प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
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राज किशोर मिश्र

सोनित

को नो मनुक्खक शि रा , धमनी केँ
फो ड़ि कऽ बहा ओल गेल रक्त,
मा टि पर ला गल ला ल दा ग,
नृशंसता लेल जे अछि अनुरक्त।

ई तँ देहक संजी वनी ,
एहि तरलक रचना कएल देवता ,
प्रा णक पुण्य -जल प्रवा हमा न,
सर्जत ने मनुज, एता वता ।

एहि सँ रङल भूमि अशो भि त,
भो अङ्गर रा क्षसक क्रूरता ,
क्रो धा ग्नि सँ नि कसल स्फुलि ङ्ग,
से देखि कुपि त छथि देवता ।

मत्त इरखा क मुह सँ बहरा इत,
बि करा ड़ अग्नि केर ज्वा ला ,
मनुजता क ई बहल सो नि त,
सज्जि त असुर-शस्त्र सँ डा ला ।

भा ङ्गल बन्धुत्वक ला ल खण्ड,
ई दा ग मनुजता पर प्रचण्ड।

सभ्यता क कतरल मा उस -पिं ड,
अंति म अन्या य केहेन भि सि ण्ड।

को नो भा एक खून, को नो मा एक खून,
जे सि न्दूर सन ,कएल मा ङ को नो सून।

क्षि ति ज सँ मेटा ओल ला लि मा ,
ई ,छि टल पि शा चि नी -का लि मा ।

लो भक तरुआरि सँ बहल लि धुर,
टूटल सम्बन्ध को नो चूर -चूर।

महा पा प-सि मा नक ला ल परि धि ,
सृष्टि पर क्रूरता , देखलनि वि धि ।

मा या -ममता क ला ल लहा स,
कऽ रहल बर्बरता अट्टहा स।

वि ना शक पा ड़ल भूमि -पुंड,
सृजनक कटल रुंड -मुंड।

मनुख लेल नहि उचि त अछि को नो तरहक हिं सा ,
कथमपि नहि कर्मणा -वा चा , नहि हो अए मनसा ।

बा घ-सिं ह तँ बुझि ने सकैत अछि ,
ने वि वेक, ने ओकरा लो क ला ज,
देवता बा द तँ मनुक्खे हो इत अछि ,
को ना क' ओ कऽ सकैछ ई का ज?

खसय ने सो नि त एक्कहु ठो प,
हिं सा सँ मनुजता हो यत लो प।

स्वर्गक सुख भूगो ल मे ,
ई भऽ सकैत अछि संभव,
हिं सा -मुक्त भऽ जा य अगर,
ई, क्षणभंगुर ,नश्वर भव।
 

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