
गजेन्द्र ठाकुर

मैथिलीक आइ धरिक सभसँ
पैघ उपन्यास-
न्याय दर्शन आ
समकालीन अपराध-गाथा
मैथिली कादम्बरी
गोहि सभक बीच जलसमाधि
गजेन्द्र ठाकुर
२०० अध्यायारम्भ मैथिली लोकगीत
अध्याय १ — चन्ना गाछीक कबड्डी
अध्यायारम्भ लोकगीत : भोरक पहिल पारी
लोकधुन : फाग-कबड्डी धुन
चान उतरि गेल गाछी सँ, पूब दिस लाली,
भूतक खेलक बीच सुनायल कोइलीक खुशहाली।
कबड्डी-कबड्डी बाजि कहू—नाम बचत आइ,
एक पारी स्मृतिक, दोसर साहसक भाइ।
पात-पात पर ओस लिखै—भोर नहि हारै,
गोहि जते गहींर रहए, सूरुज जलपर तारै।
पहिल पारी आशाक हो, संगमे पूरा गाम,
चन्ना गाछीक माटिसँ उठत न्याय केर नाम।
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अध्याय २ — दहिन कातक गाम
अध्यायारम्भ लोकगीत : दहिन कातक सूरुज
लोकधुन : बटगबनी
नदी धार बदलि सकै, सूरुज दिशा चिन्है,
गामक जड़ि माटि भीतर अपन घरकेँ गिन्है।
दहिन-बामक फेरमे नहि नामक बाट हराउ,
देहरी, पात, पुरखाक सीख संग लऽ जाउ।
कमला-बलान गाबै—गाम चलै मनमे,
कागच काटि नहि सकै नेहक मेड़ जनमे।
दहिन कातक सूरुज फेर आँगनमे उतरै,
गामक पूरा नामसँ हरेक परिवार सँवरै।
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अध्याय ३ — छपाकक हिसाब
अध्यायारम्भ लोकगीत : छपाकक बीच नाव
लोकधुन : नाविक-मंगल
एक छपाक सुनिते नाविक पतवार उठाबै,
देह नहि, नामो पार—ई प्रण जोर लगाबै।
बिसेसर, छोटू, सरयूक दीप नावमे धरू,
हिसाबकेँ मानव चेहरा, परिवारसँ भरू।
धार जते कारी हो, नावक गीत उजियार,
साँचक सूची बनि सकै दुखपर पहिल उपचार।
छपाकक बीच नाव चलत, किनार बाट जोहत,
हरेक नाम सुरक्षित होए—एहि आशामे भोरत।
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अध्याय ४ — तीस नाम, तीन सय लाश
अध्यायारम्भ लोकगीत : नाम गनू, जीवन बचाउ
लोकधुन : करुण झूमरक जागरण
तीसपर गिनती रोकू नहि, पात जते हिलै,
हरेक संख्या पाछाँ घर, माए, सपना मिलै।
नाम गनू आदरसँ, जीवनक कथा जोड़ू,
छोट सूचीक देबाल तोड़ि पूरा सत्य खोलू।
तीन सय दीप जरत तँ अन्हार पाछाँ जाए,
एक सही गिनतीसँ न्याय दिशाक राह बनाए।
नाम गनू, जीवन बचाउ, संख्या मानुख होए,
साँचक पूरा लेखासँ नया व्यवस्था बोए।
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अध्याय ५ — तारीखक गोहि
अध्यायारम्भ लोकगीत : तारीखपर सूरुज
लोकधुन : विरहा-पराती
तारीखक पानि गहींर, मुदा सूरुज रोज उगै,
एक-एक सुनवाईपर जनक साहस संग रहै।
लाल फीता नाव बनाउ, गाँठि काटू नेह,
विधवाक बरख गननाइ हो उचित समयक लेख।
समय न्यायकेँ खाए नहि, नियम सरल बनाउ,
तारीखक बीच सहायता, सूचना साफ पहुँचाउ।
तारीखपर सूरुज जरत तँ गोहि पाछाँ हटत,
धैर्य, सुधार, जन-पहरासँ न्याय बाट पकड़त।
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अध्याय ६ — हार्वर्डक एथिक्स
अध्यायारम्भ लोकगीत : पात पहुँचल सभागार
लोकधुन : विदापत पदक उज्जर लय
गामक हरियर पात उड़ि हिमक देश पहुँचै,
मंचक सोना शब्द बीच मजदूरक नाम गुँजै।
नैतिकता पुस्तक नहि, पायापर सुरक्षा,
तालीसँ पहिने साँच, भाषणसँ पहिने रक्षा।
ईरा जकाँ प्रश्न उठाउ, मेहता जकाँ जागू,
विश्वविद्यालयक ज्ञानकेँ धरतीक श्रमसँ भागू।
पात पहुँचल सभागार तँ विचार नब मोड़त,
विश्वक मंच मिथिलाक साँचसँ मानवता जोड़त।
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अध्याय ७ — श्वासक भाव
अध्यायारम्भ लोकगीत : श्वास अमोलक
लोकधुन : माएरी सोहर
बौआक पहिल साँसपर सोहर गाम गबैत,
पवन मुफ्त अँचरा भरि जीवन-रस बहबैत।
शीशी, दवा, अस्पताल सभ सेवा लेल रहू,
श्वासक दाम नहि लगाउ, मानव धर्म कहू।
माए केर जोड़ल हाथ खाली नहि घुरै,
साझा प्रबन्ध, दया, विज्ञान जीवनकेँ धरै।
श्वास अमोलक गीत गाउ, कियो नील नहि होए,
हरेक छातीमे पवन बराबर आशाक फूल बोए।
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अध्याय ८ — स्क्रीनक गोहि
अध्यायारम्भ लोकगीत : स्क्रीनपर नेहक पहरा
लोकधुन : युवक-जागरण गीत
परदा चमकै राति जखन, संगमे मित्र रहू,
हारल अंकसँ जीवन पैघ—ई बात रोज कहू।
ऋण, धमकी, लाजक जाल अकेले नहि सहू,
माए-बाबू, साथी, सेवा केन्द्रसँ जुड़ू।
स्क्रीनक गोहि चिन्हि कऽ डाउनलोड सोचि करू,
एक क्लिकसँ पहिने सत्यापनक दीप धरू।
नेहक पहरा स्क्रीनपर उज्ज्वल भोर बनत,
कियो युवक मौन नहि, संगक हाथ पकड़त।
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अध्याय ९ — देहक बाजार
अध्यायारम्भ लोकगीत : देहक गरिमा
लोकधुन : स्त्री-मंगल गीत
देह मंदिर नहि कहू मात्र—देह अपन अधिकार,
सहमति बिना कियो नहि खोलय ओकर द्वार।
फूलमति माथ उठाउ, दोष तोहर नहि,
अपराधीक लाज ओकर, पीड़ितक लाज नहि।
बहिनी सभ संग ठाढ़, कानून सेवा देत,
जीवित स्त्रीक नाम इतिहासमे सम्मान लेत।
देहक गरिमा गीत बनि बाजारक चाल हरत,
स्वतन्त्र निर्णयक प्रकाशसँ नव समाज सँवरत।
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अध्याय १० — निजताक ब्लैकमेल
अध्यायारम्भ लोकगीत : निजताक देहरी
लोकधुन : सखी-संवाद मंगल
सखी, तोहर देहरी तोहर, चाबी तोहर हाथ,
फोनक भीतर जे पैसए, अनुमति ओकर बाट।
लाज घुरा अपराधी माथ, पीड़ित माथ नहि,
संगक तीन दीप जरत तँ ब्लैकमेल भारी नहि।
नाम, प्रेम, गवाही मिलि रक्षा-घेरा देत,
कानून, तकनीक, मित्रता भरोसक हाथ लेत।
निजताक देहरीपर सम्मानक अल्पना भरू,
अपन कथा अपन शर्तपर निःशंक जगमे धरू।
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अध्याय ११ — धनक कारी नदी
अध्यायारम्भ लोकगीत : कारी नदीपर हरियर नाव
लोकधुन : रोपनी-नाविक मिश्र
कारी धनक नदी बहै, हरियर नाव उतारू,
नाम, प्रमाण, स्मृति, साहस चारि पतवारू।
खाता-खाता पार करि श्रमक दाम घुराउ,
अंकक पाछाँ मानुख देखू, साफ हिसाब बनाउ।
गामक मुँहजुबानी आगि कारी धार सुखाबै,
जनक संयुक्त पहरासँ धन सेवा बनि आबै।
कारी नदीपर हरियर नाव विश्वास लऽ चलत,
श्रमक कमाइ बच्चाक घर न्यायसँ पहुँचत।
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अध्याय १२ — डार्क-जालपर नारिकेल पात
अध्यायारम्भ लोकगीत : अन्हार जालपर पातक दीप
लोकधुन : बटगबनी-जागरण
कारी जालक बाटमे पात दीप बनि जाए,
नामक छोट हरियर रेखा दिशा सही देखाए।
साक्ष्य ओतबे खोलू जतय गरिमा सुरक्षित,
तकनीक संग विवेक रहय, जन रहय संरक्षित।
मजदूर, युवक, स्त्रीक स्वर एक पातपर जुड़ै,
गामक ज्ञान डिजिटल जगक छलक गाँठि उघड़ै।
अन्हार जालपर पातक दीप कहै—धीरे चलू,
साँचक नाव, सुरक्षित संग लऽ अन्हार पार करू।
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अध्याय १३ — सीलबन्द आवरण
अध्यायारम्भ लोकगीत : मोहर खोलत भोर
लोकधुन : करुण समदाउनक आशा-लय
सीलबन्द आवरण भीतर साँस बाट जोहै,
भोरक नियम कहै—उचित हाथ धीरे खोले।
मोहर रक्षा लेल हो, सत्य दबाबय नहि,
गोपनीयता गरिमा हो, अपराधक मही नहि।
अदालतक फर्शपर पानिक दाग दिशा देत,
छोट गामक मुँहजुबानी पूरा नाम सहेत।
मोहर खोलत भोर जखन प्रक्रिया साफ बनत,
आवरण भीतरक साँच न्याय-आसन पाबत।
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अध्याय १४ — घर घुरबाक रस्ता
अध्यायारम्भ लोकगीत : घरक बाट उजियार
लोकधुन : घरघुरनी गीत
कुहासामे पग सुनाइ, देहरी दीप जरै,
नाम कागचसँ निकलि अपन आँगन दिस धरै।
गमछा, गिट्टी, गंगारेत बाटक चिन्ह बनै,
माए केर नोर नहि—आशीषक जल झरै।
गाछ मरत तँ बीज रहत, घरक राह नहि हरत,
स्मृति, प्रेम, साक्ष्य मिलि घुरनिहारकेँ धरत।
घरक बाट उजियार रहय हरेक बिसरल नाम,
देहरीपर सम्मान भेटय—एहने हो प्रणाम।
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अध्याय १५ — नामक जल
अध्यायारम्भ लोकगीत : नामक जल अमृत
लोकधुन : नाविक-पराती
पानिपर लिखल नाम लहरि संग दूर जाए,
मेटै नहि, बून्द-बून्द नब कंठमे समाए।
गोहि देह चिबा सकै, नामक रस नहि,
नदी अपन गहींर स्मृतिमे राखै सभ सही।
नामक जल अमृत बनि घर-घर पियास बुझाबै,
इतिहासक सूखल पन्ना हरियर रंग लगाबै।
हथेलीमे बून्द धरू, उच्चारू सम्मान,
नामक जलसँ जीवित रहत जनक पहिचान।
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अध्याय १६ — चन्ना गाछीक अदालत
अध्यायारम्भ लोकगीत : गाछी अदालत आशा
लोकधुन : भगैत-मंगल
गाछ तरे आसन बिछल, पात बनल विधान,
मोहर दूर, लोक लग—सुनवाई समान।
जीतक कागच नहि चलत, नामक साँच चलत,
हारल लोकक कर्मक दीप न्याय दिशा बलत।
केओ नेनाकेँ चेतना, केओ बहिनकेँ साथ,
गाछी अदालत निर्णयकेँ घर-घर देत बाट।
आशाक न्याय उठि चलत विद्यालय, बाजार,
पातक एक निर्णयसँ जागत जनक संसार।
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अध्याय १७ — जीतक शोक
अध्यायारम्भ लोकगीत : जीतक भीतर सेवा
लोकधुन : विजय-विरहक उज्जर चाल
जीतलहुँ तँ पहिने देखू ककर घाव बचल,
मुकुट उतारि सेवा करू, तखन विजय सफल।
हरल पक्षक मान राखू, संवादक द्वार खोलू,
फैसलाक पाछाँ जीवनक सुधारक बीज बोऊ।
‘सरयू’, ‘उज्ज्वल’ स्वर भीतर चेतना जगाबै,
जीतक भारी लोहेकेँ करुणा फूल बनाबै।
जीतक भीतर सेवा हो तँ शोक पिघलि जाए,
न्यायपूर्ण विनम्र विजय समाज जोड़ि जाए।
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अध्याय १८ — खाली अदालत
अध्यायारम्भ लोकगीत : खाली अदालत भरत जन
लोकधुन : श्रमिक-पुत्र पराती
बेंच खाली देखाइ तइयो छाह सभ बैसल,
प्रवेश नहि पाओल नाम भोरक संग अएल।
झाड़ूबला धूलिमे बाबूजीक नाम लिखै,
मेटल अक्षर कोंपल बनि पाथर बीच दिखै।
न्याय जँ नाम पढ़त तँ भवन घर बनत,
लोकक स्मृति संग मिलि खालीपन भरत।
खाली अदालत भरत जनक उज्जर पुकार,
उपस्थित जीवन पाबत सम्मानक अधिकार।
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अध्याय १९
अध्यायारम्भ लोकगीत : उपस्थितिक पराती
लोकधुन : पराती
हरद-काजर पातपर पुरनका नाम सजाउ,
हाजिरीक घड़ी सभ मिलि ‘हम उपस्थित’ गाउ।
कागच फाटि सकै, जड़ि अक्षर फेर उगै,
ओसक बून्द सुखलापर स्मृतिक रेखा रहै।
सरकारी फोन थमि जाए, जनक स्वर नहि,
नामक पाठशालामे कियो अनुपस्थित नहि।
उपस्थितिक परातीसँ भोर सभक होए,
अनामक हाजिरी लऽ इतिहास पूर्ण होए।
❖
अध्याय २०
अध्यायारम्भ लोकगीत : अकेला नहि—संगक गीत
लोकधुन : बाल-लोकधुन
स्क्रीनक गोहिक चारि पएर—लालच, भय, लाज,
संगक हाथ भेटिते टूटै ओकर पूरा राज।
नेना गोल घेरा बनि एक प्रश्न उठाबै,
‘अकेला तँ नहि छी?’—मित्र तुरन्त बताबै।
भय बाँटल तँ हल्लुक, लाज अपराधी जाए,
सहारा नाम पाबिते समाज रूप बनाए।
अकेला नहि—संगक गीत फोन-पार गुँजत,
एक-दोसरक जागल स्वर जीवन बाट चुनत।
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अध्याय २१
अध्यायारम्भ लोकगीत : हम निर्दोष, हम संग
लोकधुन : स्त्री-मण्डली जागरण
हम दोषी नहि बहिनी, लाज अपराधीक माथ,
एक-दोसरक हाथ पकड़ू, खुलत सुरक्षित बाट।
घूँघट अपन इच्छा, कंठ स्वतन्त्र रहय,
डर बाँटल तँ आधा होए, संगसँ साहस बहय।
‘हम अकेली नहि’क स्वर घर-घर दीप बनत,
समाजक जागल घेरा ठगक जाल हरत।
हम निर्दोष, हम संग—एहि गीतकेँ गाउ,
निजताक देहरीपर सम्मानक पहरा लाउ।
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अध्याय २२
अध्यायारम्भ लोकगीत : खाली मंचपर साँचक तान
लोकधुन : विदापत पदक सभागार-लय
मंच खाली हो तइयो पातक स्वर उठत,
सोना शब्दसँ पैघ एक साँचक नाम फूटत।
माइक चुप रहि सकै, जनक कंठ नहि,
प्रश्नक धीम तानसम पैघ कोनो घंट नहि।
एक नाम पढ़िते सभागारक हवा बदलै,
ताली सँ बेसी मौनक ध्यान सत्य सँ मिलै।
खाली मंचपर साँचक तान नव राह बनत,
नैतिकता कागच छोड़ि जीवनमे उतर।
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अध्याय २३
अध्यायारम्भ लोकगीत : जीत छोड़ि लोक खोजू
लोकधुन : बटगबनी-विजय गीत
जीतक कागच बाँहि तरे, पहिने लोकक घर जाउ,
जकरा हरौलहुँ, ओकर आजुक हाल सुनाउ।
जीत यदि सेवा नहि करै, खाली भार बनत,
हारल लोक उठि कऽ कर्मसँ नव समाज गढ़त।
