पाठालोचन दुनू लेल अधिक विश्वसनीय होइत अछि।
