
गजेन्द्र ठाकुर
समग्र सिंहावलोकन-चतुर्भाणी, दामक प्रहसनम्, हास्यार्णव, आगमडम्बरम्, कादम्बरी, भल्लट-क्षेमेन्द्र-नीलकण्ठक व्यंग्य-त्रयी, पलाण्डुमण्डन, उत्तररामचरितम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मुद्राराक्षसम्, मृच्छकटिकम्, भगवदज्जुकम् आ मत्तविलास
तेरहटा अनूदित पोथीक तुलनात्मक अध्ययन [संस्कृतसँ मैथिली अनुवाद गजेन्द्र ठाकुर] — भारतीय आ पाश्चात्य सिद्धान्तक आलोकमे
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
संकलनक स्वरूप
प्रस्तुत तेरह पोथी — चतुर्भाणी, दामक प्रहसनम्, हास्यार्णव, आगमडम्बरम्, कादम्बरी, भल्लट-क्षेमेन्द्र-नीलकण्ठक व्यंग्य-त्रयी, पलाण्डुमण्डन, उत्तररामचरितम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम्, मुद्राराक्षसम्, मृच्छकटिकम्, भगवदज्जुकम् आ मत्तविलास — मिलि कऽ संस्कृत साहित्यक लगभग सहस्र वर्षक (गुप्त-पूर्वसँ सत्रहम शताब्दी धरि) आ सम्पूर्ण विधा-वितानक (भाण, प्रहसन, नाटक, प्रकरण, गद्यकाव्य, शतक-काव्य, व्यंग्य-काव्य) प्रतिनिधि चयन थिक। एहि चयनक अपन आन्तरिक तर्क अछि: एक छोर पर कालिदास-भवभूति-बाणक "महापरम्परा" अछि, दोसर छोर पर भाण-प्रहसन-व्यंग्यक ओ "समानान्तर परम्परा" जे गणिका-वीथी, जुआघर, मदिरालय, भ्रष्ट सभा — समाजक अस्वीकृत कोण सभकेँ साहित्यक केन्द्रमे अनैत अछि। एहि दुनू परम्पराकेँ एक्कहि पाँतिमे राखब स्वयं एकटा आलोचनात्मक वक्तव्य थिक — जे साहित्यक इतिहास केवल शिखर-सभक नहि, घाटी-सभक सेहो इतिहास थिक।
भारतीय सिद्धान्तक आलोकमे: रससँ औचित्य धरि
रस-सिद्धान्तक कसौटी पर ई तेरह पोथी रस-वितानक दुनू ध्रुव छूबि लैत अछि। शाकुन्तल आ कादम्बरी शृंगारक, उत्तररामचरित करुणक, मुद्राराक्षस बुद्धिवीरक, आ शेष रचना-मण्डल हास्यक — मुदा वास्तविक शिक्षा ई जे कोनो कृति एक-रस-बद्ध नहि अछि: शाकुन्तलमे करुण, उत्तररामचरितमे अद्भुत, मृच्छकटिकमे नओ रसक मेला, आ प्रहसनक हास्यक तरमे प्रायः निर्वेद। ध्वनि-सिद्धान्त एहि संकलनमे अपन दुनू सीमा देखैत अछि — भल्लटक अन्योक्ति "असंलक्ष्यक्रम ध्वनि"क शिखर थिक, तँ हास्यार्णवक वाच्य व्यंग्य "चित्रकाव्य"क; आ बीचमे आगमडम्बर-भगवदज्जुक सन रचना जे देखबैत अछि जे दर्शनो ध्वनित भऽ सकैत अछि। वक्रोक्ति-दृष्टिएँ सम्पूर्ण संकलन कुन्तकक कोटि-क्रमक उदाहरणमाला थिक — पद-वक्रतासँ (श्लेष: बाण) प्रबन्ध-वक्रता धरि (कथा-भीतर-कथा: कादम्बरी; नाटक-भीतर-नाटक: उत्तररामचरित)। औचित्य-सिद्धान्त एतऽ सभसँ रोचक रूपमे प्रकट अछि: क्षेमेन्द्र स्वयं एहि संकलनक रचनाकार छथि, आ प्रहसन-वर्ग देखबैत अछि जे सायास "अनौचित्य" (वेश-वाणी-आचारक व्यत्यय) स्वयं एकटा काव्य-युक्ति थिक — औचित्यक व्याकरणसँ अनौचित्यक कविता।
पाश्चात्य सिद्धान्तक आलोकमे: अरस्तूसँ बाख्तिन धरि
पाश्चात्य कोटि-सभसँ मिलान एहि संकलनक विश्व-साहित्यिक कद नापि दैत अछि: उत्तररामचरित शेक्सपियरी रोमांसक, मुद्राराक्षस मैकियावेली-पूर्व राजनीतिक यथार्थवादक, कादम्बरी आधुनिक कथाशास्त्र (narratology)क, भगवदज्जुक लॉक-पूर्व personal identity विमर्शक, चतुर्भाणी ब्राउनिंग-पूर्व नाटकीय एकालापक, आ पलाण्डुमण्डन इरैस्मस-पूर्व व्याज-प्रशस्तिक समानान्तर वा पूर्वरूप थिक। मुदा एहि संकलन पर सभसँ फलदायी एक्कटा पाश्चात्य दृष्टि जँ चुनल जाए तँ ओ बाख्तिन छथि — कार्निवल, बहुस्वरता आ "हँसीक संस्कृति"क सिद्धान्तकार। प्रहसन-भाण-व्यंग्यक ई समूचा वर्ग बाख्तिनक ओहि प्रमेयक भारतीय प्रमाण थिक जे प्रत्येक "गम्भीर" संस्कृतिक समानान्तर एकटा "हँसैत" संस्कृति जीबैत रहैत अछि — आ जे संस्कृति अपन हँसीकेँ साहित्य बनौलक (काञ्चीक सम्राट् धरि प्रहसन लिखलनि!) से भीतरसँ आत्मविश्वासी छल। संगहि सबाल्टर्न-नारीवादी दृष्टि एहि संकलनक तेसर सूत्र खोलैत अछि: शम्बूक (उत्तररामचरित), आर्यक-स्थावरक (मृच्छकटिक), वसन्तसेना-अज्जुका (दू-दू गणिका-नायिका), शकुन्तला-सीताक साक्ष्य-संकट — शास्त्रीय साहित्यक भीतरहि हाशियाक स्वर सभ अभिलिखित अछि, आलोचकक काज ओकरा सुनब थिक।
मैथिली अनुवाद-परियोजनाक महत्त्व
ई तेरह अनुवाद एकटा सुचिन्तित परियोजनाक अंग थिक — संस्कृत क्लासिकक पूर्ण वितान (उच्च नाट्यसँ प्रहसन धरि, गद्यकाव्यसँ व्यंग्य-शतक धरि) केँ शुद्ध मैथिलीमे उतारब। एकर साहित्यिक-ऐतिहासिक अर्थ तीन स्तर पर अछि। पहिल, भाषिक: ई अनुवाद-समूह मैथिली गद्यक क्षमता-परीक्षा थिक — बाणक समास, भवभूतिक करुणा, शकारक वाक्-विकृति, जयन्तक प्रमाण-भाषा — आ मैथिली प्रत्येक परीक्षामे अपन देशज सम्पदासँ उत्तीर्ण होइत अछि। दोसर, सांस्कृतिक: मिथिला — गंगेश-अयाचीक न्यायभूमि, विद्यापतिक काव्यभूमि — लेल ई अनुवाद कोनो "आयात" नहि, अपन पैतृक सम्पत्तिक गृह-प्रवेश थिक। तेसर, परम्परा-निर्माणक: विधा-वैविध्यक ई सायास चयन मैथिली साहित्यकेँ ओ आदर्श उपलब्ध करबैत अछि जे कोनो जीवित साहित्यकेँ चाही — गम्भीर आ विनोदी, शास्त्रीय आ लौकिक, केन्द्र आ हाशिया — सभ स्वर एक्कहि आलमारीमे। एही अर्थेँ ई तेरह पोथी तेरह अनुवाद मात्र नहि, मैथिलीमे एकटा सम्पूर्ण "समानान्तर क्लासिक-मण्डल"क स्थापना थिक।
चतुर्भाणी
चारि संस्कृत भाण — पद्मप्राभृतकम् (शूद्रक), धूर्तविटसंवाद (ईश्वरदत्त), उभयाभिसारिका (वररुचि), पादताडितकम् (श्यामिलक)
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
भाण संस्कृत रूपकक दस भेदमे सभसँ अनूठा विधा थिक — एकपात्रीय, एकांकी, जाहिमे एकटा वाक्पटु विट रंगमञ्च पर असगरे ठाढ़ भऽ "आकाशभाषित"क कौशलसँ समस्त नगरक चरित्र-वैचित्र्यकेँ जीवन्त कऽ दैत अछि। ओ अदृश्य पात्र सभसँ गप करैत अछि, हुनकर उत्तर स्वयं दोहरबैत अछि, आ एहि क्रममे गणिका-वीथी, जुआघर, विटमण्डली, पण्डित-सभा — सम्पूर्ण नागरक संसार श्रोताक आगाँ पसरि जाइत अछि। चतुर्भाणीक चारू रचना — शूद्रकक पद्मप्राभृतकम्, ईश्वरदत्तक धूर्तविटसंवाद, वररुचिक उभयाभिसारिका आ श्यामिलकक पादताडितकम् — गुप्तयुगक आसपासक नागर-संस्कृतिक अद्वितीय दस्तावेज थिक। एहिमे काव्यशास्त्र-प्रसिद्ध "शृंगार सहायक" विटक ओ रूप भेटैत अछि जे कामसूत्रक नागरक व्यावहारिक संस्करण बुझाइत अछि।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
भरतक नाट्यशास्त्र भाणकेँ भारती वृत्ति-प्रधान कहैत अछि — अर्थात् वाणीक अभिनय एतऽ सर्वोपरि। रस-दृष्टिएँ भाणमे शृंगार आ हास्यक अद्भुत रसायन अछि: विट स्वयं शृंगारक दूत थिक, मुदा ओकर दौत्य-वर्णनमे व्यंग्यक एहन धार अछि जे हास्य स्थायी भावक रूप धरि पहुँचि जाइत अछि। ध्वनि-सिद्धान्तक कसौटी पर भाणक "आकाशभाषित" स्वयं व्यञ्जनाक रंगमञ्चीय रूप थिक — जे पात्र मंच पर नहि अछि, तकर उपस्थिति ध्वनित होइत अछि, कहल नहि जाइत। कुन्तकक वक्रोक्ति-सिद्धान्तसँ देखी तँ चारू भाणक प्राण "वाक्य-वक्रता"मे अछि: पादताडितकम्मे गणिकाक लातसँ माथ पर प्रहार पओलाक बादो ओकरा "अनुग्रह" कहब वक्रोक्तिक चरम अछि। क्षेमेन्द्रक औचित्य-दृष्टिसँ ई प्रश्न रोचक अछि जे गणिका-जगतक अश्लीलप्राय विषय काव्योचित कोना बनैत अछि — उत्तर अछि: विटक परिष्कृत, अलंकृत भाषा विषयक ग्राम्यताकेँ उदात्त कऽ दैत अछि; उक्तिक औचित्य वस्तुक अनौचित्यकेँ साधि लैत अछि।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
