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विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह

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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
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संतोष कुमार राय 'बटोही'
कथा- लल्ली


इस्कूल के लेल सजि-धजि केँ तैयार भऽ गेल छथि । कमरा मे टाँगल देबार घड़ी दिस ताकि कऽ ओ अपन हैण्ड बैग उठौललीह । गली सँ निकैल कऽ इस्कूल जाय वाला रस्ता दिस घुमलीह । फेर की ने की फुरेलैन्ह गली दिस आपिस दौड़लाथि । मने किछु छुटि गेल रहैन्ह की वा की किछु भूलि गेल छलथिन्ह ? कमरा पर पहुँचला पर हबर-हबर कऽ गेटक ताला खोललाथि । किचेन दिस दौड़लीह । किचेन मे घुसैत लल्ली हँकमअ लगलीह । हँकमैत ओ गैस केँ बन्न केलीह तामत दूध उधियाकऽ चुल्हा पर पसरैत टेबल पर पसरैत नीचा गिरअ लागल छेलैक ।

एहेन घटना पहिल बेर भेल हेतैन्ह से नहि छै । एक बेर अपन पति केँ रूम मे सुतल ताला मारिकऽ इस्कूल चलि ऐल छलीह । जखन विपिन केँ पेशाब लगलैन्ह तऽ उठिकऽ रूमक गेट खोललाह। खोलैत मातर ओ बुझि गेलाह जे बाहर सँ गेट बन्न केल गेल छै । पहिले तऽ लल्ली केँ हाक देलथिन्ह, परञ्च कोनहु चालि नहि पाबिकऽ । ओ माथा पर दुनू हाथ राखिकऽ धम्म स बेड पर गिर गेलाह ।

ओ बड़बरैत रूम मे ओइ कोना सँ दोसर कोना जाएत छलाह । किछु देर ओहिना करैत रहलाह । फेर बेड दिस आबिकऽ किछु खोजअ लगलाह । सिरहोना उठाकऽ दोसर दिस फेकलाह । फेर जाजिम के नीचा हाथ देलकीहिन । मोबाईल हाथ मे अभरलैन्ह ।

"हलो ! तू पागल है क्या ? तेरे को थोड़ा भी दिमाग है क्या ? "
" बोलिए ! क्या हुआ ? "
" तू तो गेट बन्द करके चली गई है ।"

लल्ली केर माथा चकरा गेलैन्ह । ओ इस्कूल मे हिन्दी केर क्लास लऽ रहल छेलथिन्ह । ओ अपन घंटी बीच मे छोड़िकऽ प्रधानाध्यापक केर चैंबर मे पहुँचलीह।

" सर, मुझे अभी घर जाना होगा, उनको घर में बंद करके आ गई हूँ। "

एत्ते हेडमास्टर साहब सँ कहिकऽ लल्ली गेट दिस भगलीह । हेडमास्टर कहैते रहि गेलाह, "....की.की..क्या हुआ मैडमजी ?"

लल्ली ताला खोलि विपिन केँ भरि पाँजिकऽ पकड़लीह। विपिन गोस्सा सँ हाथ-पैर फेकऽ लगलाह । ओ विपिन केँ भरि पाँजि पकड़िकऽ बेड पर सुता देलथिन्ह आओर विपिन केर देह पर चढ़िकऽ चुमऽ लगलथिन्ह । कनी देर बाद ओ पिघलि गेलाह । दुनू मे संबंध बनि गेलै। आब ओ शांत भऽ गेलाह अछि। एक-दोसर केँ देह पर हाथ रखने छथि । दुनू एक-दोसर केँ देखिकऽ मुसकी मारि रहल छथि । अपन-अपन वसन केँ समहारैत दुनू उठलाह ।

" हमरा लेट भऽ रहल अछि ।" लल्ली हबर-हबर अपन सूट केँ ठीक करैत बजलीह।

" अच्छा , ठीक है तुम जाओ ।" विपिन अपन टावेल पहनैत शौचालय मे घुसि गेलाह ।

लल्ली निछोहे इस्कूल दिस पड़ेलीह । स्वयं सँ बतिऐत ओ बजलीह -" बाप रे बाप ई तो बहुत बड़ा मिस्टेक हो गया था। ऐसा कोई करता है क्या ?"

