
गजेन्द्र ठाकुर
मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-३) सन्दर्भ- कुणाल-कृत “चालिस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा”
१
कुणाल-कृत- “कुसमा-सलहेस आ अन्य छओ गोट नाटक”
एक विस्तृत साहित्यिक समीक्षा
लोकनाट्य आ शास्त्रीय रंग-परंपराक संधि-स्थल पर ठाढ़ मैथिली नाट्य
अंतिका प्रकाशन प्रा. लि., गाजियाबाद · पहिल संस्करण (सजिल्द) २०२१ · ISBN 978-93-88799-77-5
१. प्रास्ताविक : संग्रहक परिचय आ प्रकाशन-वृत्त
कुणालक “कुसमा-सलहेस आ अन्य छओ गोट नाटक” समकालीन मैथिली नाट्य-साहित्यक एक एहन संग्रह थिक जे अपना मूल अंतर्वस्तु आ रूप-विधान, दुनू दृष्टिसँ, मंच-केन्द्रित अछि- अर्थात ई कोनो ‘पाठ-नाटक’ (पढ़बाक लेल लिखल नाटक) नहि, अपितु बेर-बेर मंचित, परीक्षित आ परिमार्जित प्रयोग-सिद्ध नाटकक संकलन थिक। संग्रहक प्रकाशकीय सूचना एहि बातक साक्ष्य दैत अछि- सातो नाटक पहिने पटनाक विद्यापति भवनमे मंचित भेल आ तकर बाद ‘भंगिमा’ तथा ‘अंतिका’ सन पत्रिकामे प्रकाशित भेल। यएह कारण थिक जे एहि संग्रहक समीक्षा करैत काल मात्र ‘पाठ’क विवेचन पर्याप्त नहि; एकर रंगमंचीय सम्भावना (theatricality / मंचनीयता) सेहो आलोचनाक केन्द्रमे आबि जाइत अछि।
संग्रहक समर्पण-पृष्ठ अपनेमे एक नाट्य-घोषणापत्र थिक- “गाम-गाम मे नाटक (‘नाच’) कर’वला ज्ञात-अज्ञात लोक आ कलाकार लोकनि आ ‘भंगिमा’क विश्वकर्मा जे. ब्रह्मानंद केँ”। ई समर्पण कुणालक समस्त नाट्य-दृष्टिक बीज-वाक्य थिक। एक दिस ओ अनाम ग्रामीण ‘नाच’-कलाकार लोकनिकेँ नमन करैत छथि- सएह परम्परा जे शताब्दीसँ मिथिलाक माटिमे जीवित अछि मुदा संस्थागत साहित्येतिहासमे जकर नाम अनुपस्थित अछि; आ दोसर दिस ओ अपन रंगमंडली ‘भंगिमा’क प्रति आभार व्यक्त करैत छथि, जकर अनेक कलाकार- जेना जे. ब्रह्मानंद- स्वयं एहि नाटक सभक मूल मंचनमे सहयोगी रहलाह। आवरण-चित्र विनय अंबरक थिक, जाहिमे मिथिला-शैलीक लोकचित्रण-परम्पराक अनुगूँज स्पष्ट अछि।
२. संग्रहक स्थापत्य : दू वृत्तक रचना-योजना
सातो नाटककेँ एकठाम राखि देखला पर ओ दू स्पष्ट वृत्तमे विभाजित भ’ जाइत अछि- यद्यपि लेखक एहि विभाजनकेँ कतहु अभिधामे नहि कहैत छथि, तथापि रूप, स्रोत आ कालक्रमक आधार पर ई विभाजन स्वयं उद्घाटित भ’ जाइत अछि।
(क) लोकनाट्य-मूलक त्रयी- ‘चालिस चोर आ गोनू झा’, ‘बिदापत’ आ शीर्षक-नाटक ‘कुसमा-सलहेस’। ई तीनू मिथिलाक अपन लोक-आख्यान आ लोक-रंगमंच (‘नाच’, ‘सलहेस नाच’, ‘बिदापत नाच’) पर आधारित विस्तृत, बहु-पात्रीय, गीत-नृत्य-बहुल नाटक थिक। ई तीनू १९९०सँ २००६ धरिक रचना-काल देखबैत अछि।
(ख) प्रेम-चतुष्टय- ‘प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय!’, ‘विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह’, ‘प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक आविष्कार’ आ ‘प्रेमक परीक्षा उर्फ सुप्रभा आ अष्टावक्र’। ई चारू अपेक्षाकृत लघु, मितव्ययी पात्र-विधानवला, पौराणिक/आख्यानमूलक नाटिका थिक, जे २०१३–२०१४ मे ‘अंतिका’मे प्रकाशित भेल। एकरा सभक शीर्षक-विधान एक्के साँचमे ढलल अछि-एक अमूर्त भाव-मूल्य (प्रेम/विश्वास)। चारू नाटकक केन्द्रमे एक आत्मनिर्णयकारी नारी-चरित्र अछि।
एहि दू वृत्तकेँ जोड़’वला सूत्र थिक-‘प्रेम’क जीवन-तत्त्वक रूपमे प्रतिष्ठा। ‘कुसमा-सलहेस’क समापन-गीतक टेक-“बिनु मकरंदक कुसुम हो तहिना, प्रेम बिना की जीवन”- लगभग शब्दशः ‘श्वेताक आविष्कार’मे पुनः प्रतिध्वनित होइत अछि। तात्पर्य ई जे लोकनाट्य-त्रयीसँ प्रेम-चतुष्टय धरि एक वैचारिक तार लगातार ताणल अछि।
३. नाटकक सभक मोटा-मोटी सर्वेक्षण
३.१ चालिस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा
संग्रहक प्रथम आ सर्वाधिक प्रयोगधर्मी नाटक यएह थिक। एकर आरम्भे आत्म-संदर्भी (self-referential) रंगमंचक एक श्रेष्ठ उदाहरण थिक। तीन गोट ‘भाँट’ मंच पर अबैत छथि आ अपन मरैत कलाक विलाप करैत छथि-“हमरा लोकनिक विद्या आब बेकार भ’ गेलए”। जखन हुनकर पारम्परिक ‘कवित’ आ यशोगानक कोनो असरि श्रोता पर नहि पड़ैत छनि, तखन ओ निर्णय करैत छथि जे आब ‘नाटक’ करबाक चाही। एहि एक्के दृश्यमे कुणाल मैथिली बारदिक-परम्पराक (भाँट-संस्कृति) ह्रास, राज्याश्रित कलाक संकट आ रंगमंच दिस लोक-कलाकारक संक्रमण-तीनू ऐतिहासिक यथार्थकेँ एक्के संग नाटकीय बना दैत छथि।
एहि बाह्य-वृत्तक भीतर मिथिलाक चिर-परिचित ‘गोनू झा’-चक्रक कथा अबैत अछि। नरेश गोनूकेँ ‘धूर्त-शिरोमणि’क उपाधिसँ विभूषित कएने छथि; अपमानित कविराज लोकनि गोनू लग न्यायक गोहारि लगबैत छथि; आ अंततः चालिस चोरक एक टोली गोनूक घर लूटबाक उपक्रम करैत अछि। गोनू बल-प्रयोग नहि, अपितु ‘बुद्धि’-प्रयोगसँ चोर सभकेँ परास्त करैत छथि-ओ चोर सभक आपसी प्रतिद्वंद्विताकेँ ‘सरदारीक मुरेठा’क प्रतीकात्मक लोभ द’ क’ भड़काबैत छथि आ एक कूट अभिषेक-विधिक प्रहसन रचि क’ हुनका सभकेँ ठकि लैत छथि। एतय हास्य-रस आ वीर-रसक एक विरल मिश्रण अछि, जतय ‘वीरता’ शस्त्रक नहि, युक्तिक धर्म बनि जाइत अछि।
नाटकक वैचारिक उत्कर्ष ओकर समापनमे अछि, जतय भाँट लोकनि पुनः अपन भूमिकासँ बाहर आबि क’ कथाक अंत पर परस्पर वाद-विवाद करैत छथि-“एहि तरहे तँ नाटकक अंत बदलि ने गेल भाइजी?”। एहि एक संवादमे कुणाल रंगमंचीय यथार्थक तरलता, वैकल्पिक अंत (alternative endings) आ दर्शकक सोझाँ रचना-प्रक्रियाक पारदर्शिताकेँ उजागर करैत छथि। आर तखन एक प्रखर सामाजिक टिप्पणी अबैत अछि- चोरीकेँ “अशिक्षा आ गरीबी सँ उत्पन्न” सामाजिक व्याधि कहल जाइत अछि, जकर समाधान दण्ड नहि, समुचित व्यवस्था थिक।
अंतमे भाँट लोकनि ‘गमछा’ ओछा क’ दर्शकसँ दान मँगैत छथि-ई मात्र लोक-कलाकारक पारिश्रमिक-संग्रहक यथार्थ-चित्रण नहि, अपितु कला आ जीविकाक सम्बन्धक एक मार्मिक स्वीकृति थिक। समापन-गीतक पंक्ति-“बुद्धि सँ नईँ पैघ कोनो बल होइ छै”-समग्र नाटकक थीसिस-वाक्य थिक, जे शीर्षकक ‘ज्ञान झाक खिस्सा’केँ सार्थक करैत अछि।
नव्य-न्यायक कोणसँ देखी तँ एहि नाटकक केन्द्रीय मूल्य ‘बुद्धि’ वस्तुतः ‘प्रमा’ (यथार्थ-ज्ञान) आ ‘युक्ति’क महिमा थिक- गोनूक प्रत्येक विजय कोनो भौतिक बलक नहि, अपितु अनुमान, ऊह आ तर्कक विजय थिक। हास्यक आवरणमे एतय ज्ञान-मीमांसाक एक देशज प्रतिष्ठापन अछि।
३.२ बिदापत
‘बिदापत’ (अर्थात विद्यापतिक लोकोच्चारित रूप) कुणालक रचना-कौशलक सर्वाधिक परिष्कृत उदाहरण थिक। शीर्षक-पृष्ठ एकरा “लोकनाट्य शिल्प-आधारित नाटिका” कहैत अछि, मुदा एकर शिल्प वास्तवमे शास्त्रीय आ लोक-दुनू नाट्य-परम्पराक संश्लेषण थिक। नाटक ‘पूर्वरंग’सँ आरम्भ होइत अछि, सूत्रधार-नटीक शास्त्रीय संवाद-विधि अपनाओल गेल अछि, आ संग-संग समाजी (कोरस), विदूषक-सदृश ‘विपटा’ आ ‘नटुआ’ सन लोक-रंगमंचक पात्र सेहो उपस्थित छथि।
एहि नाटकक सर्वाधिक उल्लेखनीय शिल्प-विशेषता थिक स्वयं विद्यापतिक पदक सघन, सावधान आ अर्थपूर्ण प्रयोग। शिवस्तुति, भैरवी-वंदना, वसंत-वर्णन (“नव वृन्दावन, नव-नव तरुगण... विहरइ नवल किशोर”), विरह-पद (“चाँद सार लए मुख घटना करू, लोचन चकित चकोरे”) आ अवहट्ट-शैलीक समापन-पद-ई सभ कथाक प्रवाहमे एना गूँथल अछि जे नाटक एक प्रकारे विद्यापति-पदक रंगमंचीय भाष्य बनि जाइत अछि।
