
गजेन्द्र ठाकुर
मैथिली नाट्यमंच/ नाटक लेल एकटा समीक्षा सिद्धान्त (भाग-६) सन्दर्भ- कुणाल-कृत प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय!
कुणाल-कृत नाट्य-समीक्षा शृंखला · चतुर्थ नाटक
प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय!
एक चतुर्भुज नाट्य-समीक्षा : भारतीय · पाश्चात्य · चीनी · इजरायली परिप्रेक्ष्यमे
प्रकाशन : अंतिका, अप्रैल-जून २०१३ · मंच : त्रिस्तरीय · पात्र : दू अभिनेता + दू अभिनेत्री
१. परिचय, नाट्य-स्थापत्य आ मूल-प्रश्न
प्रेम-चतुष्टयक प्रथम नाटिका ‘प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय!’ कुणालक नाट्य-लेखनमे एक नवीन मोड़ थिक। लोकनाट्य-त्रयीक बहु-पात्रीय, गीत-नृत्य-बहुल विस्तारसँ एकदम भिन्न—ई नाटिका मितव्ययी, तीक्ष्ण आ विचार-केन्द्रित अछि। मंच निर्देश स्वयं बताबैत अछि—“त्रिस्तरीय मंच, स्तरक उपयोग कखनो प्लेटफार्म, कखनो सीढ़ी जकाँ”—आ पात्र मात्र चारि—दू अभिनेता, दू अभिनेत्री, जे अनेक भूमिका निभाबैत छथि (भारद्वाज/वृद्ध/वशिष्ठ/इन्द्र = एक-दू अभिनेता; श्रुवावती/सखी/स्त्री = एक-दू अभिनेत्री)।
स्रोत पुराण-आख्यान थिक—महर्षि भारद्वाजक पुत्री श्रुवावती, जनिकर उल्लेख विभिन्न पौराणिक सन्दर्भमे अछि। मुदा कुणालक श्रुवावती परम्परागत आख्यानसँ बहुत आगाँ जाइत छथि। ओ ‘विवाह-योग्य कन्या’क पारम्परिक भूमिकाकेँ अस्वीकार नहि करैत, मुदा विवाहक शर्त स्वयं निर्धारित करैत छथि—“जखने किओ हमरा लेल अर्थवान भ’ जैत, हम विवाह क’ लेब!” ई ‘अर्थवान होएबा’क माँग नाटकक केन्द्रीय दार्शनिक-नाट्य प्रश्न थिक।
नाटकक पाँच क्रम—(१) भारद्वाजसँ श्रुवावतीक ‘स्वतंत्र-स्वावलम्बी’ घोषणा; (२) सरिता-तट पर इन्द्रक छायासँ प्रेम-अनुभव; (३) इन्द्रक प्रत्यक्ष प्रकटन आ प्रस्ताव—“मरणोपरांत स्वर्ग आउ”—श्रुवावतीक अस्वीकार; (४) वृद्ध-वेशमे/वशिष्ठ-वेशमे इन्द्रक परीक्षा—अद्भुत फल—फल पाथर बनब; (५) श्रुवावतीक चिता-संकल्प—इन्द्रक स्वीकृति—दुष्यन्त कुमारक शेरसँ समापन।
२. भारतीय नाट्य-सिद्धांत
२.१ एकांकी-नाटिकाक शास्त्रीय स्वरूप आ ‘अंक’-विधान
भरतमुनिक नाट्यशास्त्र नाटकक विस्तार आ संरचनाक अनुसार विभिन्न रूप-भेद करैत अछि। दशरूपकमे ‘नाटिका’ एक अपेक्षाकृत लघु रूप थिक—सामान्यतः चारि अंकसँ कम, एक केन्द्रीय प्रेम-वृत्तांत, नायिका-प्रधान आ करुण-सम्पृक्त। एहि नाटिकाक शीर्षकमे ‘उर्फ’ शब्दक प्रयोग अभिजन-परम्परा आ लोक-परम्पराक संयोग थिक—‘प्रेम-प्रतिज्ञा’ (शास्त्रीय भाव) आ ‘श्रुवावतीक जय!’ (लोक-उद्घोष)।
