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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक संपादकीय संदेश

 विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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(c)2004-15.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतए लेखकक नाम नहि अछि ततए संपादकाधीन।

 

वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका  नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

संपादकीय

हैदराबादक मिथिला सांस्कृतिक परिषद् द्वारा श्री योगेन्द्र पाठक 'वियोगी' जी केँ हुनक पोथी 'विज्ञानक बतकही'क लेल पहिल तिरहुत साहित्य सम्मान देल गेल।

२०७१ सालक गंकी धुस्वाँ बसुन्धरा पुरस्कार ऐबेर श्री रामभरोस कापड़ि भ्रमरकेँ देल जाएत। नेवारी, नेपाली आ हिन्दी भाषाक साहित्यकार धुस्वाँ सायमी आ हुनकर पत्नी श्रीमति बसुन्धराक स्मृतिमे स्थापित गंकी धुस्वाँ बसुन्धरा पुरस्कार २०३९ साल सँ देल जा रहल अछि आ दू सालपर देल जाएबला ई पुरस्कार मैथिलीमे सर्वप्रथम देल गेल अछि।

आगाँक अंक:

पाठक जे मत आएल तैमे सभसँ बेसी मत अरविन्द ठाकुरजीक पक्षमे आएल तँए विदेहक मइ वा जून २०१५हक कोनो अंक "अरविन्द ठाकुर विशेषांक" रहत।

संगेसंग बहुत रास पाठक मत जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल जी लेल छनि। मुदा हुनक उम्र ६०सँ बेसी छनि तैयो हमरा लोकनि पाठकक मतकेँ सम्मान दैत 

 निर्णय लेलजे विदेहक जून-जुलाइ २०१५हक कोनो अंक "जगदीश चंद्र ठाकुर अनिल" विशेषांक रहत।

 

रचना उपलब्धताक अधारपर समय आगू-पाछू भऽ सकैए। विदेह सभ आलोचक,समीक्षक, समालोचकसँ हुनक लेख ओ संस्मरण, जीवनी आदि आमंत्रित करैत अछि। सभ प्रकारक रचना ३० अप्रैल २०१५ धरि पठेबाक आग्रह।

 

रविन्द ठाकुर आ जगदीश चंद्र ठाकुर ’अनिल’ क पोथी नीचाँक लिंकपर डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि:-

 

अरविन्द ठाकुर 

परती टूटि रहल अछि (कविता संग्रह)

अन्हारक विरोध मे (लघु कथा संग्रह)

बहुरुपिया प्रदेश मे (गजल संग्रह)


 

जगदीश चन्द्र ठाकुर ’अनिल’

धारक ओइ पार (दीर्घ कविता)

गीत गंगा (गीत संग्रह)

गजल गंगा (गजल संग्रह)

 

पाठकीय प्रतिक्रिया:

विदेह अंक १७१

आशीष अनचिन्हार

सुकोसुत सिशिर जीक स्वागत छनि। शशिरजीक रचना शुद्ध रूपसँ बाल रचना अछि आ बहुत नीक लयमे अछि। आशा करैत छी जे ओ आब बरोबरि अबैत रहता। आशासँ बेसी नीक प्रणव झा आ बीनीत कु. ठाकुरजीक रचना अछि। बीनीत जीक कविता "पार लगाउ" बहुत नीक नव गीत अछि। ई आशासँ भरल अछि। एकांकी वा नाटक केर संवाद छोट रहने मंचन बेसी सुतरै छै आ ऐ कलामे राजदेवजी नीक प्रदर्शन केलथि हए।

आशीष अनचिन्हार

विदेहक अंक 170मे विनीत ठाकुर, चित्रा अंशु आ प्रणव झाजीक रचनाक स्वागत छनि। इएह सभ भविष्य छथि। खास कऽ विनीत ठाकुरजीक नव गीत निर्गुणक आधुनिक स्वरूप अछि आ ई बेर- बेर एना स्पष्ट होइए--

अंतिम टाइम जे आ जाएत,

तखन किछु नै फुराएत।

अप्पन सोचि कऽ कथनी-करनी,

आँखि डबडबाएत ।

अखने सँ किए नै सोचै छी?


