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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक संपादकीय संदेश

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(c)२००४-१२.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन।

 

वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Read in your own scriptRoman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi   
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१. संपादकीय

नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ क घोषणा

अभि‍नय- मुख्य अभिनय

सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा

श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो,

हास्‍य-अभिनय

 सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह

 श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर

 नृत्‍य

 सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव

 श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत

 चि‍त्रकला

श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना

श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल

 संगीत (हारमोनियम)

 श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर

 संगीत (ढोलक)

 श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत

 संगीत (रसनचौकी)

 श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम

 शिल्पी-वस्तुकला

 श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज

 मूर्ति-मृत्तिका कला

 श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त

 काष्ठ-कला

 श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना

 किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति

 श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा

नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ विदेह नाट्य उत्सव २०१२ मे प्रदान कएल गेल। विदेह नाट्य उत्सव २०१२ क चित्र नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि।

विदेह नाट्य उत्सव २०१२

 

मैथिली- सुरजापुरी- राजबंशी

मैथिली

बाबूकेँ अपन ऐ राजनैतिक जमीनक अनुभव ओइ दलमे रहितो नै भेल हेतन्हि, जकरा कहियो ओ रामक संग पटेने रहथि। दलमे एकटा प्रभावी नेता कहै जाइबला बाबूकेँ कहियो पिछड़ल वर्गक नेताक रूपमे प्रस्तुत नै कएल गेल। मुदा राजनैतिक जमीनसँ बेशी जोड़तोड़मे माहिर बाबू दलसँ निकालि देल जाइते प्रतिपक्षी-दलक नजरिमे एना चढ़लाह जे हुनका प्रतिपक्षी-दल अपना दिससँ प्रदेशमे पिछड़ल वर्गक गद्दीपर विराजमान कऽ देलक।

एकरा सुरजापुरीमे (भारत दिसुका किशनगंज आदि क्षेत्रमे) एना लिखल/ बाजल जाएत:-

बाबूक अपना यहार राजनीतिक जमीनेर अहसास उस दलात रहले नी होबे। जहाक कोईखुन वहाय रामेर संगे सीचे छीले। दलात एक कद्दावर नेता कहा जनवार बाबू कोईखुन पिछवाड़ नेतार लखा पेश नी करील। लेकिन राजनीतिक से बेसी जोड़तोड़ोत माहिर बाबू दलार से निकलाते ही प्रतिपक्षी-दलाड़ नजरोत हिरंगदी चढ़ील कि वहाय पाटी अपनार बीती से प्रदेशोत पिछड़ार नेतार गद्दीत विरजमान करील।

 

एकरा राजबंशी [नेपाल दिस सुरजापुरीकेँ राजबंशी भाषा कहल जाइ छै, झापा, सरनामति, चकमकी, मेची, टाघनडुब्बा (ताधंडुवा) आदिमे- राजबंशी आ सुरजापुरीमे मामूली अन्तर छै] मे एना लिखल बाजल जाएत:-

बाबूर अपनार इर राजनीतिक जमीनेर ऐहसास उखान दल त रहते हुए भी नी होल, जइर कोधोय उम्हा रामेर संगे छिले। दलात एक कद्दावर नेता कहवार बाबूर कोधोय पिछड़ा नेतार लाखा पेश नी करे। माने राजनीतिक जमीनत भेल्ला जोड़तोड़ माहिर बाबू दल से निकलाले ही प्रतिपक्षी-दलार नजर एनंतिंज चढ़िल कि अम्हा पार्टीत अपनार तरफ से प्रदेशत छट जातिर नेतारक गद्धी पर बठाइ दिल।

 

सुरजापुरी- भारतमे बिहारक किशनगंज आ पूर्णियाँ आदिमे गामे-गाम राजबंशी (महादलित) जाति द्वारा ई भाषा बाजल जाइत अछि। किशनगंजमे मुस्लिममे स्वामी जाइत खोट्टा आ सेवक जाति कुल्हिया कहल जाइत छथि। कुल्हिया जाइत सेहो सुरजापुरी भाषा बजैत छथि। राजबंशी आ जे आन जाइत सभ कुल्हियाक आसपास रहै छथि से सुरजापुरी बजैत छथि। ई भाषा मैथिली आ बांग्लाक मिश्रण अछि। कियो कियो बंगालक कूच बिहारक बाहे बंगाली आ नेपालक राजबंशी भाषाकेँ सेहो सुरजापुरी भाषा कहै छथि। किछु गोटेक मत छन्हि जे बांग्लादेशक लोकक भाषाक क्षेत्रीय भाषासँ मिश्रणक परिणामस्वरूप सुरजापुरी भाषा निकलल। पूर्णियाँ आ किशनगंजमे एक्के गाममे कुल्हिया आ राजबंशी लोकनि सुरजापुरी बजै छथि, संथाल लोकनि संथाली बजै छथि, बंजारा लोकनि बंजारा भाषा बजै छथि जखन कि शेष सभ गोटे मैथिली बजै छथि। जँ मिथिला राज्यमे ऐ क्षेत्र सभकेँ लेल जाए तँ हुनका सभकेँ हुनकर भाषाक विकासक गारन्टी देबऽ पड़त। की मिथिला राज्य अभियानकर्मी सभक सोच एतऽ धरि पहुँचलनि अछि?