पाश्चात्य दृष्टिसँ भाण dramatic monologue क प्राचीनतम परिपक्व रूपमे गनल जयबा योग्य अछि — ब्राउनिंगक एकालाप-कलासँ सहस्राब्दी पूर्व। बाख्तिनक "कार्निवलेस्क" अवधारणा चतुर्भाणी पर सटीक बैसैत अछि: गणिका-वीथी ओ "उत्सवी वर्ग-विपर्यय"क स्थल थिक जतऽ पण्डित, राजपुरुष, तपस्वी — सभ अपन-अपन सामाजिक मुखौटा उतारि समान भऽ जाइत छथि; भाण ओहि उल्टल संसारक विवरणी थिक। बर्गसाँक हास्य-सिद्धान्त ("यान्त्रिकताक आरोपण") विटक चरित्र-चित्रणमे प्रत्यक्ष अछि — प्रत्येक पात्र अपन एकहि टेकक यन्त्र बनल अछि: कृपण अपन कृपणताक, कामुक अपन कामुकताक। Reader-response दृष्टिसँ भाण श्रोताक कल्पना पर निर्भर सभसँ माँगबला विधा थिक — इज़रक "रिक्त स्थान" (Leerstellen) एतऽ शाब्दिक अर्थमे मंच पर पसरल अछि; अदृश्य पात्रकेँ दर्शके गढ़ैत छथि। एहि अर्थमे भाण minimalist theatre आ one-man show क पूर्वज थिक।
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
मैथिली अनुवादमे विटक नागर वाग्विलास लेल मैथिलीक ओ परिहास-परम्परा सहज उपलब्ध अछि जे विद्यापतिक नखरा-वर्णनसँ लऽ धाङनि-गीत धरि पसरल अछि। अनुवादमे "आकाशभाषित"क लय — प्रश्न दोहराएब, फेर उत्तर देब — मैथिलीक स्वाभाविक संवाद-शैलीमे ढलल अछि, आ गणिका-जगतक पारिभाषिक शब्दावली लेल देशज शब्दक चयन अनुवादकेँ पण्डिताऊ बनयबासँ बचबैत अछि। समग्रतः चतुर्भाणी प्राचीन भारतीय नगर-जीवनक व्यंग्य-चित्रशाला थिक, जकर मैथिली प्रवेश एहि भाषाक रंगमञ्च-साहित्यमे एकटा रिक्त कोठरी भरैत अछि।
दामक प्रहसनम्
लघु संस्कृत प्रहसन — कर्ण-परशुराम आख्यानक हास्य-रूपान्तर
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
दामक प्रहसनम् लघुकाय मुदा सुगठित प्रहसन थिक जे महाभारतक एकटा मर्मान्तक प्रसंग — कर्णक परशुरामसँ छद्म-वेशमे धनुर्विद्या सीखब आ शापित होयब — केँ हास्यक चौखटामे राखि दैत अछि। नाटकक केन्द्रमे वीर-कथा नहि, "नेक दामक" अछि — कर्णक पेटू अनुचर, जे राजमहलक तड़ाग-स्नान, पाँच सुगन्धक पान आ मलमली वस्त्र छोड़ि वन-वासक कष्टमे पड़ल अछि आ जकर इन्द्रिय सभ "दर्पणक प्रतिबिम्ब जकाँ" उनटा गेल अछि — कानसँ सुँघैत अछि, नथुनासँ देखैत अछि। प्रस्तावना, दामकक दीर्घ एकालाप, परशुराम-कर्णक अति-संक्षिप्त दीक्षा-दृश्य, आ दू सैनिकक मुखेँ शाप-वृत्तान्त — एतबेमे प्रहसन सम्पूर्ण भऽ जाइत अछि।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
रस-दृष्टिएँ ई रचना हास्य आ करुणक विलक्षण सन्धि पर ठाढ़ अछि। दामकक क्षुधा-विलाप "आत्मस्थ" हास्य थिक (भरतक भेदमे, जतऽ पात्र स्वयं हँसीक विषय बनैत अछि), मुदा पृष्ठभूमिमे कर्णक नियति करुणक अन्तर्धारा बहबैत अछि — भृंगक दंश सहैत कर्णक मौन वीर आ करुणक व्यभिचारी भावसँ पुष्ट अछि। ध्वनि-दृष्टिसँ सभसँ सूक्ष्म क्षण ओ अछि जखन कर्ण कहैत छथि "हम क्षत्रिय नहि छी" — ई एक पाँतिमे वस्तुध्वनि अछि: झूठ बजबाक क्षणहिमे शापक बीज रोपा गेल, से कहल नहि गेल, ध्वनित भेल। दामकक आश्रम-वर्णन — तपस्विनी कन्या घैलसँ पौधा सिंचैत "जेना माता शिशुकेँ स्तनपान करबैत होथि" — कालिदासीय उपमा-परम्पराक औचित्यपूर्ण अनुकरण थिक, आ प्रहसनक भीतर शान्त रसक ई द्वीप वैषम्य-सौन्दर्य (contrast) उत्पन्न करैत अछि। एरण्ड वृक्षक "समय भऽ गेल" कहब अचेतनमे चेतनारोपसँ हास्यक उद्दीपन थिक।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
पाश्चात्य कोटिमे दामक स्पष्टतः parasite (उपजीवी) पात्र-परम्पराक अछि — ग्रीक-रोमन कॉमेडीक ओ भोजन-लोलुप अनुचर जे प्लॉटस आ टेरेंसक नाटकमे स्वामीक छाया बनल घूमैत अछि। दामकक एकालाप बर्गसाँक हास्य-सिद्धान्तक पाठ्य-उदाहरण थिक: शरीरक यान्त्रिक विद्रोह (इन्द्रिय-विपर्यय) आ अभ्यासक जड़ता (राजभोगक टेव) — दुनू "जीवन पर यन्त्रक आरोपण" थिक जे बर्गसाँक अनुसार हास्यक मूल स्रोत अछि। संरचनावादी दृष्टिसँ प्रहसन mock-heroic (व्याज-वीर) विधाक लघु प्रयोग अछि: महाकाव्यीय कथावस्तु (गुरु-शिष्य, शाप, नियति) आ क्षुद्र नायक (पेटू सेवक)क विसंगति स्वयं व्यंग्यक संरचना बनि जाइत अछि। एहि विसंगतिकेँ incongruity theory (कान्ट-शोपेनहावर) सोझे व्याख्यायित करैत अछि। आधुनिक दृष्टिसँ दामकक देह-केन्द्रित विलाप — भूख, निन्न, कपार-दर्द — कथाक "महान" स्तरक प्रति देहक प्रतिरोध थिक; बाख्तिनक भाषामे grotesque body उदात्त आख्यानकेँ धरती पर उतारि अनैत अछि।
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
मैथिली अनुवादमे दामकक भोजन-स्मृति ("सन्ध्याकाल मीठ पेय, पाँच सुगन्धसँ युक्त पान") मैथिल भोज-संस्कृतिक शब्दावलीमे एहन सहज उतरल अछि जे पात्र देशज बुझाइत अछि; "हमरा भूख नहि लागैत अछि"क विडम्बना मैथिलीमे आओर चोखगर भेल अछि। संक्षिप्त दीक्षा-दृश्यक ऋजु संवाद ("हम क्षत्रिय नहि छी।" "तखन हम तोरा शिक्षा देब; आउ।") अनुवादमे अपन नाटकीय शुष्कता बचौने अछि — एतऽ अलंकरणक लोभ संवरण कएल गेल अछि, से औचित्यक निर्वाह थिक। समग्रतः दामक प्रहसनम् सिद्ध करैत अछि जे भारतीय परम्परा अपन सर्वाधिक करुण नायको (कर्ण) पर स्नेहपूर्ण हँसी हँसि सकैत छल — आ ई हँसी श्रद्धाक विलोम नहि, ओकर पूरक थिक।
हास्यार्णव-प्रहसनम् (हास्यक सागर)
जगदीश्वर भट्टाचार्यक द्व्यंकी प्रहसन
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
जगदीश्वर भट्टाचार्यक हास्यार्णव मध्यकालीन संस्कृत प्रहसन-परम्पराक सभसँ निर्मम व्यंग्य-रचनामे गनल जाइत अछि। "हास्यक सागर" नाम स्वयं घोषणा थिक — एतऽ हास्य कोनो सहायक रस नहि, समुद्र जकाँ सर्वग्रासी अछि। राजा अनयसिन्धु ("अन्यायक सागर")क राज्यमे भ्रष्टाचारक जे शोभायात्रा निकलैत अछि ताहिमे राजवैद्य, ज्योतिषी, पुरोहित, कोतवाल, गुरु — समाजक प्रत्येक "पूज्य" संस्थाक प्रतिनिधि गणिका-गृहमे जुटल अछि आ प्रत्येक अपन शास्त्रक दोहाइ दैत ओकरे मर्यादा भंग करैत अछि। नामकरणहिमे व्यंग्य अछि: पात्रक नाम सभ उनटा अर्थक (विश्वभण्ड, कलहांकुर आदि) — नामे चरित्रक घोषणापत्र थिक।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
