विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

अशोक कुमार ठाकुर
गुरु दिवस पर आभार / आबू कान्हा हमर आँगन/ रक्षाबंधनक डोर, बहिनक सपनाक
जोर/ सावन आयल/ मधुश्रावणी आयल अंगना/ “मानवता—सभसँ सुन्दर तस्वीर”
१
गुरु दिवस पर आभार
अहाँ सिखेलहुँ ज्ञानक दीप,
जीवनक बाट देखेलहुँ।
डगमग पयर जखन रुकल,
हाथ पकड़ि आगाँ बढ़ेलहुँ॥
अक्षर मात्र नहि सिखेलहुँ,
जीवनक अर्थ बुझेलहुँ।
अहाँक स्नेह आ आशीष सँ,
हम अपन राहि पाबि गेलहुँ॥
गुरुजी, अहाँक ऋण कहियो,
शब्दक सीमा मे नहि आबि।
हृदय सँ केवल एतबे कहब—
अहाँक बहुत-बहुत धन्यवाद।
२
आबू कान्हा हमर आँगन
मथुरा नगरी हँसि रहल अछि,
गूँजि रहल मुरलीक तान।
नंदक घरमे जन्म लेलनि,
कृष्ण कन्हैया भगवान॥
यशोदा माय केर अँचरमे,
खेलथि नटखट नंदलाल।
माखन-मिश्री चोरि-चोरि कऽ,
करथि सभकेँ बेहाल॥
यमुना तट पर मुरली बाजय,
मधुर सुनय संसार।
राधाक संग प्रेमक रंगमे,
रंगायल वृंदावन-धाम॥
गीता केर उपदेश सुनौलनि,
कर्मक बाट देखौलनि।
सत्य-धर्मक रक्षा खातिर,
जीवनक अर्थ बुझौलनि॥
मनसँ लोभ-मोह दूर करैत,
प्रेमक दीप जराबी।
जाति-धर्मक भेद भुला कऽ,
मानवता अपनाबी॥
हे नंदलाला! आबू फेर सँ,
हमर हृदय-दुआर।
प्रेम-सुधा सँ मन भरि दिअ,
कान्हा! हे गिरधार॥
जय श्रीकृष्ण!
३
रक्षाबंधनक डोर, बहिनक सपनाक जोर
राखी केवल कलाई पर बान्हल,
कोनो साधारण धागा नहि अछि।
ई तँ बहिनक नयनक विश्वास,
भाइ लेल प्रेमक वादा अछि॥
राखी बान्हि कऽ बहिन कहैत अछि—
“भैया! हमर हाथ पकड़ि लेब।”
भाइ कहय—“तोहर सपनाक बाटमे,
हम कखनो दीवार नहि बनब॥”
बहिन पढ़य चाहय तँ पढ़य दियौ,
सपना ओकर उड़य दियौ।
डॉक्टर वा अफसर बनय चाहय,
हुनकर हौसला बढ़य दियौ॥
शिक्षिका बनय, वैज्ञानिक बनय,
खेलमे अपन नाम करय।
उद्यमी बनि अपन पयर पर,
अपन सपना साकार करय॥
किएक रोकब ओकर कदमकेँ?
किएक सपना छोट बुझब?
बेटी केवल घरक भार नहि,
ओ घरक शक्ति—ई बात बुझब॥
जखन एक बेटी पढ़ैत अछि,
केवल ओकर जीवन नहि सँवरैत अछि।
ओहि संग घरक सोच बदलैत,
पूरा परिवार आगाँ बढ़ैत अछि॥
बहिन सभसँ एक विनती अछि—
अपन सपना मरय नहि दियौ।
“लोक की कहत?” केर डर छोड़ि,
अपन बाट पर बढ़ैत रहियौ॥
मेहनत करू, संघर्ष करू,
लक्ष्यसँ पाछाँ हटू नहि।
बाट कठिन जँ आइ भेल अछि,
हिम्मत कहियो टूटय नहि॥
आ भाइ सभसँ एक निवेदन—
राखी मात्र उपहार नहि दियौ।
बहिनक कलाई पर धागा संग,
एकटा पक्का वचन दियौ॥
“तोहर पढ़ाइ कखनो नहि रुकत,
तोहर सपना कखनो नहि रुकत।
तोहर निर्णयक मान रहत,
तोहर कदम कखनो नहि झुकत॥”
पिता सय घर देखैत छथि,
बेटीक लेल रिश्ता खोजैत छथि।
काश! एक बेर बेटीकेँ पूछितथि—
“बेटी! तोहर सपना की अछि?”
