विदेह ४३३ म अंक पर पाठकीय मन्तव्य
प्रिय
सम्पादकजी,
सनातन धर्म पर श्री हितनाथ झा द्वारा लिखित-संकलित अलग-अलग लेखक के लेख
पढ़लहुँ जाहि में सनातन धर्म, तकर वर्ण-व्यवस्था के बीसवीं सदी के पूर्वार्ध
में तत्कालीन लेखक स-उदाहरण संक्षिप्त व्याख्या करए के प्रयत्न कएल गेल
रहनि I कौतूहलवश हितनाथ बाबू सँ संक्षिप्त वार्ता सेहो कएलहुँ I यद्यपि हमर
पीढ़ी कें सनातन के ने तँ शिक्षा देल गेल अछि, ने कोनों शास्त्र पढ़ाओल गेल
अछि आ नहिं ओ विशाल विषय-वास्तु के समुचित ज्ञान अछि तथापि एहि धर्म के ७२
वर्ष सँ स्वयं आचरण क रहल छी आ अपन संपर्क में लाखों सनातनीं कें सेहो देखल
आवि रहल छी I हमर विचार अछि जे कलियुग के आधुनिक परिपेक्ष में
वर्ण-व्यवस्था के समीक्षा अत्यावश्यक अछि I जनसंख्याँ विस्फोट आ भारतीय
संविधान द्वारा प्रदत्त आरक्षण व्यवस्था में योग्यता के भ रहल अवहेलना में
जेकरा जे तरह के जीविका भेट रहल अछि I एहि सँ अनेकों ब्राह्मण शूद्रकर्म व
शूद्र आध्यात्मिक कार्य क रहल अछि जाहि सँ पुरातन कर्म पद्धति तर्क-रहित भ
गेल अछि I इहो देखे में आवि रहल अछि जे एकहि व्यक्ति वर्ण-व्यवस्था के
अन्यान्य कार्य क रहल अछि I अतएव सनातन आ ओहि में वर्ण-व्यवस्था के
आधुनिकीकरण अनिवार्य भ गेल अछि I हर सनातनी कें धर्म के एक मूल प्रारूप
विद्यालय पाठ्यक्रम में अवश्य होवए चाही I आजुक युग में बढ़ि रहल कट्टरवाद
में मात्र सनातन एक एहन धर्म अछि जे समावेशी अछि आ 'सर्वदेवाः' कें मानैत
छैक I समग्र विश्व में धार्मिक वैमनस्यता कें समाप्त करए में सनातनी
मानसिकता के आवश्यकता अछि I
सप्रेम
डॉ वी. एन. झा
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