नाट्यशास्त्रीय दृष्टिसँ हास्यार्णव शुद्ध प्रहसनक लक्षण-ग्रन्थ सन अछि: निन्द्य जनक अनुकृति, वेश-भाषाक विडम्बना, आ हास्यक छहू भेद (स्मित सँ अतिहसित धरि)क प्रयोगशाला। मुदा एकर हास्य भरतक "परस्थ" कोटिक अछि — कवि पात्र पर हँसबैत अछि, पात्रक संग नहि। ध्वनि-सिद्धान्तक कसौटी पर एतऽ विशेष बात ई जे व्यंग्य प्रायः वाच्ये भऽ गेल अछि — आनन्दवर्धन जकरा "चित्र-काव्य" कहितथि; मुदा गहिंर देखला पर सम्पूर्ण प्रहसन एक विराट "प्रबन्ध-ध्वनि" थिक: कोनो पात्र नहि कहैत अछि जे राज्य-व्यवस्था सड़ि गेल अछि, समूचा रचना ई ध्वनित करैत अछि। क्षेमेन्द्रक औचित्य-सिद्धान्त एतऽ उनटा कसौटी बनैत अछि — प्रत्येक पात्र अपन वर्ण-धर्मक ठीक विपरीत आचरण करैत अछि, आ इएह सुनियोजित "अनौचित्य" प्रहसनक अलंकार थिक; अनौचित्ये एतऽ औचित्य अछि। वक्रोक्ति-दृष्टिसँ श्लेष आ विपरीत-लक्षणाक भरमार — आशीर्वादक भाषामे गारि आ स्तुतिक छन्दमे निन्दा — कुन्तकक "विपर्यय-वक्रता"क उदाहरणमाला थिक।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
पाश्चात्य कोटिमे हास्यार्णव Juvenalian satire क निकटतम भारतीय बन्धु थिक — जुवेनलक रोम जकाँ एतहु क्रोध ("saeva indignatio") हास्यक ईंधन अछि। बाख्तिनक कार्निवल-सिद्धान्त एहि रचना पर सर्वाधिक फलदायी अछि: गणिका-गृह ओ कार्निवल-स्थल थिक जतऽ मुकुट उतरैत अछि, पवित्र-अपवित्रक सीमा मेटाइत अछि, आ "उच्च"क विसर्जन देहक निम्न स्तर पर होइत अछि। मुदा बाख्तिनक कार्निवलमे जे पुनर्जीवनी उल्लास अछि, हास्यार्णवमे ओकर ठाम अन्धकारपूर्ण निराशा अछि — एहि अर्थेँ ई dark comedy अथवा स्विफ्टक सदृश misanthropic satire लग पहुँचैत अछि। नॉर्थ्रॉप फ्राइक विधा-सिद्धान्तमे ई "विडम्बना आ व्यंग्यक मिथॉस" (शीतकालीन कथारूप)क शुद्ध उदाहरण थिक — एतऽ कोनो हरियर संसार नहि, कोनो पुनर्स्थापित व्यवस्था नहि; समापनो व्यंग्ये अछि। न्यू हिस्टॉरिसिज्मक दृष्टिसँ प्रहसन अपन युगक संस्था-क्षयक दस्तावेज थिक — व्यंग्यक अतिरेक स्वयं इतिहासक साक्ष्य अछि।
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
मैथिली अनुवाद एहि रचनाक सभसँ कठिन चुनौती — श्लेष आ नामगत व्यंग्य — केँ देशज समानान्तरसँ साधैत अछि; मैथिलीक अपन गारि-परिहासक लोक-परम्परा (विवाहक डहकन धरि) एहि अनुवादकेँ सांस्कृतिक घर दैत अछि। ध्यातव्य जे अनुवादमे अश्लीलताक ग्राम्य स्तर नियन्त्रित राखल गेल अछि — व्यंग्यक धार बचल अछि, फूहड़ि छँटल अछि। समग्रतः हास्यार्णव व्यंग्यक ओ आरसी थिक जाहिमे कोनो युग अपन भ्रष्ट मुँह देखि सकैत अछि; ओकर मैथिली आगमन एहि आरसीकेँ मिथिलाक दलान पर टाँगि दैत अछि।
आगमडम्बरम्
नैयायिक जयन्त भट्टक दार्शनिक नाटक
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
नवम शताब्दीक काश्मीरमे न्यायमञ्जरीक रचयिता जयन्त भट्ट जखन नाटक लिखलनि तँ एकटा अभूतपूर्व विधा जन्म लेलक — दार्शनिक शास्त्रार्थक रंगमञ्चीय रूपान्तर। आगमडम्बरक नायक कोनो राजा वा प्रेमी नहि, सङ्कर्षण नामक तेजस्वी मीमांसक स्नातक अछि जे "आगम-आडम्बर" — धर्मक नाम पर पाखण्ड — क विरुद्ध अभियान पर निकलल अछि। चारि अंकमे ओ क्रमशः बौद्ध, जैन, नीलाम्बर, शैव साधक, चार्वाक — सभसँ भेंट करैत अछि, आ अन्ततः न्यायदर्शनक प्रौढ़ प्रतिनिधि धैर्यराशिक मुखेँ "सर्वागमप्रामाण्य"क समन्वयकारी सिद्धान्त पर नाटक विश्राम पबैत अछि: सभ आगम प्रमाण अछि, जँ ओ लोक-विरुद्ध आ हिंसा-प्रवर्तक नहि हो। राजा शंकरवर्मनक समकालीन राजनीति — नीलाम्बर सम्प्रदायक निषेध — नाटकमे प्रत्यक्ष उपस्थित अछि।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
रस-निष्पत्तिक दृष्टिसँ आगमडम्बर विलक्षण प्रयोग थिक: एकर अंगी रस निर्धारित करब कठिन — हास्य (पाखण्डी सभक विडम्बना), शान्त (अन्तिम समन्वय), आ एकटा एहन बौद्धिक आनन्द जकरा अभिनवगुप्तक शब्दावलीमे "चर्वणा"क विशुद्ध रूप कहल जा सकैत अछि — तर्कक रसास्वाद। एतऽ प्रश्न उठैत अछि जे की शास्त्रार्थ रसक विषय भऽ सकैत अछि; जयन्तक उत्तर व्यावहारिक अछि — हुनक शास्त्रार्थ-दृश्य सभमे जय-पराजयक नाटकीय तनाव ओहिना अछि जेना युद्ध-दृश्यमे। ध्वनि-दृष्टिसँ नाटकक शीर्षके श्लेषगर्भ अछि: "डम्बर" माने आडम्बरो आ कोलाहलो — धर्मक हल्ला आ धर्मक पाखण्ड, दुनू ध्वनित। औचित्य-सिद्धान्तक कसौटी पर जयन्तक सन्तुलन प्रशंसनीय अछि: व्यंग्य पाखण्डी पर अछि, दर्शन पर नहि — बौद्ध धर्मोत्तर विद्वान् रूपमे आदरणीय देखाओल गेल छथि, हुनक पतित अनुयायी उपहास्य। इएह विवेक एहि नाटककेँ साम्प्रदायिक फूहड़िसँ बचबैत अछि।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
पाश्चात्य परम्परामे एकर निकटतम बन्धु अरिस्तोफेनीसक "मेघ" (Clouds) थिक — दार्शनिक सभक रंगमञ्चीय विडम्बना; मुदा जयन्त अरिस्तोफेनीससँ आगू जाइत छथि: हुनका लऽग विडम्बनाक बाद एकटा सकारात्मक दार्शनिक निष्कर्ष अछि। एहि अर्थेँ आगमडम्बर novel of ideas क पूर्वज-रूप "drama of ideas" थिक — शॉ आ ब्रेख्तसँ सहस्र वर्ष पूर्व मंच पर विचारक द्वन्द्व। बाख्तिनक "बहुस्वरता" (polyphony) एतऽ आश्चर्यजनक रूपेँ चरितार्थ अछि: प्रत्येक दर्शन अपन प्रामाणिक स्वरमे बजैत अछि — चार्वाक धरि अपन पक्ष पूरा बलसँ रखैत अछि — आ लेखकीय स्वर अन्त धरि प्रतीक्षा करैत अछि। तुलनात्मक धर्म-दर्शनक आधुनिक दृष्टिसँ नाटकक समापन religious pluralism क मध्यकालीन घोषणापत्र सन पढ़ल जा सकैत अछि — यद्यपि न्यू हिस्टॉरिसिस्ट सतर्कता कहत जे ई बहुलतावाद राज्य-शक्तिक छत्रछायामे संचालित अछि (नीलाम्बरक निषेध ओकर सीमा देखबैत अछि)। एहि तनाव — समन्वय आ बहिष्करणक सहअस्तित्व — मे नाटकक आधुनिक प्रासंगिकता अछि।
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
मैथिली अनुवादक समक्ष द्वैध चुनौती छल — दार्शनिक पारिभाषिकता आ नाटकीय प्रवाह। अनुवाद प्रमाण, प्रामाण्य, अनुमान सन पारिभाषिक शब्द यथावत् राखि, व्याख्यात्मक सहज मैथिली वाक्य-गठनसँ ओकरा वहनीय बनबैत अछि — मिथिलाक अपन नव्यन्याय-परम्परा (गंगेश उपाध्यायक भूमि!)क कारणेँ ई शब्दावली मैथिली पाठक लेल आगन्तुक नहि, घुरल पाहुन थिक। समग्रतः आगमडम्बर सिद्ध करैत अछि जे भारतीय रंगमञ्च बौद्धिक बहसकेँ मनोरञ्जन बना सकैत छल — आ इएह सिद्धि एकरा विश्व-नाट्यमे अद्वितीय बनबैत अछि।
कादम्बरी
बाणभट्टक गद्य-महाकाव्य
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
"बाणोच्छिष्टं जगत्सर्वम्" — ई प्रसिद्धोक्ति कादम्बरीक कीर्तिक साक्ष्य थिक। सप्तम शताब्दीमे हर्षवर्धनक सभाकवि बाणभट्ट गद्यकेँ ओहि शिखर पर पहुँचौलनि जतऽ पद्य ईर्ष्या करए। कादम्बरीक कथा-यन्त्र स्वयं चमत्कार अछि: शूकक मुखेँ कहल कथाक भीतर कथा, जन्म-जन्मान्तरक तीन स्तर (शूद्रक/चन्द्रापीड/पुण्डरीक...), आ स्मृति-विस्मृतिक ओ खेल जाहिमे पाठको पात्रक संग अपन पूर्वजन्म बिसरल रहैत अछि आ अन्तमे सभटा गिरह एक्केबेर खुजैत अछि। महाश्वेता आ कादम्बरी — प्रतीक्षाक दू मूर्ति — भारतीय साहित्यक अमर नायिका छथि। बाणक मृत्युक बाद हुनक पुत्र भूषणभट्ट उत्तरभाग पूर्ण कएलनि — पिताक वाक्य-वृक्षक छाहरिमे।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
