वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.B R E A K the Language Barrier - Read in your own script Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
१.
सुजीत कुमार झा-कथा-फुल फुलाइए कऽ रहल
२.
सुमित आनन्द-
अक्षरपुरूष-विश्वनाथ
३.
नवीन कुमार आशा-
फेर सॅ वर रहलाह कुमार
१.
सुजीत कुमार झा
कथा
फुल फुलाइए कऽ रहल
इन्जनकँे शटिङ्ग करयकँे अवाज आबि रहल छल । बीच–बीचमे सिट्टी सेहो बाजि उठैत छल ।
सवारी गाडी आ माल गाडीकँे आबए जाएकेँ अवाज जोड़ सँ सुनाइ दऽ रहल छल । हम रोबोट जकाँ
इम्हर सँ ओम्हर भगैत कखनो ग्यास पर पानि रखैत छलहुँ तऽ कखनो सोनुकेँ दुधक गिलास
हातमे दैत छलहुँ । बीच–बीचमे हुनको आवश्यकता पुरा कऽ रहल छलहुँ । भोरक समय कोना बित
जाइया पते नहि चलैत अछि । ९ बजे धरि ओहो स्टेशन चलि जाइत छथि आ सोनु सेहो स्कुलक
लेल बिदा भऽ जाइत अछि । फेर हम रहि जाइत छी । आ हमर अस्त व्यस्त परल घर, जकरा हम
फेर सँ सजाबय लगैत छी ।
सोनु अपन ब्याग पिठ पर रखलक आ स्कूल चलि देलक, इम्हर ओहो हमरा बाँहि पर एकटा स्नेही
हात थपथपा चलि देला ।
राति सँ भऽ रहल झिस्सी आ बादलक कारण ठण्ढ महशुस भऽ रहल छल । हम आलमारीमे सँ साल
निकालि कऽ ओढि लेलहुँ ।
आगामे टेबुल पर हमरा दूनु गोटेकेँ बिबाहक पहिल वर्षगाँठक खिचल फोटो राखल छल । हम एक
टक्क देखैत रहि गेलहुँ, गुलाबी रंगक साड़ी पहिरने हम हुनकर कन्हाँ पर माथ रखने छलहुँ
। फोटो हम अपना हातमे लऽ लेलहुँ । हमरा अपन अतित अपने चारु दिस घुमय लागल प्रतीत
भेल । माँ बैठक रुम सँ अवाज लगौलक, ‘पिंकी, कनि बेटी, चाह बना कऽ ला नऽ ।’
हम भानस घरमे मचिया पर बैसि आलू सोहि रहल छलहुँ, बगलमे कोबीक तरकारी काटल छल, हमरा
कोबीक तरकारी बहुत नीक लगैत अछि, ओकरे देखि रहल छलहुँ । माँकँे प्रेम भरल अवाज सुनि
कऽ हमर हृदय जोड़–जोड़ सँ धड़कय लागल ।
हमरा बुझल छल एहि समय चाहक लेल किए कहल गेल अछि । रातिएमे हम माँ आ बाबुजीक बात
सुनि लेने छलहुँ । ओ बातक आधार पर हमरा ई पत्ता चलि गेल छल काल्हि जखन चारि दिनक
यात्रा सँ बाबुजी घर अएला ओहि क्रममे ट्रेनमे हुनका एक नवयुवक भेटल छल जे अपने
जातिक आ रोजगारमे लागल छल । ओ जयनगर स्टेशन पर सहायक स्टेशन मास्टर छला । बाबुजी
हुनकर बात सँ बहुत प्रभावित भेला आ किछु मिनेटक यात्रामे भेल बातक परस्पर घुलि मिल
गेलाक बाद बाबुजी हुनका सँ हमरा बिषयमे बात कएने छलथि । आ ओ सहमत भेलाक बाद बाबुजी
हुनका गाम जा कऽ हमर बिबाह एक प्रकार सँ तय कऽ लेने छलथि ।
हम एम ए पास भऽगेल छी, घरमे सभ हमर नोकरीक बिरोधमे अछि । जहिना–जहिना हमर उमेर बढि
रहल अछि, माँ आ बाबुजीक चिन्ता सेहो तारक गाछ जकाँ बढि रहल अछि । घरमे दान दहेज
देबाक लेल बुहत बेसी किछु नहि अछि, तैयो ओ अपन बेटीक लेल उपयुक्त बरक खोजीमे छला ।
कतेको लोक हमरा देखय आएल, मुदा वा त बहुत तिलकक अभाव आ फेर हमर पिरसियाम रंगक कारण
बातचित बढिए नहि रहल छल । एहि सभबीच हमर अपन छोट सन सुन्दर घरक कल्पना टुटैत महशुस
भऽ रहल छल । बाबुजीक बताओल बातक आधार पर हमरा मनमे एहि युवककेँ छवि बनि कऽ आबि रहल
छल, हृदय जोड़ सँ धड़ैक रहल छल । धड़कैत हृदय सँ चाह बना कऽ ओढ़नी ठीक करैत बैठक रुममे
चलि गेलहुँ । बाबुजी आ माँ बहुत खुशी देखाइ दऽ रहल छल । माँ ओ युवककेँ सम्बन्धमे
जानकारी देलन्हि ।
हमरा लागय लागल जेना लम्बा पतझरकेँ बाद बहार आबि गेल अछि । चारु दिस गाछ सभ पर
हरियर कनोजरि फुटि गेल अछि ,