 

विशेष रूपें ई अंक भरिगर अछि गुण आ संख्या दूनू हिसाबें। जँ हरेक अंकमे एनाहिते दू-तीना टा नव आबथि तँ बेसी नीक।

 

कीर्तिनाथ झा

प्रिय गजेन्द्र जी ,
 

विदेहक १६९ म अंक भेटल . एखन धरि मधुपजी सं सोझे संपर्क में रहैबला पीढ़ी उपलब्ध छथि. ओहि समुदाय सं ककरो कोनो लेख नहिं हयब अखरल. तथापि एहि अंकक सब सं विशिष्ट सनेस थिक ' मधुपजीक किछु गीत, कविता ,गजल आ दोहा. बानगीक रूप में मधुप जीक किछु गीत दितियैक तं नीक होइत . पूर्ववर्ती पीढ़ीक रचनाकारक रचना जखन नव पीढ़ी पढ़त तखने ने नीक बेजायक निर्णय हेतइ . अनिल चन्द्र ठाकुरजीक आलेखक माध्यमे मधुपजीक पोथीक लिस्ट तं लोककें भेटबे करतैक. हँ, छपाईमें अशुद्धि मधुर में बालु जकां प्रतीत भेल. विदेहक एहि अंकमे सुश्री ज्योतिक कविता आकृष्ट केलक; सनेस में लमनचुस आ कृष्णभोग आम आब विलुप्त भेल जा रहल छैक मुदा ममताक रंग तं ओएह छैक .डाक्टर अजित मिश्रक प्रसादें 'हम जेबै कुसेस्सर भोर, रंगि कै ठोर, पहिरि कै काड़ा, झनकाय झनाझन छाड़ा' सन गीत तकबाक इच्छा लोक कें होई से संभव .

एकटा आओर गप्प. साहित्यमें मौलिक रचना आ समालोचना दुनूक महत्व छैक. मुदा, मैथिली में समालोचना सर्वत्र अनेरुआ घास जकां साहित्यके छारने रहैत अछि. एखुनका युग में छापू आ उतारू ( copy and paste ) एहि प्रवृत्तिक संगबहिना थिकै. युवक लोकनि सं हमर आग्रह अछि मूल लेखन करथि . नव वस्तु लोक नवीनताओ देखिकय कीनि लैत अछि. पछाति दोसरा बेर भले जांचि-परखि क लिअय. दोसर, समालोचना ले साहित्यक गहन अध्ययन चाही . पहिने अपने अवगति होयत तखन ने  नीक बेजायक गुण-अवगुण अनका बुझयबइ . शास्त्र में कहने छैक - श्रोतव्यो ,मन्तव्यः ,निदिध्यासितव्यः ( सुनु , गुनु , मनन करू). तथापि जं समालोचनाक वृत्ति में रूचि हो तं सुनु , गुनु , मनन करू आ तखन  अपन दृष्टि सं साहित्यकें भजारू आ अपन नीर-क्षीर विवेचना सं पाठककें अवगत कराऊ. 
 

एतद्धि.

सादर,

कीर्तिनाथ

 

आशीष अनचिन्हार

विदेहक १६९ म अंक

विदेहक ई मधुप विशेषांक एकटा माइल स्टोन अछि। प्रायः देखल गेल अछि जे प्रिंट बला पत्रिकामे १२०-१३० पन्ना छपैत अछि मुदा ७०-८० पन्ना साभार बला लेखसँ भरल रहैत अछि। आ तरहें विदेह ओइ पत्रिका सभसँ अलग अछि कारण ऐमे एकटा छोड़ि आर सभ आलेख बिल्कुल नव आ फ्रेश अछि। आ इएह तत्व विदेहकेँ आर पत्रिकासँ अलग बनबैत छै।

गप्प करी किछु आलेखकेँ गप्प करब। मुन्नाजीक आलेख एकटा नव प्रश्न ठाढ़ केलक अछि यात्रीजीक जनकवि हेबाक सम्बन्धमे। वियोगीक जीक आलेखमे नव तरीका छै जे ओइ समयक पचास पाइ आजुक समयमे कतेक हेतै आ ओकरासँ आजुक मजदूर कतेक घर निमाहत। मैथिलीमे मठाधिशी परंपराकेँ देखैत ओमप्रकाशजी सही कहि रहल छथिन जे मठाधीशक फर्माक कारणें मधुपजी बेसी गजल नै लीखि सकलाह।
बाद बाँकी सभ आलेख अपन-अपन निष्कर्षमे नीक अछि मुदा सभसँ बड़का काज भेल जे प्रचुर मात्रामे मधुपजीक रचना नेटपर आएल। ई सभसँ बड़का काज भेल।