 

दूर्वाक्षत

यजुर्वेदक अध्याय २२ मंत्र २२ केँ विश्वक पहिल राष्ट्रभक्ति गीत होएबाक गौरव प्राप्त छै। मुदा मिथिलामे दूभि-अक्षत छीटि कऽ ऐ मंत्रकेँ दूर्वाक्षत मंत्र बना देल गेल। बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक पब्लिशिंग कॉरपोरेशन लि. दूर्वाक्षत नामसँ नवम वर्गक किताब छपने अछि। ऐ पोथीमे मिथिला आ मैथिलीकेँ पछुएबाक षडयंत्र पूर्ण रूपसँ दृष्टिगोचर होइत अछि। अठारह पन्नामे मिथिलाक एकटा जिलाक स्थायी बन्दोबस्तीबला जमीन्दारक जीवनी पढ़ाओल गेल अछि!! मैथिली लिपिक संरक्षणपर डेढ़ पन्नाक पचास बर्ख पुरान लेख अछि जकर आइक तकनीकी युगमे कोनो महत्व नै छै, प्रवासी मैथिल समाज लेख पुरातनपंथी अछि आ अखुनका बच्चाकेँ ई हास्यास्पद बुझेतै, प्रवासक अर्थ, मैथिलक अर्थ आ प्रवासक कारण सभ किछु बदलि गेल अछि। तँ की ई बच्चा सभकेँ गुलामीक पाठ पढ़ेबाक षडयंत्र नै अछि? लोक नवम वर्गक हिन्दी, अंग्रेजी, बांग्ला आ आन भाषाक पोथीसँ एकर तुलना करैए तँ स्थिति आर भयावह भऽ जाइए। शिक्षकसँ आग्रह जे जमीन्दारक जीवनी बच्चा सभकेँ नै पढ़ाबथु, प्रश्न-पत्र सेट केनिहारसँ आग्रह जे ओ जमीन्दारक जीवनीबला अध्यायसँ प्रश्न नै पुछथि।

 

छुतहर/ छुतहर घैल/ छुतहा घैल

छुतहा घैल महेन्द्र मलंगियाक नवीन नाटकक नाम छन्हि। ऐ छोटसन नाटकक भूमिका ओ दस पन्नामे लिखने छथि।

पहिने ऐ भूमिकापर आउ।  हुनका कष्ट छन्हि जे रमानन्द झारमणहुनका सुझाव देलखिन्ह जेछुतहर घैलकेँ मात्रछुतहरकहल जाइ छै। से ओ तीन टा गप उठेलन्हि- पहिल-

तों कहियो पोथी के लेखी,

हम कहियो अँखियन के देखी।

दोसर- यात्री जीक विलाप कविता-

काते रहै छी जनु घैल छुतहर

आहि रे हम अभागलि कत बड़।

आ कहै छथि जे ओइ कविताक विधवा आ ऐ नाटकक कबूतरी देवीकेँ शिवक महेश्वरो सूत्र आ पाणिनीक दश लकारसँ (वैदिक संस्कृत लेल पाणिनी १२ लकार आ लौकिक संस्कृत लेल दस लकार निर्धारित कएने छथि..खएर…) कोन मतलब छै?

तेसर ओ अपन स्थितिकेँ कापरनिकस सन भेल कहैत छथि, जे लोकक कहलासँ की हेतै आ गाम-घरमे लोकछुतहर घैलबजिते छैक!!