अपन भावनामे हम स्वयं बहैत जा रहल छलहुँ, बादमे ओ युवककेँ फोटो सेहो हमरा देखाओल
गेल । देखि कऽ दंग रहि गेलहुँ अनायासे मुहँ सँ खसि पड़ल अबेरे सँ किए नहि मुदा मोन
जोगर जीवन संगी भेट रहल अछि ।
शायद एतेक सुन्दर पढ़ल लिखल युवक सँ हमर संसार बसय बला छल । एहिद्वारे एखन धरि हमर
हिसाब किताब नहि बैसल छल । फोटो हातमे लऽ हम इहे सभ सोचि रहल छलहुँ ।
‘चट्ट मगनी पट्ट बिबाह’ बला बात भेल । एतेक बढियाँ लड़का कही हात सँ नहि निकलि जाए
एहिद्वारे बाबुजी एक महिना भितरे बिबाह दुरागमन सँ निबैट गेला ।
लड़काक बाबु नहि छल माँ गामेमे रहैत छली । अगहन महिना जाढ़ शुरुए भऽ रहल छल जाहि पर
मन पसिनक सँग हमर कल्पनाक रंग आकाशमे चारु दिस छिरिआए लागल । चारि दिन सासुरमे
रहलाक बाद जयनगर स्टेशनक लेल बिदा भऽ गेलहुँ । ओ स्थानक लेल हम तऽ ओहिना बहुत
उत्सुक छलहुँ । पतिक व्यवहार सेहो बहुत बढियाँ छल । हुनक हँसमुखक अनुहारकँे अएना
जकाँ देखैत छलहुँ । एक दोसर सँ बातचित करैत कखन जयनगर स्टेशन आबि गेल पते नहि चलल ।
‘पिंकी, स्टेशन आबि गेल ।’ हुनकर अबाज सुनाइ देलक, हम एकदम चौक कऽ जल्दी सँ उठि अपन
माथ झाँपय लगलहुँ । कनिक लाजो भऽ गेल पतिक नोकरी बला स्थानपर पहिल बेर अएलहुँ अछि ।
फेर जल्दी–जल्दी हुनकर पाछु लागि गेलहुँ । ओ ब्याग हातमे लऽ आगा–आगा जा रहल छला ।
हम सोचि रहल छलहुँ स्टेशन पर हुनकर चिन्हा परिचयकँे दू तीन गोटे मित्र हमरा अवश्य
लेबए अएता, कारण ओ बता रहल छलथि एतेक जल्दीमे बिबाह भेल की ककरो आबएकेँ सम्भव नहि
छल । मुदा आश्चर्य लागल जखन किओ देखाइ नहि देलक । हम असगरे समान सभ लऽ हुनकर पाछु
चलि रहल छलहुँ । जयनगर स्टेशन सँ किछुए दुर पर किछु क्वाटर सभ बनल छल । एक केँ बाद
एक क्वाटर छुटि रहल छल हमरा बुझएमे किछु नहि आबि रहल छल । अन्ततः एकटा छोटका
क्वाटरक आगा पहुँच कऽ ओ गेटक ताला खोललन्हि । छोट रुम ओहि सँ सटले एकटा भानस घर आ
पाछूमे बाथरुम छल । भानस घरमे आठ दशटा बरतन आ कनिमनि डिब्बा राखल छल । एकटा पुरान
पेटी सेहो छल ।
ई की ? हम अबाक भऽ हुनका दिस ताकय लगलहुँ । ई सभ हमरा अपना आपमे अप्रत्याशीत आ अजिब
जँका लागल ।
‘एना की देखि रहल छी ? एखन क्वाटर नहि भेटल अछि । एहिद्वारे एहिमे रहि रहल छी ।
जहिना क्वाटर भेटत बदलि लेब,’ फेर ओ बातकेँ आगा बढबैत कहलन्हि, ‘ओना एखन धरि असगरे
छलहुँ किए बड़का घर लितहुँ । आब अहाँ आबि गेल छी तऽ बड़का घरक कोशिश करब ।’ ओ लग आबि
कऽ हमरा बाहि पर हात थपथपा खुशी कऽ देलन्हि ।
एक दू दिनक बाद ओ अपन काज पर सेहो जाए लगलथि आ हम असगरे रहय लगलहुँ । धीरे–धीरे लग
पासक महिला सभ हमरा लग आबय लगली । एक दिन चालीस पैतालीस बर्षक एक महिला हमरा घर
बाटे जाइत छली । हमरा देखि कऽ टोकि देली । भेष भुषा आ बातचित सँ पत्ता चलल ओ एतयकेँ
स्टेशन मास्टरक कनियाँ छथि । एखन धरि जतेक महिला अबैत छली, पारस्परिक बिचारधारा आ
स्तरमे समान्य लगलाक कारण किछु जमि नहि रहल छल । ई सोचि कऽ जखन स्टेशन मास्टरक
कनियाँ अछि तऽ बातचितमे आनन्द आओत, हम हुनका आदर सँ घरमे अनलहुँ आ खुलि कऽ बातचित
करय लगलहुँ ।
‘लगैत अछि, अहाँ बहुत पढल लिखल छी ?’ एका एक ओ पुछलन्हि ।
‘हँ हम एमए पास छी’ हम गर्व सँ कहलहुँ ।
‘अहाँकँे बुझल अछि, अहाँक पति एतय की करैत छथि?’ ओ गम्भिरता सँ पुछली ।
‘हँ, एतय ओ सहायक स्टेशन मास्टर छथि ।’ हम ओही गर्व सँ उत्तर देलहुँ ।
‘ई अहाँ सँ केँ कहलक अछि ?’ ओ फेर सँ प्रश्न कएली ।