रस-दृष्टिएँ कादम्बरी विप्रलम्भ शृंगारक महासमुद्र थिक — संयोगक क्षण एतऽ दुर्लभ अछि, प्रतीक्षा अनन्त; महाश्वेताक तपस्विनी-रूप विप्रलम्भकेँ शान्तक सीमा धरि लऽ जाइत अछि, आ इएह "शृंगार-शान्त-सन्धि" कादम्बरीक विशिष्ट रस-रसायन थिक। ध्वनि-सम्प्रदाय लेल बाण चुनौती छथि: आनन्दवर्धन जकरा "गुणीभूतव्यंग्य" कहितथि, से बाणक अलंकृत शैलीमे सर्वत्र अछि — व्यंग्यार्थ वाच्यक सेवक बनल; तथापि सम्पूर्ण कृतिक स्तर पर कर्म आ जन्मान्तरक जे दार्शनिक ध्वनि अछि से प्रबन्ध-ध्वनिक उदाहरण थिक। रीति-सम्प्रदायक कसौटी पर कादम्बरी पाञ्चाली-गौड़ी रीतिक समास-भूयिष्ठ ओज आ वैदर्भीक माधुर्यक सङ्गम अछि; दण्डी जकर "पदलालित्य" कहने छथि, से एतऽ चरम पर अछि। श्लेष बाणक स्वभाव थिक — शुकनासोपदेशमे लक्ष्मीक निन्दा श्लेषक एहन जाल अछि जे अनुवाद-मात्रक परीक्षा थिक। वक्रोक्ति-दृष्टिसँ बाण "प्रबन्ध-वक्रता"क आचार्य छथि — कथा कहबाक टेढ़ बाटे कथाक अर्थ थिक।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
पाश्चात्य विधा-सिद्धान्तमे कादम्बरीकेँ प्रायः "विश्वक प्रथम उपन्यास"क दावेदारीमे राखल जाइत अछि; ई दावा जतबा विवादित हो, एकर कथा-संरचना निर्विवाद रूपेँ आधुनिक अछि — frame narrative (शहरजादी-शैली), embedded narrator, आ analepsis क एहन प्रयोग जे जेरार जेनेटक कथाशास्त्र (narratology) लेल पाठ्य-सामग्री थिक: कथावाचक शुक स्वयं कथाक पात्र थिक, आ "के ककरा कथा कहि रहल अछि" — ई प्रश्न अन्त धरि घूमैत रहैत अछि। स्मृति-विस्मृतिक केन्द्रीयता कादम्बरीकेँ प्रूस्तक निकट अनैत अछि — चन्द्रापीडक हृदयमे अकारण उठल पूर्वजन्मक टीस प्रूस्तक mémoire involontaire क संस्कृत पूर्वाभास सन अछि। मनोविश्लेषणक दृष्टिसँ जन्मान्तर-यन्त्र दमित कामनाक (पुण्डरीकक तपोभंग) पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुनरागमनक रूपक थिक — फ्रायडक "दमितक प्रत्यावर्तन"। नारीवादी पाठ महाश्वेता-कादम्बरीक प्रतीक्षाकेँ दू तरहेँ पढ़त — निष्क्रियताक आदर्शीकरण, अथवा (गहिंर पाठमे) स्त्री-स्मृतिक ओ दृढ़ता जे पुरुष-पात्रक विस्मृति-मृत्युक बीच कथाक निरन्तरता बचौने रहैत अछि: एतऽ स्त्रिये कथाक धुरी छथि।
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
बाणक समास-सघन गद्यक मैथिली अनुवाद साहसक काज थिक। प्रस्तुत अनुवाद दीर्घ समासकेँ मैथिलीक लयबद्ध वाक्य-शृंखलामे तोड़ि कऽ राखैत अछि — अर्थ-घनत्व बचल अछि, श्वास-अवकाश भेटल अछि; श्लेषक ठाम जतऽ द्विअर्थ असम्भव छल ओतऽ एक अर्थ चुनि टीका-भावेँ दोसर सुरक्षित कएल गेल अछि। महाश्वेता-वृत्तान्तक करुण गद्यमे मैथिलीक "नोर", "हिय", "बाट जोहब" सन शब्द बाणक भावकेँ माटिक गन्ध दैत अछि। समग्रतः कादम्बरीक ई मैथिली रूप गद्यकाव्यक ओहि परम्पराकेँ मिथिलामे पुनःप्रतिष्ठित करैत अछि जकर बीज विद्यापतिक भूपरिक्रमा सनक रचनामे छल।
भल्लट-शतक, कलाविलास आ कलियुग-विडम्बना
तीन व्यंग्य-कृति — भल्लट, क्षेमेन्द्र, नीलकण्ठ
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
ई संकलन संस्कृत व्यंग्य-परम्पराक तीन युग आ तीन शैलीक त्रिवेणी थिक। नवम शताब्दीक काश्मीरी कवि भल्लटक शतक अन्योक्तिक शिखर अछि — राजा शंकरवर्मनक उपेक्षासँ आहत कविक ओ पद्यावली जाहिमे समुद्र, कल्पवृक्ष, सुग्गा, विष — सभ किछु मनुष्यक बात कहैत अछि, मनुष्यक नाम लेने बिना। एगारहम शताब्दीक क्षेमेन्द्र कलाविलास ("छल-कौशलक विलास")मे दस सर्ग धरि दम्भ, लोभ, काम, वेश्या-वृत्ति, कायस्थ-लेखनिक, मद, गायक, सोनार, विविध ठग आ अन्तमे सद्गुणक "कला" गनबैत छथि — मूलदेव-चरितक बहन्ने समाजक ठगिनी विद्या सभक विश्वकोश। सत्रहम शताब्दीक दाक्षिणात्य नीलकण्ठ दीक्षित कलियुग-विडम्बनामे सए श्लोकक भीतर पण्डित, ज्योतिषी, वैद्य, कवि, महाजन, कृपण, धर्मध्वजी — तेरह कोटिक विडम्बना कसैत छथि, आ अन्तमे कलियुगहिकेँ प्रणाम कऽ दैत छथि — "जतऽ अपन कल्पना कानून अछि"।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
तीनू कृति अलंकारशास्त्रक तीन भिन्न औजारक सिद्धि थिक। भल्लटक प्राण अन्योक्ति (अप्रस्तुतप्रशंसा) अछि — अप्रस्तुतक वर्णनसँ प्रस्तुतक बोध; ई ध्वनि-सिद्धान्तक आदर्श अलंकार थिक, कारण व्यंग्यार्थ सम्पूर्णतः अनुक्त रहैत अछि। आनन्दवर्धन (भल्लटक समकालीन काश्मीरी!) जाहि "अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य"क बात करैत छथि, भल्लट ओकर जीवित उदाहरण छथि — "हाय कालकूट! ओहि समुद्रसँ अहाँक जन्म कोना भेल?" मे समुद्र समुद्र नहि रहि जाइत अछि। क्षेमेन्द्र स्वयं औचित्यविचारचर्चाक आचार्य छथि, आ हुनक व्यंग्य-विधि अपनहि सिद्धान्तक प्रयोग थिक: प्रत्येक वर्गक "अनौचित्य"क सूचीकरण — सोनारक चौंसठ कला, तराजूक सोलह दोष — शास्त्रीय गणना-शैली (कोश-पद्धति)क व्याज-प्रयोगसँ हास्य उपजबैत अछि; शास्त्रक रूपमे ठगीक शास्त्र। नीलकण्ठक शैलीमे वक्रोक्तिक चरम संक्षेप अछि — प्रत्येक श्लोक सूक्ति-सन, जाहिमे विपरीत-लक्षणा ("मन्त्र-तान्त्रिक निश्चय धन्य अछि") डंकक काज करैत अछि। रस-दृष्टिएँ तीनूमे हास्यक पाछाँ जे स्थायी अछि से वस्तुतः शान्त-मिश्रित निर्वेद थिक — व्यंग्य एतऽ वैराग्यक पूर्वपीठिका अछि, विशेषतः नीलकण्ठमे जे अन्ततः शिव-शरणमे विश्राम पबैत छथि।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
पाश्चात्य कोटिमे भल्लटक अन्योक्ति ईसपक फेबल आ रूपक-काव्य (allegory)सँ भिन्न अछि — फेबलमे नीति वाच्य अछि, अन्योक्तिमे व्यंग्य; ई emblematic poetry क निकट, मुदा ओहूसँ सूक्ष्म। भल्लटक राजा-विरोधी स्वर लऽ कऽ ई निर्वासित-साहित्य (literature of exile/disgrace)क कोटिमे ओविडक Tristia क दूरस्थ बन्धु थिक। क्षेमेन्द्रक कलाविलास मेनिप्पियन व्यंग्य (Menippean satire)क लक्षण-पूर्ति करैत अछि — विधा-मिश्रण, विश्वकोशीय सूची-प्रेम, ठग-नायक (मूलदेव picaresque परम्पराक पूर्वज अछि — स्पेनी पिकारोसँ पाँच सए वर्ष पहिने)। नीलकण्ठक शैली रोमन epigram (मार्शल) आ लॉ रोशफूकोक maxim-कलाक समकक्ष अछि — संक्षेपे शस्त्र थिक। तीनू पर बाख्तिनक ई सूत्र लागू अछि जे व्यंग्य "समापनहीन वर्तमान"क विधा थिक — महाकाव्यक बन्द अतीतक विपरीत; इएह कारण अछि जे ई तीनू कृति आइयो समकालीन बुझाइत अछि: सोनार, ज्योतिषी आ "माननीय"क चरित्र-चित्रण एकैसम शताब्दीक अखबार सन पढ़ाइत अछि।
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
अनुवादमे तीन भिन्न शैली लेल तीन भिन्न रजिस्टर साधल गेल अछि — भल्लट लेल पद्यानुकारी भावगर्भित मुक्त लय, क्षेमेन्द्र लेल सूची-सुलभ कथात्मक गद्य, नीलकण्ठ लेल सूक्ति-चोख वाक्य। "छल-कौशलक विलास" सन शीर्षक-अनुवाद स्वयं व्याख्या थिक। मैथिली पाठक लेल विशेष लाभ ई जे मिथिलाक अपन व्यंग्य-परम्परा (हरिमोहन झा धरि) एहि त्रिवेणीमे अपन पुरखा चिन्हत। समग्रतः ई संकलन देखबैत अछि जे संस्कृत केवल देवभाषा नहि, धारदार लोकालोचनक भाषा सेहो छल।