मुदा तीनू बिन्दुपर तीनू तर्क मलंगियाजीक विरुद्ध जाइ छन्हि।अँखियन देखी लोकव्यवहारछुतहरमात्र कहल जाइत देखलक सुनलक अछि, घैलचीपर छुतहरकेँ अहाँ राखि सकै छी? लोइटसँ बड़ैबमे पान पटाओल जाइ छै तखन मलंगियाजीक हिसाबे ओकरालोइट घैलकहबै। घैल, सुराही, कोहा, तौला, छुतहर, लोइट, खापड़ि, कुड़नी, कुरवाड़, कोसिया, सरबा, सोबरना सभ बौस्तुक अलग नामकरण छै। फूलचन्द्र मिश्ररमण” (प्रायः फूलचन्द्रजीछुतहा घैलशब्दक सुझाव हँसीमे देने हेथिन्ह, जँ नै तँ एकटा नव भाषाक नव शब्द अछि!!) सुझाव मानैत मलंगिया जीछुतहर घैलकेँछुतहा घैलकऽ देलन्हि, गपक द्योतक जे हुनका गलतीक अनुभव भऽ गेलन्हि मुदा रमानन्द झारमण गप मानि लेने छोट भऽ जइतथि से खुट्टा अपना हिसाबे गाड़ि देलन्हि। बादमे रमानन्द झारमणचेतना समितिसँ ओइ पोथीकेँ छपेबाक आग्रह केलखिन्ह , चेतना समिति मात्र २५टा प्रति दैतन्हि तेँ अपन संस्थासँ एकरा छपबेलन्हि, सभसँ पठककेँ कोन सरोकार? आब आउ यात्रीजीक गपपर, यात्रीजीकेँ हिन्दी पाठकक सेहो ध्यान राखऽ पड़ै छलन्हि, हुनका मोनो नै रहै छलन्हि जे कोन कविता हिन्दीमे छन्हि, कोन मैथिलीमे कोन दुनूमे, से छुतहर घैल लिखि देलन्हि, एकर कारण यात्रीजीक तुकबन्दी मिलेबाक आग्रहमे सेहो देखि सकै छी। फेर आउ कॉपरनिकसपर, जँ यात्री जी वा मलंगिया जीघैल छुतहर”, “छुतहर घैलवाछुतहा घैललिखिये देलन्हि तँ की नेटिव मैथिली भाषी छुतहरकेँ   “घैल छुतहर”, “छुतहर घैलवाछुतहा घैलबाजब शुरू कऽ देत। से कॉपरनिकस सेहो मलंगियाजीक विरुद्ध छथिन्ह।

कॉपरनिकसक किंवदन्तीक सटीक प्रयोग मलंगियाजी नै कऽ सकलाह, प्रायः गैलिलीयो सँ कॉपरनिकसकेँ कन्फ्यूज कऽ रहल छथि, कॉपरनिकसक सिद्धान्तक समर्थन पोप द्वारा भेल छल कॉपरनिकस पोप पॉल- केँ अपन हेलियोसेन्ट्रिक सिद्धान्तक चालीस पन्नाक पाण्डुलिपि समर्पित केने रहथि। खएर मलंगियाजीक विज्ञानक प्रति अनभिज्ञता विज्ञानक सिद्धान्तकेँ किवदन्तीसँ जोड़बाक सोचपर अहाँकेँ आश्चर्य नै हएत जखन अहाँ हुनकर खाँटी लोककथा सभक अज्ञानताकेँ अही भूमिकामे देखब।

अली बाबा चालीस चोर”- सम्पूर्ण दुनियाँकेँ बुझल छै जे मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि जेअरेबियन नाइट्स (१००१ कथा)” मे संकलित अछि ओइमे विवाद अछि जे अरेबियन नाइट्समे बादमे घोसियाएल गेल वा नै, मुदा मध्यकालीन अरबी लोककथा अछि, मे कोनो विवाद नै अछि। बलबनक अत्याचार आदिक की की गप साम्प्रदायिक मानसिकता लऽ कऽ मलंगिया जी कहि जाइ छथि से हुनकर लोककथाक प्रति सतही लगाव मात्रकेँ देखार करैत अछि।मिथिला तत्व विमर्शवारमानाथ झा पंजीक सतही ज्ञान बहुत पहिनहिये खतम कऽ देल गेल अछि, तेँ लिखित रूपसँ हमरा सभक पंजी पोथीमे वर्णित अछि। गोनू झा विद्यापति सँ ३०० बर्ख पहिने भेलाह, मुदा मलंगियाजी ५० साल पुरान गप-सरक्काक आधारपर आगाँ बढ़ै छथि। हुनका बुझल छन्हि जे गोनूकेँ धूर्ताचार्य कहल गेल छन्हि मुदा संगे गोनूकेँ महामहोपाध्याय सेहो कहल गेल छन्हि से हुनका नै बुझल छन्हि!! गोनू झाक समयमे मुस्लिम मिथिलामे रहबे नै करथि तखनतहसीलदारक दाढ़ीकतऽ सँ आओत। लोकक कण्ठमे छुतहर छै ओकराछुतहा घैलकऽ दियौ, लोकक कण्ठमेकर ओसूलीकरैबलाक दाढ़ी छै ओकरातहसीलदार दाढ़ी कहि  साम्प्रदायिक आधारपर मुस्लिमकेँ अत्याचारी करार कऽ दियौ, तेहेन भूमिका लिखि दियौ जे रमानन्द झारमण आन गोटे डरे समीक्षा नै करताह। एकटा पैदल सैनिक एकटा सतनामी (दलित-पिछड़ल वर्ग द्वारा शुरू कएल एकटा प्रगतिवादी सम्प्रदाय) झगड़ासँ शुरू भेल सतनामी विद्रोह औरंगजेबक नीतिक विरोधमे छल ओइमे मस्जिदकेँ सेहो जराओल गेलै, मुदा गोनू झाक कर ओसूली अधिकारी मुस्लिम नै रहथि, लोककथामे गप नै छै, हँ जँ साम्प्रदायिक लोककथाकार कहल कथामे अपन वाद घोसियेलक लिखै काल बेइमानी केलक तँ तइसँ मैथिली लोककथाकेँ कोन सरोकार? फील्डवर्कक आधारपर जँ लोककथाक संकलन नै करब तँ अहिना हएत।