‘ओहे हमरा आ हमर नैहरक लोककँे कहने छलथि ।’ हम आब सतर्क भऽगेल छलहुँ आ संगहि
आश्चर्य सेहो भऽरहल छल की कतहुँ गरबर तऽ नहि छैक ।
‘तऽ आब सुनु, अहाँक संग धोखा भेल अछि । ई जगदिश एहि स्टेशनक पैट म्यान अछि ।’ ओ एक
एक शब्द पर जोड दैत कहलन्हि ।
हमर माथ घुमय जकाँ लागल एखन धरि हमरा सन्दर्भमे जतेक घटना घटि रहल छल, ओ हमरा
अप्रत्याशित लागि रहल छल, ई नयाँ बात सुनि हम स्तब्ध भऽ गेल छलहुँ । ई तऽ हम
कल्पनामे सेहो नहि सोचि सकैत छलहुँ । हम ओ महिलाके मुहँ दिस देखि रहल छलहुँ । हमर
मोन एखनो अपन प्रियतमक लेल ई बात मानयकँे लेल तैयार नहि छल ।
शायद ओ हमर मोनक बात बुझिगेल छली । दू मिनेटक चुप्पिक बाद हमरा कनहा पर हात रखैत
कहलन्हि, ‘एना लगैत अछि अहाँकँे हमरा बातक बिश्वास नहि भऽ रहल अछि । हम अहाँकेँ
धोखामे राखय नहि चाहैत छी । एहिद्वारे काल्हि भोर दस बजे अहाँ हमर घर चलि आउ ओ
तरकारी लऽ कऽ आओत । हमरा घरक तरकारी ओहे अनैत अछि ।
तखन अहाँकँे सभ सत्य पत्ता चलि जाएत ।
ई कहि कऽ ओ तऽ चलि गेली, मुदा हमर मस्तिष्कमे एकटा बबंडर उठल छल ।
हम ओहि ठाम बैसल आँखि सँ दूर किछु देखय लगलहुँ । हमरा एहि सभ पर बिश्वासे नहि भऽरहल
छल । मुदा बेर–बेर एकटा बात घुमि रहल छल ओ अपरिचित महिलाकेँ हमरा सँ एहन झुठ
बाजयकँे किए आबश्यकता पड़ि गेल ।
मोन कहलक, ‘पहिने सही बात पता लगाली, फेर हुनका सँ किछु कही’ ई सोँचि कऽ ओहि दिन हम
समान्य जकाँ बनल रहलहुँ ।
दोसर दिन भोर दस बजे हुनका गेलाक बाद स्वयं तैयार भऽ कऽ ठीक दस बजे छोटका क्वाटर
छोड़ि बड़का क्वाटर दिस बढि गेलहुँ ।
‘आउ, बैसु ।’ स्टेशन मास्टरक कनियाँ बहुत स्नेह सँ हमरा अपना लग बैसा लेलन्हि । हम
दूनु गोटे आपसमे बातचित कऽ रहल छलहुँ की ओ तखने आबि गेला । बास्तबमे तरकारीक बड़का
झोड़ा लेने घाम सँ तर उपर छलथि ।
जहिना हम दूनु एक दोसरकँे देखलहुँ, ओहो स्तब्ध रहि गेला, किछु देरक लेल ओ ठगल जँका
ओतहि ठाढ़ रहि गेला । फेर मनकेँ शान्त करैत ओ जल्दी सँ बाँकी पैसा स्टेशन मास्टरक
कनियाँकेँ पकरा तिर जँका भागि गेला ।
आब सभ स्थिति हमरा आगा स्पष्ट भऽ गेल छल । हम लजाइत जल्दी सँ घर आबि द्वार बन्द कऽ
चौकी पर उल्टा सुति हिचैक– हिचैक कऽ कानय लगलहुँ । की ई धोखा खाएकँे एतेक बड़का
संसारमे हमही रहि गेल छलहुँ । चौबिस बर्षक बाद एकटा छोटका बगैचा चाहलहुँ ओहो काँट
सँ भरल निकलल ।
हमरा हुनका पर बहुत तामस आबि रहल छल । ओ बढ़िया कपड़ा पहिर, अपनाके स्मार्ट देखा कऽ
हमरा बाबुजीकेँ धोखा देलन्हि की ओ सहायक स्टेशन मास्टर छथि, जखन की छथि एकटा पैट
म्यान ।
जीबनक उल्लास शुरु भेलो नहि छल की समाप्त होबय जकाँ प्रतित होबय लागल । हम सोचि रहल
छलहुँ, ‘नैहरमे, कुटमैतामे, सँगीमे कोना मुहँ देखाएब । सभ हमरा पर हँसत की पैट
म्यान सँ बिबाह कएने अछि । माँ बाबुजी सेहो भग्यकँे लऽ कऽ कन्ता ।’
हमरा दिमागमे रंग–विरंगक बिचार आबि रहल छल । हम दिन भरि किछु नहि खेलहुँ आ नहि कोनो
काज कएलहुँ । जखन ओ ६ बजे अएलाह तखने हम चौकी पर सँ उठि हुनका खुब बात कहलहुँ ।
‘अहाँ हमरा धोखा किए देलहुँ ? हमर जीवन किए बरबाद कएलहुँ ? एकटा एमए पास लडकीकँे
कनियाँ बना कऽ किए अनलहुँ’ हम हुनका पर एकदम बरसि रहल छलहुँ ।
ओ एक दम शान्त भऽ हमरा दिस देखैत बजला, ‘नहि पिंकी, एहन बात नहि अछि । हमरा मोनमे
कोनो धोखा देबाक बात नहि छल, हम अहाँ सँ पे्रम करैत छी आ करैत रहब .....’
बात काटि कऽ हम तेजी सँ हुनकर नजदिक आबि कऽ चिचिएलहुँ, ‘पे्रमक एतय की प्रश्न अछि ?
