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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  पद्य

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(c)२००४-१२.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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     १.डॉ॰ शशिधर कुमर २.नवीन कुमार "आशा"

     .

डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४

      

     

मातृभूमि निज  मिथिला  अछि,  छी  वासी  हिन्दुस्तान  के
(मातृ भू वन्दन गीत)

(विगत् गणतन्त्र दिवस पर विशेष)

 

 


मातृभूमि निज  मिथिला  अछि,

                       छी  वासी  हिन्दुस्तान  के (केर)।*

पुण्यभूमि,  रणभूमि,  तपो - भू,

                         धरती   स्वर्ग   समान   जे ।।

 

 

युग - युग सँ अछि ठाढ़ जतऽ,

                      गर्वोन्नत  दिव्य  हिमालय ।

गूँजय  वेद - पुराण  जतऽ,

                       अछि सदाचार केर आलय ।

बहय  जतऽ  गोदावरी,  गंगा,

                       कोशी, कमला  आ कृष्णा ।

विभिन्न धर्म, भाषा भाषी जतऽ,

                     रहय निडर भऽ, क्लेश विना ।

शत कोटि करय छी नमण आइ हम,

                            धरती  कनक  समान  जे ।

पुण्यभूमि,  रणभूमि,  तपोभू,

                         धरती   स्वर्ग   समान   जे ।।

 

 

भारत  केर  सन्तान  छी हम,

                      आ  भारत  माँ  केर  प्रहरी ।

धर्म हमर  अछि  देशक  रक्षा,

                      देशक उन्नति – प्रगती (ति) ।**

देत कुदृष्टि जे एहि धरती पर,

                       करब   तकर     सन्धान ।

मारि भगायब हर एक केँ,

                       जे    होयत   खल   शैतान ।

इएह धरती थिक मण्डन गौतम,

                         औलिया, नानक राम के (केर) ।*

पुण्यभूमि,  रणभूमि,  तपो - भू,

                         धरती   स्वर्ग   समान   जे ।।

 

 

फहराय  हमेशा  मुक्त व्योम मे,

                     विजयी   -  विश्व   -  तिरंगा ।

रहय  विश्व  मे  सभसँ  आगाँ,

                      हमर   देश    केर    झण्डा ।

अमर  रहय  ई  देश,   जतऽ

                      अछि   धीर – वीर   सन्तान ।

मातृभूमि  केर  रक्षा  लेऽ जे,

                      करय     निछाउर     प्राण ।

नञि बिसरि सकब गान्धी - सुभाष,

                         आ अगनित कत’ बलिदान केँ ।

पुण्यभूमि,  रणभूमि,  तपो - भू,

                         धरती   स्वर्ग   समान   जे ।।

 

 

* मैथिली काव्य रूप मे बहुधा “केर” आ “केँ” केर उच्चारण द्विमात्रिक “के” सन होइत अछि । यद्यपि गद्य मैथिली मे एहि प्रकारेँ लिखब गलत अछि पर पद्य मैथिली मे पद्यक लय – ताल केर अनुसारेँ आवश्यकता पड़ला पर लिखल जा सकैत अछि ।

 

·         केर = ह्रस्व उच्चारण = ।। = २ मात्रा

·         केँ = दिर्घ उच्चारण = ऽ = २ मात्रा

·         के = दिर्घ उच्चारण = ऽ = २ मात्रा

 

**  पद्य मैथिलीक एकटा आओर विशेषता । पद्य मैथिली मे पद्यक लय – ताल केर अनुसारेँ आवश्यकता पड़ला पर मूल “ह्रस्व उच्चारण” केँ “दिर्घ” आ “दिर्घ उच्चारण” केँ “ह्रस्व” रूप मे उच्चारित कयल जा सकैत अछि ।

 

 

हे अए (ऐ)  हमर शशिकामिनी

(गीत)

(आगामी वेलेण्टाइन डे पर विशेष)

 

 

हे अए (ऐ)  हमर शशिकामिनी ।*

हे अए (ऐ)  हमर शशिकामिनी ।।

 

गज - गामिनी,     मनोहारिनी ।

मम्  हृदय - कुञ्ज  विहारिणी ।।

 

मृदु - भाषिणी, मित - भाषिणी ।

छलकय  अधर  सञो  वारुणी ।।

 

मधु - हासिनी ,    सौदामिनी ।

रति - छवि नयन सुखदायिनी ।।

 

प्रिय - दर्शिनी,  मधु - वर्षिणी ।

शोभा     अलंकृत - कारिणी ।।

 

मन्मथ - जयी,   सद्यः   रती ।

कर काम जय - ध्वज धारिणी ।।

 

अहँ   उर्वशी,   मम् उर बसी ।

अहँ   प्रीति पय - मन्दाकिनी ।।

 

हे  अए (ऐ)  हमर शशिकामिनी ।

हे अए (ऐ)  हमर शशिकामिनी ।।

 

 

* शशिकामिनी = चाँदनी = चानी

  

 

 नवीन कुमार "आशा"

हिंगलू भाइ यौ टिंगलू भाइ

 

हिंगलू भाइ यौ टिंगलू भाइ

जुनि अहाँ तोड़ू तुराइ

जँ अहाँ तोड़ब तुराइ

रातिमे खायब खूब पिटाइ

जुनि रहू अहाँ खाटपर

नै तँ काल्हि रहब टाटपर

आब सुनू यौ भाइ सुनू यौ भाइ

जे अछि टाटक बत्ती

नै बनबै जाउ देहक पहचान

आइ दुपहरिया रहि रहरिया

ओतए आबै अहाँक अबाज

पहुँचलौं जखन हम अहाँक डेरा

तखन आएल माथमे फेरा

फेर बुझल हम घरक रीत

अहाँ करी सभटा काज

भौजी खाली करथि साज

तँए कही यौ टिगलू भैया

जल्दी-जल्दी खेनाइ पकाउ

जँ अहाँ पकायब नीक खेनाइ

रातिमे भौजी दैथि रस मलाइ

आ जँ अगर तानब तुराइ

फेर खायब खूब पिटाइ

 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।