त्रिस्तरीय मंचक उपयोग नाट्यशास्त्रक ‘रंगमण्डप’ सिद्धांतक आधुनिक रूपान्तरण थिक। भरत मंचकेँ तीन भागमे विभाजित करैत छथि—रंगशीर्ष (उपर), रंगपीठ (मध्य) आ नेपथ्य। कुणालक त्रिस्तरीय मंच एकर नव व्याख्या थिक—‘शीर्ष सतह पर पुरुष’ (उद्घोषक-सूत्रधार), ‘मध्य सतह’ (कथाक प्रमुख दृश्य) आ ‘निचला स्तर’ (वनस्पति-सरिता-तटक प्राकृत संसार)।
२.२ रस-विचार : शृंगारक तीन रूप एकहि संग
एहि नाटिकामे शृंगार-रसक तीन उपभेद एकहि संग उपस्थित अछि—(क) ‘संयोग-शृंगार’ (आकर्षण-भाव, सरिता-तट पर छाया-दर्शन); (ख) ‘वियोग-शृंगार’ (इन्द्रक बारम्बार अस्वीकार, श्रुवावतीक प्रतीक्षा-यातना); (ग) भक्ति-शृंगार (माला गँथनाइ—“मोनक देवताकेँ पहिराब’क लेल”)। भरत शृंगारक ‘स्थायी भाव’ ‘रति’ मानैत छथि, आ एकर उच्चतम अवस्था ओ ‘परम-रति’ मानैत छथि—जे इन्द्रियसँ परे शुद्ध प्रेम-तत्त्व थिक। श्रुवावती एहि परम-रतिक अवतरण छथि।
करुण-रसक एक विशिष्ट उपस्थिति सेहो अछि—“जाहि मोन मे प्रियक स्मरण नहि, से मोन ल’ क’ की?” ई विचार शुद्ध करुणाक नहि, एक दार्शनिक करुणाक अभिव्यक्ति थिक जाहिमे जीवनक मूल्य प्रश्नगत होइत अछि। अभिनवगुप्तक ‘शान्त-रस’—जीवनक समस्त सम्बन्धसँ परे शान्त स्वीकृति—समापन-दृश्यमे उपस्थित अछि।
२.३ धर्मशास्त्र आ स्त्री-स्वाधीनता : नाट्यक राजनीतिक पाठ
मनुस्मृतिक एक प्रसिद्ध उद्धरण—“पिता रक्षति कौमारे, भर्ता रक्षति यौवने”—स्त्रीक ‘रक्षा’क उत्तरदायित्व पिता-पति-पुत्रमे विभाजित करैत अछि। भारद्वाज अही परम्पराक पालक छथि—“स्त्रीकेँ भाइ, पिता वा पतिएक संग रहबाक चाही।” श्रुवावती एहि धर्मशास्त्रीय मानदण्डकेँ एक प्रश्नसँ खण्डित करैत छथि—“किए? हम अपन रक्षा आ देखभाल स्वयं नहि क’ सकैत छी बाबूजी!”
एहि प्रश्नक सांस्कृतिक महत्त्व असाधारण अछि। ई केवल व्यक्तिगत स्वाधीनताक प्रश्न नहि—ई मैथिली पौराणिक-नाट्य-परम्पराक भीतरसँ एक धर्मशास्त्रीय मानदण्डकेँ चुनौती देबाक नाट्य-प्रयास थिक। भारद्वाजक अन्तिम उत्तर—“सुखी रही—गृहिणी जकाँ की तपस्विनी जकाँ”—ओ अपनहुँ श्रुवावतीक आत्मनिर्णयकेँ स्वीकार क’ लैत छथि। पितृसत्तात्मक संरचना एतय आत्म-समर्पण करैत अछि—एक नाट्य-क्षण जे भारतीय स्त्री-केन्द्रित नाट्य-परम्पराक (मैत्रेयी, गार्गी, शकुन्तला)क क्रमागत अगिला पड़ाव थिक।
२.४ वक्रोक्ति-दृष्टि : ‘अर्थवान’ शब्दक बहु-आयामी ध्वनि