पदक घमण्ड उतारि चलू, पगमे माटि धरू,
लोकक मुक्त जीवनसँ अपन उत्तर सीखू।
जीत छोड़ि लोक खोजू, जीतक अर्थ बदलत,
दूसराक मान बचेलापर अपन मान फुलत।
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अध्याय २४
अध्यायारम्भ लोकगीत : नब पन्नाक भोर
लोकधुन : बाल-कबड्डी गीत
किताब कहलक अन्त, नेना पन्ना फेरलक,
ओसक नान्हि बून्द नब कहानी लिखि देलक।
पहिल पंक्ति खेलक, दोसर नामक मान,
तेसर पंक्ति संगक, चौठी नव अभियान।
पन्ना खाली डर नहि, सम्भावनाक खेत,
बालक कलम चलिते उगै भविष्यक नेह।
नब पन्नाक भोर कहै—कथा कहियो नहि थाम,
हरेक पीढ़ी अपन कर्मसँ फेर लिखै गाम।
❖
अध्याय २५
अध्यायारम्भ लोकगीत : मोनक बाट घर
लोकधुन : बटोहिया गीत
देह शहरमे हो तइयो मोन गामक बाट,
पातक सरसर, पोखरिक गन्धि, दादीक बात।
टाँगल मोन उतारि लिअ, यात्रा लेल सजाउ,
जड़ि संग संवाद करब, अपन साँच बुझाउ।
घर घुरब केवल दूरी नहि, भीतरक मिलन,
मोनक बाटपर भेटत पुरखा, नेना, जीवन।
बटोहिया गीत गाबि चलू, अहंकार छोड़ि,
घरक माटि मनकेँ फेर न्याय दिशामे मोड़ि।
❖
अध्याय २६
अध्यायारम्भ लोकगीत : जूता उतारि विनम्र हो
लोकधुन : रेल-बटगबनी
दुआरपर जूता खोलू, संग अहंकार उतारू,
माटिक ठंढक पएरसँ माथक ताप उतारू।
नाम पढ़बासँ पहिने लोकक आँखि पढ़ू,
जीतक आदेश नहि, सुनबाक आसन गढ़ू।
रेल दूरसँ आनल देह, मन पहिने पहुँचत,
विनम्र पग धरिते बन्द सम्बन्ध खुलत।
जूता उतारि नाम पढ़ू आदरक उच्चार,
माटि सिखाबै—मनुख हो पदसँ पहिने सार।
❖
अध्याय २७
अध्यायारम्भ लोकगीत : काँचक दू पार संवाद
लोकधुन : झूमर
काँचक परदा दू मुख, दुनू पार नजर,
शहर गामकेँ देखै, गाम देखै शहर।
परदा बन्द नहि करू, पारदर्शी राह बनाउ,
डिलीट शब्दक पाछाँक मानुखकेँ सुनाउ।
तकनीक दर्पण बनय, देबाल नहि होए,
दू दिशाक संवादसँ भरोसक बीज बोए।
काँचक दू पार संवाद उज्जर पुल बनत,
मोनक दूरी घटि कऽ साझा दुनिया जनत।
❖
अध्याय २८
अध्यायारम्भ लोकगीत : संदेश बचाउ, जीवन बचाउ
लोकधुन : सिग्नल-जागरण
पाँच सेकेंडक अक्षर हो, तइयो संकेत मानू,
संकट, भय, निराशाक बात समयपर पहिचानू।
सन्देश मेटय सँ पहिने सुरक्षित प्रति धरू,
मित्र, परिवार, सहायता संग तुरन्त खबर करू।
एक उत्तर—‘हम संग छी’—जीवन बाट बदलै,
रातिक फोनक पाछाँ भोरक द्वार निकलै।
सन्देश बचाउ, जीवन बचाउ, मौन नहि रहू,
डिजिटल करुणाक जालसँ एक-दोसर सहू।
❖
अध्याय २९
अध्यायारम्भ लोकगीत : शीशाघरमे नदीक गीत
लोकधुन : समुद्र-मलार
शीशाघरमे समुद्र देखू, आवाजो भीतर आनू,
लाभक रेखा बीच मनुखक नाम सम्मानू।
काँचक मीनार खिड़की खोलि पवनकेँ ठौर दिअ,
दूर देशक श्रम आ सपनाक उचित मोल दिअ।
छपाक भयक नहि हो, चेतनाक मधुर ताल,
समुद्रपारो न्याय रहय वैश्विक व्यवहार।
शीशाघरमे नदीक गीत हृदयकेँ नरम करत,
काँचक ठंढा जगतमे मानवीय ऊष्मा भरत।
❖
अध्याय ३०
अध्यायारम्भ लोकगीत : भीतरक न्याय दीप
लोकधुन : भगैत-न्याय मंगल
बाहरक अदालत देर करै, भीतर दीप जरै,
विवेकक शान्त न्यायाधीश साँचक पन्ना धरै।
अपने काजक लेखा पढ़ू, दोषसँ नहि भागू,
सुधारक आदेश स्वयंकेँ देबामे नहि डेराउ।
भीतरक अदालत दण्ड मात्र नहि, दिशा,
पश्चात्तापसँ कर्म धरि बनाबै नव आशा।
न्याय दीप भीतर जरत तँ बाहर बाट साफ,
मनक साँचक फैसला जीवन करै निष्पाप।
❖
अध्याय ३१
अध्यायारम्भ लोकगीत : हारल लोकक कर्म विजय
लोकधुन : श्रमगीत
न झण्डा, न मंच, हारल लोक काजपर,
विद्यालय, खेत, सहायता, नेनाक समाजपर।
कर्मक शान्त विजय कागचक जीतसँ पैघ,
जकर श्रम जीवन सुधारे, सएह असल नेह।
हार नहि जँ हाथ चलै, ज्ञान बाँटल जाए,
दिन-दिन छोट सुधारसँ भविष्य रूप बनाए।
हारल लोकक कर्म विजय चुपचाप फूलत,
न्यायक असल इतिहास जनक श्रमसँ खुलत।
❖
अध्याय ३२
अध्यायारम्भ लोकगीत : तेसर पारी—संग
लोकधुन : कबड्डी-धुन
पहिल पारी खेल छल, दोसर नामक गान,
तेसर पारी संगक—जीवित जन अभियान।
सीमा आब दफ्तर, स्क्रीन, घर, बाजार,
एक-दोसरक हाथ पकड़ि करब सभटा पार।
कबड्डी स्वरमे साँस नहि, भरोसक लय धरू,
पकड़निहार छलक जाल, संगसँ ओकरा हरू।
तेसर पारी शुरू भेल, दर्शक कियो नहि,
सभ खिलाड़ी, सभ पहरुआ—कियो अकेल नहि।
❖
अध्याय ३३
अध्यायारम्भ लोकगीत : दर्पणसँ सुधार
लोकधुन : मोन-झूमर
दर्पण दण्ड नहि मात्र, साँचक मित्र बुझू,
चेहरा जकाँ कर्म देखू, गलती स्पष्ट चुनू।
जेलसँ भागल जाए, अपने नजरसँ नहि,
मुदा नजर जँ करुण हो तँ सुधार कठिन नहि।
दर्पण सामने प्रण करू—आइसँ भिन्न चलब,
जकर हक छीनल, ओकरा न्यायसँ फेर मिलब।
दर्पणसँ सुधार जखन व्यवहारमे उतरै,
अपराधक छाह घटि कऽ मनुखता फेर उगै।
❖
अध्याय ३४
अध्यायारम्भ लोकगीत : नदीक कान
लोकधुन : नाविक-समदाउनक उज्जर रूप
नदी धार रोकि सुनै हरेक किनारक नाम,
झूठक शोर पार करि पाबै साँचक तान।
हमरो कान नदी जकाँ धैर्यवान बनाउ,
कमजोर स्वर, दूर पुकार आदरसँ अपनाउ।
नदी नाम सुनै तइयो निर्णय नहि थोपै,
सुनि कऽ माटि, पात, जनक संग सत्य जोड़े।
नदीक कानक सीख लिअ—गहींर सुननाइ,
सुनल नामकेँ उचित ठाम धरब न्याय कमाइ।
❖
अध्याय ३५
अध्यायारम्भ लोकगीत : देहरीक धूलिसँ आशीष
लोकधुन : घरघुरनी गीत
घर टूटि जाए तइयो देहरी धूलि बचाबै,
घुरनिहारक पग चिन्हि पुरखा बात सुनाबै।
धूलि माथपर धरि कहू—घरक मान रहय,
नब भीत उठत, नब छप्पर, नेह पुरान बहय।
देहरी स्मृति मात्र नहि, पुनर्निर्माणक मूल,
ओहि धूरिमे रोपू विश्वासक नान्हि फूल।
देहरीक धूलिसँ आशीष नब घरकेँ भेटत,
टूटल ईंटो संग जुड़ि सुरक्षित भविष्य देत।
❖
अध्याय ३६
अध्यायारम्भ लोकगीत : तीन कंकड़—घर, साहस, सपना
लोकधुन : बाल-झूमर
जेबीमे तीन कंकड़, नेना नाम धरै,
एक घरक, एक साहसक, एक सपना भरै।
डर लगए तँ साहस पकड़ू, दूर हो तँ घर,
थाकि जाउ तँ सपना कहत—आगाँ बाट अमर।
नान्हि कंकड़ खेल नहि, स्मृतिक चिन्ह महान,
बच्चाक सरल उपायसँ मन पाबै पहिचान।
तीन कंकड़ तीन बात, जेबीमे उजियार,
घर, साहस आ सपना संग कियो नहि लाचार।
❖
अध्याय ३७
अध्यायारम्भ लोकगीत : जड़ि पढ़ि भविष्य
लोकधुन : धान-रोपनी गीत
गाछक पात नहि मात्र, जड़ि पढ़ू जमीन,
अपराधक अण्डा छोट, पाछाँ जाल महीन।
जड़ि धरि प्रश्न पहुँचत तँ रोग सही चिन्हात,
ऊपरी पात काटलासँ फेर उगत उत्पात।
धान रोपनी जकाँ कारण पाँति-पाँति देखू,
मूल सुधार, शिक्षा, नियम संग समाधान लेखू।
जड़ि पढ़ि भविष्य गढ़ू, लक्षण मात्र नहि,
गहींर समझक खेतीसँ समस्या अटल नहि।
❖
अध्याय ३८
अध्यायारम्भ लोकगीत : नाम सही, मान सही
लोकधुन : नाम-पाठ मंगल
लिखल नाम देहक खोल, पढ़ल नामक प्राण,
उच्चारण सही करिते बढ़ै मनुखक मान।
वर्तनी पूछि लिखू, परिचय अपने कहय,
छोट सुधारसँ ककरो पूरा अस्तित्व रहय।
नाम सही पढ़ू विद्यालय, दफ्तर, मंच सभ ठाम,
सम्मानक पहिल सीढ़ी अछि सही उच्चारल नाम।
नाम सही, मान सही—ई सरल लोक-विधान,
एक अक्षरक सावधानी बचाबै पहिचान।
❖
अध्याय ३९
अध्यायारम्भ लोकगीत : ओसक ‘आब’
लोकधुन : पराती
थिर पातपर ओस लिखलक—आब, एखन, यैह बेर,
बीज बहुत दिन बाट जोहलक, खोलू जीवन-द्वार फेर।
‘काल्हि’क बहाना छोड़ि कऽ पहिल नान्हि काज करू,
एक फोन, एक आवेदन, एक हाथ आइ धरू।
ओस सुखि जाए पहिने संकल्प माटिमे बोऊ,
आबक पगसँ भविष्यक लम्बा रस्ता जोऊ।
ओसक ‘आब’ पराती गाबै—समय जागि गेल,
थिर पातक भीतरक बीज धरती माँगि लेल।
❖
अध्याय ४०
अध्यायारम्भ लोकगीत : हथेली खोलत दरबाजा
लोकधुन : ओस-गीत
भीजल हथेली दरबाजापर नेहक छाप धरै,
ताला भीतरसँ सुनि कऽ धीरे-धीरे सरै।
मुट्ठी नहि, खुलल हथेली भरोसक पहिचान,
जे किछु अछि साफ देखाय—एहने साँचक दान।
ओसक अक्षर हथेलीपर कहै—डेराउ नहि,
खुलल हाथक आगाँ बन्द मन रहि पाउ नहि।
हथेली खोलत दरबाजा, संगक घर बनत,
विश्वासक नमीसँ सूखल सम्बन्ध फुलत।
❖
अध्याय ४१
अध्यायारम्भ लोकगीत : नाव चलू नाम सहित
लोकधुन : नाविक गीत
किनारपर नाव तैयार, नामक पतवार धरू,
धार जते तेज हो तइयो संगक साहस भरू।
एक चप्पू स्मृतिक, दोसर प्रमाणक,
बीचमे जीवित आशा, दिशा न्याय-स्थानक।
नाव खाली देह नहि, पहिचानो पार लगाबै,
हरेक यात्रीक पूरा नाम नदी आदरसँ गाबै।
नाव चलू नाम सहित, कियो पाछाँ नहि रहय,
साझा पतवारक बलसँ गहींर धारो सहय।
❖
अध्याय ४२
अध्यायारम्भ लोकगीत : भार बाँटू
लोकधुन : श्रम-झूमर
कन्हापर बैसल भार आधा हो संग लगिते,
एक हाथ पाछाँ आए, दोसर आगाँ बढ़िते।
दुख, काज, जिम्मेदारी बाँटू बराबर,
साझा श्रमसँ कठिन बाट होए सहजतर।
झूमरक गोल घेरामे कियो बीच अकेल नहि,
कन्हा-कन्हा मिलल रहत तँ भार पहाड़ नहि।
भार बाँटू, गीत गाउ, पगक लय मिलाउ,
एक-दोसरक थकानकेँ नेहक जल पियाउ।
❖
अध्याय ४३
अध्यायारम्भ लोकगीत : घर-घर हलुक कन्हा
लोकधुन : बटगबनी
भार घर-घर चलल तइयो संगमे राहत जाए,
एक देहरी दू हाथ देत, दोसर भोजन लाए।
कियो कागच पढ़ि देत, कियो बच्चा सम्हारै,
कियो अदालत संग जाए, कियो खेत उबारै।
घर-घर हलुक कन्हा हो सामुदायिक नेहसँ,
बोझक बाट बदलि जाए सहयोगक गेहसँ।
बटगबनी गाबि कहू—हम सभक घर एक,
बाँटल भारमे उगि उठै समाजक सच्चा टेक।
❖
अध्याय ४४
अध्यायारम्भ लोकगीत : पोतीक प्रश्नक फूल
लोकधुन : दादी-पोती गीत
पोती पूछलक—‘ककर डर?’ दादी फूल मुस्केलक,
‘जे साँचक नाम सुनै, ओकर भय पिघेलक।’
प्रश्नकेँ रोको नहि, कापीपर रंग भरू,
पुरान पीड़ा सरल कथा बनि अगिला पीढ़ी धरू।
पोतीक प्रश्न काँटा नहि, ज्ञानक नान्हि फूल,
ओहि सुगन्धिसँ खुलि सकै इतिहासक बन्द मूल।
दादी-पोती संग गाउ, उत्तर खोजू नेह,
प्रश्नशील नेनाक हाथमे भविष्यक उज्जर गेह।
❖
अध्याय ४५
अध्यायारम्भ लोकगीत : बन्द घर खुलल
लोकधुन : आँगन-पराती
दुआर भीतरसँ खुलल, पुरान हवा बहार,
धूप पसरल कोठरीमे, चमकल घर-दुआर।
जाला झाड़ू, खिड़की खोलू, स्मृति व्यवस्थित राखू,
जे दुख नुकायल छल, ओकरा सुरक्षित बातक साखू।
बन्द घर दोषी नहि, ओकरा संग चाही,
हँसी, पग, गीत, संवाद—जीवनक थाती।
घर खुलल तँ मन खुलल, छाह पाछाँ हटत,
आँगनक नूतन उजाससँ सम्बन्ध फेर गढ़त।
❖
अध्याय ४६
अध्यायारम्भ लोकगीत : श्वासक मूल्य जीवन
लोकधुन : उत्तराधिकार-मंगल
लाभ नहि, श्वास पहिने—एहि नियमपर चलू,
धनक मीनार बादमे, जीवनक दीप बलू।
काज, दवा, व्यापार सभ मानव हित सँ जुड़य,
एक श्वास बचल तखनहि असल लाभ उगय।
सन्तानकेँ धनसँ बेसी ईमानक उत्तराधिकार,
जकर काज जीवन बचाबै, ओकर नाम अपार।
श्वासक मूल्य जीवन थीक, बजार नहि नापै,
करुणा संग कमायल धन सुखक फूल छापै।
❖
अध्याय ४७
अध्यायारम्भ लोकगीत : गज-ग्राहक बुद्धि
लोकधुन : लोक-आख्यान मंगल
गजक पएर जलमे अटकल, साथी स्वर उठाबै,
ग्राहक दाँत जते कठोर, बुद्धि बाट बनाबै।
बल अकेल पर्याप्त नहि, समय, संग, उपाय,
संकटमे विवेकक दीप मुक्ति राह देखाय।
गज कहै—अहं छोड़ू, मदति माँगब मान,
नदी कहै—संगक शक्ति सभसँ पैघ प्राण।
गज-ग्राहक कथा सँ सीखू, जालक चाल बुझू,
धैर्य, ज्ञान, सहयोगसँ विजयक कमल चुनू।
❖
अध्याय ४८
अध्यायारम्भ लोकगीत : पुकार लेल कान
लोकधुन : करुण पुकारक आशा-लय
जनम भरि जे पुकारल, ओकरा कान दिअ,
बीचमे उत्तर नहि, पहिने पूरा मान दिअ।
सुनबाक समय सेवा, सुनबाक धैर्य दान,
एक ध्यानसँ बचि सकै कतेको टूटल प्राण।
गाममे ‘सुनबाक घर’ बनाउ, खुलल रहय द्वार,
कियो रोअय, कियो कहय, भेटय सहारा अपार।
पुकार लेल कान जागल तँ मौन नहि मरत,
सुनल स्वरक आदरसँ न्याय धीरे उतर।
❖
अध्याय ४९
अध्यायारम्भ लोकगीत : सुनल बातक बही
लोकधुन : मौन-बही गीत
कानमे लिखल बही कागचसँ गहींर,
सुनल बातक जिम्मेदारी हृदय करै गंभीर।
नाम, दिन, संदर्भ सहेजू, अनुमति संग लिखू,
ककर कथा कतेक खोलब—गरिमाक सीमा बुझू।
सुनल बात उधार सही, सेवा सँ चुकाउ,
विश्वासक कापी स्वच्छ राखि उचित ठाम पहुँचाउ।
कानक बही जखन ईमानक हाथमे रहत,
अनसुना जनक इतिहास सुरक्षित रूप गढ़त।
❖
अध्याय ५०
अध्यायारम्भ लोकगीत : जड़ि नाम सम्हारै
लोकधुन : समदाउनक हरियर रूप
देह दूर गेल तइयो जड़ि नाम सम्हारै,
माटि भीतर अक्षरकेँ ओसक दूध पियारै।