अहाँ अपन औकात तऽ देखु एकटा पैट म्यान भऽ कऽ अहाँ हमरा सन लडकी सँ बिबाह कएलहुँ आ
आब कहैत छी धोखा नहि देलहुँ अछि । हम अहाँ सँग नहि रहि सकैत छी ।’
‘सुनु पिंकी हम अहाँकेँ कोनो बातक लेल जोड़ नहि देब मुदा हम साँच कहैत छी, हम एसएलसी
धरि पढल छी आ आगा पढयकँे हमर बहुत इच्छा छल मुदा बाबुजीक आकास्मिक मृत्यु आ धनाभावक
कारण हमर पढाइ रुकि गेल । एसएलसी कएलाक बाद कतहुँ नोकरी नहि भेटल । अन्तमे एहिठाम
काज करय लगलहुँ ।’ ओ गारा बाझल अबाजमे कहि रहल छलथि ।
‘हमरा ई सभ नहि सुनयकेँ अछि आ नहि अहाँकँे मजबुरीमे हमर कोनो दिलचस्पी अछि । हम आब
एतय एक क्षण नहि रुकि सकैत छी । काल्हि भोरे गाडी सँ चलि जाएब ।’
‘हम अहाँकेँ रोकब नहि आ नहि अहाँकेँ रोकयकेँ अधिकार अछि । हम अपन गल्ती स्वीकार
करैत छी, मुदा एकटा बात धैर्यताक संग सुनु पिंकी, हम ई सोचि कऽ बिबाह कएने छलहुँ जे
अहाँके हिम्मत पाबि कऽ आगाकँे पढाइ पुरा करब । हम जे सपना देखने छी, ओ एहि जीवनमे
पुरा करब । मुदा अहाँ नहि चाहैत छी तऽ अहाँकँे इच्छा ।’ ओ हमरा नजदिक अबैत बजलथि आ
हमरा कनहापर हाथ राखयकँे प्रयास कएलन्हि । मुदा ओहि समय हम एक घाइल शेरनी जकाँ
तमसायल छलहुँ । हम हुनकर हात जोड़ सँ झटैक देलहुँ आ बिना हुनका देखने रुमकेँ भितर सँ
बन्द कऽ पड़ि रहलहुँ ।
ओ राति निन्द हमरा सँ कोशो दूर छल । बाहरक पद चाप सँ हमरा आभास भऽ रहल छल ओ
बरण्डेमे एम्हर–ओम्हर टहैल रहल छला । बहुत देर धरि हम आबेशमे किछु नहि किछु सोचैत
रहलहुँ ।
बहुत देरक बाद जखन मोनक बिहारि कनिक कम भेल तखन बिचार करय लगलहुँ, ‘काल्हि हमरा
जेबाक अछि । मुदा जाएब कतय ? बाबु जीक लग ? मुदा ओ घर तऽ हम छोड़ि आएल छी । आब की
ओहने आदर हमरा फेर भेटत ? सभ खिस्सा बता देलाक बाद बाबुजी उल्टे तमसेता । हुनकर
तबीयत आओर खराब भऽ जाएत । माँकेँ तऽ ओहिना ब्लड प्रेसर अछि, ओ कहुँ बेहोस भऽ गेल त
? निश्चय हमरा सहानुभूति भेटत, मुदा कहिया धरि ? धीरे–धीरे सभ समान्य भऽ जाएत ।
मुदा हमराकँे अपनाओत ? हमरा भविष्य पर परित्यक्ताक छाप लागिए जाएत ।
‘पड़ोसी, सँगी, सरकुटुम्ब जे सुनत, हमरा मुहँ पर सान्तवना देत, मुदा पीठ पाछू हमर
मजाक उडाओत । एतय सँ गेलाक बाद जे भविष्य हम बनाबय चाहैत छी की ओ सम्भव हैत ?
भवाबेशमे कोनो नयाँ कदम उठाबय सँ पहिने हमरा ई बढियाँ जकाँ सोचि लेबाक चाही की नयाँ
चाल टुटल जीवनकेँ जोड़ि सकत वा नहि ?
‘हुनका बदनामी कएला सँ की हमरा बदनामी नहि हैत ? जिनका सँग सुख दःुख निर्बाह करबाक
बचन लेने छलहुँ, यदि ओ गल्तीए कएने छथि तऽ की हम एहि दुखित हालतमे हुनका छोड़ि चलि
जाइ ? तऽ हम कि करु ?’ हमर पढाई बिबेक काज कएलक । हमरा धीरे–धीरे एना लागय लागल,
‘हमरा ई घर नहि छोड़बाक चाही । आब तऽ हमरा अपन एहि काँट भरल बाटिकाकँे कोशिश कऽ कऽ
फुल सँ भरल बनाबयकेँ चाही । चिड़ै जखन खोता बनबैत अछि तऽ खरपतारसभ निच्चा खसैत रहैत
अछि मुदा ओ कहियो हिम्मत नहि हारैत अछि । अपन खोता पुरे करैत अछि । फेर हम तऽ पढल
लिखल महिला छी । ओ कहि रहल छथि तऽ शायद ओहो ठीक होथि । सम्भव अछि अपन साधना अधुरा
रहलाक कारण आब हमर माध्यम सँ पुरा करय चाहैत होथि आ फेर हम तऽ हुनकर अर्धागिनी छी ।
महिला तऽ शक्ति होति अछि, पुरुषकँे पौरुष स्त्रीसँग पुरा होइत अछि ।
‘हमरा एखन हिम्मत नहि हारबाक चाही । जखन एहि घरमे आबिए गेल छी तऽ एहि घरकँे रोशन
करबाक प्रयत्न करब ।’
पुरे राति इहे सोच साँचमे निकलि गेल । जखन सुति कऽ उठलहुँ तऽ उज्जर किरण जँका हमर
मन सेहो साफ भऽ गेल छल ।
ओ धुनक धनी छला ।ओ अपन पढाइ फेर सँ शुरु कएलन्हि । हमहुँ बोर्डिङ्ग स्कुल पकड़ि
लेलहुँ । दूनुकँे त्याग, तपस्या आ साहस बास्तबमे रंग देखौलक ओ सात सालमे एमए कऽ
लेलन्हि । ओ बास्तवमे सहायक स्टेशन मास्टर बनि गेला । हमर बँगैचामे छोटका फुल सोनु
सेहो चलि आएल । आब हम नोकरी छोड़ि देने छी ।
कतहँु दुर सँ आबि रहल सीट्टीक आबाज सँ हमर ध्यान भंग भेल । हम फोटो टेबुल पर राखि
देलहुँ आ खिड़की सँ बाहर दिस तकलहुँ ....कतहुँ दूर रेलक पटरीकँे दूनु कोर एक दोसर सँ
मिलैत नजरि आबि रहल छल ।
२.
