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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
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हितनाथ झा

(मैथिलीमे ग्रामगाथा विधाकेँ नव जीवन देनिहार, पाठकीय विधाक अगुआ। संपर्क-9430743070)

मैथिली साहित्यमे तारानाथ झा एवं हुनक परिवारक योगदान २९

वृद्ध योगधर बाबूक विवाह
(
गल्प)
श्री अच्युतानन्द झा बी.ए. बी.एल.
(
२९-१०-३४)

की कहू उमाशंकर बाबू, हम बड़े अभागल छी, नहि तँ एहि बुढ़ारी वयसमे हमरा कतहु पत्नी-मृत्युक असह्य विपत्ति पड़िते?। हमरा घरमे क्यो नहि अछि- अछैत धन सम्पत्तिक अथवा एहि रूपें कहू जे भोग-विलासक उपाय और इच्छा रहितहुँ ईश्वर हमरा बाबाजी बना देलैन्ह। हम बड़े घोर विपत्तिमे पड़ि गेल छी। हमरा भगवान एतेक सम्पत्ति द' क' एहन यातना कियैक देलैन्हि?। हम अपने तँ वृद्ध भेलहुँ- हम घर बाहर दुनू कोना केँ देखि सकब ?। बाहरक काज जँ कोनहुना देखबो करब, तँ आँगन मे के धरत और संभारत। गृहिणी नहि रहने हमर बाहरी कुल उद्यम विफल हैत, कियैक तँ बाहर मे हम जे संग्रह करब से घरमे आबिकेँ लुटि जायत। अनका ममते कोन होएतैक?। आवेशहुक तँ अभावे रहतैक। संस्कृतमे एक कहबी छैक जे " न गृहं गृहमित्याहु:, गृहिणी गृहमुच्यते" से हमरा अक्षरशः सत्य अनुभव होइछ। हम आब वृद्ध भेलहुँ, हम यदि एखन विवाह करी तँ हमरा स्त्री केँ एहि बातक डर सर्वदा बनल रहबाक सम्भव जे " हमर ई वृद्ध पति कखन स्वर्ग द्वारोन्मुख होयताह तकर कोन ठेकान - ई तँ बतौर पाहुने थिकाह, सब सम्पत्तिक मालकिन हमहिं थिकहुँ- हम जँ ओरिया क' राखब तँ हमरे काज आओत।" तखन उमा बाबू अपने तँ जनितहि छी- हमरा बालको सभ जे छथि से नावालिगेसब छथि।धन जे संचय होएतैन्ह से तँ हुनके लोकनिकेँ काज अओतैन्हि। छोट अवस्थामे एखन जँ ओ सब स्वतन्त्र होइ जयताह, तँ कुल सम्पत्तिकेँ डुबा दै जयताह। तैं जाधरि हम जीबैत छी ताधरि तँ कोनो कथे नहि, जे तकरा वादो जँ ओ लोकनि सतमाइक तरमे रहै जयताह, तँ धन सम्पत्ति बाँचल रहै जयतैन्ह और अपनालोकनिक बुद्धि जखन परिपक्व होइ जयतैन्ह तखन ओकर सदुपयोग करै जयताह। और बहुत की कहू उमा बाबू, वृद्धावस्था मे सेवा- शुश्रुषा जेहन स्त्री करत, तह बेटा पुतहु बुतें कथी लै हैत ?।

हा !!! धर्मशास्त्र-कार लोकनि वृद्ध जगत केर परम उपकार कय गेलाह जखन कि ओ सब लिपिबद्ध कयलन्हि जे -" पति केहनो दुरवस्था मे रहथि, तथापि हुनका प्रति लेशमात्रो उपेक्षा बुद्धि कयने स्त्री नरकगमिनी हो।" अन्तिम पद तँ वृद्ध केँ एकदम निश्चिन्त और सुखी बना देलक। कोनहुना विवाह धरि भेल ताके, तकरा बाद तँ बिना मूल्यक दासी ठाढ़ भ' जाइति। धन्यवाद हुनका लोकनि काँ।