पुरखाक वृक्ष लगाउ, पट्टपर पूरा नाम,
छाहमे नेना सीखत श्रम, साहस, सम्मान।
जड़ि कहै—स्मृति स्थिर, पात नित्य नब,
जीवन रूप बदलै, प्रेम रहै अजब।
जड़ि नाम सम्हारै जखन वन बनत परिवार,
देहक पारो टिकि रहत मानक उज्जर धार।
❖
अध्याय ५१
अध्यायारम्भ लोकगीत : साक्षीकेँ संग
लोकधुन : प्रायश्चित्त-मंगल
साक्षीक छाती भारी हो तँ संगक कन्हा दिअ,
सुरक्षित घर, कान, सलाह, विश्रामक ठाम दिअ।
साँच कहनिहार वीर सही, मनुख सेहो होए,
ओकर डर, थकान, परिवारक मान संजोए।
गवाहीक भार बाँटि कऽ संस्था जिम्मा लेत,
एकाकी साहस नहि, सामूहिक रक्षा देत।
साक्षीकेँ संग भेटल तँ सत्य दृढ़ रहत,
भारी छाती हलुक भऽ न्याय-दिशा कहत।
❖
अध्याय ५२
अध्यायारम्भ लोकगीत : चौपाल अगिला स्वर
लोकधुन : सामूहिक नाम-गीत
कटल गाछिक ठाम चौपाल नव उगि आए,
एक स्वर पूरा भेल कि अगिला आसन पाए।
कियो पहिने, कियो पाछाँ—सभकेँ बराबर बेर,
लोकक कथा नदी समान चलै घेर-घेर।
अगिला आवाज लेल खाली जगह बचाउ,
अपन जीतक शोरसँ दोसर स्वर नहि दबाउ।
चौपाल अगिला स्वरकेँ स्वागत फूल धरत,
सुनवाईक निरन्तर धारा समाज पूर्ण करत।
❖
अध्याय ५३
अध्यायारम्भ लोकगीत : ठूँठक भोर
लोकधुन : पराती
गाछ कटल तइयो सूर्यक बाट नहि रुकल,
ठूँठक ओसपर भोरक पहिल सोना झुकल।
जड़ि भीतर जीवन जागल, कोंपल संकेत देत,
विनाशक पाछाँ पुनर्निर्माणक दिन भेटत।
ठूँठक चारू कात माटि नरम-नरम करू,
बीज, पानि, पहरा दऽ नव गाछी फेर भरू।
ठूँठक भोर कहै—आशा जड़ि धरि जाए,
कटल इतिहाससँ नब भविष्य फूटि आए।
❖
अध्याय ५४
अध्यायारम्भ लोकगीत : जड़िक घेरा
लोकधुन : चौपाल-मंगल
डारि नहि बचल तइयो जड़िक घेरा बनाउ,
लोक गोल बैसि स्मृति, योजना, गीत सुनाउ।
ठूँठ केन्द्र, जन चारू कात—नब गाछी निर्णय,
कियो पानि, कियो बीज, कियो पहरा दए निश्चय।
घेरा रक्षा मात्र नहि, साझा कर्मक थान,
जड़िक संग जुड़ल रहत माटि, जल आ प्राण।
जड़िक घेरा मजबूत हो तँ वन घुरि आए,
सामुदायिक नेहसँ सूखल धरती हरियराए।
❖
अध्याय ५५
अध्यायारम्भ लोकगीत : पीयर कागचक पाँखि
लोकधुन : चेतावनी-बटगबनी
पीयर कागच कैंची नहि, पाँखि बनि उड़ू,
कटबाक आदेश छोड़ि सत्यक समाचार जुड़ू।
रंग पीयर सरिसोंक, ज्ञानक उज्जर फूल,
कागच जनकेँ चेताबै, नहि काटै घर-मूल।
हरेक सूचना सरल लिखू, अधिकारक राह बताउ,
भयक भाषा हटाकऽ सहायता संग पहुँचाउ।
पीयर कागचक पाँखि आशाक पत्र बनत,
जन-जागरूकता उड़ा कऽ सुरक्षित गाम गढ़त।
❖
अध्याय ५६
अध्यायारम्भ लोकगीत : स्मृतिभूमि
लोकधुन : माटि-गीत
‘खाली भूखण्ड’ लिखल जगह नामसँ भरल,
ककरो खेल, ककरो घर, ककरो सपना पलल।
माटि नापू तखन पहिने स्मृतिक नक्शा पढ़ू,
कब्र, गाछ, पगडंडी, जल-स्रोतक मान गढ़ू।
विकास जँ आए तँ लोकसँ सहमति लए,
स्मृतिभूमिक सम्मानसँ नव निर्माण करे।
खाली नहि कोनो धरती, हरेक कण इतिहास,
माटिक मान राखिते विकास पाबै विश्वास।
❖
अध्याय ५७
अध्यायारम्भ लोकगीत : प्रश्नक खेत
लोकधुन : प्रश्न-भगैत
गंगेशक प्रश्न हल जकाँ माटि गहींर जोतै,
प्रमाणक बीज रोपि कऽ ज्ञानक धान बोतै।
प्रमेय पाबय खेत जखन तर्कक पानि पाए,
सन्देहक खरपतवार विवेक धीरे हटाए।
प्रश्नक खेत खुलल रहय विद्यार्थी सभ लेल,
उत्तर बदलि सकै, मुदा ईमान रहय मेल।
गंगेशक प्रश्नसँ ज्ञानक फसल भरपूर,
जिज्ञासु मन मिथिलाक भविष्य करै नूर।
❖
अध्याय ५८
अध्यायारम्भ लोकगीत : शोकक सेवा निधि
लोकधुन : करुणा-झूमर
फूल-दिया स्क्रीनपर, संगमे साफ हिसाब,
शोकक सेवा निधिसँ परिवार पाबय जवाब।
किस्त नहि संवेदना, नियमित सहायता हो,
शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका स्थायी व्यवस्था हो।
दानक कोड पारदर्शी, लाभार्थीक मान,
दुखक नामपर व्यवसाय नहि, करुणाक अभियान।
शोकक सेवा निधि जखन जीवनकेँ उठाबै,
स्मृति फूलसँ आगाँ बढ़ि भविष्य राह बनाबै।
❖
अध्याय ५९
अध्यायारम्भ लोकगीत : मेटल कोड, बचल साँच
लोकधुन : गुप्त-सन्देश जागरण
सन्देश मेटल तइयो भाप काँचपर रहै,
नान्हि कोड पढ़िते पूरा रास्ता कहै।
डिजिटल राख सहेजि कऽ विशेषज्ञ संग जाँचू,
जल्दी निष्कर्ष नहि, प्रमाणक धागा बाँधू।
मेटल कोड हार नहि, खोजक पहिल द्वार,
सुरक्षित प्रति, समयक छाप बनत सच्चा आधार।
बचल साँचक चिन्हसँ जालक नक्शा खुलत,
धैर्यक दीप हाथमे हो तँ अन्हारो गलित।
❖
अध्याय ६०
अध्यायारम्भ लोकगीत : मौनसँ वचन
लोकधुन : मौन-पराती
दोसर मौन पहिलसँ भिन्न—एहि बेर सोचक थान,
धर्मक कपड़ा हटि रहल, खुलि रहल असल जान।
मौन भीतर प्रश्न पकै, उत्तर रूप धरै,
सही क्षणमे स्पष्ट वचन जनक संग उतरै।
चुप्पी छलक ढाल नहि, आत्मावलोकन हो,
भोरक बाद काजमे बदलल ईमानक प्रण हो।
मौनसँ वचन, वचनसँ कर्म—एहि क्रममे चलू,
भीतरक सत्य बाहिर लऽ समाजक दीप बलू।
❖
अध्याय ६१
अध्यायारम्भ लोकगीत : नामक शान्त उत्सव
लोकधुन : नाम-उत्सव गीत
न नगाड़ा, न पताका, नामक दीप पर्याप्त,
शान्त स्वरमे पढ़ल गेल तँ स्मृति होए सुरक्षित।
हरेक नामक संग एक फूल, एक कथा, एक मान,
उत्सव ओ नहि जे ढाँकय, जे खोलय पहिचान।
गामक नेना, बूढ़, बहिन सभ घेरा बनाउ,
जयकार नहि, आदरसँ जीवन-गीत सुनाउ।
नामक शान्त उत्सवमे आत्मा पाबै ठौर,
स्मरणक सरल उजास रहत युग-युग भोर।
❖
अध्याय ६२
अध्यायारम्भ लोकगीत : हरियर बिन्दुक सोहर
लोकधुन : सोहर
तेल सिरा गेल तइयो बाती नान्हि जरै,
कारी रातिक कागचपर हरियर बिन्दु उगै।
ओ बिन्दु नव जन्मक, आशाक पहिल नैन,
एक कोंपल कहि रहल—फेर हरियर होएत धेन।
सोहर गाउ धीमे-धीमे, जीवन घुरि रहल,
ठूँठक हृदय भीतर नव रस भरि रहल।
हरियर बिन्दुक जन्मसँ भविष्य पाबै नाम,
नान्हि उजास एक दिन बनत विशाल धाम।
❖
अध्याय ६३
अध्यायारम्भ लोकगीत : उजासक रखवारी
लोकधुन : झिझिया-जागरण
दीप जरै तँ केवल देखू नहि, रखवारी करू,
उजासक भीतर लोभ न पैसय, सावधानी धरू।
पारदर्शी काँच, खुलल हिसाब, साझा पहरा हो,
प्रकाशक नामपर अन्हारक व्यापार नहि हो।
झिझिया घुमि-घुमि कहै—छिद्र सभ जाँचू,
दीपक तेल ककर श्रम, ई प्रश्नो चिन्हू।
उजासक रखवारीसँ प्रकाश पवित्र रहत,
लोभक छाह पाछाँ हटत, जन भरोस बढ़त।
❖
अध्याय ६४
अध्यायारम्भ लोकगीत : शोकसँ सेवा
लोकधुन : करुणा-मंगल गीत
शोकक नामपर ठेका नहि, सेवा हाथ बढ़ाउ,
फूलक संग सहायता, न्याय, उपचार पहुँचाउ।
रोदनकेँ विज्ञापन नहि, मौनक मान दिअ,
परिवारक जरूरत पूछि ठोस सहारा दिअ।
स्मृति भवन तखने पवित्र जखन लोक लाभ पाए,
शोकसँ सेवा जन्मि कऽ जीवित जीवन बचाए।
करुणा काज बनत जखन श्रद्धा साँच रहत,
दुखक धरतीपर आशाक घर धीरे-धीरे बनत।
❖
अध्याय ६५
अध्यायारम्भ लोकगीत : पुरान पुलपर नव पग
लोकधुन : नदी-बटगबनी
पुरान पुलक गन्धमे पसीना, गाद, इतिहास,
ओहि पर नव पग धरू, सहेजि कऽ विश्वास।
दरार जाँचू, पाया मजबूत, नामक पट्ट लगाउ,
जे बनौलक ओकर श्रमकेँ आदरसँ बताउ।
पुरान पुल बोझ नहि, सीखक खुलल किताब,
गलती सँ सुधार करब, ई भविष्यक जवाब।
नव पग चलत सुरक्षित, पुरखा देत आशीष,
नदी पार करैत समाज सीखत न्यायक रीति।
❖
अध्याय ६६
अध्यायारम्भ लोकगीत : लेंस साफ, दृष्टि मानवीय
लोकधुन : दृष्टि-गीत
लेंस साफ करू पहिने, फेर मानुखकेँ देखू,
चेहरा वस्तु नहि, अनुमति लऽ कथा लेखू।
आँखि नापय नहि गरिमा, आँखि सम्मान करै,
चित्र जँ जनक हो तँ जनक सहमति धरै।
दृष्टि तकनीकसँ पैघ, हृदयक नेहसँ साफ,
लेंसक भीतर गोहि नहि, करुणाक खुलल छाप।
देखबासँ पहिने पूछू, देखलापर मान दिअ,
मानवीय दृष्टि सँ कला आ ज्ञानकेँ प्राण दिअ।
❖
अध्याय ६७
अध्यायारम्भ लोकगीत : अनुमति पहिने
लोकधुन : स्त्री-संवाद गीत
हमरा देखबा सँ पहिने पूछू—हम तैयार छी?
हमर देह, हमर कथा, हमर निर्णय हमर छी।
‘हँ’क मान, ‘नहि’क मान, मौनकेँ सेहो सुनू,
विश्वासक घेरा भीतर सहमतिक फूल चुनू।
चित्र, स्वर, स्पर्श, लेख—सभमे अनुमति चाही,
सम्मानक ई सरल नियम मानवताक थाती।
अनुमति पहिने, काज पाछाँ—एहि लयमे चलू,
स्वतन्त्र मनक बगियामे सम्बन्धक फूल फुलू।
❖
अध्याय ६८
अध्यायारम्भ लोकगीत : बटनसँ पहिने विवेक
लोकधुन : चेतावनी-बाल गीत
बटन दबाबै हाथ तखन पहिने मोन टटोलू,
ककर नाम, ककर धन, ककर मान—साफ-साफ बोलू।
एक क्लिकक चाल तेज, सोचक दीपो तेज,
ठगीक बाट रोकि सकै सावधान सन्देश।
माए-बाबू संग विचारू, अनजान लिंक नहि खोलू,
लोभक मीठ बोलि सुनिते सत्यापनक ढोलू।
बटनसँ पहिने विवेक—डिजिटल सुरक्षाक गान,
सावधानीसँ बचत घरक श्रम, भरोस, सम्मान।
❖
अध्याय ६९
अध्यायारम्भ लोकगीत : पानिमे नामक कमल
लोकधुन : पनिघट-मंगल
मिटल नाम पानिमे फेर कमल बनि उगै,
धार जते बहै, जड़ि स्मृतिक भीतर रहै।
पनिघटपर बहिनी सभ नामक गीत गाउ,
बून्द-बून्द उच्चारणसँ चिन्हारि घुरि लाउ।
पानि मेटै नहि साँच, केवल रूप बदलै,
नामक कमल भोरमे सूरुज दिस खुलै।
जलपर फूल, मनमे मान, घरमे दीप धरू,
मेटायल जीवनकेँ स्मृतिक आसन भरू।
❖
अध्याय ७०
अध्यायारम्भ लोकगीत : झोँटासँ मुक्त नाम
लोकधुन : पोखरि-गीत
पनिडुब्बीक झोँटामे जे नाम ओझरायल,
सखी सभ कंघी लऽ कऽ धीरे-धीरे छुड़ायल।
एक गाँठि भयक, एक लाजक, एक विस्मृत बात,
नेहक तेल लगिते खुलि जाए सभ जटिल गाँठ।
मुक्त नाम पोखरि ऊपर चान जकाँ चमकै,
जकर कथा बन्हायल छल, स्वतन्त्र स्वर दमकै।
झोँटासँ मुक्त नामकेँ पातपर घर दिअ,
ओझरायल स्मृतिकेँ सम्मानक कंठ दिअ।
❖
अध्याय ७१
अध्यायारम्भ लोकगीत : असल भूत चिन्हू
लोकधुन : लोक-व्यंग्य झूमर
भाड़ाक भूत नाचि सकै, धुँआ खूब पसारै,
असल भय तखने भागै जखन बुद्धि दीप जारै।
भेस, अफवाह, नकली चमत्कारक चाल बुझू,
प्रमाण, प्रश्न, हँसीक संग साँचक बाट चुनू।
भूतसँ नहि, अज्ञानसँ समाज बेसी डेराइ,
ज्ञानक ढोल बजिते नकली छाह भागि जाइ।
असल भूत लोभ-छल, ओकर नाम पुकारू,
व्यंग्यक उज्जर हँसीसँ डरक बाजार उतारू।
❖
अध्याय ७२
अध्यायारम्भ लोकगीत : ठूँठक हँसीसँ कोंपल
लोकधुन : हरियरनी गीत
ठूँठ हँसल भीतरसँ—जड़ि एखन जीवित,
पहिल वर्षा पड़िते कोंपल होएत उपस्थित।
खोखल कहि नहि छोड़ू, नमी ओकरा दिअ,
कटल गाछक स्मृतिसँ नव वनकेँ प्राण दिअ।
ठूँठक हँसी व्यंग्य नहि, धैर्यक मधुर बोल,
विनाशक बादो जीवन खोजि लैत अछि ठौर।
कोंपल फूटत, पात हिलत, चिड़िया घुरि आए,
ठूँठक हँसीसँ पूरा गाछी फेर हरियराए।
❖
अध्याय ७३
अध्यायारम्भ लोकगीत : स्वप्न-दरबारमे न्याय
लोकधुन : स्वप्न-भगैत
स्वप्नमे दरबार लागल, सभकेँ आसन भेटल,
विधवा, बच्चा, मजदूरक पूरा कथन सुनल।
न्यायाधीश विवेक बनल, साक्षी बनल चान,
फैसला—हरेक नामक मान, हरेक जीवन सम्मान।
भोर होइत स्वप्नक नियम जागल जगमे लाउ,
दफ्तर, अदालत, गाममे समान सुनवाई पाउ।
स्वप्न-दरबार कल्पना नहि, दिशा देखाबै आज,
मनमे देखल न्यायकेँ कर्ममे करू समाज।
❖
अध्याय ७४
अध्यायारम्भ लोकगीत : स्वीकारसँ शुरुआत
लोकधुन : एकल आशा-पद
पहिल स्वीकार बन्द कोठरीमे धीमे जन्मै,
‘हम गलत रही’ कहिते कठोर हृदय नमै।
स्वीकार अन्त नहि, सुधारक पहिल पग,
साँचक नाम कहू, भरू क्षतिक उचित रग।
डर बिना आत्मावलोकन मनकेँ मुक्त बनाबै,
दोषक पूरा जिम्मा लेब विश्वास फेर जगाबै।
पहिल स्वीकारसँ शुरुआत, बाट लंबा सही,
ईमानक एक पगसँ भविष्य अन्हार नहि।
❖
अध्याय ७५
अध्यायारम्भ लोकगीत : भरोसक जाल
लोकधुन : युवक-जट-जटिन
चारि पट्टी सिग्नल हो, तइयो संग जरूरी,
भरोसक नेटवर्क बनत मानव कड़ी पूरी।
मित्रक फोन, परिवारक कान, सहायता केन्द्र,
संकटमे एक क्लिकसँ जुड़य सुरक्षित केन्द्र।
पासवर्ड जकाँ गोपनीय, सम्बन्ध खुलल रहय,
लाज नहि, सहायता माँगब साहसक बात कहय।
भरोसक जाल मजबूत हो तँ ठगक जाल फटत,
एक-दोसरक संगसँ डिजिटल राति कटत।
❖
अध्याय ७६
अध्यायारम्भ लोकगीत : समुद्रपार संगति
लोकधुन : बटोहिया गीत
समुद्रपारक यात्री सेहो ओही चान निहारै,
घरक नाम, मायक बोली हृदय भीतर सम्हारै।
दूर देशमे संग बनाउ, सत्यापनक रीत,
परदेसियो अपन हक जानू, साझा सुरक्षा प्रीत।
भाषा अलग, कानून अलग, मानुखक मान समान,
विश्वास सावधानी संग हो, एहीमे कल्याण।
समुद्रपार संगति बनि दूरीकेँ पुल करै,
घरक गन्धि आ विश्वक ज्ञान संग-संग फलै।