पलाण्डुमण्डन प्रहसनम्
निषिद्ध प्याजक स्तुति-सभा — पण्डित-समाजक विडम्बना
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
पलाण्डुमण्डन ("प्याजक मण्डन/स्तुति") उत्तर-मध्यकालीन संस्कृत प्रहसन-परम्पराक ओ चुटगर रचना थिक जाहिमे व्यंग्यक निशाना कोनो राजा वा गणिका नहि — स्वयं पण्डित-समाज अछि। कथा-बीज सरल आ विस्फोटक अछि: स्मृति-शास्त्रमे ब्राह्मण लेल निषिद्ध पलाण्डु (प्याज)क सेवन-समर्थनमे पण्डित सभक सभा जुटैत अछि, आ ओ सभ ओहि शास्त्रार्थ-कौशल, ओहि प्रमाण-परम्परा, ओहि व्याख्या-चातुरीसँ — जाहिसँ वेदान्तक गुत्थी सोझरौल जाइत छल — प्याज-भक्षणक शास्त्रीय औचित्य सिद्ध करैत छथि। लिङ्गोजी भट्ट सन पात्र-नाम दाक्षिणात्य पण्डित-परिवेशक सूचक थिक। प्रहसनक हास्य एहि विरोधाभास पर टिकल अछि जे विद्वत्ताक समस्त यन्त्र जीभक सेवामे लागल अछि।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
नाट्यशास्त्रीय वर्गीकरणमे ई शुद्ध प्रहसन थिक — निन्द्यक अनुकृति; मुदा एकर "निन्द्य" कोनो नीच पात्र नहि, स्वयं शास्त्रार्थ-पद्धतिक दुरुपयोग अछि — ई सूक्ष्मता एकरा साधारण प्रहसनसँ ऊपर उठबैत अछि। वक्रोक्ति-दृष्टिसँ सम्पूर्ण रचना एक विराट "व्याज-स्तुति" थिक — स्तुतिक व्याजसँ निन्दा: प्याजक जतबा गुणगान, पण्डितक ततबा पोल। ध्वनि-सिद्धान्तसँ देखी तँ हास्यक व्यंग्यार्थ श्रोताक शास्त्र-परिचय पर निर्भर अछि — जे मीमांसाक प्रमाण-प्रक्रिया जनैत अछि, तकरे लेल "अर्थवाद", "गौण-मुख्य" सन पदक व्याज-प्रयोग खुलैत अछि; ई "सहृदय-सापेक्ष ध्वनि"क रोचक स्थिति थिक। औचित्य-दृष्टिएँ कविक साहस देखू — शास्त्रक भाषामे शास्त्रक विडम्बना, मुदा शास्त्रक प्रति अनादर बिना; व्यंग्य पद्धतिक दुरुपयोग पर अछि, पद्धति पर नहि। हास्यक भेदमे ई "उपहसित"सँ "अपहसित" धरिक यात्रा करबैत अछि — आ अन्ततः पाठक अपनहि पर हँसैत अछि, कारण तर्कसँ अपन रुचिकेँ शास्त्र बनयबाक कला केवल पण्डिते टा क नहि, सार्वजनीन दुर्बलता थिक।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
पाश्चात्य विधामे एकर सोझ समानान्तर mock-encomium (व्याज-प्रशस्ति) थिक — इरैस्मसक "मूर्खताक प्रशंसा" (Moriae Encomium) आ ओकर पूर्ववर्ती ग्रीक adoxography (तुच्छ विषयक गम्भीर स्तुति — माछी, टकलापन, ज्वरक प्रशस्ति!)। पलाण्डुमण्डन ठीक एही कोटिक अछि — तुच्छ विषय (प्याज) पर महाशास्त्रीय गम्भीरता; हास्य ओही असंगतिसँ (incongruity) फूटैत अछि। बाख्तिनक दृष्टिसँ ई रचना "भोजनक कार्निवल" थिक — निषिद्ध स्वादक विद्रोह, जतऽ देहक भूख शास्त्रक अनुशासन पर विजयी होइत अछि; ई विजय बाख्तिनक ओहि "material bodily principle"क उत्सव थिक जे समस्त कार्निवल-साहित्यक प्राण अछि। सोफिस्ट-आलोचनाक प्राचीन ग्रीक बहस (प्लेटोक "कमजोर पक्षकेँ प्रबल बनयबाक कला"क आक्षेप)सँ तुलना करी तँ पलाण्डुमण्डन संस्कृत जगतक सोफिस्ट्री-विमर्श थिक — तर्कक शक्ति आ तर्कक नैतिकताक बीचक खाधि पर हँसैत। आधुनिक भाषामे ई motivated reasoning (अभीष्ट-प्रेरित तर्क) पर लिखल प्राचीनतम व्यंग्यमे एक थिक।
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
मैथिली अनुवादमे एहि प्रहसनकेँ विशेष घरेलू स्वाद भेटल अछि — मिथिलाक पण्डित-सभा, शास्त्रार्थ-परम्परा आ भोजन-प्रेम तीनू एतऽ आत्मीय प्रसंग थिक; "पलाण्डु"क ठाम मैथिलक रसोई-विमर्श सहजहि जुड़ि जाइत अछि। शास्त्रार्थक पारिभाषिक व्यंग्य अनुवादमे बचल अछि, कारण मैथिली स्वयं शास्त्रार्थक भाषा रहल अछि। समग्रतः पलाण्डुमण्डन लघु आकारक पैघ रचना थिक — ई देखबैत अछि जे कोनो परम्परा तखनहि जीवित रहैत अछि जखन ओ अपनहि पर हँसबाक साहस रखैत अछि।
उत्तररामचरितम्
भवभूतिक करुण-नाट्य
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
अष्टम शताब्दीक भवभूति उत्तररामचरितमे रामकथाक ओहि अध्यायकेँ उठौलनि जकरासँ कवि सभ कतराइत रहलाह — सीता-परित्याग। सात अंकक ई नाटक परित्यागक बाद बारह वर्षक विरहकथा थिक: चित्रदर्शनसँ आरम्भ (प्रथम अंकमे राम-सीता अपन अतीतक चित्र देखैत छथि — स्मृतिक रंगमञ्च), पञ्चवटीमे छाया-सीताक अदृश्य स्पर्श, लव-कुशसँ अनजान पिताक भेंट, आ अन्तमे गर्भ-नाटक (नाटकक भीतर नाटक) द्वारा पुनर्मिलन — वाल्मीकि स्वयं मंच पर रामायणक "सुखान्त पाठान्तर" खेलबा कऽ लोकापवादक उत्तर लोकहिसँ दिअबैत छथि। "एको रसः करुण एव" — भवभूतिक अपन घोषणा एहि नाटकक बीज-वाक्य थिक।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
रस-सिद्धान्तक इतिहासमे उत्तररामचरित एकटा सैद्धान्तिक हस्तक्षेप थिक। भवभूति करुणकेँ अंगी रस बना कऽ भरतक ओहि मान्यताकेँ चुनौती देलनि जे नाटक-सन दृश्यकाव्यमे शृंगार वा वीरे प्रधान हो; आ आगाँ बढ़ि घोषणा कएलनि जे करुणे एकमात्र रस थिक, शेष रस ओकरे आवर्त-विवर्त। अभिनवगुप्तक साधारणीकरण-सिद्धान्त एहि नाटकक तेसर अंकसँ नीक कतहु सिद्ध नहि होइत — छाया-सीता प्रसंगमे सीता मंच पर छथि मुदा राम नहि देखैत छथिन; दर्शक दुनूक वेदना एक्केबेर देखैत अछि — ई "द्वैध-दृष्टि" साधारणीकरणक रंगमञ्चीय यन्त्र थिक, दर्शक व्यक्तिगत शोकसँ ऊपर उठि शोक-सामान्यक आस्वादक करैत अछि। ध्वनि-दृष्टिसँ "अपूर्वकर्मचण्डालमयि मुग्धे विमुच्यताम्" सन पाँति — जतऽ राम अपनहिकेँ चण्डाल कहैत छथि — आत्मधिक्कारक व्यंग्यार्थसँ भरल अछि। औचित्य-प्रश्न एतऽ केन्द्रीय अछि: की मर्यादापुरुषोत्तमक अश्रुपात उचित? भवभूतिक उत्तर — "वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि" — लोकोत्तर चरित्रक हृदयकेँ लोक-हृदय बना कऽ औचित्यक नव व्याख्या करैत अछि।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
अरस्तूक कोटिमे उत्तररामचरित निकटतम भारतीय "ट्रेजेडी" कहल गेल अछि — hamartia (राज्यधर्मक नाम पर निरपराध पत्नीक त्याग), पीड़ाक दीर्घ अनुभव, आ अनुकम्पा-भय (eleos-phobos)क विरेचन; मुदा समापनक पुनर्मिलन एकरा शुद्ध ट्रेजेडी नहि रहऽ दैत अछि — पाश्चात्य शब्दावलीमे ई tragicomedy अथवा शेक्सपियरक अन्तिम "रोमांस" (विशेषतः The Winter's Tale — ओहूमे निर्दोष पत्नीक परित्याग, वर्षोक पश्चात्ताप, आ कला-माध्यमे — मूर्ति/नाटक — पुनर्जीवन!)क अद्भुत पूर्वरूप थिक। गर्भ-नाटक metatheatre क प्राचीनतम सचेत प्रयोगमे अछि — हैमलेटक "मूसक जाल"सँ आठ सए वर्ष पूर्व, आ ओहूसँ आगू: एतऽ नाटक-भीतर-नाटक सत्यक परीक्षा नहि, सत्यक पुनर्लेखन करैत अछि — कला यथार्थकेँ सुधारैत अछि। सबाल्टर्न-दृष्टिसँ शम्बूक-प्रसंग अनिवार्य पाठ थिक: शूद्र तपस्वीक वध रामक हाथेँ — भवभूति एहि प्रसंगकेँ काटि नहि, मंच पर आनि, शम्बूककेँ दिव्य रूपमे रामक स्तुति करबैत छथि; आधुनिक आलोचना एहिमे वर्ण-व्यवस्थाक हिंसाक स्वीकार आ ओकर असहज परिशोधन — दुनू पढ़त। नारीवादी पाठ लेल छाया-सीता "उपस्थित-अनुपस्थित स्त्री"क (present absence) चिरन्तन रूपक थिक — जे बजैत छथि मुदा सुनल नहि जाइत छथि।
