लेखक: गजेन्द्र ठाकुर | शोध-आलेख
लोककथा, बाल-चेतना आ न्याय-बोधक विस्तृत मैथिली आख्यान
नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’क ‘स्वर्ण-कमल’ (२०१९) मैथिली बाल-उपन्यासक ओहि रचनात्मक धाराक प्रतिनिधि कृति अछि जाहिमे परम्परागत राजकुमार-कथा, चमत्कारप्रधान लोककल्पना, पारिवारिक कथावाचन आ आधुनिक उपन्यासक क्रमिक घटनाविन्यास एक-दोसरसँ मिलैत अछि। उपन्यासक एक स्तरपर प्रफुल्ल आ अन्य नेनासभ अपन बाबीसँ खिस्सा सुनैत छथि; दोसर स्तरपर राजकुमार सुजीत उत्तराधिकार-संघर्ष, दरबारी षड्यन्त्र, वनयात्रा, गुरु-सहायता, स्वर्ण-कमलक प्राप्ति, राक्षसक आतंक आ राज्यक पुनर्स्थापनाक कठिन क्रमसँ गुजरैत छथि। मूल कृतिक उद्धरण मुद्रित पृष्ठसँ देल गेल अछि। विश्लेषणक निष्कर्ष ई अछि जे ‘स्वर्ण-कमल’क सबसँ स्थायी योगदान केवल आदर्श वीरक विजयमे नहि, बल्कि मैथिलीमे दीर्घ साहसिक आख्यानक सृजन आ बाबीक मौखिक कथा-संस्कृति केँ पाठकक सक्रिय जिज्ञासासँ जोड़बाक प्रयासमे निहित अछि। एकर सीमा नायकक आदर्शीकरण, स्त्री-पात्रक विषम सक्रियता, आ राजनीतिक न्यायकेँ राजवंशीय समाधानमे समेटि देबाक प्रवृत्तिमे अछि।
मैथिली बाल-साहित्य; स्वर्ण-कमल; नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’; लोककथा; बाल-उपन्यास; कथावाचन; राजसत्ता; नैतिकता; बाल-पाठक; प्रतीक; आख्यान-विज्ञान।
प्रस्तावना : कृतिक साहित्यिक प्रश्न
बाल-साहित्य केँ प्रायः सरल मनोरञ्जन, सदाचारक शिक्षा अथवा विद्यालयक पूरक पाठ मानि लेल जाइत अछि। मुदा श्रेष्ठ बालकथा बालक केँ सामाजिक सम्बन्ध बुझबाक, भयक सामना करबाक, अन्याय देखबाक आ अपन निर्णय बनयबाक कल्पनात्मक अवसर दैत अछि। एहि दृष्टिसँ ‘स्वर्ण-कमल’क मूल्यांकन करबाक समय केवल ई प्रश्न पर्याप्त नहि जे राजकुमार विजय पबैत छथि कि नहि। प्रश्न ई सेहो अछि जे हुनक विजयक नैतिक अर्थ की अछि; कथावाचिका बाबी आ श्रोता नेनासभक सम्बन्ध ओहि अर्थक निर्माण कोना करैत अछि; आ चमत्कार, साहस, राजनीतिक शक्ति तथा क्षमा एक-दोसरसँ कोना जुड़ैत अछि।
कृतिक प्रारम्भ घरेलू आ परिचित जगतमे होइत अछि, जाहिसँ राजमहलक अपरिचित संसारधरि यात्रा आरम्भ होइत अछि। प्रफुल्लक बाबी केवल कथा सुनौनिहार नहि; ओ अनुभवक परम्परा, परिवारक स्मृति आ भाषा-संस्कारक प्रतिनिधि छथि। एही कथाचौखटमे राजकुमार सुजीतक साहसिक जीवन प्रवेश करैत अछि। दू संसारक एहि आवागमनसँ मैथिली बालकक घरेलू भाषिक अनुभवक भीतर विस्तृत कल्पनासंसार आकार ग्रहण करैत अछि।
ई अध्ययन तीनटा परस्पर सम्बद्ध प्रतिपादन आगाँ रखैत अछि। पहिल, उपन्यासक रचना मौखिक लोककथा आ विस्तृत लिखित आख्यानक संगम थिक। दोसर, राजकुमारक संघर्षक केन्द्र केवल व्यक्तिगत सत्ता-प्राप्ति नहि, बल्कि नैतिक पात्रताक परीक्षण अछि; तथापि उत्तराधिकार-आधारित राजधर्म ओकर वैचारिक सीमा बनल रहैत अछि। तेसर, कथा-श्रोताक जिज्ञासा आ बाबीक हस्तक्षेप बाल-पाठक केँ सक्रिय बनबैत अछि, मुदा अनेक स्थानपर पूर्वनिर्धारित उपदेश ओकर स्वायत्त अर्थनिर्माणक अवकाश घटबैत अछि।
बाल-उपन्यासक परिचय आ रचनात्मक स्वरूप
‘स्वर्ण-कमल’क लेखक नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’ छथि। कृतिक प्रकाशन २०१९ मे गोसाउनि बैद्यनाथ स्मृति मंच, उपरदाहा, जिला दरभंगासँ भेल। शीर्षकीय विवरणमे एकरा स्पष्ट रूपेँ मैथिली बाल-उपन्यास कहल गेल अछि। पुस्तकक मुद्रित मूल्य १५० टाका अछि। आरम्भिक पृष्ठसभमे योगानन्द झाक समीक्षात्मक भूमिका, लेखकक वक्तव्य आ तकर बाद मुख्य कथा उपस्थित अछि (मिश्र, २०१९: ३–१९)।
मुख्य कथा मुद्रित पृष्ठ १९ सँ १०२ धरि दस क्रमांकित खण्डमे विभक्त अछि। खण्डसभक आरम्भ क्रमशः पृष्ठ १९, ३०, ३८, ४४, ५४, ६१, ६७, ८४, ८९ आ ९४ सँ होइत अछि। एतय पृष्ठ-सन्दर्भ सदिखन पुस्तकक मुद्रित पृष्ठक सूचक अछि। प्रत्येक खण्डक स्वतन्त्र चर्चा करैत काल केवल घटनाक सार देबाक बदला ई जाँचल गेल अछि जे कोन नव सूचना, नैतिक प्रश्न, पात्र-स्थिति अथवा कथात्मक मोड़ उत्पन्न होइत अछि।
तुलनात्मक विवेचनक आधार मूल कृतिक भूमिका, मैथिली बाल-साहित्यक प्रकाशित इतिहासपर उपलब्ध अध्ययन, साहित्य अकादेमीक प्रामाणिक पुरस्कार-अभिलेख आ लोककथाशास्त्र तथा बाल-साहित्य-आलोचनाक मान्य ग्रन्थ छथि। जहिना प्रॉपक प्रकार्य-आधारित पद्धति कथाक बाहरी गठन बुझयमे सहयोग करैत अछि, तहिना निकोलायेवाक चरित्र-आलोचना पात्रक सक्रियता आ विकासक प्रश्न खोलैत अछि। ई सैद्धान्तिक सन्दर्भ व्याख्याक उपकरण छथि; कृतिक प्रत्यक्ष स्रोत अथवा लेखकक घोषित प्रेरणा नहि।
मैथिली बाल-साहित्यक परम्परा आ ‘स्वर्ण-कमल’क ऐतिहासिक स्थान
मिथिलामे बालकक कथासंसार मुद्रित पुस्तकसँ बहुत पहिनेसँ परिवार आ लोकजीवनमे सक्रिय रहल अछि। दादी-नानीक खिस्सा, पशु-पक्षीक व्यवहारकथा, गोनू झाक चातुर्य, राजा-रानीक आख्यान, लोकदेवता, राक्षस, जादुई साधन आ नैतिक दृष्टान्त सामूहिक स्मृतिक माध्यमसँ चलि आबि रहल छथि। एही मौखिक पूँजीक किछु अंश लिखित साहित्यक विविध रूपमे प्रविष्ट भेल। तथापि मौखिक खिस्सा आ उपन्यास एक नहि छथि: उपन्यास विस्तृत चरित्र-जाल, क्रमविकसित द्वन्द्व, स्थगित समाधान आ पाठकक दीर्घकालिक सहभागिताक अपेक्षा करैत अछि।
देवशंकर नवीन मैथिली बाल-साहित्यक ऐतिहासिक रूपरेखामे ‘शिशु’ (१९४९), ‘धीया-पूता’ (१९५६), ‘बटुक’ (१९६१), ‘नेना-भुटका’ (१९९६) आ ‘बाल मिथिला’ (१९९८) सन बाल-पत्रिकाक चर्चा करैत छथि। ओ मातृभाषामे शिशु-शिक्षा, बाल-पत्रिकाक सीमित प्रसार आ साहित्यिक पत्रिकासभमे बाल-रचनाक स्थानपर ध्यान केन्द्रित करैत छथि (नवीन, प्रकाशन-विवरण अनुपलब्ध)। ई इतिहास बतबैत अछि जे मैथिलीमे बालक लेल लिखब निश्चय निरन्तर रहल, मुदा संस्थागत प्रकाशन आ पाठकीय पहुँचक समस्या सेहो बनल रहल।