❖
अध्याय ७७
अध्यायारम्भ लोकगीत : शीशा साफ, आँखि साफ
लोकधुन : शहर-पराती
शीशाक देबाल चमकै, भीतर मनो साफ हो,
गोहिक आँखि नहि, करुणाक दृष्टि माफ हो।
लाभक काँच पारदर्शी, श्रमक नाम देखाए,
शहरक उजास गामक हककेँ नहि नुकाए।
खिड़की खोलू, पवन आवय, हिसाब जन पढ़ि ले,
दर्पणमे अपन काज देखि संस्था सीखि ले।
शीशा साफ, आँखि साफ—एहि नियमपर नगर,
मानव मानक उज्जर इजोत रहय अमर।
❖
अध्याय ७८
अध्यायारम्भ लोकगीत : मौनक पुल
लोकधुन : मौन-दोहरा
दू मौन एक-दोसर लग बैसल, पवन बीच बोलल,
आँखिक नमी, हथेलीक थरथर संवाद खोलल।
शब्द नहि तँ समय दिअ, संगक आसन धरू,
मौनक पुलपर धीरे-धीरे विश्वासक पग भरू।
एक मौन दोषक हो, दोसर घावक गहींर,
सुनबाक धैर्य मिलिते दुनू पाबै नब नीर।
मौनक पुल पार कऽ साँचक कंठ उगै,
बिनु दबावक संवादे सम्बन्ध फेर जुड़ै।
❖
अध्याय ७९
अध्यायारम्भ लोकगीत : दानपत्र पारदर्शी
लोकधुन : करुणा-मंगल
भीजल दान-पत्र सुखाउ खुलल सूरुज तरे,
ककर धन, ककर लाभ—सभ जनक आँखि पढ़े।
सुनहर किनारी कम, साफ हिसाब बेसी,
दान तखने पुण्य जखन मदद पहुँचै जेसी।
लाभार्थीक गरिमा राखू, फोटो नहि बेचू,
सेवा केर हरेक खर्चक साँचक पन्ना सेचू।
दानपत्र पारदर्शी हो तँ विश्वास फूलत,
करुणाक पानि सही खेतमे जीवन बनि झूलत।
❖
अध्याय ८०
अध्यायारम्भ लोकगीत : संतानक प्रश्न, नव उत्तर
लोकधुन : पिता-पुत्री संवाद गीत
बेटी पूछै—न्याय बचेलहुँ? पिता आँखि उठाउ,
पुरान भूल नहि नुकाउ, साँचक उत्तर लाउ।
संतानक प्रश्न दण्ड नहि, सुधारक दीप,
एक पीढ़ीक साहससँ दोसर पाबै सीप।
‘पेशा सेवा लेल’ कहि कर्मसँ प्रमाण दिअ,
बच्चाक उज्जर नजरकेँ ईमानक मान दिअ।
नव उत्तर पुरान घरमे ताजा हवा भरत,
संतानक प्रश्नसँ परिवारो न्याय-पथ धरत।
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अध्याय ८१
अध्यायारम्भ लोकगीत : भीतरक पोखरि साफ
लोकधुन : गज-ग्राह आख्यानक आशा-लय
चारि किनार अलग सही, पानि एकहि प्राण,
भीतरक पोखरि साफ करू, हटत भ्रमक जाल।
गजक बल, ग्राहक पकड़—दुनू कथा बुझू,
डरक गाद निकालि कऽ स्वच्छ विवेक चुनू।
कमल उगत जखन मनक पानि निर्मल होए,
चारू दिशा एक आकाशक उज्जर छवि संजोए।
भीतरक पोखरि साफ रहत तँ निर्णय होए स्पष्ट,
मनक स्वच्छ जलसँ जीवन बनत शान्त, समर्थ।
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अध्याय ८२
अध्यायारम्भ लोकगीत : पातक आसनपर पाठशाला
लोकधुन : बाल-पाठशाला गीत
छाहरि कम, पातक आसन, ज्ञानक आकाश पैघ,
नेना गोल घेरा बैसि सीखै नामक नेह।
पहिल पाठ—कियो अनाम नहि, दोसर—संग रहू,
तेसर—डर बाँटू सभ, चौठी—साँच कहू।
कापी नहि तँ माटि अछि, कलम नहि तँ टहनी,
लोकक अनुभव पुस्तक, दादीक कथा गहनी।
पातक आसनपर पाठशाला न्याय-बोध जगाबै,
सीखल नेना काल्हि समाजक सच्चा पहरा बनाबै।
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अध्याय ८३
अध्यायारम्भ लोकगीत : उपस्थितिक गीत
लोकधुन : हाजिरी-मंगल
नाम पुकारू एक-एक, सभ कहू—उपस्थित,
माय, मजदूर, नेना, बूढ़—सभक मान सुरक्षित।
हाजिरी केवल संख्या नहि, जीवनक पहिचान,
जकर पएर धरतीपर, ओकर पूरा स्थान।
कियो छुटि नहि जाए पाँतिसँ, कियो मेटायल नहि,
उपस्थितिक एक स्वर सँ टूटै अदृश्य मही।
हाजिरीक गीत गाउ, हरेक नामक दीप धरू,
समाजक पूरा चित्रमे सभ रंग बराबर भरू।
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अध्याय ८४
अध्यायारम्भ लोकगीत : स्त्री सभक उज्जर पहर
लोकधुन : स्त्री-मण्डली मंगल गीत
दिनक श्रम, रातिक बात—स्त्री सभ घेरा बनाबै,
एक-दोसरक कंठ सुनि साहस दीप जलाबै।
माय, बहिन, बेटी सभ अपन नाम कहत,
घर, खेत, दफ्तर, मंचमे समान अधिकार रहत।
घूँघट चाही तँ अपन, स्वरपर पर्दा नहि,
निर्णयमे आधा जगत कखनहुँ आधा नहि।
उज्जर पहर स्त्रीक हो, गामक भोर बढ़त,
हुनकर संग समाजक हरेक संस्था पूर्ण बनत।
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अध्याय ८५
अध्यायारम्भ लोकगीत : पएरक धूलिसँ बाट
लोकधुन : श्रम-बटगबनी
मजदूरक पएरक धूलि बाटक नक्शा लिखै,
जतय श्रमक पग पड़ै, विकास ओतहि दिखै।
धूलि झाड़ू नहि तिरस्कार, माथपर मान धरू,
जूता, विश्राम, सुरक्षित राह सभ अधिकार भरू।
पग-पग मिलि कऽ सड़क, पुल, घर, नगर बनै,
श्रमिकक नाम बिना कियो प्रगति पूर्ण नहि कहै।
पएरक धूलिसँ बाट, बाटसँ भविष्य उजियार,
श्रमक सम्मान मिथिलाक सभसँ पैघ श्रृंगार।
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अध्याय ८६
अध्यायारम्भ लोकगीत : परदाक विश्राम, आँखिक उत्सव
लोकधुन : दिनभरिया लोकगीत
एक दिन परदा विश्राम लए, आँखि गाछी जाए,
माटिक रंग, पातक नस, बादरक चाल निहारै।
फोन चुप, परिवार बोलै, आँगन गीत सुनै,
नेना दादी लग बैसि पुरनका खेल चुनै।
परदाक उपवास दण्ड नहि, जीवनक उत्सव,
सामना-सामनी हँसीमे मिलै अपनत्वक रस।
आँखि विश्राम, मन विस्तार, देहक लय सुधरै,
तकनीक संग संतुलनसँ जीवन सुन्दर करै।
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अध्याय ८७
अध्यायारम्भ लोकगीत : परदेस पत्रमे घरक भोर
लोकधुन : बटोहिया-पत्र गीत
परदेसक बच्चाकेँ लिखू—आँगन एखन हँसै,
कटल ठूँठकोंपल फुटल, तुलसी पात बसै।
माए केर स्वास्थ्य, बाबाक खेत, पोखरिक जल,
घरक साँचक समाचारसँ दूरी होए हलुक।
पत्रमे आदेश नहि, नेहक खुलल दुआर,
घुरि आबू जखन चाहू, घर रहत तैयार।
परदेस पत्रमे भोर पठाउ, आशाक रंग भरी,
दूर शहरमे घरक गन्धि बनत उज्जर डोरी।
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अध्याय ८८
अध्यायारम्भ लोकगीत : अनसुना स्वरक चौपाल
लोकधुन : जन-सुनवाई मंगल
जे सुनल नहि गेल, ओकरा पहिने आसन दिअ,
बीचमे टोको नहि, पूरा कथा कहबाक मान दिअ।
चौपाल गोल बनाउ, मंचक ऊँचाई घटाउ,
शान्त कानक दीप जरा हरेक अनसुना स्वर लाउ।
गवाही कमजोर नहि जँ भाषा सरल होए,
जनक अनुभव कानूनक नब दिशा संजोए।
अनसुना स्वरक चौपाल समाजकेँ पूर्ण करत,
सुनबाक संस्कृति सँ न्याय घर-घर उतर।
❖
अध्याय ८९
अध्यायारम्भ लोकगीत : पातक लोक-विधान
लोकधुन : लोक-विधान गीत
सूखल पातक नस-नसमे नदीक बाट बनल,
प्रकृतिक संविधान बिना मोहरो मानल।
जल बाँटू, छाह बचाउ, बीजक हक सम्हारू,
जीव-जंतु, माटि, मनुख संग-संग संसारू।
कानून जँ लोकसँ जुड़त, पात जकाँ लचकत,
न्याय जड़ि धरि पहुँचि कऽ हरेक जीवनकेँ रकत।
पातक लोक-विधान पढ़ू, सरल मुदा महान,
सह-अस्तित्वक अक्षरमे बसै धरतीक प्राण।
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अध्याय ९०
अध्यायारम्भ लोकगीत : खाली कुरसी, भरल जन
लोकधुन : मौन-झूमरक उत्सवी रूप
कुरसी खाली हो तइयो चौपाल भरल रहै,
पदधारी नहि आयल तँ जनक काम नहि बहै।
एक-दोसरक बात लिखू, निर्णय साफ बनाउ,
खाली आसनकेँ प्रश्नक फूलसँ सजाउ।
कुरसी सेवा प्रतीक, व्यक्ति मात्र नहि,
संस्था जनक भरोससँ टिकै, डरक बात नहि।
भरल जनक जागरूकता खाली पद सँ पैघ,
लोकतन्त्रक झूमरमे सभक बराबर नेह।
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अध्याय ९१
अध्यायारम्भ लोकगीत : ठूँठक छाहमे सुनवाई
लोकधुन : छाहरि-पराती
गाछ कटल, ठूँठ बचल, छाह नान्हि सही,
ओहि छाहमे कान पैघ, सुनवाई रुकत नहि।
एक-एक लोक बैसि कहै अपन दुःख-सुख बात,
ठूँठक जड़ि सम्हारि राखै पुरखा केर सौगात।
छोट आसन न्याय रोकै? नहि, मन चाही खुलल,
एक सुनल स्वर सँ समाजक सम्बन्ध फुलल।
ठूँठक छाहमे सुनवाई आशाक बीज बोए,
जड़ि बचल तँ वनक सपना एक दिन पूरा होए।
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अध्याय ९२
अध्यायारम्भ लोकगीत : बाढ़िक बाद हरियाली
लोकधुन : चौमासा-मंगल
बाढ़ि फेर आयल तइयो नाव तैयार राखू,
ऊँच मचान, बीजक डिब्बा, संगक हाथ सम्हारू।
पानि उतरला पर गाद खेतकेँ उर्वर करै,
विपदा पाछाँ श्रमक गीत नव हरियाली धरै।
घर टूटल तँ मिलि कऽ फेर मजबूत घर बनाउ,
नदीक स्वभाव बुझि सुरक्षित बसावट सजाउ।
बाढ़िक बाद हरियाली आशाक पुरान रीति,
मिथिलाक धैर्य कहै—फेर उठब, फेर प्रीति।
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अध्याय ९३
अध्यायारम्भ लोकगीत : गोहि चिन्हू, नदी बचाउ
लोकधुन : नदी-जागरण गीत
पानिक गोहि प्रकृतिक, छलक गोहि अलग,
रूप चिन्हू, नदीकेँ दोष नहि दिअ गलत।
जलचरक घर बचाउ, मनुखक लोभ घटाउ,
अपराधक दाँत चिन्हि कऽ सही ठाम रोकाउ।
नदी साफ रहत तँ गोहि अपन सीमा मानत,
जनक पारदर्शी शासन छलक भूख हरत।
गोहि चिन्हू, नदी बचाउ, विवेकक दीप धरू,
प्रकृति आ न्याय दुनूकेँ संतुलित आदर करू।
❖
अध्याय ९४
अध्यायारम्भ लोकगीत : सौदासँ ऊपर जीवन
लोकधुन : सौदा-विरहा से मंगल
अन्तिम सौदामे नाम नहि, जीवन पहिने मान,
दामक तराजू नापि नहि सकै मनुखक प्राण।
कागचपर सीमा लिखू—जे बिकाउ नहि होए,
देह, सहमति, स्मृति, श्वास स्वतन्त्रतामे सोए।
व्यापार सेवा बनि रहय, लोभ नहि सरकार,
लाभक संग जिम्मेदारी हो स्पष्ट व्यवहार।
सौदासँ ऊपर जीवन—बाजारो ई सीखू,
मानव मानक रेखा भीतर सभ अनुबंध लिखू।
❖
अध्याय ९५
अध्यायारम्भ लोकगीत : देरक क्षमा संग सुधार
लोकधुन : प्रायश्चित्त-समदाउनक उज्जर रूप
देरसँ आयल क्षमा जँ साँच, संग सुधार लाउ,
केवल बोल नहि, टूटल हक फेर घुरा दियाउ।
भूलक पूरा नाम कहू, पीड़ितक बात सुनू,
क्षतिपूर्ति, नियम-सुधार, नव व्यवहार चुनू।
क्षमा खाली द्वार नहि, लम्बा बाटक आरम्भ,
जिम्मेदारी निभबैत चलू, तखन घटत दम्भ।
देरक क्षमा संग सुधार आशाक पुल बनत,
घावक मान राखि कऽ सम्बन्ध नव जनत।
❖
अध्याय ९६
अध्यायारम्भ लोकगीत : अपन खाता, अपन जीवन
लोकधुन : खाता-जागरण
दोसराक खाता ढोउ नहि, अपन नामक मान,
लेन-देन स्पष्ट राखू, सुरक्षित पहिचान।
कागच पढ़ू, फोन बुझू, अनजान धन रोकू,
लोभक नान्हि बाटसँ जीवनकेँ नहि झोंकू।
अपन खाता अपन श्रमक स्वच्छ नदी बनाउ,
परिवार संग वित्तक सरल ज्ञान बढ़ाउ।
म्यूल नहि, मालिक बनू अपन निर्णयक आज,
सावधानीक गीतसँ बचत श्रमक कमाइ-साज।
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अध्याय ९७
अध्यायारम्भ लोकगीत : पातपर संदेशक आशा
लोकधुन : सिग्नल-बटगबनी
अन्तिम संदेश मेटल तइयो पातपर रहि जाए,
हावा पढ़ि कऽ घर-घर आशाक बात पहुँचाए।
‘संग खोजू, सहायता लिअ’—हरेक पंक्ति कहत,
अन्हार फोनक भीतर सेहो भोरक संकेत रहत।
सन्देशकेँ जीवन दिअ, समयपर हाथ बढ़ाउ,
कियो संकटमे हो तखन ओकर दुआर पहुँचाउ।
पातपर आशाक शब्द डिजिटल राति हरत,
एक सही सन्देश कतेको जीवन बचा सकत।
❖
अध्याय ९८
अध्यायारम्भ लोकगीत : मौनमे उपस्थित जन
लोकधुन : गवाही-पराती
कियो नहि बाजै तइयो आँखि कहै—हम छी,
खाली आसन, भीजल पात कहै—हम छी।
मौनकेँ अनुपस्थित नहि, संकेत जकाँ पढ़ू,
सुरक्षित ठाम देलापर कंठक फूल गढ़ू।
उपस्थिति हस्ताक्षर नहि, सम्मानक अनुभूति,
जनक शान्त संगति देत भयपर विजय-पूर्ति।
मौनमे उपस्थित जनकेँ आदरसँ स्थान दिअ,
बोलबाक बेर अपने आए—एतबे विश्वास दिअ।
❖
अध्याय ९९
अध्यायारम्भ लोकगीत : बच्चाक हाथसँ जीत
लोकधुन : गज-ग्राह विजय गीत
गजक बल थाकि सकै, बच्चाक हाथ नहि,
नान्हि उँगली सत्य पकड़ै, छोड़ै बाट नहि।
एक नेना चित्र बनाबै, दोसर नाम पढ़ै,
तेसर प्रश्न उठाबै, चौठा संगमे बढ़ै।
बच्चाक सहज न्याय-बोध ग्राहक पकड़ ढील करै,
नव पीढ़ीक उज्जर हँसी अन्हारक जड़ि हरै।
बच्चाक हाथसँ जीत, आशाक पाँखि पसार,
साँच सिखाउ, संग दिअ—ओ बनत भविष्यार।
❖
अध्याय १००
अध्यायारम्भ लोकगीत : बाल-पारीक विजय
लोकधुन : बाल-कबड्डी गीत
कबड्डी-कबड्डी नेना दौड़ै नामक पारी,
हँसी ओकर ढाल बनल, जिज्ञासा तरवारी।
सीमा पार करैत कहै—कियो अनाम नहि,
जकर कथा सुनल गेल, ओकर हार नहि।
पुस्तक, खेल, गीत मिलि न्याय सरल बनाबै,
बाल-पारीक विजय भविष्यक दिशा देखाबै।
हाथ नहि थाकै, मन नहि झुकै, संगक स्वर रहत,
दुइ सय वर्षक अन्हारो नेनाक भोरसँ कटत।
❖
अध्याय १०१
अध्यायारम्भ लोकगीत : पृथ्वीक उपहार लिअ
लोकधुन : आकाश-बटगबनी
दूर ग्रह जँ बुलाबै, संग की लऽ जाएब?