सुमित आनन्द
अक्षरपुरूष-विश्वनाथ
समाजशास्त्रक लब्धप्रतिष्ठ विद्वान
प्रोफेसर डॉ0 विश्वनाथ अपन अमर कृतिसँ मैथिली साहित्यमे जे
स्थान प्राप्त कए चुकल अछि से वस्तुतः मैथिलीयोक विद्वान, प्राध्यापक सुभचिन्तक
लोकनिक हेतु दुर्लभ अछि। ई अपन छात्रावस्थहिसँ प्रायः महाविद्यालयमे प्रवेष करितहि
पठन-पाठनक विशय किछु रहनि मुदा मैथिलीक सेवामे संलग्न भए गेलाह। ओहि समयमे
समाप्ताहिक मिथिला मिहिर सबसँ लोकप्रिय आ दीर्घजीबी पत्रिका छल जाहिमे हिनक रचना
मासमे एक वा दूटा अवश्य छपैत छल।
मैथिली साहित्यमे डॉ0 विश्वनाथ एकदिस जँ व्यंग्य कथाकारक रूपमे प्रतिष्ठित
भेलाह तऽ दोसर दिस ई एकटा नव विद्या पर कलम उठओलनि जे थिक साक्षात्कार विद्या। एहि
विद्यापर ओहि समयमे बहुत कमे लोक लिखने छलाह।
डॉ0 विश्वनाथक तीन गोट प्रकाशित पोथी अछि अक्षर-अक्षर अमृत,
युगान्तर एवं जुलुस रूकल अछि। एहिमेसँ पूर्वक दुनू साक्षात्कार विद्या पर अछि आ
तेसर कथा पर आधारित।
हिनक अक्षर-अक्षर अमृत जे जहिना वृत्यनुप्रास अछि तहिना ओहिमे संगृहीत सात गोट
महापुरूषक अन्तर्वीक्षा वस्तुतः साहित्यक
अलङकारे थिक। एहिमे जाहि वरेण्य साहित्यकारक साक्षात्कार
प्रस्तुत कयल गेल अछि ओ थिकाह-मधुप, किरण, हरिमोहन झा, तन्त्रनाथ झा, सुमन यात्री
एवं आरसी प्रसाद सिंह। डॉ0 साहेबक सर्वप्रथम अन्तर्वीक्षा 1976 मे छपल जे कवि
चूड़ामणि ‘मधुप’ संग छल आ तकर बाद तऽ ओ गति पकड़ि लेलक। एहिमे
जाहि सातगोट शीर्षस्थ साहित्यकार लोकनिक साक्षात्कार
प्रस्तुत कयल गेल अछि तनिक जन्म 1906 सँ 1911 केर कालखण्डमे भेल छल।
समाजशास्त्री डॉ0 विश्वनाथक दोसर साक्षात्कारक पोथी थिक
युगान्तर जाहिमे 1912 सँ 1933 धरिक कालखण्डसँ नओ गोट मूर्धन्य साहित्यकारक
अन्तर्वीक्षा प्रस्तुत कयल गेल। एहि पुस्तकमे जनिक अन्तरंग वार्ता संगृहित अछि ओ
थिकाह - व्यास जयकान्त मिश्र, उमानाथ झा, जटाशंकर दास,
गोविन्द झा अणिमा सिंह, आनन्द मिश्र एवं लिली
रे। ई नवो व्यक्तित्व प्रातः स्मरणीय छथि।
मैथिली साहित्यक रीढ़ छथि।
डॉ0 विश्वनाथ जेहने आलोचक तेहने कथाकार जेहने कवि तेहने व्यंग्यकार जेहने भाषणकर्ता
तेहने मंचसंचालक। हिनक कथा संग्रह ‘जुलुस रूकल अछि’ अत्यन्त रोचक ओत्सुक्सवर्धक आ
शिक्षाप्रद अछि। मैथिली साहित्यमे हिनक कथा
संग्रह-प्रर्याप्त लोकप्रियताकेँ प्राप्त कयलक। हमर विश्वास
अछि जे डॉक्टर साहेब अपन एहने रचना सभसँ मैथिली साहित्यक उद्यानकेँ सुरभित करैत
रहताह।
सुमित आनन्द
मैनेजिंग एडीटर
सोसाइटी टुडे,
अम्बेदकर स्टडीज सेन्टर
सी. एम. कॉलेज, दरभंगा
३.
नवीन कुमार आशा
फेर सॅ वर रहलाह कुमार
आजुक परिस्थिति मे अगर कोनो वरक कथा-वार्ता आबै छनि तँ ओ हुनका पर उपकार होइत
अछि, आ अगर वर लोकनि कथाक चर्चा सुनै छथि तँ ओ भलेहि उपर सॅ तमसाइथ
मुदा अंदर सॅ खुश
रहै छथि, आखिर आबि गेल वैवाहिक जीवनक समय।
एहिना किछु घटलनि हमर पिताजी संग।
आ सोचू अगर कोनो वरक कथाक गप्प ओकरा सॅ कएल जाए तँ ओ कते प्रसन्न होएत, एहिना हमर पिताजी संग भेल।
संजीवजी हालहि मे गाम आएल छलाह, हमर पिसियौत बहिनक विवाहमे। ओइ ठाम हुनकर विवाहक गप्प चलल तँ ओ काफी खिसिया गेलाह मुदा ओ भितरकी मुस्की मारैत छलाह। विवाहक दोसर दिन संजीवजी वापिस दिल्लीक रेल पकड़ि चलि गेलाह। आब विवाहक हिसाव सॅ एक बेर कनियाक द्वितीय यात्रा होइत अछि, आई भोर मे बहिनकेँ अयबाक छलनि से आनइ लेल हम आ हमर भाइजी गेलौंह, ओतय काफी मजा आएल, आ ठाकुरजी सेहो अयलाह, आजुक कार्यक्रम छनि किछु विध-बाध हेतनि। ठाकुरजी (वरक) पहिल यात्रा अपन सासुरक काफी तनाव पूर्ण होइत अछि, काफी शुभ-शाभ्र बैसल छलाह लेकिन कते काल ओहो बरदा्स्त करताह किएक तँ सार-साइर हुनका लग गप्प दैत छलखिन। आब सॉझुक पहर अछि, सभ बइसल छथि ओइ बीचमे बिना पहिचानल नम्बर सॅ फोन केनाइ आरंभ भेल, ओइ क्रममे एकटा फोन संजीवजी लग आएल। संजीवजी कार्यालयमे छलाह।
ओम्हर सॅ आवाज आएल ‘‘बौआ बाबूजी छथि’’....