‘स्वर्ण-कमल’क आरम्भिक भूमिकामे ‘इजोती रानी’ आ रामदेव झाक बाल-उपन्यास-प्रयासक उल्लेख अछि। भूमिकाकार एहि कृति केँ मैथिलीमे लोककथासँ विस्तृत बाल-आख्यान बनयबाक पूर्ववर्ती उदाहरणक रूपमे प्रस्तुत करैत छथि (योगानन्द झा, ‘मैथिली बाल उपन्यास : स्वर्ण-कमल’, मिश्र, २०१९: ५–६)। एहिसँ ‘स्वर्ण-कमल’ केँ कोनो निर्वातमे उत्पन्न कृति मानबाक बदला एकटा विद्यमान साहित्यिक प्रयत्नक उत्तरवर्ती चरणक रूपमे बुझल जा सकैत अछि।
तुलना करैत समय सन्दर्भक सीमाक ध्यान रखब जरूरी अछि। ‘इजोती रानी’क विस्तृत कथानकक प्रत्यक्ष पाठ एतय तुलनाक विषय नहि बनल; अतः दुनू कृतिक ‘समान कथावस्तु’ अथवा प्रत्यक्ष प्रभावक निर्णय नहि देल जा सकैत अछि। साम्य केवल व्यापक विधागत स्तरपर देखल जा सकैत अछि—राजकुमारक अभियान, नैतिक चुनौती आ लोककल्पनाक प्रयोग। एहि विश्लेषणक मुख्य पाठ ‘स्वर्ण-कमल’ स्वयं अछि।
साहित्य अकादेमीक २०२३क बाल साहित्य पुरस्कारक मैथिली अनुशंसित कृतिसूचीमे ‘स्वर्ण कमल’ केँ नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’क २०१९क ‘उपन्यास’ रूपमे स्थान देल गेल। ओहि सूचीमे ‘गुलरी’क संग ई दोसर उपन्यास छल; पुरस्कार ‘ओल कतरा, झोल कतरा’क लेखक अक्षय आनन्द ‘सन्नी’ केँ देल गेल (साहित्य अकादेमी, २०२३)। एहि अभिलेखक अर्थ कृतिक संस्थागत विचारार्थ उपस्थिति थिक, पुरस्कार-प्राप्ति नहि।
मैथिली बाल साहित्य पुरस्कारक पूर्ववर्ती सूचीमे रामदेव झाक ‘हँसनी पान आ बजंता सुपारी’ (२०१५) आ अमलेन्दु शेखर पाठकक ‘लालगाछी’ (२०१७) उपन्यासक रूपमे अंकित छथि; २०१८ मे वैद्यनाथ झाक ‘खिस्सा सुनू बौ’ कथा-संग्रहक पुरस्कार मिलल। ई तथ्य रचनात्मक विविधताक संकेत करैत अछि: एक दिशामे मौखिक कथनक परम्परा, दोसर दिशामे उपन्यासक विस्तृत आन्तरिक संसार। ‘स्वर्ण-कमल’ एहि दुनू धाराक संगमबिन्दुपर राखल जा सकैत अछि (साहित्य अकादेमी, बाल साहित्य पुरस्कार सूची)।
कथानकक समग्र विन्यास : घरेलू खिस्सासँ राज्यक संघर्ष धरि
उपन्यासक पहिल संसार प्रफुल्लक परिवारक अछि। बाबी अपन अनुभव, अनुशासन आ ममताक माध्यमसँ परिवारमे विशेष स्थान रखैत छथि। नेनासभ ओकरा घेरि कथा सुनबाक प्रतीक्षा करैत अछि। खिस्सा आरम्भ होइत अछि, बीचमे विराम अबैत अछि, आ अगिला दिन नूतन प्रश्नसँ कथा पुनः चलैत अछि। एहि आवृत्तिसँ पुस्तकक खण्डविभाजन प्राकृतिक कथावाचनक रीति प्राप्त करैत अछि।
भीतरक कथाक नायक राजकुमार सुजीत छथि। उत्तराधिकार आ राजपरिवारक विरोधक कारण हुनका राजमहलसँ दूर होमय पड़ैत अछि। नयनावतीक महत्त्वाकांक्षा, शमशेर सिंह आ जालिम सिंहक अवसरवाद तथा सुमेरगढ़क राजकीय संकट कथाक राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार करैत अछि। वन आ अनजान प्रदेशमे सुजीत केँ अपरिचित लोक पर विश्वास करबाक, संकटसँ लड़बाक आ अपन पहिचान गुप्त रखबाक आवश्यकता होइत अछि।
सर-सुल्तानक आश्रय, महात्माक मार्गदर्शन आ स्वर्ण-कमलक प्राप्ति राजकुमारक यात्राक विभिन्न चरण छथि। कल्लू राक्षसक आतंक आ श्रीधरपुरक प्रसंग निजी राज्य-संघर्षक बाहर पीड़ित लोकक रक्षा करबाक नैतिक आयाम जोड़ैत अछि। विशाखा राक्षसक अतीतक किछु सूत्र खोलैत छथि। पछिला भागमे भवानीशंकर आ कलानाथ सन पात्रसभक माध्यमसँ गुप्त सूचना, लोकसमर्थन आ राजनीतिक पुनर्गठनक प्रश्न प्रबल होइत अछि। अन्ततः सुजीतक पहिचान, सुमेरगढ़क अभियान, मिलन आ सम्बन्धसभक पुनर्व्यवस्था कथाकेँ समाप्ति दिस लऽ जाइत अछि।
ई सम्पूर्ण कथाविन्यास वृत्ताकार अछि। बाबी आ नेनासभक निकट आरम्भ भेल कथा राजकीय संकटमे विस्तार पबैत अछि आ फेर श्रोता नेनासभ लग घुरैत अछि। कथाक अन्तिम मूल्य एहि बातमे निहित अछि जे बालक केवल परिणाम नहि सुनैत अछि, परिणामक नैतिक अर्थक सम्बन्धमे अपन प्रश्न सेहो करैत अछि।
दसू खण्डक पृथक पाठविश्लेषण
पहिल खण्ड : बाबीक कथासंसार आ पाठकक प्रवेश
पहिल पृष्ठक आरम्भिक वाक्य—“आइ प्रफुल्ल आदि नेना सभक मन बड़ प्रफुल्लित छलनि” (मिश्र, २०१९: १९)—नायक राजकुमार नहि, बल्कि कथा सुनबाक लेल तैयार बच्चासभक सामूहिक मनःस्थितिक चित्र अछि। एतय ‘प्रफुल्ल’ नाम आ ‘प्रफुल्लित’ विशेषणक निकटता भाषाक हलुक खेल उत्पन्न करैत अछि। लेखक पाठक केँ पहिने श्रोता-मण्डलीक परिचय दैत छथि; साहसिक कथा तकर बाद आरम्भ होइत अछि।
प्रफुल्लक बाबीक व्यक्तित्व आर्थिक साधारणता, संयुक्त परिवार, अनुशासन आ स्नेहक प्रसंगसँ निर्मित होइत अछि। बाबी परिवारक वरिष्ठ सदस्य छथि, मुदा हुनक कथात्मक शक्ति आधिकारिक पदसँ नहि, अनुभव आ आत्मीयतासँ अबैत अछि। बच्चासभक उत्सुकता बतबैत अछि जे कथा घरक नित्य-व्यवहारक भाग बनि सकैत अछि।
एहि खण्डमे घरेलू जीवनक अपेक्षाकृत दीर्घ चित्रण एकटा स्पष्ट रचनात्मक चुनाव अछि। एक दिशामे ई राजसी साहसिक आख्यानक लेल आत्मीय भूमि तैयार करैत अछि; दोसर दिशामे मुख्य संघर्षक उद्घाटन स्थगित करैत अछि। कथा जल्दी शुरू होयबाक अपेक्षा रखनिहार पाठक लेल ई विलम्ब अनुभव भऽ सकैत अछि। तथापि बाल-पाठकक सामाजिक सन्दर्भ केँ प्रमुख स्थान देबाक कारण ई आरम्भ उपन्यासक सांस्कृतिक मौलिकताक आधार अछि।
खण्डक अन्तमे बाबी आ बालकक बीच जिज्ञासा-विरामक सम्बन्ध स्थापित भऽ चुकैत अछि। एतय आरम्भिक ‘चौखट’ कथाक बाहरी सजावट नहि, बल्कि आगामी दसू खण्डक अर्थ-निर्माणक विधान बनि जाइत अछि।