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
मैथिली अनुवाद भवभूतिक दुरूह पदावली लेल प्रसिद्ध चुनौतीकेँ करुणक देशज शब्द-सम्पदासँ साधैत अछि — मैथिलीक "नोर", "हिय हहरब", "छाती फाटब" भवभूतिक करुणकेँ सोहर-समदाउनिक भूमिमे रोपि दैत अछि; प्राकृतभाषी पात्रक पहिचान अनुवादमे सुरक्षित अछि। समग्रतः उत्तररामचरित विश्व-साहित्यक ओ नाटक थिक जे देखबैत अछि जे महाकाव्यक बाद की होइत अछि — विजयक बाद वेदना; आ मैथिली, जे विरह-गीतक भाषा थिक, एकर स्वाभाविक दोसर घर सिद्ध होइत अछि।
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
कालिदासक नाट्य-शिरोमणि
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
"काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला" — संस्कृत आलोचनाक ई सर्वसम्मति दुर्लभ घटना थिक। कालिदास महाभारतक शकुन्तलोपाख्यानक कठोर कथाकेँ (जतऽ दुष्यन्त जानि-बूझि मुकरि जाइत छथि) दुर्वासाक शाप आ अँगूठीक "अभिज्ञान"-यन्त्रसँ रूपान्तरित कऽ सात अंकक ओ नाटक रचलनि जाहिमे प्रेम तीन अवस्थासँ गुजरैत अछि — तपोवनक सहज अंकुरण, नगर-राजसभामे विस्मृति-प्रत्याख्यानक दारुण मध्य, आ हेमकूटक तपःपूत पुनर्मिलन। प्रकृति एतऽ पृष्ठभूमि नहि, पात्र थिक — शकुन्तलाक विदाईमे वृक्ष वस्त्र दैत अछि, मृग आँचर पकड़ैत अछि।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
रस-दृष्टिएँ शाकुन्तल संयोग-विप्रलम्भ-पुनर्संयोगक पूर्ण शृंगार-चक्र थिक, आ एकर विशेषता ई जे विप्रलम्भक कारण बाह्य खलनायक नहि — शाप-रूपेँ नियति आ स्वयं नायकक विस्मृति अछि; एहिसँ करुणक जे छाया शृंगार पर पड़ैत अछि से रस-मिश्रणक आदर्श उदाहरण थिक। ध्वनि-सम्प्रदाय लेल शाकुन्तल घर-आँगन थिक: आनन्दवर्धन-अभिनवगुप्त बेर-बेर एहीसँ उदाहरण अनैत छथि। चतुर्थ अंकक कण्व-विदाई — "पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलम्" — वात्सल्यक एहन ध्वनि-सघन क्षण थिक जे परवर्ती आलोचना "काव्येषु नाटकं... तत्रापि च चतुर्थोऽङ्कः" कहि एकरे मुकुट-मणि मानलक। वक्रोक्ति-दृष्टिसँ "अभिज्ञान" (चिन्ह/अँगूठी) स्वयं महावक्रता थिक — प्रेमक प्रमाण वस्तुमे राखब आ वस्तुक हेरायब — कुन्तक जकरा "प्रकरण-वक्रता" कहितथि। औचित्यक कसौटी पर कालिदासक संयम अद्वितीय अछि: प्रत्याख्यान-दृश्यमे दुष्यन्त क्रूर नहि, शापित छथि — खलनायकहीन दुःखान्तक ई कला औचित्यक चरम थिक। भरतक "काव्यं ग्राह्यमलंकारात्" एतऽ उपमामे सिद्ध अछि — "अलं कालिदासस्य उपमा"।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
शाकुन्तल पाश्चात्य साहित्य-चेतनामे प्रवेश करनिहार प्रथम भारतीय कृति थिक — सर विलियम जोन्सक अनुवाद (१७८९) पढ़ि गेटे लिखलनि जे स्वर्ग आ पृथ्वी एक्कहि नाममे चाही तँ "शकुन्तला" कहू; फाउस्टक रंगमञ्चीय प्रस्तावना (Vorspiel auf dem Theater) शाकुन्तलक सूत्रधार-प्रस्तावनाक प्रत्यक्ष ऋणी थिक — विश्व-साहित्य (Weltliteratur)क गेटे-कल्पनाक एकटा बीज एतहि अछि। रोमैंटिक आलोचना एहिमे प्रकृति-मनुष्यक अद्वैत देखलक; इको-क्रिटिसिज्मक आजुक दृष्टिसँ तपोवन "पारिस्थितिक समुदाय"क साहित्यिक आदर्श-चित्र थिक जतऽ मनुष्य प्रकृतिक स्वामी नहि, सदस्य अछि। संरचनावादी पाठ लेल अँगूठी बार्थक "hermeneutic code"क शुद्ध यन्त्र थिक — हेराएब-भेटब पर कथाक ताला-कुंजी। नारीवादी आलोचना दू स्वरमे बजैत अछि: एक दिस शकुन्तलाक वाणी-हरण (सभा-दृश्यमे ओकर सत्य अप्रमाण भऽ जाइत अछि — स्त्री-साक्ष्यक अवमूल्यनक चिरपरिचित संरचना), दोसर दिस महाभारतक तेजस्विनी शकुन्तला (जे राजाकेँ भरल सभामे धिक्कारैत छथि)क तुलनामे कालिदासीय नायिकाक "कोमलीकरण"; मुदा सूक्ष्म पाठ ई देखत जे कालिदासो शकुन्तलाकेँ सभा-दृश्यमे तीखा प्रतिवाद ("अनार्य!") देने छथि। मनोविश्लेषण लेल दुष्यन्तक विस्मृति दमनक (repression) रूपक थिक — गान्धर्व-विवाहक सामाजिक अपराध-बोध स्मृतिकेँ निगलि जाइत अछि, आ अँगूठी — भौतिक साक्ष्य — दमितकेँ घुरा अनैत अछि।
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
मैथिली अनुवादमे शाकुन्तलक तपोवन मिथिलाक फुलवारी बनि गेल अछि — लता, भ्रमर, मृग-छौना लेल मैथिलीक कोमल शब्दावली कालिदासक कोमलताक समवर्ती थिक; प्राकृत-भाषिणी शकुन्तला-सखी लेल मैथिलीक घरेलू बोली-स्तर आ पद्य-भाग लेल तत्सम-गन्धी उच्च स्तर — ई द्विस्तरीय रजिस्टर मूलक संस्कृत-प्राकृत विभाजनक सर्जनात्मक समाधान थिक। समग्रतः शाकुन्तलक मैथिली अवतरण विद्यापतिक भाषाकेँ कालिदाससँ जोड़बाक सांस्कृतिक सेतु-कर्म थिक — दुनू कविक साझा सम्पत्ति थिक शृंगार आ प्रकृतिक अभेद।
मुद्राराक्षसम् (मंत्री राक्षसक राजसी मोहर)
विशाखदत्तक राजनीतिक नाटक
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
संस्कृत नाट्य-परम्परामे मुद्राराक्षस अकेला-दुकेला रचना थिक — ने नायिका, ने शृंगार, ने विदूषक; सम्पूर्ण नाटक दू मस्तिष्कक शतरञ्ज थिक। नन्द-वंशक पतनक बाद चाणक्य चन्द्रगुप्तकेँ सिंहासन पर बैसा चुकल छथि, मुदा हुनक असली लक्ष्य आब शत्रुक विनाश नहि — शत्रुक हृदय-परिवर्तन अछि: नन्दक स्वामिभक्त अमात्य राक्षसकेँ चन्द्रगुप्तक मन्त्री बनाएब। एक टा मोहर (मुद्रा), एक टा जाली चिट्ठी, आ छद्मवेशी गुप्तचरक जालसँ चाणक्य राक्षसक प्रत्येक चालिकेँ पहिनहिसँ खेलल घर बना दैत छथि — अन्तिम चालिमे राक्षसक सद्गुणे (मित्र चन्दनदासकेँ बचएबाक करुणा) ओकर "पराजय"क द्वार बनैत अछि। विशाखदत्त क्षत्रिय-राजपुत्र छलाह — राजनीतिक हुनक ज्ञान पोथीक नहि, प्रासादक अछि।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
रस-दृष्टिएँ मुद्राराक्षस शास्त्रीय वर्गीकरण लेल समस्या थिक — परम्परा एकर अंगी रस वीर मानैत अछि, मुदा ई युद्धवीर नहि, "नीतिवीर"/"बुद्धिवीर" थिक: उत्साह स्थायी भाव अछि, मुदा ओकर विषय रणभूमि नहि, कूटयोजना अछि। ई रस-सिद्धान्तक सीमाक रचनात्मक विस्तार थिक। संधि-योजनाक दृष्टिसँ (नाट्यशास्त्रक कथा-संरचना-सिद्धान्त) मुद्राराक्षस पाठ्यपुस्तक-योग्य अछि — मुख-प्रतिमुखसँ निर्वहण धरि प्रत्येक संधि कसल; एकहु दृश्य निष्प्रयोजन नहि। ध्वनि-दृष्टिसँ नाटकक व्यंग्य-सम्पदा "नाटकीय विडम्बना" (dramatic irony)मे अछि — दर्शक चाणक्यक जाल जनैत अछि, राक्षस नहि; प्रत्येक राक्षस-संवादक दोसर अर्थ दर्शकहि लेल ध्वनित होइत रहैत अछि। औचित्य-दृष्टिएँ विशाखदत्तक साहस ई जे ओ "खलनायक"केँ नाटकक नैतिक केन्द्र बना देलनि — राक्षसक स्वामिभक्ति एहन उदात्त अछि जे शीर्षकहि हुनका नामे अछि; चाणक्य जितैत छथि, मुदा महिमा राक्षसक भागमे जाइत अछि — विजय आ महत्त्वक ई विभाजन औचित्यक सूक्ष्मतम प्रयोग थिक।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