संजीवजी...... नहि.....
ओम्हर सॅ ........ श्री कांती जी राय, दुर्गागंज सॅ बाजि रहल छी, अहॉक बाबुजी सॅ काज
छल कृपा कऽ कय हुनकर पता देब
, किछु आवश्यक काज छल।
संजीवजी.........जी अवश्य (फेर हमर पिताजी सोचलथि, आखिर की बात) फेर बाजला.....जी
देखि कऽ
दैत छी।
....
श्री कांतिजी राय.............बौआ....बौआ.......अहॉ की करै छी..(अत्यधिक कम स्वरमे) ऐ आवाज पर सभ हॅसय लागल तँ राय जी फोन काटि देलखिन।
कनिक काल बाद फेर फोन
भेल।
राय जी........बौआ अहॉ की कतय कार्य करै छी...
अहि पर संजीवजी .......जी हम अपनेकेँ कनि कालमे फोन करै छी?
संजीवजी कने प्रसन्न छथि की आखिर हमर नम्बर आएल।
आ एम्हर सभ कियो हल्ला केलक ‘‘ बनि गेलाह बुरबक।
फेर ओही राति मे फोन नै भेल आ एम्हुरका लोग बुझथि जे हमरा लोकनि तँ नहि बनि गेलौंह बुरबक।
फेर भोर भेल। आइ बहिनकेँ लऽ कय हुनक सासुर जेबाक छल, हम सभ भोरे उठलौं, फेर ठाकुरजी लग
गेलौं तँ ओ पुछलथि
जे ओ एला क?
तँ जवाब देलयनि की नहि-नहि।
फेर हम सभ श्री कांतीजी रायक प्रतिमूर्ति संग लऽ गाड़ी मे बैसलौं, कनि काल
सन्नाटा छायल किए तँ बहिन कानै छलीह। किछु कालक बाद हम सभ चौक क्रास कयलौं तँ
ठाकुरजी कहलथि- ‘‘रायजी केँ फोन घुमाओल जाय, फेर
एक दू बेर ओ नहि उठेलाह, तँ हम सभ कियो
सोचलौं जे बनला रायजी बुरबक।
फेर कनिक काल मे
एकटा मिस कॉल आयल तँ फेर रायजी केँ फोन घुमायल गेल, एहि बेर सभ
अत्यन्त चुप छल, फेर
शुरू भेल वरक(संजीव) वार्तालाप।
रायजी ..... बौआ हम राय जी़
संजीव....... जी
रायजी.........बौआ अहॉ पता नहि
प्रेषित कयलौं, कनि अहॉक बाबुजी सॅ
काज छल।
संजीव..........जी हम राति मे व्यस्त छलौं।
( गाड़ी मे सभ हॅसय लागल फेर इशारा भेल चुप रहबाक)
रायजी.........बौआ, एकरा खराब नहि मानब,
एकटा गप्प
पूछी?
संजीव.........जी अवश्य।
रायजी.........बौआ की करय छीयै अहॉ,
संजीव..........(काफी कम स्वर मे) जी हम नोएडा मे कार्यरत छी,
एकटा
मल्टीनेशनल कंपनी मे।
रायजी.........(काफी कठोर स्वर मे) वाह...वाह
बौआ
एकटा गप्प बुझबाक छल, पुछु.......
संजीव...........जी अवश्य
रायजी...........हमर जेठ बालक ग्रेटर कैलाश मे रहैत छथि,
अगर अहॉ खराब नहि मानी तँ ओ अहॉ सॅ भेट करऽ चाहैत छथि की अहॉ
हुनका सॅ भेट कऽ सकै छियैन्हि।
(संजीव कनी काल सोचलाह फेर बुझलनि की कथा वार्ताक गप्प अछि)
संजीव..........जी हमर रात्री कालीन कार्य अछि अगर अपनेकेँ ऐतराज नहि
हुअए तँ भोर मे भेट कऽ
सकै छथि।
रायजी...........बौआ पता तँ अहॉ पठा दिअ किएक तँ हम विदा भऽ गेल
छी, अपनेक बाबुजी सॅ आवश्यक कार्य अछि, अगर
एक
बेर
रास्ताक जानकारी दऽ
दैतौंह तँ ठीक रहितय।
(फेर की छल उत्साहित संजीवजी पता बता देलखिन्ह आ राय जी सेहो बौआ........बौआ कऽ रहल
छलखिन्ह। राय जीकेँ सख्त हिदायत भेटल रहन्हि की अंग्रजी
शब्दक प्रयोग नहि करथि।)
संजीव.......... जी हम कनि देर मे पता भेज दैत छी।
रायजी......... अच्छा.....अच्छा.....(कनि मुस्कुराइत) फोन काटि दैत छथि।
आब आगूक ब्यूह रचना तैयार भेल, ठाकुरजी बजलाह.... आब की करब, ममिया ससुर कें तँ मन
मे लडडू फूटैत हेतैन्हि।
ओना संजीव प्रफुल्लित छलाह, आब विवाहक समय ऐलन्हि जे।
भोरे-भोर हम सभ कियो बहिनक सासुर पहुचलौं, ओतय कनी काल धरि
ऐ प्रकरण पर गप्प चलल आ
सभ इंतजार करय लगलौं, पर ओइ दिन
केओे नहि आयल। आब हम सभ
एकटा समयक इंतजार कऽ
रहल
छलौं, राय जी सेहो प्रसन्न छलाह।
आइ निकिताक द्वितीय-यात्राक बाद पहिल दिन हुनकर सासुर हम आ
