VIDEHA ISSN 2229-547X  ·  First Maithili Fortnightly eJournal  ·  Since 2000  ·  www.videha.co.in
विदेह — प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका — First Maithili Fortnightly eJournal

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रामकृष्ण परार्थी

जमाना बदलि गेलैं

डीएसपी रामशरण पासवानकेँ नौकरी करैत पंदरह वर्ष भ' गेल छलैं, अहीं पंदरह वर्षक दरिमयान ओ पूरा बिहार घुमि-घामिक' पहिल बेर अपना गृह अनुमंडलमे ज्वाइनिंग कैएने छल से मोनमे कइक प्रकारकेँ उत्साह आ संकल्प छलैं, कानून व्यवस्थाकेँ ल' क' ओ जतेक शख्त छल   ततेबे गरीब-गुरबा शोषित वंचित भेल ओकरा हीयामे करुणा भरल छलैं, दोसर अपन माटि-पानिकेँ प्रति लगाव ओकरा आम-आदमीकेँ लगिच आएल छलैं, पहिने जे एगो पुलिस अधिकारी आ आम-आदमीक बीच दूरी होइत छलैं से आब एकदमसँ समाप्त भ' गेल छलैं, लोकसभ बिनु डर-भगकेँ अपन फिरसानी ल'क' आंकरा समक्ष पहुँचैत छल आ ओ यथासंभव लोकक फिरसानीकेँ दूर करबाक चेष्टामे लागि जाइत छल, सच्च कही त' ओ जहियासँ अपन गृह अनुमंडलमे योगदान देने छल तहियासँ ओकरा अनुमंडलमे केस-फौदारिकेँ मामिला बहुत कम भ' गेल छलैं, पासवानजीकेँ दिशा-निर्देशसँ पुलिस छोट-छिन विवादकेँ ग्राम पंचायत स्तर पर सुलझाक' लोकक अनावश्यक आर्थिक नुकसानकेँ बचबयमे लागि गेल छल।

डीएसपी साहब आने दिन जकाँ आइयो ससमय अपना ऑफिसमे पहुँचक' फाइल सभकेँ निरीक्षण करयमे लागल छल कि अचक्के अरदली आबिक' सूचना देलकैं—'सर कोई आपका ग्रामीण आपसे मिलना चाहता हैं, वह अपना नाम बेचन पाण्डे बता रहा हैं।'

बेचन पाण्डेकेँ नाम सुनिते डीएसपी रामशरणकेँ मानस-पटल पर पाण्डेकेँ जातीय दंभ आ सामंती प्रवृतिबला मोचंड छवि स्पष्ट नजिर आबैय लगलैं ओ यादि करय लागल अभाव आ अपमानसँ भरल अपना बचपन के, जाति-वर्णक वैमनस्यतासँ भरल अपना गाम-समाजकेँ, बेचन पाण्डे गामक कोनो बहुत पैघ जमींदार निह छलैं, बाप शोभन पाण्डेकेँ माथ पर चौदह बीघा जमीन रहैं आ ओहि चौदह बीघा जमीनमे बेचन पाण्डे आ भूवन पाण्डे दू भाइ आनेकि दुनू भाइकेँ मात्र सात-सात बीघा हिस्सा बँटाएल रहैं मुदा दुनू भाइकेँ घमंड एतेक कि जेना दरभंगा महाराजा होथि, जौन-बोनिहारकेँ

गारि-फजइत केनाय आ केकरो जातिसूचक शब्दसँ संबोधन केनाय ओकरा दुनू भाइ लेल शानक गप्प रहैय।