कुन्तकक वक्रोक्ति-सिद्धांत आ आनन्दवर्धनक ध्वनि-सिद्धांत दुनूक परिप्रेक्ष्यमे ‘अर्थवान’ शब्द एहि नाटकक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पद थिक। अभिधातः—‘महत्त्वपूर्ण/उपयोगी’; लक्षणातः—‘सार्थक जीवन जीबएवाला’; व्यंजनातः—‘जे हमर अस्तित्वकेँ अर्थ दैत हो’। ई तृतीय अर्थ नाटकक दार्शनिक आत्मा थिक—श्रुवावती कोनो बाह्य मानदण्ड (सुन्दरता, सम्पत्ति, शौर्य) नहि, एक अन्तरंग ‘अर्थ’क सम्बन्ध खोजैत छथि।
एहि शब्दक वक्रोक्ति एतय अछि—देवराज इन्द्र, जे सर्वशक्तिमान छथि, बहु-विवाहित छथि, स्वर्गक स्वामी छथि—ओ एक ऋषि-कन्याक ‘अर्थवान’ बनबाक परीक्षामे असफल होइत छथि, आ अंततः चिता-दृश्यमे जा क’ स्वयंकेँ ‘अर्थवान’ सिद्ध करैत छथि। एहि उनटा परीक्षामे वक्रोक्ति आ व्यंग्य एकहि संग अछि।
३. पाश्चात्य नाट्य-सिद्धांत
३.१ सिमोन द बोउवार : ‘दोसर लिंग’ आ स्त्री-कर्तृत्व
फ्रांसीसी दार्शनिक-नारीवादी सिमोन द बोउवार (Simone de Beauvoir, १९०८–१९८६) अपन ‘द सेकेण्ड सेक्स’ (Le Deuxième Sexe, १९४९)मे घोषणा कएलनि—“one is not born, but rather becomes, a woman” (स्त्री जन्म नहि लैत, बनाओल जाइत अछि)। ओ तर्क देलनि जे स्त्रीक ‘अन्यता’ (otherness) सामाजिक-सांस्कृतिक निर्माण थिक।
श्रुवावतीक चरित्र बोउवारक एहि सिद्धांतक एक पौराणिक-नाट्य उदाहरण थिक। पिताक संरक्षण, राजकुलक विवाह-प्रस्ताव, इन्द्रक ‘मरणोपरांत’ प्रस्ताव—ई सभ श्रुवावतीकेँ एक वस्तु बनेबाक प्रयास थिक। श्रुवावती प्रत्येक बेर एहि प्रयासकेँ अस्वीकार क’ अपनाकेँ कर्ता बनेबाक दावा करैत छथि। हुनकर अन्तिम वाक्य—“हमरा तैँ हरदम स्वीकार छल प्रिय! अहाँ अपने कहूँ!”—एहि कर्तृत्वक पराकाष्ठा थिक—विजय हुनकर अछि।
३.२ सार्त्र : अस्तित्ववाद आ ‘अर्थ-निर्माण’
फ्रांसीसी दार्शनिक ज्याँ-पॉल सार्त्र (Jean-Paul Sartre, १९०५–१९८०) अपन अस्तित्ववादक केन्द्रीय घोषणा कएलनि—“existence precedes essence” (अस्तित्व सारसँ पहिने आबैत अछि)। मानव जन्मसँ कोनो पूर्व-निर्धारित ‘सार’ (essence) नहि लैत—ओ अपन स्वतंत्र निर्णयसँ अपनाकेँ परिभाषित करैत अछि।
श्रुवावतीक दर्शन सार्त्रीय अस्तित्ववादक एक पौराणिक-नाट्य प्रतिरूप थिक। ऋषि-कन्या होएब एक जन्म-दत्त ‘essence’ थिक; ‘स्वतंत्र-स्वावलम्बी व्यक्ति’ होएब हुनकर स्व-निर्मित ‘existence’ थिक। “अहीं कहने छी, अपवादों सँ नियमक पुष्टि होइत छै। हमरा आहाँ अपवाद बन’ दिअ’ बाबूजी!”—ई वाक्य सार्त्रक ‘radical freedom’ (मूलभूत स्वतंत्रता)क एक मैथिली अभिव्यक्ति थिक।
