वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.Read in your own script Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
१.जगदीश
प्रसाद मण्डल २.
कपिलेश्वर
राउत
१
जगदीश
प्रसाद मण्डलक
नौटा
कविता-
1. धूप-छाँह
हे सूर्ज तोड़े पूछै छिअह?
उपर रहि तँू किअए बनौने,
एना छह दोहरी बेबहार।
अपन रश्मि आगू बढ़बैमे
धरतीकेँ किअए केने अन्हार।
केना रोकि तोरा दइ छह
वन-उपवन ओ जंगल।
आस लगौने धरतियो बैसल
करै छह किअए मंगल-अमंगल।
विहुँसि सूर्ज बाजल विह्वल!
कोनो भेद-भाव कखनो नै
मनमे कहियो उठैए।
जे जतए पकड़ि-पकड़ि
से अपन काज करबए लगैए।
जँ तोहू करबए चाहै छह
छाहरि छोड़ि निकलह बाहर।
जखने नजरि मिला-चलबह
तखनेसँ संग पूरए लगबह।
मर्माहत भऽ पुकारि धरती-
केना कऽ घुसुकि पेबै,
चारू दिस घेड़ने-ए।
केना कऽ संग पाएब तोहर
कानि-कानि मन कहैए।
))((
2. माए
भेटि नै पबैत शब्दकोषमे
एक्को उदाहरण माइक लेल।
नजरि उठा जखन देखै छी
माताराम की सभ देल।
तीसे वर्खमे विधवा भेलौं
कहब कि अहाँसँ मइया।
मनुख बना ठाढ़ कऽ देलौं
बाकी कि रखलौं हे मइया।
कनतोड़ी भरि अपन आभूषण
बेचि-विकीन लगा देलौं
जुआनी गला जे सिनेह विलहलौं
बदलामे हम की कऽ देलौं।
राखि-सम्हारि घरसँ बाहर
अपन ओ लागिक परिवार।
लुटा-मेटा अपन जिनगीकेँ
जिनगी जीबैक चढ़ेलौं धार।
हँसी-खुशी जिनगी ससरैए।
सटि-सटि आनो परिवार।
एक-दोसरमे भेद कहाँ-ए।
संगे-संग मानो-सम्मान।
नव-नव चेहरा सिरजि
नव-नव काज धड़बैए।
नव-नव परिवार समेटि
नव-नव सिनेह सजबैए।
अपन सदृश्य अपने हे मैया
शब्द कहाँ अछि जे किछु कहबह।
अपन रूप परसि-परसि
अपने सन हमरो बनेलह।
))((
3. साथी
जिनगीमे साथी मिलए जँ,
जीवन रस पीबे करत।
जीवने रस ने अमृत कहबए
अमृतमय जिनगी जीबे करत।
जाबे अमृतपान नै होइ छै
साथी हेराइक डरो रहै छै।
जहिना तेज धारा धारमे
हाथक साथी हथिआर (लाठी) छुटै छै।
कोमल-कड़ा बीख होइत जहिना
तहिना ने अमृतो होइ छै।
कात-करोट किनछेरे-किनछरि
घोंघा-सितुआ मोती भेटै छै।
नै अछि जरूरी कोनो
अमृत मधुर हेबे करत।
तीतोमे बास जेकर छै
नीक-नीक फल देबे करत।
आशमे अमृत बरसै छै
निराश छोड़ि आशावान बनू।
अपन जान-परान अपनेमे
मुट्ठी बान्हि-बान्हि आगू बढ़ू।
जहिना दुनियाँक रंग सतरंगी
तहिना चालि जिनगियो धड़ै छै
खसैत-उठैत, चलैत-चलैत
जिनगी रसपान करै छै।
))((
4. घर लोटिया बुड़ले अछि।
घर लोटिया बुड़ले अछि,
घर-घरारी गेले अछि।
गाम-घर उजड़ि-उपटि
नाओं-ठेकान विसरले अछि।
घरक लोटिया बुड़ले अछि।
बेटा-पुतोहू निकलि घरसँ
देखलक शहर-बजार।
ओ कि फेरि घुरि घर औत
आकि घुमत हाट-बजार।
छाती मुक्का मारि लिअ
अपन जिनगी सम्हारि लिअ।
नै तँ अपनो बुड़ले अछि
घरक लोटिया बुड़ले अछि।
जइ बच्चाकेँ भेँट नै हेतै
सालक-साल माए-बाप।
दादा-दादीक कथे कि कहब
मोबाइलेसँ करत क्रिया-कलाप।
कुल-खनदान सभ गेलै अछि
घरक लोटिया बुड़ले अछि।
अंग्रेजी पढ़ि अंग्रेजिया बनि-बनि
पप्पा-मम्मी आनत घर।
बाप-दादाक कि भेद ओ बुझत