एक दिनक गप्प छैय, ओहि समय रामशरणकेँ उमेर मात्र आठ-नौ बर्खँ होइत हेतैं, बेचन पाण्डेकेँ पितियौत बहिनकेँ बियाह रहैं, एहि बियाह ल'क' भिर गाममे चर्चा रहैं कि वीसीआर आबि रहल छय से वीसीआर देखबाक लालचमे भिर गामक बाल-बुतरू सभ साँझसँ ओतय जुटान लगौने रहैं, एम्हर पंडाल बिनाक' तैयार भ' गेल रहैं आ जयमाला बमा मंचकेँ टूटा कारीगर सजावयमे व्यस्त रहैं, पंडालक एक कोनमे कुर्सी सभ सैइंतक' सेहो राखल रहैं, अधिकांश बच्चा ओहि पंडालक बाहर धमाचौकरी मचौने रहैं मुदा किछु एहनो बच्चा सभ रहैं जे सैइंतलाहा कुर्सीमेसँ कुर्सी निकालि संच-मंच बैसिक' जयमालाबला मंचके सजावयबला कारीगरकेँ शिल्प कौशल देखयमे लागल रहैं ओहि समय बेचन पाण्डे दू-चारि आदमीकेँ ल'क' कुर्सीकेँ सुसज्जित ढंगसँ रखबाक लेल पंडालमे पहुँचल कि अचक्के ओकर नजिर कुर्सी पर बैसल रामशरण पर पड़ि गेलैं आ ओ आगि बबूला भ'क' रामशरणकेँ दुर्वचन कहैत बाजल—'सार दुसाध-मुसहर भ'क' कुर्सीए पर बैइसत, भगले कि निह भगले एत' से।'

बेचन पाण्डेकेँ मोचंडपनी देखिक' आर बच्चा सभ पंडालसँ बाहरि निकलिक' पुनः खेल'-कुद'मे व्यस्त भ' गेल मुदा कुशाग्र-बुद्धि आ आत्मस्वाभिमानी रामशरण आत्मग्लानिसँ भिर गेल ओकरा संगे एतेबे उमेरमे जे जाति आधारित घटना सभ घटल छलैं एक-एक क' मोन पड़ैय लगलैं जाहिसँ हीयामे अनेको तरहक प्रश्न सभ हिलकोर मारय लगलैं, हमरा सभकेँ लोक सभ अछोप किएाक कहैं छैक? की हम सभ आदमी निह छीक'? की दुसाध-मुसहरकेँ कुर्सी पर बैस'क' अधिकार निह हइक? आ फेर मोने-मोने पछताय लागल, कतेक नीक बाबू कहैं छल बौआ रौ निह जो ओहि टोला, पढ़बे-लिखबे त' काम देतौ, इ वीसीआर देखला से पेट निह भरि जेतौ बेकार हम बाबूके बात काटिक' एत' अइली, निह आब निह रहब हम एत' बेचन पाण्डे दू थपड़ मारि दित त' कतौ अढ़ूमेसँ चोरा-नुकाक' वीसीआर देखिओ लिति मुदा एहन जहर जन बात सुनिक' आब एत' रहनाय बर्दाशत से बाहर बुझाय हैक', जाइ छी घरे सुति रहब ओ अपनाकेँ घोइंटक' कानन सन मुँह कैएने घर लेल विदा भ' गेल।

घर आएल त' बाप जगले रहैं, लालटेनक मढ़िम इजोतमे बेटाक लटकल मुँह देखिक' पूछलक—'कि भेलौग', ककरो से झगड़-लड़ाइ केलहीग कि? रामशरण कोनो उतारा निह देलकैं चुपचाप रहि गेल, बाप बेसी पढ़ल-लिखल निह छलैं मुदा बेटाक भाव-भंगिमा पढ़ब खूब नीकसँ जानैत छलैं ओ बेटाकेँ कानन सन मुँह पढ़िक' बुझि गेल छल कि एकरा कोई मारि-पिट आनेत' गारि-फजहित जरूर कैलकेंग जाहि कारणे एकर मुँह लटकल हइ अहि बेर ओ बेटाकेँ पुचकारिक' पूछलक—'कह न बौआ की भेलौग व कैइला कानन सन मुँह कैएने छे? कोइ मारलकौग' की? किछु कहबे तबे ने हम्हु बुझबे।'

बापक पिआर भरल दू बोलीसँ ओकरा हीयामे जे जमकल अपमान-अनादरक भाव रहैं से आँखि मेहे लगलैं ओ अवोड़्कार कानैत बापसँ कहय लागल—'कुर्सी पर बैसि गेल छिलअइ त' बेचन पाड़े गारि दिअ लागल आ कहलक सार दुसाध-मुसहर भ'क' कुर्सी पर बैसल छेक' भगले कि निह भगले एत' से।'

