
परमेश्वर कापड़ि
हमर रचनागत अदका-फदका
घास चरए गाइ, दूध दिए भरि झबही,
देश चरए नेता, राजनीति करए घबही।
लाज नै सरकारके, नङटे नाचए राजनीति,
नेता छिटए भाषणके बिआ, ई छी कुटनीति।
ओ नेता की नेता भेल,
जे ने रहए भ्रष्टाचारी।
घूस कमीसनक पूजी-पगहापर,
जे करए जनताक पैकारी।।
आधुनिकताक नव विधानमे,
हे नारी, ब्वाय-फ्रैण्ड अधिकारिणी।
वैश्वीकरणक उधसल बिहाड़िमे,
अहाँ देह प्रदर्शनक आधारणी।
नेता परिकल सत्तामे,
दल करए फेरबदली,
नीति-सिद्धान्तके मारि गोली,
केहुना पोकेट भरि ली।
नेता मारए माछ
उपछए राजनीतिक खत्ता।
जनताके हे टुटरुम टूट,
सरकार एत' चौधरी बोलाता।।
ऐ पार, ओइ पार नदीमे नकसिक पाइन,
भगबा खोलि पार उतरब, ई कोन बाइन।
जनान्दोलनमे जनता जान-प्राण देलक,
सम्झौता क' नेतबा सरकारटा बनौलक।
सत्य बड़ बिख होइछ, के ने जनैए,
लोक झूठेके भजाक', उठि बैसैए।
सम्हरु, टिटकारी नै पारु, मुह फुला देत,
बढ़ल चललै जमाना, नव हाक-वाक दैत ।
चन्ना-मामा भार लाबे, घुट-घुट खाए बौआ,
सुतल, निन गबैत रहए, जागे पलङक पौआ।
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