प्रत्युष (भाईजी) दुनु गोटा जा रहल छी, किएक तँ ठाकुरजीक किछु समान हमरा लग
छलन्हि। हम सभ ओतऽ पहुंचलौं, ओ सभ काफी सुशील आ विनम्र छथि। हमरा सभकेँ जिज्ञासा छल
की आखिर संजीव
किछु कयलथि की नहि। ओतय पहुंचलाक बाद पता चलल की
केओ नहि भेजल गेल।
ठाकुरजी कहलथि की एतय सभकेँ रायजीक गप्प कहलियैन्ह तँ सभ कियो खुब हँसलथि। फेर राय
जी सोचलाह की फोन
कएल जाय की नहि, तँ निष्कर्ष निकलल की नहि एखन प्रतिक्रिया आबय
दियौ।
हम सभ सायं काल वापस आबि गेलौं। घर पर पहुंचलाक बाद संजीवक बाबुजीक फोन हमर
मोबाइल पर आयल, तँ हम खूब नीक जकॉ गप्प कयलौं। फेर हमरा सॅ गप्प करैक क्रम मे कहलथि
की कनी फोन अपन बाबूकेँ दियौन्ह। हम पछबरिया घरक बरामदा पर बइसल अपन बाबूकेँ फोन
देलियन्हि
आ कहलियैन्ह जे दादाजीक फोन अछि, आ ओतय गप्पी जकॉ
बैसि गेलौं, किएक तँ
मोन
मे होइत छल की हो
ने हो कथा वार्ताक गप्प कहबे करथिन्ह।
गप्प आरंभ भेल .... दादाजी हाल चाल बूझैक बाद कहलथिन्ह की संजीवक विवाहक गप्प भऽ
रहल छनि काते कात गप्प छनि।
बाबु............. कतय सॅ , कोन गाम
दादाजी...... दुर्गागंज, बुझाइ अछि मजिस्ट्रेट परिवार सॅ
बाबु............. कोन परिवारक छथिन्ह
दादाजी........चौधरी परिवार सॅ
शायद
बाबु............ की चौधरी परिवार या राय परिवार
दादाजी.........ओएह किछु, वर सॅ गप्प भेलन्हि पर वर नहि बुझय देलखिन्ह जे
ओ वर छथि।
बाबु............. अच्छा...अच्छा (हॅसिते-हॅसिते)
(कात मे बैसल राय जी सेहो मंद मंद हॅसैत छथि ओहि बातक
जानकारी ककरो नहि छनि सिवाय
एक दू गोटा
छोड़ि कऽ)
दादाजी..........हॅ आबथि तखन सोचि छी पर वर नहि तैयार छथि
बाबु.................नहि नहि हम बुझा देबन्हि , नीक घर
छै, करता करता..
दादाजी...........हॅ मंगैत छलखिन्ह नम्बर आ पता
बाबु ............ हॅ
आर सभ ठीक, संजीव सभ
ठीक
ने
दादाजी............हॅ हॅ , ठीक छथि।
फेर फोन काटि दैत छथिन्ह आ आब राय जी बाबु सभ टा गप्प बतबै छथि, फेर सभ हॅसै
छथि। आ फेर बाबु बिगड़ै सेहो छथि, एना नहि करैक चाही, फेर हॅसै छथि, बाते तेहन छैक।
आब
ऐ बातक जानकारी ठाकुरजीकेँ देलियनि तँ
ओहो प्रसन्न भेलाह आ कहलथि आखिर फँसि
गेलाह हमर ममिया ससुर विवाहक चक्कर मे। फेर सब एहि विषय पर सोचैत सोचैत
कय काफी
हॅसला। फेर रायजी काफी उत्साहित छलाह आखिर कथा प्रगति पर छनि।
आब फेर सभ विचार कैलथि की फोन कएल जाय
वा नहि तँ ठाकुरजी विचार देलखिन्ह की नहि
एक
बेर
आर प्रतिक्रिया आबै दियौ तखन
ई प्रक्रम आगु बढ़ाएब। आखिर संजीव विवाह लेल
फुर-फुर कय रहल छथि, आइ ई गप्प बुझी कऽ सभ
(खास कय कऽ रायजी) अत्यन्त प्रसन्न
छथि।
ओना संजीवजी सेहो
ऐ कथा
वार्ताक गप्पकेँ तिल मे तार कऽ सभकेँ
बतबैत छलखिन, एहि
बातक जानकारी भेटल रवि दिन, ओहि दिन बाबूक छुट्टी रहैत छनि। हम, बाबु आ हमर माइ
तीनु गोटा
घूर तपैत रही किएक तँ दिसम्बरक महिना आ जाड़क सितलहड़ी रहैक, ओहि क्षण हमर
बाबुक मोबाइल पर
एकटा फोन आयल, बाबु अपन चश्मा पूवरिया
घर मे बिसरि गेल छलाह ताहि
द्वारे हमरा कहलथि, ककर फोन अछि? हम देखल तँ ओ संजीवजीक बड़की बहिन रितुक फोन छल
दिल्ली सॅ। बाबु फोन उठेलाह आ रितुक संग गप्प मे लागि गेलाह। कुशल-पातीकह बाद
ओ हमर माइक संग गप्प करय लगलीह। विवाह दानक गप्प
भेल आ फेर ओ माइ सॅ पुछलखिन्ह
की.... संजीव किछु कहलथि की.....। (कात मे रायजी सेहो
छलाह गप्प सुनैत)
माइ........ नहि नहि कहॉ गप्प
सुनल हँय, विवाह मे जे आएल छलाह ओकर
बाद नहि गप्प
भेल, किए?