बापक मोन तामसे बहीर भ' गेलैं, मोन भेलैं जे एखिनए दौड़क' जाइ आ बेचन पाण्डेक संग उठा-पटक करि मुदा अपन आर्थिक समाजिक आ दैहिक औकाति ओकरा नीकसँ बुझल छलैं ओ मजबूर भ' गेल बेचारा आ एगो मजबूर बाप सांत्वना-सहानुभूतिकेँ सिवाय अपना संतितकेँ दैये की सकैत छल अपना बेटाकेँ समझाबय लागल। चुप रह बौआ निह कान, हमरा बुझल छल जे ओहि टोलक लोकसभ धनटेड़ हइक', ओकरा सभकेँ अपना जाति पर घमंड हइ, ओ सभ एम्हरका लोकसभ के आदमीमे गीनती निह करय हइक, तही लेल तोरा हम ओहि टोला जाइसे मना करैं छिलओंग' मुदा हमर एगो गप्प सुनि ले बौआ ओकर सभसे हम तो' लाठीके बल पर मुकाबला निह क' सकैं छहीक' ओकरा सभकेँ पछाड़य लेल जी-जान लगाक' राति-दिन पढ़य पड़तौ बाबा साहब कहने छथिन शिक्षा शेरनी के दूध होइ हइ जे पीतैं से दहारतैं, आइ ऊ तोरा अपमानित क'क' कुर्सी परसँ उठेलकौग' लेकिन काल्हि जँ कहीं तो' पढ़ि-लिखक' उच्च पद पर चलि गेलैं त' वेह तोरा बैसिभ लेल सम्मान पूर्वक कुर्सी देतौ।

डीएसपी साहब अपन अतीतक यादि कैएए रहल छय की आदेश लेबाक लेल प्रतिक्षारत ठाड़ अरदली फेरसँ टोकलकैं—'साहब क्या करें बेचन पाण्डे को भेज दे?'

अरदलीकेँ टोकलासँ डीएसपी साहबकेँ धिआन भंग भेलैं आ ओ अतीतसँ घुमि-घामिक' वर्तमानमे अबैत बाजल—'हँ भेज दो।'

किछुए देरमे बेचन पाण्डे डीएसपी साहबकेँ चेम्बरमे आएल आ निह चाहितो अपनासँ बीसो बर्खक छोट रामशरणकेँ हाथ जोड़ि अभिवादन कैएलक।

रामशरण खूब नीकसँ बुझैत छल जे बिनु कारणे कौवा निह लगैं छैं, एकरा डमरासँ कोनो-ने-कोनो काम जरूर होतैं निह त' एकरा सन जातिय दंभ झखयबला लोक हमरा सन अछोप जातिकेँ एना हाथ जोड़िक' अभिवादन निह क' सकैं छय, थोड़े देर लेल मोनमे इहो खिआल एलैं कि एकरासँ बदला लेबाक लेल एगो नीक अवसरि भेटल अछि एकरो बिनु कुर्सी पर बैसिने ठाड़े राखिक' गप्प-सप कैल जाय मुदा संवैधानिक पदक गरिमाकेँ खिआल अबितो ओ व्यक्तिगत वैमनस्यताकेँ बिसरिक' ओकरा कुर्सी पर बैसिकेँ इशारा करैत मैथिलीएमे पूछलक—'की हमरासँ कोनो काम अछि पाण्डेजी?'

पाण्डेजीकेँ काज लेबाक छलैं बड़ पुचकारिक' बाजल—'जी श्रीमान अपनेसँ काम अछि तेँ अयलहुँ अछि।'

डीएसपी साहब सहज भावसँ बाजल—'की काम अछि से खुलिक' बाजु।'

'की बाजु श्रीमान, उल्टे चोरी आ ऊपरसँ सीना-जोरी बला जमाना चलि रहल छैय, काल्हिखन रमेसरा गबार हमर मसूरिओ चरा लेलक आ जखन हमर बेटा मना कैएलकैं त' ओकर हाथोँ तोड़ि देलकैं आ फेर वेह उल्टे झूठ-फूसके हमरा दुनू बापते पर केसो क' देलक, देखियौन' (कुर्ता ऊपर उठाक' पीठ देखबैत) बाँससँ मारि क' हमर पीठ जे फारि देने अछि।'

डीएसपी रामशरणकेँ पुलिसगीरीकेँ नम्हर अनुभव छलैं, दोसर ओ बेचन पाण्डे'क मोचंड व्यक्तित्वसँ सेहो परिचित छल, ओकरा बुझवामे किनको भाडठ निह भेलैं कि ई एकदमसँ सफेद झूठ बाजि रहल अछि, तइयो ओकर पीठ निहारैत पूछलक—'आ अहाँ दुनू बापते ओकरा किछु निह कहलियैं।'

