
मुन्ना जी
अकविता- उघारू झांपलकें!
चुप्पे ,किए खौंझाइ छी हमरा पर
किए कनखियाइत गरौने छी नजरि
क' दै छी आरोपित अहां सब हमरा
इ कहि जे अहां स्त्री विरोधी छी।
यै,हम मात्र गढ़नि नै गढ़ै छी,बुझलियै
हम त' उकसबै छी अहां सबकें
सनकबै छी सब जनी जातिकें
जिनक आंगुर चलैए शब्द संयोजनमे
बहुत बेर कहलौं जे-
स्त्री जन्य बातकें जं लेखक लिखताह
तहन ओ मात्र मात्र भावार्थ हेतै
जं लेखिका लिखती ?
तहन ओ पूर्णत: भोगल यथार्थ हेतै।
हम त'
ढ़ाठ खोलि बढ़बाक आह्वान करै छी
सबकें ओइ ढ़ठिएल जिनगी सं
नै जानि कलम उठाइयो धखाइ छी अहां
दोसर स्त्री कें नव दृष्टि, बाट देखेबा सं
धाख जरूरी छै,साख बचेबा लेल
पहिने किशोरीक गेम छल कित कित,गोटरस....
आब बेधड़क भ' खेलाइए
लिव इन सं पेयर क्लब धरि।
धाखक तर त' ओ दबाएल रहै छलखिन
तें बाबा आ दाइक अधरतियाक पहड़मे
दबले पएरै ढ़ूकि होइन युग्म दर्शन
तखनो धीया- पुता सं घर भरल।
आ,आब...!
संवैधानिक, सामाजिक जोड़ा बनै सं पहिने।
कतेको बेर कतेको संग
लागि जाइछ जोड़,प्रतिस्पर्धा चालू...
अहां कनै अवरोधक भ' अजमाउ नै
विषम लैंगिकता प्रकृति प्रदत्त अछि
साम्यता कृत्रिम कार्य वहन मात्र
तहन उकस- पाकस सं उत्फाल किए?
करू प्रदर्शन अपन अस्तित्व जोगा
अपन कलेवरक संग!
पारू नवका डरीर ,लिखू अहां उघारि
ओ सबटा झांपल बातकें
जे अहाकें रखलक ढ़ठिया
आ निशक्त बनाकें!
कलमक धारकैं पिजाउ ,बनाई धरगर।
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