महेन्द्र नारायण राम लिखै छथि जे लोककथामे जातित-पाइत नै होइ छै, मुदा मलंगियाजी से कोना मानताह। भगता सेहो हुनकर कथामे एबे करै छन्हि। असल कारण जइ कारणसँ मलंगिया जीक नाटकक अभिन्न अंग बनि जाइत अछि से अछि हुनकर आनुवंशिक जातीय श्रेष्ठता आधारित सोच। हुनकर नाटकमे मोटा-मोटी अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक घीच तीरि कऽ सत्रहटा दृश्य अछि, जइमे पन्द्रहम दृश्य धरि छोटका जाइतक (मलंगियाजीक अपन इजाद कएल भाषा द्वारा) कथित भाषापर सवर्ण दर्शकक हँसबाक, भगताक भ्रष्ट-हिन्दीक माध्यमसँ छद्म हास्य उत्पन्न करबाक अपन पुरान पद्धतिक अनुसरण करै छथि। कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह सोलहम दृश्यसँ करै छथि मुदा बाजी तावत हुनका हाथसँ निकलि जाइ छन्हि। आइ जखन संस्कृत नाटकोमे प्राकृत वा कोनो दोसर भाषाक प्रयोग नै होइत अछि, मलंगियाजीक भरतकेँ गलत सन्दर्भमे सोझाँ आनब संस्कृतसँ हुनकर अनभिज्ञताकेँ देखार करैत अछि भरत नाट्यशास्त्रपर हिन्दीमे जे सेकेण्डरी सोर्सक आधारपर लोक सभ पोथी लिखने छथि, तकरे कएल अध्ययन सिद्ध करैत अछि।

मलंगियाजीक कहब अछि जे नाटक जँ पढ़बामे नीक अछि तँ मंचन योग्य नै हएत, वा मंचन लेल लिखल नाटक पढ़बामे नीक नै लागत?  हुनकर संस्कृत पाँतीकेँ उद्घृत करबासँ तँ यएह लगैत अछि। जँ नाटक पढ़बामे उद्वेलित नै करत तँ निर्देशक ओकर मंचनक निर्णय कोना लेत? मंचीय गुण की होइ छै, अढ़ाइ-अढ़ाइ पन्नाक सत्रहटा दृश्य, तथाकथित निम्न वर्गकेँ अपमानित करैबला जातिवादी भाषा, भगताकबुझता है कि नहीं?” बला हिन्दी सभक सम्मिलनक स्लैपस्टिक ह्यूमर”? जे एकर विरोध कऽ मैथिलीक समानान्तर रंगमंचक परिकल्पना प्रस्तुत करत से भऽ गेल नाटकक पठनीय तत्त्वक आग्रही जे पुरातनपंथी जातिवादी अछि से भेल नाटकक मंचीय तत्वक आग्रही!! की २१म शताब्दीमे मलंगियाजीक जाति आधारित वाक्य संरचना संस्कृत, हिन्दी वा कोनो आधुनिक भारतीय भाषाक नाटकमे (मैथिलीकेँ छोड़ि) स्वीकार्य भऽ सकत? जँ नै तँ शब्दावली लेल १८०० बर्ष पुरनका संस्कृत नाटकक गएर सन्दर्भित तथ्यकेँ, मूल संस्कृत भरत नाट्यशास्त्र नै पढ़ैबला नाटककार द्वारा, बेर-बेर ढालक रूपमे किए प्रयुक्त कएल जाइए? माथपर छिट्टा काँखमे बच्चा जँ कियो लेने अछि तँ निम्न वर्गक अछि? ओकर आंगनक बारहमासामे निम्न वर्गकेँ राड़ कहै छथि, कएक दशक बाद धरि सुधार आएल छन्हि जे आब ओइ वर्गकेँ निम्न वर्ग कहि रहल छथि, सुधार स्वागत योग्य मुदा दीर्घ अवधि लेल बड्ड कम अछि। बबाजी कोना कथामे एलै गाजा कोना एलै ओइसँ बगियाक गाछक बगियाक कोन सम्बन्ध छै? मलंगियाजी अपन जाति-आधारित वाक्य संरचना, भ्रष्ट-हिन्दी मिश्रित वाक्य रचना कोना घोसिया सकितथि जँ भगता निम्न वर्गक छद्म संकल्पना नै अनितथि, तथ्य बड्ड चतुराइसँ नुकेबाक प्रयास करै छथि, तेँ मेडियोक्रिटीसँ आगाँ नै बढ़ि पबै छथि। तेँ हुनकामे नाट्य-कथाकेँ उद्देश्यपूर्ण बनेबाक आग्रह तँ छन्हि मुदा सामर्थ्य नै आबि पबै छन्हि।