पाण्डे अपन सफाई दैत बाजल—'ओ जखन ढाठमेसँ एगो बाँसक खुड़ा उखाड़िक' ओहिसँ मारि हमरा बेटाकेँ हाथ तोड़ि देलक त' हम्हुँ ओकरा पर एगो ढेला फेकिलियैं किनसाइत वेह ढेला ओकरा माथमे लागि गेलैं त' सुनैत छिये केस कैलक अछि जे बेचन पाण्डे दुनू बापते मारिक' कपार फोड़ि देलक।'

बेचन पाण्डेक पीठ पर एक जगह बाँसक दाग छलैं वेह... डीएसपी साहब बाजल—'हँ पीठ त' एक जगह अहुँकेँ फूटल अछि, अहुँ एफ आइ आर करौलय'य की?'

बेचन पाण्डे घमंडसँ बाजल—'त' छोड़ि कोना दिअइ श्रीमान ओकरा निह कोनो औकाति छैय से ओतेक कुदैत अछि आ हमरा त' केहुना भगवान छः बीघा जमीन देने अछि, बुझबैय एक डेढ़ बीघा ओकरे नासयमे बबाँद क' देलियैं।'

रामशरण पुलिसया अंदाजमे पुचकारि-पुचकारिक' बेचन पाण्डेकेँ थाहि रहल छल, ओ अरदलीकेँ बजावय लेल टेबुल परहक घण्टीकेँ बजावैत पाण्डेसँ कहल— हमरा त' जनतब छल जे अपनेकेँ सात बीघा जमीन छैय।'

'जी अपनेकेँ सही बुझल छल, हमरा दुनू भाइमे सात-सात बीघाक' हिस्सा बँटायल रहैं मुदा एगो बेटीक बिआह आ देही-नेहीमे एक बीघा बेच देलियैं।'

घण्टीक आवाज सुनि अरदली चेम्बरमे आबि अपन उपिस्थित दर्ज करौलक—'जी सर।'

डीएसपी साहब अरदलीकेँ आदंश दैत कहलक—'जाओ पाण्डेजी के लिए एक कप चाय लेके आओ!' आ फेर पाण्डेसँ बतियाय लागल—'पाण्डेजी अहाँकेँ दुटा बेटा अछि किने।'

'जी श्रमान।'

'दुनू की सभ करैत अछि आ केते धरि पढ़ल-लिखल अछि?'

'बड़का सुजित सात-आठ किलास धरि पढ़लक आ फेर पढ़य-लिखयमे मोन निह लगलैं त' हमरा संगे खेती-बाड़ी करय लागल आ छोटका विक्रमजीत जे मैट्रिक पास कय क' घुमयकेँ नाम पर एक बेर दिल्ली गेल से आइ दू बर्खँ भ' गेलैं ओम्हरे कोनो फैक्ट्रीमे काम पकड़ि लेलक केतबो कहैत छिये रौ एखन पढ़य-लिखयकेँ उमेर छौ कोनो कॉलेजमे नाम लिखाले त' कहैत अछि यौ आब

हमरा पढ़'-लिख'केँ मोन ने करैत अछि कमाही दिअ।'

'त' कमाइत अछि बढ़ियाँसँ।'

'धूर की कमाओत, केनाहिओ अपन पेट पालैत अछि।'

अरदली किछुए देरमे चाय लाबिक' बेचन पाण्डेकेँ आगू राखि देलकैं, डीएसपी साहब पाण्डेकेँ चाय पीबाक आग्रह करैत बाजल—'पाण्डेजी अहाँ चाय पीबु, हम पाँच मिनटमे अबैत छीओ।'