ओकरो अपन इच्छा अछि,
ओकरो किछु अरमान अछि।
ओ सेहो खुलि कऽ जीबय चाहय,
ओकरो अपन आकाश अछि॥
समाजक डर देखाकऽ बेटीकेँ,
अपन बाट चुनय सँ नहि रोकू।
ओकर इच्छा, ओकर गरिमा,
कोनो दबावमे नहि झोंकू॥
बेटीकेँ इंसान बुझू,
ओकरो अधिकार दिऔ।
शिक्षा, सम्मान आ निर्णयक,
ओकरा पूरा संसार दिऔ॥
जाहि दिन हर बहिन पढ़ि लेती,
अपन पयर पर ठाढ़ भऽ जाती।
ताहि दिन राखीक ई डोरी,
संसारक सभसँ मजबूत बनती॥
एहि रक्षाबंधन प्रण ली सभ—
हर बहिन आगाँ बढ़त।
हर भाइ बहिनक सपनाक,
सम्मान करैत संग रहत॥
हर बेटी बोझ नहि होयत,
हर बेटी घरक शान होयत।
जाहि घरमे बेटी मुस्कायत,
ओतहि सच्चा सम्मान होयत॥
राखी केवल धागा नहि अछि,
ई विश्वास आ सम्मान अछि।
बहिनक सपनाक रक्षा करब,
रक्षाबंधनक सच्चा मान अछि॥
राखीक डोर प्रेमसँ जोड़य,
मनमे नव विश्वास जगाबय।
भाइ-बहिनक पावन बंधन,
युग-युग धरि मुस्कान लुटाबय॥
४
सावन आयल
सावन आयल झम-झम बरखा,
हरियर भेल संसार।
माटिक सोंधी गंध उठल अछि,
मनमे जागल प्यार॥
घनघोर बादर गगनमे छायल,
बिजुरी चमकि जाय।
रिमझिम-रिमझिम फुहार पड़ैत,
धरती मुस्कुराय॥
आमक डारिमे झूला पड़ल,
सखीसभ झूलय आय।
कजरारी नयन, मधुर मुस्कान,
मनकेँ बहुत लुभाय॥
पोखरि भरल, कमल मुस्कायल,
खेत हरियर भेल।
धानक रोपनी करैत किसानक,
मनमे आशा खेल॥
गामक बाट पर पानि छलकल,
छप्पर टप-टप बाजय।
माय गरम-गरम पकौड़ी देथि,
बच्चा खुशी मनाय॥
सावन केवल ऋतु नहि अछि,
ई तऽ भावक गीत।
माटि, प्रकृति आ मनकेँ जोड़य,
प्रेमक पावन रीत॥
बरखा एहन पड़ैत रहय,
भरल रहय पोखरि-ताल।
हरियर रहय हमर मिथिला,
सुखमय होय न बुरा हाल।।
सावन आयल झम-झम बरखा,
हरियर भेल संसार।
मिथिलाक माटि सुगंधित भेल,
मनमे फूटल बहार॥
५
मधुश्रावणी आयल अंगना
मिथिलाक सावनी लोकगीत
सावन मासक रिमझिम फुहार,
भीजल अंगना-दुआर।
मधुश्रावणी आयल सखि हे,
मनमे उठल बहार॥
फूलक डाली सजि गेल आँगन,
रंग भरल चहुँदिस।
सखीसभ मिलि गीत सुनाबथि,
हँसी गूँजय हरदिस॥
गौरी-शंकरकेँ नेहसँ पूजी,
माँगथि सुख-सुहाग।
अचल रहय दाम्पत्यक जोड़ी,
मिटय सभ दुःख-दाग॥
नव-नव ब्याहल कन्याक मनमे,
साजनक अछि याद।
मायकेक आँगन छोड़ि अयली,
मोनमे उठय विषाद॥
सखी कहय—“हँसि दे बहिना,
सावन फेर न आबय।”
मधुश्रावणीक ई मधुर घड़ी,
जीवन भरि मोन रहि जाय॥