 

नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता (नेपाल देशक भाषा-साहित्य,  दर्शन, संस्कृति आ सामाजिक विज्ञानक क्षेत्रमे  सर्वोच्च सम्मान)

 

नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठानक सदस्यता

श्री राम भरोस कापड़ि 'भ्रमर' (2010)

श्री राम दयाल राकेश (1999)

श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव (1994)

 

नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान मानद सदस्यता

स्व. सुन्दर झा शास्त्री

 

नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान आजीवन सदस्यता

श्री योगेन्द्र प्रसाद यादव

 

 

 

फूलकुमारी महतो मेमोरियल ट्रष्ट काठमाण्डू, नेपालक सम्मान

फूलकुमारी महतो मैथिली साधना सम्मान २०६७ - मिथिला नाट्यकला परिषदकेँ

फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार २०६७ - सप्तरी राजविराजनिवासी श्रीमती मीना ठाकुरकेँ

फूलकुमारी महतो मैथिली प्रतिभा पुरस्कार २०६७ -बुधनगर मोरङनिवासी दयानन्द दिग्पाल यदुवंशीकेँ

 

 

 

साहित्य अकादेमी  फेलो- भारत देशक सर्वोच्च साहित्य सम्मान (मैथिली)

 

 

           १९९४-नागार्जुन (स्व. श्री वैद्यनाथ मिश्र “यात्री” १९११-१९९८ ) , हिन्दी आ मैथिली कवि।

 

 

           २०१०- चन्द्रनाथ मिश्र अमर (१९२५- ) - मैथिली साहित्य लेल।

 

 

 

साहित्य अकादेमी भाषा सम्मान ( क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य आ गएर मान्यताप्राप्त भाषा लेल):-

           

           २०००- डॉ. जयकान्त मिश्र (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।)

           २००७- पं. डॉ. शशिनाथ झा (क्लासिकल आ मध्यकालीन साहित्य लेल।)

            पं. श्री उमारमण मिश्र

 

 

 

 

साहित्य अकादेमी पुरस्कार- मैथिली

 

 

१९६६- यशोधर झा (मिथिला वैभव, दर्शन)

 

१९६८- यात्री (पत्रहीन नग्न गाछ, पद्य)

 

१९६९- उपेन्द्रनाथ झा “व्यास” (दू पत्र, उपन्यास)

 

१९७०- काशीकान्त मिश्र “मधुप” (राधा विरह, महाकाव्य)

 

१९७१- सुरेन्द्र झा “सुमन” (पयस्विनी, पद्य)

 

१९७३- ब्रजकिशोर वर्मा “मणिपद्म” (नैका बनिजारा, उपन्यास)

 

१९७५- गिरीन्द्र मोहन मिश्र (किछु देखल किछु सुनल, संस्मरण)

 

१९७६- वैद्यनाथ मल्लिक “विधु” (सीतायन, महाकाव्य)

 

१९७७- राजेश्वर झा (अवहट्ठ: उद्भव ओ विकास, समालोचना)

 

१९७८- उपेन्द्र ठाकुर “मोहन” (बाजि उठल मुरली, पद्य)

 

१९७९- तन्त्रनाथ झा (कृष्ण चरित, महाकाव्य)

 

१९८०- सुधांशु शेखर चौधरी (ई बतहा संसार, उपन्यास)

 

१९८१- मार्कण्डेय प्रवासी (अगस्त्यायिनी, महाकाव्य)

 

१९८२- लिली रे (मरीचिका, उपन्यास)

 

१९८३- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (मैथिली पत्रकारिताक इतिहास)

 

१९८४- आरसी प्रसाद सिंह (सूर्यमुखी, पद्य)

 

१९८५- हरिमोहन झा (जीवन यात्रा, आत्मकथा)

 

१९८६- सुभद्र झा (नातिक पत्रक उत्तर, निबन्ध)

 

१९८७- उमानाथ झा (अतीत, कथा)

 

१९८८- मायानन्द मिश्र (मंत्रपुत्र, उपन्यास)

 

१९८९- काञ्चीनाथ झा “किरण” (पराशर, महाकाव्य)

 

१९९०- प्रभास कुमार चौधरी (प्रभासक कथा, कथा)

 

१९९१- रामदेव झा (पसिझैत पाथर, एकांकी)

 

१९९२- भीमनाथ झा (विविधा, निबन्ध)

 

१९९३- गोविन्द झा (सामाक पौती, कथा)

 

१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)

 

१९९५- जयमन्त मिश्र (कविता कुसुमांजलि, पद्य)