सार्त्र ‘mauvaise foi’ (bad faith / अ-प्रामाणिक जीवन) कहैत छलाह ओहि स्थितिकेँ जाहिमे व्यक्ति अपन स्वतंत्रतासँ मुँह मोड़ि परम्परा-आज्ञाक शरण लैत अछि। इन्द्रक बहु-वेश-प्रयास (वृद्ध, वशिष्ठ) एहि ‘mauvaise foi’क देवत्व-संस्करण थिक—देवराज अपन यथार्थ पहचानसँ मुँह नुका क’ परीक्षा दैत छथि। श्रुवावती प्रत्येक वेश भेदि दैत छथि—“हम तखने विवाहित भ’ गेलहूँ जखन हृदयमे स्थान देलहूँ”।
३.३ बाख्तिन : बहु-स्वरीय नाटक आ ‘डायलॉजिज्म’
मिखाइल बाख्तिन (Mikhail Bakhtin) अपन ‘डायलॉजिज्म’ (Dialogism) सिद्धांतमे तर्क दैत छलाह जे भाषा स्वभावतः बहु-स्वरीय (polyphonic) होइत अछि—प्रत्येक शब्दमे अनेक आवाज गूँजैत अछि। एहि नाटकमे सर्वाधिक उल्लेखनीय ‘डायलॉजिज्म’ थिक—समापनक उर्दू शेर।
दुष्यन्त कुमार (१९३१–1९७५)क प्रसिद्ध उर्दू शेर—“कौन कहता है कि आसमाँ में सुराख हो नहीं सकता / एक पत्थर तो तबीअत से उछालो यारो”—मैथिली पौराणिक नाटिकाक समापनमे एकाएक उभरैत अछि। एहि ‘बहु-स्वरीय’ समापनमे एकहि क्षणमे तीन भाषा-संस्कृति उपस्थित अछि—मैथिली पौराणिक आख्यान, हिन्दी उर्दू काव्य-परम्परा, आ आधुनिक राजनीतिक चेतना (आकाशमे सुराख = असम्भवकेँ सम्भव करब)। ई बाख्तिनक ‘heteroglossia’ (बहु-भाषी संवाद)क एक विशिष्ट नाट्य-उदाहरण थिक।
३.४ पीटर ब्रूक : ‘खाली मंच’ आ रंगमंचीय मितव्ययिता
ब्रिटिश निर्देशक पीटर ब्रूक (Peter Brook, १९२५–२०२२) अपन ‘द एम्प्टी स्पेस’ (The Empty Space, १९६८)मे घोषणा कएलनि—“एक व्यक्ति खाली मंच पर चलैत अछि, दोसर व्यक्ति ओकरा देखैत अछि—बस, एतबे रंगमंचक लेल पर्याप्त अछि।” ब्रूकक ‘Holy Theatre’ (पवित्र रंगमंच) सिद्धांतमे ओ माँगैत छलाह जे दृश्य-सामग्री न्यूनतम होए जाहिसँ दर्शकक कल्पना सक्रिय हो।
एहि नाटिकाक त्रिस्तरीय खाली मंच ब्रूकक ‘खाली मंच’क एक सटीक मैथिली-पौराणिक संस्करण थिक। “स्तरक उपयोग कखनो प्लेटफार्म, कखनो सीढ़ी जकाँ”—दृश्य-सामग्री नहि, स्थान-सम्भावना। इन्द्रक अन्तर्धान आ पुनः प्रकटन, फलक पाथर बनब, चिताक निर्माण—ई सभ ‘प्रकाश-परिवर्तन’ आ अभिनय-क्रियाद्वारा निर्मित होइत अछि, नहि कि भारी दृश्यावली सज्जासँ। ब्रूकक ‘holy theatre’ यैह थिक—जाहिमे दर्शकक आत्म-चेतना जागृत होइत अछि।
४. चीनी नाट्य-सिद्धांत
४.१ युआनफेन : भाग्य-निर्धारित प्रेम आ श्रुवावतीक चुनौती
चीनी सांस्कृतिक-दार्शनिक परम्परामे ‘युआनफेन’ (fate-bound love / भाग्य-सम्बन्ध) एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा थिक—दू आत्माकेँ मिलाबएवला एक पूर्व-निर्धारित दैवी डोरि। चीनी काव्य-नाट्यमे प्रायः ‘युआनफेन’क साकार होएब नाटकक लक्ष्य होइत अछि।