दोसर खण्ड : गुमनाम राजकुमार, विपत्ति आ कथा-पुनःस्मरण
दोसर खण्डक आरम्भमे श्रोता अपन सुनल खिस्साक पुनः माँग करैत अछि। प्रफुल्लक कथन “बाबी ! हम तँ पूरा खिस्सा नहि सुनि सकलहुँ” (मिश्र, २०१९: ३०) कथावाचनक महत्त्वपूर्ण पक्ष खोलैत अछि: कथा बुझबाक लेल श्रोता बीचक छूटल कड़ी पुनः प्राप्त करय चाहैत अछि। बाबी बच्चासभक एहि आवश्यकता केँ स्वीकार करैत छथि।
भीतरक कथामे सुजीत अनजान वनमे संकटसँ जूझैत छथि। अपरिचित व्यक्ति, वनक खतरनाक भूगोल आ आश्रयक प्रश्न राजकुमारक राजकीय पहिचान केँ अस्थायी रूपसँ निष्प्रभावी बनबैत अछि। ओ राजवंशक बलपर नहि, अपन सावधानी आ प्रयत्नक बलपर आगाँ बढ़ैत छथि।
सर-सुल्तानसँ जुड़ल प्रसंगमे आश्रयक संग सूचनाक संकट उपस्थित होइत अछि। जे व्यक्ति अपन वास्तविक परिचय नहि खोलैत अछि, ओकरा लेल सहयोग प्राप्त करब सेहो कठिन अछि। एतय गुप्त पहिचान केवल रोमांचक युक्ति नहि; सुरक्षा आ विश्वासक बीच तनावक स्रोत अछि।
दोसर खण्डक उपलब्धि ई अछि जे नायकक विपत्ति केँ पाठकक कल्पनामे स्थिर करैत अछि। सीमा ई जे साहसक बहुल वर्णनक बीच भय, सन्देह आ व्यक्तिगत दुर्बलताक अन्तरंग अनुभूति आओर उभरि सकैत छल।
तेसर खण्ड : राजकीय पतनक इतिहास आ खलनायकक निर्माण
तेसर खण्डमे कथा राजकुमारक यात्रासँ हटि राजनीतिक पूर्ववृत्त देखबैत अछि। प्रारम्भमे स्पष्ट सूचना भेटैत अछि: “राजा सुजान सिंह टीकमगढ़क राजा छलाह” (मिश्र, २०१९: ३८)। जुआ, मद्यपान आ विलासक कारण हुनक आर्थिक आ राजकीय स्थिति बिगड़बाक उल्लेख सत्ता आ चरित्रक सम्बन्ध केँ नूतन दिशा दैत अछि।
एहि स्थानपर पाठक बुझैत अछि जे सुजीतक व्यक्तिगत संकट एक पृथक दुर्घटना नहि; वंशीय सम्बन्ध, सत्ता-व्यवस्था आ पूर्ववर्ती राजकीय निर्णयक व्यापक जालक परिणाम अछि। नयनावतीक पूर्ववृत्त आ राजपरिवारक सम्बन्ध उद्घाटित भेला सँ दरबारी षड्यन्त्रक कारण क्रमशः स्पष्ट होइत अछि।
नायकक अभियानक बीच विरोधी शक्तिक इतिहास जोड़बाक शिल्प कथाक विस्तारक उदाहरण अछि। मुदा राजा सुजान सिंहक दुर्बलताक चित्रण नैतिक संकेत बहुत स्पष्ट करैत अछि। जुआ आ मद्यपानक दोष राजकीय पतनक कारण बनैत अछि; सामाजिक-आर्थिक कारणक विवेचन अपेक्षाकृत सीमित रहैत अछि।
एहि खण्डक आलोचनात्मक महत्त्व ई अछि जे रचनामे ‘दुष्ट’ पात्र अकस्मात् उत्पन्न नहि होइत छथि। हुनक स्वार्थक पाछाँ पूर्वघटना आ सम्बन्ध छथि। तथापि उपन्यास ओहि सम्बन्धसभकेँ आधुनिक मनोवैज्ञानिक उपन्यासक गहराइधरि नहि लऽ जाइत अछि।
चारिम खण्ड : आश्रम, दिशानिर्देश आ शीर्षकक उद्घाटन
चारिम खण्डक आरम्भमे बाबी चारिम दिनक कथावाचनक चौखट बनेने राखैत छथि। राजकुमार सर-सुल्तानक सहायता पाबि राजमहलक षड्यन्त्रसँ अलग भऽ नव मार्ग खोजैत छथि। एकटा अदृश्य शक्ति द्वारा आगाँ बढ़ाओल जाएबाक अनुभूति कथा केँ यथार्थक सीमासँ अलौकिक लोककल्पनामे प्रवेश करबैत अछि।
महात्मा राजकुमारक मार्गदर्शक बनैत छथि। एहि गुरुपात्रक सम्बन्ध केवल उपदेश दैबाक नहि, बल्कि संकट बुझबाक, आगामी लक्ष्य निर्धारित करबाक आ आवश्यक साहस जुटेबाक अछि। तथापि गुरु द्वारा अत्यधिक पूर्वसूचना भेटलासँ नायकक खोजक अनिश्चितता किछु कम होइत अछि।
पुस्तकक शीर्षकक निर्णायक प्रसंग पृष्ठ ५३ मे उद्घाटित होइत अछि। महात्माक निर्देशानुसार वन, पहाड़ आ जलक कठिन यात्रा पश्चात् सरोवरक मध्य स्वर्ण-कमल प्राप्त करबाक अछि। लेखक कहैत छथि जे स्वर्ण-कमल तोड़लापर मन्दिरक घण्टी बजत आ माँ कालीक आशीर्वाद प्राप्त होयत (मिश्र, २०१९: ५३)। ई दृश्य कथाक मुख्य जादुई साधनक उद्भव थिक।
‘स्वर्ण’ शब्द मूल्यवान वस्तुक बोध करबैत अछि, मुदा एहि फूलक उपयोग धन संचय लेल नहि, विपत्तिक प्रतिरोध लेल होइत अछि। एकरा प्रयत्नपूर्वक अर्जित रक्षाशक्तिक प्रतीक पढ़ल जा सकैत अछि। तथापि ई व्याख्या पाठकक आलोचनात्मक अर्थनिर्माण अछि; पुस्तक स्वयं चमत्कारक व्यावहारिक कथात्मक कार्यपर अधिक जोर दैत अछि।
पाँचम खण्ड : नयनावतीक सत्ता-प्रयोग आ शमशेर-जालिमक उभार
पाँचम दिन श्रोता सीधे प्रश्न उठबैत अछि जे सुजीतक माता-पिताक स्थिति की भेल आ राजकुमारक आगाँक गन्तव्य की थिक। बाबीक उत्तरसँ स्पष्ट होइत अछि जे सुजीतक संकट एक दिशामे नहि चलि रहल अछि; राजा रणवीर सिंह आ रानी सुनन्दा अलग दुःख भोगैत छथि, तखने नयनावतीक प्रभाव राज्यक शासनमे बढ़ैत अछि (मिश्र, २०१९: ५४)।
नयनावतीक स्वार्थमे शमशेर सिंह आ जालिम सिंह राजनीतिक उपकरण बनैत छथि। जालिम सिंहक चरित्रक सम्बन्ध जुआ, मद्य आ दुराचरणसँ जोड़ल गेल अछि। सत्ता प्राप्त करबाक कामना केवल व्यक्तिगत द्वेष नहि; राज्यक संसाधन आ प्रशासनपर नियन्त्रणक संघर्ष बनि जाइत अछि।
ई खण्ड देखबैत अछि जे शासकक निर्बलता सार्वजनिक जीवनमे अस्थिरता उत्पन्न करैत अछि। जखन राजकीय जिम्मेदारी निजी सुख आ दरबारी स्वार्थक अधीन भऽ जाइत अछि, तखन न्यायप्रिय उत्तराधिकारी दूर रहितो संघर्षक केन्द्र बनि जाइत अछि।
मुदा एहि विवेचनमे एगो आलोचनात्मक समस्या अछि। नयनावतीक राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा केँ मुख्यतः स्त्री-विरोधी ‘दुष्ट रानी’ प्रतिरूपक माध्यमसँ देखाओल गेल अछि। समस्या महत्त्वाकांक्षा स्वयं नहि, ओकर अनैतिक साधन अछि—एहि अन्तरकेँ स्पष्ट रखलासँ पात्रक अर्थ अधिक सन्तुलित होइत।
छठम खण्ड : सत्ताक मनोविज्ञान आ सार्वजनिक उत्तरदायित्व