एतेक कही ओ ऑफिससँ बाहर चलि आएल आ सम्बन्धित थानाध्यक्षकेँ फोन लगाक' वाकस्थितिकेँ जानकारी लेबय लागल, थानाध्यक्षकेँ कथन रहैं—'सर मैं जानता था कि वह आपका गाँव हैं, कभी न कभी मामला आपके पास जाएगा ही, इसलिए मैं पूरी लगन और इमानदारीकेँ साथ तहकीकात किया हूँ, प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि अभियुक्त रमेसर यादव दिनकेँ करीब दस बजे अपने भैंस और परू को चराकर गाँव के पश्चिम में जो बांध है उस पर से वापस आ रहा था, उसी बांध से सटे बेचन पाण्डे का जमीन है जिसमे वर्तमानमें मसूरी की फसल लगी हुई है उसी खेत में बेचन पाण्डे अपने बड़े बेटे सुजित पाण्डे के साथ खढ़-पतवार बिन रहा था कि अचानक रमेसर यादव का पक बांध से नीचे उतरकर मसूरी चरने लगा, जिसे देखकर बेचन पाण्डे रमेसर यादव को भदूरी-भदूरी गालियां देना शुरू कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि परू एक या दो झाड़ियां ही अपने मुँहमे लिया था तभी आकर यादव अपने परू को खेत से हटा लिया था ऑर पाण्डे से अपनी गलती भी मान लिया था लेकिन पाण्डे की गालियां देना बन्द नहीं हुआ, बात-बात में विवाद आगे बढ़ा और जवाब में रमेसर यादव भी गाली दे दिया जिससे आक्रशित होकर बेचन का पुत्र सुजित पाण्डे वहीं बगल के खेत से ढाठ बाला एक बाँस का खुंटा उखाड़ कर रमेसर यादव के सर पर मार दिया जिससे उसका सर फट गया, अपना खून बहता देख रमेसर यादव अपना आप खो दिया और वहीं बाँस छिनकर सुजित के हाथ पर दे मारा जिससे उसका दाहिना हाथ टूट गया और वह दर्द से छटपटाता हुआ वहीं बैठ गया, अपने बेटा को इस तरह पीटते देख बेचन पाण्डे रमेसर यादव पर हँसुआ से वार करना चाहा लेकिन उससे पहले रमेसर यादव पाण्डे के पीठ पर बाँस का एक जोरदार प्रहार कर दिया और वह छिटपिटाता हुआ पीछे हट गया इतने में आस-पास के लोग पहुँचकर दोनों पक्षों में बीच-बचाव कर दिया। यहीं मेरा तहकीकात का विस्तृत विवरण हैं सर।'

जाहि प्रकारसँ दरोगाजी अपन तहकीकात विवरण सुनौलकैं ताहि हिसाबसँ डीएसपी रामशरणकेँ मोनमे कोनो तरहक संशय निह रहलैं तइयो ओ अपना भिर दरोगाक गप्पकेँ सत्यापन करबाक लेल अपन खाश मित्र शिवकृपाल महतोकेँ फोन कैएलक मुदा ओतहुँसँ लमसम वेह जानकारी प्राप्त भेलैं जे दरोगाजीकेँ कथन रहैं।

ओ पूर्णरूपेण संतुष्ट भेलाक बाद अपना चेम्बरमे आकि बैसि गेल आ पाण्डेसँ कहलक—'पाण्डेजी हम कल्हुका घटनाकेँ पूरा जानकारी दरोगासँ प्राप्त केलहुँ अछि ओ कहि रहल अछि जे अहीं बेटा ढाठमेसँ एगो बाँसक खुड़ा उखाड़िक' रमेसरकेँ कपार पर मारलकैं जाहिसँ ओकर कपार फाटि गेलैं तखन ओ अहाँ बेटाकेँ हाथ तोड़लक।'

पाण्डे चट द' बाजल—'धूर ओ दरोगा की बाजत, घूस खिएने होतैं।'

एहिबेर डीएसपी साहब पुलिसया अंदाजमे बेचन पाण्डेकेँ जोरसँ डपटलक—'खबरदार पाण्डेजी ग्रामिन बुझिक' नीकसँ बतिया लेलहुँ त' एकर मतलब ई निह कि अहाँ हमरा लग अंट-शंट बाजय लागि आइ दरोगा सच्चकेँ सच्च कही देलकैं त' ओ घुसखोर भ' गेलैं काल्हि जँ वेह फाइल हमरा लग अओतैं आ हम उचित गप्प लिख देबैं तखन अहाँ कहबे डीएसपी साहब सोलकन छलैं सोलकनमाकेँ पक्ष लेलकैं मुदा हमर एगो गप्प सुनि लिअ देश आब वर्णाश्रम व्यवस्थासँ निह भारतीय संविधानसँ चलैत छैय आ संविधानक मुख्य आधारे छैय समता स्वतंत्रता आ भाइचारा आब ओ पुरनका गप्प बिसरि जाउ जे शुकना मलाहकेँ एगो सुखलका आमक डाड़ि तोड़बाक कारणे अहाँ दुनू भाइ ओकरा मेहमे बान्हिक' जुता-चप्पलसँ मारने रहिअइ आ ओ किछु निह कहलक आब जमाना बदलि गेल छैय अहाँकेँ केकरो एकटा गारि देबै त' ओ अहाँकेँ दसटा गारि देत, अहाँकेँ केकरो एक लाठी मारबै त' ओ अहाँकेँ दस लाठी मारत तेँ नीक रहत जे अपन जातीय दंभ आ सामंती सोचकेँ परित्यागिक' संवैधानिक व्यवस्था अनुरूपेँ अपना व्यक्तित्वकेँ विकास करि, तखनिह मान-सम्मान बाँचल रहत।