श्रुवावती-इन्द्रक सम्बन्धमे ‘युआनफेन’ जटिलतापूर्वक उपस्थित अछि—श्रुवावती इन्द्रकेँ ‘मोनक देवता’ कहैत छथि, माला गँथैत छथि—ई ‘युआनफेन’क स्वीकृति थिक। मुदा ओ इन्द्रक शर्त (‘मरणोपरांत’) नहि मानैत छथि—ई ‘युआनफेन’क पुनः-परिभाषा थिक। श्रुवावती कहैत छथि जे ‘युआनफेन’ दैवी-निर्धारित भऽ सकैत अछि, मुदा ओकर समय आ शर्त स्वयं तय करब—ई स्त्री-कर्तृत्वक एक सूक्ष्म अभिव्यक्ति थिक।
४.२ काओयान : परीक्षा-नाट्य-परम्परा
चीनी शास्त्रीय रंगमंचमे ‘काओयान’ (test/trial) एक प्रमुख नाट्य-उपकरण थिक। चीनी लोककथा-नाटकमे अनेक उदाहरण अछि जाहिमे प्रेमीक निष्ठाकेँ एक असाधारण परीक्षासँ सिद्ध करबाक चाही। प्रसिद्ध ‘लियाङझू’ (Butterfly Lovers) कथाक नाट्यीकरणमे सेहो निष्ठाक परीक्षा केन्द्रमे अछि।
एहि नाटकमे ‘काओयान’ एक उनटल संरचनामे अछि—सामान्यतः नायकक निष्ठाकेँ परखल जाइत अछि; एतय नायिका स्वयं परीक्षार्थी छथि (इन्द्र द्वारा दत्त ‘फल-परीक्षा’), आ परीक्षक इन्द्र स्वयं परीक्षित होइत छथि (श्रुवावतीक चिता-संकल्प इन्द्रकेँ विचलित करैत अछि)। ई उनटल ‘काओयान’ नाटकक मौलिकताक प्रमाण थिक—परीक्षक स्वयं परीक्षित भ’ जाइत अछि।
४.३ यीझी : इच्छाशक्ति आ नियोकन्फ्यूशियाई नैतिकता
नियोकन्फ्यूशियाई दार्शनिक (विशेषतः वांग यांगमिंग, १४७२–१५२९) ‘यीझी’ (moral will / नैतिक इच्छाशक्ति) आ ‘झी लियाँगझी’ (extending innate moral knowledge / सहज नैतिक ज्ञानक विस्तार) पर बल दैत छलाह। ओ मानैत छलाह जे मनुष्यक भीतर सहजाततः एक ‘नैतिक ज्ञान’ विद्यमान अछि—बाहरसँ थोपल नहि।
श्रुवावती ‘यांगमिंग’क अर्थमे एक ‘यीझी-सम्पन्न’ पात्र छथि। हुनकर ‘अर्थवान’क माँग, वशिष्ठ-वेशमे इन्द्रकेँ ‘अनकर स्त्री’ घोषित कएनाइ, आ चिता-संकल्प—ई सभ बाहरसँ शिखाओल नहि, भीतरसँ उपजल नैतिक निर्णय थिक। नाटककारक अपन सन्देश—“आत्मबल, मनुष्यक सब सँ पैघ संपत्ति अछि”—वांग यांगमिंगक दर्शनसँ अद्भुत साम्य रखैत अछि।
४.४ बेइजू: चीनी त्रासदी-सिद्धांत आ एहि नाटकक ‘जय’
चीनी नाट्य-चिन्तकक परम्परामे यह प्रश्न उठाओल गेल अछि जे चीनी नाटकमे पाश्चात्य अर्थमे ‘बेइजू’ (tragedy) अछि वा नहि। वांग गुओवेई तर्क देलनि जे चीनी शास्त्रीय नाटकमे ‘दुखद परिस्थिति’ होइत अछि, मुदा अंत सामान्यतः समझौता वा समन्वयमे होइत अछि। एहि ‘अर्ध-त्रासदी’केँ ओ ‘दुखी खोज’ कहलनि।