पाश्चात्य कोटिमे मुद्राराक्षस राजनीतिक यथार्थवादक नाट्य-रूप थिक — मैकियावेलीक Il Principe सँ सहस्र वर्ष पूर्व "साध्य-साधन"क ओ विमर्श जे कौटिल्यीय अर्थशास्त्रक रंगमञ्चीय भाष्य सन अछि; चाणक्य मैकियावेलीक आदर्श "नव-राजा"क निर्माता-रूप छथि, मुदा एक भेदसँ — हुनक लक्ष्यमे व्यक्तिगत स्वार्थ शून्य अछि, कार्य सिद्ध भेला पर ओ शिखा बान्हि वनप्रस्थ दिस ताकैत छथि: सत्ता-संन्यासक ई युग्म पाश्चात्य यथार्थवादकेँ अनुपलब्ध अछि। विधा-दृष्टिसँ ई espionage thriller आ heist-संरचनाक प्राचीनतम परिपक्व रूप थिक — ल कारेक शीत-युद्ध कथा-जालसँ तुलनीय: छद्म-पहिचान, double agent (भागुरायण), जाली दस्तावेज, आ "मास्टरमाइंड"क बिन्दु-दर-बिन्दु खुलैत योजना। संरचनावादी दृष्टिसँ नाटक द्वयात्मक विरोध (binary opposition) पर गठित अछि — बुद्धि/हृदय, राजनीति/निष्ठा, मुद्रा (राज्यक अमूर्त शक्ति)/चन्दनदास (नागरिक स्नेह) — आ समाधान विरोधक विलय (राक्षसक मन्त्रित्व-ग्रहण)मे अछि। न्यू हिस्टॉरिसिज्म एहि नाटककेँ गुप्तयुगीन राज्य-विमर्शक दस्तावेज रूपेँ पढ़त — साम्राज्य-निर्माणक वैधता-कथा, जाहिमे हिंसा न्यूनतम आ सहमति-निर्माण (राक्षसक सहमति!) परम लक्ष्य अछि।
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
मैथिली अनुवाद "मंत्री राक्षसक राजसी मोहर" शीर्षकहिसँ अनुवाद-दृष्टि घोषित करैत अछि — मुद्राक अर्थ-गाम्भीर्य देशज पदावलीमे। कूटनीतिक संवादक द्विअर्थकता — जे एहि नाटकक प्राण थिक — अनुवादमे सतर्कतासँ बचाओल गेल अछि; गुप्तचर-प्रसंगक सांकेतिक भाषा मैथिलीमे सहज चलैत अछि। समग्रतः मुद्राराक्षस देखबैत अछि जे संस्कृत नाटक कोमलताक अतिरिक्त कठोरताक, हृदयक अतिरिक्त मस्तिष्कक नाट्य सेहो रचि सकैत छल — आ ओहूमे अन्ततः जीत हृदयेक होइत अछि।
मृच्छकटिकम् (माटिक खेलौना-गाड़ी)
शूद्रकक दस-अंकी प्रकरण
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
मृच्छकटिक संस्कृत नाट्य-साहित्यक सभसँ "लौकिक" महारचना थिक। राजा शूद्रक (परम्परा-प्रसिद्ध रचयिता) राजप्रासाद छोड़ि उज्जयिनीक गली-कूचीमे उतरि गेलाह — एतऽ दरिद्र भेल उदार व्यापारी चारुदत्त अछि, बुद्धिमती गणिका वसन्तसेना अछि, जुआरी-सँ-भिक्षु बनल संवाहक अछि, सेन्ह काटबकेँ कला माननिहार चोर शर्विलक अछि, राजाक साला शकार अछि — मूर्खता आ क्रूरताक अमर मूर्ति — आ पृष्ठभूमिमे आर्यकक राज्य-क्रान्ति पकैत अछि। शीर्षकक "माटिक गाड़ी" — रोहसेनक खेलौना, जाहिमे वसन्तसेना अपन गहना भरि दैत छथि — सम्पूर्ण नाटकक बीज-प्रतीक थिक: माटि आ सोनक, दरिद्रता आ प्रेमक सङ्गम।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
रूपक-भेदमे ई "प्रकरण" थिक — कल्पित कथा, लौकिक पात्र, आ नायिका गणिका; भरतक व्यवस्थामे प्रकरणकेँ नाटकसँ न्यून मानल गेल, मुदा शूद्रक एहि "न्यून" विधाकेँ दस अंकक व्याससँ महाकाव्यीय गरिमा देलनि। रस-दृष्टिएँ मृच्छकटिक रस-मिश्रणक प्रयोगशाला थिक — शृंगार (चारुदत्त-वसन्तसेना), हास्य (मैत्रेय, शकार), करुण (वध-स्थल-यात्रा), अद्भुत, वीर, बीभत्स धरि — आ आश्चर्य ई जे एतेक रसक भीड़मे रस-भंग नहि होइत अछि; कारण औचित्य: प्रत्येक रस अपन पात्र-स्तर आ भाषा-स्तरसँ बान्हल अछि। नाट्यशास्त्रक भाषा-व्यवस्थाक सभसँ समृद्ध प्रयोग एतहि अछि — सात-आठ प्राकृति-भेद, पात्रक सामाजिक स्तरक ध्वनि-चित्र। वक्रोक्ति-दृष्टिसँ शकारक "विपरीत-पाण्डित्य" (रामायण-महाभारतक उनटल हवाला) अज्ञानक वक्रोक्ति थिक — भाषिक हास्यक अक्षय कोष। ध्वनि-दृष्टिएँ माटिक गाड़ी वस्तु-ध्वनिक आदर्श अछि: ओहिमे राखल गहना कथाक समस्त उलझनक बीज बनैत अछि, आ "माटिमे सोन" — चारुदत्तक दरिद्र-उदारताक — प्रतीक बनि व्यंग्यार्थ पसारैत अछि।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
पाश्चात्य विधा-कोटिमे मृच्छकटिक tragicomedy आ melodrama क पूर्ण लक्षणसँ युक्त अछि — निर्दोषक फाँसी-यात्रा अन्तिम क्षणमे रुकैत अछि; मुदा एकर गहिंर पहिचान "नगर-नाट्य" (city comedy) रूपेँ अछि — बेन जॉनसनक लंदनसँ बारह सए वर्ष पूर्व उज्जयिनीक अर्थतन्त्र, न्यायतन्त्र, अपराधतन्त्रक पूर्ण नागरिक चित्र। मार्क्सवादी पाठ लेल ई संस्कृतक सर्वाधिक उर्वर पाठ थिक: सम्पत्तिक गति (गहनाक हाथ-दर-हाथ भ्रमण) कथाक वास्तविक चालक अछि; न्यायालय-दृश्य वर्ग-न्यायक नग्न चित्र थिक — "दरिद्र साक्ष्य अप्रमाण"; आ आर्यकक क्रान्ति एकमात्र संस्कृत नाटक थिक जतऽ राज-परिवर्तन ग्वाला-पुत्रक नेतृत्वमे होइत अछि — सबाल्टर्न इतिहास-दृष्टिक रंगमञ्चीय पूर्वाभास। नारीवादी दृष्टिसँ वसन्तसेना गणिका-पात्रक मुक्ति-कथा थिक — ओ अपन देह-वृत्तिक अर्थतन्त्रसँ निकसि "वधू" पद पबैत छथि; आधुनिक पाठ एहि समापनकेँ दू तरहेँ देखत — स्त्रीक विजय, अथवा विवाह-संस्थामे ओकर पुनर्वशीकरण। ब्रेख्तीय दृष्टिसँ नाटकक न्याय-प्रहसन आ शकारक अति-नाटकीयता स्वयं "अलगाव-प्रभाव" उत्पन्न करैत अछि — दर्शक व्यवस्था पर सोचबा लेल बाध्य होइत अछि। (स्मरणीय: जर्मन रंगमञ्च एहि नाटककेँ उन्नैसम शताब्दीहिसँ अपनौने अछि।)
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
मैथिली अनुवाद "माटिक खेलौना-गाड़ी" एहि नाटकक बहुभाषिकताक समक्ष मैथिलीक अपन स्तर-भेद (ठेठ, सामान्य, तत्समगर्भी) उतारैत अछि — शकारक भ्रष्ट उक्ति लेल मैथिलीक हास्यमूलक वाक्-विकृति, चारुदत्तक पद्य लेल प्रौढ़ स्तर। चोरिक "शास्त्रीय" वर्णन आ जुआघरक दृश्य मैथिली मुहावरामे विशेष खिलल अछि। समग्रतः मृच्छकटिक प्रमाण थिक जे भारतीय क्लासिक "क्लासिक" एहि द्वारे नहि जे ओ राजा-देवताक कथा कहैत अछि, वरन् एहि द्वारे जे ओ माटिक गाड़ीमे मनुष्यताक सोन भरि सकैत अछि।
भगवदज्जुकम् (साधु आ वेश्या)
बोधायन-कृत प्रहसन — आत्मा-विनिमयक हास्य
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
भगवदज्जुकम् संस्कृत प्रहसन-परम्पराक सभसँ बुद्धिदीप्त रचना मानल जाइत अछि। कथा-यन्त्र अद्भुत अछि: परिव्राजक (भगवान्) अपन चञ्चल शिष्य शाण्डिल्यकेँ योगक "परकाय-प्रवेश" सिद्धि देखयबा लेल — यमदूतक भूलसँ मृत भेल गणिका वसन्तसेना (अज्जुका)क देहमे प्रवेश करैत छथि; बादमे यमदूत भूल सुधारऽ मे गणिकाक आत्माकेँ परिव्राजकक देहमे धऽ दैत अछि। फल: गणिकाक देहसँ वेदान्त-वाणी आ संन्यासीक देहसँ शृंगार-चेष्टा! वैद्य, माता, प्रेमी — सभ चकराइत अछि, आ शाण्डिल्य — भूख-प्रेरित भऽ बौद्ध-मठसँ भागल ई "अन्न-दास" शिष्य — एहि अराजकताक सूत्रधार-साक्षी बनल हँसबैत रहैत अछि। पल्लव-युगमे (सम्भवतः महेन्द्रविक्रमक समकालीन/पूर्ववर्ती) रचित ई प्रहसन मत्तविलासक संग दक्षिणक मन्दिर-रंगमञ्च (कूडियाट्टम् धरि) मे जीवित रहल।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