उमा बाबू एतेक काल धरि योगधर बाबूक उपरोक्त सब बात चुपचाप सुनैत गेलाह। बिचारै छलाह जे योगधर बाबू अपन तूँ ती बजा लैथु, तखन हमहुँ समुचित उत्तर देवैन्हि।हुनका आशा छलैन्हि जे युक्ति-युक्त उत्तर पाविकेँ योगधर बाबू अपन हृद्गत भावकेँ हुनका मनोनुकूले परिवर्तन करताह। परन्तु देखी केहन मान होइ छैन्हि। ई सब बात मोनमे बिचारितहि छलाह कि श्यामाचरण, भूतनाथ, लोकेश्वर, आत्मानन्द और सच्चिदानंद बाबू प्रभृति गण्य-मान्य लोक सब एकत्रित भय योगधर बाबूक ओहि ठाम पहुँचि गेलाह। हुनको लोकनिक उद्देश्य वैह छलैन्हि जे उमाबाबू कहै ले प्रोन्मुख भेल छलाह। आइ- काल्हि ग्राम-मण्डली मे सर्वत्र योगधर बाबूक असमय विवाहक चर्चा, टीका-टिप्पणी और समालोचना गरम रूपें भय रहल अछि।

योगधर बाबू अपने जे कहल से हम सूनल परन्तु हमरो जँ किछु सुनितहुँ तँ हमहुँ एहि विषयपर अपन अभिमत कहि सुनाबितहुँ।

उमाशंकर बाबू अपने तँ बड़े महान लोक छी जे हमर तँ ई सिद्धान्त अछि जे सुनी बात छोट पैघ सभक, परन्तु करी वैह जे अपना नीक लागे।

उमा बाबू तँ " करी वैह जे अपना नीक लागै" सूनिकेँ निराशाक कालिमा देखय लगलाह, तथापि निम्न-लिखित उक्ति बजलाह।

धर्मशास्त्रक आदेश अछि जे " भार्य्या पुत्र प्रयोजना" से भगवान अपनेकेँ चारि लाल सन लाल देने छथि। अपनेक जेठ जन बालक आब शीघ्रे समर्थ होयताह, हुनके विवाह-दान दिन नीक जकाँ करियैन्ह, पुतहुकेँ घरमे आनिकेँ घर स्थिर करी ताही मे शोभा अछि। यावत काल धरि जेठजन बाबूक विवाह द्विरागमन होयबाक छैन्हि ताधरि अपने कन्या सबहिकेँ बजा केँ गृह कार्य्य सञ्चालन कराउ। कन्या बुतें अन्यथा होयबाक तँ कोनो टा संभवे नहि। आवेशो हुनका लोकनिसँ बढ़िकेँ के करत ?। हुनका लोकनि पूर्ण ज्ञानवती सब छथि और तकर यश नैहर सासुर दुहूँ ठाम सुरभित छैन्हि।

अपनेक बालक सब तेहन सत्पात्र ओ सद्बुद्धि सम्पन्न सब छथि जे हमरा सबहिकेँ हुनका लोकनिक पूर्ण भरोश रहैछ। हमरालोकनिकेँ ओ सब देशोद्धार-कार्य्यक सूत्रधार रूपें दृष्टिगोचर होइ छथि। हिनका लोकनिक बड़े विलक्षण बुद्धि छैन्हि। गुरुजनक सम्मान करबामे ओ सब बड़े निपुण छथि।किछुए दिनमे अपनेक बालक सब पण्डित भ' भ' केँ अपन गामकें के कहय, देश भरिकेँ उज्ज्वल करै जयताह। हिनका लोकनिसँ सेवा-सुश्रुषा मे कथमपि त्रुटि नै होयबाक सम्भव।हिनका सब पण्डित छथि और कर्तव्याकर्तव्यक पूर्ण विचार होयतैन्हतेँ हिनका लोकनिसँ अन्यथा होयबाक कोनो टा शंका नहि।
प्रत्युत अपनेकेँ भावी स्त्रीयहि सँ दुःख पहुँचबाक बेशी डर कियैक तँ एक तँ ओ बड़े छोटि रहतीह और दोसर अशिक्षता तँ जानियें केँ रहतीह और तेँ कर्तव्याकर्तव्यक ज्ञान सँ हीन रहतीह औरो एक बात अछि, अपने यद्यपि हुनकासँ सन्तुष्टो रही तथापि ओ अपनेसँ तद्वते रहतीह कि नहि तकर हमरा पूर्ण भय अछि।