छठम खण्डक आरम्भमे बाबी पिछला घटनाक पुनः स्मरण करबैत छथि। एहि खण्डसँ ठीक पहिने पुस्तकक एकटा सूक्ति ध्यान खींचैत अछि: “सत्ता आ स्वार्थमे अन्योन्याश्रय सम्बन्ध होइत छैक” (मिश्र, २०१९: ६१)। ई वाक्य कथाक राजनीतिक नैतिकताक एकटा प्रमुख सूत्र अछि।
राजा, रानी, सेनानायक आ राजकुमारक व्यक्तिगत सम्बन्ध राज्यक सार्वजनिक नियतिकेँ प्रभावित करैत अछि। सत्ता पाबयवला व्यक्ति जँ अपन पदक उपयोग निजी स्वार्थ लेल करैत अछि तँ राजधर्म दूषित होइत अछि—एहि विचारक पुनरावृत्ति पूरे खण्डमे दृष्टिगोचर होइत अछि।
महत्त्वपूर्ण ई अछि जे राजकुमारक संघर्षक समाधान तत्काल नहि होइत अछि। कथा अलग-अलग पक्षक गतिविधि देखबैत अछि। पाठकक ध्यान नायकक वीरताक संग राज्यक अस्थिरता आ सामान्य लोकक सम्भावित क्षतिपर सेहो जाए लगैत अछि।
एहि खण्डमे उपन्यासक राजनैतिक आलोचनाक सम्भावना स्पष्ट होइत अछि; मुदा समाधानक कल्पना मूलतः सुयोग्य व्यक्तिक शासनमे केन्द्रित रहैत अछि। शक्ति पर संस्थागत नियन्त्रण, प्रजाक अधिकार आ सार्वजनिक उत्तरदायित्वक प्रश्न कथा बहुते कम खोलैत अछि।
सातम खण्ड : दीर्घ यात्रा, कल्लू राक्षस आ विशाखाक साक्ष्य
सातम खण्डमे कथा साहसिक रूपसँ सर्वाधिक विस्तृत होइत अछि। सुजीत महात्माक देल तलवार लऽ पहाड़, वन आ अनजान क्षेत्रक यात्रा पर निकलैत छथि। पहिल पृष्ठमे ठहरबाक मनाही आ सतत आगाँ बढ़बाक आग्रह अछि। “कतहुँ ठहरबाक नहि अछि” (मिश्र, २०१९: ६७)—एहि छोट निर्देशमे अभियानक समयगत तनाव आ लक्ष्य-केन्द्रितता समाहित अछि।
यात्रामे प्राकृतिक परिवेश केवल सजावट नहि रहैत अछि; पहाड़, जल, अपरिचित मार्ग आ वनराजि नायकक क्षमता जाँचबाक माध्यम बनैत अछि। भूख-प्यास, विश्राम आ सावधानीक प्रसंग वीरताकेँ पूर्णतः अलौकिक होमयसँ बचबैत अछि।
श्रीधरपुरक कल्लू राक्षसक आतंक नायकक निजी संकटसँ कथाकेँ सार्वजनिक उद्धारक दिशामे मोड़ैत अछि। कल्लू लोक केँ भयभीत करैत अछि आ कुमारिकासभक अपहरणक कथा सोझाँ अबैत अछि। सुजीतक हस्तक्षेप एहि कारण महत्त्वपूर्ण अछि जे एतय ओ अपन राजमुकुट नहि, अपरिचित लोकक सुरक्षा लेल संघर्ष करैत छथि।
विशाखा द्वारा कल्लूक अतीत उद्घाटित होइत अछि। ओ बतबैत छथि जे कल्लूक जन्म आ विकृति पीढ़ीगत अनुभव आ प्रतिशोधसँ जुड़ल अछि (मिश्र, २०१९: ८१–८३)। हिंसक पात्रक पूर्वकथा एकटा जटिल प्रश्न उठबैत अछि: अन्याय भोगनिहार स्वयं कखन अन्यायक स्रोत बनि जाइत अछि? कथाक उत्तर अन्ततः राक्षसक दमनक पक्षमे अछि; ओकर सामाजिक कारणक विश्लेषण अधिक विकसित भऽ सकैत छल।
एहि खण्डक प्रमुख उपलब्धि साहस आ परोपकारक संगम अछि। संगहि, बाल-पाठकक भावनात्मक संवेदनशीलताकेँ ध्यानमे रखैत हिंसक दृश्यसभक तीव्रता पर विचार जरूरी अछि।
आठम खण्ड : वापसीक तैयारी, गुप्त पहिचान आ प्रतिरोधी सहयोग
आठम खण्डमे बाबी कथाकेँ नव ‘पड़ाव’ पर राखैत छथि। राजकुमार अपन उद्देश्यक पूर्तिक दिशामे पुनः आश्रम आ राजनीतिक घटनाक संग जुड़ैत छथि। महात्मा हुनका सुमेरगढ़ जायब, अपन पहिचान गुप्त रखब आ विरोधीक शक्ति बुझि काज करबाक सलाह दैत छथि (मिश्र, २०१९: ८४)।
गुप्त पहिचान एतय केवल रोमांचक भेषबदल नहि, राजनीतिक रणनीति बनैत अछि। शक्तिसम्पन्न शत्रुक सोझाँ तुरन्त प्रत्यक्ष होयब विनाशकारी भऽ सकैत अछि; धैर्य आ सूचना-संग्रह साहसक आवश्यक अङ्ग बनैत अछि। एहि तरहें वीरताक अर्थ निर्बाध आक्रमणसँ हटि विवेकपूर्ण संगठन धरि विस्तृत होइत अछि।
भवानीशंकर आ मुरमुर सन पात्रसभक प्रसंग दरबारी विरोधक भीतर वैकल्पिक राजनीतिक चेतना देखबैत अछि। झूठा आरोप, पदसत्ताक दुरुपयोग आ बेगुनाहक रक्षा करबाक प्रसंगसँ लोकसमर्थनक प्रश्न उठैत अछि (मिश्र, २०१९: ८५–८७)।
एहि खण्डक सीमामे ई देखल जा सकैत अछि जे लोकसमर्थनक सामाजिक आधार ततेक विस्तार नहि पबैत अछि जतेक राजकीय षड्यन्त्रक व्यक्तिगत जाल। तथापि नायकक सफलता अलग-थलग बाहुबल नहि, सामूहिक सहयोगपर निर्भर होयबाक संकेत महत्त्वपूर्ण अछि।
नवम खण्ड : कलानाथ आ ग्रामीण लोक-चेतनाक प्रवेश
नवम खण्डक आरम्भ राजापुरक गृहस्थ कलानाथसँ होइत अछि। ओकरा “बहुत मेहनती” कहि किसान-जकाँ श्रमपर आधारित सामान्य जीवनक परिचय देल गेल अछि (मिश्र, २०१९: ८९)। ई आरम्भ राजमहल, आश्रम आ राक्षसक किलासँ हटि गामक संसारमे प्रवेश करबैत अछि।
कलानाथक माध्यमसँ उपन्यास प्रजा, पंचायत, सामाजिक प्रतिष्ठा आ अन्यायपूर्ण दमनक सम्भावना केँ मूर्त रूप दैत अछि। राजकीय संघर्षक प्रभाव केवल राजवंशपर नहि, सामान्य ग्रामीण व्यक्तिपर सेहो पड़ैत अछि—ई नवम खण्डक महत्त्वपूर्ण विस्तार अछि।
पछिला घटनामे कल्लूक उपरान्त आगाँक अभियान, राम-लक्ष्मणक सहायताक प्रसंग आ राजनीतिक स्थिति बुझबाक प्रयास जुड़ैत अछि। एतय सहायता केवल राजकीय सेना वा महात्माक अलौकिक शक्तिसँ नहि, साधारण लोकक तत्परतासँ सेहो भेटैत अछि।
कलानाथक चरित्रक साहित्यिक महत्त्व ओकर सामाजिक स्थिति मे अछि। उपन्यासक राजनीतिक केन्द्र राजमुकुट होइतहुँ लोक-जीवनक अवलम्बनक बिना नायकक अभियान पूर्ण नहि होइत। एहि संकेतक अधिक विस्तार भेल रहितय तँ कृति केवल आदर्श राजधर्मक कथा नहि, प्रजा-आधारित नैतिक राजनीतिपर सेहो अधिक स्पष्ट विचार कऽ सकैत छल।
दशम खण्ड : परिचयक उद्घाटन, न्याय आ कथाचौखटक पूर्णता
दशम खण्डक आरम्भ राहुलक प्रश्नसँ होइत अछि—“आइ की सुनायब ?” (मिश्र, २०१९: ९४)। बाबी बतबैत छथि जे राजकुमार सुमेरगढ़मे प्रवेश आ अपहृत बालिकासभक उद्धारक कथा सुनबैत छथि। एहि उद्घोषणासँ अन्तिम खण्डक गति आ अपेक्षा दुनू तीव्र होइत अछि।
