VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
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बद्रीनाथ राय अमात्य

वेदज्ञ मैथिलक मर्म/ घवाह मैथिलक व्यथा/ वेदज्ञ मैथिलक व्यथा;हमर सारि; विमर्शक विषय


वेदज्ञ मैथिलक मर्म/ घवाह मैथिलक व्यथा/ वेदज्ञ मैथिलक व्यथा

दिल्ली प्रवाशक क्रममे एकटा विशिष्ट ,शिष्ट ,मर्मज्ञ मैथिल काका भेटल छला जे प्रात: वायुसेवनके लेल निकलल छला। ओ अपन भेष भूषा, चानन टिक्का आ टिकसँ वेदज्ञ विद्वान बझना जाइत छला ।टहलबाक क्रममे अपन पाँच वर्षीय पौत्रसँ मैथिलीमे बतियाइत छला। बाबा पोताक मैथिलीमे संभाषण सुनि हमरा मनमे अपन मातृ भाषाक प्रति आकर्षण जागल ।हम मैथिल काकाक ध्यान अपना दिस आकृष्ट करैत प्रणाम क' कहलियनि--काका अपने मैथिल थिकहुँ,हमहुँ मैथिल छी।काका हमरा जातिये दृष्टिकोणसँ अपन स्वजातीय बुझला आऔर प्रशन्न होइत बजला--हाँ हम विशुद्ध मैथिल छी। वार्तालापक क्रममे काकाक मैथिलत्व जागि गेल छलनि।काका अपन प्रशंसनीय प्रशंसा करैत बजला--हम बहुतो विद्यापति समारोह करौने छी,सब जाति धर्म वर्गसँ चन्दा लैत छलियैक मुदा स्वजातीय छोड़ि मंचमे केकरो सट' नञि दैत छलियैक।बाबा विद्यापतिजी हमर पूर्वज छथि हम हुनक वंशज छी।हमरा मैथिली मिथिलाक माटिसँ बहुत स्नेह अछि।हमरा एखनो मिथिलाक माटिपानिके उद्धार करबाक इच्छा रहैत अछि, मुदा पौरुष आब नञि बाँचल अछि।काकाक चतुर्थावस्था देखैत हम कहलियनि--काका अपनेक देह मिथिलाक माटिपानिसँ बनल अछि,ई देह पुन: मिथिलेक माटिपानिके सुपूर्त होमक चाही।एहि अवस्थामे अपनेके अपन माटिपानि पर रहक चाही। काका हमर बातके स्वीकृति दैत बजला--अवश्य!अवश्य!हमरो सएह इच्छा अछि। मुदा ई डकूबा सरकार सबटा सत्यानाश केलक। हम अकचकाइत पुछलियनि--काका से की?काका सरकार पर रुष्ट होइत बजला--ई डकूबा सरकार गाँव गाँव मे ततेक ईसकूल खोलि देलकै अछि जे आब सेवा टहल करबैक लेल गाँव मे रार रोइया नञि भेटैत छैक। हमर बेटा पुतौह सब दिल्लिए रहैत छथि। हम विधुर छी असगर गाँवमे रहब बहुत मोसकिल छैक।जखन हमरामे पौरुष बाँचल छल तखन हम एक टाकाक गोट बीसटा चोकलेटसँ बीसक रारक धिया पुत्ताके टहलूमे रखैत छलहुँ जे अपन बकरी चरबक लेल जाइत छल आऔर हमरा गायके लेल लतरल दूभि घास नोचिक' आनि दैत छल जे घास खाक' हमर गाय मस्त रहै छलि आऔर खूब दूध दैत छलि। किछु आँकड़ पाथर खुआ देलापर भरि दिनक लेल टहलू भेटैत छल ,खूब टहल करबैत छलहुँ आऔर साझमे अपन फेरन फारन फाटल पुरान कोनो वस्त्र दैत छलियैक, वस्त्र पावि ओहो खूब प्रसन्न होइत छल।एतबे नञि, ओ सब ताड़ी पीबि आपस मे खूब लड़ितो छल ,हमही ओकर सबहक झगड़ाक पंचैती करैत छलियैक ।पंचायत मे न्याय अन्याय देखबाक कोनो प्रयोजन नञि होइत छलैक,जेकरा प्रति विद्वेष रहैत छल तेकरे दोषी साबित करै छलियैक आऔर बेसी नञि,पचासक रुपया जरिबाना सेहो करैत छलियैक आऔर तत्क्षण पाइ सेहो ल' लैत छलियैक। होइत प्रात ओकरे टहल करबाक लेल बजबैत छलियैक भरि दिन इच्चानुकूल टहल करेलाक बाद ओकरे देल वएह पाइ ओकरे आपस क' दैत छलियैक। सत्यानाश हौ एहि सरकारक जे स्वर्ग सन मिथिलामे गाँव -गाँव ईसकूल खोलि हमर मिथिलाक संस्कृतिके नष्ट भ्रष्ट आऔर दुष्कृत केलक अछि।हम काकाक कथन सुनि अकचकाएल सन्न रहि गेलहुँ।