कथा-वस्तु विद्यापतिक जीवनकेँ तीन सम्बन्ध-तन्तुक माध्यमसँ बुनैत अछि-आश्रयदाता-मित्र शिवसिंह, हुनक रानी लखिमा आ सेवक उगना (जे स्वयं महादेव छलाह)क प्रसिद्ध लोक-कथा। नाटकक अंतिम अंश अत्यंत मार्मिक अछि-ओइनीक युद्धमे शिवसिंहक अंतर्धान, लखिमाक ओ हठ जे ओ पतिकेँ मृत मानबासँ अस्वीकार करैत प्रतीक्षारत रहैत छथि, आ विद्यापतिक आजीवन शोक। एतय लखिमा सती-छविमे नहि, अपितु एक दृढ़, स्वाभिमानी प्रतीक्षारत स्त्रीक रूपमे प्रस्तुत भेल छथि-ई पारम्परिक आख्यानक एक सूक्ष्म पुनर्पाठ थिक।
नाटकक ध्वनि-व्यंजना (काव्यशास्त्रीय ‘ध्वनि’) एकर समापनमे चरम पर पहुँचैत अछि-विद्यापति कहैत छथि जे ओ अपन ‘पद’मे जीवित रहताह, आ संग-संग शिवसिंह, लखिमा, विपटा, नटुआ-उगना सेहो अमर रहताह। एतय करुण-रसक तल नीचाँ शान्त-रसक एक गहींर धारा बहैत अछि-मृत्यु-शोकक ऊपर काव्यक चिरंजीविताक प्रतिष्ठा। समग्रतः ‘बिदापत’ विद्यापतिकेँ संस्थागत साहित्येतिहासक ‘महाकवि’क प्रतिमासँ उतारि क’ लोक-रंगमंचक जीवित नायकक रूपमे पुनः-प्रतिष्ठित करैत अछि-ई विदेह समानांतर-इतिहास-दृष्टिक एक उत्कृष्ट नाट्य-निदर्शन थिक।
३.३ कुसमा-सलहेस
शीर्षक-नाटक होएब एकर केन्द्रीयताक मात्र संयोग नहि-कलात्मक आ वैचारिक, दुनू दृष्टिसँ ई संग्रहक हृदय थिक। शीर्षक-पृष्ठ एकरा “महागाथा (राजा सलहेस) आ लोक-नाट्य (सलहेस नाच) पर आधारित नाटक” कहैत अछि। राजा सलहेस मिथिलाक दुसाध (दलित) समुदायक लोक-देवता-नायक थिकाह आ ‘सलहेस नाच’ ताहिसँ जुड़ल लोक-रंगमंच। एहि स्रोत-चयने स्वयं एक सांस्कृतिक-राजनीतिक वक्तव्य थिक-कुणाल मिथिलाक अभिजन-केन्द्रित साहित्य-परम्पराक बदला एक सबाल्टर्न (अधीनस्थ/वंचित) महागाथाकेँ अपन सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी नाटकक आधार बनबैत छथि।
नाटकक पात्र-विधान एक पूर्ण महाकाव्यात्मक विस्तार लैत अछि-नायक सलहेस (महिसौथाक राजा), नायिका कुसमा (मालिन), कथा-संवाहक सूग्गा हिरामन, नाचक विदूषक विपटा, सलहेसक पशु-सहचर बाघ ‘ठनका’ आ भालु ‘बनका’, योगिनी मालिन-बहिनी, मोरंग-भोट-बाघगढ़-समदागढ़ सन अनेक राज्य, आ साक्षात देवी दुर्गा। ई विस्तार सलहेस-नाचक मूल लोक-संरचनाकेँ-पूर्वरंग, सुमिरन, समाजी-गायन, दृश्य-दर-दृश्य भौगोलिक यात्रा-यथावत संजोगि क’ राखैत अछि।
नाटकक आरम्भिक ‘सुमिरन’ एक अद्भुत समन्वयवादी (syncretic) घोषणा थिक-एहिमे देवता, बाबा-डीहबार, गुरु-गोसाँइ, उगैत सूर्य, गंगा, गोरा-पार्वतीक संग-संग पछिम दिस ‘मीरा-सुलतान’ (एक मुस्लिम पीर)केँ सेहो सुमिरल जाइत अछि, आ अंतमे “सकल समाज” तथा “जन-गन-मन”केँ। दर्शककेँ कएल अभिवादन सेहो ओतबे समावेशी अछि-“परिनाम, नमस्ते, आदाब, गुड इवनिंग, सलाम”। ई समन्वयवाद दुसाध सलहेस-परम्पराक अपन सांस्कृतिक चरित्र थिक, जकरा कुणाल पूर्ण निष्ठासँ रंगमंच पर अनैत छथि।
नायिका कुसमाक आत्म-परिचय-जे राजकन्या भेलहुँ मुदा महल छोड़ि वन-वासिनी मालिन बनलहुँ-गहींर लोक-काव्यात्मक छटासँ भरल अछि; जनकपुर, कमरू-कामाख्या, विसुनपुरक तीर्थ-यात्राक स्मृति आ बारह बरखक अवस्थामे देखल दुर्गाक स्वप्न-वचन एकर भाव-भूमि बनबैत अछि। मुदा नाटकक केन्द्रीय द्वन्द्व प्रेमक नहि, अपितु प्रेम बनाम सत्ता-लोलुपताक थिक।
एहि द्वन्द्वक चरम तखन अबैत अछि जखन विस्तारवादी सम्राट सूचोंग सलहेसकेँ रंगीलागढ़क कारागारमे लोहाक बेड़ीमे बान्हि लैत अछि आ समस्त मिथिला पर एकछत्र राजक स्वप्न देखैत अछि। सलहेसक उत्तरमे एहि नाटकक आत्मा बाजैत अछि-“हमर प्राण अहाँक मुट्ठी मे भ’ सकैए सम्राट। मुदा हमर विचार आ भावना केँ बान्हल नईँ जा सकैए। नहि रहता सलहेस मुदा भयमुक्त जीवनक मंत्र सँ भरल जनता रहतै।” एहि एक संवादे सलहेसक दुसाध लोक-देवताकेँ कुणाल एक जन-नायक, अभय आ स्वातंत्र्यक प्रतीक बना दैत छथि, आ मालिन-बहिनी लोकनिकेँ शान्ति-करुणा-स्नेह-आनन्दक तथा ‘लोक-कल्याण’क मूर्ति।
नाटकक समापन एक समवेत गायन-नृत्यमे होइत अछि आ ओ अमर टेक उभरैत अछि-“प्रेम सत्य छै, प्रेम छै सौरभ, प्रेमक भाव चिरंतन, बिनु मकरंदक कुसुम हो तहिना, प्रेम बिना की जीवन।” एतय शृंगार-रस अपन लौकिक तलसँ ऊपर उठि क’ एक विश्वव्यापी मानवीय-तत्त्व बनि जाइत अछि-प्रेम एतय व्यक्ति-राग नहि, सृष्टिक शक्ति थिक। ई नाटक संग्रहक सर्वाधिक सबल कृति थिक-लोक-स्रोतक प्रामाणिकता, राजनीतिक चेतना आ काव्यात्मक उत्कर्ष-तीनू एकठाम।
३.४ प्रेम-चतुष्टय : चारि पौराणिक नायिका
अंतिम चारि नाटक एक सुसंगठित विचार-शृंखला थिक। चारू एक्के नाट्य-व्याकरण साझा करैत अछि-मितव्ययी पात्र, बहु-भूमिका-अभिनय (एके अभिनेता द्वारा अनेक पात्रक अभिनय), स्तरित वा रिक्त मंच, सूत्रधार/उद्घोषकक कथन-शैली आ बीच-बीचमे विद्यापति-पदक प्रयोग। चारू पौराणिक/आख्यानमूलक नायिकाक माध्यमसँ आधुनिक मूल्य-स्त्री-कर्तृत्व, आत्मनिर्णय आ प्रेमक गरिमा-प्रस्थापित करैत अछि।
प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय! महर्षि भारद्वाजक पुत्री श्रुवावती विवाहक पारम्परिक मानदण्ड-सुन्दर, सम्पन्न, शौर्यवान वर-केँ अस्वीकार क’ कहैत छथि जे ओ विवाह तखने करतीह जखन कियो हुनका लेल साँचमे ‘अर्थवान’ भ’ जैताह। ओ अपनाकेँ “स्वतंत्र आ स्वावलंबी” व्यक्ति घोषित क’ परम्पराक ‘अपवाद’ बन’ चाहैत छथि। इन्द्र (वशिष्ठ-वेशमे) हुनका एक फलकेँ सूर्यास्तसँ पूर्व सिद्ध करबाक परीक्षा दैत छथि; फल पाथर बनि जाइत अछि, मुदा प्रेम-स्मृति-विहीन जीवनकेँ निरर्थक मानि श्रुवावती स्वयं चितामे प्रवेश करबाक संकल्प लैत छथि-आ ओकर एहि आत्मबले इन्द्रकेँ झुकाबैत अछि। नाटकक थीसिस-“आत्मबल, मनुष्यक सब सँ पैघ संपत्ति अछि”। यद्यपि अग्नि-प्रवेशक रूढ़ि एहि नारीवादी पाठक संग किछु तनाव उत्पन्न करैत अछि (, तथापि एतय बलि नहि, संकल्पक शक्ति केन्द्रमे अछि।
विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह। महाभारतक सुकन्या-च्यवन-आख्यानक एहि रंगमंचीय रूपमे चपल, क्रीड़ामग्न राजकुमारी सुकन्या आ बामी-भीड़मे (वल्मीक) समाधिस्थ वृद्ध ऋषि च्यवनक प्रसंग अछि। आरम्भ विद्यापतिक वसंत-पद ‘आयल रितुपति राज बसंत’सँ होइत अछि। रानीक चिन्ता आ राजा शर्यातिक मुग्ध-वात्सल्यक बीच एक सूक्ष्म दार्शनिक संवाद अबैत अछि-“जैँ आहाँ आँखि मुनि ली तैँ ओ वृक्ष आहाँ केँ नईँ देखायत... परंतु सब किछु उपस्थित अछि।” ई संवाद ज्ञान आ ज्ञेयक भेदकेँ रंगमंच पर अनैत अछि-अनुपलब्धि सत्ताक अभाव नहि थिक। नाटकक मर्म ‘विश्वास’ थिक-सुकन्याक निष्ठे च्यवनकेँ नव यौवन दिआबैत अछि।
प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक आविष्कार। ई चतुष्टयक सर्वाधिक मौलिक कल्पनावला नाटक थिक। राजनर्तकी श्वेता सात बरखक कठोर साधनाक बाद राजा अतिरथक प्रति अनुरक्त भ’ जाइत छथि। मुदा अतिरथ कलाक प्रति ‘निरपेक्ष’ (विरक्त) रहैत छथि-ओ कलाकेँ देहसँ फराक क’ देखबाक ‘नीर-क्षीर विवेक’क पक्षधर छथि आ घोषणा करैत छथि जे “प्रेम करब तँ नितांत मूर्खता थिक”। श्वेता प्रत्युत्तरमे कवि-वचन उद्धृत करैत छथि-“कुसुम बिना मकरंद तहिना प्रेम बिना की जीवन” (ध्यातव्य: यैह सूत्र ‘कुसमा-सलहेस’क समापन-टेक छल), आ संकल्प लैत छथि जे ओ ‘निरपेक्ष’ राजाकेँ स्वयं प्रेमक प्रस्ताव करबाक लेल बाध्य करतीह। ‘आविष्कार’ शब्दक द्व्यर्थता एतय सटीक अछि-श्वेता प्रेमक आविष्कार करतीह आ अपन कर्तृत्वक सेहो। नर्तकी सन परम्परासँ ‘वस्तु’ बनाओल चरित्रकेँ कुणाल एतय ‘कर्ता’ बना दैत छथि-ई एकर प्रमुख उपलब्धि थिक।