एहि नाटकक शीर्षकक ‘जय!’ शब्द यैह बताबैत अछि जे ई ‘बेइजू’ नहि, ‘बेइ झोंग योऊ शी’ (joy within sorrow)क एक रूप थिक। फलक पाथर बनब, चिता-संकल्प—ई दुखद; मुदा इन्द्रक स्वीकार आ ‘जय’ क उद्घोष—ई समन्वय थिक। मुदा विशेष ई जे एहि ‘जय’क नायिका श्रुवावती छथि, देवराज इन्द्र नहि—ई एक महत्त्वपूर्ण उलटफेर थिक।
५. इजरायली नाट्य-सिद्धांत
५.१ हनोख लेविन : मानव-प्रतिष्ठाक नाट्य-रक्षा
इजरायलक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण नाटककार हनोख लेविन (Hanoch Levin, १९४३–१९९९) अपन नाटकमे बेर-बेर ओइ प्रश्नसँ जुझलाह—मानव-प्रतिष्ठाक (human dignity) कोन-कोन व्यवस्थाक विरुद्ध रक्षा करबाक चाही? हुनकर ‘द लेबर ऑफ लाइफ’ (The Labour of Life) जेकाँ नाटकमे स्त्री-पात्र प्रायः सामाजिक-पारिवारिक दबावक विरुद्ध अपन अस्मिताक लड़ाइ लड़ैत अछि।
श्रुवावतीक स्थिति लेविनक स्त्री-पात्रसँ एक महत्त्वपूर्ण भेदक संग समान अछि। लेविनक स्त्री प्रायः असफल होइत अछि—व्यवस्था ओकरा निगलि जाइत अछि। श्रुवावती विजयी होइत छथि। ई भेद कुणालक आशावादी मानवतावादक प्रमाण थिक—ओ लेविनक क्रूर यथार्थवादसँ भिन्न एक भारतीय-पौराणिक आशावाद लैत छथि जाहिमे ‘आत्मबल’क अन्ततः विजय होइत अछि।
५.२ एली रोजिक : बहु-भूमिका आ ‘परिवर्तनशील पहचान’क प्रतिमात्मकता
एली रोजिकक प्रतिमात्मकता (theatrical iconicity)क सिद्धांत एहि नाटकमे एक विशेष परीक्षामे पड़ैत अछि—बहु-भूमिका अभिनय (multi-role performance)। एक्के अभिनेता भारद्वाज, वृद्ध, वशिष्ठ आ इन्द्र बनैत अछि।
रोजिकक प्रश्न—जखन एक अभिनेता अनेक पात्र खेलाइत अछि, तखन दर्शक कोन ‘प्रतिमा’ देखैत अछि? रोजिक तर्क दैत छलाह जे दर्शक एकहि संग दू ‘प्रतिमा’ देखैत अछि—अभिनेताक आ पात्रक—एहि द्वैत-दर्शनमे रंगमंचक विशिष्ट सौन्दर्य निहित अछि। एहि नाटकमे एहि ‘डबल आइकॉनिसिटी’क एक विशेष राजनीतिक अर्थ अछि—इन्द्र वृद्धक वेशमे आ वशिष्ठक वेशमे परीक्षा लैत छथि; दर्शक जनैत छथि जे ई इन्द्र छथि—ई ‘dramatic irony’ (नाट्य-विडम्बना) थिक जाहिमे श्रुवावतीक सत्य-दृष्टि आर अधिक उज्ज्वल भ’ जाइत अछि।
५.३ उत्तर-हॉलोकास्ट नाट्य-चिन्तन : ‘अग्नि’ आ ‘अस्तित्व’
इजरायली रंगमंच-विद्वान ड्वोरा बेन शाउल (Dvora Ben-Shaul) आ अन्यक उत्तर-हॉलोकास्ट नाट्य-चिन्तनमे अग्नि एक अत्यन्त भार-वाहक प्रतीक (loaded symbol) बनि गेल अछि—विनाश आ उत्तरजीविता (survival) दुनू एकहि संग संग्रहित अछि।