 

१९९६- राजमोहन झा (आइ काल्हि परसू, कथा संग्रह)

 

१९९७- कीर्ति नारायण मिश्र (ध्वस्त होइत शान्तिस्तूप, पद्य)

 

१९९८- जीवकान्त (तकै अछि चिड़ै, पद्य)

 

१९९९- साकेतानन्द (गणनायक, कथा)

 

२०००- रमानन्द रेणु (कतेक रास बात, पद्य)

 

२००१- बबुआजी झा “अज्ञात” (प्रतिज्ञा पाण्डव, महाकाव्य)

 

२००२- सोमदेव (सहस्रमुखी चौक पर, पद्य)

 

२००३- नीरजा रेणु (ऋतम्भरा, कथा)

 

२००४- चन्द्रभानु सिंह (शकुन्तला, महाकाव्य)

 

२००५- विवेकानन्द ठाकुर (चानन घन गछिया, पद्य)

 

२००६- विभूति आनन्द (काठ, कथा)

 

२००७- प्रदीप बिहारी (सरोकार, कथा)

 

२००८- मत्रेश्वर झा (कतेक डारि पर, आत्मकथा)

 

२००९- स्व.मनमोहन झा (गंगापुत्र, कथासंग्रह)

 

२०१०-श्रीमति उषाकिरण खान (भामती, उपन्यास)

 

 

 

साहित्य अकादेमी मैथिली अनुवाद पुरस्कार

 

 

१९९२- शैलेन्द्र मोहन झा (शरतचन्द्र व्यक्ति आ कलाकार-सुबोधचन्द्र सेन, अंग्रेजी)

 

१९९३- गोविन्द झा (नेपाली साहित्यक इतिहास- कुमार प्रधान, अंग्रेजी)

 

१९९४- रामदेव झा (सगाइ- राजिन्दर सिंह बेदी, उर्दू)

 

१९९५- सुरेन्द्र झा “सुमन” (रवीन्द्र नाटकावली- रवीन्द्रनाथ टैगोर, बांग्ला)

 

१९९६- फजलुर रहमान हासमी (अबुलकलाम आजाद- अब्दुलकवी देसनवी, उर्दू)

 

१९९७- नवीन चौधरी (माटि मंगल- शिवराम कारंत, कन्नड़)

 

१९९८- चन्द्रनाथ मिश्र “अमर” (परशुरामक बीछल बेरायल कथा- राजशेखर बसु, बांग्ला)

 

१९९९- मुरारी मधुसूदन ठाकुर (आरोग्य निकेतन- ताराशंकर बंदोपाध्याय, बांग्ला)

 

२०००- डॉ. अमरेश पाठक, (तमस- भीष्म साहनी, हिन्दी)

 

२००१- सुरेश्वर झा (अन्तरिक्षमे विस्फोट- जयन्त विष्णु नार्लीकर, मराठी)

 

२००२- डॉ. प्रबोध नारायण सिंह (पतझड़क स्वर- कुर्तुल ऐन हैदर, उर्दू)

 

२००३- उपेन्द दोषी (कथा कहिनी- मनोज दास, उड़िया)

 

२००४- डॉ. प्रफुल्ल कुमार सिंह “मौन” (प्रेमचन्द की कहानी-प्रेमचन्द, हिन्दी)

 

२००५- डॉ. योगानन्द झा (बिहारक लोककथा- पी.सी.राय चौधरी, अंग्रेजी)

 

२००६- राजनन्द झा (कालबेला- समरेश मजुमदार, बांग्ला)

 

२००७- अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली)

 

२००८- ताराकान्त झा (संरचनावाद उत्तर-संरचनावाद एवं प्राच्य काव्यशास्त्र-गोपीचन्द नारंग, उर्दू)

 

२००९- भालचन्द्र झा (बीछल बेरायल मराठी एकाँकी-  सम्पादक सुधा जोशी आ रत्नाकर मतकरी, मराठी)

 

२०१०- डॉ. नित्यानन्द लाल दास ( "इग्नाइटेड माइण्ड्स" - मैथिलीमे "प्रज्वलित प्रज्ञा"- डॉ.ए.पी.जे. कलाम, अंग्रेजी)

 

 

साहित्य अकादेमी मैथिली बाल साहित्य पुरस्कार

 

 

२०१०-तारानन्द वियोगीकेँ पोथी "ई भेटल तँ की भेटल"  लेल

२०११- ले.क. मायानाथ झा "जकर नारी चतुर होइ" लेल

 

प्रबोध सम्मान

 

 

प्रबोध सम्मान 2004- श्रीमति लिली रे (1933- )

 

प्रबोध सम्मान 2005- श्री महेन्द्र मलंगिया (1946- )

 

प्रबोध सम्मान 2006- श्री गोविन्द झा (1923- )

 

प्रबोध सम्मान 2007- श्री मायानन्द मिश्र (1934- )