योगधर बाबू अपने कहल जे ओ जे संचय करतीह से एही बालक लोकनि काँ काज औतैन्हि से हमरा सम्यक रूपें बुद्धिस्थ नहि होइछ। सतमाय और सतौत मे साश्वतिक द्वेष भाव होइ छैक। सतौतसब छोट रहौक वा पैघ और सतमायक अनिष्ट साधन नहियो करैत हो तथापि सतमायकेँ ओकरा देखियेकेँ दुःख होइ छैक। आइ काल्हिक कोन कथा जे जे सत्ययुगहुमे एहि दुनूकेँ शाश्वतिक विरोध रहैत छलैक। एखन तँ कलियुगे थीक, एखन तँ युगहिक धर्मे ई विरोध हैब स्वाभाविक होयतैक। विचार करू योगधर बाबू जे रामचन्द्र सन सतौत ककरा होयतैक- हुनक सन विवेकी, न्यायी, क्रियावान और समचित्त के हैत, तथापि कैकेयी हुनक सतमाय अपन धर्मकेँ नहि छोडलैन्हि। रामकेँ वन पठौने बिना नहि रहलीह। और अपन बेटा भरतकेँ राज्य दियौने बिना चैन नहि भेलीहि।

अपनहुँ आब परम् वृद्ध भेलहुँ- एही अवस्थाक स्त्री " प्राणेभ्योsपि गरीयसी" होइ छैक। अपने प्रमाद्य वश भय बुद्धि-भ्रष्ट भय जायब एवं कर्तव्याकर्तव्यक विचार सँ रहित भय एहि लाल सभक परम् कष्टक कारण भय जयबैन्ह जाहिसँ उद्धृत हैब हिनका सबहि काँ परम् दुःसाध्य होइ जयतैन्हि। अपने केँ सुखक लेश मात्रो धरि होयत कि नहि, परन्तु बालक सबहि काँ दुःखक पारावार नहि रहतैन्हि। अपनेकेँ यदि कनेको एहि बालक सबहिपर दया और स्नेह हो तँ पुनर्विवाहक स्वप्नो धरि नहि देखू। एहीमे अपनेकेँ एहि लौकिक एवं पारलौकिक सुख अछि। " स जातो येन जातेन, याति वंश: समुन्नतिम् " अपने चारि सुयोग्य पुत्रक उत्पादन कयने छी जाहिसँ वंशक भावी उन्नति अवश्यम्भावी अछि।अपने देवता और पितर सबहिकेँ अपन क्रिया सँ सन्तुष्ट कयने छियैन्हि, जकर फलो विद्यमान अछि और तत्प्रयुक्त अपनेकेँ समाजमे पूर्ण यश और प्रतिष्ठा अछि। हमरा सबहिकेँ दुःख एही बातक अछि जे ई असमय विवाह रूपी कुत्सित कर्म कयने अपनेक जीवन कलंकित भय जायत।अपनहुँकेँ एवं नेनहु लोकनिकेँ दारुण कष्टक अनुभव होएतैन्हि।