राजकुमार गुप्त सहयोग, राजनीतिक जानकारी आ लोकसमर्थनक आधारपर सुमेरगढ़क अवस्थाक सामना करैत छथि। सर-सुल्तानसँ संवादमे सुजीतक कथन महत्त्वपूर्ण अछि—“हम एहि लेल अपनेकेँ बाध्य नहि क’ सकैत छी” (मिश्र, २०१९: ९७)। एहि छोट वाक्यमे सहयोग आ स्वीकृतिक बीच नैतिक अन्तर स्पष्ट होइत अछि। विजयक महत्त्व केवल शत्रु-संहार नहि, साथी केँ विवश नहि करबाक विवेक सेहो अछि।
अन्तिम घटनामे राजकुमारक वास्तविक परिचय, शत्रुपक्षक विफलता, राजपरिवारक पुनर्मिलन आ नयनावतीक अपराध-स्वीकार कथाकेँ समापन दिस लऽ जाइत अछि। राजकुमारी जावेदासँ सम्बन्ध सेहो अन्तिम समाधानक भाग बनैत अछि। तथापि राजनीतिक व्यवस्था आ दण्ड-न्यायक जटिलता अपेक्षाकृत कम समयमे सिमटि जाइत अछि।
सभसँ महत्त्वपूर्ण ई जे राजकुमारक कथा समाप्त भेलापर घरेलू कथा-मण्डली फेर सोझाँ अबैत अछि। राहुल आ दोसर नेना अनुभवक अर्थक सम्बन्धमे प्रतिक्रिया दैत छथि। राजमहलक विशाल संसारक अन्ततः बाबीक बोलीमे समा जायब उपन्यासक मुख्य सांस्कृतिक उपलब्धि अछि।
कथाक भीतर कथा : शिल्प, समय आ श्रोताक सक्रियता
‘स्वर्ण-कमल’क बाह्य कथाचौखट आ भीतरी राजकुमारक आख्यान केँ अलग-अलग पढ़ला पर ओकर महत्त्वपूर्ण शिल्पगत अन्तर्सम्बन्ध छूटि जाइत अछि। बाबीक भूमिका कथावाचनक निरन्तरता रखब, बिसरल प्रसंग पुनः जोड़ब, अगिला घटनाक पूर्वसूचना देब आ नेनासभक प्रतिक्रियाक आधारपर खिस्सा बढ़ेबाक अछि। एहि व्यवस्थामे कथा केवल लिखित पाठ नहि रहि, सामूहिक श्रवणक अनुभव बनैत अछि।
दश खण्डक क्रम दिनक आवर्तनसँ सम्बन्धित अछि। श्रोता-बालक रोज नव प्रश्नक संग अबैत अछि। समयक ई विभाजन आधुनिक धारावाहिक कथाक उत्सुकता-जाग्रत करबाक तकनीकसँ साम्य रखैत अछि, मुदा ओकर सांस्कृतिक मूल घरेलू मौखिक परम्परामे अछि। अध्यायक अन्त कथा केँ सम्पूर्ण समाप्त नहि करैत अछि; ओ अगिला सुनवाईक अपेक्षा बनबैत अछि।
ऐडन चेम्बर्सक बाल-पाठकक चर्चा-आधारित पढ़ाइ सम्बन्धी सिद्धान्तक आलोकमे देखी तँ पाठक प्रश्न कऽ, अनुभव साझा कऽ आ अपूर्ण जानकारीक सम्बन्धमे तर्क कऽ कथाक अर्थ बनबैत अछि (Chambers, 1993)। ‘स्वर्ण-कमल’क बच्चासभ एहि सक्रिय पाठकीयताक पूर्वरूप देखबैत अछि। मुदा बाबीक कथात्मक अधिकार बहुत प्रबल अछि; ओ कतेको ठाम नैतिक निष्कर्ष स्वयं दैत छथि। एहि कारण बातचीतक स्वतन्त्रता आ उपदेशक एकरेखीयता बीच तनाव बनल रहैत अछि।
कथाविज्ञानक दृष्टिसँ ई अन्तःस्थ आख्यान (कथाक भीतर कथा) थिक। भीतरी घटनासभक काल आ बाहरी वाचन-काल अलग अछि, मुदा बच्चासभक जिज्ञासा दुनू केँ जोड़ि रखैत अछि। एहि द्विस्तरीय रूपक परिणामस्वरूप उपन्यास केवल राजकुमारक कहानी नहि, कहानी सुनबाक सांस्कृतिक स्थितिक सेहो दस्तावेज बनि जाइत अछि।
पात्रक विन्यास : नैतिक नायकसँ जटिल विरोधी धरि
सुजीतक चरित्रक आरम्भिक परिचय राजवंशीय उत्तराधिकारीक अछि; मुदा कथा हुनका राजमहलक सुरक्षा सँ बाहर निकालि दैत अछि। वन, भूख-प्यास, अनिश्चित मार्ग आ छद्म परिचयक दबावमे हुनक कर्मक परीक्षा होइत अछि। न्यायप्रियता ओतबे अर्थवान अछि जतेक ओ संकटग्रस्त अपरिचित लोकक सहायता करैत छथि। कल्लू-विरोधी अभियान एहि कारण व्यक्तिगत प्रतिशोधक सीमा तोड़ैत अछि।
मुदा सुजीतक नैतिक छवि अत्यधिक निष्कलुष अछि। जटिल चूकि, दीर्घ आत्मसन्देह आ गहिर आत्मालोचनाक प्रसंग सीमित छथि। मारिया निकोलायेवाक चरित्र-अध्ययनक भाषा उपयोग करी तँ कथाक प्रेरक ‘कार्यपरक’ नायक आ गहिर ‘अन्तर्मन-प्रधान’ पात्रक बीच अन्तर देखल जा सकैत अछि (Nikolajeva, 2002)। सुजीतक साहस पाठक केँ प्रेरित करैत अछि, मुदा ओकर दुर्बलता अधिक देखाओल जाइत तँ सम्बन्ध आओर मानवीय बनितय।
बाबी उपन्यासक सांस्कृतिक नायिका छथि। हुनक अधिकार न धनसँ, न राजकीय बलसँ; ओ मातृभाषाक जीवित स्मृति, अनुभव, अनुशासन आ आत्मीय सम्बोधनसँ बनैत अछि। एहि रूपमे बाबी चरित्र मात्र नहि, साहित्यिक परम्पराक प्रतीक छथि।
नयनावती सत्ताक स्वार्थपूर्ण उपयोगक प्रतिनिधि छथि। हुनक योजनाक प्रभाव सार्वजनिक जीवनपर पड़ैत अछि। अन्तिम पश्चात्तापक कारण ओ निरन्तर दुष्ट रहनिहार पात्र नहि; परिवर्तन सम्भव अछि। तथापि परिवर्तनक क्रम अधिक विस्तार पाबितय तँ मनोवैज्ञानिक विश्वसनीयता मजबूत होइत।
शमशेर सिंह आ जालिम सिंह व्यक्तिगत स्वार्थकेँ संस्थागत शक्तिसँ जोड़ैत छथि। सैनिक अधिकार आ शासन-यन्त्र जखन निजी महत्त्वाकांक्षाक साधन बनैत अछि, तखन रक्षक स्वयं संकट बनि जाइत अछि। राजा रणवीर सिंहक संकट आ रानी सुनन्दाक करुण अवस्था एहि दुरुपयोगक पारिवारिक परिणाम देखबैत अछि।
महात्मा गुरु, रणनीतिकार आ लोककथात्मक ‘दाता’ प्रकार्यक संगम छथि। ओ सुजीतकेँ आवश्यकता अनुसार दिशा, सूचना आ शक्ति-स्रोत प्रदान करैत छथि। कल्लू विपरीत ध्रुवपर अछि, मुदा ओकर इतिहास बतबैत अछि जे हिंसक पात्रक उत्पत्ति सेहो अतीतक सम्बन्धसँ जुड़ि सकैत अछि। विशाखा एकटा स्मृति-साक्षीक रूपमे ओहि इतिहास केँ उद्घाटित करैत छथि।
सर-सुल्तान, भवानीशंकर आ कलानाथ कथाकेँ एकल वीरगाथा बनबासँ रोकैत छथि। सुजीतक सफलता सहयोग, सूचना आ लोकसम्बन्धपर निर्भर अछि। एहि पात्रसभक कारण ई स्पष्ट होइत अछि जे साहस सदा एकाकी संघर्ष नहि; दूसरक विश्वास अर्जित करब सेहो ओकर हिस्सा अछि।
स्त्री-पात्र, मातृत्व आ सत्ताक लैंगिक राजनीति
रानी सुनन्दा आ नयनावतीक विरोध कथाक परम्परागत ‘सद्गुणी माता बनाम दुष्ट विमाता’ संरचना पुनः उपस्थित करैत अछि। ई लोककथामे परिचित युक्ति अछि, मुदा साहित्यिक आलोचनाक लेल एतय पूछब आवश्यक अछि जे स्त्रीक सत्ताकांक्षा केँ अनैतिकता सँ केना अलग कयल जाए। नयनावतीक समस्या सत्ताक अभिलाषा नहि, ओहि अभिलाषाक पूर्तिक लेल छल, षड्यन्त्र आ अन्याय अपनब अछि।