श्रुवावतीक चिता-दृश्य एहि परिप्रेक्ष्यसँ एक जटिल प्रतिमा बनैत अछि। अग्नि-प्रवेश पारम्परिक भारतीय परम्परामे ‘सती’क प्रतीक थिक—एक पितृसत्तात्मक संस्था। कुणाल एहि प्रतीककेँ उनटैत छथि—श्रुवावतीक चिता ‘मरबाक’ नहि, ‘जीबाक माँग’क अभिव्यक्ति थिक। ओ स्वयं आगि लगाबैत छथि, आ घोषणा करैत छथि—“प्रियक स्मरण करैत हम अग्नि-प्रवेश करब।” ई ‘नहि जीबाक’ नहि, ‘प्रेमसहित जीबाक वा नहि जीबाक’क द्विभाजन थिक। इजरायली दृष्टिसँ एहि ‘उत्तरजीविताक राजनीति’मे श्रुवावती एक ‘witness’ (साक्षी) छथि—ओ अपन अस्तित्वकेँ ‘प्रमाण’ बनाबैत छथि।
५.४ याकोव शाबताई : समापनक उर्दू शेर आ ‘अन्तर-सांस्कृतिक संवाद’
इजरायली नाटककार याकोव शाबताई (Yaakov Shabtai, १९३४–१९८१) अपन ‘पास्ट कन्टीन्यूअस’ (Past Continuous) जेकाँ कृतिमे भाषाक प्रयोग एक प्रमुख सौन्दर्यशास्त्रीय उपकरण बनाबैत छलाह—हिब्रू, यिद्दिश आ अरबीक मिश्रण एहि सांस्कृतिक संकरताक अभिव्यक्ति थिक।
कुणालक मैथिली नाटिकाक समापनमे उर्दू शेरक प्रयोग शाबताईक अन्तर-सांस्कृतिक संवादक समानांतर थिक। मैथिली + पौराणिक सन्दर्भ + उर्दू काव्य-परम्परा—ई संयोग मात्र सजावट नहि, एक सांस्कृतिक-राजनीतिक वक्तव्य थिक—जे ‘आत्मबल’क भाषा सीमा नहि मानैत अछि, जे एहि सन्देशक उर्दू अभिव्यक्ति ओतबे प्रामाणिक अछि जतेक मैथिली। दुष्यन्त कुमारक ‘एक पत्थर तो तबीअत से उछालो’ श्रुवावतीक चिता-संकल्पक उर्दू अनुवाद थिक।
६. चतुर्भुज-संश्लेषण : ‘जय’क बहुआयामी अर्थ
चारू नाट्य-परम्पराकेँ एकठाम राखि देखल जाए तँ ‘प्रेम-प्रतिज्ञा उर्फ श्रुवावतीक जय!’क केन्द्रीय प्रश्न स्पष्ट होइत अछि—‘जय’ केकर थिक, आ ओ ‘जय’ केहन?
भारतीय दृष्टि—शृंगारक तीनू उपभेद; धर्मशास्त्रक स्त्री-मानदण्डकेँ नाट्य-खण्डन; ‘अर्थवान’क त्रि-स्तरीय ध्वनि; चिता = भक्ति-परम्पराक पुनःव्याख्या।
पाश्चात्य दृष्टि—बोउवारक ‘subject’-बनब; सार्त्रक radical freedom; बाख्तिनक heteroglossia (उर्दू शेर); ब्रूकक ‘holy theatre’ (खाली मंच)।
चीनी दृष्टि—युआनफेनक पुनःपरिभाषा; उनटल काओयान; वांग यांगमिंगक यीझी = आत्मबल; ‘बेइ झोंग योऊ शी’ जयन्ती।
इजरायली दृष्टि—लेविनक स्त्री बनाम कुणालक आशावादी आत्मबल; रोज़िकक double iconicity; अग्नि = उत्तरजीविताक राजनीति; शाबताईक अन्तर-सांस्कृतिक संवाद।
चारू परम्पराक साझा निष्कर्ष—श्रुवावतीक ‘जय’ एक ब्यक्तिगत प्रेम-विजय नहि। ई एक दार्शनिक ‘जय’ थिक—‘आत्मबल’ (जे भारतीयमे साहस, पाश्चात्यमे freedom, चीनीमे यीझी, आ इजरायलीमे dignity थिक) क ‘जय’। शीर्षकक विस्मयादिबोधक चिह्न (‘!’) यैह कहैत अछि—ई घोषणा थिक, विवरण नहि।
अगिला अंकमे : विश्वासक शक्ति उर्फ सुकन्याक विवाह
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