प्रेमक परीक्षा उर्फ सुप्रभा आ अष्टावक्र। अष्टावक्र (अष्ट-वक्र-आठ ठाम वक्र शरीरवला) ऋषि आ महर्षि वदन्यक पुत्री सुप्रभाक गाढ़ अनुरागक एहि कथामे ‘परीक्षा’ केन्द्रमे अछि। वदन्य अष्टावक्रकेँ स्वर्गमे उर्वशीक सान्निध्यमे पठा क’ सुप्रभाक निष्ठाक परीक्षा लैत छथि-सुप्रभा अन्य राजासँ स्वयंवरक प्रस्ताव अस्वीकार करैत मात्र “अष्टावक्रक प्रतीक्षा” करबाक हठ रखैत छथि। अष्टावक्र उर्वशीकेँ अस्वीकारि क’ लौटैत छथि आ दुनूक विवाह होइत अछि। समापन-दोहा एकर मर्म कहैत अछि-“जहिना स्वर्ण मे आगि सँ आबए आर निखार / प्रेम, परीक्षा दैत अछि, तेँ होइछ आर प्रगाढ़।”
४. कुणालक नाट्य-शिल्प : लोकनाट्य, शास्त्र आ आधुनिकता
कुणालक रंगमंचीय भाषाक सब सँ बड़का विशेषता थिक तीन परम्पराक सायास संश्लेषण। एक दिस ओ शास्त्रीय संस्कृत-नाट्यक उपकरण-पूर्वरंग, सूत्रधार-नटी, नांदी-सदृश वंदना-अपनबैत छथि; दोसर दिस मिथिलाक लोक-रंगमंचक (‘नाच’) तत्त्व-समाजी (कोरस), विदूषक ‘विपटा’, सूग्गा-कथावाचक, समवेत गायन-नृत्य, दर्शककेँ सोझ सम्बोधन आ रिक्त/स्तरित मंच-केँ केन्द्रमे रखैत छथि; आ तेसर दिस आधुनिक रंगमंचक आत्म-संदर्भिता आ ‘अलगाव’क प्रविधि उपस्थित अछि।
एहि अंतिम बिन्दु पर पश्चिमी नाट्य-चिन्तनक संदर्भ प्रासंगिक अछि। ब्रेख्तक ‘महाकाव्यात्मक रंगमंच’ (एपिक थिएटर) आ ओकर ‘विरचन/अलगाव-प्रभाव’-जाहिमे दर्शककेँ बेर-बेर स्मरण कराओल जाइत अछि जे ओ नाटक देखि रहल छथि- कुणालक रंगमंचमे लोक-रूपक स्वाभाविक अंग बनि क’ अबैत अछि। ‘चालिस चोर’क भाँट-वृत्त, भूमिका-त्याग आ वैकल्पिक-अंतक वाद-विवाद; ‘बिदापत’मे विपटाक बेर-बेरक टोकाटोकी “गड़ी आगाँ बढ़ाउ!”; आ ‘कुसमा-सलहेस’मे हिरामन-विपटाक मेटा-कथन-ई सभ ‘चतुर्थ भित्ति’केँ निरन्तर तोड़ैत अछि। उल्लेखनीय ई जे ब्रेख्त एहि प्रविधिकेँ पश्चिममे जतय अवांगार्द-प्रयोगक रूपमे प्रस्तुत कएलनि, ओतय मिथिलाक ‘नाच’मे ओ सदासँ अंतर्निहित छल- कुणाल यएह देशज-आधुनिकताकेँ उद्घाटित करैत छथि।
मंचनीयताक प्रति कुणालक सजगता असाधारण अछि। ‘चालिस चोर’क अंतमे ओ लिखैत छथि जे एहि नाटकक ४५-मिनट, ६०-मिनट आ एक-घंटा-तीन रूप अछि, आ एकर एक चारिम ‘ध्वनि-नाट्य’ (रेडियो-नाटक) शृंखलाक तेरह प्रकरण सेहो प्रसारित भेल। ओ ईहो सुझबैत छथि जे एक अभिनेता एकाधिक पात्रक अभिनय करथि। एहि सूचना सभसँ स्पष्ट अछि जे ई आलेख रंगमंचक व्यावहारिक आवश्यकताकेँ ध्यानमे राखि लिखल गेल-ई ‘अभिनय-योग्य’ पाठ थिक, ‘अभिनेय’क मात्र कल्पना नहि।
५. भाषा, छंद आ काव्य-सौंदर्य : रस-ध्वनि-वक्रोक्तिक कोण
कुणालक भाषा एकल नहि, अपितु बहुस्तरीय अछि। लोकनाट्य-त्रयीमे ओ ठेठ ग्रामीण मैथिली लोक-मुहावरा, अनुप्रास-बहुल तुकबन्दी आ गीत-शैलीक प्रयोग करैत छथि-जतय ‘हास्य’ आ ‘शृंगार’क लोक-रूप प्रधान अछि। प्रेम-चतुष्टयमे ओ अपेक्षाकृत तत्सम-प्रधान, संस्कृत-निष्ठ, परिनिष्ठित मैथिली अपनबैत छथि-जे आश्रम-वातावरण आ पौराणिक गरिमाक अनुकूल अछि। एहि भाषिक-कौशलमे कुणालक पात्र आ परिवेश-बोध स्पष्ट झलकैत अछि।
वक्रोक्ति-दृष्टिसँ लोकनाट्य-नाटक सभमे शब्द-वक्रता (कुन्तकोक्त ‘वक्रोक्ति’) चरम पर अछि-‘सरदारीक मुरेठा’ आ कुसमाक ‘लहठी’ (बेड़ी बनाम चूड़ी), ‘चुमाओन बनाम श्राद्ध’, ‘धूर्त-शिरोमणि’क उपाधि-एतय अर्थक दोहरापन आ श्लेष नाटकीय ऊर्जाक स्रोत थिक। ध्वनि-दृष्टिसँ ‘बिदापत’क समापन (‘पद’मे जीवन) आ ‘कुसमा-सलहेस’क प्रेम-टेक-दुनू अभिधासँ ऊपर उठि व्यंग्यार्थ (सूचित अर्थ)मे प्रतिष्ठित होइत अछि, जतय करुणक नीचाँ शान्त आ शृंगारक ऊपर अध्यात्म ध्वनित होइत अछि।
विद्यापति-पदक प्रयोग कुणालक एक सायास काव्य-नीति थिक-ई मात्र अलंकरण नहि, अपितु मिथिलाक काव्य-स्मृतिकेँ रंगमंचक जीवित अंग बना देबाक उपक्रम थिक। ‘बिदापत’मे ओ विद्यापति-पदक नाट्य-भाष्य रचैत छथि, तँ ‘सुकन्या’मे वसंत-पद वातावरण-निर्मितिक उपकरण बनैत अछि- एहि प्रकारे पद-परम्परा आ नाट्य-परम्परा एक-दोसरमे विलीन भ’ जाइत अछि।
६. नव्य-न्यायक दृष्टि : प्रमा, अभाव आ प्रामाण्य
एहि संग्रहमे ज्ञान-मीमांसाक अनेक सूत्र नाटकीय रूपमे विद्यमान अछि, जकर पाठ नव्य-न्यायक उपकरणसँ कएल जा सकैत अछि। ‘चालिस चोर’मे गोनूक प्रत्येक विजय अनुमान आ युक्तिक-अर्थात ‘प्रमा’क-विजय थिक; बल बनाम बुद्धिक द्वन्द्वमे नाटक प्रमाण-व्यापारकेँ सर्वोपरि घोषित करैत अछि।
‘सुकन्या’क ओ संवाद-“आँखि मुनि लेला पर वृक्ष नईँ देखायत, मुदा सब किछु उपस्थित अछि”-नव्य-न्यायक एक केन्द्रीय अन्तर्दृष्टिकेँ रंगमंच पर अनैत अछि-ज्ञानक अभाव विषयक सत्ताक अभाव नहि थिक (अनुपलब्धि ≠ अभाव)। इन्द्रिय-सन्निकर्षक अभावमे प्रत्यक्ष नहि होइत, मुदा वस्तु तँ रहिते अछि-ज्ञान आ ज्ञेयक ई भेद नाटकमे यथार्थ-स्वीकृतिक नैतिक तर्क बनि जाइत अछि।
‘श्रुवावती’क ‘अर्थवत्ता’-तर्क आ ‘अतिरथ’क ‘नीर-क्षीर विवेक’-दुनू वस्तुतः सम्बन्ध आ विशेषण-ज्ञानक प्रश्न उठबैत अछि- कोन गुण-धर्म कोन सम्बन्धमे ‘अर्थवान’ वा ‘ग्राह्य’ होइत अछि, ताहि पर। एहि अर्थमे कुणालक नाटक मनोरंजनक आवरणमे एक देशज ज्ञान-मीमांसाक संवाहक सेहो थिक।
एक वृहत्तर स्तर पर समग्र संग्रह ‘प्रामाण्य’क प्रश्न उठबैत अछि- लोक-ज्ञान आ लोक-स्मृतिक प्रामाणिकता। सलहेस-गाथा, गोनू-चक्र आ बिदापत-नाच-ई सभ ‘अप्रामाणिक’ लोक-वृत्तांत नहि, अपितु एक समानांतर ज्ञान-परम्पराक प्रमाण थिक- यएह एहि संग्रहक मौन प्रतिज्ञा थिक।
७. वैचारिक धरातल : विदेह समानांतर-इतिहासक परिप्रेक्ष्य
विदेह समानांतर-साहित्य-दृष्टिक परिप्रेक्ष्यमे एहि संग्रहक महत्त्व विशेष रूपसँ उद्घाटित होइत अछि। संस्थागत साहित्येतिहास जतय अभिजन-केन्द्रित, मुद्रित आ ‘शिष्ट’ परम्पराकेँ केन्द्रमे रखैत आएल अछि, ओतय कुणाल अपन सम्पूर्ण नाट्य-कर्मकेँ लोक-रंगमंच आ लोक-आख्यानक भूमि पर ठाढ़ करैत छथि-आ ओहि अनाम ‘नाच’-कलाकार लोकनिकेँ अपन समर्पणमे साहित्येतिहासक केन्द्रमे अनैत छथि जिनकर नाम कतहु अंकित नहि।
‘कुसमा-सलहेस’क दुसाध (दलित) लोक-देवता-नायककेँ एक जन-नायक, अभय आ स्वातंत्र्यक प्रतीक बना क’ प्रस्तुत करब एहि दृष्टिक सर्वाधिक प्रखर अभिव्यक्ति थिक- ई सबाल्टर्न-स्वरक रंगमंचीय प्रतिष्ठापन थिक। ‘बिदापत’मे महाकवि विद्यापतिकेँ संस्थागत प्रतिमासँ उतारि लोक-रंगमंचक जीवित नायक बनाएब; आ प्रेम-चतुष्टयमे पौराणिक नायिका सभकेँ-श्रुवावती, सुकन्या, श्वेता, सुप्रभा-आत्मनिर्णयकारी, कर्ता-स्त्रीक रूपमे पुनर्पाठ करब- ई सभ एक्के समानांतर-इतिहास-दृष्टिक विभिन्न आयाम थिक।
एहिमे जातीय (दलित-सबाल्टर्न), लैंगिक (स्त्री-कर्तृत्व) आ सांस्कृतिक (हिन्दू-मुस्लिम समन्वय) तीनू स्तरक प्रतिरोध एक्के संग सक्रिय अछि-मुदा कतहु नारेबाजीक रूपमे नहि, अपितु लोक-रूपक स्वाभाविक प्रवाहमे विलीन भ’ क’। यएह कुणालक वैचारिक परिपक्वताक प्रमाण थिक।
८. सीमा आ जिज्ञासा
सातो नाटकक सीमा, कमी आ वैचारिक तनाव
प्रास्ताविक : आलोचनाक आवश्यकता
एक सन्तुलित साहित्यिक विवेचना केवल गुणगानसँ पूर्ण नहि होइत। कुणालक ‘कुसमा-सलहेस आ अन्य छओ गोट नाटक’ मैथिली नाट्य-साहित्यक एक उल्लेखनीय संग्रह थिक- यएह सिद्ध होइत अछि एहि तथ्यसँ जे सातो नाटक बेर-बेर मंचित भेल, ‘भंगिमा’ आ ‘अंतिका’मे प्रकाशित भेल, आ अंततः एक पुस्तक-संग्रहमे आएल। मुदा यएह प्रतिबद्धता पाठक-समीक्षककेँ उत्तरदायी सेहो बनाबैत अछि- नाटकक उपलब्धि जतेक तीव्र, ओकर सीमाक स्वीकृति ओतबे ईमानदार होएबाक चाही।