बाबी स्त्री-अनुभवक दोसर रूपक प्रतिनिधित्व करैत छथि। हुनक पास वैधानिक राजसत्ता नहि, मुदा कथा पर हुनक पूर्ण सांस्कृतिक अधिकार अछि। परिवारक भीतर ज्ञानसंचरणक ई अधिकार नयनावतीक कठोर राजनीति सँ पूर्णतः भिन्न अछि। ई तुलना देखबैत अछि जे उपन्यास स्त्रीकेँ केवल एक नैतिक रूपमे सीमित नहि रखैत अछि।
विशाखा कल्लूक अतीतक जानकारी दैत छथि; हुनक वाणी कथाकेँ स्मृति आ कारणक स्तर प्रदान करैत अछि। राजकुमारी जावेदाक उपस्थिति सेहो स्त्री-संसारक विस्तार करैत अछि। तथापि निर्णायक युद्ध, अभियान आ राजकीय समाधानक नेतृत्व लगभग सम्पूर्णतः पुरुष पात्रसभक हाथमे अछि।
समकालीन बाल-पाठिकाक दृष्टिसँ जावेदाक स्वतंत्र निर्णय, विशाखाक स्वयंप्रेरित सामाजिक प्रतिरोध अथवा सुनन्दाक राजनीतिक विवेक अधिक विकसित भऽ सकैत छल। एहन सम्भावना देखेनाइ कृतिक ऐतिहासिक रूपपर वर्तमान नैतिक फैसला थोपनाइ नहि; ई उपन्यासक भीतर निहित किन्तु अल्पविकसित रचनात्मक सम्भावनाक निदर्शन थिक।
स्वर्ण-कमल, तलवार, वन आ किला : प्रतीकक अर्थक्षेत्र
कमल भारतीय सांस्कृतिक चिन्तनमे पवित्रता, सुन्दरता आ प्रतिकूल परिस्थितिमे खिलबाक क्षमता सँ जुड़ल प्रतीक थिक। एहि सामान्य सांस्कृतिक अर्थकेँ उपन्यासपर यांत्रिक ढंगसँ आरोपित नहि करबाक चाही। मूल पाठमे स्वर्ण-कमलक प्राथमिक कार्य अलौकिक संरक्षण आ नायकक आगामी अभियानक सशक्तीकरण थिक (मिश्र, २०१९: ५३)। ओकर प्रतीकात्मक अर्थ एहि कथात्मक कार्यसँ विकसित होइत अछि।
‘स्वर्ण’ शब्द धन आ दुर्लभताक बोध करबैत अछि; तथापि नायक एकरा निजी समृद्धि लेल नहि रखैत छथि। एतय मूल्यवान वस्तुक मूल्य उपयोगक नैतिक लक्ष्यसँ जुड़ि जाइत अछि। स्वर्ण-कमल एही कारण अनैतिक स्वर्णलोभक विपरीत ध्रुव बनि सकैत अछि।
तलवार साहसिक लोककथाक संघर्ष-साधन अछि, मुदा गुरु द्वारा देल गेल तलवारक संग सावधानीक निर्देश सेहो अछि। शस्त्रक शक्ति विवेकक अधीन होयबाक आग्रह कथामे बिखरल अछि, यद्यपि हिंसा आ आत्मरक्षाक सीमा अधिक सुस्पष्ट होयबाक आवश्यकता छल।
वन एकटा सीमांत-स्थान अछि जतय राजसत्ता आ परिचित सामाजिक क्रम क्षीण होइत अछि। राजकुमार केँ बचेबाक लेल अपन अनुभव पर निर्भर रहय पड़ैत अछि। किला उलटाभाँति सत्ताक केन्द्र आ बन्दीक स्थान दुनू बनि सकैत अछि। सरोवरक मध्य कमल प्राप्त करब चुनौतीक पार जा कऽ नव शक्ति पाबबाक रूपक रूपमे पढ़ल जा सकैत अछि।
प्रॉपक प्रकार्य-सिद्धान्त आ आख्यानक संरचनात्मक साम्य
व्लादिमीर प्रॉप ‘Morphology of the Folktale’ मे लोककथाक पात्रसभसँ बेसी हुनक कथात्मक कार्य अथवा ‘प्रकार्य’क अध्ययन करैत छथि (Propp, 1968)। ‘स्वर्ण-कमल’मे प्रारम्भिक संकट, नायकक बहिष्करण, मार्गदर्शकसँ भेट, विशेष साधनक प्राप्ति, यात्रा, शत्रु-संघर्ष, गुप्त परिचय, पहिचानक उद्घाटन आ पुनर्स्थापनाक क्रम एहि पद्धतिसँ पढ़ल जा सकैत अछि।
एहि क्रममे नयनावती-शमशेर-जालिम विरोधी शक्तिक कार्य करैत छथि; महात्मा दाता आ मार्गदर्शकक; स्वर्ण-कमल जादुई साधनक; सुजीत संघर्षरत नायकक; आ राज्यक पुनर्स्थापना अन्तिम समाधानक। मुदा प्रॉपक प्रत्येक प्रकार्य प्रत्येक कथामे उपस्थित होइत अछि—एहन दावा नहि अछि। संरचनात्मक साम्य कृतिक व्याख्या सहज बनबैत अछि, एकरा कोनो यूरोपीय लोककथाक प्रतिलिपि सिद्ध नहि करैत अछि।
वास्तविक महत्त्व एहि बातमे अछि जे लेखक लोककथात्मक घटना-क्रमकेँ लम्बा उपन्यासक भीतर विस्तार दैत छथि। खलनायकक अनेक स्तर, सहायकक विविध प्रकार आ बाहरी कथावाचिका एहि संरचनाकेँ सामान्य एकल लोककथासँ अधिक जटिल बनबैत अछि।
रस, दृश्यात्मकता आ बालकक कल्पनाशक्ति
कथाक प्रधान भाव वीरताक अछि। राजकुमारक भयावह यात्रा, दमनकारी शक्तिसँ मुठभेड़ आ प्रजाक रक्षाक प्रयास वीर रसक आधार छथि। मुदा वीरता केवल बलप्रयोग नहि: गुप्त रूपमे रहि सूचना बुझब, मित्र बनायब आ साथी पर बाध्यता नहि थोपब सेहो साहसक विवेकपूर्ण रूप थिक।
अद्भुत रस स्वर्ण-कमल, माँ कालीक संरक्षण, महात्माक विशेष ज्ञान आ राक्षसक प्रसंगसभसँ उत्पन्न होइत अछि। भयानक रस कल्लूक किला, अपहरण, वनक जोखिम आ षड्यन्त्रमे अछि। करुण रस सुनन्दा आ सुजीतक बिछोह, राजा रणवीर सिंहक संकट तथा सामान्य लोकक पीड़ामे स्पष्ट होइत अछि। अन्तिम पुनर्मिलन तनावक शमनक दिशामे बढ़ैत अछि।
लेखकक दृश्यात्मक संसारमे नदी, पहाड़, सरोवर, वन आ किला अछि; ई सभ मुख्यतः गति आ रोमांच उत्पन्न करैत अछि। स्थानीय प्राकृतिक इतिहास, मौसम, लोकवनस्पति आ मिथिलाक विशिष्ट भूगोलक गहिर विवरण अपेक्षाकृत कम भेटैत अछि। कथाक साहसिक स्वभाव एहन सङ्क्षेपक किछु औचित्य दैत अछि, मुदा मातृभाषा आ क्षेत्रीय परिवेशक बीच अधिक सघन सम्बन्ध उपन्यासकेँ विशिष्ट स्थानीय रूप दऽ सकैत छल।
नैतिक दर्शन : न्याय, क्षमा, सहमति आ सत्ता
उपन्यासक नैतिक आग्रह अन्यायक विरुद्ध सक्रिय प्रतिरोध अछि। सुजीत केवल अपमान सहि निष्क्रिय प्रतीक्षा नहि करैत छथि। ओ तैयारी करैत छथि, साहस जुटबैत छथि, सहायता लैत छथि आ संकटग्रस्त लोकक रक्षा करैत छथि। एही कारण उपन्यासक सदाचार केवल कथन नहि, कर्मसँ जुड़ल अछि।
तथापि न्याय आ प्रतिशोधक अन्तर सदिखन पर्याप्त स्पष्ट नहि अछि। कल्लूक विनाश, षड्यन्त्रकारीक दमन आ राजवंशीय उत्तराधिकारक पुनर्स्थापना एक संग घटैत अछि। बालकसँ एहि प्रसंगपर चर्चा करैत समय पूछल जा सकैत अछि: आत्मरक्षाक लेल बलप्रयोग कखन आवश्यक अछि? अपराध स्वीकार करबाक बाद कतेक क्षमा उचित अछि? व्यक्तिगत क्षमा आ सार्वजनिक उत्तरदायित्व समान अछि कि अलग?