माटिक गन्ध, मायक गीत, नामक दीप सजाएब।
धन नहि, हथियार नहि, साझा नेहक बात,
पृथ्वीक हरियर सीख लऽ पार करब आकाश-पात।
तारा पूछत—तोहर मूल? कहब—मानव मान,
जतय जाएब ओतय रोपब शान्ति, श्रम, सम्मान।
पृथ्वीक उपहार लिअ, लोभ एतय छोड़ू,
दूर ग्रहक यात्रामे प्रेमक बाट जोड़ू।
❖
अध्याय १०२
अध्यायारम्भ लोकगीत : ताराक पारीमे नाम
लोकधुन : कबड्डी-आकाश धुन
साँस रोकू, नाम बाजू, ताराक पारी जाउ,
सीमा नभक हो तइयो अपन जड़ि नहि बिसराउ।
एक पारी पृथ्वी लेल, दोसर मानवता,
तीसर पारी न्याय लऽ, चौठी सह-अस्तित्वता।
ताराक धूरि माथपर, हृदयमे गामक थाप,
कबड्डीक लय कहै—संग रहू बेहिसाब।
ताराक पारीमे नाम आदरसँ पहुँचत,
ब्रह्माण्डो सीखत जखन मनुख नेहसँ जियत।
❖
अध्याय १०३
अध्यायारम्भ लोकगीत : नामक धागा आकाशमे
लोकधुन : झूलन-आकाश गीत
ताराक बीच तनल धागा, नामक झूला डोलै,
एक छोर पुरखा पकड़े, दोसर नेना खोलै।
आकाश गहींर हो तइयो धागा टूटत नहि,
स्मृति, प्रेम, जिम्मेदारी कखनहुँ छोट नहि।
झूलू धीरे, गीत गाउ, तारामे दीप सजाउ,
हरेक पीढ़ीकेँ अगिला पीढ़ीक संग जोड़ि जाउ।
नामक धागा आकाशमे उज्जर राह बनत,
दूर-दूरक जीवन सभ एक परिवार जनत।
❖
अध्याय १०४
अध्यायारम्भ लोकगीत : पृथ्वी हमर चयन
लोकधुन : माटि-प्रेम गीत
स्मृति-बिनु शीशा-महलसँ अपन कादो नीक,
माटिक गन्धि, पानिक स्वर, पीपरक छाह अतीव।
पृथ्वी चुनब दीनता नहि, प्रेमक पैघ प्रमाण,
एतय श्रमक पसीना अछि, एतय जनक सम्मान।
जतय घाव ओतहि उपचारक बीज उगाउ,
धरती छोड़ि भागू नहि, धरती नव बनाउ।
पृथ्वी हमर चयन कहू, जिम्मेदारी साथ,
अपन घरकेँ न्यायमय करब—एहने उज्जर बाट।
❖
अध्याय १०५
अध्यायारम्भ लोकगीत : धरतीक सोहर
लोकधुन : सोहर
धरती नवजात शिशु सन भोरक गोदमे हँसल,
ओसक दूध पिअल, सूरुजक अँचरा पसल।
नदी नाल काटि बहै, वन झुनझुना बजाबै,
पवन दुलारि कहै—नव जीवन आबि जाए।
धरतीक सोहर गाउ सभ, घावपर फूल धरू,
नवजात घरक रक्षा जकाँ पर्यावरण भरू।
हरेक दिन ओकर जन्मदिन, हरेक बीज शुभदान,
धरती हँसत तँ हँसत मनुखक सभ सन्तान।
❖
अध्याय १०६
अध्यायारम्भ लोकगीत : बीज-माटिक मिलन
लोकधुन : रोपनी-मंगल
बीज कहै—माटि चाही, माटि कहै—आउ,
पानि कहै—हम नेह देब, सूरुज कहै—फुलाउ।
चारू तत्त्व मिलि कऽ जीवनक गीत रचै,
एक नान्हि अंकुर भीतर पूरा वन बसै।
बीजकेँ सही घर दिअ, किसानक मान बचाउ,
जैव विविधताक रंग खेत-खेत उगाउ।
बीज-माटिक मिलनसँ भविष्य हरियर होए,
साझा संरक्षणक बलसँ अन्नक गंगा सोए।
❖
अध्याय १०७
अध्यायारम्भ लोकगीत : भविष्य बचाउ, बीज बचाउ
लोकधुन : धान-बीज जागरण
बीज चोरल तँ काल्हिक थारी खाली होए,
बीज बचल तँ सात पीढ़ी अन्नक हँसी बोए।
दादीक डिब्बा, किसानक ज्ञान, खेतक लोक-विधान,
सभकेँ संग सहेजि राखू—एहने भविष्य दान।
एक बीजक भीतर मौसम, स्वाद, कथा, संस्कार,
ओकर स्वतन्त्रता बचेनाइ सभक साझा भार।
भविष्य बचाउ, बीज बचाउ, भंडार खोलि बाँटू,
लोभक ताला तोड़ि कऽ जीवनक हक सँटू।
❖
अध्याय १०८
अध्यायारम्भ लोकगीत : माटिक ठाम बनाउ
लोकधुन : माटि-माय गीत
माटि पूछै—हम कतय उगब? कहू—हमर हृदयमे,
खेत, आँगन, गमला, वन—सभ सम्मानक सदयमे।
कंक्रीटक बीचो नान्हि हरियर खिड़की खोलू,
बीजक पएर धरबाक लेल नरम धरती जोतू।
माटि केवल जमीन नहि, जीवनक आधार,
ओकर साँस बचेनाइ सभ नागरिकक व्यवहार।
माटिक ठाम बनाउ, शहरो हरियर होए,
जतय माटि मुस्कायत ओतय मानवता सोए।
❖
अध्याय १०९
अध्यायारम्भ लोकगीत : नदी मुक्त करब
लोकधुन : पनिहारिन-मलार
बोतलमे बन्द नदीक स्मृति ढक्कन ठेलै,
धारक जन्म स्वतन्त्र, पियासक संग खेलै।
पानि वस्तु मात्र नहि, जनक साझा प्राण,
कूप, पोखरि, धार बचाउ—एहने जल सम्मान।
पनिहारिन गीत गाबि स्रोतक बाट साफ करू,
बून्दकेँ व्यापारक कैदसँ धीरे मुक्त करू।
नदी मुक्त रहत तँ माटि, माछ, मनुख हँसत,
जल-न्यायक उज्जर धार सभ घरमे बसत।
❖
अध्याय ११०
अध्यायारम्भ लोकगीत : राखसँ अंकुर
लोकधुन : अग्नि-प्रभाती
आगि बुझल, राख बचल, राखमे बीज नुकायल,
पहिल बून्द पड़िते हरियर कोंपल मुस्कायल।
जे जरि गेल ओकर नाम नव वनमे बसाउ,
विनाशक धूरिसँ पुनर्निर्माणक राह बनाउ।
राख कहै—अन्त नहि, रूप बदलल मात्र,
धैर्य, श्रम, नेह मिलिते फेर भरत ई पात्र।
राखसँ अंकुर, आँसूसँ साहस उगि जाए,
भोरक अगिनि ऊष्मा बनि नया घर सजाए।
❖
अध्याय १११
अध्यायारम्भ लोकगीत : स्वच्छ हवा साझा अधिकार
लोकधुन : वायु-पराती
पवन सभक देहरी आबै, शुल्क ककरो नहि,
स्वच्छ साँस पर सभक हक, भेद ककरो नहि।
धुँआक स्रोत चिन्हि कऽ साफ तकनीक अपनाउ,
गाछ लगाउ, चूल्हि सुधारू, नीला आकाश बचाउ।
बच्चाक फेफड़ा फूल जकाँ, ओकर मान धरू,
शहर-गामक हवा मिलि जीवनक गीत भरू।
स्वच्छ हवा साझा अधिकार—एक स्वरमे कहू,
साँसक पहरा सभ मिलि दियौ, स्वस्थ मिथिला रहू।
❖
अध्याय ११२
अध्यायारम्भ लोकगीत : आकाश भरू प्रश्न-उत्तर
लोकधुन : आकाश-पराती
खाली आकाश प्रश्न करै—नीचाँ के जागल?
धरती उत्तर देत—जनक विवेक नहि भागल।
प्रश्न बादर, उत्तर बून्द, संवाद बनै धार,
मौनक सूखल खेतमे उगै विचारक हार।
आकाश खाली राहत नहि जखन कंठ खुलै,
हरेक प्रश्नक पाँखि लगा समाधान दिस उड़ै।
प्रश्न-उत्तरक मेघसँ ज्ञानक वर्षा होए,
खुलल मनक आकाशमे नव समाज संजोए।
❖
अध्याय ११३
अध्यायारम्भ लोकगीत : शब्दकेँ जीवन
लोकधुन : अक्षर-सोहर
शब्द जन्मै जखन अर्थक देह ओढ़ि आए,
हथेली, आँखि, श्रम, अनुभव संग अपनाय।
खाली नारा नहि बनाउ, काजसँ ओकर मान,
‘न्याय’ लिखू तँ न्याय करू, ‘सेवा’ लिखू तँ दान।
अक्षरक सोहर गाउ, भाषा जीवित राखू,
लोकक बोली, दुख, उमंग सभ पन्नामे साखू।
शब्दकेँ जीवन दिअ, जीवनकेँ स्वच्छ नाम,
बोल आ कर्म मिलिते पूर्ण होए पैगाम।
❖
अध्याय ११४
अध्यायारम्भ लोकगीत : अर्थक आत्मा सम्हारू
लोकधुन : दार्शनिक विदापत पद
शब्दक देह चमकि सकै, अर्थ भीतर रोए,
नेहक नजर रखिते आत्मा फेर संजोए।
‘गरिमा’ केवल अक्षर नहि, व्यवहारक फूल,
‘सहमति’ बिना काज अधूरा, ई समाजक मूल।
अर्थक आत्मा बाजारमे बेचू नहि कखनो,
लोकक अनुभवसँ भाषा नवी करू सपनो।
शब्द आ अर्थ संग रहत तँ विश्वास टिकत,
साँचक भाषा पीढ़ी-पार उज्जर राह लिखत।
❖
अध्याय ११५
अध्यायारम्भ लोकगीत : कण्ठक बगिया
लोकधुन : कण्ठ-झूमर
हरेक कंठ एक फूल, अलग रंग अलग गन्ध,
नकल नहि, सम्मानसँ बनत सुरक सम्बन्ध।
कलाकारक अनुमति लिअ, श्रमक उचित दाम,
आवाजक असल मालिकक सदिखन रहय नाम।
कण्ठक बगिया सहेजि राखू, चोरी हवा न होए,
लोकधुनक बीज नव पीढ़ीक स्वरमे सोए।
स्वतन्त्र आवाज मिलि कऽ सुन्दर हार बनत,
मिथिलाक बहुरंगी कंठ विश्वभरि गुँजत।
❖
अध्याय ११६
अध्यायारम्भ लोकगीत : चुप्पीमे साँचक बीज
लोकधुन : मौन-पराती
चुप्पी खाली नहि रहै, भीतर बीज पलै,
समयक ओस पाबि एक दिन कोंपल बनि निकलै।
पहिने सुनू, तखन बोलू, शब्द रहय विचार,
साँचक चुप्पी तैयारी, भयक मौन बेकार।
मौनक मान राखू मुदा अन्यायपर स्वर दिअ,
सही क्षणमे साँचक बीज धरती फोड़ि दिअ।
चुप्पीमे जागल विवेक जखन वाणी पाबत,
एक मृदु सत्य सय कोलाहल ऊपर छाबत।
❖
अध्याय ११७
अध्यायारम्भ लोकगीत : स्मृति चुकाउ सेवा सँ
लोकधुन : ऋण-मंगल गीत
सुनल नामक ऋण रहै, सेवा ओकर ब्याज,
स्मृति केवल फूल नहि, जिम्मेदारी आज।
जकर कथा सुनलहुँ, ओकर हकक संग रहू,
विद्यालय, दस्तावेज, सहायता केर रंग रहू।
ऋण चुकाउ धनसँ नहि, न्यायपूर्ण व्यवहार,
अगिला पीढ़ीकेँ सिखाउ मानव मानक सार।
स्मृतिक उधार सेवा सँ धीरे-धीरे चुकत,
नामक मान बचेनिहारक आत्मा हल्लुक होत।
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अध्याय ११८
अध्यायारम्भ लोकगीत : पूरा देह, पूरा मान
लोकधुन : देह-अधिकार मंगल
नाम बचल तँ नीक, मुदा देहक मानो चाही,
स्वास्थ्य, सुरक्षा, सहमति—जीवनक सच्ची थाती।
हाथक श्रम, आँखिक निन्न, छातीक साँस गनू,
मनुखकेँ आधा नहि, पूरा अधिकार दियौ।
देह अपन, निर्णय अपन, उपचार सभकेँ समान,
कामक ठाम सुरक्षा हो, विश्रामक सम्मान।
पूरा देह, पूरा मान—गीत घर-घर गाउ,
जीवनकेँ सम्पूर्ण बुझि न्याय समाज बनाउ।
❖
अध्याय ११९
अध्यायारम्भ लोकगीत : पसीनाक अक्षर
लोकधुन : मजदूर श्रमगीत
पाथरपर नाम नहि पढ़ै केवल नयनक जोर,
पसीनाक अक्षर चमकय भोर-भोर, घोर-घोर।
हथौड़ा, कुदालि, करघा, हल—सभ कलम समान,
श्रमक हरेक चाल लिखै देशक असल गान।
मजदूरक हाथ पकड़ि ओकर कथा सुनू,
दाम, सुरक्षा, विश्रामसँ श्रमक मान चुनू।
पसीनाक अक्षर पढ़ल तँ इतिहास साफ होए,
श्रमिकक उज्जर नामसँ सभ विकास संजोए।
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अध्याय १२०
अध्यायारम्भ लोकगीत : नर्म न्याय, दृढ़ जड़ि
लोकधुन : कोंपल गीत
न्यायक देह कोंपल सन, नर्म ओकर पात,
जड़ि मुदा पाथर फोड़ै, धरै दृढ़ विश्वास।
दया ओकर ओस बनै, नियम ओकर माटि,
साहस सूरुज बनि दए वृद्धि दिन आ राति।
कठोरता नहि शक्ति मात्र, संवेदना बलवान,
नर्म न्याये जोड़ि सकै टूटल जनक प्राण।
कोंपलकेँ पहरा दिअ, वन एक दिन बनत,
दृढ़ जड़िक कोमल न्याय मिथिलाक रूप गढ़त।
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अध्याय १२१
अध्यायारम्भ लोकगीत : स्पर्शक खुलल आकाश
लोकधुन : नचारीक मुक्त लय
जातिक पिंजरा टूटि जाए जखन हाथ मिलै,
मानुखक गरम स्पर्शसँ सूखल मन फुलै।
कियो ऊँच-नीच नहि, धरती सभकेँ धरे,
एके पवन, एके पानि सभक जीवन भरे।
बोलक सलाखी खोलू, नेहक खिड़की लाउ,
स्पर्शक खुलल आकाशमे संग-संग उड़ि जाउ।
हाथसँ हाथ जुड़ल रहत तँ पिंजरा टिकत नहि,
मानव मानक आगाँ कोनो जाति पैघ नहि।
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अध्याय १२२
अध्यायारम्भ लोकगीत : प्रश्नक दीप
लोकधुन : विदापत पदक जिज्ञासा-लय
गंगेशक प्रश्न दीप थीक, कियो बुझा नहि पाबै,
एक उत्तरसँ दोसर बाट हरदम खुलि आबै।
जिज्ञासा गंगाजल जकाँ मनक मैल हटाबै,
साँचक पाथर छूइत-छूइत उज्जर रूप बनाबै।
प्रश्न करब अपराध नहि, ज्ञानक पहिल नाम,
जे पूछै से पार लगाबै भ्रमक गहींर गाम।
दीप हाथमे लऽ चलू, उत्तर स्वयं फुलत,
गंगेशक मुक्तिक प्रश्नसँ नव विचार उगत।
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अध्याय १२३
अध्यायारम्भ लोकगीत : स्त्रीक नाम पातपर
लोकधुन : समदाउनक आशा-रूप
पोथीक पात खाली छल, बहिनी नाम लिखाउ,
मेटायल स्त्रीक जीवनकेँ अक्षर-फूल सजाउ।
माय, दादी, बेटी सभ अपन कथा कहत,
पातक नस-नसमे हुनकर श्रमक नदी बहत।
नाम लिखलासँ मान बढ़ै, इतिहास पूर्ण होए,
आधा पोथी पूरा बनत जखन स्त्री स्वर सोए।
पात-पातपर नाम उगाउ, कोंपल जकाँ हरियर,
स्त्रीक स्मृतिसँ मिथिला बनत आरो समृद्ध, सुन्दर।
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अध्याय १२४
अध्यायारम्भ लोकगीत : प्रमाणक अगिनिसँ उजास
लोकधुन : झिझिया-मंगल
दीपक छिद्रसँ अगिनि झरे, झूठक जाल जरे,
साँचक पन्ना राख जकाँ नहि—स्वर्ण जकाँ निखरे।
प्रमाण आगि दण्ड नहि, उज्जर करय विचार,
जे शुद्ध अछि से चमकि उठत, मेटत भ्रमक भार।
झिझियाक दीप घुमाउ, छिद्र-छिद्र जाँचू,
अगिनिसँ नहि डेराउ, सत्यक रूप पहिचानू।
उजास बनल प्रमाण जखन न्याय दिशा देखत,
कारी ओढ़नी हटिते जनक चेहरा चमकत।
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अध्याय १२५
अध्यायारम्भ लोकगीत : रोपू न्याय, काटू आशा
लोकधुन : धान-रोपनी गीत
कीचड़मे पएर धँसाउ, न्यायक धान रोपू,
एक पाँति साहसक, दोसर नेहक जोपू।
पानि बराबर बाँटू सभ, खेतक मान बचाउ,
जकर श्रम ओकरे अन्न, साफ नियम बनाउ।
रोपनीक गीत दूर धरि सामूहिक बल जगाबै,
आजुक नान्हि बिरबा काल्हि सुनहर बाली लाबै।
रोपू न्याय, काटू आशा, भरू जनक खलिहान,
माटि कहत—संगक श्रमसँ बदलै हरेक विधान।
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अध्याय १२६
अध्यायारम्भ लोकगीत : अन्नक पहिल मुठ्ठी
लोकधुन : कटनी-मंगल
हँसुआ चमकल भोरमे, बाली नम्र झुकै,
पहिल मुठ्ठी अन्न लऽ कऽ घरक चूल्हि धुकै।
पहिने भूखल हाथक भाग, तखन बाजार जाए,
श्रमक पूरा दाम भेटय, किसान गीत सुनाए।
अन्नक हरेक दाना भीतर मेघ, माटि, घाम,
पहिल मुठ्ठी बाँटि कऽ बढ़त परिवारक मान।
कटनीक हँसी कहै—मेहनत बेकार नहि,
साझा थारी भरल रहत तँ भूख लाचार नहि।
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अध्याय १२७
अध्यायारम्भ लोकगीत : थारी भरत संग
लोकधुन : जट-जटिनक मिलन-गीत
खाली थारी बीचमे राखू, सभ एक मुठ्ठी आनू,
जट आनय धान, जटिन नून, संगमे भोजन पानू।
एक घर कम, दोसर बेसी—गाम बराबर करै,
साझा चूल्हि धुआँ उठाबै, भूखक राति हरै।