सातो नाटकक कमजोरी, वैचारिक तनाव, शिल्प-सीमा आ पुनरावृत्ति-दोषकेँ नाटकक आलोचनाक उद्देश्य खण्डन नहि, भावी नाट्य-लेखनक लेल रचनात्मक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत केनाइ थिक।
संरचनागत सीमा- संग्रहक असमान स्केल आ लय-भंग
संग्रहक सर्वाधिक स्पष्ट संरचनागत समस्या थिक- सातो नाटकक आकार-वैषम्य। ‘कुसमा-सलहेस’ लगभग ७० पृष्ठक विराट नाटक थिक; ‘प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय!’ मात्र १४ पृष्ठमे समाप्त भ’ जाइत अछि। पाठक/ भावी निर्देशक जखन ‘कुसमा-सलहेस’क बाद ‘श्रुवावती’ उठाबैत अछि, तखन ओकरा एक ‘महाकाव्यात्मक संसार’सँ एकाएक एक ‘लघु-चेम्बर पीस’मे जाए पड़ैत अछि। ई संक्रमण सुखकर नहि।
तुलना कएल जाए-
‘चालिस चोर आ गोनू झा’ = ७४ पृष्ठ · ‘बिदापत’ = ४८ पृष्ठ · ‘कुसमा-सलहेस’ = ७० पृष्ठ · ‘श्रुवावती’ = १४ पृष्ठ · ‘सुकन्या’ = २६ पृष्ठ · ‘श्वेता’ = १८ पृष्ठ · ‘सुप्रभा-अष्टावक्र’ = २८ पृष्ठ।
संग्रहक आरम्भिक तीन नाटकक औसत ६४ पृष्ठ आ अंतिम चारिक औसत २१ पृष्ठ थिक। ई एक पुस्तक-रचना (book-architecture)क समस्या थिक-ई दुनू समूह किछु भिन्न पुस्तकक विषय-वस्तु लगैत अछि, एकहि लाटमे भेलासँ पाठ-अनुभवमे अटपट लगैत अछि।
‘उर्फ’ शीर्षक-साँचाक एकरसता
प्रेम-चतुष्टयक चारू नाटकक शीर्षक एक्के साँचमे ढलल अछि-‘[अमूर्त-भाव] उर्फ [नायिकाक नाम]क [क्रिया-शब्द]’। ई साँच पहिले तीन नाटकमे नवीन लगैत अछि (शास्त्रीय भाव + लोक-उद्घोष), मुदा चारिम बेर दुहराएब एक यांत्रिकता उत्पन्न करैत अछि। पाठक शीर्षक पढ़िते ‘फॉर्मूला’ बुझि लैत अछि; विस्मय नहि होइत अछि।
तुलना करू-‘बिदापत’ (एक शब्द, अनेक अर्थक सघनता) - ‘कुसमा-सलहेस’ (दू पात्रक नाम, महाकाव्यात्मक)- ई दुनू शीर्षक अपन नाटकक जीवन्तता धारण करैत अछि। ‘प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक आविष्कार’ एक अपेक्षाकृत नाम आ सूत्र-बद्ध शीर्षक थिक। ई शीर्षक-क्रमिकता प्रेम-चतुष्टयमे एक सीमा थिक।
नाटक-वार कमी आ वैचारिक तनाव
चालिस चोर आ गोनू झा
क. मेटाथिएटरक अतिरेक
एहि नाटकक मेटाथिएटरीय उपकरण-भाँटक वाद-विवाद, वैकल्पिक-अंत, दर्शककेँ सम्बोधन-नाट्य-शिल्पक दृष्टिसँ प्रशंसनीय थिक। मुदा नाटकक अंतिम दृश्यमे भाँट लोकनि जखन ‘चोरी एक सामाजिक व्याधि थिक, अशिक्षा आ गरीबीसँ उत्पन्न’ कहैत छथि, तखन ई सन्देश नाटकीय रूपसँ ‘बताएब’मे बदलि जाइत अछि। भरतमुनि जे कहलाह-नाटक ‘देखाबैत’ अछि, ‘कहैत’ नहि- एहि मानदण्डपर ई अन्तिम दृश्य कमजोर पड़ैत अछि। सन्देश-निहित पाठ स्वयं रंगमंचीय क्रियासँ स्पष्ट भ’ जएबाक चाही; एहि लेल भाँटक मुखर व्याख्या अनावश्यक थिक।
ख. चोर-पात्रक द्वि-आयामिता
गोनू झाक तुलनामे चालिस चोर (विशेषतः दुरमतिया आ देबहा) मात्र हास्य-साधन बनि रहि जाइत छथि। हुनकर गरीबी-अशिक्षाक ओ ‘सामाजिक व्याधि’, जकरा नाटकार स्वयं अन्तमे स्वीकार करैत छथि, नाटकक भीतर कोनो नाट्यात्मक गहराई नहि पाबैत अछि। ई एक विरोधाभास थिक- अंतमे एक प्रगतिशील सामाजिक व्याख्या दैत नाटककार, परंतु पूरा नाटकमे चोर लोकनि केवल ‘हँसाओल जाएवला वस्तु’ बनल रहि जाइत छथि। सामाजिक-यथार्थवादी नाट्य-लेखन एहि विरोधाभासकेँ दूर करैत, चोरक दारिद्र्यकेँ कोनो दृश्यमे मानवीय बनाबैत अछि।
ग. गमछा-प्रसंग द्विअर्थीय
गमछा ओछा क’ दान माँगबाक दृश्य एकहि संग दू अर्थमे कार्य करैत अछि- एक ब्रेख्तीय ‘पारदर्शिता’ (कलाकारक आर्थिक भेद्यता उजागर करनाइ) आ दोसर एक ‘राजकीय कला-संरक्षण’क आलोचना। मुदा नाटककार एहि दुनू अर्थमे सँ कोनो एककेँ पूर्ण रूपेण नहि विकसित करैत छथि- ई प्रसंग लोक-परम्पराक यांत्रिक पुनरावृत्ति जेकाँ लागैत अछि, एक सायास नाट्य-निर्णय जेकाँ नहि।
बिदापत
क. विपटाक ‘गड़ी आगाँ बढ़ाउ’ : हास्यसँ व्याघातक ओर
विपटाक ‘गड़ी आगाँ बढ़ाउ’ उद्घोष-विधि सबसँ पहिले एकटा टटका लोकनाट्य-युक्ति थिक। मुदा ई वाक्य नाटकभरि एत्ते बेर दोहराओल गेल अछि जे ओ एक ब्रेख्तीय ‘विरचन-प्रभाव’ रहबाक बदला एक यांत्रिक व्यवधान बनि जाइत अछि। दर्शक जखन जनैत अछि जे विपटा बेर-बेर यएह कहत, तखन ओहि कथनक आश्चर्य-तत्त्व समाप्त भ’ जाइत अछि। ब्रेख्तक विरचन-प्रभाव तखने काज करैत अछि जखन ओ अनपेक्षित होए- एहि नाटकमे ओ अत्यन्त प्रत्याशित भ’ जाइत अछि।
ख. उगना-महादेव प्रसंगक अपूर्णता
उगना वास्तवमे महादेव छलाह- एहि महत्त्वपूर्ण लोक-कथाकेँ नाटकमे एक केन्द्रीय भावात्मक क्षण हेबाक चाही। मुदा एहि नाटकमे उगनाक महादेव-पहचान एक अन्य चरित्रक मुखसँ ‘रिपोर्ट’ (अमियकरक कथन) क रूपमे अबैत अछि, प्रत्यक्ष नाट्य-क्रियाक रूपमे नहि। एहि कारणे एहि क्षणक भावात्मक प्रभाव (जे विद्यापति-भक्तिमे एक दिव्य-क्षण थिक) सम्पूर्ण रूपसँ उभरि नहि पाबैत अछि।
ग. ऐतिहासिकता-काव्यता द्वन्द्व
नाटक ई.सं. १४००–१४५० धरिक ‘ऐतिहासिक’ समय-सीमा घोषित करैत अछि, मुदा नाट्य-संरचना सर्वत्र काव्यात्मक-लोक-शैलीमे अछि। एहि दुनूक मध्य तनाव कखनो-कखनो प्रकट होइत अछि- जेना जौनपुर-दरबारक दृश्य एक ऐतिहासिक यथार्थ थिक मुदा ओकरा अमियकरक ‘स्वाँग’ (हास्य-अभिनय)मे प्रस्तुत केनाइ एहि यथार्थकेँ हल्लुक कऽ दैत अछि। नाटककारक ऐतिहासिक-काव्यात्मक संतुलन कखनो-कखनो डोलैत अछि।
कुसमा-सलहेस
क. खलनायक-वर्ग (सूचोंग-चूहड़)क एकआयामिता
संग्रहक सर्वाधिक महत्त्वाकांक्षी नाटकमे खलनायक-वर्गक चित्रण एकआयामी भ’ गेल अछि। सूचोंग, चूहड़मल्ल, तरुमल्ल- तीनू मात्र ‘दुष्ट-गुण’क संकलन मात्र थिकाह, कोनो अन्तर्द्वन्द्व, कोनो मानवीय जटिलता हुनका सभमे नहि अछि। जखन बुधेसरकेँ ओ लोकनि यातना दैत छथि, तखन समवेत-हँसी (हो... हो...) आ क्रूरताक एक सतही चित्रण अछि। महाकाव्यात्मक नाटकमे उत्कृष्ट खलनायक वएह होइत अछि जे दर्शककेँ अपन नजरिसँ सहमत भ’ जाएपर विवश करए; एहि नाटकमे एहन जटिलता अनुपस्थित अछि।
ख. भूगोल-विस्तारसँ नाट्य-केन्द्रीयताक क्षय
नाटकमे स्थान-परिवर्तन अत्यधिक अछि- महिसौथा, मोरंग, भोट, बाघगढ़, समदागढ़, रेवा-दाह, रंगीलागढ़। ई भौगोलिक विस्तार महागाथाक प्रामाणिकता प्रकट करैत अछि, मुदा नाट्य-रचनाक दृष्टिसँ एहिसँ कथाक केन्द्रीयता-कुसमा-सलहेसक प्रेम-कथा-प्रायः पृष्ठभूमिमे चलि जाइत अछि। मोरंग-राजाक युद्ध-प्रसंग आ भोट-आक्रमणक विवरणक कारणे नायिका कुसमा बेसी काल तक मंचसँ अनुपस्थित रहैत छथि। महाकाव्यात्मक विस्तार आ नाट्यात्मक केन्द्रीयताक बीच संतुलन पूर्णतः साधल नहि गेल।
ग. समन्वयवादी सुमिरन आ सांस्कृतिक विसंगति
नाटकक आरम्भमे ‘मीरा-सुलतान’केँ सुमिरल जाएब एक सुन्दर समन्वयवादी भाव थिक। मुदा ओहि सुमिरनमे जे दुसाध सलहेस-परम्पराक अपन सांस्कृतिक तत्त्व (वनदेवी, पशु-मित्र, दुसाध लोक-कथाक विशिष्ट शब्दावली) थिक, ओ ‘जन-गण-मन’क सन्दर्भसँ किञ्चित असंगत लागैत अछि। समन्वयवाद अत्यन्त सुन्दर उद्देश्य थिक, मुदा एहि नाटकक संदर्भमे ओकर विस्तार सुमिरनके ‘सर्व-धर्म-समभाव प्रदर्शन’क रूपमे बनाबैत अछि, एक प्रामाणिक दुसाध-धार्मिक-आह्वानक रूपमे कम।
प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय!