डीएसपी साहब कने देर लेल चुप भेल त' बेचन पाण्डे डराइते बाजल—'उल्टे हमर मसूरिओ चरा...'

डीएसपी साहब, बेचन पाण्डेक मुँहक गप्प छिनैत बाजल—'मसूरी चरा लेलक त' अहाँ दंड लितियैं, जुमाँना करितयैं मारि-गारि पढ़बाक अधिकार अहाँकेँ के देलक।'

किछु देर चुप रहलाक पछाति डीएसपी साहब फेरसँ बाजल—'आ की कहैं छलियैं, बुझबैं एक-डेढ़ बीघा जमीन ओकरा नासयमे बबाँद क' देलियैं, अपन अरजलहा रहित ने पाण्डेजी त' ई गप्प निह फुराएत, बाप-दादाकेँ अरजलहा अछि तेँ एतेक फूटानी सुझैत अछि।'

जकड़ियाएल सामंती प्रवृति बला सोच आ जातीय दंभ बड मसकिलसँ दुटैत छैय पाण्डे अपन घटिया सोचकेँ मान-सम्मानसँ जोड़ैत बाजल—'जखन इज्जत-प्रतिष्ठा निह रहत श्रीमान तखन जथा-जमीन ल'क' की हेतैं।'

पाण्डेकेँ कुंठित सोच देखिक' डीएसपी साहब घृणाकेँ भावसँ बाजल—'जेहन अहाँकेँ सोच अछि पाण्डेजी आ जेहन बेटा सभकेँ संस्कार द' रहल छियैं तेहनामे जाहि जथा-जमीन पर अहाँकेँ एतेक घमंड अछि ओ बहुत जल्दीए समाप्त भ' जाएत, ओना अहाँ किहिओ रहल छियैं जे छः बीघा जमीन अछि ओहिमेसँ एक-डेड बीघा केस-मुकदमा लड़ैमे बेच देबैं त' बाँचल साढ़े चारि बीघा आ ओहिमे अहाँ बेटा दू भाइ ताहि हिसाबे ओकरा दुनूकेँ हिस्सा भेलैं सवा दू-दू बीघा आ जँ कहीं काल्हि अहाँ दुनू कोनो देही-नेही आकि केस-मोकदामे फँसि गेल त' ओ दिन दूर निह अछि पाण्डेजी जखन लोकसभ अहाँकेँ जीवैतें जिनगीमे कहत हइय ओ देखहीं बेचन बाबूकेँ बेटा-पोता राजिमस्त्रीक संगे मजूरी करैत छैय, तखन अपनेकेँ प्रतिष्ठा बढ़ि जाएत।'

डीएसपी साहबक कड़ुगर गप्प पाण्डेकेँ लेल भविष्यक आइना जकाँ छलैं जाहिमे ओ थोड़ेक देर लेल अपन भविष्य निहारैय लागल, बुझना भेलैय जेना पूरा जथा-जमीन बिका गेल अछि, बेटा-पोता सभ लल्ल-लुच्च भेल एम्हर-ओम्हर भटकि रहल अछि आ अछि आर्थिक विपन्नताक जड़ि सभ हमरे मानिक' दुल्कारि रहल अछि वर्तमानमे लौटते मोन छुब्ध भ' गेलैं आ अकसमाते मुँहसँ निकलि गेलैं—'आब की कैल जा सकैत अछि श्रीमान।'