रितु........
हुनका फोन पर कोई कथा वला फोन केने छलखिन्ह, पप्पाक
पता आ नम्बर मॅगैत छलखिन्ह, संजीव कहलथि की
गप्प करै लेल 10.30 बजे राति मे फोन
केने छलखिन्ह आ कहलखिन्ह
बौआ अहॉक बाबू सॅ गप्प छल किछु आवश्यक गप्प अछि। संजीव
कहलथि की दू तीन बेर नम्बर देलियनि।
माई...... फेर की
कहलन्हि (हॅसिते हॅसिते)
रितु........बुझै नै छियै, ओकरा ओनाहियो विवाहक गप्प सॅ कते
चिढ़ छै।
माइ...... लेकिन आब विवाह करैक चाहियैन, हम तँ दरभंगा मे कच कचा
दैत छलियन्हि तँ कहै छलाह छोड़ू,
नै करब तँ कतौ कऽ लेब,
फेर की भेलन्हि यै।
रितु.........ओ तँ सोचलथि
जे पापा क कोनो दोस्त हेथिन्ह, तँय पूरा नीक
जकॉ गप्प केलखिन्ह। भौजी यै कहलक की हम तँ हुनका काकाजी
बुझै छलियनि पर ओ तँ ससुरजी बनय चाहैत छथि। यै भौजी कहै
छै संजीव जे दू साल विवाह नहि करब, की करतै पता नहि।
माइ....... लेकिन यै आब गप्प हेतनि तखन ने दू साल मे विवाह हेतनि, आब
कऽ लेताह तँ काकीकेँ सेहो
नीक हेतन्हि, कतय सॅ एलनि हॅ...
(ओनो राय जी
ऐ गप्पकेँ वर्चस्व लऽ कऽ सुनि रहल छलाह आ
सोचि रहल छलाह की संजीव कते आगि मे
घी डालि कय गप्पकेँ प्रस्तुत केलाह अछि।
)
फेर रायजी
घुर लग सॅ उठि कऽ
ऐ बातक जानकारी ठाकुरजी आ निकिता
केँ देलखिन्ह, निकिता
एखनि सासुर मे छथि, ओ कहलक की रायजी हम गप्प करी की ? रायजी कहलथि की नहि,
आब फोन पर कथा उपस्थित करै छी आ अपन माई सॅ विकल वावुकेँ (संजीवक पिताजी) गप्प करा दैत छियनि।
फेर रायजी ठाकुरजी सॅ सेहो गप्प कयलथि। ठाकुरजी बजलाह की गप्पकेँ तिलक तार कऽ
प्रस्तुत कैल जा रहल अछि, आब की करब रायजी ?
रायजी........ नहि नहि बढ़ै दियौ एखन किछु बाकी
छै, संजीवकेँ आनंद लियै दियौन्हि
एखन।
किछु दिनुका बाद रायजी निकिताक सासुर गेलाह फेर ओहि ठाम सॅ विकल बाबुकेँ फोन
केलखिन्ह आ कथा उपस्थित कऽ देलखिन्ह।
ओना हम
ई सभ बुझि कय अपन काका (संजीव)
केँ फोन केलियैन्ह आ हुनका बधाइ देलियैन्ह, आ
हुनका सॅ पुछलियैन्ह की विवाह करबै ने काका, तँ ओ कहलथि की नहि यौ अखन दु साल नहि
करब। हम कहलियैन्ह दु साल तँ विवाह होइत होइत लागि
जएबे करत। ताहि पर काका एकदम
खिसिया गेलाह आ फोन काटि देलथि।
सभ हुनका मनबै मे विफल रहल फेर हमर बाबु संजीव
केँ फोन कैलथि आ हुनका सॅ गप्प कैलथि तँ ओ किछु विंदु पर गप्प सुनि कय विवाह करै लेल
तैयार भऽ गेलाह।
संजीवजीक संग हुनकर परिवारक सब सदस्य काफी प्रसन्न छथि, किएक नहि हेबाक
चाहियैन्हि विवाह जे प्रस्तावित छनि।
फेर अचानक जहि दिन रायजी
केँ विकल बाबु ओतय जेवाक छलन्हि ओहि दिन संजीवक मोबाइल पर
एकटा फोन अबैत अछि....
संजीव........ हैलो...हैलो...
अपरिचित..... संजीवजी, हाय हम स्मिता झा बाजि रहल छी
संजीव....... जी कहू, की बात?
स्मिता.........जी हमरा अहॉ सॅ किछु गप्प करबाक छल,की अपने धर सॅ बाहर
छियै, नहि तँ जखन बाहर होयब तखन मिस कॉल करि देब?
संजीव.........जी, अखन कहि सकैत छी, हम बाहर छी
स्मिता..........जी, हमर पिताजी अहॉ ओतय कथा लऽ कऽ गेलाह अछि, हम
अहॉकेँ विवाहक बाद परेशान
आ दुखी नहि देखय चाहैत छी ताहि
लेल किछु गप्प कहय चाहैत छी। हम अहॉकेँ देखने छी, अहॉ
सुंदर आ
सुशील छी पर हम अहॉ सॅ विवाह नहि कय सकैत
छी आ
ई गप्प हम ककरो नहि कहि सकैत छियैक तँय अहॉ
अपने
ई कथा तोड़ि दियौ अहॉ सॅ विशेष आग्रह अछि।
संजीव.......... अहॉ चिंता जुनि करू, अहॉ
ई गप्प दोस्त बुझि बतेलौंह अछि
ताहि लेल हम अहॉक सहायता अवश्य करब अहॉ निश्चिन्त रहू।
फेर संजीव दुखी भऽ जाइत छथि, किएक नहि कियो वर विवाहक सपना देखत, ओहो परिवारक दवाब
मे तँ ओकरा पर
की बितत?
किए तँ-‘‘वर फेर रहि गेलाह कुमार’’।
--------------------
(गुंजन झाकेँ समर्पित)
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