क. अग्नि-प्रवेश : नारीवादी पाठक संग संरचनात्मक तनाव
एहि नाटकक सबसँ गम्भीर वैचारिक तनाव अछि- श्रुवावती एक दिस ‘स्वतंत्र-स्वावलम्बी व्यक्ति’ घोषित करैत छथि अपनाकेँ, आ दोसर दिस जखन फल सिद्ध नहि होइत तखन ‘प्रियक स्मरण करैत आग्नि-प्रवेश करब’क संकल्प लैत छथि। नाटक एहि अग्नि-प्रवेशकेँ ‘आत्मबल’क प्रकटीकरण कहैत अछि, मुदा बलिदान-केन्द्रित प्रतीक स्वयं एक पितृसत्तात्मक रूढ़िक अनुसरण थिक। स्वाधीन स्त्री जीवनक माँग करैत अछि, मृत्युक नहि। ई वैचारिक विरोधाभास नाटकमे नहि सोझरल अछि।
तुलना करू : सुकन्या (नाटक-५) अपन पिताक श्राप-परिणामक जिम्मेदारी लैत छथि आ जीवनक मार्ग चुनैत छथि; अष्टावक्र (नाटक-७) उर्वशीकेँ अस्वीकार क’ जीवित प्रेमकेँ चुनैत छथि। एहि दुनूक तुलनामे श्रुवावतीक चिता-संकल्प एक कमजोर नाट्य-समाधान थिक।
ख. इन्द्रक तीन वेश : दोहराव आ विश्वसनीयता-क्षय
इन्द्र पहिले ‘प्रत्यक्ष’ आबैत छथि (परिचय देबैत छथि), तखन ‘वृद्ध’ बनिक’ अबैत छथि, तखन ‘वशिष्ठ’ बनिक’। ई तीनू वेश दोहराओल संरचनामे (श्रुवावती हर बेर अस्वीकार करैत छथि) एक नाट्य-लय उत्पन्न करैत अछि जे अत्यन्त पूर्वानुमेय भ’ जाइत अछि। तेसर वेश-दृश्य (वशिष्ठ) मूलतः दोसर वेश-दृश्यक (वृद्ध) दुहराव थिक। दुनूमे श्रुवावती अस्वीकार करैत छथि, दुनूमे इन्द्र क्रुद्ध होइत छथि। एहि दोहरावसँ नाट्य-तनावमे विस्तार नहि, क्षय होइत अछि।
ग. दुष्यन्त कुमारक उर्दू शेर : बाहरी तत्त्व-सम्मिलनक दिक्कत
नाटकक समापनमे दुष्यन्त कुमारक हिन्दी-उर्दू शेर (‘कौन कहता है कि आसमाँ में सुराख हो नहीं सकता’) सांस्कृतिक-भाषाई समृद्धिक एक अभिव्यक्ति थिक। मुदा एहि मैथिली पौराणिक नाटिकाक संदर्भमे ओ किञ्चित असंगत सेहो लागैत अछि। जँ कोनो काव्य-पंक्ति उद्धृत करबाक आवश्यकता छल, तँ मैथिली काव्य-परम्परामे एहन शेर उपलब्ध अछि। ई एक छोट मुदा विशिष्ट शिल्प-प्रश्न थिक।
विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह
क. वय-भेद आ नैतिक असुविधा
नाटकक भीतरसँ स्वयं एहि तनावकेँ स्वीकार कएल गेल अछि- कोरसक गायन-“सोरह बरिसक अलकेसरि धीआ, च्यवनक वयस हैजार”। ई गायन वय-भेदक नैतिक असुविधाकेँ मनोरंजक ढंगसँ प्रकट करैत अछि, मुदा एहि असुविधाक कोनो समाधान नाटकमे नहि अछि। च्यवन अपन वयस आ क्षमताक समक्ष आश्वस्त छथि; राजा विवशतासँ सहमत छथि; सुकन्या स्वेच्छासँ स्वीकार करैत छथि। मुदा एहि सहमतिक नैतिक आधारकेँ नाटक पर्याप्त रोपेँ विकसित नहि करैत अछि।
ख. अश्विनी कुमार-दृश्यक अत्यधिक लम्बाई
अश्विनी कुमारक प्रथम प्रवेश, तकर बाद पुनः प्रवेश, क्षमा-याचना, उर्वशी-तुलना, श्रापक धमकी, पुनः भेंट, आ सोमरस-प्रसंग-ई सम्पूर्ण क्रम नाटकक कुल लम्बाईक एक पैघ भाग ल’ लैत अछि। मुख्य प्रेम-कथा (सुकन्या-च्यवनक सम्बन्ध-विकास) एहि हास्य-प्रसंगसँ अपेक्षाकृत कम स्थान पाबैत अछि। नाट्यात्मक अर्थव्यवस्थाक दृष्टिसँ अश्विनी-प्रसंगक एक दृश्य हटा क’ मुख्य-दम्पती-सम्बन्धकेँ अधिक विस्तार दैत तँ नाटक अधिक सन्तुलित होइत।
ग. ‘च्यवनप्राश’ टिप्पणी : समय-विभाजनक खतरा
सूत्रधारक ‘च्यवनप्राश बला च्यवन’ टिप्पणी एक पल हास्यपूर्ण लागैत अछि। मुदा ई आधुनिक-उपभोक्ता-संस्कृतिक सन्दर्भ पौराणिक वातावरणमे एक ‘टाइम-रिफ्ट’ (समय-विभाजन) उत्पन्न करैत अछि। यदि ई सायास छल-एक ब्रेख्तीय विरचन-प्रभाव-तँ ओहि नाट्य-उद्देश्यकेँ नाटकक भीतर अधिक सुसंगत रूपसँ प्रयोग भेबाक चाहियनि।
प्रेमक विस्तार उर्फ श्वेताक आविष्कार
क. अतिरथक परिवर्तन : गतिशास्त्रक समस्या
नाटकक सर्वाधिक गम्भीर शिल्प-सीमा थिक-अतिरथक मनोवैज्ञानिक रूपान्तरण अत्यन्त शीघ्र होइत अछि। एक दिस नाटककार अतिरथकेँ ‘सात-आठ बरखसँ’ निरपेक्ष, ‘सब स्वयंवरसँ एकसरे घुरनिहार’ राजा चित्रित करैत छथि; दोसर दिस श्वेताक जल-समाधिक समाचार पाबिते ओ नदी-तट दिस दौड़ि पड़ैत छथि आ अरण्यमे भेंट होइतहि मुकुट उतारि दैत छथि। दशकों-पुरान ‘निरपेक्षता’ एक्के दृश्यमे विघटित भ’ जाइत अछि। एहि रूपान्तरणकेँ तैयार करएवला पर्याप्त नाट्य-आधार (psychological groundwork) नाटकमे नहि अछि।
‘बेमन भ’ गेलाह अतिरथ’, ‘सब कृत्रिम सन’, ‘सब प्राणहीन कठपुतरी सन’- उद्घोषकक ई भाष्य अतिरथक परिवर्तनक ‘कारण’ बताबैत अछि, मुदा ई ‘बताएब’ थिक, ‘देखाएब’ नहि।
इब्सेनक ‘हेड्डा गेब्लर’ वा चेखवक ‘थ्री सिस्टर्स’मे पात्रक मनोवैज्ञानिक परिवर्तन आस्ते-आस्ते, दृश्य-दर-दृश्य सिद्ध होइत अछि। ‘श्वेताक आविष्कार’मे अतिरथक परिवर्तन-यात्रा उद्घोषकक वर्णनपर अत्यधिक निर्भर अछि, प्रत्यक्ष नाट्य-क्रियापर कम।
ख. मूल-कथाक स्रोत-अभाव
श्वेता-अतिरथक कथाक कोनो पौराणिक वा ऐतिहासिक स्रोत नहि अछि-ई सर्वथा कुणालक स्वतंत्र कल्पना थिक। ई अपनेमे एक गुण थिक (मौलिकता)। मुदा एहिसँ उत्पन्न एक कमजोरी सेहो अछि-नाट्य-कथाकेँ जे ‘भार’ आ ‘विश्वसनीयता’ एक पौराणिक स्रोत दैत अछि (जेना अन्य छह नाटकमे), ओ एहिमे अनुपस्थित अछि। ‘राजनर्तकी’ आ ‘निरपेक्ष राजा’क कथा एक लोकप्रिय नाट्य-साँचा (trope) थिक जे अनेक भारतीय भाषाओंमे पहिनहियो लिखाएल अछि।
प्रेमक परीक्षा उर्फ सुप्रभा आ अष्टावक्र
क. वदन्यक प्रेरणा : अव्याख्यायित अस्वीकार
महर्षि वदन्यक अष्टावक्र-अस्वीकारक वास्तविक कारण नाटकमे कहियो स्पष्ट नहि होइत अछि। ओ कहैत छथि-“स्पष्टीकरण देब हमर बाध्यता नहि”। एहि ‘रहस्य’केँ नाटककार एक उपकरण बनाबैत छथि, मुदा एहिसँ वदन्यक चरित्र मनोवैज्ञानिक रूपसँ ‘खोखला’ रहि जाइत अछि। अस्वीकारक कारण ज्ञात नहि भेलासँ दर्शककेँ परीक्षाक ‘दाँव’ पूर्ण रूपसँ बुझाइत नहि अछि। वदन्य एक कार्यकारी (functional) पात्र बनि जाइत छथि, एक जीवित चरित्र नहि।
ख. सुप्रभाक नाट्य-उपस्थिति : असमान
शीर्षकमे सुप्रभाक नाम अष्टावक्रसँ पहिने अछि (‘सुप्रभा आ अष्टावक्र’), मुदा नाटकक पहिल अर्धांश अष्टावक्रकेँ समर्पित अछि। सुप्रभा दशम-एकादश दृश्यमे (बारह दृश्यमेसँ) मात्र मंचपर अबैत छथि। बारहम दृश्य (उर्वशी-प्रसंग) मे ओ अनुपस्थित छथि। यदि नाटकक शीर्षक सुप्रभाकेँ प्राथमिकता दैत अछि, तँ नाट्य-संरचना ओहि प्राथमिकताकेँ प्रतिबिम्बित नहि करैत अछि।
ग. वंदी-रहस्य : एक महत्त्वपूर्ण नाट्य-अवसरक क्षय
वंदी वास्तवमे वरुण-पुत्र छथि, आ ‘जल-समाधि’ वस्तुतः विद्वान लोकनिकेँ यज्ञक लेल जल-देवताक आश्रयमे राखनाइ छल-यैह रहस्य एहि नाटकक सर्वाधिक आश्चर्यजनक नाट्य-मोड़ (plot-twist) थिक। मुदा नाटककार एहि रहस्यकेँ एक हास्य-प्रसंगमे पर्यवसित क’ दैत छथि (“पानिए तँ हमर घर-दुआरि अछि”)। एहि क्षणकेँ यदि एक ‘नाट्य-उद्घाटन’ (theatrical revelation) बनाओल जइतए, तँ ओ नाटकक सर्वोत्तम दृश्यमे एक होइत।
संग्रह-स्तरीय साझा सीमा
स्त्री-कर्तृत्व आ पितृसत्तात्मक अनुमोदन-क्रम
प्रेम-चतुष्टयक चारू नाटकमे एक साझा संरचनात्मक विशेषता अछि जे एक साझा सीमा सेहो थिक- प्रत्येक नायिकाक स्वाधीन निर्णय अंततः एक ‘पुरुष-प्राधिकारक अनुमोदन’सँ पूर्ण होइत अछि।
श्रुवावतीक जय-इन्द्रक ‘अहाँ विजयी भेलहूँ’ उद्घोषसँ; सुकन्याक विवाह-राजा शर्याति-च्यवनक सहमतिसँ; श्वेताक मुक्ति-अतिरथक पलायन-अनुगमनसँ; सुप्रभाक विवाह-वदन्यक अनुमतिसँ। ई चारू उदाहरण बतबैत अछि जे नाटककार नायिकाकेँ ‘कर्ता’ बनाबैत छथि मुदा हुनकर नाट्य-विजयक अंतिम पुष्टि एक पुरुष-चरित्रक मुँहसँ होइत अछि। एहि सूक्ष्म पुनर्उत्पादनसँ (subtle reproduction) नाटककारक नारीवादी विचार किञ्चित सीमित होइत अछि।
उद्घोषक-निर्भरता : ‘बताएब’ बनाम ‘दिखाएब’
प्रेम-चतुष्टयक चारू नाटकमे उद्घोषक (narrator) पात्रकेँ एक ‘भावना-व्याख्याकर्ता’क भूमिका दैल गेल अछि-
‘श्वेताक अवसाद हेरा गेलै...’, ‘अतिरथ बेमन भ’ गेलाह...’, ‘बीतल रजनी, ज्यों युग बीतए...’