मेहँदी रचल हथेली पर,
पयरमे महावर लाल।
साड़ीमे सजल नवेली दुल्हिन,
मुख पर मधुर उजाल॥
नाग-नागिनकेँ फूल चढ़ाबी,
मनसाक करी अराध।
घर-आँगनमे सुख-शांति रहय,
दूर रहय सब बाध॥
माय कहथि—“बेटी सुखी रहिहऽ,
सदा रहय सुहाग।”
बाबूजीक आशीषक छाया,
मेटय जीवनक दाग॥
सावनक बदरी घेरि अयल,
कोयल कूकल डार।
मधुश्रावणी केर पावन गीतसँ,
गूँजि उठल मिथिलाधार॥
मधुश्रावणी आयल अंगना,
नेहक दीप जरल।
मिथिलाक बेटी, सखी संग-संग,
सावनमे मन हरषल॥
-मिथिलाक लोकपरम्परा अमर रहय,
मधुश्रावणीक गीत गूँजैत रहय।
६
“मानवता—सभसँ सुन्दर तस्वीर”
विश्व मानवता दिवस एवं विश्व
फोटोग्राफी दिवस पर रचना
कैमरा जखन दुनिया देखलक,
कतेक रंग देखायल।
कतहु हँसीक फूल खिलल,
कतहु नोर बहायल॥
ककरो तस्वीरमे माय केर आँचल,
ककरोमे बच्चाक मुस्कान।
कतहु अनजानक दुख देखिकऽ,
हाथ जिनकर बढ़ल भेल गुणगान।।
तस्वीर केवल तस्वीर नहि अछि,
ई समयक दस्तावेज।
बीसल पल केर मौन कहानी,
बनि जाइत अछि आवाज॥
चेहरा बदलि गेल, समय बीतल,
मुदा यादि रहि जाइत अछि।
छोट सन तस्वीरक चौखटमे,
पूरा संसार समा जाइत अछि॥
मुदा सभसँ सुन्दर चित्र वैह,
जाहिमे मानवता देखाय।
भूखलकेँ रोटी भेटैत देखाय,
प्यासलकेँ पानि पियावल जाय॥
जतय धर्मसँ पहिने मानवता,
जातिसँ पहिने प्यार।
अनजानक आँखिक नोर पुछय,
ओतय बनय अपन परिवार॥
कैमरा केवल दृश्य नहि देखय,
मनक पीड़ा पहचानय।
जे तस्वीरमे प्रेम बसल होय,
वैह तस्वीर महान कहाय॥
आबू एहन तस्वीर बनाबी,
जतय कोनो भेद नहि रहय।
मानवता सभसँ ऊपर होय,
सभहक हृदयमे प्रेम रहय॥
विश्व मानवता दिवस पर आइ,
मानव होयबाक मान करी।
विश्व फोटोग्राफी दिवस पर,
सुन्दर स्मृतिक सम्मान करी॥
एकटा क्लिकमे पल ठहरि सकैत अछि,
तस्वीर भले कागज पर रहि जाय,
एकटा प्रेमसँ जीवन सँवरि सकैत अछि।
मानवता हृदयमे उतरि जाय॥
मानवता केर रंग सभसँ न्यारा,
प्रेम सँ सुन्दर नहि कोनो नजारा।
कैमरा जँ ई भाव पकड़ि लय सारा,
तस्वीर बनि जाय जीवनक सहारा॥
-अशोक कुमार ठाकुर; ग्राम–करमौली, पोस्ट–करमौली,थाना–खजौली, जिला–मधुबनी
(बिहार)मोबाइल नंबर:-8709568993,जनसेवा:-एस.डी.आर.एफ,मे कार्यरत सिपाही।
अपन मंतव्य editorial.staff.videha@zohomail.in पर पठाउ।
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