उमाशंकर बाबू अपनेक उत्तर सूनल। परन्तु हमरा बड़े दुःख होइछ जे अपने हमरा परमवृद्धकेँ बुझै छी। केश पाकल और दाँत टूटल देखलहुँ कि झट अनुमान कय लेल जे हमर इंद्रियादियो शिथिल भय गेल। आब ने नवयुवक लोकनि काँ पन्द्रहे बीस वर्षक अवस्थामे बिना विवाहे रहिए नहि होइ छैन्हि, परन्तु हमरहुसँ पूर्वक समयमे 40 /50 वर्षक अवस्थामे तँ लोक सब प्रथमे विवाह करैत छल। हमरे एखन कोन वयस भेलै जे विवाह नहि करी। एखन हमरा केवल 59म् (उन्सठिम्) वर्ष थीक- सट्ठातो पट्ठा सूनल नहि अछि। दू चारि मासक वा परमावधि गोटेक वर्षक बात रहै तँ मानलो जाय। हमरा ज्योतिषी परसू टिप्पणि देखिकेँ कहने छथि जे एखन दस पन्द्रह वर्ष कोनो डर नहि अछि। तखन विवाह कियैक नहि करब। परुकहु साल एक 68 म् वर्षक बूढ़केँ कन्या भेल छैन्हि। हमरा तँ एखन साठियो नहि पुरले। अपने लोकनि चारिये बालकमे सन्तुष्ट छी, हम अपनेलोकनिकेँ कहै छी- " हमरा विवाह करय दै जाउ, दश वर्षहिक अभ्यन्तरमे औरो चारि सन्तानक उत्पत्ति कय वंशक समुन्नित करब। यदि ओना नहि हैत तँ मकरध्वज सन सन औषधिक सेवन करब, अवश्ये बुढ़ारी वयसक सुख उठायब। यदि शास्त्र प्रमाण थिक और हमरामे नास्तिकता बुद्धि नहि अछि तँ हम अवश्यमेव कृतकार्य्य होयब।कहू औ श्यामाचरण बाबू लोकनि हम अनर्गल बात कहै छियैन्हि?। फारसीमे एक कहबी छैक - " हिम्मते मरदाँ, मदते ख़ुदा"। साहसीकेँ ईश्वर सहायक होइ छथिन्ह। औ बाबूलोकनि ! हमर तँ इएह सिद्धान्त अछि।

श्यामाचरण बाबू लोकनि एक स्वरसँ कहलथिन्ह जे जखन अपनेकेँ सिद्धान्त सुदृढ अछि, तखन हमरालोकनिक परामर्श देनहि की हैत। हमरालोकनिक अयलासँ अपनेकेँ अनेक तरहक कष्ट भेल हो से सम्भव, तदर्थ हमरासभ क्षमाप्रार्थी होइ छी। हमरालोकनि अपन बात घुरा लै छी, अपने अपन मनोनुकूल कार्य्य कय देखल जाउ जे की परिणाम होइछ। हमरालोकनि एखन जाइ छी।

योगधर बाबूकेँ हिनकालोकनिक विदा होयबाक समयमे उठलोसन होयबाक विचार नहि भेलैन्हि।

2
शिरोमणि बाबू ! आइ हमर बड़े भाग्य जे अपनेक दर्शन प्राप्त भेल।हम अपनहिक भेट लै उत्कण्ठित छलहुँ।एखन कतयसँ आबि रहल छी ?।

योगधर बाबू हमर तँ ई कार्ये थीक जे एक ठामसँ दोसर ठाम जाइत अबैत रही जे अपनहि सन सन महान व्यक्तिक सेवा करबाक शुभ अवसर प्राप्त हो। हम जहियासँ अपनेक ओहिठामक अशुभ संवाद सूनल तहिएसँ अपनेक जिज्ञासा करइ लै उत्कण्ठित छलहुँ।कहू बाबू आब अपने की विचार कय रहल छी ?। आब शुद्ध बड़े कम दिन छैक, आलस्य कयने कार्य्य सुधरब कठिन हैत।

की कहू शिरोमणि बाबू हम तँ बड़े अवग्रहमे पड़ि गेल छी। गामक लोक सब कहैछ जे आब अहाँ विवाह दान करैक योग्य नहि छी।दुइ तीनि दिन होइछ जे एहि गामक पाँच सात व्यक्ति पण्डितम्मन्य सब हमरा कत पण्डिताइ झाड़ि आयल रहथि जे विवाहक स्वप्नो नहि देखी। परन्तु हमहुँ तेहन उत्तर देलियैन्हि जे अपन अपन सन मुँह बना केँ चल जाइत गेलाह। हम तँ सिद्धान्त कैल जे एही बेर जेना तेना विवाह अवश्ये करब।