ई वर्णन कखनो-कखनो पात्रकेँ अपन भावना स्वयं प्रकट करबाक नाट्य-अवसरसँ वंचित क’ दैत अछि। रंगमंचमे सर्वोत्तम भावनात्मक क्षण ओ होइत अछि जखन पात्र ‘जीबैत’ अछि, वर्णनकर्ता ‘बताबैत’ नहि अछि। एहि नाटकमे उद्घोषक-निर्भरता एक व्यापक शिल्प-सीमा थिक।
दैवी हस्तक्षेपक वैचारिक विरोधाभास
संग्रहक कतिपय नाटकमे नायिका-कर्तृत्वक एक उच्च घोषणा होइत अछि, मुदा नाट्य-कथामे एक देवता वा दैवी शक्ति आखिर हस्तक्षेप करैत अछि।
श्रुवावतीक ‘आत्मबल’ इन्द्रक स्वीकृतिसँ ‘सिद्ध’ होइत अछि; सुकन्याक ‘विश्वास’ अश्विनी कुमारक औषधि-ज्ञानसँ च्यवनकेँ यौवन दैत पुरस्कृत होइत अछि; अष्टावक्रकेँ पितृ-श्राप नदी-स्नानसँ दूर होइत अछि। एहि दैवी-पुरस्कार-क्रमसँ एक अनायास संदेश उत्पन्न होइत अछि- ‘प्रेम-निष्ठाकेँ दैवी पुरस्कार भेटिते अछि’। ई मानव-कर्तृत्वकेँ स्वायत्त नहि, दैव-निर्भर प्रमाणित करैत अछि।
विद्यापति-पद : अत्यधिक प्रयोगक जोखिम
विद्यापतिक पदक प्रयोग ‘बिदापत’ आ ‘सुकन्या’ दुनूमे अछि। ‘बिदापत’मे ई पूर्णतः सार्थक एवं सुसंगत अछि- विद्यापति स्वयं नाटकक नायक छथि। मुदा ‘सुकन्या’मे विद्यापतिक वसन्त-पद (‘आयल रितुपति राज बसंत’) वातावरण-निर्माणक लेल अछि। एहि उपयोगसँ एक प्रश्न उठैत अछि- की संग्रहकेँ एकटा विद्यापति-पदक संरक्षण-प्रयोजन अछि? यदि ‘सुकन्या’क वसन्त-वर्णन हेतु मैथिली काव्य-परम्पराक कोनो अन्य पदक प्रयोग कएल जाएत, तँ ‘बिदापत’मे विद्यापति-पदक विशिष्टता आरो अधिक निखरैत।
रंगमंचीय निर्देश : असमान विवरण-स्तर
लोकनाट्य-त्रयीमे मंच-निर्देश (stage directions) अत्यन्त विस्तृत आ विशिष्ट अछि-“गबैत, कुसमा सामर, ठनका-बनका...कुनटा, बुधेसरकेँ दुलार मलार करैए”। मुदा प्रेम-चतुष्टयमे मंच-निर्देश प्रायः न्यूनतम अछि-“प्रकाश परिवर्तन”, “संगीत”, “फ्रीज”। ई अन्तर नाट्यकारक दू भिन्न कालक रचना-पद्धतिकेँ दर्शाबैत अछि, मुदा एहिसँ छोट नाटिकासँ अभिनेताकेँ कम मार्गदर्शन भेटैत अछि।
उपसंहार : सीमाक संग सम्भावना
प्रथमतः, प्रेम-चतुष्टयमे कतहु-कतहु सन्देश-प्रधानता (उपदेशात्मकता) नाट्य-तनावक स्थान ल’ लैत अछि-विशेषतः समापन-दोहा आ उद्घोषकक टिप्पणी कखनो-कखनो ओहि अर्थकेँ मुखर क’ दैत अछि जे ध्वनित रहितहुँ अधिक प्रभावी रहितैक। नाट्य-कलाक मर्म ‘देखाबए’मे अछि, ‘कहि देब’मे नहि- एहि कसौटी पर लोकनाट्य-त्रयी प्रेम-चतुष्टयसँ पुष्ट होइत अछि। द्वितीयतः, ‘श्रुवावतीक जय’मे स्त्री-स्वातंत्र्यक प्रखर पाठक संग अग्नि-प्रवेशक रूढ़िक प्रयोग एक वैचारिक तनाव उत्पन्न करैत अछि- यद्यपि नाटक एकरा ‘आत्मबल’क संकल्पक रूपमे प्रस्तुत करबाक प्रयास करैत अछि, तथापि बलिदान-केन्द्रित प्रतीक आधुनिक नारीवादी पाठक संग पूर्ण रूपसँ संगति नहि बैसाबैत अछि- ई प्रश्न खुजल रहैत अछि। तृतीयतः, संग्रहमे स्केल (परिमाण)क असमानता अछि- ‘कुसमा-सलहेस’ सन महाकाव्यात्मक विस्तार आ प्रेम-चतुष्टयक चेम्बर-नाटिका एक्के लाटमे राखल गेल अछि; ई वैविध्य एक दृष्टिसँ संग्रहक सम्पन्नता थिक, मुदा एकर पाठ-अनुभवमे लय-भंग सेहो उत्पन्न करैत अछि। एहि सभ सीमाक बादहुँ ई स्वीकार’ पड़त जे ई कमी कुणालक नाट्य-दृष्टिक मूल बल-मंचनीयता आ लोक-संप्रेषणीयता-क सोझाँ गौण अछि।
संग्रहक सीमा मुख्यतः तीन श्रेणीमे आबैत अछि-
(क) शिल्प-सीमा : उद्घोषक-निर्भरता, ‘बताएब’ बनाम ‘देखाएब’, कतिपय पात्रक एकआयामिता।
(ख) वैचारिक तनाव : अग्नि-प्रवेश-रूढ़ि, पितृसत्तात्मक अनुमोदन-क्रम, दैवी-पुरस्कार-निर्भरता।
(ग) संरचनात्मक सीमा : आकार-वैषम्य, शीर्षक-एकरसता, दोहराओल नाट्य-ढाँचा।
महत्त्वपूर्ण ई जे ई सीमा संग्रहक मूल्यकेँ नष्ट नहि करैत अछि। कोनो सीमा-रहित रचना-संग्रह नहि अछि- महाकवि विद्यापतिक पदमे सेहो परम्परागत नायिका-साँचाक पुनरावृत्ति अछि; भिखारी ठाकुरक नाटकमे सेहो भाषिक असमानता अछि। कुणालक सीमा बहुधा ओहि स्थानमे अछि जाहिठाम हुनकर महत्त्वाकांक्षा सर्वाधिक उड़ान भरैत अछि-ई एक रचनाकारक सजीव चिह्न थिक।
एहि सीमाकेँ चिन्हित करबाक एक व्यावहारिक उद्देश्य सेहो अछि-नाटकक भविष्यक निर्देशक लोकनि एहि सीमाकेँ मंचन-प्रक्रियामे सम्बोधित कऽ सकैत छथि। अतिरथक परिवर्तन-यात्राकेँ एक समक्ष निर्देशक मूक-दृश्यसँ विस्तारित क’ सकैत छथि; श्रुवावतीक चिता-संकल्पकेँ एक शक्ति-उद्घोषक रूपमे पुनः-अभिनीत कएल जा सकैत अछि; वंदीक रहस्य-उद्घाटनकेँ एक विराट नाट्य-क्षणमे पर्यवसित कएल जा सकैत अछि। यएह जीवित रंगमंचक गुण थिक- प्रत्येक मंचन एक नव ‘संस्करण’ थिक।
उपसंहार
‘कुसमा-सलहेस आ अन्य छओ गोट नाटक’ समकालीन मैथिली रंगमंचक एक महत्त्वपूर्ण अवदान थिक-ई लोकनाट्य आ आधुनिक रंगमंचक बीच एक सेतु थिक, जे मिथिलाक ‘नाच’-परम्पराकेँ मात्र संरक्षित नहि करैत, अपितु ओकरा समकालीन वैचारिकतासँ अनुप्राणित क’ पुनर्जीवित करैत अछि। बुद्धि (‘चालिस चोर’), काव्य-चिरंजीविता (‘बिदापत’), अभय-स्वातंत्र्य आ प्रेम (‘कुसमा-सलहेस’) आ स्त्री-कर्तृत्व (प्रेम-चतुष्टय)- एहि चारि स्तम्भ पर ठाढ़ ई संग्रह अंततः एक्के थीसिस दिस अभिमुख अछि- ‘प्रेम’ (व्यापक मानवीय करुणा आ जीवनासक्तिक अर्थमे) सृष्टिक मूल-तत्त्व थिक, आ ‘बुद्धि’ ओकर रक्षक।
लोक-स्रोतक प्रति निष्ठा, सबाल्टर्न आ स्त्री-स्वरक प्रति संवेदनशीलता, शास्त्र-लोक-आधुनिकताक संश्लेषण आ रंगमंचीय व्यावहारिकता-एहि गुण सभक कारणे ई संग्रह विदेह समानांतर-साहित्य-दृष्टिक एक उपयुक्त निदर्शन थिक आ मैथिली नाट्य-समीक्षाक एक अनिवार्य संदर्भ-बिन्दु। एकर अध्ययन-अध्यापन आ पुनर्मंचन मैथिली रंगमंचक जीवंतताक लेल समान रूपसँ आवश्यक अछि।
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कुणाल-कृत नाट्य-समीक्षा शृंखला · प्रथम नाटक
चालिस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा
एक चतुर्भुज नाट्य-समीक्षा
भारतीय · पाश्चात्य · चीनी · इजरायली नाट्य-सिद्धांतक परिप्रेक्ष्यमे
पहिल मंचन : ४-५ अगस्त १९९३, विद्यापति भवन, पटना · प्रकाशन : भंगिमा, अंक-२२, अगस्त १९९५
१. परिचय आ कथा-संरचना
कुणालक प्रथम नाटक ‘चालिस चोर आ गोनू झा उर्फ ज्ञान झाक खिस्सा’ मैथिलीक नाट्य-इतिहासमे एक विलक्षण स्थान रखैत अछि। ई नाटक अपन कथा-वस्तुसँ बेसी अपन ‘कथा कहबाक ढंग’क कारणे महत्त्वपूर्ण अछि। नाटकक आरम्म्भे एक मेटाथिएट्रिकल (आत्म-संदर्भी) युक्तिसँ होइत अछि- तीन गोट ‘भाँट’ (यशोगायक/परम्परागत कवि-गायक) मंच पर अबैत छथि, दर्शकक समक्ष अपन निरर्थकताक विलाप करैत छथि, आ जखन ओ बुझैत छथि जे हुनकर पारम्परिक कवित-पाठसँ कतहु असरि नहि पड़ैत, तखन ओ निर्णय करैत छथि-“जैं हमरा लोकनि नाटक करी तँ केहन रहतै!” एहिसँ आरम्भ होइत अछि एक दोसर कथा-भाँटक कथा (बाहरी वृत्त) आ मिथिलाक चिर-परिचित लोक-तर्कशास्त्री गोनू झाक कथा (भीतरी वृत्त)।
भीतरी कथाक प्रमुख अवयव-प्रारम्भमे एक बाल-परीक्षा दृश्य (जाहिमे हरबाह चतुरतासँ सिद्ध करैत अछि जे बच्चा केकर अछि); तकर बाद ‘भुनभुनादेव’ सुबेदारक दरबारमे बुद्धिक अपमान; फेर कविराज लोकनिक गोनू-शरण; गढ़ घुसकियाहीमे न्याय-यात्रा; चोरक टोलीक आपसी सत्ता-संघर्ष (दुरमतिया बनाम देबहा); गोनूक काली-माता स्वप्न; आ अंतमे एक कुटिल अभिषेक- विधिसँ चोर सभकेँ परास्त करबाक दृश्य। नाटककारक एक विशेष टिप्पणी महत्त्वपूर्ण अछि- एहि नाटककेँ एक अभिनेता द्वारा बहु-पात्रीय अभिनयमे खेलल जा सकैत अछि, आ एकर तीन टा काल-संस्करण (४५/६०/९० मिनट) आ एक ध्वनि-नाट्य शृंखला (१३ प्रकरण रेडियो पर प्रसारित) सेहो अछि।
नाटकक मूल प्रश्न-कलाकेँ के पोसत? राज्य, समाज, वा स्वयं कलाकार? आ एहि जीवन-संघर्षमे ‘बुद्धि’ (ज्ञान) की अन्तिम आ सर्वोच्च शक्ति थिक?- यएह प्रश्न चारू नाट्य-परम्पराक समीक्षाक केन्द्रमे रहत।
२. भारतीय नाट्य-सिद्धांत
२.१ नाट्यशास्त्र : रस-निष्पत्ति आ पात्र-प्रकार
भरतमुनिक ‘नाट्यशास्त्र’ (अनुमानित द्वितीय शती ईसापूर्व–द्वितीय शती ईसवी) रसकेँ नाट्यक आत्मा कहैत अछि-“रसो नाट्यस्य जीवनम्”। एहि नाटकक प्रधान रस ‘हास्य’ थिक, मुदा ओ एकल नहि अछि। भरत हास्यक छह विभेद देखबैत छथि जाहिमे ‘परस्थ हास्य’ (दोसर पर निर्देशित हँसी) एतय केन्द्रीय अछि- बुड़िराज, भुनभुनादेव, दुरमतिया आ चोर-दलक मूर्खताक चित्रण एहि वर्गमे आबैत अछि। संग-संग ‘आत्मस्थ हास्य’ (स्वयं पर हँसब) सेहो अछि- भाँटक आत्म-विडम्बना एकर उदाहरण अछि।
हास्यक आलम्बन विभाव थिक- भुनभुनादेव आ बुड़िराजक विसंगत आचरण (“राजन्, अहाँक नाम ‘बुड़िराज’ रखैत छी किऐकि हमरा अधिक नीक लगैए”), दुरमतियाक हठधर्मिता आ रनूभनूक असहाय प्रहसन। ‘वात्स्यायन’क कामसूत्र-परम्पराक ‘शृंगार’ एतय नहि- ई हास्य-प्रधान नाटक अछि। मुदा ‘वीर-रस’क एकटा अद्भुत संस्करण अवश्य अछि- गोनूक वीरता शस्त्र-बलक नहि, युक्ति-बलक थिक। भरत ‘धीर-ललित’ नायकक लक्षण कहैत छथि- शांत, विनोदी, बुद्धिमान-यएह गोनूक प्रकृति थिक।
विदूषक-परम्परा- भरतक नाट्यशास्त्रमे ‘विदूषक’ (vidūṣaka) एक विशिष्ट पात्र-प्रकार थिक- बहुधा ब्राह्मण, हास्यास्पद वेश, परंतु बुद्धिमान आ नायकक मित्र। गोनू झा आंशिकतः एहि परम्पराक उत्तराधिकारी थिकाह- मुदा कुणाल एकरा लोक-वास्तवाद (folk realism) मे पुनर्परिभाषित करैत छथि। गोनू न्यायालयी विदूषक नहि, अपितु माटिसँ जुड़ल जन-तर्कशास्त्री छथि।
२.२ प्रहसन/भाण आ लोकधर्मी शिल्प
संस्कृत-नाट्यक ‘प्रहसन’ विधा (हास्य-प्रधान एकांकी/बहुअंकी नाटक) एहि रचनाक निकटतम शास्त्रीय समकक्ष थिक। भरत प्रहसनकेँ ‘त्रिविध हास्य’ (मन, वचन, शरीर) क सम्मिश्रणसँ निर्मित बताबैत छथि। कुणालक नाटकमे तीनू उपस्थित अछि- भाँटक वाक्-क्रीड़ा (वचन-हास्य), चोरक असंगत क्रिया (शरीर-हास्य), आ गोनूक काली-माता-प्रसंगक मानस-विनोद।
नाट्यशास्त्रक ‘लोकधर्मी’ (लोक-परम्पराक अनुसरण) बनाम ‘नाट्यधर्मी’ (शास्त्रीय अभिनय-रीति) क भेद एहि नाटककेँ स्पष्टतः ‘लोकधर्मी’ शिविरमे राखैत अछि। दर्शककेँ सीधा सम्बोधन, गीत-प्रयोग, सपना-दृश्य, नाम-विडम्बना (भुनभुनादेव, बुड़िराज, दुरमतिया)- ई सभ लोकधर्मी प्रविधि थिक जे नाट्यशास्त्रक शास्त्रीय मानदण्डसँ भिन्न मुदा ततबे वैध आ परम्परा-सम्मत अछि।
२.३ ध्वनि आ वक्रोक्ति
आनन्दवर्धनक ‘ध्वन्यालोक’ (नवम शती) क ‘ध्वनि-सिद्धांत’-जाहिमे शब्दक व्यंजनार्थ (ध्वनित/सूचित अर्थ) अभिधा आ लक्षणासँ उत्कृष्ट घोषित होइत अछि- एहि नाटकमे अनेक स्तर पर क्रियाशील अछि।
शीर्षकक ‘ज्ञान झाक खिस्सा’- अभिधातः एक व्यक्तिक कथा, परंतु ध्वनि-अर्थमे ‘ज्ञान/बुद्धि’क कथा। नाटकक समापन-गीत यएह ध्वनिकेँ मुखर करैत अछि-“बुद्धि सँ नईँ पैघ कोनो बल होइ छै।” एहि शब्द-ध्वनिमे समग्र नाटकक तात्पर्य संग्रहित अछि।
कुन्तकक ‘वक्रोक्ति-जीवित’ (दशम शती) जे वक्रता-सिद्धांत प्रस्तुत करैत अछि- अभिधेय-वस्तुक चमत्कारपूर्ण, आह्लादक अभिव्यक्ति-ओ एतय बहुल मात्रामे उपस्थित अछि। भुनभुनादेवक पूरा चरित्र एक ‘नाम-वक्रोक्ति’ थिक। गोनूक काली-माताक संग संवाद-
"हे माता! जखन आहाँ केँ सर्दी लगैत हैत तँ... सब हाथ केँ अस्त्र-शस्त्र मे बझौने छी। तखन नाक सँ पोटा कोना पोछैत हैब!"