डीएसपी साहब निढोख बाजल—'जँ हमरासँ पूछैत छी त' हम कहब दुनू कियो समाजिक स्तर पर एगो पंचायत बैसाक' मामिलाकेँ रफा-दफा करू, केस-मोकदमा कियोकेँ आर्थिक नुकसान होत आ शारीरिक-मानसिक फिरसानी बनल रहत से अलगे।'

बेचन पाण्डे सशंकित भ' बाजल—'एहि लेल उहो तैयार होतैं तखिनए ने श्रीमान।'

डीएसपी साहब पुलिसया रूआबसँ बाजल—'ओ किएक निह तैयार हेतैं, आइए हम ओकरा दरोगाकेँ कहबा दैत छियैं कि परसु चारि बजे समुदायिक भवन परिसरमे पंचायत हेतैं, उपिस्थत रहबाक लेल, हँ गामक पाँच-सातगो सम्मानित व्यक्तिकेँ जुटेनायक भार अहाँकेँ अछि, ओना गाम-समाजक गप्प छैय ताहि लेल हमर पूरा कोशिश रहत की थोड़बो देर लेल हम दरोगाकेँ संग क'क' ओतय उपिस्थत होय मुदा पंचायत वेह सम्मानित लोकिन करताह।'

पाण्डे लग आब कहय लेल आर कोनो गप्प निह छलैं तेँ ओ डीएसपी साहबसँ आदेश मंगलक—'त' आब हम चलि श्रीमान।'

डीएसपी साहब आदेश दैत आश्वस्त कैएलक—'हँ जाउ, परसु समुदायिक भवनमे मिलैत छी।' आ बेचन पाण्डे ओतयसँ उठिक' विदा भ' गेल।

पंचायत बला दिन डीएसपी साहब दरोगा आ चारि-पाँचटा पुलिसकेँ ल'क' पहुँचल त' देखैत अछि समुदायिक भवन परिसरमे नीक भीड़ जुटल अछि ओ गाड़ीसँ उतरि दरोगाजीकेँ संग क'क' बैसका पर पहुँचल त' गामक मुखिया सरपंच आ सम्मानित पंच लोकिन दुनू आगन्तुककेँ सम्मान देबाक लेल, अपना कुर्सीपरसँ उठिक' ठाड़ भ' गेल, डीएसपी साहब सेहो हाथ जोड़िक' पूरा गाम-समाजक लोककेँ अभिवादन कैएलक आ एम्हर बेचन पाण्डे हुनका दुनू गोटेकेँ बैसबाक आग्रह करैत अपना गमछासँ कुर्सी झाड़य लागल, जाहिसँ डीएसपी रामशरणकेँ एकबेर पुनः ओ बचपन घटना यादि पड़ि गेलैं आ ओ मोने-मोन सोचय लागल, बाबूजी ठीके कहने रहथि 'आइ ऊ तोरा अपमानित क'क' कुसी परसँ कुसी, कुसी परसँ उठेलकौग' लेकिन काल्हि जँ तो कही पढ़ि-लिखक' उच्च पद पर चलि गेलैं त' वेह तोरा बैसिय लेल सम्मान पूर्वक कुर्सी देतौ।' ओ मोनिह-मोन अपन स्मृतिशेष पिताकेँ धन्यवाद ज्ञापित कैलक आ कुर्सी पर बैसि गेल फेर बितलहा गप्पके बिसरिक' वर्तमान पर धिआन केन्द्रीत करैत मुखियाजीसँ कहलक—'अखिन धरि तो सभ पंचायतक कार्यवाही निह शुरू केलहकग' की?'

डीएसपी साहब गाम-घरक रिश्तामे मुखियाजीकेँ भाइ लगैत छल ओ डीएसपी साहबकेँ उतारा देलक—'भैया हमसभ अपनेकेँ प्रतिक्षा क'रहल छलहुँ।'

डीएसपी साहब बाजल—'बेकार हमर प्रतिक्षा क'रहल छलह तोँ सभ, पंचायत तोँही पंच लोकिन करबहक हम त' अपन गाम-घर बुझिक' ओहिना एगो औपचारिकता निभावैय लेल आबि गेलहुँ कोनो दोसरा गामक गप्प रहितैं तखन हम थोड़बे जइतियैं, हुअ आब जल्दी तोँ सभ पंचायतक कार्यवाही शुरू कर'।'