नाम खाली थारीपर नहि, अन्नक संग लिखाउ,
ककरो देहरी सूनी नहि—एहन प्रण दोहराउ।
जट-जटिन हँसि कहै—संग रहब तँ भरत,
एक मुठ्ठी नेहसँ पूरा संसार सँवरत।
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अध्याय १२८
अध्यायारम्भ लोकगीत : लोटामे मेघ उतरू
लोकधुन : चौमासा-मलार
सावन मेघ घेरि अएल, लोटा आकाश धरै,
बून्द-बून्द आशा भरि कऽ सूखल कंठ तरै।
छप्परक धार समेटि राखू, पोखरि फेर सजाउ,
जलकेँ साझा धन बुझि हरेक बून्दक मान बचाउ।
खाली लोटा गीत गाबै—मेघ, हमर घर आउ,
पियासक खेत, थाकल जनकेँ जीवन-जल दे जाउ।
मलारक तान उठिते बादर हृदय पिघलत,
लोटामे मेघ उतरि कऽ नव हरियाली फुलत।
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अध्याय १२९
अध्यायारम्भ लोकगीत : नूनक साँच किरिया
लोकधुन : मंगल-गान
एक चुटकी नून धरू, साँचक किरिया खाउ,
जे थारीक स्वाद बढ़ाबै, ओकर मान बचाउ।
नून श्रमक पसीना, नून माटिक सार,
नून बिना भोज अधूरा, साँच बिना व्यवहार।
किरिया भयक नहि हो, जिम्मेदारीक बोल,
जकर संग अन्न बाँटल, ओकरा नहि देब डोल।
नूनक साँच किरिया कहै—विश्वास नहि बेचू,
एक दाना जकाँ सत्यकेँ रोज हृदयमे सेचू।
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अध्याय १३०
अध्यायारम्भ लोकगीत : स्वाद घर घुरल
लोकधुन : सोहर-विरहक उज्जर मेल
माए केर हाथक भातक स्वाद फेर घर आयल,
धुँआ, नून, सरिसों तेल आँगनमे मुस्कायल।
परदेसक जिह्वा मोन रखै तुलसीक गन्ध,
एक कौरसँ खुलि जाए पुरखा-प्रेमक बन्ध।
स्वाद केवल भोजन नहि, स्मृतिक घर-दुआर,
जकरा बाँटू ओतय बढ़ै अपनापन अपार।
घरक स्वाद घुरि आयल तँ दूरी गलि जाए,
एक थारीक नेहसँ बिसरल नाम जुड़ि जाए।
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अध्याय १३१
अध्यायारम्भ लोकगीत : एक थारी, एक चान
लोकधुन : सामा-चकेवा
एक थारीमे चान उतरि सभकेँ देखै एक,
सामा कहै—बराबर बाँटू अन्न, स्नेह आ नेह।
चकेवा पाँखि पसारि देत संगक मधुर सन्देश,
भाइ-बहिन, पड़ोसी सभक साझा हो परिवेश।
थारी गोल चन्द्रमा जकाँ भेद कतहु नहि,
जकर भूख सएह पहिल, जाति-पाँति किछु नहि।
एक थारी, एक चान, एक आँगनक प्यार,
सामा-चकेवा गीतसँ जुड़त मिथिलाक संसार।
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अध्याय १३२
अध्यायारम्भ लोकगीत : रसोईक गणराज्य
लोकधुन : चूल्हा-चौका लोकधुन
तीन गोट चूल्हि, आगि एक, धुँआ एके रंग,
रसोईक गणराज्यमे सभक बराबर संग।
कियो काटै तरकारी, कियो पानि आनै,
कियो रोटी सेंकै, कियो गीत सुनाबै।
कामक मान बराबर, भोजन साझा अधिकार,
चूल्हा-चौका सिखबैत लोकतन्त्रक व्यवहार।
रसोईक गणराज्य कहै—सेवा नहि दासत्व,
संग पकायल अन्नमे बसै प्रेमक नागरिकत्व।
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अध्याय १३३
अध्यायारम्भ लोकगीत : मंचक पहिल ढोल
लोकधुन : पमरिया नाच-गान
ढोलक पहिल चोट पड़ल—आउ, अपन नाम कहू,
मंच नहि दूरक महल, गामक बीच रहू।
जे कथा दबायल छल, नाचक पगमे आए,
हँसी, प्रश्न, गवाही मिलि नव रंगमंच बनाए।
पमरिया घूमि कहै—दर्शक सेहो भाग,
कला जखन जनसँ जुड़ै, टूटै चुप्पीक दाग।
मंचक पहिल ढोलसँ साहस जागि उठत,
हरेक अनकहल जीवन अपन भूमिका लिखत।
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अध्याय १३४
अध्यायारम्भ लोकगीत : साँसमे साहस
लोकधुन : कबड्डी-खेल गीत
एक साँस नामक, दू साँस गवाही,
तेसर साँस संगक, चौठी जन-भलाई।
सीमा पार करैत कहू—हम डेराइत नहि,
साँचक पारी खेलनिहार कखनहुँ हराइत नहि।
साँस गनू मुदा जीवनकेँ अंक नहि बनाउ,
हरेक धड़कनक गरिमा राखि खेलक नियम सजाउ।
कबड्डी-कबड्डी स्वरमे साहसक लय भरू,
साँसमे संगक बल लऽ सत्य सीमा छू।
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अध्याय १३५
अध्यायारम्भ लोकगीत : मंचपर स्मृति उजास
लोकधुन : भगैत-मंगल
मृदंग बाजल, दीप जरल, स्मृति मंचपर आयल,
जकर कथा अधूरी छल, आदरसँ सुनायल।
मृतककेँ रोदन मात्र नहि, प्रेरणाक मान,
हुनकर श्रमसँ जीवित सभ सीखय नव अभियान।
मंचपर नाम पढ़ू धीरे, फूल नहि ढाँकय बात,
स्मृति उजास बनि देखाबै न्याय दिशाक बाट।
भगैतक वीर लय कहै—सत्य फेर उठत,
जकर नाम सम्मानित, ओकर सपना फुलत।
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अध्याय १३६
अध्यायारम्भ लोकगीत : तालीक बाद काम
लोकधुन : जागरण-झूमर
ताली बजल तँ हाथ नहि थाकू, काजमे लगू,
मंचक उत्साह बाट, विद्यालय, घर धरि भगू।
रोदन सुनि उठल भावना सेवा बनि जाए,
एक प्रतिज्ञा, एक सहायता जीवन राह बनाए।
ताली पाछाँ मौन नहि, जिम्मेदारी बोलै,
दर्शकक हाथ श्रम करै, साँचक गाँठि खोलै।
उत्सवक फूलक संग श्रमक बीज धरू,
तालीक बाद कामसँ आशाक खेत भरू।
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अध्याय १३७
अध्यायारम्भ लोकगीत : दर्शक बनल गवाह
लोकधुन : जन-जागरण गीत
जे आँखि देखलक, ओ आँखि आब नाम लिखत,
जे हाथ ताली देलक, से हाथ संग टिकत।
दर्शक दूर नहि रहत, समाजक अंग बनत,
मंचक कथा देहरी-देहरी जिम्मेदारी जनत।
कियो सुनत, कियो लिखत, कियो बाट बनाबै,
कियो पीड़ित हाथ पकड़ि न्याय-दुआर पहुँचाबै।
दर्शक बनल गवाह जखन कला सफल होए,
गीतक उजास जीवनक अन्हार भीतर सोए।
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अध्याय १३८
अध्यायारम्भ लोकगीत : जुलूस बनल गीत
लोकधुन : बटगबनीक उत्सवी चाल
मंचसँ कथा उतरि चलल धूरि भरल बाट,
ढोल, पात, कंठ संग बनल जनक बारात।
जुलूस नहि क्रोध मात्र, आशाक चलैत घर,
हरेक मोड़पर एक नव साथी, एक नव स्वर।
बाट-बटोहिया गीत गाउ, प्रश्न हाथमे फूल,
शान्त पगसँ बदलि सकै अन्यायक कठोर मूल।
जुलूस बनल गीत जखन शहर-गाम जुड़त,
संगक लयपर सत्यक नब इतिहास मुड़त।
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अध्याय १३९
अध्यायारम्भ लोकगीत : बाटे रंगमंच, लोक कलाकार
लोकधुन : सलहेस लोकगाथा
न टिकट, न पर्दा चाही, बाटे रंगमंच बनै,
हलवाहा, बच्चा, दाई सभ कलाकार बनै।
सलहेसक वीर कथा जकाँ जनक साहस गाउ,
अन्यायक जंगल बीच न्याय-पथ बनाउ।
हरेक चौकपर एक दृश्य, हरेक देहरी संवाद,
कला आ जीवन मिलि देत परिवर्तनक स्वाद।
बाटे रंगमंच जखन लोक अपन भूमिका पाबै,
मिथिलाक माटि स्वयं नब महागाथा गाबै।
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अध्याय १४०
अध्यायारम्भ लोकगीत : कागचक खेल, नामक जीत
लोकधुन : कबड्डी-दस्तावेजी धुन
कागच बीच रेखा खिंचल, नाम पारीमे जाए,
मोहर जँ पकड़य दौड़ै, साँच सीमा छू आए।
नियम साफ, प्रति सुरक्षित, जन पहरा साथ,
दस्तावेजक खेल बदलि देत पारदर्शी हाथ।
कबड्डी नहि छलक हो, प्रमाणक उत्सव हो,
हरेक नाम पूरा लिखल, हरेक सहमति स्पष्ट हो।
कागचक खेल साँचसँ खेलू, नामक जीत कराउ,
सूखल पन्नामे जीवनक हरियर लय बसाउ।
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अध्याय १४१
अध्यायारम्भ लोकगीत : बरामदा बनल जनपथ
लोकधुन : कचहरी-झूमरक उज्जर चाल
बरामदाक पाथर कहै—पग-पग बात लिखल,
धूलि झाड़ि जन बैठत तँ न्याय-दुआर खुलल।
जूता सहल पाथर आब आसन बनि जाए,
गरीबक थाकल देह ओतय सम्मान पाए।
दिनक प्रतीक्षा गीत बनत, रातिक मौन बयान,
बरामदा जनपथ बनत जखन जागत इंसान।
पाथर ठंढा हो तइयो हृदयक ताप जगाउ,
कचहरीक लम्बा बाटमे संगक दीप जलाउ।
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अध्याय १४२
अध्यायारम्भ लोकगीत : अलमारीक साँस खुलल
लोकधुन : पराती
अलमारीक बन्द साँस भोरक हवा पबैत,
पन्ना-पन्ना फड़फड़ा कऽ अपन कथा सुनबैत।
ताला खोलू सावधानी, धूलिक मान रखू,
बरखोंक दबल अक्षरकेँ उज्जर आसन दिअ।
फाइल नहि निर्जीव, लोकक जीवन ओतय,
हरेक कागचसँ घरक गन्धि उठि आबै एतय।
अलमारी साँस लैत जखन दफ्तर मानुख बनत,
खुलल पन्नाक उजाससँ जन-भरोस फेर जनत।
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अध्याय १४३
अध्यायारम्भ लोकगीत : रद्दी नहि, बीजक पन्ना
लोकधुन : बीज-रोपनी गीत
रद्दी बोरा खोलू बहिन, पन्ना बीज समान,
ककरो घरक नक्शा ओहि, ककरो बाबाक नाम।
फाटल कोना जोड़ि देब, मेटल शब्द पढ़ब,
सूखल कागचक खेतमे न्यायक बीआ गड़ब।
एक पन्ना एक ऋतु, एक मोहर इतिहास,
सहेजल कागच देत पुनः बिसरल जनकेँ श्वास।
रद्दी नहि कहियौ कखनो, स्मृतिक अन्न बचाउ,
बीजक पन्ना रोपि कऽ नव अधिकार उगाउ।
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अध्याय १४४
अध्यायारम्भ लोकगीत : नाम घर दिस बटोहिया
लोकधुन : बटगबनी
अलमारी छोड़ि नाम चलल घरक पथ पकड़ि,
बरामदा, सीढ़ी, धूरि पार कएल दृढ़ि।
देहरीपर माए दीप लऽ बाट जोहि रहल,
नामक पएरक आहटसँ सूखल आँगन हँसल।
बाट लम्बा हो तइयो बटोहिया गीत गाउ,
एक-दोसरक संग धरि हरेक नाम घर पहुँचाउ।
घर घुरल नामसँ पुरखा सभ आशीष देत,
बिसरल वंशक पात फेर हरियर रंग लेत।
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अध्याय १४५
अध्यायारम्भ लोकगीत : दरारमे दीप
लोकधुन : झिझिया-जागरण
डरक घैला पर नान्हि दरार, ओतहि दीप धरू,
छिद्र-छिद्रसँ उजास झरै, भीतर साहस भरू।
घैला टूटत नहि तुरन्त, प्रकाश पहिने जाए,
जकर मनमे भोर बसल, ओ राति पार लगाए।
बहिनी सभ झिझिया घुमाउ, गीतक घेरा बनाउ,
दरारकेँ कमजोरी नहि—उम्मीदक द्वार बताउ।
एक किरण सय किरण बनि अन्हारक मोल घटत,
डरक घैला भीतरसँ आशाक कमल फूटत।
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अध्याय १४६
अध्यायारम्भ लोकगीत : लाल मोहर सेवा हाथ
लोकधुन : नचारी-मंगल
लाल मोहर हथेलीपर सेवा बनि उतरू,
जनक हकक कागचपर साँचक फूल छिड़िआउ।
दाग नहि, विश्वासक चिह्न होउ हरेक छाप,
मोहर पड़िते खुलि जाए सहायता केर आप।
हाथ जकरा चलबै, ओकर मन साफ रहय,
पदक बल नहि, लोकक मान सदिखन साथ रहय।
लाल रंग सूरुजक, चेतना आ प्यार,
मोहर सेवा हाथ बनि खोलू जनक द्वार।
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अध्याय १४७
अध्यायारम्भ लोकगीत : दस्तकसँ खुलत देहरी
लोकधुन : देहरी-बटगबनी
धीमे दस्तक दियौ पहिने, भीतरक स्वर सुनू,
‘आउ’ कहत तखन नेहसँ दुआर पार चुनू।
हरेक घरक अपन मर्यादा, हरेक दुखक अपन चाल,
सुनबाक धैर्ये खोलि सकै मनक गहींर जाल।
देहरी-देहरी दस्तक दऽ भरोसक फूल धरू,
प्रश्न नहि आक्रमण हो, संगक आसन करू।
दस्तकसँ खुलत देहरी, आदेशसँ नहि कखनो,
सम्मानक पग धरिते घर बाजत मधुर सपनो।
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अध्याय १४८
अध्यायारम्भ लोकगीत : असल प्रति चमकत
लोकधुन : जाँच-झूमर
साँचक प्रति कातमे राखू, झूठक रंग खुलत,
मिलावटक खरोंच देखिते असल अक्षर फुलत।
एक पन्ना दोसर पन्नासँ शान्तिपूर्वक बोलै,
मिलानक उज्जर दीप अन्हारक गाँठि खोलै।
जाँच मतलब दोष मात्र नहि, साँचक मान बचाउ,
जे साफ अछि ओकर माथ पर भरोसक फूल चढ़ाउ।
असल प्रति चमकत जखन जनक आँखि सजग,
मिलावट खुद हारि जाए, सत्य रहय अडिग।
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अध्याय १४९
अध्यायारम्भ लोकगीत : नान्हि गिट्ठ खोलू
लोकधुन : माछमार गीत
जाल बहुत पैघ हो तइयो गिट्ठऽ नान्हि ठाम,
धैर्यक नखसँ खोलि सकै माछमारक काम।
एक गिट्ठ खुलत, दोसर राह अपने देखत,
नान्हि चिन्ह जोड़िते जालक नक्शा लेखत।
जलकेँ दोष नहि दियौ, जालक चाल बुझू,
माछक जीवन बचाबय लेल सही गिट्ठ चुनू।
नान्हि गिट्ठ खोलू संग, हाथ नहि थाकत,
साँचक नाव मुक्त जलमे फेर सहजहि नाचत।
❖
अध्याय १५०
अध्यायारम्भ लोकगीत : हत्था साँचक हाथमे
लोकधुन : वस्तु-जागरण गीत
रबर मेटा गेल तइयो काठक हत्था बोलै,
ककर हथेली पकड़ने छल, स्मृतिक गाँठि खोलै।
वस्तु सभ मौन गवाह, आदरसँ ओकरा पढ़ू,
हत्थाकेँ साँचक हाथमे दऽ नव उपयोग गढ़ू।
मोहर सेवा लेल बनल, छलक औजार नहि,
हाथ बदलत, अर्थ बदलत, वस्तु दोषी नहि।
खाली हत्था कहै—आब ईमानक छाप धरू,
जनक कागचपर भरोसक उज्जर फूल भरू।
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अध्याय १५१
अध्यायारम्भ लोकगीत : हाथकेँ नाम दिअ
लोकधुन : करुण भगैतक आशा-लय
मोहर अपने नहि चलै, हाथ ओकरा चलबै,
हाथक पाछाँ मन रहै, मन दिशा बतबै।
काजक जिम्मेदारीसँ कियो मुख नहि मोड़ू,
‘ऊपर’क धुँआ छोड़ि अपन नाम साफ जोड़ू।
हाथ जँ सेवा करै तँ आशीष ओकर भाग,
हाथ जँ छल करै तँ साँच करै ओकर जाग।
हाथकेँ नाम दिअ सभ, उत्तरदायित्व जागत,
नाम सहित कएल काज जनक भरोस बढ़त।
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अध्याय १५२
अध्यायारम्भ लोकगीत : ऊपरक बोलक मूल खोजू
लोकधुन : प्रश्न-नचारी
‘ऊपर सँ कहल’ सुनिते पूछू—ऊपर के?
