VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
Twitter / X Facebook Archive

विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह

Videha

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

विदेह नूतन अंक
वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.

राम शंकर झा "मैथिल"
स्मृति शेष (भाग-०८) अधिकची निन/ डबरा


स्मृति शेष (भाग-०८)
अधिकची निन

अधिकची निन मे छलहूँ
कनियां!कनियां सुनैत छि
आई जन्माष्टमी अछि
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी
तें आई सिधहा नहिं
निकाललहूँ अछि
टाअट परका पोरो
आ साग नहिं कटलहूँ अछि
आई घर मे सब गोटे
उपवास करब न......?
अधिकची निन मे छलहूँ..!
आँखि खुजी गेल
बाअ आँगन निपैत
बाजैत छलीह
बड़की माअ बाउ कें लेल
जलखैय तअ बनत
हअम आँखि मिरैत बजलहूँ
हमहूँ उपवास करब
"बाअ"जोर सँ बजलीह
बाउ कें दूध मखान खुवाउ
"बाअ"दौड़क एअलिह
नहिं बाउ उपवास अंहाँ नहिं
गायक गोबर हाथ लागल
अपन आंचरक खुट सँ
हअमर दुनू डोका सनक
नयन कें पोछैईथ बजलीह
पुरुख उपवास नहिं करैत छैथि
कनियां धिया करतीह
अधिकची निन मे छलहूँ..!
हअम विस्मित भए बजलहूँ
से कियाअक.....?
पुरुख आ धिया कनियां मे
कोउन अंतर अछि....?
"बाअ"हअमर मुँह पोछैईथ
बजलीह अंहाँ पहिले उठु तअ
हअम हड़बड़ी मे बाजि उठलहुँ
ज्यों घर मे कनियां बड़की माअ
उपवास करतीह हअम
कियाक नहिं
"बाअ"कनियां धिया
कें उपवासक
फल पूरखो कें भेटैत अछि
अधिकची निन मे छलहूँ..!
हअम किंकर्तव्य विमूढ़ छलहूँ
स्त्रीक समर्पण आ कर्म भाव
एहि भौतिक जगत स्त्री कें सब
काज पुरुख कें समर्पित अछि
मुदा ओहि अलौकिक जगतो मे
स्त्रीक पुण्य पुरुखे कें भेटअत...?
तखन कौनो पुरुख आ मनसा
कोना काए मोंछ टेरैत छैथि
अधिकची निन मे छलहूँ...!
आई फेर आँखि खुजल
ठाकुरवाड़ी सँ
आबाज आबि रहल
हाथी घोड़ा पालकी जय जय
कन्हैयालाल की......
चाअर कें कोरो मे लटकल
बाअक घिसाअल फोटो झूलैथ
बस एकटक हुनका निहारैत
निहारैत आई फेर उपवास अछि
मुदा "बाअ"नहिं छैथि
बस हुनकर.. स्मृति...
अधिकची निन मे छलहूँ..
स्मृति शेष स्मृति शेष......!!