हँ बाबू अपने विवाह अवश्य कयल जाइ। अपनेकेँ भेले कि ? केवल शरीरक त्वचा मात्र लरकि गेल अछि और दाँत टुटले अछि और केश पाकि गेल अछि। परन्तु एहि सभसँ कोन त्रुटि भेल हैत, अपनेक हाड़-काठ तँ पूर्ववते अछि। अपनेकेँ जे विवाहक अयोग्य कहै जाइ छथि से सब परश्रीकातर थिकाह। अपनेक ग्रामीण सब अपनेक अभ्युदय नहि देखि सकै छथि अतएव एहन परामर्श दैत छथि। परन्तु चावश ! अपनहुँ खूब फटकारलियैन्हि। हुनका सभकेँ छकैबाक हेतु अपने सभा वास्तुक बाद लगले ओतय चलल जाय। हमहुँ अयबे करब। तखन देखबी जे अपनेक विवाह कोना नहि होइये। अस्तु एखन हम जाइ छी।

श्री योगधरबाबू हुनका अड़ियातै ले उठल सन भेलाह और हुनकर यात्रा -साफल्यक निमित्त " गणनान्ता गणपति ऊँ हवामहे" इत्यादि वेदध्वनि करय लगलाह।

शिरो• -हाँ ! हाँ !! योगी बाबू अपने बैसल जाउ , अपने बैसल जाउ। हम अपनेक कार्य्य अपना जकाँ करब। अपने सौराठ सभा शीघ्रे आबी।
(
क्रमशः)
(
प्रभात, वर्ष 2, अंक 11, नवम्बर 1934)

(
ई गल्प अपूर्ण अछि। आगाँक भाग दिसम्बर 34क अंकमे नहि अछि। आ एकर बादक अंक उपलब्ध नहि अछि। तत्कालीन समयक स्थिति-परिस्थिति आ सामाजिक व्यवस्थाक नीक जकाँ एहि गल्पमे वर्णन कयल गेल अछि, जे आब इतिहास भए गेल अछि। एहि गल्पक लेखक कोन गामक छलाह, से नहि कतौ लिखल अछि। कोइलखक छल हेताह अथवा आनो गामक, हुनक वंशजक लग जँ आगाँक अंश उपलब्ध होनि तँ सूचित करथि। एखन तँ पाठके पर निर्भर अछि जे योगधर बाबूक विवाह भेलनि कि व्यवधान अयलनि, गामक पण्डित सभक बात रहलनि कि घटकक प्रपंचक शिकार भेलाह , आब तँ कल्पने कय सकैत छी जे सभा गाछी गेलाह कि नहि?- हितनाथ झा)

 

संपादकीय सूचना-एहि सिरीजक पुरान क्रम एहि लिंकपर जा कऽ पढ़ि सकैत छी-

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साहित्य अकादेमीक संकीर्ण मैथिली भाषा विभागसँ विदेह (मैथिली साहित्यक समानान्तर मंच) ऐ अर्थमे सेहो फराक अछि जे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिका सन सहभाषाकेँ संग लऽ कऽ मिथिलाक बोली-वैविध्यक समग्र चित्र देल जाइत अछि। विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक भाषा विज्ञान, रचना आ व्याकरण मैथिलीक संग देल गेल अछि मैथिलीक एकटा समानान्तर व्याकरण, रचना आ भाषा विज्ञान (ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाकेँ संग लऽ कऽ)- गजेन्द्र ठाकुर, संगे विदेहमे ठेठी, अंगिका आ बज्जिकाक साहित्य ई-प्रकाशित आ समीक्षित सेहो होइत अछि।– गजेन्द्र ठाकुर, सम्पादक, विदेह ISSN 2229-547X
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