प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
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विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं-
१. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी

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२. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी

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३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी

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ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:-
१.कपिलेश्वर राउत
२.उमेश मण्डल
३.राम विलास साहु
४.राजदेव मण्डल
५.नन्द विलास राय
६.जगदीश प्रसाद मण्डल
७.दुर्गानन्द मण्डल
८.रामानन्द मण्डल

 

ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राम विलास साहुक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक

राम विलास साहु केर पाँचटा कथा

कथा ३

स्‍वर्गक सुख

कोसी नदीक छीटपर बौकू सदाय खोपड़ी बना रहै छल। अगल-बगलमे आरो लोक सभ काश-पटेरक खोपड़ी बना रहै छल। कोसीक कटनियाँ भेने मुसहरी टोल उजैर गेल।

माघ मासक समए। वस्‍त्रक अभावसँ जाड़क मारल बौकू ठिठुरैत घूर तपै छल। जखने घूरमे आगि देलक आकि बौकूक बेटा-बेटी सटि कऽ बैस आगि खोरि-खोरि तापए लगल। पत्नी बलबावाली खोपड़ीसँ बकरी निकालैत जोरसँ बजली-

"रातियोँ सिदहाक अभावमे सभ कोइ भुखले सुति रहलौं, आब दिनोमे बाल-बच्चा की खाएत। भूखसँ तरैप की बाल-बच्चाक संगे कोसीमे डुमि मरब।"

बौकू सदाय बाजल-

"भोरे-भोर एहेन अशुभ बात नइ बाजू। शीतलहरी भरि कोनो तरहेँ परान बँचाउ। परान बँचत तँ लाखो उपए करब। कनिक्को समए फरिच हेतै तँ खाइ-पीबैक जोगार करब। एक तँ कोसी मैयाक मारल छी दोसर भगवानो बेमुख अछि।"

शीतलहरीक कोनो ठेकान नइ अछि मुदा भूख तँ समैपर लगिये जाइए। बेटा-बेटी रातिमे किछु ने खेलक। भिनसर होइते जोर-जोरसँ खाइले माँगए लगल।

बलबावाली पड़ोसीसँ दू सेर अल्‍हुआ पैंच आनि घूरक आगिमे पका-पका बेटा-बेटीकेँ देलक। अपनो दुनू परानी खेलक। ऊपरसँ पानि पीब-पीब भूख मेटेलक।

कुहेस कमिते रौदक दर्शन भेल। बलबावाली पतिकेँ कहलकैन-

"दू दिनसँ सुखल रोटी आ अल्‍हुआ खा कऽ कोनो तरहेँ दिन कटलौं मुदा आइ भातक कोनो जोगार करू।"

बौकू जाड़क कोनो परवाह नइ करैत धोतीक तर-ऊपरा ओढ़ैत बाजल-

"सब मिलि चलू परसा चौरीमे धानो लोढ़ब आ घोंघी-डोका सेहो बीछि आनब।"

साबिकेसँ परसा चौरीक सिंगरा-बेलौड़ आ सतराज धान नामी अछि।

चौरी पहुँचते बौकू बेटा-बेटीकेँ कहलक-

"तूँ सभ घोंघी-डोका बीछि-बीछि छिट्टामे राख आ हम दुनू गोरे धान बीछै छी।"

दुनू गोरे मिलि करीब पसेरी भरि धान लोढ़लक। बेटा-बेटी घोंघी-डोका छिट्टामे उठौलक।

जखन घर चलैले तैयार भेल तँ बौकूक पत्नी बजली-

"सुतैले एकेटा गोनैर अछि। किछ नार सेहो नेने चलू। बिछौना मोटसँ देबै। "

नार बीछैकाल बौकू एकटा अढ़ैया भरिक कौछकेँ देखलक। देखते बौकू कौछकेँ उनटौलक।

कौछकेँ उनटा देने भागल नइ होइ छइ। उठा कऽ तौनीमे बान्‍हलक। धान आ नार पत्नीक माथपर देलक आ अपने बौकू घोंघी-कौछ लऽ बेटा-बेटीकेँ संग केने विदा भेल।

घर पहुँचते धान रौदमे पसारलक। पड़ोसीसँ उक्‍खैर-समाठ आनि धान-कुटि कऽ चाउर तैयार केलक। कौछक मासु बना रान्‍हलक। दोसर बरतनमे भात रान्‍हलक। सभ कोइ संगे खेनाइ खाइले बैसल।

जाड़क समयमे सिंगरा-बेलौड़ आ देसहरिया धानक चाउरक लाल-लाल भात तेलगर आ स्‍वादिष्ट होइते अछि। तैपर सँ कौछक मासु अपने तेलसँ ऐंठल-ऐंठल, भातपर पड़िते भातो तेलसँ तर-बतर भऽ गेल। बौकू बमरोटिया हाथसँ भात-मासु बँटबो करए आ खेबो करए। खेनाइ अधपेटा भेल तँ पानि पीब पियास मिझा नहमर साँस लैत बाजल-

"एहेन खेनाइ भागशालीए लोक खाइए। राजा-महराजाकेँ नशीव नइ होइ छइ। ई खेनाइ देखते केहेन-केहेन साधु-बबाजीकेँ सेहो मन ललिचा जेतइ।"

भोजन केलापर बौकू घूर पजारि देह टनकौलक। बलबावाली अरामसँ सुतैले ठेहुन भरि नार बिछौलक आ बाल-बच्चाक संग ओइपर सुतल। आ ऊपरसँ गोनैर ओढ़ि लेलक। कनीकालक पछाइत सबहक देह गरमा गेलइ।

बलबावाली हाफी करैत पतिकेँ कहली-

"औझका मेहनत साफल भेल। एहेन बिकट समयमे एहेन खेनाइ आ एहेन ओढ़ना बिछौना मिलल।"

नीक अवसर देख बौकू बाजल-

"ई छी स्‍वर्गक सुख। एहेन सुख रजो-रजबारकेँ सुन्‍दर महल आ सजल पलंगपर नइ भेटैए। अपना देखियो तर नारायण आ ऊपर गोविन्‍द छै आ बीचमे बौकूक परिवार अरामसँ सुतल छइ। नइ कोनो डर-भर छै आ बगलेमे कासी मैयाक दिन-राति पहरा पड़ै छइ।"

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