-एहि वाक्यमे आस्था आ हास्यक, भक्ति आ बुद्धिक, देवत्व आ मानवीयताक जे वक्र मिश्रण अछि, ओ ‘वक्रोक्ति’क उत्कृष्ट उदाहरण थिक। एतय भय कहियो नहि आबैत- अभयक वक्रोक्ति थिक ई।
३. पाश्चात्य नाट्य-सिद्धांत
३.१ अरस्तू : अनुकरण, विप्रतिसार आ परिशोधन
यूनानी दार्शनिक अरस्तू (३८४–३२२ ईसापूर्व) अपन ‘काव्यशास्त्र’ (Poetics)मे नाटकक आत्मा ‘अनुकरण’ (μίμησις / अनुकृति) कहैत छथि, आ उत्कृष्ट त्रासदीक लेल ‘विप्रतिसार’ (περιπέτεια / परिस्थिति-परिवर्तन) आ ‘पहचान’ (ἀναγνώρισις / अभिज्ञान)क महत्त्व बतबैत छथि। कुणालक ई नाटक अरस्तूक मानदण्डसँ एक अर्थमे ‘विरोधी’ थिक-ई एकलरेखीय त्रासदी नहि, बहुरेखीय हास्य-प्रहसन थिक। अरस्तू ‘एपिसोडिक’ कथा-संरचनाकेँ त्रुटिपूर्ण मानैत छलाह; मुदा लोक-परम्परामे यएह एपिसोडिकता ओकर प्राण थिक।
तथापि अरस्तूक परिशोधन/कैथार्सिस- दर्शकक दमित भावनाक मोचन-एतय एक कॉमिक रूपमे उपस्थित अछि। चोरी, दारिद्र्य, राज्यक भ्रष्टाचार-एहि तीनू सामाजिक भयक विरुद्ध जे हास्य-कैथार्सिस एहि नाटकमे होइत अछि, ओ सामाजिक-मनोवैज्ञानिक स्तर पर अरस्तूक सिद्धांतसँ समर्थनीय अछि।
नाटकमे ‘अभिज्ञान’-दृश्य उलटा रूपमे अछि- गोनू (अर्द्धनिद्रा) चोर सभकेँ पहिने काली माताक रूप ‘चिन्हैत’ छथि (“काली माता पुरुखक भेष मे आबि गेलीहए!”), तखन ओ ‘नहि-पहचानैत’ छथि। ई ‘reversed anagnorisis’ थिक- पहचानक हास्यात्मक प्रयोग, जाहिसँ भयक स्थान हँसी लैत अछि।
३.२ ब्रेख्त : महाकाव्यात्मक रंगमंच आ विरचन-प्रभाव
जर्मन नाटककार-विचारक बेर्टोल्ट ब्रेख्त (१८९८–1९५६) अपन ‘महाकाव्यात्मक रंगमंच’ (Episches Theater / एपिक थिएटर) सिद्धांतमे ‘विरचन-प्रभाव’ (Verfremdungseffekt / अलगाव-प्रभाव) कहलाह- अभिनेता दर्शककेँ बेर-बेर स्मरण करबाबथि जे ओ एक ‘निर्माण’ देखि रहल छथि, कोनो ‘वास्तविकता’ नहि, जाहिसँ दर्शकक आलोचनात्मक बुद्धि जागृत रहए। कुणालक नाटक ब्रेख्तीय विरचन-प्रभावक एक देशज संस्करण थिक।
तीन भाँट मंच पर निर्णय लैत छथि जे ‘नाटक करब’- ई स्वयं विरचन-प्रभावक आरम्भ थिक। पूरा खेलमे ओ कतहु ‘भावमग्न’ नहि होइत छथि, सदा अपन कलाकार-अस्तित्वसँ सचेत रहैत छथि। अंतमे ओ पुनः मंच पर आबि नाटकक वैकल्पिक अंत पर वाद-विवाद करैत छथि आ दर्शककेँ सामाजिक व्याख्या प्रस्तुत करैत छथि-“अशिक्षा आ गरीबी सँ उत्पन्न एहि सामाजिक व्याधि”। ई ब्रेख्तक ‘Gestus’ (भाव-मुद्रा/प्रदर्शन-क्रिया) क उत्कृष्ट उदाहरण थिक-अभिनेता ‘दिखाबैत’ अछि (zeigen), अनुभव नहि करैत अछि।
ब्रेख्त कलाक आर्थिक आधारकेँ सेहो मुद्दा बनबैत छलाह। ‘गमछा-प्रसंग’-जाहिमे भाँट लोकनि स्पष्ट रूपसँ दर्शकसँ पेट भरबाक लेल दान माँगैत छथि- यएह ब्रेख्तीय पारदर्शिता थिक। ब्रेख्त सदा चाहैत छलाह जे कलाक उत्पादन-शर्त (conditions of production) नुकाओल ने जाए- एहि नाटकमे ओ उजागर अछि।
३.३ लायनल एबल : मेटाथिएटर
अमेरिकी आलोचक लायनल एबल (Lionel Abel) अपन ‘मेटाथिएटर’ (Metatheatre, १९६३) ग्रन्थमे ओहि नाट्य-विधाकेँ परिभाषित कएलनि जाहिमे पात्र अपनाकेँ ‘नाटकमे’ जनैत छथि। एहि परिभाषाक अनुसार ‘चालिस चोर’ एक परिपूर्ण मेटाथिएटर थिक- तीन भाँट मंच पर नाटक करबाक निर्णय लैत छथि, नाटकक कथा छाँटैत छथि, आ अंतमे रचना-प्रक्रियाक पारदर्शिता प्रदर्शित करैत छथि। एबल कहलनि जे मेटाथिएटर जीवनकेँ सपना आ नाटककेँ जागरण मानैत अछि- एतय ठीक उल्टा अछि- भाँटक जीवन-संकट ‘असल’ थिक आ गोनूक कथा ‘सपना’ (नाट्य), मुदा दुनूकेँ एक्के रंगमंच धारण करैत अछि।
३.४ बाख्तिन : कार्निवालेस्क
रूसी चिन्तक मिखाइल बाख्तिन (१८९५–1९७५) अपन ‘कार्निवालेस्क’ सिद्धांतमे ओहि सांस्कृतिक क्षणक विश्लेषण कएलनि जाहिमे स्थापित सामाजिक पदक्रम उनटि जाइत अछि, मर्यादाक बान्ह टूटैत अछि, आ लोक-हास्यमे अधिकारक उपहास होइत अछि।
एहि नाटकमे कार्निवालेस्कक अनेक छटा अछि- बुड़िराज नामक ‘बुद्धिहीन मंत्री’, भुनभुनादेव ‘गुनगुनाबएवला-देव’ सुबेदार-दुनूक नाम स्वयं हुनकर सत्ता-पद पर कार्निवालेस्क टिप्पणी थिक। चोर-दलमे जखन नेतृत्वक लेल लोकतांत्रिक मत-गणना होइत अछि- एहि बर्बर समूहमे सेहो ‘राजनीति’ चलैत अछि- ई एक कार्निवालेस्क समानांतर-राज्य थिक।
गमछा-प्रसंग बाख्तिनक दृष्टिसँ ‘श्रेणी-उत्क्रमण’ (inversion of hierarchy) थिक- राजाधिराज आ हुनकर दरबारक उपहास करैत, भाँट-कलाकार दर्शकसँ सोझे आर्थिक सम्बन्ध स्थापित करैत छथि, बिना कोनो मध्यस्थक। ई ‘राज्याश्रय’ बनाम ‘जनाश्रय’क द्वन्द्वकेँ कार्निवालेस्क रूपमे सोझराइत अछि।
४. चीनी नाट्य-सिद्धांत
४.१ ली यू : नाटक-संरचनाक तत्त्व
चीनी नाटककार-विचारक ली यू (१६११–1६८०), जिनकर ‘शियान-चिंग-ओउ-चि’ (‘फुरसतिमे मनक बात’) चीनी नाट्य-समीक्षाक आधार-ग्रन्थ मानल जाइत अछि, एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत देलनि-‘झू-नाओ’ (मुख्य-मस्तिष्क / केन्द्रीय विचार-सूत्र)- प्रत्येक उत्तम नाटकमे एक ऐसी केन्द्रीय धुरी होएबाक चाही जाहिसँ समस्त कथा-धागा बन्हाएल हुअए।
एहि नाटकक ‘झू-नाओ’ थिक- ‘बुद्धि बनाम बाहुबल’, तथा एहिसँ जुड़ल ‘लोक-कला बनाम राज्य-शक्ति’। ली यू कहलनि जे झू-नाओ पहिल अंकेमे स्थापित होएबाक चाही- आ कुणाल यएह करैत छथि (भाँटक पहिल दृश्य)।
ली यूक दोसर सिद्धांत ‘मि-झेन-शियान’ (सूक्ष्म-सीवन / stitching) थिक- नाटकक सब अंग एना सूतल होए जे अंतमे सब ताग अपन स्थान पर हो। गमछा-प्रसंग आ भाँट-वृत्तक अंतमे प्रत्यावर्तन एहि ‘मि-झेन-शियान’क उदाहरण थिक- नाटकक बाहरी वृत्त (भाँटक संकट) ठीक ओही स्थल पर समाप्त होइत अछि जाहिठाम आरम्भ भेल छल।
४.२ चोउ पात्र-प्रकार
चीनी शास्त्रीय रंगमंचमे (जिंग-जू/पेइचिंग ओपेरा तथा अन्य रूप) पाँच मूल पात्र-प्रकार होइत अछि-शेंग (पुरुष-नायक), तान (नारी), चिंग (रंगीन मुख), मो (वृद्ध), आ चोउ (विदूषक)। ‘चोउ’ ओ एकमात्र पात्र-प्रकार थिक जे सोझे दर्शकसँ गप करैत अछि, मंच-परम्पराकेँ तोड़ैत अछि, आ देशज लोकभाषाक प्रयोग करैत अछि।
एहि नाटकक तीन भाँट ‘चोउ’क एक त्रिमूर्ति संस्करण छथि। हुनकर दर्शक-सम्बोधन, भूमिका-परित्याग, गीत-प्रयोग आ स्व-उपहास-सभ ‘चोउ’क चिरपरिचित गुण थिक। एहि समानांतरसँ प्रकट होइत अछि जे लोक-रंगमंचक एक वैश्विक तर्क अछि- प्रत्येक सभ्यताक लोक-रंगमंच एक विदूषक-पात्र रचैत अछि जे ‘चतुर्थ भित्ति’ केँ तोड़ैत अछि आ समाजक आत्म-दर्शन करबैत अछि।
४.३ श्यू-शी: रिक्त-पूर्ण सिद्धांत
चीनी सौन्दर्यशास्त्रमे ‘श्यू-शी’ (खाली-भरल, empty-full) क सिद्धांत मूलभूत अछि। मंच पर जे ‘रिक्त’ (श्यू) होइत अछि- दृश्य-सामग्रीक अभाव-ओ कल्पनाद्वारा ‘पूर्ण’ (शी) बनि जाइत अछि। चीनी अभिनेता एक छड़ीसँ ‘नाव’ आ एक कदमसँ ‘यात्रा’ बनबैत छथि।
