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VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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नबोनारायण मिश्र

हमर संस्मरण : रमणजी क संग

हम १९६९ ई॰ सँ मैथिली साप्ताहिक पत्रिका “मिथिला-मिहिर”क नियमित पाठक छलहुँ। “मिथिला मिहिर” मे अन्यान्य लेखकक संग डॉ॰ रमानन्द क “रमण” क आलेख यदा-कदा प्रकाशित होइत छल। हम मात्र हुनक नाम सँ परिचित छलहुँ। ओ नीक लेखक आ रिजर्व बैंक, पटनाक उच्च आधिकारी छथि से सुनल छल।

१९९० ई॰ क पश्चात कोकिल मंच कलकत्ताक वार्षिक आयोजन (नाट्य-मंचन) मे हुनका सम्मिलित होबाक लेल पत्राचार नियमितरूपे करैत छलहुँ। हुनक प्रथम दर्शनक सौभाग्य कहिया भेल से स्मरण, नहि अछि मुदा ओ जहिया कलकत्ता आबथि ताहिसँ पूर्व पत्र द्वारा अवश्य सूचित करैत छलहुँ। एहन अवसर कतेको बेर आएल जाहि मे हमरा हुनका सँ भेंट भेल। किन्तु विशेष अवसर पर हुनिका सँ भेंट भेल तखन चर्चा हम हमरा चाहब जे हमरा लेल चिरस्मरणीय भेल।

(१) “सगर राति दीप जरए” कथा-गोष्ठी मे हुनक भूमिका महत्वपूर्ण रहैत छल। ओहि कथा गोष्ठी मे हम बलाइन, बोकारो, राँची आ कलकत्ता मे सहभागी छलहुँ।

एतए उल्लेखनीय जे “कर्ण-गोष्ठी” कलकत्ता द्वारा “सगर राति दीप जरए" के कथा अमृतक ४६म आयोजन दि॰ २१ जनवरी २००३ मे भेल जकर अध्यक्षता रमानन्द झा “रमण” कएलनि। उक्त अवसर पर डॉ॰ गोविन्द झा लिखित पोथी “आत्मालाप” क लोकार्पण रमानन्द रेणु कएने छलाह आ कथा-पाठ मे हम अपन कथा प्रस्तुत कएने रही।

(२) ३० अगस्त २००६

भारतीय भाषा संस्थान (Central Institute of Indian Languages) क कार्यक्रम मे सम्मिलित होबाक लेल शताब्दी एक्सप्रेस सँ हावड़ा आयल छलाह सर्वश्री पंडित गोविन्द झा, डॉ॰ बासुकीनाथ झा, डॉ॰ गोकुलनाथ झा, डॉ॰ सुभाषचन्द्र यादव आ डॉ॰ रमानन्द झा “रमण”। ओहि दिन सब गोटे यात्री-निवास मे रुकल छलाह।

पूर्व सूचना अनुसार रामलोचन ठाकुर जी के निर्देश पर हम, विनय भूषणजी, मिथिलेशजी, अनमोलजी, अमरनाथ “भारती” आ अरुण कुमार सिंह के सूचित कएने रहियन्हि।

ओहि अवधि मे नवीन चौधरी नर्सिंग होम मे भर्ती छलाह आ लक्ष्मण झा “सागर” जी औफिसक कार्यसँ कलकत्ता सँ बाहर गेल छलाह। सुखद संयोग जे एक दिन पहिने सागरजी कलकत्ता पहुँचि गेलाह आ हमरा सँ फोन पर बात भेलनि तद्नुसार दोसर दिन सागरजी क ऑफिस सँ संग करैत हावड़ा पहुँचि गेल छलहुँ। हमरा सँ पहिने डॉ॰ वीरेन्द्र मल्लिक आ रामलोचन ठाकुर पहुँचल छलाह। पुनः अरुण सिंह सेहो आबि गेलाह।

रमानन्द झा “रमण” जी हमरा सभ लोकनिकेँ सभ अक्षर-पुरुष सँ परिचय करौलनि। तत्पश्चात ओ साँझ चिरस्मरणीय साहित्यिक गोष्ठी मे परिणत भऽ गेल। डॉ॰ वीरेन्द्र मल्लिक जी कालिदासक “मेघदूत”क सांगोपांग वर्णन करय लगलाह आ हम सभ मंत्रमुग्ध भऽ ओकर रसास्वादन करैत रहलहुँ। गोष्ठीक समापन होइत राति ९ बाजि गेल छल आ आगन्तुक अतिथि लोकनि राति दस बजे भुवनेश्वर हेतु प्रस्थान कएलनि।