डीएसपी साहबकेँ आदेश मिलते पंच लोकिन पंचायतक कार्यवाही शुरू क'देलक, सभसँ पहिने वादी-प्रितवादी अपन-अपन पक्ष रखलक तेकर बाद गवाह सभक गवाही भेलैं आ अन्तमे निर्णय पर विचार-विमर्श करबाक लेल पाँच-सातगो पंच लोकिन कने दूर जाक' एकांती करय लागल आ जखन निर्णय पर सभिकयो एकमत भ' गेल त' समाजक बीचमे आबि सरपंच साहब पंचक निर्णय सुनौलक—'दुनू पक्षक गप्प आर गवाह सभक गवाही सुनलक पछाति पंच लोकिन निर्णय लेलक अछि जे गलतीमे बेचनजी ठहरैत छथि, कियाक कि प्रथमतः रमेसर जानि-बुझिक' हुनकर जानपर अपना परूकेँ निह छोड़लकैं दोसर माल-मवेशी निमूधन होइत छैय जँ दू-चारि झाड़ मसूरी चिरओ गेलैं त' गवाहक गवाही अनुसार रमेसर अपन गलती मानि रहल छलैं त' हुनका चुप भ' जेबाक चाहि छलनि आने त' फेर ओ एगो एनाहिते छोट-छिन पंचायती बैसाक' रमेसरसँ अपन हजाँना वसूल क' सकैत छलाह मुदा ओ अहि दुनूमेसँ किछु निह क' गारि-गरौबैल आ मारि-पीट पर उतरि गेलाह जे कतौसँ उचित निह छैय, रहलैय मारि-पीटकेँ पछाति दर-दवाइमे खर्चाक गप्प त' ओ लमसम दुनू पक्षकेँ बरोबिरए छिन आनेकि हरेक दृष्टिकोणसँ देखला-सुनलक बाद पंच लोकिनकेँ अन्तिम निर्णय अछि जे बेचनजी रमेसरसँ भरल समाजमे अपन गलती लेल क्षमा मांगथि आ दुनू कियो अपन-अपन केस मोकदमा समाप्त करथि।'

बेचन पाण्डे आइ धरि कहिओ गामक पंच लोकिनकेँ महत्व निह देने छलैं आ आइ एकाएक पंचक निर्णय छलैं ओकरा गलती मनबायकेँ से ओ एतेक आसानीसँ कोना स्वीकार क' लितैं, गप्पकेँ घुमावैत बाजल—यदि अपने सभक वैह फैसला अछि त' हमर बेटा सुजित रमेसरसँ माफी माँग लैत छैय।

पंच लोकिन ओकर घमंडी स्वभावसँ परिचित छल सभ एक सुरमे बाजल—'से हैत बेचनजी, गलती करबैं अहाँ आ माफी मंगबैय अपना बेटा पोतासँ, ई गप्प निह चलय बला अछि अहाँकेँ माफी मांगही पड़त।'

पंचक समर्थनमे डीएसपी साहब सेहो बाजल—'पंचक निर्णयकेँ अवहेलना अहाँ निह क' सकैत छिये पाण्डेजी, उचित यैह अछि जे अहाँ अपन गलती मानि लियो।'

गाम-समाज आ थाना-पुलिसकेँ दवाबमे पाण्डे विवश छल निह चाहितो ओ अपना जगह पर ठाड़ भ' क' मुड़ि झुकौने बाजल—'पूरे समाजक बीच हम रमेसरसँ क्षमा मांगैत छियैं हमरा गलतीकेँ माफ कैल जाओ।'

बेचनकेँ गलती स्वीकारिते दरोगाजी बाजल—'वादी-प्रितवादी दोनों एक संयुक्त आवेदन बना कर थाना को दीजिए कि हमलोगों के बीच ग्राम पंचायत के माध्यम से सुलह-समझौता हो चुका है जिसके कारण हम दोनो अपना-अपना केस वापस ले रहें हैं।'

दरोगाकेँ कथनानुसार सरपंच साहब एगो संयुक्त आवेदन लिखक' तैयार कैलक आर ओकरा दुनूसँ हस्ताक्षर करबाक' दरोगाजीकेँ लग जमा क' देलक, तेसर बाद मुखियाजी पंचायत समाप्तकेँ घोषणा क' देलक, आ सभिकयो ओतयसँ उठिक' विदा भ' गेल।

 

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