आकाश, पद कि मनुख—उत्तर देत से।
बोलक माथ खोजिते धुँआ आकार पाबै,
जिम्मेदारीक नाम लिखल तँ झूठ पाछाँ धाबै।
प्रश्न सम्मानसँ करू, मुदा प्रश्न छोड़ू नहि,
आदेश जँ अन्याय करे, ओकरा मानू नहि।
ऊपरक बोलक मूल खोजू, जड़ि धरि दीप लिअ,
साफ उत्तर भेटलासँ जनक विश्वास दिअ।
❖
अध्याय १५३
अध्यायारम्भ लोकगीत : खूँटीपर संकेत टांगू
लोकधुन : खोज-बटगबनी
खाली खूँटी देखिते बुझू किछु छल एतय,
धागा, गन्ध, खरोंच सभ बाट देखाबै ततय।
दक्षिणक किसानक बात, नदीपारक विधवा,
छोट संकेत जोड़ि बनत साँचक पूरा कथा।
खूँटीपर चिन्ह टांगू, ताकि कियो बिसरै नहि,
अनुपस्थित वस्तुक मौन सेहो बेकार नहि।
खोजक गीत गाबि चलू, सूक्ष्म बात सम्हारू,
नान्हि संकेतक हाथ पकड़ि अन्हार पार उतारू।
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अध्याय १५४
अध्यायारम्भ लोकगीत : बाबाक आसन पर भोर
लोकधुन : निर्गुण-प्रभाती
बाबाक आसन नमी सँ भरल, ओसक मोती झलकै,
अनलिखल वचन खेतक मेड़पर चुपचाप पलकै।
संतान बैसि सुनू कने, काठो कथा सुनाबै,
पुरखा केर साँचक सीख भोरक राह देखाबै।
आसन खाली नहि कखनो, स्मृति ओतय रहै,
बाबाक श्रमक गन्धि हवा संग घरमे बहै।
भोरक सूर्य प्रणाम करै ओ पुरनका स्थान,
आसनसँ उठत नव पीढ़ीक ईमानक अभियान।
❖
अध्याय १५५
अध्यायारम्भ लोकगीत : मौन भोजमे बोलक दाना
लोकधुन : भोज-मंगल गीत
थारीमे चावल उज्जर, संगमे साँच परोसू,
दानक हरेक दानासँ जनक सम्मान जोरसू।
मौन भोज नहि, स्मृतिक गीत सभ मिलि गाउ,
जेकर नामपर अन्न, ओकर कथा सुनाउ।
एक दाना एक श्रम, एक लोटा एक पियास,
भोज तखने पुण्य जखन साझा हो विश्वास।
थारी-थारी बोलक दाना प्रेमसँ भरि दिअ,
दानकेँ दिखावा नहि, मानव सेवा कऽ लिअ।
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अध्याय १५६
अध्यायारम्भ लोकगीत : उज्जर कपड़ामे पारदर्शिता
लोकधुन : सोहर-मंगल
उज्जर कपड़ा ओढ़ि कऽ भीतर उज्जर रहू,
धागा-धागा साफ राखू, छलक गाँठि नहि सहू।
दान जँ हो तँ नाम, हिसाब, उद्देश्य खुलल,
पारदर्शी हाथसँ सेवा केर कमल फुलल।
उज्जर रंग केवल बाहरक सजावट नहि,
मनक साफगिरी बिना पुण्यक आहट नहि।
कपड़ा हवा लगिते जेना आर-पार देखाए,
सेवा सेहो खुलल रहय, जन भरोस पाबै।
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अध्याय १५७
अध्यायारम्भ लोकगीत : लोहेक पेटमे जीवन
लोकधुन : संदूक-जागरण
लोहेक पेट खोलू धीरे, भीतर इतिहास,
कागच, कपड़ा, बीज, चाबी—सभमे लोकक श्वास।
जंगक परत हटत जखन अक्षर चमकि उठत,
बरखोंक दबल गवाही नव पाँखि लऽ उड़त।
संदूककेँ कब्र नहि, स्मृतिक घर बनाउ,
जे भेटै ओकर मान राखि सूची साफ बनाउ।
लोहेक पेटमे जीवन अछि, आदरसँ ओकरा खोलू,
अन्हारमे राखल साँचकेँ सूरुजक संग जोड़ू।
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अध्याय १५८
अध्यायारम्भ लोकगीत : अपन हस्ताक्षर अपन अधिकार
लोकधुन : गवाही-समदाउनक उज्जर चाल
अपन हस्ताक्षर अपन स्वर, कियो नहि चोरै,
रेखा-रेखामे जीवनक सहमति अपना ठौरै।
पहिने पढ़ू, बुझू, तखन हथेली आगाँ बढ़ाउ,
जे बात नहि मानल, ओहि पर नाम नहि चढ़ाउ।
साक्षर हो वा अंगूठा, अधिकार बराबर,
सम्मति बिना कागच सूखल, आत्मा बिनु घर।
अपन हस्ताक्षरक मान घर-घर सिखाउ,
नामक रेखामे स्वतन्त्रताक दीप जलाउ।
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अध्याय १५९
अध्यायारम्भ लोकगीत : अंगूठाक मान
लोकधुन : श्रम-मंगल गीत
अंगूठाक गोल निशान खेतक सूरुज समान,
श्रमिकक पूरा सहमति, ओकर पूर्ण पहिचान।
जीवित हाथे छाप दए, बुझि कऽ दए स्वीकृति,
मृतकक नामक रक्षा हो, नहि बनय विकृति।
स्याही लागल अंगूठा कहै—हम उपस्थित छी,
अपन हकक पन्नापर स्वतन्त्र हस्ताक्षर छी।
अंगूठाक मान बचाउ, शिक्षा संग बढ़ाउ,
हरेक श्रमिककेँ अपन कागच खुद पढ़बाक बल दिअ।
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अध्याय १६०
अध्यायारम्भ लोकगीत : गोदाम खुलल, हिसाब उजियार
लोकधुन : मजदूर झूमरक उत्सवी चाल
गोदामक दुआर खुलल, सूरुज भीतर आयल,
कागच, बोरा, मोहर सभ साफ-साफ देखायल।
जेकर वस्तु ओकर नाम, जेकर श्रम ओकर दाम,
हिसाबक हरेक पाँतिमे रहय पूरा पहिचान।
मजदूर झूमर गाबि कहै—खुलल रहय भंडार,
चोरीक छाह टिकत नहि जखन जन पहरादार।
गोदाम पेट नहि आब, जन-लेखाक घर,
उज्जर हिसाबसँ फुलत विश्वासक नगर।
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अध्याय १६१
अध्यायारम्भ लोकगीत : बोलू, संगमे सभ छी
लोकधुन : सामूहिक जागरण गीत
‘ककरो नहि कहू’क ताला स्वर मिलिते टूटै,
एक कंठसँ दोसर कंठ धरि साहस-पानि छूटै।
बहिनी, भाय, पड़ोसी सभ गोल घेरा बनाउ,
डरक बात अकेले नहि, संग-संग सुनाउ।
जतय दस कान जागल, छल ओतय टिकत नहि,
नामसँ नाम जुड़ल रहत, कियो अकेल पड़त नहि।
बोलू धीरे, बोलू साफ, साँचक लय पकड़ू,
संगमे सभ छी—एहि मंत्रसँ अन्हार फोड़ू।
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अध्याय १६२
अध्यायारम्भ लोकगीत : स्वरक मोहर खुलल
लोकधुन : भगैत-जागरण
मृदंगक पहिल चोट पर बन्द स्वर खुलि जाए,
दस फोनक एके साँस लोकगीत बनि जाए।
मोहर जँ आवाज दबौने, कंठ ओकरा खोलत,
गामक सामूहिक गान झूठक देबाल डोलत।
एक स्वर छोट होइत अछि, संग भेल तँ धार,
साँचक गीत बहैत-बहैत पार करै दरबार।
मृदंग बाजू, नाम पुकारू, भयक राति विदा,
स्वरक मोहर खुलल जखन, न्याय भेल सदा।
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अध्याय १६३
अध्यायारम्भ लोकगीत : कार्बनमे बचल उजास
लोकधुन : कागच-बटगबनी
पन्ना हटि सकैत अछि, छाप कतऽ हटत,
कार्बनक कारी रेखा भोरक बाट कहत।
नान्हि निशान सहेजि राखू, जोड़ू एक-एक तार,
मेटायल अक्षर फेर बनत साँचक उज्जर हार।
हावा जँ पन्ना उड़बय, स्मृति ओकरा धरत,
धूलि जँ चेहरा ढाँकय, जनक आँखि पढ़त।
कार्बनमे बचल उजास कहै—हिम्मत नहि हारू,
छोट प्रमाणक पाँखि लगा सत्यक गाम उजारू।
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अध्याय १६४
अध्यायारम्भ लोकगीत : सत्रह-सीक कुंजी
लोकधुन : रहस्य-बटगबनीक तेज चाल
नान्हि अंक सत्रह-सी, हथेलीमे कुंजी,
पैघ ताला काँपि उठल, जागल बुद्धि-सूँझी।
धागा पकड़ि धीरे चलू, गाँठि अपने खुलत,
छोट संकेतक मान रखू, बड़का जाल मिलत।
राति गहींर हो तइयो नेनाक दीप जलै,
कुंजी साँचक हाथमे हो तँ बन्द घर खुलै।
सत्रह-सी नहि डरक नाम, खोजक पहिल धाम,
एक नान्हि चिन्हसँ भेटत न्याय दिशाक गाम।
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अध्याय १६५
अध्यायारम्भ लोकगीत : तेतरि घाटपर नाव
लोकधुन : नाविक गीत
तेतरि घाटपर भोर भेल, रस्सी खोलू नाव,
छाहक पाछाँ देह मिलत, धैर्यक राखू भाव।
धार बदलै, नाविक नहि अपन दिशा बिसरै,
ताराक छोट निशान देख पानि-पानि उतरै।
एक चप्पू प्रश्नक हो, दोसर साँचक बल,
दुनू मिलि पार लगाबै गहींर अपराधक जल।
घाट पुकारै—आउ सभ, नाव अकेली नहि,
संग चलत जन-विश्वास तँ दूरी भारी नहि।
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अध्याय १६६
अध्यायारम्भ लोकगीत : बखारीमे धानक गन्ध
लोकधुन : कोठी-बखारी मंगल गीत
बखारी खोलू, डर नहि—धानक गन्ध भरू,
सड़ल चुप्पी बाहर फेकू, नव बीआ घर धरू।
हरेक दाना मेहनत कहै, हरेक भूसा इतिहास,
अन्नक कोठी बनय पुनः भरोसक निवास।
माए झाड़ू फेरि कहै—अन्हार आब न रहत,
खुलल झरोखा, सूखल माटि, नया मौसम बहत।
बखारीमे धान भरत तँ घरक निन्न हँसत,
डरक सड़ल गन्ध हटत, जीवन फेर बसत।
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अध्याय १६७
अध्यायारम्भ लोकगीत : माय, असल आवाज चिन्हू
लोकधुन : माए-बौआ सोहर
माय, तोहर कान चिन्है बौआक असल तान,
नकल चाहे लाख करै, नेह बताबै प्राण।
पहिने गामक नाम पूछू, बालपनक एक बात,
जवाबमे जँ घर नहि महकै, रोकि दिअ ओ बाट।
डरक आदेश मानू नहि, संगमे लोक बजाउ,
असल बौआक स्नेहक स्वर हृदयसँ चिन्हू।
माय केर बुद्धि दीप थीक, ठगक राति हरत,
नेहक सत्यक आगाँ नकली आवाज झरत।
❖
अध्याय १६८
अध्यायारम्भ लोकगीत : गामक नाम शहर जगाउ
लोकधुन : नगर-बटगबनी
गामक नाम शहर पहुँचि घंटी जकाँ बाजै,
पेंशन, बैंक, मुकदमा सभ साँचक बाट साजै।
कच्चा दुआरसँ उठल स्वर ऊँच भवन चढ़त,
माटिक गन्ध शीशा-घरक बन्द हवा बदलत।
गाम अकेल नहि आब, शहरक कान जागल,
एक नामक पाछाँ पूरा जनसमुदाय लागल।
बाट-बाट बटगबनी गाउ—हक नहि रुकत,
गामक उज्जर नामसँ शहरक गला खुलत।
❖
अध्याय १६९
अध्यायारम्भ लोकगीत : चन्द्रमा साफ करब
लोकधुन : मधुश्रावणी चन्द्र-गीत
चन्द्र दू हो वा दस हो, असल चान एक,
काजरक दाग धोइ देत जनक जागल नेह।
आकाशक उज्जर थारी सभकेँ बराबर देखै,
नकली चमकक पाछाँ साँचक किरण लेखै।
बहिनी सभ मधुश्रावणी गीतमे प्रश्न उठाउ,
कलंकक खोल हटाकऽ असल चेहरा लाउ।
चानक प्रकाश बँटैत अछि, अधिकारो बँटू,
कारी कक्षक दुआर खोलि उज्जर दिन गढ़ू।
❖
अध्याय १७०
अध्यायारम्भ लोकगीत : असल चान उदित
लोकधुन : कोहबरक चन्द्र-मंगल
कागचक नकली चान उतरि जाए राति,
आँगनक असल चन्द्रमा देत नव सौगाति।
कोहबरक चित्रमे माछ, बाँस, कमल फुलाय,
साझा जीवन, साफ वचन, प्रेमक राह देखाय।
प्रकाश जे बाँटल जाए, सएह चानक मान,
जे केवल भ्रम चमकाबै, ओ नहि आसमान।
असल चान उदित होउ, सभ चेहरा उजियार,
साँचक शीतल जोतिसँ भरू घर-दुआर।
❖
अध्याय १७१
अध्यायारम्भ लोकगीत : भय उतारि साहस पहिरू
लोकधुन : गाछी-जागरण
गाछी तरे आसन बिछल, भयक गठरी खोलू,
एक-एक गाँठि उतारि सभ अपन साँच बोलू।
शपथक भारी शब्द नहि, नेहक हाथ पर्याप्त,
काँपैत कंठो बाजि उठत जखन संग सुरक्षित।
भय उतारि साहस पहिरू, नव वस्त्रक समान,
जनक घेरा रक्षा बनत, जगत सुनत बयान।
गाछी कहै—डेराउ नहि, पात सभ पहरुआ,
साँचक बाट चलनिहारक संग अछि पुरुआ।
❖
अध्याय १७२
अध्यायारम्भ लोकगीत : तीन रंगक बन्धन
लोकधुन : धागा-मंगल गीत
लाल धागा साहसक, पीयर स्मृतिक फूल,
हरियर आशा बाँधि देत तीनूकेँ एक मूल।
गाँठि नहि बन्धनक हो, सहमतिक पहिचान,
जे कहै ‘हम संग छी’, से सभसँ पैघ दान।
कलाई-कलाई धागा बन्हू, भयक जाल कटत,
तीन रंगक उज्जर अर्थ घर-घर दीप जड़त।
लाल-पीयर-हरियर गाउ, जीवनक त्योहार,
साहस, स्मृति, आशासँ खुलत न्याय-द्वार।
❖
अध्याय १७३
अध्यायारम्भ लोकगीत : पन्द्रह बरखक बीज
लोकधुन : बरहमासा बीज-गीत
पन्द्रह बरख माटि तरे बीज चुपचाप रहल,
ऋतु-ऋतु ओस पीबैत भीतर जीवन पलल।
आब फागुनक पवन लगल, खोलि रहल छिलका,
पुरान पंजीसँ उगि आयल साँचक हरियर तिनका।
देर भेल तँ की भेल, बीज समय चिन्है,
न्यायक अंकुर पाथर फोड़ि अपन दिशा गिन्है।
पन्द्रह बरखक धैर्य आब फसल बनि हँसत,
जकर नाम दबायल छल, ओ सभ भोर बसत।
❖
अध्याय १७४
अध्यायारम्भ लोकगीत : नामक पाथर पर दीप
लोकधुन : नचारी-मंगल
पाथर कठोर सही, दीपक जोति नरम,
नरम उजासे पढ़ि सकै बरखोंक दबल करम।
नामक पाथर धोइ कऽ फूल आ अक्षत धरू,
स्मृतिक आसनपर बैठि न्याय-पथक प्रण करू।
एक दीपसँ सय दीप, एक नामसँ गाम,
शिला आब चुप नहि रहत, गुनगुनायत नाम।
पाथरपर दीप जरत तँ राति हारि जाए,
नामक मान सम्हारनिहार इतिहास बनि जाए।
❖
अध्याय १७५
अध्यायारम्भ लोकगीत : सूचीमे जीवन भरू
लोकधुन : पुत्र-पिता श्रमगीत
सूची केवल पाँति नहि, बाबाक पूरा दिन,
हथौड़ा, पसीना, हँसी, घरक आशा चिन्ह।
दीनबंधु कलम उठाउ, नामक संग कथा लिखू,
जकरा पाछाँ परिवार, ओकर जीवन साफ देखू।
अन्तिम सूची अन्त नहि, नव हाजिरीक द्वार,
मृतकक मान बचाबयवाला बनत जीवित पहरदार।
हरेक पाँतिमे साँस भरू, आँकड़ा नहि मानू,
बाबाक श्रमक उज्जर सूरज संततिकेँ आनू।
❖
अध्याय १७६
अध्यायारम्भ लोकगीत : कारी चादर पर उजास
लोकधुन : समारोह-मंगल गीत
