
संतोष कुमार राय
'बटोही'
'मातृभूमि स्वर्गादपि गरीयसी'
आइ मोन बड़ दुखी भऽ गेल अछि। गरीबी मे जनम हेनाई सभ सँ पैघ पाप होएत छै, ई
गप सरिपहुँ सच छै । दोसर सच छै सहोदर अई कलियुग मे अपन नहि होयत छै। एक-दु
धूर जमीन लेल मर्डर भऽ जायत छै ई देखवा मे आबि रहल अछि । काल्हिए रवि केँ
दियाद मे जमीन लेल झगड़ा फँसि गेल छेलै। 112 नम्बर पकड़ि के लऽ गेल छेलै
दुनु केँ । दस हजार टाका खरच केलकै, तखन शाम मे थाना हुनका दुनू केँ छोड़ि
देखथिन्ह। गप किछु नहि छेलै। कनेक बतकही भऽ गेल रहै निर्मल आओर विलेक्षण
केँ । विलेक्षण केँ बड़का लड़िका आओर पुतौहु कुनाल केँ मारै लेल गेल छेलै।
कुनाल झंझारपुर मे ब्लॉक में कम्प्युटर आपरेटर केँ रूप मे कार्यरत छथि । ओ
112 नंबर केँ फोन केलथिन्ह ।
दियादी मे ओना जमीन बटवारा किनको नहि देखलियैन्ह आई धरि । घरक आगा मेहेक
जमीन केँ ओना बटवारा केलाथि विलेछन जे चौड़ाई तीन कोड़ी छै आओर लंबाई पचास
कड़ी। कुनाल केतबो कहैत रहि गेलै जे एना बटवारा केला सँ जमीन बरबादे टा भ
रहल अछि। कनिको पॉजिटीव सोचियौ, परञ्च विलेक्षण आओर हुनकर तीनूटा लङिका नहि
मानलकै । जमीन केँ छिन्न-भिन्न क देलकै । कतेक दिन तक लड़ाई होएत रहलै ।
जमीन माय जकाँ होएत छै- अन्नपूर्णा । मायक दूध आओर अपन खेतक अन्न एक होयत
छै ।
घर बनेवाक लेल बड़ दिन सँ होयत अछि, परञ्च घर बनेवाक लेल जमीन जे हेवाक
चाही से नहि अछि । बेसी नहि तँ गुजारा करवाक लेल जमीन अछि अपना। घरक लेल
चौरस जमीन चाही। रस्ता से चाही। मेन रस्ता सँ जुड़ल हेबाक चाही । उ जमीन
नहि भेट रहल अछि । तीनकोनमा, लमछुड़का, टेढ़-बाँकुर लोक बेचैत अछि आओर
सोझुका अपन खानदान लेल रखैत अछि । हँ, किछु बिका जायत छै, तखन मालूम होयत
अछि । जमीन चोरनुकबा बड़ बिकैत छै, पते नहि चलत। जमीन बिकेलाक छह मास पछैत
मालूम होयत छै जे फलाँ केर फलाँ जमखन, घरारी, खेत बिका गेलै ।
एक बेर तँ मोन भेल सासुरे मे बसि जाउ जमीन खरीद कऽ जखन ओनहै छपराढ़ी मे
पोस्टेड छलहुँ अछि। कोशिश केलियै आओर कऽ रहल छियैय जत जमीन घरक लेल निक भेट
जेतै ओतै किन लेबै । ओ सासुर हेतै आ कोनो दोसर गाम। सुविधा हेबाक चाही सभ ।
अबै वाला जेनरेशन केँ दिक्कत नहि हेतै से काज करबाक अछि आब । राम तँ कहने
रहतिन्ह जे मातृभूमि स्वर्ग सँ बढ़ि केँ होयत छै, परञ्च की करू जखन कियो
अपन गाम मे घर बनेबाक लेल डमीन देबाक लेल नहि चाहैत छथि उचित दाम पर । मोन
पीता गेल अछि । बड़ नीक हेतैन्ह रामक लेल अपन मातृभूमि। हमरा लैल अपन गाम
निक जरूर अछि, परञ्च की केल जाय ।
गाम छोड़ि कऽ भाग' पड़त मने । बाप-पीत्ती, बाबा-परबाबा केर इ गाम छियैय।
हुनका कहियो रस्ता-पेड़ा लेल दिक्कत नहि भेलैन्ह , परञ्च आब त लोक रस्ता
रोकि रहल छै ...रोकि देलकै । अपन धौंस जमा रहल छै लोक- तों हमरा दक चलैत
छैं, तोरा घरेटा छौ...घर सँ निकलबीही से रस्ता नहि छौ । किछु नव लोक जे आपर
पर रस्ता वाला भेलाह अछि से बेसी उलाहना द रहल छथि । दम घुटि रहल अछि अइ
जली मे , छटपटैत छी..मुर्छित भ गेल छी...अकुवा-बकुला गेल छी। की कहु ? किछु
नहि फुरा रहल अछि। सरिपहुँ ' मातृभूमि स्वर्गादपि गरीयसी होयत हेतै किनको
लेल। हमरा लेल त हमर गाम हमरा भगेनिहार भऽ रहल अछि ।
- संतोष कुमार राय ' बटोही ';
ग्राम - मंगरौना
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