इस्कूल मे पहुँचकऽ ओ पहिले शौचालय मे घुसलीह । सूट मे किछु उजरा लैग गेल छेलैन्ह। पानि सँ धोई देलथिन्ह। फेर शिक्षक सदन मे ओ पंखा केर नीचा मे बैस गेलीह ।

आइ दूध जरिकऽ पतिला केँ कारी कऽ देने छेलैक । ई त नीक भेलै जे पड़ोसी अंकल ड्यूटी नहि गेल छलाह । ओ किछु जरबाक गंध सुइंघकऽ कमरा सँ निकललाह। पहिने अपन किचेन मे घुसललाह। चुल्हा दिस नजर दड़ौललाह। चुल्हा पर किछु नहि चढ़ल छेलैन्ह । सोहारी बनेलाक बाद सतीशजी दूध औंटकऽ उतारि लेने छलाह । ओ आब लल्ली केँ किचेन दिस दौड़लाह । दूध जरै केर गंध आबि रहल छेलैक किचेन सँ । ओ खिड़की दिस गेलाह । बेड रूम मे किनको नहि देखलकीन्ह।

फेर फोन लगौलाह, " अरे, आप कहाँ हैं ? किचेन में दूध जल रहा है । "

" ओ..ओ...ह..., ठीक है आती हूँ.....।"

लल्ली केर माथा फेर चकरा गेलैक । अखन ओ इस्कूल पहुँचले छेलीह । हेडमास्टर अखन नहि आयल छलाह। ओ राधा केँ कहिकऽ रूम दिस पड़ेलीह । रूम पर पहुँचलाक बाद किचेन केँ ताला खोलिकऽ गैस केँ बन्न केलीह । पतिला जरिकऽ कारी भऽ गेल छेलैक।

लल्ली केर जनम गाम पर भेल छलैन्ह । परञ्च लल्ली केर पढ़ाई_लिखाई दिल्ली मे भेल छलैन्ह । दिल्ली सँ शिक्षाशास्त्र मे प्रशिक्षण लेलाक बाद ओ बिहार मे शिक्षिका भेलीह ।

" आप क्यों परेशान हैं ? मैं सही से पहुँच जाऊंगी घर ।"
फोन पर विपिन केँ कहि रहल छलथिहीन लल्ली । पति सँ दूर बिहार मे अपन दुटा बेटा केँ पढ़ा रहल छथिन्ह । दिन भरि काजे मे लागल रहैत छथि । हुनकर काज खतमे नहि होएत छन्हि। विहंसर मे दुनू बालक केँ विद्यालय भेजबाक बाद खेलहा_पिललाह बरतन केँ धोइकऽ रखैत छथि । अपन कपड़ा संगैंह दुनू बेटाक कपड़ा धोइकऽ छत पर सुखबाक लेल डालैत छथिन्ह। फेर नहाकऽ इस्कूल लेल तैयार होइत छथि ।

असगरे काज केला सँ ओ थाकि जायत छथि। हुनकर देह जवाब देमऽ लगैत छन्हि । पहिने हुनका माथा नहि दुखाति छलैन्ह, परञ्च आब माथा मे हरदम दरद रहैत छन्हि । मोन होयत रहैत छन्हि बपहारि काटि कऽ कानि । फेसबुक पर अपन स्टेटस मे कृष्ण केर भक्ति सँ सानल गीत लगबैत छथि । ह्वाट्सअप पर सेहो राधा-कृष्ण केर फोटो स्टेटस मे टांगैत छथि । ज्यादातर स्टेटस मे फिलासफी रहैत छन्हि ।