कारी चादर बिछल सही, ओहि पर दीप धरू,
नाम पढ़ू आदरसँ, मंचकेँ साँचसँ भरू।
माला फूलक हो तखन जखन काजो फूल समान,
सेवा-मंचपर जनक प्रश्न पाबय उचित स्थान।
चादर कारी प्रतिरोधक, लाजक ढाकन नहि,
ओहि पर रखल प्रमाण कहत—हम सभ मौन नहि।
दीपक पाँति बनाउ सभ, मंचक रूप बदलत,
अन्हारक ओही आसनपर जन-उजास फुलत।
❖
अध्याय १७७
अध्यायारम्भ लोकगीत : कागच छातीसँ, जन संग
लोकधुन : घर-घर बटगबनी
कागच छातीसँ लगाउ, मुदा अकेले नहि चलू,
देहरी-देहरी लोक जुटाउ, साँचक माला गुँथू।
बरामदासँ गाम धरि बाट लंबा होए,
संगक पएर पड़िते दूरी गीत बनि सोए।
कागचमे नाम, हृदयमे मान, हाथमे हाथ रहय,
जनक संग चलल याचिका कखनहुँ बाट नहि बहय।
घर-घर बटगबनी गाउ—न्याय चलै जनसंग,
कागचक सूखल पन्नामे भरू जीवनक रंग।
❖
अध्याय १७८
अध्यायारम्भ लोकगीत : धूलि हटत, खिड़की खुलत
लोकधुन : कोठरी-पराती
ऊपरक कोठरी धूलि भरल, सूरुज बाट जोहै,
एक झाड़ू, एक खिड़कीसँ अन्हार बाहर होए।
सीढ़ी-सीढ़ी चढ़ि चलू, साँस बराबर राखू,
पुरान बक्सा खोलि कऽ साँचक चिन्ह सहेजि राखू।
धूलि दोष नहि, विस्मृतिक चादर मात्र,
हाथ मिलिते साफ होएत हरेक पन्ना, हरेक पात्र।
खिड़की खुलत, पवन कहत—आब किछु नहि छुपत,
ऊपरक कोठरीमे भोरक नील कमल फुलत।
❖
अध्याय १७९
अध्यायारम्भ लोकगीत : मोहरक पग सत्य दिस
लोकधुन : पगचिन्ह गीत
स्याहीक पग चलि रहल, ओकर राह पढ़ू,
ककर हाथसँ कत्तय गेल, धैर्यसँ नक्शा गढ़ू।
मोहर अपने दोषी नहि, दिशा हाथ बताबै,
साँचक पहरुआ हरेक निशान जोड़ि उत्तर पाबै।
पगचिन्ह शहर पार करै, बैंक-दफ्तर जाए,
जनक जागल आँखि ओकर पाछाँ-पाछाँ धाए।
मोहरक पग सत्य दिस मोड़ू, सेवा बनय चाल,
जनहितक दस्तावेजपर पड़य उज्जर लाल।
❖
अध्याय १८०
अध्यायारम्भ लोकगीत : शान्तिक चादर, प्रतिरोधक आसन
लोकधुन : समदाउनक आशा-लय
जे चादरसँ माए नेना ढाँकै, ओहि पर सत्य धरू,
शान्ति मतलब चुप्पी नहि—साहससँ घर भरू।
खेतक मेड़, स्त्रीक मान, गरीबक हकक बात,
चादर बीच बिछा कऽ बनाउ जनसभा रात।
नरम कपड़ो ढाल बनै जखन हाथ मिलै,
मौनक भीतर गीत उगै, भयक ताला खुलै।
शान्तिक चादर ओढ़ि नहि, आसन जकाँ बिछाउ,
प्रेमक दृढ़ प्रतिरोधसँ नव समाज बनाउ।
❖
अध्याय १८१
अध्यायारम्भ लोकगीत : नम्बरक पार मनुख
लोकधुन : सामा-चकेवा धुनक उज्जर चाल
नम्बर बदलै, सिम बदलै, मनुखक नेह नहि,
स्वरकेँ स्वर चिन्है, साँचक राह कहि।
दादीक सीख, नेनाक हँसी, घरक बोली साथ,
नकली बादर कटि जाए, खुलि जाए असल बाट।
हाथ पकड़ि कहू सभ—हम एक-दोसर चिन्है छी,
काँचक जालक पारो मानुखक दीप बन्है छी।
भोरक पहिल किरण कहै—डेराउ नहि कियो,
नामक संग चलैत रहू, छल हारत निश्चयो।
❖
अध्याय १८२
अध्यायारम्भ लोकगीत : सेवा-दरबाजा भोरमे
लोकधुन : पराती
राति भरि बन्द रहल जे सेवा-दुआर भारी,
भोरक चाबी बनि अएल जनक बोलि पियारी।
कागच, खाता, मोहर सभ आब उजासमे आउ,
जकर हक दबायल छल, ओकर नाम सुनाउ।
दुआर-दुआर दीप धरू, बाट-बटोहिया जोड़ू,
सेवा शब्दकेँ साँच बनाउ, झूठक गाँठि छोड़ू।
सूरुज उगै तँ देबालो अपन छाह हटाबै,
जनक पहरासँ हरेक संस्था फेर भरोस जगाबै।
❖
अध्याय १८३
अध्यायारम्भ लोकगीत : दादीक नामक दीप
लोकधुन : दादी-पोती आँगन गीत
दादीक चेहरा झुर्रीमे मिथिलाक नक्शा,
नाम हुनकर दीप जकाँ, प्रेम हुनकर रक्षा।
पोता-पोती घेरा दऽ कंठक कथा सुनत,
कियो हुनकर नाम चोरत तँ गाम एकजुट बनत।
सुप, डलिया, पुरनका गीत—सभ गवाही देत,
दादीक हँसीक उजास अन्हार काटि देत।
आँगनमे तुलसी कहै—स्मृति अमर रहै,
जकरा घरक लोक पुकारै, ओकर नाम नहि बहै।
❖
अध्याय १८४
अध्यायारम्भ लोकगीत : असल स्वर चिन्हू
लोकधुन : विदापत पदक कोमल लय
काँचक भीतर आवाज बहुत, असल एके प्राण,
नेहक बोलि हृदय चिन्है, छलक टूटै तान।
माए जेना बौआकेँ निन्नमे सेहो बुझै,
साँचक स्वरक धड़कन झूठक नकलसँ अलगै।
पहिने प्रश्न, फेर विश्वास, संगमे लोक रहू,
डरक फोनक आगाँ अपन घरक नाम कहू।
स्वरक मर्यादा राखि चलू, कंठ रहय स्वतन्त्र,
मानुखक साँचक बोली सभसँ पैघ मंत्र।
❖
अध्याय १८५
अध्यायारम्भ लोकगीत : चरमर कमरामे बिहान
लोकधुन : रेल-बटगबनीक मध्यम चाल
चरमर पंखा घूमि रहल, खिड़की खोजै भोर,
स्टेशनक सीटी कहै—खुलत अन्हारक छोर।
एकटा साँचक पग धरिते कमरा बाट बनै,
बन्द हवा बाहर निकलि गाछक गन्धि सनै।
रेल जकाँ साहस चलू, पटरी दू पर साथ,
एक पाँति न्याय लिखै, दोसर खोलै बाट।
जे कमरा छल भयक घर, चौपाल बनि जाए,
चरमर स्वर लय बनि नव जीवन गीत सुनाए।
❖
अध्याय १८६
अध्यायारम्भ लोकगीत : मधुकरसँ मधुरस फेर
लोकधुन : मधुमक्खी लोकधुन
भन-भन करै मधुकर, फूलक बाट बताउ,
जहरक घेर छोड़ि आब मधुरस घर लाउ।
हरेक फूलक श्रम बराबर, हरेक पाँखिक अधिकार,
छत्ता तखने मीठ बनत जखन साँच व्यवहार।
लोभक धुआँ हटत जखन मनमे नेह उगै,
भटकल पाँखि घुरि कऽ फेर सुगन्धक राह लगै।
मधु नामक मान बचाउ, श्रमक रस नहि चोरू,
फूल-फूलक भाग बराबर, संगहि जीवन जोड़ू।
❖
अध्याय १८७
अध्यायारम्भ लोकगीत : रानी नाम उज्जर
लोकधुन : स्त्री-मण्डली मंगल गीत
रानी अपन नाम धुऐ नहि, धूलि झाड़ि चमकाउ,
जकरा झूठ मलिन कएलक, साँचक जलसँ नहाउ।
बहिनी सभ घेरा दऽ कहै—माथ उठाउ रानी,
तोहर नामक पात हरियर, तोहर बोली पानि।
कागचक दाग उतरि जाए, मान नहि उतरै,
स्त्रीक एक स्वर उठिते सय झूठ पाछाँ हटै।
रानी नामक उज्जर अक्षर देहरी-देहरी जाउ,
अपन कथा अपन कंठसँ निःशंक गुनगुनाउ।
❖
अध्याय १८८
अध्यायारम्भ लोकगीत : नील मोहर, हरियर पात
लोकधुन : झिझिया-जागरण
नील मोहर जँ घाव बनल, हरियर पात लगाउ,
दीपक छिद्रसँ साँचक किरण भीतर धरि पठाउ।
मोहर सेवक होउ पुनः, मालिक नहि बनि जाए,
जनक हाथक लिखल वचन कागचमे मुस्काए।
नील रंग आकाशो थीक, आशाक खुलल द्वार,
घावक रंग बदलि सकै सामूहिक उपचार।
दीप घुमाउ झिझिया जकाँ, छिद्र-छिद्र उजियार,
मोहरक भीतर मानुख जागय—एतबे नव विचार।
❖
अध्याय १८९
अध्यायारम्भ लोकगीत : बिसेसरक नामक वापसी
लोकधुन : मजदूर सोहर
लोहेक पेट खुलत आइ, नामक जन्म होएत,
बिसेसरक श्रमक अक्षर फेर पातपर सोहेत।
जूता, गमछा, हथेली, पसीना सभ कहत,
पुलक हरेक पाया भीतर ओकर साहस रहत।
माए नहि, इतिहासो आब ‘हाजिर’ कहि उठत,
कटल नामक ठाम हरियर कोंपल फेर फुटत।
श्रमक नाम घुरि आयल तँ धरती भेल धन्य,
बिसेसरक उज्जर स्मृति बनत सभक पुण्य।
❖
अध्याय १९०
अध्यायारम्भ लोकगीत : पंजी जागल भोर
लोकधुन : पंजी-पराती
नील पंजी आँखि खोलि भोरक नाम पढ़ै,
जे पाँति चुप छल बरखों, आब उजास गढ़ै।
एक-एक अक्षर धानक दाना, सहेजि कऽ धरू,
जकर हक दबायल छल, ओकर जीवन भरू।
पंजी आब डरक नहि, जनक भरोस बनत,
खुलल पन्ना गाम-नगरक साँचक पुल बनत।
कलम चलू पारदर्शी, मोहर रहय सचेत,
भोरक पंजी लिखत आब न्याय, मान आ नेह।
❖
अध्याय १९१
अध्यायारम्भ लोकगीत : खाली कुर्सी पर जन
लोकधुन : चौपाल झूमर
कुर्सी खाली रहि सकै, जनक आसन खाली नहि,
गामक गोल घेरामे निर्णय दूरवाली नहि।
घंटी बजै तँ लोक कहै—पहिने सुनू सभ बात,
पद केवल सेवा लेल, नहि डरक सौगात।
एक कुरसीक छाह घटत, सय कंठक बल बढ़त,
जनक आँखि जागल रहत तँ शासन सीधा चलत।
खाली कुर्सीपर राखू संविधानक फूल,
लोकक संग जुड़ल अधिकार रहत अटल मूल।
❖
अध्याय १९२
अध्यायारम्भ लोकगीत : कटोरी भरल स्वर
लोकधुन : पनिहारिन गीत
खाली कटोरी कान बनल, बून्द-बून्द स्वर पीबै,
जकर रोदन दबल रहल, आब गीत बनि जीबै।
पानि भरू नेहक, नून भरू विश्वास,
एक-दोसरक बात सुनू, हल्लुक होएत साँस।
कटोरी घूमि घर-घर जाए, सभ अपन बात धरै,
सुननिहारक शान्त हृदय दुखकेँ फूल करै।
खाली पात्र अभाव नहि, स्वागतक आधार,
ओहिमे भरत लोकक स्वर, आशा अपरम्पार।
❖
अध्याय १९३
अध्यायारम्भ लोकगीत : साँससँ चेहरा उगै
लोकधुन : सोहरक धीम लय
पहिल साँससँ चेहरा उगै, नामसँ जीवन फूले,
अन्हार गर्भक पाछाँ भोरक पाँखि खुले।
जकर कंठ दबायल गेल, ओकर आँखि पढ़ू,
हथेली, चाल, पसीना—सभसँ परिचय गढ़ू।
एक चेहरा एक संसार, आँकड़ा मात्र नहि,
साँसक गरिमा मानि चलू, कियो अनाम नहि।
भोरक सोहर गाबि कहू—जीवन सभसँ पैघ,
हरेक चेहरामे चमकि रहल मानवताक मेघ।
❖
अध्याय १९४
अध्यायारम्भ लोकगीत : मनक रसीद
लोकधुन : नचारीक आशावादी चाल
कागचक रसीद छुटि सकै, मनक लेखा रहै,
जे नेहसँ काज कएल, ओकर गवाही बहै।
मोनक भीतर साफ हिसाब, आँखिमे उजियार,
साँचक बाट चलनिहारकेँ की डर, की भार।
लिफाफा नहि, विश्वासक मोहर साथ लिअ,
भीतरक अदालतमे अपन उत्तर साफ दिअ।
मनक रसीद कहत सदा—न्याय उधार नहि,
सत्यक कमाइ धीरे सही, कहियो बेकार नहि।
❖
अध्याय १९५
अध्यायारम्भ लोकगीत : धन थरथर, सत्य ठाढ़
लोकधुन : हिसाब-झूमरक तेज लय
खाता काँपै, सिक्का डेराइ, सत्य ठाढ़ मुस्काए,
जनक एकजुट प्रश्नसँ लोभक मीनार ढहाए।
धन जँ सेवा करै तँ लक्ष्मी, छल करै तँ भार,
साफ कमाइ धानक बाली, लोभक धन बेकार।
हिसाब खोलू भोरमे, खिड़की सभ उजियार,
जेकर हिस्सा ओकरा भेटय, एतबे न्याय विचार।
साँचक आगाँ धन थरथर, श्रमक माथ न झुकत,
लोकक जागल आँखि रहत तँ कारी धारा रुकत।
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अध्याय १९६
अध्यायारम्भ लोकगीत : गमछा बनल ध्वज
लोकधुन : बटोहिया-मंगल गीत
फाटल गमछा हाथमे आब हारक चिन्ह नहि,
श्रम, स्मृति आ साहसक ई झण्डा कम नहि।
कोना-कोना जोड़ि कऽ बहिनी सीवन देत,
मजदूरक नामक रंगसँ नव इतिहास लेखत।
हावा लगिते गमछा कहै—बाट एखन खुलल,
जकर स्वर कटायल छल, ओकर कंठ फेर फुलल।
फाटल कपड़ा ध्वज बनल तँ गामक माथ उठत,
स्मृतिक लाल-गेरुआ रंग न्याय-दिशा देखत।
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अध्याय १९७
अध्यायारम्भ लोकगीत : किनार पर नामक दीप
लोकधुन : छठ-अर्घ्य धुन
काँपल किनार स्थिर होएत जखन दीप धरब,
डूबल नामक सम्मानसँ उदित सूरुज करब।
जलमे अर्घ्य, माटिमे प्रण, कंठमे साँचक बोल,
संग-संग ठाढ़ परिवार, टूटत भयक गोल।
पूर्वक रेखा लाल भेल, नव दिन आबि रहल,
किनारक हरेक कण कहै—न्याय जागि रहल।
नामक दीप बहाउ नहि, हथेलीपर सम्हारू,
उदयाचलक सूर्य संग नव विश्वास उभारू।
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अध्याय १९८
अध्यायारम्भ लोकगीत : जूताक पगडंडी
लोकधुन : पगचिन्ह बटगबनी
माटिमे छूटल जूता बाटक अन्त नहि,
ओहि ठामसँ पगडंडी उठत, साहस कम नहि।
एक पएर साक्षी बनत, दोसर न्याय दिस जाए,
धूलि-धूसर चिन्ह सभ मिलि सत्यक नक्शा बनाए।
जे भागल ओ दूर रहत, निशान रहत एतय,
माटि अपन आँखिसँ देखल बात कहत सदय।
जूताक पगडंडीपर जन संग-संग चलत,
अपराधक धरती पर न्यायक धान उगत।
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अध्याय १९९
अध्यायारम्भ लोकगीत : संदूक खोलल बिहान
लोकधुन : बिहान-समदाउनक उज्जर रूप
लोहेक संदूक खुलि गेल, भीतर भोर भेटल,
अक्षर सभ पाँखि पसारि अन्हार पार उड़ल।
गवाहीक हाथ काँपलो तँ ढक्कन खोलि देलक,
बरखोंक बन्द साँचकेँ सूरुज गोदमे लेलक।
राख, कागच, कुंजी, मोहर—सभटा स्वर बनल,
एक पुरान पेटक भीतर नव भविष्य जनमल।
बिहानक गीत गाउ सभ, डरक राति समाप्त,
खुलल संदूक कहै—सत्य रहै अपराजित।
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अध्याय २००
अध्यायारम्भ लोकगीत : हम छी—उदय महागान
लोकधुन : विदेह लोक-महागान
पानि बजै, पात लिखै—हम छी, हम छी,
माटि कहै, साँस कहै—हम छी, हम छी।
नाम नहि सूची मात्र, जीवनक उज्जर थार,
एक-दोसरक पहरा बनि ठाढ़ अछि संसार।
गोहि जते रूप बदलए, जागल आँखि चिन्हत,
सत्य बीआ पाथर फोड़ि हरियर अंकुर बनत।
दुइ सय दुआर खुलल, कथा चलत आगाँ,
हम छी, संग छी—एहि स्वरमे नव मिथिला जागाँ।
[ऐ कादम्बरीक अंश]
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