 

प्रबोध सम्मान 2008- श्री मोहन भारद्वाज (1943- )

 

प्रबोध सम्मान 2009- श्री राजमोहन झा (1934- )

 

प्रबोध सम्मान 2010- श्री जीवकान्त (1936- )

 

प्रबोध सम्मान 2011- श्री सोमदेव (1934- )

 

प्रबोध सम्मान 2012- श्री चन्द्रभानु सिंह (1922- ) आ

                               श्री रामलोचन ठाकुर (1949- )

 

 

यात्री-चेतना पुरस्कार

 

 

 

२००० ई.- पं.सुरेन्द्र झा “सुमन”, दरभंगा;

 

२००१ ई. - श्री सोमदेव, दरभंगा;

 

२००२ ई.- श्री महेन्द्र मलंगिया, मलंगिया;

 

२००३ ई.- श्री हंसराज, दरभंगा;

 

२००४ ई.- डॉ. श्रीमती शेफालिका वर्मा, पटना;

 

२००५ ई.-श्री उदय चन्द्र झा “विनोद”, रहिका, मधुबनी;

 

२००६ ई.-श्री गोपालजी झा गोपेश, मेंहथ, मधुबनी;

 

२००७ ई.-श्री आनन्द मोहन झा, भारद्वाज, नवानी, मधुबनी;

 

२००८ ई.-श्री मंत्रेश्वर झा, लालगंज,मधुबनी

 

२००९ ई.-श्री प्रेमशंकर सिंह, जोगियारा, दरभंगा

 

२०१० ई.- डॉ. तारानन्द वियोगी, महिषी, सहरसा

 

२०११ ई.-  डॉ. राम भरोस कापड़ि भ्रमर (जनकपुर)

 

 

भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता

 

युवा पुरस्कार (२००९-१०) गौरीनाथ (अनलकांत) केँ मैथिली लेल।

 

 

भारतीय भाषा संस्थान (सी.आइ.आइ.एल.) , मैसूर रामलोचन ठाकुर:- अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००३-०४ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) जा सकै छी, किन्तु किए जाउ- शक्ति चट्टोपाध्यायक बांग्ला कविता-संग्रहक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त।  रमानन्द झा 'रमण':- अनुवाद लेल भाषा-भारती सम्मान २००४-०५ (सी.आइ.आइ.एल., मैसूर) छओ बिगहा आठ कट्ठा- फकीर मोहन सेनापतिक ओड़िया उपन्यासक मैथिली अनुवाद लेल प्राप्त।

 

विदेह सम्मान

 

विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान

 

१.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी फेलो पुरस्कार २०१०-११ 

२०१० श्री गोविन्द झा (समग्र योगदान लेल)

२०११ श्री रमानन्द रेणु (समग्र योगदान लेल)

२.विदेह समानान्तर साहित्य अकादेमी पुरस्कार २०११-१२ 

 

२०११ मूल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (गामक जिनगी, कथा संग्रह)

२०११ बाल साहित्य पुरस्कार- ले.क. मायानाथ झा (जकर नारी चतुर होइ, कथा संग्रह)

२०११ युवा पुरस्कार- आनन्द कुमार झा (कलह, नाटक)

२०१२ अनुवाद पुरस्कार- श्री रामलोचन ठाकुर- (पद्मानदीक माझी, बांग्ला- मानिक बंद्योपाध्याय, उपन्यास बांग्लासँ मैथिली अनुवाद)

नाटक, गीत, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला, शिल्प आ चित्रकला क्षेत्रमे विदेह सम्मान २०१२ क घोषणा

 

अभि‍नय- मुख्य अभिनय ,

 

सुश्री शि‍ल्‍पी कुमारी, उम्र- 17 पि‍ता श्री लक्ष्‍मण झा

 

श्री शोभा कान्‍त महतो, उम्र- 15 पि‍ता- श्री रामअवतार महतो,

 

हास्‍य-अभिनय

 

सुश्री प्रि‍यंका कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री वैद्यनाथ साह

 

श्री दुर्गानंद ठाकुर, उम्र- 23, पि‍ता- स्‍व. भरत ठाकुर

 

नृत्‍य

 

सुश्री सुलेखा कुमारी, उम्र- 16, पि‍ता- श्री हरेराम यादव

 

श्री अमीत रंजन, उम्र- 18, पि‍ता- नागेश्वर कामत

 

चि‍त्रकला

श्री पनकलाल मण्डल, उमेर- ३५, पिता- स्व. सुन्दर मण्डल, गाम छजना

श्री रमेश कुमार भारती, उम्र- 23, पि‍ता- श्री मोती मण्‍डल

 

संगीत (हारमोनियम)

 

श्री परमानन्‍द ठाकुर, उम्र- 30, पि‍ता- श्री नथुनी ठाकुर

 

संगीत (ढोलक)

 

