
जगदानन्द झा "मनु"
२ टा गजल
१
प्रेम जिनकासँ छल ओ मुँह मोरि लेलनि
नेग दर्दक द झट नाता तोरि लेलनि
ओ हमर दर्दकेँ हँसि खिल्ली उड़ाकय
छोरि आनसँ किए नाता जोरि लेलनि
प्रेम केनाइ की बुझता निर्दयी ओ
जे हृदय केकरो छनमे कोरि लेलनि
सीखता की चलब नेहक फूलपर ओ
संग चलनाइ शूलक जे छोड़ि लेलनि
‘मनु’ अनाड़ी कपट छलकेँ चिन्हलक नहि
मोन नहि ओ करेजोकेँ झोरि लेलनि
(बहरे असम, मात्राक्रम : 2122-1222-2122)
२
की बनब चाहै छलौं हम कि बनि गेलौं
प्रेममे प्रियतम अहीं केर सनि गेलौं
आस जे परिवारकेँ आब नहि रहलै
जेब खाली देख सभ हीन जनि गेलै
सुधि रहल नहि बोझ लदने अपन हमरा
पाबि चुटकी भरि सिनेहेसँ कनि गेलौं
खूनमे सदिखन बसल नेह गामक अछि
छल लिखल परदेशकेँ गाम मनि गेलौं
आब प्रेमक ई अगण लय रहल जीवन
मोनमे बसि ‘मनु’ हमर साँस गनि गेलौं
(बहरे कलीब, मात्राक्रम : 2122-2122-1222)
-जगदानन्द झा ‘मनु’, मो० न० +९१ ९२१२-४६-१००६
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