अड़ि-अड़ि बाजत निडर।
आबो कहू भाय, केना नै डुमतै
घरक लोटिया केना नै बुड़तै।
))((
5. जुग बदलल जमाना बदलल।
जुग बदलल जमाना बदलल
बदलि गेल सभ रीति-बेबहार।
चालि-ढालि सेहो बदलि गेल
बदलि गेल सभ आचार-विचार।
मुदा, राति-दिन एको ने बदलल
नै बदलल चान, सूर्ज, अकास।
पूरबा-पछबा सेहो ने बदलल
नै बदलल जिनगीक विसवास।
दुख देखि सभ दौग रहल-ए
पाबए चाहैए सुखक भंडार।
उड़ि-उड़ि पूरबा-पछियामे
लोभक बाट पकड़ि धूरझाड़।
घर छोड़ि घुड़मुड़िया खेलए
दुहाइ कसि मातृभूमिक लगबए।
अपनो जिनगी देखि-देखि
करनीक तँ फलो किछु देखबए।
एक सुग्गा वन बास करैए
दोसर पोसा िपजरा कहबैए।
रहितो पिजरा पोसा सुग्गा
राम-राम दिन राति रटैए।
अपन जिनगी अपने बूझि
अपन बाट पकड़ए पड़त।
अपना जिनगी लेल सदति
जीवन-संघर्ष करए पड़त।
जइ युवामे आत्मबल नै
ओइ युवाक जुआनी केहन।
अपन हाथ अपने छाती रखि
मुँहसँ अवाज निकलए जेहन।
))((
6
गरीबी
गरीबीक गुरू-आश्रम बीच
भट्ठेसँ पढ़ैत एलौं।
भोरे उठि प्रणाम करै छियनि
मनक असीरवाद पबैत एलौं।
राति-दिन सुरता लगौने
सदिखन चर्च करै छियनि।
उठिते चर्च अपने आबि-आबि
जन्म–अजन्मक बात कहै छियनि।
आँखिक आगू गुरू-गरीबीक
सुतलमे जगबै छथि।
दू-दिसिया चालि मनुखक
पकड़ि बाँहि कहै छथि।
अमीर-गरीबक चालि दू-दिसिया
कखनो अमीर, कखनो गरीब बनैत।
भाग्यक रेखा अगम-अथाह छै
हँसि-हँसि सदिखन सुनबैत।
गरीबी सत्-मार्ग चलबैए
हँसि कु-मार्ग अमीरी धड़बैए
भेद-कुभेद भेद बिनु बुझने
सुमार्ग कहि कुमार्ग चलबैए।
जेकरा ढौआ ढन-ढन करए
ओ केना पहुँचत मधुशाला।
चिकड़ि-चिकड़ि गरीबनाथ कहए
भोजन नै छी सुआद मशाला।
अपने हाथे पकड़ि बाँहि
सीमा सरहद देखि-देखि चलबैए।
अपन आड़ि-मेड़ अपने पकड़ि
हँसि-हँसि अपन चालि धड़बैए।
जेकरा अहाँ अमीर बूझै छी
नै छिऐक ओ अमीरी।
आ ने जेकरा गरीब बूझै छी
नै छिऐक ओहो गरीबी।
बुद्धदेव किअए राज-पाट छोड़लनि
जँ अभावेकेँ गरीबी कहबै।
भिझुक बेना पकड़ि किअए
जिनगी भीखमंगाक बनबए।
गरीबीक जे राह पकड़ि-पकड़ि
राही बनि रनिबास चलैए।
ब्रह्मा, विष्णु ओ शिवदानी
पदे-पद दर्शन पबैए।
यएह गरीबी आ अमीरीक
धड़-धड़ जीवन धार बहैए
सागर-गंगा हेराएल कहाँ
तिले-तिल चलैत रहैए।
7
दबाइये राेग
कहिया कतएसँ रोगाएल छी
रोगे ओछाइन धेने एलौं।
जी तोड़ि तरद्दुतो करै छी
रोगे संग-संग जीबैत एलौं।
रोगो कहाँ छोड़ए चाहैए
अपन ओझराएल-पोझराएल बान
रोगाएल देखि-देखि कहैए
ओ अछिये महा बुरिबान।
उक्कठ-पाकठ बरमहल करैए
कखनो नै छोड़ए अपन सान।
ताकि-ताकि मीठहा दवाइ आनि
गमबए चाहैए अपन जान।
कहै छलै पेट पाचन बिगड़ल
पीबए लगलौं महाजाइम।
आठे दिन अबैत-अबैत
सरदी-बोखार पकड़लक तानि।
कोनो कि एना आइये होए
आकि होइत आएल जुग-जुगसँ।
जएह पोषक सएह शोषक बनि
लीड़ी-बीड़ी करैत जुग-जुगसँ।
मनुख-मनुखक बीच अड़िया
घुमा बुइध बुद्धियार बनौलक।
दिन-राति छाँटि-छुटि आड़ि
साबरमंत्र पढ़ा मुग्ध बनौलक।
मनतरो कि हरही-सुरही
पीठिया-पीठिया मन घुमौलक।
हँसि-हँसि पकड़ि चालि