श्री बुलन राउत, उम्र- 45, पि‍ता- स्‍व. चि‍ल्‍टू राउत

 

संगीत (रसनचौकी)

 

   श्री बहादुर राम, उम्र- 55, पि‍ता- स्‍व. सरजुग राम

 

शिल्पी-वस्तुकला

 

    श्री जगदीश मल्लिक,५० गाम- चनौरागंज

 

मूर्ति-मृत्तिका कला

 

श्री यदुनंदन पंडि‍त, उम्र- 45, पि‍ता- अशर्फी पंडि‍त

 

 

काष्ठ-कला

 

श्री झमेली मुखिया,पिता स्व. मूंगालाल मुखिया, ५५, गाम- छजना

 

 

किसानी-आत्मनिर्भर संस्कृति

 

श्री लछमी दास, उमेर- ५०, पिता स्व. श्री फणी दास, गाम वेरमा

 

अनचिन्हार आखर ( http://anchinharakharkolkata.blogspot.com ) द्वारा प्रायोजित "गजल कमला-कोसी-बगमती-महानंदा सम्मान" बर्ख 2011 लेल ओस्ताद सदरे आलम गौहर जीकेँ प्रदान कएल गेलैन्ह। एहि बेरुक मुख्यचयनकर्ता ओस्ताद सियाराम झा"सरस" छलखिन्ह।

 


( विदेह ई पत्रिकाकेँ ५ जुलाइ २००४ सँ खन धरि ११ देशक १,५०२ ठामसँ ७२,०४३ गोटे द्वारा ३५,४५२ विभिन्न आइ.एस.पी. सँ ३,३६,७०७ बेर देखल गेल अछि; धन्यवाद पाठकगण। - गूगल एनेलेटिक्स डेटा। )
 

गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com
 

http://www.maithililekhaksangh.com/2010/07/blog-post_3709.html

 

 

 २. संदेश-


[ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ]


१.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत।

२.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी।

३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत।

४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन।

५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दि बधाई स्वीकार करी।

६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।

७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।

८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम ैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।

९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।

१०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।

११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।

१२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।

१३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।

१४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी।

१५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी।

१६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। मुदा अहाँक सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनारथ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे https://sites.google.com/a/videha.com/videha-pothi/  पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि ताहिपर हमर कोनो नियंत्रण नहि अछि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग।

१७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल।

१८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई।

१९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत।

२०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ।

२१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ।

२२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य।

२३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई।

२४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि।

२५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर)

२६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक।

२७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत।

२८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी।

२९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना।

३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी।

३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि।

३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई।

३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई।

३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई।

३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, िशालकाय संगहि उत्तमकोटिक।

३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ।

३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम।

३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना।

३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ।

४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल।

४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई।

४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य।

४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना।

४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि।

४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक।

४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत।

४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आ्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि।

४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रश‍ंसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत।

४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना।

५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना।

५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना।

५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल।

५३.श्री मानश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना।

५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक अनेक धन्यवाद; कतेक बरखसँ हम नेयारैत छलहुँ जे सभ पैघ शहरमे मैथिली लाइब्रेरीक स्थापना होअए, अहाँ ओकरा वेबपर कऽ रहल छी, अनेक धन्यवाद। 

५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना।

५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल।

५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई।

५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि।

५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी।

६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि।

६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब।

६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी।

६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही।

६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय।

६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना।

६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय।

६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह।

६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना ।

६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ।

७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक)

७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि।

७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि।

७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि।

७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना।

७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि।

७६.श्री उदय चन्द्र झा "विनोद": गजेन्द्रजी, अहाँ जतेक काज कएलहुँ अछि से मैथिलीमे आइ धरि कियो नहि कएने छल। शुभकामना। अहाँकेँ एखन बहुत काज आर करबाक अछि।

७७.श्री कृष्ण कुमार कश्यप: गजेन्द्र ठाकुरजी, अहाँसँ भेँट एकटा स्मरणीय क्षण बनि गेल। अहाँ जतेक कज एहि बएसमे कऽ गेल छी ताहिसँ हजार गुणा आर बेशीक आशा अछि।

७८.श्री मणिकान्त दास: अहाँक मैथिलीक कार्यक प्रशंसा लेल शब्द नहि भेटैत अछि। अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सम्पूर्ण रूपेँ पढ़ि गेलहुँ। त्वञ्चाहञ्च बड्ड नीक लागल।

७९. श्री हीरेन्द्र कुमार झा- विदेह ई-पत्रिकाक सभ अंक ई-पत्रसँ भेटैत रहैत अछि। मैथिलीक ई-पत्रिका छैक एहि बातक गर्व होइत अछि। अहाँ आ अहाँक सभ सहयोगीकेँ हार्दिक शुभकामना।
 



कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर

गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७

Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:

Language:Maithili

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