नयनावतीक अन्तिम पश्चात्ताप उपन्यासक करुण-नैतिक पक्ष खोलेत अछि। व्यक्तिक परिवर्तन सम्भव अछि—ई आशावादी दृष्टि बाल-साहित्यक लेल उपयोगी अछि। मुदा राजकीय षड्यन्त्रसँ सामान्य लोक केँ भेल क्षतिक न्यायिक समाधान व्यक्तिगत क्षमासँ स्वतः पूरा नहि होइत। उपन्यास एहि अन्तरक गहिर विवेचन नहि करैत।
सहमतिक प्रश्न अन्तिम खण्डमे उजागर होइत अछि। सर-सुल्तानसँ संवादमे सुजीतक ‘बाध्य नहि’ करबाक कथन बतबैत अछि जे साथीकेँ स्वतन्त्र इच्छा देनाइ नैतिक नेतृत्वक गुण अछि (मिश्र, २०१९: ९७)। ई प्रसंग एकरा सरलीकृत ‘तलवारक नायक’सँ बेसी विचारशील पात्र बनबैत अछि।
राज्यक अन्तिम पुनर्स्थापना आदर्श राजधर्मक रूपमे प्रस्तुत अछि। आधुनिक लोकतान्त्रिक अर्थमे नागरिक संस्थाक जवाबदेहीक चित्र अपेक्षाकृत कम अछि। उपन्यासक राजनीतिक कल्पना मुख्यतः सुयोग्य शासकक नैतिकता पर आश्रित अछि। एहि सीमा केँ मानैतहुँ कथा पदसत्ताक दुरुपयोगक तीव्र आलोचना करैत अछि, जे एकर महत्त्वपूर्ण उपलब्धि अछि।
बाल-मनोविज्ञान, पठन-अनुभव आ शैक्षिक उपयोगिता
कथाक भीतर नेनासभक उत्सुकता ई मानैत अछि जे बच्चा केवल आदेश माननिहार प्राणी नहि, प्रश्न पूछनिहार पाठक अछि। प्रफुल्लक छूटल प्रसंग पुनः सुनबाक आग्रह, विमलाक शंका आ राहुलक प्रश्न सामूहिक पठनक बहुरंगी रूप बनबैत अछि। एतय चर्चा, स्मरण, अनुमान आ अन्तिम प्रतिक्रिया—चारू प्रक्रिया बालकक अर्थ-निर्माणसँ सम्बन्धित अछि।
कथाक साहसिक संरचना भय केँ पूर्णतः समाप्त नहि करैत; ओ भयक बीच निर्णय लेबाक अवसर रचैत अछि। राजकुमार अकेला पड़ैत छथि, गलत व्यक्तिक भेट भऽ सकैत अछि, आश्रय अनिश्चित होइत अछि। एहि प्रकारक प्रसंग बच्चाक भीतर आत्मविश्वास आ सावधानीक बीच सम्बन्धक कल्पना विकसित करयमे सहायक होइ सकैत अछि। तथापि कल्लूक हिंसा आ अपहरणक प्रसंग सम्भावित बाल-पाठकक उमेर आ संवेदनशीलता अनुसार सन्दर्भित कयल जाएबाक चाही।
बाल-पठनक आधार उमेर मात्र नहि, भाषिक दक्षता, श्रवण-अनुभव आ भावनात्मक तैयारी सेहो अछि। माध्यमिक विद्यालयक पूर्वार्द्धसँ किशोरावस्थाधरिक पाठक लेल ई कृति उपयुक्त होयबाक सम्भावना अछि; छोट बच्चा लेल चुनल प्रसंगक सामूहिक कथावाचन अधिक उपयोगी होयत। ई पाठकीय मूल्यांकन अछि, प्रकाशकीय निश्चित आयु-वर्ग नहि।
मातृभाषामे एहन विस्तृत साहसिक उपन्यासक उपलब्धता भाषिक आत्मविश्वासक पक्षसँ विशेष महत्त्व रखैत अछि। मैथिली बालककेँ इहो अनुभव होइत अछि जे अपन भाषामे महल, राक्षस, गुप्त अभियान, राजनीतिक द्वन्द्व आ आत्मीय घरेलू संवाद एकसंग विकसित भऽ सकैत अछि। एतय बाल-साहित्य मातृभाषाक रचनात्मक विस्तारक साधन बनैत अछि।
भाषाशैली, संवाद आ सम्पादकीय अनुशासन
उपन्यासक भाषा सहज कथावाचनक अनुकूल अछि। संवादक पर्याप्त उपयोग घटनाक गति बनौने रखैत अछि। बाबीक बोलबाक शैलीमे आत्मीयता अछि; राजकीय पात्रसभक भाषामे औपचारिकता आ अधिकारक बोध भेटैत अछि। भाषाक ई भिन्नता पाठक केँ दुनू संसारमे सहज प्रवेश दैत अछि।
एकर संग किछु शैलीगत सीमा सेहो अछि। अनेक अवसरपर पात्रसभक संवाद केवल कथानकक आवश्यक सूचना दैत अछि। कथावाचक अथवा महात्मा द्वारा घटनाक नैतिक अर्थ तत्काल स्पष्ट कयलासँ पाठकक स्वतन्त्र व्याख्याक अवसर कम होइत अछि। दृश्य-रचना आ अन्तर्मुखी अनुभूतिक अनुपात आओर सन्तुलित होइत तँ प्रभाव गहिर होइत।
सम्पादकीय दृष्टिसँ कतिपय विवरण आ पुनरावृत्ति सङ्क्षिप्त बनाओल जा सकैत अछि, मुदा मैथिली शब्दरूप, वाक्य-लय आ मौखिक स्वरपर अनावश्यक मानकीकरण उचित नहि। भाषाक स्वाभाविकता स्वयं कृतिक रचनात्मक सम्पत्ति अछि।
आलोचनात्मक सीमा आ मूल्यांकनक सन्तुलन
कृतिक पहिल सीमा कथाक दीर्घ प्रस्तावना अछि। घरेलू आरम्भ सांस्कृतिक रूपसँ सार्थक अछि, मुदा मुख्य साहसिक घटनाक प्रारम्भ अपेक्षाकृत देरमे होइत अछि। दोसर सीमा नायकक अत्यधिक आदर्शीकरण; सुजीतक मानवीय कमजोरी आ निर्णयगत भूलक अवसर सीमित अछि। तेसर सीमा जादुई संरक्षणपर निर्भरता, जे किछु ठाम मानवीय प्रयत्नक जटिलता सरल करैत अछि।
चारिम सीमा खलनायकक कारण-विकासक अपूर्णता अछि। नयनावती आ जालिम सिंह सत्ता-लोभक प्रतिनिधि स्पष्ट छथि, मुदा हुनक अन्तर्द्वन्द्व आ सामाजिक परिस्थिति अधिक गहराइ पाबि सकैत छल। कल्लूक अतीत एहि सरलीकरणकेँ तोड़बाक सम्भावना खोलैत अछि, मुदा ओकरा बहुत विस्तार नहि भेटैत अछि।
पाँचम सीमा लैंगिक सक्रियताक असमान वितरण अछि। बाबी आ विशाखा अर्थनिर्माणमे निर्णायक छथि, मुदा शारीरिक अभियान आ राजनीतिक समाधानमे पुरुष नेतृत्व प्रमुख बनल रहैत अछि। छठम सीमा अन्तिम राज्यव्यवस्था आ दण्ड-न्यायक तीव्र समाधान अछि। पारिवारिक मेल-मिलापक बीच सार्वजनिक न्याय आ प्रजाक अधिकारक प्रश्न गौण रहि जाइत अछि।
एहि सीमा केँ उल्लेख करब कृतिक अवमूल्यन नहि। साहित्यिक आलोचनाक उद्देश्य रचनाक वास्तविक संरचना आ ओकर सम्भावना दुनू केँ देखेनाइ अछि। लोककथात्मक उद्देश्य, बाल-पाठकक रोमांचक आवश्यकता आ प्रकाशित मैथिली बाल-उपन्यासक ऐतिहासिक परिस्थिति ध्यानमे राखि मूल्यांकन करबाक चाही।
उपलब्धि : मैथिली बाल-उपन्यासक रचनात्मक विस्तार
‘स्वर्ण-कमल’क पहिल उपलब्धि मौखिक कथा-संस्कृतिक पुनर्स्थापना अछि। बाबी आ नेनासभक संग पठन-संबन्धक प्रस्तुति उपन्यासक मौलिक सांस्कृतिक स्वर बनबैत अछि। दोसर उपलब्धि अनेक खण्डमे फैलल निरन्तर साहसिक कथानक अछि, जाहिमे राजकुमारक यात्रा, राजकीय षड्यन्त्र, राक्षसक आतंक आ राज्यक पुनरुद्धार एक-दोसरसँ सम्बन्धित होइत अछि।
तेसर उपलब्धि साहसक नैतिक परिभाषाक विस्तार अछि। अपरिचितक सहायता, विश्वसनीय साथी बनायब, गुप्त सूचना जुटायब आ सहमतिक सम्मान करब वीरताक संग प्रस्तुत अछि। चारिम उपलब्धि अद्भुत, भयानक, वीर आ करुण अनुभूतिक मिश्रण अछि, जे बाल-पाठकक कल्पनाशक्ति केँ विस्तृत करैत अछि।
पाँचम उपलब्धि मातृभाषाक गद्य-विस्तार अछि। राजदरबारक औपचारिक संवाद आ बाबीक आत्मीय मैथिली एकहि पुस्तकमे सह-अस्तित्व रखैत अछि। छठम उपलब्धि नैतिक प्रश्नक बहुलता अछि: कोना न्याय करब, ककर विश्वास करब, गलत रास्ता चुननिहार व्यक्तिक संग कोन व्यवहार उचित अछि आ अधिकारसँ बेसी महत्त्वपूर्ण पात्रता किएक अछि।
समग्र रूपमे कृति न केवल राजकुमारक विजयक कथा थिक, बल्कि बालकक सुनबाक, पूछबाक आ विचार करबाक अधिकारक साहित्यिक स्मरण सेहो अछि।
निष्कर्ष
‘स्वर्ण-कमल’ केँ मैथिली बाल-साहित्यक लोककथात्मक साहसिक उपन्यासक रूपमे चिन्हित करब सर्वाधिक न्यायसंगत अछि। एकर मूल गतिशीलता राजकुमारक संकटपूर्ण यात्रा मे अछि, मुदा सांस्कृतिक मौलिकता बाबी-प्रफुल्लक कथावाचन सम्बन्धमे। एही द्विस्तरीय संरचनासँ कृति मौखिक परम्पराक आत्मीयता आ मुद्रित उपन्यासक विस्तारित साहसिक संसारकेँ एकसंग रखैत अछि।