कुणालक नाटकमे ‘श्यू-शी’क सर्वाधिक मार्मिक उदाहरण अछि- गोनूक कर्पास-बीज वटी। एक मुट्ठी बेकार कपास-बीजकेँ गोनू दावा करैत छथि जे ई प्रति भरी दस अशर्फीमे बिकाइत अछि। ‘रिक्त’ वस्तु (worthless seed) एक ‘पूर्ण’ (valued commodity) बनि जाइत अछि- ई गोनूक बुद्धि-शक्तिक श्यू-शी-प्रयोग थिक। एहिसँ प्रकट होइत अछि जे कुणालक सौन्दर्य-बोध चीनी लोक-रंगमंचक ‘रिक्तता-सम्पन्नता’क मर्मसँ संगत अछि।
४.४ यी-चिंग: वांग गुओवेई
चीनी काव्यशास्त्री वांग गुओवेई (१८७७–१९२७) अपन ‘रेन-झियान-ची’ ग्रन्थमे ‘यी-चिंग’ (emotion-situation-fusion / भाव-स्थिति-संलय) क सिद्धांत दैत छथि- उत्कृष्ट कलामे भाव आ परिवेश एना मिज्झर होइत अछि जे एक स्वतंत्र सौन्दर्य-लोक (aesthetic sphere) सृजित होइत अछि।
एहि नाटकक ‘यी-चिंग’ थिक-भाँटक मरैत कलाक नस्टाल्जिया आ गोनूक अपरास्त बुद्धिक उल्लासक संयोग। एहि दुनूक मिलन एक विशिष्ट रंगमंचीय भाव-क्षेत्र रचैत अछि जाहिमे विषाद आ उत्साह एकहि संग उपस्थित छथि। वांग ‘यू-वो-झी-चिंग’ (landscape-with-subject) कहैत छलाह-जाहिमे रचनाकारक भाव स्वयं सृष्टिमे विलीन भ’ जाइत अछि। एहि नाटकमे लेखकक मैथिली-कलाकारत्वक संकटक प्रति प्रेम ओहिना संग्रह-रूपमे व्यक्त होइत अछि।
५. इजरायली नाट्य-सिद्धांत
५.१ एली रोज़िक : प्रतिमा-सिद्धांत (Theatrical Iconicity)
इजरायली नाट्य-विद्वान एली रोज़िक (Eli Rozik, जन्म १९३४) अपन ग्रन्थ ‘थिएट्रिकल इमेज’ (Theatrical Image) आ बाद’क लेखनमे एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत प्रस्तुत कएलनि- रंगमंचक मूल इकाई ‘प्रतिमा’ (iconic image) थिक, ने पाठ आ ने कथा। अभिनेताक शरीर-स्वर-क्रिया एक काल्पनिक संसारक ‘प्रतिमा’ (icon, Peirce-अर्थमे) सृजित करैत अछि- नाटक ई प्रतिमा-प्रणाली थिक।
एहि नाटकमे रोजिकक सिद्धांतक एक विशेष आयाम थिक- भाँट-प्रतिमा। तीन भाँट मंच पर जे छवि उत्पन्न करैत छथि, ओ मात्र ‘तीन व्यक्ति’क प्रतिनिधित्व नहि, अपितु ‘मरैत भाँट-परम्परा’क समग्र रूपमे एक प्रतिमा थिक। रोजिक कहलनि जे प्रतिमा ‘symbolic’ (प्रतीक) नहि, ‘iconic’ (प्रतिरूप) होइत अछि- ओ अपन संकेतित विषय-वस्तुसँ समानता (resemblance) आधारित सम्बन्ध रखैत अछि। भाँट अपना कलाक ह्रासकेँ ‘देखाबैत’ छथि- ई देखाएब प्रतिमा थिक।
नाटककेँ अपने विषय बनाएब- जखन भाँट निर्णय लैत छथि जे ‘नाटक करब’-एतय रोजिकक ‘थिएटर-अबाउट-थिएटर’ (theatre about theatre) सिद्धांत लागू होइत अछि। रंगमंच अपन माध्यमकेँ विषय बनबैत अछि- ई एक उत्कृष्ट ‘प्रतिमात्मक आत्म-प्रतिफलन’ (iconic self-reflexion) थिक।
५.२ शिमोन लेवी : पुरालेख-रंगमंच
इजरायली नाट्य-विद्वान शिमोन लेवी (Shimon Levy, १९३९–2०१७) अपन अनेक ग्रन्थमे ओहि नाट्य-कार्यकेँ रेखांकित कएलनि जाहिमे रंगमंच एक ‘सांस्कृतिक पुरालेख’ (cultural archive) बनैत अछि- ओहि परम्परा, स्मृति आ अभ्यासक जीवित संग्रहस्थल जे अन्यथा विस्मृत भ’ जैत। लेवीक परिप्रेक्ष्यमे, रंगमंच मात्र ‘वर्तमानक घटना’ नहि, अपितु ‘अतीतक स्मृतिक प्रदर्शन’ (performance of remembered past) सेहो थिक।
एहि नाटकमे भाँट-परम्परा- जे मिथिलाक यशोगायक कुलक शताब्दी-पुरान जीविका-परम्परा थिक-अपन ह्रास-क्षणकेँ रंगमंच पर ‘पुरालेखित’ करैत अछि। दर्शक जे देखैत छथि, ओ भाँटक एक ‘जीवित-मृत्यु-क्षण’क प्रतिमा थिक। एहि नाटकक मंचन (पटना, १९९३) भाँट-परम्पराक एक जीवित नमूना संरक्षित करैत अछि- भलेँ भाँट मंच पर विलाप कर’ रहल होथि।
५.३ हिब्रू रंगमंचक भाषा-पुनरुद्धार-समानांतर
इजरायली रंगमंचक इतिहासक सब सँ महत्त्वपूर्ण आयाममे एक थिक-हिब्रू भाषाकेँ जीवित रंगमंचक माध्यम बनाएब। ‘हबीमा’ (Habima, मास्को, १९१७; बादमे इजरायलक राष्ट्रीय रंगमंच) हिब्रू भाषामे प्रयोग करैत एक मृत-प्रायः भाषाकेँ नाट्य-भाषाक रूपमे पुनर्स्थापित कएलक।
कुणालक नाटक आ ‘भंगिमा’ रंगमण्डलीक पटना-मंचन (१९९३) एकर समानांतर थिक। हिन्दी-प्रभुत्ववला पटनाक सांस्कृतिक वातावरणमे मैथिलीमे नाट्य-प्रस्तुति एक भाषा-राजनीतिक कार्य थिक- मैथिलीकेँ ‘बोलीमात्र’ नहि, एक ‘रंगमंच-योग्य’, ‘दर्शक-योग्य’, ‘साहित्यिक भाषा’क रूपमे प्रतिष्ठित करबाक सांस्कृतिक-राजनीतिक प्रयास। एहि दृष्टिसँ भंगिमाक भूमिका हबीमाक भूमिकासँ सादृश्य रखैत अछि।
५.४ साक्षी-रंगमंच (Witness Theatre) : गमछाक अर्थनीति
इजरायली नाट्य-परम्परामे ‘साक्षी-रंगमंच’ (Witness Theatre / עדותएदुत) एक महत्त्वपूर्ण विधा बनल-जाहिमे रंगमंच एक कठोर सामाजिक यथार्थक ‘गवाह’ बनैत अछि आ दर्शककेँ ओहि यथार्थक प्रति उत्तरदायी बनाबैत अछि।
नाटकक अंतिम गमछा-प्रसंग-जाहिमे भाँट लोकनि स्पष्ट रूपसँ कहैत छथि जे “हमरा लोकनिक पेट तखने भरत जखन दर्शकगण कृपा करताह”-एक ‘साक्षी-क्षण’ थिक। ई रंगमंचक आर्थिक भेद्यताकेँ (economic vulnerability of performing artists) सार्वजनिक करैत अछि आ दर्शककेँ ‘गवाह’ बनबैत छथि। ई क्षण मात्र हास्य नहि-एहिमे कला-जीवनक एक कठोर सत्यक स्वीकृति अछि।
एहि दृष्टिसँ देखला पर नाटकक अंत एक ‘राजनीतिक कार्य’ बनि जाइत अछि- दर्शककेँ ‘साक्षी’ बनेबाक आ उत्तरदायित्वक ‘आमंत्रण’।
६. चतुर्भुज-संश्लेषण : एक तुलनात्मक मूल्यांकन
चारू परम्पराक आलोककेँ एक साथ धरि राखि देखी तँ ‘चालिस चोर आ गोनू झा’ एक बहुस्तरीय रचना थिक-ओ समान रूपसँ भारतीय रस-वक्रोक्ति, ब्रेख्तीय विरचन-प्रभाव, चीनी श्यू-शी, आ इजरायली साक्षी-रंगमंचक मानदण्ड पर उत्तीर्ण होइत अछि।
भारतीय दृष्टि-हास्य + वीर रसक असाधारण मिश्रण; विदूषक-परम्पराक लोक-रूपान्तरण; ध्वनि-सिद्धांत द्वारा ‘बुद्धि’ शब्दक अर्थ-विस्तार।
पाश्चात्य दृष्टि-परिपूर्ण ब्रेख्तीय ‘एपिक थिएटर’; मेटाथिएटरक क्लासिक उदाहरण; बाख्तिनीय कार्निवालेस्क।
चीनी दृष्टि-चोउ-पात्र-प्रकारसँ भाँटक उत्कृष्ट साम्य; श्यू-शी सौन्दर्य-दर्शन; यी-चिंगक विषाद-उल्लास संयोग।
इजरायली दृष्टि-रोजिकक प्रतिमात्मक आत्म-प्रतिफलन; लेवीक पुरालेख-रंगमंच; हबीमा-सादृश भाषा-राजनीति; गमछाक साक्षी-क्षण।
चारू परम्पराक एक साझा निष्कर्ष अछि- यएह नाटक मात्र ‘गोनू झाक खिस्सा’ नहि, अपितु ‘रंगमंचक खिस्सा’ थिक- ओकर संकट, ओकर अर्थनीति, ओकर जीवन-शक्ति, आ ओकर सामाजिक कर्तव्यक कथा। एहि अर्थमे ई नाटक एक नाट्य-घोषणापत्र (theatrical manifesto) सेहो थिक- जे ‘बुद्धि’केँ, लोक-कलाकारक हास्य-तर्ककेँ, समस्त बाधाओंक विरुद्ध ठाढ़ होएबाक शक्ति घोषित करैत अछि।
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[सैद्धांतिक विवेचन लेल देखू- मैथिली समीक्षाशास्त्र- गजेन्द्र ठाकुर]
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