हमर सारि

हमर सारि सुपनेखिया सियान नञि भेलि छथि तथापि विवाहक लेल उताहुल रहैत छथि आऔर पुरुष वर्गके रिझेबाक लेल लोक संहारक शृंगार करैत छथि आऔर गर्धप स्वरमे गबितो छथि। ओ अपन लोक संहारक शृंगारसँ बहुतो के संहार केने छथि ओ पुरस्कारक लेल कखनो कवियित्री कखनो गायिका बनि जाइत छथि।मिथिलाक सुप्रसिद्ध रिलांगना भेलाक कारणे हुनका समस्त पुरुष समाज चिन्हैत छनि।मुदा कृष्णाभिसारिका सन गोर आऔर सुपनेखा सन सुन्दर रहलाक कारणे बुढ़ जुवान केओ मैथिल हुनकापर नञि रिझ रहल छनि, कारण अपन अंगप्रदर्शनक क्रममे ओ अपन किछुए अंग छोड़ि अपन अंग प्रत्यंग बुढ़ जुवान समस्त मैथिल समाजक पुरुष वर्गके देखा देने छथि।हमरा मैथिल समाजमे केओ नञि चिन्हैत छल से हमहूँ अपन सारि सुपनेखियाक परसादे समस्त मिथिला समाजमे चिन्हल जाइत छी।माला मंच सम्मान सेहो खूब भेटैत अछि।मन खूब प्रसन्न रहैत अछि मुदा भीतरसँ सन्न रहैत छी जे जँ कोनो बुढ़ जुवान सुपनेखियाके नञि गछलकै त' हमरे गाराक घेघ बनत।हमरा भूखल रहब बर्दास्त अछि मुदा ऐंठ अन्न नञि पचैत अछि।


विमर्शक विषय
हमर सारि सुपनेखियाक क्रान्तिकारी आऔर बारुदी विचारसँ जखन सामाजिक विधान वाधित हुअए लगलैक तखन हमर सासुर पक्षक लोक ओकरा वैवाहिक बन्हनमे बान्हि देबाक विचार केलनि।ताहि क्रममे हमरो कहल गेल जे हिनका लेल सस्ता सुन्दर टिकाउ मजगूत वऽर देखल जाए।हमर सारि सुपनेखिया पाकल जामुन सन गोर कृष्णाभिसारिका सन सुन्नर छलि मुदा विचार शुक्लाभिसारिका सन देदिप्यमान रखैत छलि।हुनका द्रौपदी बनबाक इच्छा छलनि मुदा केकरो दशरथ बनब हुनका बर्दास्त नञि छलनि ।ओ बिच्चहिमे विरोधक स्वरमे बाजि उठली--मुदा वऽर बेरोजगार ,मैथिलीक लेखक वा अछरकटुआ कवि नञि होमक चाही।हम बेरोजगारो चला लेब मुदा लेखक कवि नहिञे टा चलत कारण कवि रवि होइत छथि,हुनक देह आऔर विचार बहुते अगियाह होइत छनि।हुनक वैचारिक ताप सहब हमरा लेल अस्हय हाएत। हमहूँ मौकासँ लाभ उठबैत जे बात कहियो नञि कहने छलियनि से कहलियनि जे अपनेक यौवनमे आकर्षण अवश्य अछि मुदा एनामे अपन मुँह रंग रुप देखि अपन यौवनपर नञि,अपन रंग रुपपर गंभीर विमर्श करब से हमर आग्रह।हमर कहल सत्य बात हुनका मिरचाइ सन लगलनि आऔर हमरापर बरसैत बजली--अहाँक प्रसिद्धिक लेल हमर अखण्ड कौमार्यके बेरि बेरि खण्ड-खण्ड काएल गेल, हमर यौवनक खूबे दुरुपयोग भेल अछि।हम बहुतो मैथिलक व्यंगवाण आऔर नयनवाणसँ विद्ध भेलि छी। आइ हमरे एहि यौवनक परसादे अहाँ कवि कहबै छी,मुदा हम सत्य बात कहबे करब, अहाँ व्याकरणहीन पौरुषहीन आऔर बेहाया छी,अहाँमे कनिञो कृतज्ञता नञि अछि।आइ हमहूँ अपन दग्धल मनसँ श्राप दैत छी जे कहियो अहाँ कवि नञि बनब, सब दिन अछरकटुए रहि जाएब।हमर नाक तऽ कटिये गेल अछि,जँ हमर विवाह नञि भेल तऽ आब अहाँक टीक काटब।

 

-बद्रीनाथ राय अमात्य, ग्राम पोस्ट करमौली, भाया कलुआही, जिला मधुबनी बिहार ,फोन 6205190859

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