एहन-एहन विशेषांक आर एबाक चाही।

 

आशीष अनचिन्हार

विदेहक उद्येश्य छै समानांतर चलब। साहित्य केर संग जीवनमे सेहो। विदेहक १६८म अंकमे प्रकाशित कपिलेश्वर राउतजीक कथा "बड़का खीरा" पुरने ब्राम्हणवादी ढ़ाँचापर अछि। जखन ओ अपन कथाक शुरूआते एना करै छथि जे-- "कहबी अछि‍, पुरुखक भाग आ स्‍त्रीकगणक चरि‍त्र कखनि‍ बदलि‍ जाएत तेकर कोन ठेकान।" तखने ई निश्चित होइत अछि जे ई विदेहक परंपराक अंतर्गत नै अछि। ओना हमरा ई मानबामे कोनो संकोच नै जे कथाक मूल स्वर अंधविश्वास हटेनाइ अछि। मुदा ई बड़का दुर्भाग्य जे कथाक शुरूमे लेखक अपने अंधविश्वाससँ ग्रस्त छथि।

कथासँ फिल्म जल्दी बनि सकैए मुदा फिल्मसँ कथा बहुत मोशकिल छै। ओमप्रकाशजीक कथापर जँ आबी तँ कहि सकै छी जे कथासँ फिल्म बनल अछि आ पाठक एकै पाराग्राफक बाद बुझि जाइत छथि जे अंतमे की हेतै। आ तँए शुरूआतेसँ ई कथा नीरस भऽ जाइए।

कुंदन कुमार कर्णजीसँ ई अपेक्षा जे ओ अपन गजलमे नव-नव बिंब अनताह। प्रस्तुत गजलमे पुरने बिंब सभहँक भरमार अछि।

इरा मल्लिकजीक आ अशरफ राइनजीक रचनासभ बड़ नीक छनि।

 

नचिकेता (मिथिला दर्शन)

विदेह भाषा सम्मानक संकल्पना आ ऐ बेरिक चयनित लेखक-अनुवादक सभकेँ हमरा सभक दिससँ बधाइ।

शेफालिका वर्मा

सभ सम्मानित साहित्यकारकेँ हमर अशेष शुभकामना। संगे विदेह ग्रुप आ गजेन्द्रजीकेँ मैथिलीकेँ एतेक सम्मानित करबा लेल असंख्य साधुवाद।

आशीष अनचिन्हार

१६६म अंक संतुलित अछि। प्रस्तुत अंकमे वियोगीजीक कथा "विजय"केँ ऐ अंकक सर्वश्रेष्ठ रचना कहल जाए तँ दिक्कत नै। हिनक कथाक पहिल पार्टक अपेक्षा दोसर पार्ट बेसी मुखर अछि आ एकर मुल्याकंन पचास साल बाद जा कऽ फड़िच्छ हेतै।

संपादकीयमे जँ कहियो काल देशक राजनीति ओ समाजिक-आर्थिक पक्षपर चर्चा होइ तँ आ रुचिगर हएत से आशा अछि।

विदेहमे पहिल बेर कविता लऽ कऽ एबाक लेल महेश झा डखरामीजीक स्वागत छनि।

आशीष अनचिन्हार

अंक 167मे डाॅ. कीर्ति नाथ झा जीक कथा कने आर फड़िच्छ हेबाक व्यग्रतामे अछि। पाठक ने ऐ पारक रहै छथि आ ने ओइ पारक।

नन्‍द वि‍लास रायजीक कथा कने पुरान ढ़र्राक बुझना गेल। पूरा संसारमे विषय एकै होइ छै मुदा ओकर शिल्पक प्रयोग अलग-अलग करै छै। आशा अछि जे रायजी आगूसँ शिल्पक खियाल रखता।