रस-दृष्टिएँ एतऽ हास्यक उद्भव-स्थल "वेश-वाणीक व्यत्यय" थिक — भरत हास्यक विभावमे "विकृत-वेष-अलंकार" गनने छथि; भगवदज्जुक ओकरा दार्शनिक स्तर पर लऽ जाइत अछि: विकृति वस्त्रक नहि, आत्महिक अछि। ध्वनि-सिद्धान्तसँ ई प्रहसन असाधारण अछि, कारण एकर हास्यक प्रत्येक क्षण वेदान्तक गम्भीर प्रमेय ध्वनित करैत अछि — देह-आत्माक भेद, "को ऽहम्"क प्रश्न — जे उपनिषद् गम्भीर स्वरे कहैत अछि, से ई प्रहसन उनटा कऽ देखा दैत अछि: देह बदलि गेला पर "हम" के? हास्यक व्याजसँ शास्त्रार्थ — ई "व्यङ्ग्य-वेदान्त" थिक। वक्रोक्ति-दृष्टिएँ सम्पूर्ण नाटक एक विराट "विपर्यय-वक्रता" पर ठाढ़ अछि। औचित्य-प्रश्न रोचक अछि: की संन्यासीक एहन विडम्बना उचित? रचनाक भीतरहि उत्तर अछि — व्यंग्य सच्चा योगी पर नहि (परिव्राजकक सिद्धि वास्तविक अछि!), पाखण्ड आ देहात्म-भ्रम पर अछि; प्रहसनक अन्तमे सभ आत्मा अपन-अपन देह घुरि पबैत अछि — व्यवस्था-पुनर्स्थापन औचित्यक रक्षा करैत अछि।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
पाश्चात्य कोटिमे एकर कथा-यन्त्र body-swap comedy क विश्व-साहित्यमे प्राचीनतम पूर्ण प्रयोग थिक — आधुनिक सिनेमा धरि (Freaky Friday सन) पसरल एहि रूढ़िक जड़ि एतऽ अछि; मुदा पाश्चात्य रूपान्तरसभ जतऽ मनोवैज्ञानिक "समानुभूति"क पाठ पढ़बैत अछि, बोधायन दार्शनिक प्रश्न उठबैत छथि — पहिचान देहमे अछि की चेतनामे? ई प्रश्न आधुनिक philosophy of mind (लॉकक स्मृति-सिद्धान्त, personal identity विमर्श) सँ सोझे संवाद करैत अछि — लॉकक "राजकुमार आ मोचीक" प्रसिद्ध विचार-प्रयोगसँ सहस्र वर्ष पूर्व मंच पर ओकर प्रदर्शन। बाख्तिनक कार्निवल-सिद्धान्त एतऽ शाब्दिक रूपेँ फलित अछि — उच्च-नीचक विनिमय (संन्यासी-गणिका!) कार्निवलक मूल-मन्त्र थिक, आ "देह"क केन्द्रीयता बाख्तिनक भौतिक-दैहिक सिद्धान्तक अनुरूप। बर्गसाँक हास्य-सूत्र — "देह पर यन्त्रवत् आरोपण" — एतऽ चरम रूपमे अछि: आत्मा बदलल, देहक टेव नहि बदलल। Absurdist दृष्टिसँ यमदूतक "लिपिकीय भूल" (गलत जीव उठा लेब) ब्रह्माण्डीय प्रशासनक ओ विडम्बना थिक जे काफ्का-योनेस्कोक जगत्सँ परिचित पाठककेँ चौंका दैत अछि — नियति एतऽ त्रासद नहि, दफ्तरी अछि।
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
मैथिली अनुवाद "साधु आ वेश्या" शीर्षक-द्वन्द्वहिसँ नाटकक विपर्यय-संरचना पकड़ि लैत अछि। अनुवादक कठिनतम स्थल — गणिका-देहस्थ संन्यासीक संस्कृतनिष्ठ वाणी आ संन्यासी-देहस्थ गणिकाक विलास-वाणीक व्यत्यय — मैथिलीक स्तर-भेदसँ (तत्समगर्भी बनाम लोकरंजक बोली) सधल अछि; एहि भाषिक व्यत्ययहिमे अनुवादक सफलता अछि। समग्रतः भगवदज्जुकम् देखबैत अछि जे भारतीय परम्परामे गम्भीरतम दर्शन आ उन्मुक्ततम हास्य परस्पर विरोधी नहि — एक्कहि सिक्काक दू पीठ थिक; "को ऽहम्"क प्रश्न ठहाकाक बीचोबीच पूछल जा सकैत अछि।
मत्तविलास प्रहसनम् (आनन्दमे मत्त करैबला प्रहसन)
पल्लव नरेश महेन्द्रविक्रम वर्माक प्रहसन
विस्तृत समीक्षा — भारतीय आ पाश्चात्य साहित्यिक सिद्धान्तक दृष्टिसँ
कृति-परिचय
सप्तम शताब्दीक आरम्भमे काञ्चीक पल्लव सम्राट् महेन्द्रविक्रम वर्मा — "विचित्रचित्त" — स्वयं जे प्रहसन रचलनि से राजकीय आत्मविश्वासक अद्भुत दस्तावेज थिक: अपनहि राजधानी काञ्चीक धर्म-जगतक विडम्बना। कपाली सत्यसोम — मदिरा-मत्त शैव कापालिक — अपन कपाल (भिक्षा-पात्र, नर-कपाल) हेरा दैत अछि आ बौद्ध भिक्षु नागसेन पर चोरिक आरोप लगबैत अछि; बीचमे पाशुपत मध्यस्थ बनैत अछि, उन्मत्तक हाथसँ कपाल घुरैत अछि, आ झगड़ा जेना उठल तेना बैसि जाइत अछि। एक अंकक एहि लघु रचनामे तत्कालीन काञ्चीक धार्मिक बहुलता — कापालिक, बौद्ध, पाशुपत, जैनक उल्लेख — सड़क-स्तरीय यथार्थमे अंकित अछि।
भारतीय काव्यशास्त्रीय दृष्टि
नाट्यशास्त्रीय दृष्टिसँ मत्तविलास "शुद्ध प्रहसन"क लक्षण-सिद्ध उदाहरण थिक — पाखण्डी-तापस-चेटादिक निन्द्य अनुकृति; मुदा राजा-रचयिताक स्पर्शसँ एकर हास्यमे जे परिष्कार अछि से उल्लेखनीय: गारि-स्तरक स्थूलता न्यून, स्थिति-जन्य आ चरित्र-जन्य हास्य प्रधान। रस-व्यवस्थामे हास्यक "मद"-आधारित विभाव एतऽ केन्द्रमे अछि — भरत मदक तीन अवस्था गनने छथि, आ सत्यसोमक सम्पूर्ण आचरण ओकर क्रमिक प्रदर्शनी थिक; नाटकक नामहिमे "मत्त" अछि। वक्रोक्ति-दृष्टिएँ नाटकक तीक्ष्णतम शस्त्र "व्याज-तर्क" थिक — सत्यसोम मदिरालयकेँ यज्ञशाला कहैत अछि (ध्वजा=यूप, मदिरा=सोम, चषक=चमस...): ई उपमा-शृंखला वक्रोक्तिक चमत्कार आ धर्म-भाषाक खोखलापनक ध्वनि — दुनू एक्केसंग थिक। ध्वनि-दृष्टिसँ बौद्ध भिक्षुक मनोगत ("पिटक-ग्रन्थमे मदिरा-स्त्रीक निषेध कोन ईर्ष्यालु बूढ़ जोड़ि देलक!") प्रच्छन्न-लालसाक व्यंग्य-गर्भ उक्ति थिक। औचित्य-दृष्टिएँ राजाक सन्तुलन देखू — कोनो सम्प्रदाय-विशेषक पक्षधरता नहि; व्यंग्य सभ पर बराबर, आ तेँ कोनो पर नहि — शासकीय निष्पक्षताक सौन्दर्यशास्त्र।
पाश्चात्य सिद्धान्त-दृष्टि
पाश्चात्य कोटिमे मत्तविलास farce क लक्षण — हेरायल वस्तु, झूठ आरोप, सार्वजनिक झगड़ा, संयोगसँ समाधान — पूर्णतः धारण करैत अछि; मोलियरक Tartuffe सँ हजार वर्ष पूर्व धार्मिक पाखण्डक रंगमञ्चीय विडम्बना, मुदा एक निर्णायक भेदसँ: मोलियरक व्यंग्य-पात्र कपटी अछि, सत्यसोम कपटी नहि — निष्ठावान् मूर्ख अछि; ओ जे बजैत अछि से मानैत अछि। ई भेद व्यंग्यकेँ क्रूरतासँ बचबैत अछि आ बर्गसाँक "टेवक यान्त्रिकता"क शुद्ध क्षेत्रमे रखैत अछि। बाख्तिनक दृष्टिसँ मत्तविलास कार्निवलक शाब्दिक मंचन थिक — मदिरा, सड़क, पवित्रक अपवित्रीकरण (कपाल-पात्र!), आ "सम्राट्क अपन कार्निवल" — राजसत्ता स्वयं अपन नगरक धर्मसत्ताक विडम्बना रचि रहल अछि: न्यू हिस्टॉरिसिस्ट एतऽ पूछत जे ई विडम्बना विध्वंसक (subversive) थिक की सत्ता-पोषित सुरक्षा-कपाट (safety valve / licensed misrule)? सम्भवतः दोसर — राजा हँसबाक अनुमति दऽ कऽ धर्म-संस्था सभ पर अपन प्रभुत्वहि देखा रहल छथि। धर्म-समाजशास्त्रक दृष्टिसँ ई नाटक सम्प्रदाय-प्रतिस्पर्धाक "बाजार"क चित्र थिक — भिक्षा, पात्र, प्रतिष्ठाक अर्थतन्त्र; आ कपाल-हरण-कथा वस्तुतः प्रतीक-पूँजी (symbolic capital, बूर्द्यो)क हरण-कथा थिक: कपाल गेल तँ कापालिकक पहिचाने गेल।
अनुवाद-मूल्यांकन आ निष्कर्ष
मैथिली अनुवाद "आनन्दमे मत्त करैबला प्रहसन" शीर्षकसँ मूलक श्लेष (मत्त=मातल/आनन्दमग्न) खोलैत अछि। मातलक लटपटायल वाणी लेल मैथिलीक अपन "मातल-बोली"क लोक-परिचित लय अनुवादमे सटीक बैसल अछि; मदिरालय-यज्ञशाला उपमा-शृंखला पारिभाषिक शब्दसहित बचाओल गेल अछि, जे एकर व्यंग्य-धार लेल अनिवार्य छल। समग्रतः मत्तविलास ओ दुर्लभ रचना थिक जाहिमे सिंहासन स्वयं सड़क पर उतरि हँसैत अछि — आ डेढ़ हजार वर्ष बाद ओ हँसी एखनहुँ ताजा अछि, कारण पाखण्ड कहियो पुरान नहि होइत अछि।
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