प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
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विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं-
१. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी

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२. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी

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३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी

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ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:-
१.कपिलेश्वर राउत
२.उमेश मण्डल
३.राम विलास साहु
४.राजदेव मण्डल
५.नन्द विलास राय
६.जगदीश प्रसाद मण्डल
७.दुर्गानन्द मण्डल
८.रामानन्द मण्डल

 

ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राम विलास साहुक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक

राम विलास साहु केर पाँचटा कथा

कथा ४

घुसहा घर

मुखियाजी पंचायतक गामे-गाम आम सभाक बैसार लेल ढोल्हो दियौलैन‍। गामक लोक सभ एकजुट भऽ आम सभामे पहुँचला। सभाकेँ सम्‍बोधित करैत मुखियाजी बजला-

"ऐ बैसारमे सभ कियो मिल ‍निर्णए लिअए जे पंचायतक गरीब आ मसोमात, जिनकर घर टुटल-फाटल होइ वा रहबा योग नै होइ, ओइ बेकती‍क सूची बनाएल जाउ। हुनका सभकेँ सरकार तरफसँ घर बनबैले इन्‍दि‍रा-आवास योजनासँ रूपैया भेटतैन‍।"

वार्ड सदस्‍यक सहयोगसँ मुखियाजी लग इन्‍दि‍रा आवासबला सूची पहुँचल। बिहानेसँ मुखियाजीक दलाल सभ सूचीमे नामांकित बेकती‍सँ भेँट कऽ एक-एकटा फार्म दऽ कहि देलक जे फार्म भरि कऽ मुखियाजी लग जमा करै जाउ आ बैंकमे खाता सेहो खोलबा लइ जाउ। संगे संग पाँच हजार रूपैआ सेहो दिअए पड़त। तखन इन्‍दि‍रा आवास भेटत।बहुत गोटे तँ अपन गाए-महींस-बकरी-छकरी-गहना-जेबर जेकरा जे गर लगलै बेचि कऽ रूपैआ दऽ रूपैआ उठेलक। किछु आदमी एहनो छल जेकरा सकर्ता नै भेलै ओ वंचित रहि गेल। बदलामे पाइबला लोक अपना नामे उठा लेलक।

    किछु दिनक बाद रघि‍या मसौमात इन्‍दि‍रा-आवास ले फार्म भरि मुखिया जी लग पहुँचली। मुखियाजी फार्म पढ़ि बजला-

"पहिले इन्‍दि‍रा आवासमे पचीस हजार भेटै छलै आब चालिस हजार भेटै छै मुदा आगूसँ साइठ हजार भेटतै। जइमे पच्‍चीसमे पाँच हजार आ अखन चालिसमे दस हजार खर्चा लगै छै मुदा आगू साइठमे पनरह हजार लगतै।"

रधिया सुनिते कानि-कलैप कऽ अपन मजबूरी सुनौलकैन‍। मुखियाजी मुड़ी डोलबैत बजला-

"यइ काकी, हमरे केने नै ने होइ छै, डेगे-डेग हाकिम-हुकुम बैसल छइ। ओहो तँ कटिया सोन्‍हा कऽ रखने रहै छै तेकरा की हेतइ। आ हमरो कोनो दरमाहा भेटै छै हमहूँ तँ ओहीमे निमहै छिऐ। तँ ई हेतौ जे हम अपनबला नै लेबो।"

‍रधिया सभ बात सुनि परिस्थिति बुझि‍ आपस आबि गेली।

    बुधनी बुढ़िया गाममे सभसँ उमेरगर। जुआनियेमे घरबला बाढ़िमे डुमि कऽ मरि गेलखिन। दूटा बेटाक संग बुधनी कहियो हिम्‍मत नै हारली। संघर्ष करैत आत्‍म-‍निर्भरतापर धियो-पुतोकेँ सक्कत बनौने छैथ‍। हलाँकि आर्थिक रूपे कमजोरे छैथ‍।

एक दिन मुखियाजीक नजैर‍ बुधनी बुढ़ियापर पड़लैन‍ आ देखते पुछलखिन-

"गामक बहुतो लोक सभ लाभ लेलक मुदा तूँ कोनो फारमो नै भरलीही? तोरा तँ दूटा लाभ भेटतौं। एकटा वृद्धा-पेंसन आ दोसर इन्‍दि‍रा आवासक।"

बधनी बजली-

"ऐमे कोनो खर्चो-वर्चो लगैए?"

मुखियाजी-

"हँ, वृद्धा-पेंसनमे पाँच साए आ इन्‍दि‍रा-आवासमे पनरह हजार।"

बुधनी-

"हम ई लाभ नै लेब।"

मुखियाजी-

"किए नै लेब?"

बुधनी-

"घूस दऽ कऽ घर बनाएब तँ ओइ घूसहा घरमे रहैबला केहेन हेतै?"

मुखियाजी आ बुधनी बुढ़ियाक गप अपना घरक कोनचर लगसँ रधिया मसोमात सुनैत छेली अपना मनकेँ बुझबैत बजली-

"इन्‍दि‍रा आवास किए घूसहा घर कहियो ने।"

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