
रामचन्द्र राय
दू गोट कविता [भूख/
तरहथिए पर दुनिया]
१
भूख
थाकल ठेहियायल तन
बोझिल मन
फाटल मैल वसन
नोरायल नयन
केस दाढ़ी बढ़ल
कलुषित आत्मा जड़ल
एक हाथ में बाटी
दोसर हाथ में लाठी
लड़खड़ाइत डेग स'
बढ़ि रहल छै आगाॅं
गली के कचड़ाक ढेर दिश
चुनतै ओ सड़ल - गलल
पचपचाइत अन्न
जै सऽ मिझौतै ओ
अपन उदरक भूख!
शासन,समाज छै मूक
कियो नहि बांटि रहलै
ओकर ई दुख
कहु भला ई केकर चूक?
कहु भला ई केकर चूक?
२
तरहथिए पर दुनिया
देखु - देखु जुग कोना बदैल गेलैए,
तरहथिए पर दुनिया समैट गेलैए।
कम जाइछ लोक आब बैंक आ बजार,
मोबाइले में बन्न छै हजारक हजार ..
खगताक पूर्ति ऑनलाइने स' भऽ रहलैए.. देखु-देखु जुग..
कम जाइछ छात्र आब स्कूल आ कॉलेज,
गुगले पर भेट जाइछ दुनियां क नॉलेज ..
घरहि बैसल आब ऑनलाइन पढ़ाई भ' रहलैए.. देखु-देखु..
नहि लगाबैछ डुबकी छात्र किताबक सागर मे,
रील्स देखि - देखि ओ नहाइछ गागर मे ..
सिरिफ ओंगरीएटा स' सभ कमाल भ' रहलैए.. देखु-देखु..
सोशल मीडिया आब बनि गेलै सभक जीवनक अंग,
नवतुरिया सभ रहैछ सदिखन अही मे मगन..
अगड़म - बगड़म देखि,लिखि,पढि ओ बहैक रहलैए.. देखु-देखु..
जे छैथ सचेष्ट से करैछ नीक काज,
सोशल मीडियाक उपयोग कऽ उठबैछ बेस लाभ..
एहि सॅं बहुतो के जिनगी सवैर गेलैए.. देखु- देखु..
-रामचन्द्र राय फोन: 9931092370
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