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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

विदेह नूतन अंक स्व.कालीकान्त झा "बुच"

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(c)२००८-०९.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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स्व.कालीकान्त झा "बुच"

कालीकांत झा "बुच" 1934-2009

हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 0 मे भेलनि  पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक

प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चा बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल  मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि  डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |



!! माॅथ पर धान !!

की लचकल अछरल पछरल डाॅड़,
की मचकल आॅचर गछरल फाॅड़,
चालि उत्तान छै,
माॅथ पर धान छै ।।

बढ़ै छै रूनरून रूनरून शीस,
पड़ै छै दीठि पायलक दीस,
कंठ मे गान छै ।
माॅथ पर धान छै ।।

की चमकल बुट्टी - बुट्टी देह,
ठोर पर हासक पातर रेह,
गाल तर पान छै ।
माॅथ पर धान छै ।।

आॅखि पर लागल लाजक बोझ,
घोघ सॅ ताकय सोझे सोझ,
लक्ष्य खरिहान छै ।
माॅथ पर धान छै ।।

भक्त रहलै मंदिर केॅ झोलि,
गेलै दू - दू शिव आसन डोलि,
अभय वरदान छै,
माॅथ पर धान छै ।

वियोगक वीतल कारी रैन,
जुड़ायल आइ मुड़ायल नैन,
गगन मे चान छै,
माॅथ पर धान छै ।।

काटि कऽ माल भोग केर खेत,
बान्हि कऽ बोझ चललि समवेत,
गमागम प्राण छै ।
माॅथ पर धान छै ।।

वदन पर अनुचित अलुपित दृष्टि,
चरण पर करू सिनेहक दृष्टि
एतय भगवान छै ।
माॅथ पर धान छै ।।

हे चरऽरक चंडी धऽरक देवि,
देश बढ़ि रहल अहाॅ केॅ सेवि,
मोॅछ पर शान छै ।
माॅथ पर धान छै ।।




!! बुढ़ारी मे घीढ़ारी !!

बुढ़ारी मे ई घी की -
एकरा कहियौ डालडा ढ़ारी ।।
वरद जुआ कऽ हाॅफि रहल छथि -
चमेर लेट्ट गाड़ी ।।

बुनलनि गहुमक लेट भेराइटी,
दऽ सकलाह खाद नहि डाइटी,
दाना बेगाना भेलनि,
थे्रसर पर चैकल नारी ।।

मझिनी मे जलपान करै छथि,
भरलो थार जियान करै छथि,
उठि गेला चटनी चटैत,
पड़ले तरूआ तरकारी ।।

हे देखू अकरहर करै छथि,
पेंचर ट्यूब मे हवा भरै छथि,
जोलही धोती केर आसन पर,
पसरल सीफेन साड़ी ।।

बऽर सऽख सॅ दाॅत लगौलनि,
खसि पड़लनि जहिना मुॅह बौलनि,
कनियाॅ ओडÛठ़लि दरवज्जा पर,
अपने बैसल बारी ।।

टीशन पर रोमांस करै छथि,
हीरो सबहक कान कटै छथि,
कारी केश खिजाबी ताहि पर -
उगलनि उज्जर दाढ़ी ।।
!! सारिक पत्र पाहुनक नाम !!

फोटो अहॅक टडÛबौने छी मन मे,
हऽम छोट सारि अहॅक औ पाहुन,
हमरे शपथ अहाॅ अबियौ फागुन मे ।।

जहिया सॅ गेलहुॅ हमर नीन लेलहुॅ,
ओझा अहाॅ पर सुनू मरि गेलहुॅ,
हमरा तऽ कंठी अछि अपने मॅछखौका औ,
झोरे चटयलहुॅ कियक नेनपन मे ।
फोटो .............................................. ।।

साॅझे दैया लग परिते निनयलहुॅ,
सपने मे झटकल अहाॅ चलि अयलहुॅ,
ओझा बुझि धयलहुॅ जहिना हम बहिना केॅ,
ओ हॅसलि हम दुःगंजन मे ।
फोटो .............................................. ।।

चाही ने हमरा सिनुरो आ चूड़ी,
इच्छा अछि एक्के बहुत मजबूरी,
एखन अहाॅ नेह क्षीर दारू बहिना केॅ,
हमर मिलन होयत अगिले जनम मे
फोटो .............................................. ।।
!! राम बिना अवधपुरी !!

विलपि रहल वन उपवन भवन निःपरान गय,
राम बिना अवधपुरी लागय मसान गय ।

पतनी चुड़ैल भेलि पति परेत सन सूझै,
बेटा वैताल माय जोगिनी वनलि बूझै
कोयलि कुलवधू आइ डाकिनी समान गय,
राम बिना .......................................... ।।

शैल युता काली आ शंकर भैरव बनला,
तांडव नत्र्तकक लेल, सोझे सरयू फनला,
डमडम डमरू त्रिशूल चमकय असमान गय ।
राम बिना .......................................... ।।

धऽर धऽर मे विलाप द्वारि - द्वारि हहाकार,
बूढ़क की बात हाय नेनो तजलक अहार,
अप्पन ने ककरो क्यो सभक सऽभ आन गय ।
राम बिना .......................................... ।।

शीतल अछि आगि पानि अदहन भऽ उधिएलै,
काॅट भेल कोमल आ फूले गड़ि - गड़ि गेलै,
झडकावै चानिनियाॅ जड़ि रहलै चान गय ।
राम बिना .......................................... ।।