बुइधसँ यारी करौलक।
छी ठाढ़ बुद्धियार बनि-बनि
जिनगीक परिचए कहाँ पेलौं।
अपनो जिनगी नै देखै छी
कतएसँ कतए एलौं-गेलौं।
पाँच तत्वक जीवन पाबि-पाबि
जिनगीमे किछु नै केलौं
अकारथ जिनगी बना-बना
बेर्थमे जिनगी गमेलौं।
कि कहब किछु ने फुड़ैए
पीछराह बाट पकड़ि लेलौं।
केम्हरो-सँ-केम्हरो पीछड़ै छी
मृत्युकेँ सदति नतैत एलौं।
भार बना जीवन लीलाकेँ
कुहरि-कुहरि जीबै छी।
आशा-आसी ताकि रहल छी
जिनगी बाट काटै छी।
8
मुँहक झालि
मुँहक झालि बजौने कि हएत,
काजक झालि बजबए पड़त।
फोकला-खाख अन्ने की
सुभर दाना उपजबए पड़त।
जाधरि धरती पड़ती रहतै
चारागाह दिन-रातियो बनतै।
चरनिहारोक चालि असंख्य छै,
दिन-राति चरबे करतै।
सूर्जे जकाँ ओहो रहै छै
सूर्जेक संग चलबो करै छै।
राति-दिन बेड़ा-बेड़ा
समए देखि चड़बो करै छै।
देहधारी जीवे टा नै
विवेकियो पुरूष कहबै छी
लाज-शर्म जँ उठा-पीब
तँ अपन बिटारि अपने करै छी।
जँ धरतीपर जन्म लेलौं
किछु देबो किछु लेबो सीखू।
अपने केलहा संग चलै छै
गीरह बान्हि कन्हेठ राखू।
जहिना वनमे वृक्ष बहुत छै
जीवो-जन्तु तहिना भरल छै।
पाँच तत्व िनर्मित जे कहबै
पाँचे तत्व विलीनो होइ छै।
बिनु भक्तिक मुक्ति कहाँ
बिनु मुक्तिक जिनगी कहाँ छै।
भक्ति-मुक्तिक बीच बटोही
जिनगीक रसपान करै छै।
मुँहक झालि लहरी नै
कर्मक स्वरलहरी सीखू
अपन इतिहास अपने हाथसँ
स्वार्णाक्षरमे लिखनाइ सीखू।
9
किछु सीखू किछु करू
जिनगीमे किछु करब सीखू
जिनगीमे किछु लड़ब सीखू।
सभ जनै छी, सभ देखै छी
अज्ञान-अबोध बनि-बनि अबै छी।
सज्ञान-सुबोध तखने बनब
संघर्षक बाट जिनगी धड़ब।
एक-दोसरमे तखन बदलै छै
बीच परिवर्तनक खेल चलै छै।
जहिना रीतु परिवर्तन होइ छै
तहिना कुरीत-सुरीत सेहो बनै छै।
जहिना जाड़मे गरमी बदलै छै
तहिना ने गरमियो जाड़ बदलै छै।
पबिते पानि धरती धमकि
नवरंगी रूप बना सजै छै।
जिनगियोक तँ खेल एहिना
अहीमे सभ किछु बनै छै।
कियो भक्त भगवान पबैत
तँ कियो पबैत भगवत् भजन।
कियो योद्धा बनि अस्त्र उठबए
तँ कियो कुकर्म-सुकर्म गढ़ैत।
आँखि उठा घर-बाहर देखू
अपन कालखंड अपने परखू।
पबिते परेखि जीवन-मौसम केर
साओनक सोहनगर सुगंध बिखड़ू।
२
कपिलेश्वर
राउत
कविता-
माइक ओद्रमे जे भाषा सिखलक
परदेश जा सभ विसरलक।
गाम आबि काहे-कुहे बजैए
समाज कहैत आब बड्ड बुझैए।
पढ़ल लिखल आर विगारलक
बाल बच्चाकेँ कनभेन्ट धरेलक।
चालि-ढालि अंग्रेजिया पकड़ि
मातृभाषाकेँ खिल्ली उड़ौलक।
अप्पन भाषा बिसरि
बहरबैया भाषा अपनौलक।
अहाँ मैथिलीकेँ केना आगू केलौं
अपने तँ गेबे केलौं बच्चोकेँ भसिएलौं।
जेतबो इज्जत गौआँ दइए
परदेशी ओकरा थकुचैए।
गौआँ-घरूआ मैथिली जियाबए
परदेशिया बाहर भगाबए।
कनिये अंग्रेजिया जोर लगबिऔ
मैथिलीकेँ आगाँ देखबिऔ।
जनक आ सीताक भाषा अपनाउ
कर्म छोड़ू नै अपनाकेँ बनाउ।
विद्यापति आ यात्री कहि गेला
मण्डन आ अयाची कर्म वीर भेला।
अप्पन भाषा सभ जन मिठ्ठा
एकरा नै बुझू हँसी ठठ्ठा।
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