अशरफ राईन जीक कता आ आजाद गजल नीक भाव लेने अछि।

कीर्तिनाथ झा

प्रिय गजेंद्रजी ,
'विदेह' १६७ म अंक ०१ दिसम्बर २०१४ (वर्ष ७ मास ८४ अंक १६७) भेटल . 
दूटा रचना आकृष्ट केलक.
अशरफ राइन केर आजाद ग़ज़ल आ जगदानन्द  झा 'मनु ' केर ' मैथिली भाषामें एकरूपताक  अभाव '. 
अशरफ राइन केर आजाद ग़ज़ल अनुभूत सत्यक पीड़ाक सद्यः प्रतिबिम्ब थिक.  अपन देश सं दूर  रेगिस्तान में रहैत मजबूर जिनगीक आ अपन देश-कोस. माटि-पानि, आमा-बुआ सं दूर हेबाक दुःखक ई  एहन बयान  थिक जे ग़ज़ल सहजहिं मोनके  छूबि लेलक. एतबे नहिं, एहि गजल में कोमल भावनाक अतिरिक्त  आओर बहुतरास  गंभीर गप्प छै, जेना, राजनेता लोकनिक प्रति आक्रोश आ संविधान नहिं बनबाक अफशोस . वाह अशरफ . लिखैत रहू .
आब ' मैथिली भाषामें एकरूपताक  अभाव ' क गप्प करी :
हम पहिने स्पष्ट क दी , हम भाषा वैज्ञानिक नहिं छी . मुदा एहि विषय पर विचार तं अछिए . ' मैथिली भाषामें एकरूपताक  अभाव ' समस्या  थिक आ नहिओ थिक . मुदा ताहि पर भाषा वैज्ञानिक विचार करथु , समाधान ताकथु . ओना एहि विषय पर प्रायः चालीस आ पचास केर दशक में मैथिलीक तत्कालीन  साहित्यकार  लोकनि विचार केने छथि . से तकला उत्तर भेटत . भाषाक नमूना वा  उदाहरणक हेतु  रमानाथ झा , किरणजीक आ यात्रीक भाषा  देखबाक थिक. ओना, भाषाक में एकरूपताक अभाव भाषाके समृद्ध करैत छैक .  संगहिं, एकरूपताक अभाव जीवित भाषाक धुक-धुकीक प्रमाण थिकैक. नहिं तं अंग्रेजी किएक विश्यव्यापी भाश भ  गेल आ फ्रेंच किएक फ्रांसहिं धरि सीमित भेल जा रहल अछि . ई नहिं बिसरबाक चाही जे   भाषाक अनुसार व्याकरणक बनैछ. तें,  जनसामान्यकें आ मौलिक लेखककें व्याकरणक अनुसार भाषा बाजबाक /लिखबाक   बाध्यता नहिं हेबाक चाही. 
सादर ,
कीर्तिनाथ

विदेह भाषा सम्मान २०१४-२०१५ (समानान्तर साहित्य अकादेमी सम्मान)

 २०१४ मूल पुरस्कार- श्री नन्द विलास राय (सखारी पेटारी- लघु कथा संग्रह)

२०१४ बाल पुरस्कार- श्री जगदीश प्रसाद मण्डल (नै धारैए- बाल उपन्यास)

२०१४ युवा पुरस्कार - श्री आशीष अनचिन्हार (अनचिन्हार आखर- गजल संग्रह)

२०१५ अनुवाद पुरस्कार - श्री शम्भु कुमार सिंह ( पाखलो-  तुकाराम रामा शेटक कोंकणी उपन्यासक मैथिली अनुवाद)

 

विदेह भाषा सम्मान २०१-१ (वैकल्पिक साहित्य अकादेमी पुरस्कार)

२०१ बाल साहित्य पुरस्कार श्रीमती ज्योति सुनीत चौधरी- “देवीजी” (बाल निबन्ध संग्रह) लेल।

२०१ मूल पुरस्कार - श्री बेचन ठाकुरकेँ "बेटीक अपमान आ छीनरदेवी" (नाटक संग्रह) लेल।

२०१३ युवा पुरस्कार- श्री उमेश मण्डलकेँ “निश्तुकी” (कविता संग्रह)लेल।

२०१४ अनुवाद पुरस्कार- श्री विनीत उत्पलकेँ “मोहनदास” (हिन्दी उपन्यास श्री उदय प्रकाश)क मैथिली अनुवाद लेल।



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गजेन्द्र ठाकुर

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