चेतना समिति, पटना प्रत्येक वर्ष विद्यापति-पर्वक अवसर पर अपन मनीषी के मैथिला-विभूति सम्मान सँ सम्मानित करैत रहल अछि। ताहि क्रम मे डॉ॰ श्रीमती अणिमा सिंह के निमंत्रण-पत्र पठाओल गेल मुदा प्रो॰ प्रबोध बाबूक अस्वस्थताक कारणें ओ पटना नञि पहुँचि सकल छलीह। अस्तु चेतना समितिक प्रतिनिधि डॉ॰ रमानन्द क “रमण” मान-पत्र आ शाल लऽ डॉ॰ श्रीमती अणिमा सिंह के सम्मानित करबाक हेतु कलकत्ता आयल छलाह। एहि सारस्वत अभियानक साक्षी बनबाक सौभाग्य हमरो प्राप्त भेल जाहि मे “रमण” जी, हम, राजनन्दन लाल दास आ रामलोचन ठाकुर समेत चारू गोटे प्रबोध बाबूक निवास-स्थान लेक गार्डेन्स पहुँचल रही। सहज अविस्मरणीय सुखद क्षण जीवन मे बड़ थोड़ भेटैत छैक।

हमरा दृष्टि सँ रमानन्द झा “रमण” मैथिली साहित्यक प्रमुख साहित्यकार, आलोचक, शोधकर्मी आ संपादक रूप मे बहुचर्चित छथि। सृजनात्मक लेखनक अतिरिक्त मैथिली भाषा, साहित्य आ संस्कृति पर गंभीर अध्ययन संगहि आलोचनाक क्षेत्रमे वैज्ञानिक शोधपरक दृष्टि प्रदान कएलनि अछि। हिनक आलेख समसामयिक विचारोत्तेजक संग आत्म-मंथन लेल निश्चय बाध्य करैत अछि। आलोचनाक क्षेत्र मे आचार्य रमानाथ झा, मोहन भारद्वाज आ रमानन्द क “रमण” के नाम श्रद्धापूर्वक लेल जाइत अछि से हुनक महत्वपूर्ण कार्य रचना-संसार देखलापर स्पष्ट होइत अछि। एहि ठाम हुनक पोथीक विशद् सूची दऽ पन्ना भरब हमर अभीष्ट नहि अछि। तँइ हुनक किछु एहन काजक वर्णन करी जे मैथिली लेल आन कियो नै करैत अछि।

मैथिली भाषा-साहित्य ओ संस्कृतिसँ जुड़ल लोकक फोटो केर एहन विशाल भंडार हुनका लग छनि जे आन किनको लग नै छनि। ई भंडार एकटा परंपराकेँ जीवित बचा लेबाक कला छै।

अन्यान्य उपलब्धिक अतिरिक्त मैथिली साहित्यकार आ समाजसेवी लोकनिक अवदानकेँ सहेजि कऽ रखने छथि जे आन कोनो लोक नञि कएने छथि। जिनकर अवसान भऽ चुकल छनि तिनका नामे हुनक पुण्य-तिथि पर “मोन पड़ैत अछि” शीर्षक सँ आ जीवित लोकक जन्म-दिवस पर “युग युग जीबथि” शीर्षक सँ चेतना समिति, पटनाक मुखपत्र त्रैमासिक पत्रिका “घर-बाहर” मे नियमितरूप सँ प्रकाशित करैत छथि जकर ओ स्वयं संपादक सेहो छथि। सोशल मीडिया (फेसबुक) पर सेहो साहित्यक नियमित रूप सँ उल्लेख करैत छथि मुदा एहिठाम हुनका पर दोषारोपण छनि जे “बाबू साहेब चौधरी” सन कहानी मैथिली आन्दोलनी आ नाटककार के नाम ओहि सूची मे सम्मिलित नञि करैत छथि।

ओना साहित्यकारक प्रति हुनक दायित्व-बोध सर्वविदित अछि आ तकरे परिणाम जे पंडित गोविन्द झा आ प्रो॰ आनन्द मिश्रक सान्निध्य हिनका दीर्घ अवधि धरि भेटलनि।

“रमण” जी के विषय मे दू गोट विशिष्ट साहित्यकार सँ हमरा बात भेल ताहिमे हुनक मन्तव्य अछि, तकर बानगी निम्नलिखित अछि-

(१) रामलोचन ठाकुर के मन्तव्य :-

“रमण” जी हमर प्रिय लोक आ नीक समीक्षक छथि मुदा एकटा दोष जे ओ अन्य लोकक अपेक्षा श्रोत्रिय समाजक कार्य के बेसी उजागर करैत छथि ताहि ठाम ओ निरपेक्ष नञि रहि पबैत छथि।

(२) राजनन्दन लाल दासक मन्तव्य :-

“रमण” जी हमर बहुत घनिष्ट आ सहयोगी लोक छथि। हम हुनका मैथिली साहित्यक पंजीकार मानैत छी। मैथिली साहित्यक दुर्लभ वस्तु जे कतहुँ उपलब्ध नञि रहत से खोजि कऽ लोकक सोंझा आनि देताह। हम जे जखन प्रयोजन भेल से खोजि कऽ पठा दैत छथि।

वस्तुतः रमानंद झा "रमण" खोजी प्रवृत्तिक लोक छथि जिनकर काज हुनका अन्य साहित्यकार सँ अलग बनबैत अछि।।

 

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