डबरा

ठमकल जमकल सरल
हअम डबरा छि...!
गेनहायत महकैत करिछियौन
हअम डबरा छि..!
सगरों टोलक सगरों गामक
धोईन मांअर बारैन सोहारैन
अपन उदर मे ठुसँने
हअम डबरा छि..!
चाहे सोयरी घरक जनमौटी
सअर समांगक जनमलक टट्टी
हअमरा मुँह मे ठुसल गेल
चाहे नीक भेटल चाहे बेजाअ
अँखि बन्न लैत गेलहूँ
कियाक कि
हअम डबरा छि..!
दोगे दोग गतर गतर गोहे गोहे
करिया झामंर भेलहूँ
अपन मुँह देह झाँपि लैत छलहूँ
हरियर पात कुमहीं सङ्ग करमी
मुदा ह्रदय जुराईत छल
अपन सर समाज पाहून पुरुख
घर आँगना खेत सँ खारिहान
चिकन चुनमुन झळकैत
हअमरे बदौळत सदिखन
हअम डबरा छि..!
फरिक दियाअद जोन बोन
कहैत छल
बहुरु काअ कें डबरा
भिगो बाबाक डबरा
तेलिया मन्याँक डबरा
मरनी माअक डबरा
जानि नहिं कतेक नाम
कोन कोन पहचान
ऐका पअर एक उपाधि सँ
अलंकृत शोभित होईत
हअम डबरा छि..!
कतेको बेर पड़ल अकाल
मरुआक बिया तकर डिभी
कियारीये कियारी भरल पुरल
तरकारीक गाछ सङ्ग मिर्चाय
हमरे पईन सँ पटाओळ जाईत
वज्रसन रौदी वरखा नहिं आस
तखनहुँ भरैत खेत खरिहान
अपने सन कारि कारि मरुआ
मरुआक रोटी सङ्ग मिर्चाय
घर घराअन सङ्गहिं सर कुटुंब
सब कियौ करैथ भरि पेट लबान
हअम डबरा छि..!
कि कि कहु कि कि सुनाउ
भरि जीवन भरल जुआनी
जकर जकर गुरु-नुर हग पाद
अपन उदर सम्माहरलहुँ
अपन समांग धिया-पुता बुझि
ने कोनो मान आ नहिं अपमान
बुझलहूँ
भरि भरि वरख अपन ओद
भरि भरि डांअर भरि भरि छाति
पईन-जल भरि कोख रखलहूँ
पताल भू-जल भरल रहाय
हअम डबरा छि..!
बेर कुबेर चूल्हा सँ निकलल आगि
धह-धह जरैत गामक गाम
अगिळगी सँ बताह अपसिँआत
हमरे सरलाहा महकल पईन सँ
कियौ अपन गोसाँई घर मिझाबैय
कियौ भगवतीक आंचर बचाबैय
कियौ बाबा डीहबार पर झोँकाअ
कियौ अपन ठाकुरबाड़ी बचाबैय
हअम डबरा छि..!
कतेको दिन राति दलाने दलान
हमरे किस्सा हमरे पिहानी
सबहक मुँह एकहिं जुबान
आय ज्यों ई नहिं रहिंता डबरा
नहिं बचिंता ई गाम घर
नहिं बचिंता ई गामक डीहबार
हअम डबरा छि..!
कि सब कहु कि सब सुनाउ
भरि टोल कि भरि गाम
हेंजक हेंज लोक सङ्ग
कौआ, मैना,चिंराई-चुनमुनी
कतेको दिन कतेको मास
मामूर, कबैय सङ्ग गरैय
चखना तरकारी करैथ जलखैय
किछ हाट किछु बाट बिकाअ
बढ़ शान सँ बढ़ गुमाअन सँ
लोक बाजैथ
ई मांछ फलांह बाबाक
अपन पहचान सँ अपन मान सँ
हमहूँ करैत छलहूँ गुमाअन
मुदा आब अपनहिं सर समांग
हअमरा छाति चढि मर-मराबैत
ढ़ाकिये ढ़ाकि छिठे छिठा
मारि मुंगरी मारि कोदाईरक पसाठ
भरि भरि टेलर मांटिक प्रसाद
हअमर जुआनी हअमर जीवनक
इति श्री कथा मे समेटैथ
हअम डबरा छि..!
लबका नाम भेटल बौआ डीह
सोनदाय भराठ मिथिला रिसोर्ट
हअमर स्तित्व हअमर पहचानक
सदिखन कें लेल सुध-श्राद्ध
हअमरे छाति बैसि भरि गाम
भरि टोल
खाईथ खुआबैथ भोज सङ्ग
बरात
आ ताहि पअर करैत सर समांग
सङ्ग नागिन डांस
हअमर नोर हअमर व्यथा
कें सुनत ककरा सुनाबि
हअम डबरा छि..!
भरळ जुआनी हअम मारल
गेलहूँ
मुदा एखनहुँ हअमर टीस
ज्यों भूजल नहिं बांचत
ज्यों किड़ा-मकोड़ा चाली सितुआ
नहिं बांचत
ज्यों भांति-भांति कें जैव विविधता
नहिं बांचत
कोना कए लोक देताह आशीष
शतम जीवु शतम जीवु
हअम डबरा छि..!
हअम डबरा छि..!!

-राम शंकर झा "मैथिल", उघरा, दरभंगा, मो-7970778787, Mail- jharam1977@gmail.com 

अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।