सुजीतक विजय एकटा सरल ‘भलाइ बुराइ पर भारी’ प्रतिपादनसँ अधिक जटिल अर्थ ग्रहण करैत अछि। हुनक संघर्ष न्याय, विश्वास, सहयोग आ सहमतिक प्रश्न उठबैत अछि। संगहि, नायकक आदर्शीकृत रूप, चमत्कारक निर्णायक हस्तक्षेप, स्त्री-पात्रक सीमित स्वतंत्रता आ राजवंशीय समाधान आधुनिक आलोचनात्मक प्रश्न उठबैत अछि।
एहि अन्तर्विरोधसभक बावजूद पुस्तकक स्थायी साहित्यिक योगदान महत्त्वपूर्ण अछि। स्वर्ण-कमल शीर्षकक फूल कथा भीतर रक्षा आ आशाक साधन अछि; आलोचनात्मक अर्थमे ई मैथिली मातृभाषाक भीतर पीढ़ीसँ पीढ़ी चलैत कथा, स्मृति आ नैतिक कल्पनाक प्रतीक बनि उठैत अछि। राजमहलक आख्यान समाप्त भऽ जाइत अछि, मुदा बाबीक खिस्सा सुनबाक नेनासभक चाहना साहित्यक निरन्तरताक संकेत दैत अछि।
प्राथमिक स्रोत
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। २०१९। स्वर्ण-कमल (मैथिली बाल उपन्यास)। उपरदाहा, दरभंगा: गोसाउनि बैद्यनाथ स्मृति मंच।
झा, योगानन्द। २०१९। ‘मैथिली बाल उपन्यास : स्वर्ण-कमल’। नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’, स्वर्ण-कमल, पृ. ५–१६। उपरदाहा, दरभंगा: गोसाउनि बैद्यनाथ स्मृति मंच।
इतिहास आ संस्थागत सन्दर्भ
नवीन, देवशंकर। ‘मैथिली बाल साहित्य का विहंगम परिदृश्य’। गद्यकोश। (अवलोकन: २३ अक्टूबर २०२६)।
साहित्य अकादेमी। २०२३। List of Books Recommended for the Bal Sahitya Puraskar 2023, मैथिली अनुभाग। (अवलोकन: २३ अक्टूबर २०२६)।
साहित्य अकादेमी। ‘बाल साहित्य पुरस्कार (२०१०–२०२५)’, मैथिली पुरस्कार-प्राप्त कृतिसूची। (अवलोकन: २३ अक्टूबर २०२६)।
आलोचनात्मक आ सैद्धान्तिक सन्दर्भ
Propp, Vladimir. 1968. Morphology of the Folktale. 2nd ed. Translated by Laurence Scott; edited by Louis A. Wagner. Austin: University of Texas Press.
Nikolajeva, Maria. 2002. The Rhetoric of Character in Children’s Literature. Lanham, MD: Scarecrow Press.
Chambers, Aidan. 1993. Tell Me: Children, Reading & Talk. Stroud: Thimble Press.
समेकित निष्कर्ष
साहित्यिक उपलब्धि आ आलोचनात्मक सीमा
बारह कृतिक एहि संयुक्त पठनसँ नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’क लेखकीय पहिचान मुख्यतः समाजक आन्तरिक अन्तर्विरोधकेँ सार्वजनिक चर्चा बनएबाक प्रयत्नक रूपमे उभरैत अछि। कथा, उपन्यास, शब्दचित्र, गीत आ बाल-आख्यान जेकाँ भिन्न विधामे हुनकर भाषा आ कथन-विन्यास बदलैत अछि, मुदा मानवीय गरिमा, शिक्षा, अन्याय-विरोध आ लोकसम्बन्धक प्रति आग्रह स्थिर रहैत अछि।
समाजसुधारक प्रवृत्ति हुनकर रचनाक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि अछि; ओकर सीमा तखन सोझाँ अबैत अछि जखन कथक वा पात्रक वाणी कलात्मक दृश्यकेँ दबा कऽ निष्कर्ष पहिनहिं निर्धारित कऽ दैत अछि। स्त्रीक अस्मिता, वंचित वर्गक जीवन, ग्रामीण संस्था आ आधुनिक प्रशासनक चित्रण प्रायः प्रश्न उपजाबैत अछि, जखन कि समाधान कतिपय प्रसंगमे पात्रक नैतिक दृढ़ताक सहारे अत्यधिक शीघ्र प्राप्त भऽ जाइत अछि। ई अन्तर प्रत्येक कृतिक आलोचनात्मक मूल्यांकनमे महत्त्व रखैत अछि।
मिथिलाक गाम आ शहर एतय विरोधी ध्रुव मात्र नहि छथि। स्मृति, शिक्षा, जीविका, प्रवास, राजनीतिक अनुभव आ सांस्कृतिक कर्मक मार्फत दूनूक बीच सतत आवागमन चलैत अछि। एहि सामाजिक भूमि पर नन्दक साहित्य मानवीय सम्बन्धकेँ अपन मुख्य मापदण्ड बनबैत अछि। ग्राम्य संस्कृति प्रतिकेँ स्नेह आलोचनाहीन मोह नहि बनय, आ आधुनिक संस्था प्रतिकेँ विश्वास तकर शक्ति-संरचनाक प्रश्नकेँ ओझरा नहि दे—एहि सन्तुलनमे अनेक रचनाक आलोचनात्मक सम्भावना निहित अछि।
‘काव्य सरिता’ आ ‘स्वर्ण-कमल’ लेखकक रचनात्मक विस्तारक विशेष प्रमाण अछि। पहिल पोथी गीतात्मक परम्परा, लोकधुन आ सार्वजनिक चेतनाकेँ एकठाम अनैत अछि; दोसर बाल-पाठकक लेल पारिवारिक कथावाचन आ साहसिक कल्पनाकेँ दीर्घ आख्यानमे रूपान्तरित करैत अछि। एहि दुनूकेँ प्रौढ़ सामाजिक उपन्याससभक कसौटीपर यथावत् जाँचब उचित नहि; प्रत्येक विधाक अपन सौन्दर्यबोध आ पाठकीय अपेक्षा छैक।
समग्रतः नन्दक कृति-संसार मैथिली साहित्यक सामाजिक प्रश्न, लोकभाषी अभिव्यक्ति आ नैतिक कल्पनाकेँ अध्ययनक समृद्ध अवसर प्रदान करैत अछि। ओकर महत्त्व प्रशंसात्मक घोषणामे नहि, बल्कि ओहि प्रश्नसभमे अछि जे पाठककेँ समानता, न्याय, परिवार, सत्ता, नैतिकता आ भाषिक संस्कृतिक सम्बन्ध फेरसँ विचारबाक लेल बाध्य करैत अछि।
सन्दर्भग्रन्थ आ साहित्यिक अभिलेख
नन्द कुमार मिश्र ‘नन्द’क अध्ययनाधीन कृतिसभ
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। गाम-घर।
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। आडम्बर। २०१७।
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। गुदड़ीक लाल।
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। अनठिया कुकुर।
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। सुजाता।
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। सुकन्या। २०१९।
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। परिवार। २०२१।
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। दिल्लीक पार्क। २०१८।
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। याचक के नञि। २०२२।
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। महारानी कैकेयी।
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। काव्य सरिता। २०१९।
मिश्र, नन्द कुमार ‘नन्द’। स्वर्ण-कमल। २०१९।
मैथिली साहित्यक अभिलेखीय सन्दर्भ
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका। मैथिली पोथीक सूची (पोथी)। https://videha-ejournal.github.io/videha/pothi.htm
विदेह। मैथिली गद्य : लेखक आ रचनाक सूची। https://videha-ejournal.github.io/videha/prose.htm
विदेह। विदेह शिशु उत्सव : बाल-साहित्यक रचना आ ग्रन्थसूची। https://videha-ejournal.github.io/videha/kids.htm
विदेह। समानान्तर मिथिला एवं मैथिली साहित्येतिहास : लेखक, विधा आ साहित्यिक परम्पराक अभिलेख। https://videha-ejournal.github.io/videha/videha.htm
झा, हरिमोहन। कन्यादान। मैथिली उपन्यास।
नागार्जुन। पारो। मैथिली उपन्यास।
प्रेमचन्द। गोदान। हिन्दी उपन्यास।
पद्य Poetry