" सुनिता मैं ठीक हो जाऊंगी ....।"
" तूँ टेंशन नहीं लेना दीदी ....।"

स्त्री केर स्वतंत्रता केँ पक्षधर छथि लल्ली। कतेक बेर दिन भरि काज केला सँ थाकिकऽ राति केँ खायतो नहि छथि। मोन आधा दिल्ली मे रहैत छन्हि आधा बिहार मे ।

"बेटा आपने लंच बाक्स ले लिया, न ?"
" हाँ जी मम्मा ...।"
" पार्थ, आपने पेंसिल ले लिया, न ?"
" जी , मम्मा ।"

दुनू लड़िका केँ इस्कूल लेल तैयार कके बस लग छोड़ि अबैत छथि लल्ली ।

दिल्ली मे सास पहिने फिरिशान केने रहैत छलथिन्ह। आब दिल्ली सँ फोन कके ओ कनैत रहैत छथि, " आपने बिना अच्छा नहीं लग रहा यहाँ। सोच रही थी यहीं रहती तो अच्छा था । नौकरी बड़ी नहीं होती, परिवार बड़ा होता है। मेरा देखभाल कौन करेगा। अब मैं बूढ़ी हो गयी हूँ। घुटना में दरद रहता है ।"

एके साँस मे लल्ली केँ हुनकर सास अपन मोनक गप कहि देलथिहीन ।

" आप चिंता नहीं कीजिए मम्मी, आपकी देखभाल मैं ही करूँगी । अभी वहाँ सुनिता है, न ?"
"नहीं बेटा, वह मेरी एक भी बात नहीं मानती ।
दशहरा में आएगी ना ?"

" जरूर आऊंगी...।"

जखन लल्ली गृहिणी छलीह । सास-ससुर, देवर सभक घर मे देखभाल करैत छलीह ,त हुनकर सास हरदम बटगबनी गबैत रहैत छलीह । आइ दिन मे दस बेर फोन करैत छथि । लल्ली इस्कूल केँ अपन परिवार बुझि रहल छथि। इस्कूल केर शिक्षिका सभ सँ बहिनापा भ' गेल छन्हि। अइ साल ओ सभ अपन-अपन पति केँ छोड़ि कऽ गोवा टूर पर गेल छेलीह । ओ आब किनको नहि सुनैत छथि। अपन मोन केँ मालकिन ओ खुद भऽ गेल छथि।

" मेरे लिए आपने क्या भेजा ? ये सभी टॉफियाँ और गिफ्ट तो मैं भी आपको दे सकती हूँ ।"
" तो भेजती क्यों नहीं मेरे लिए भी ? मैंने तो कभी नहीं कहा कि तुम मत भेजो .....।"
" भेज दूंगी मैं भी....।"
" अच्छा छोड़ो ये सब बात, मैं कह रहा था अपन सब इस बार 'वैष्णोदेवी' टूर पर चलेंगे ।"
" ठीक है। मम्मी और पापा भी चलेंगे, ना ?"
"हाँ , तुम कहती हो तो उनको भी साथ ले चलेंगे ।"

लल्ली आइ बड़ खुश छथि। गरमी छुट्टी केँ तीन दिन रहि गेल छै। ट्रेन केर टिकिट पहिने सँ बनल छै । इस्कूल मे सभ शिक्षक-शिक्षिका मे गरमी छुट्टी बीतेबाक प्लान पर चर्चा भऽ रहल छै । कियो शिमला जाएत छथि। कियो देहरादून, त कियो अपन गामक आम आओर जामुन खाऽकऽ गरमी छुट्टी बितौताह।

दरभंगा सँ 'बिहार संपूर्ण क्रांति' खुलि गेलै। लल्ली अपन माय केँ खिड़की सँ हाथ डोलबैत 'बाय-बाय' कऽ रहल छथि ।

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