प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
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विदेहक लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज मे अखन धरि अहाँ पढ़लौं-
१. कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी

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२. जगदानन्द झा "मनु"क "माटिक बासन"पर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी

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३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी

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ऐ शृंखलामे आगाँ समानान्तर धाराक किछु गणमान्य कथाकरसँ हुनका नजरिमे हुनकर अपन सर्वश्रेष्ठ ५-५ टा कथा आमंत्रित कएल गेल अछि। कथाकार लोकनि छथि:-
१.कपिलेश्वर राउत
२.उमेश मण्डल
३.राम विलास साहु
४.राजदेव मण्डल
५.नन्द विलास राय
६.जगदीश प्रसाद मण्डल
७.दुर्गानन्द मण्डल
८.रामानन्द मण्डल

 

ऐ अंकमे प्रस्तुत अछि राम विलास साहुक ५ टा कथा, जइपर हमर समीक्षा अंग्रेजीमे सम्पादकीय पृष्ठ पर अछि।- सम्पादक

राम विलास साहु केर पाँचटा कथा

कथा ५

शिक्षाक महत

जीबछ घरजमैया छल। हुनकर पत्नी रधिया, माए-बापक एकलौती बेटी बड़ दुलारि छल। रधियाक पिताकेँ चारि बीघा चास-बास, कलम-बाँस आ गाए-बड़द छल। खेती-बाड़ीसँ जिनगी चलै छेलैन‍। सोझमतिया रहने कोनो छल-कपट नै रहैन। पितमरू छला। परिवारमे अक्षरक बोध केकरो नै रहैन‍ खाली जीबछ ट-ब कए कऽ साक्षर छल। रधियाक पिता जरूरत‍ पड़लापर जखन‍ समाजमे कोनो लेन-देन करै छला तँ औंठेक निशान दइ छला।

एक साल एहेन समए भेलै जे इलाकाक इलाका बाढ़ि-पानिसँ दहि गेलइ। ने नेवान करैले अन्न आ ने दाँत खोदहैले नार-पुआर भेलइ। दोसर साल रौदी भऽ गेलइ। एक तँ बाढ़िक मारल, दोसर रौदीक जरल। गरीब-गुरबाकेँ गुजर कटनाइ पहाड़ भऽ गेलइ। केतेको परिवार तँ आन-आन गाम अपन-अपन कुटुमैती जा किछु दिन समए कटलक। मुदा ई सुविधा सबहक नशीव नै छेलइ। गामक नमहर जमीनदार, मालिक-गुमस्‍ता जे छला हुनका तँ पहिलुके सालक पुरना अन्न बखारीक-बखारी भरल छेलैन। हुनका सभकेँ कोनो चिन्ता नै छेलैन‍। रधियाक माए-बाप बुढ़ रहने आन गाम जा केना काज करत। ओ दुनू गामेमे मालिकसँ कहियो मरूआ तँ कहियो धान तँ कहियो छाँटी चाउर कर्जा लऽ समए काटै छल। कर्जा देनिहार मालिक सभ विपतिक समयमे गरीबक शोषण सेहो करैत। एक मन अन्नक बदला दू मन आ दोसर साल चुकेलापर तीन मनक करारीपर कर्जा लगबैत। तेकर बादो औंठाक निशान एकटाकेँ के कहए जे तीन-तीनटा छाप कागतपर लइ छेलखिन। गरीब अपन परान बँचाएत आकि छापक परबाह करत। कर्जा खेनिहार थोड़े बुझै छल कि छाप देबै कागतपर आ हमर जमीन जत्‍था चलि जेतै तक्खापर।

एक दू साल समए बितलै। जीबछ अपन सोसराइरेमे सासु-ससुरक सेवा आ खेती-बाड़ी कऽ गुजर-बसर करै छल। किछु समए पछाइत‍ सासु-ससुर मरि गेलखिन। श्राद्ध-कर्मसँ निवृत भेले छल आकि गामक मालिक-गुमस्‍ता लोकैन‍ अपन-अपन कागत लऽ जीबछ ऐठाम पहुँचए लगला। कर्जा तँ करारीपर देने रहैन‍‍। ओ समय‍ बीति गेल छल। कर्जा खेनिहार पहिले कागतपर छाप देने रहैन‍‍। ओइ कागतपर मालिक-जमीनदार लोकैन‍ जमीनक खाता-खेसरा रकबा लिखि कऽ अपन नाओं कऽ लेलैन‍। गरीब सबहक जमीन मालिक-गुमस्‍ता हरैप‍ लेलकैन‍। जइमे रधियाक जमीन सेहो चलि गेल। आब जीबछ-रधियाकेँ दूटा बेटी, एकटा बेटा आ परिवारक भरन-पोषण करनाइ कठिन भऽ गेल। जीबछ कमाइ खातीर बाहर चलि गेल। बाहरमे पढ़ल-लिखल आदमीकेँ नोकरी जल्‍दीए होइ छेलै आ बेसी दरमाहा सेहो भेटै छेलइ। जीबछ बेसी पढ़ल तँ नै मुदा साक्षर छल। जइसँ शि‍क्षाक महत जिनगीमे केतेक होइ छै से मोने-मन महशूस करै छल।

जीबछ ट-ब-ट काए कहुना कऽ चिट्ठी लिखि घर पठेलक। ओइमे बेटा-बेटीकेँ पढ़बैले रधियाकेँ प्रेरित करैत कहै छल जे पढ़ाइमे जेते खरच लगत, हम कमाए कऽ पठाएब मुदा अहाँ धिया-पुताकेँ पढ़बैमे कोनो कोताही नै करब। रधियो मोने-मन सोचै छेली जे नीक लोक बनबाक लेल शि‍क्षाक बड़ महत छइ। जे हम आ हमर माए-बाप जँए नै पढ़ल छेलौं तँए ने सभटा जमीन मालिक-गुमस्‍ता हरैप‍ लेलैन‍। जखन‍ पढ़ल रहितौं तँ ई मुसिबत नै अबिताए। हम सभ जे केलौं से केलौं मुदा धिया-पुताकेँ जरूर पढ़ाएब। अइले हमरा जे परिश्रम आ तियाग करए पड़त ओ करब। ओ सभ दिन अपन धिया-पुताकेँ समैपर संगे जा स्कूल पहुँचाबए लगली।

रधियाक टोलेमे बुच्‍ची बाबू छला। बुच्‍ची बाबू अंचलमे बड़ाबाबू छैथ‍। छुट्टीमे घर आएल छैथ‍। हुनका काल्हि‍ भोरे ट्रेन पकैड़‍ ड्यूटीपर जेबाक छेलैन‍ से रधियाकेँ कहलखिन-

"रधिया, किछु समान अधिक अछि। गाममे कएक गोटेकेँ कहलिऐ जे काल्हि‍ भोरके ट्रेन पकड़ब से कनी समान स्टेशनपर पहुँचा दिअ, मुदा कियो तैयार नै भेल। तूँ कनी पहुँचा दइ। हम तोहर बड़ उपकार मानबो।"

रधिया बाजल-

"ठीक छै, कअए बजै चलब। कहि दिअ हम समान पहुँचा देब।"

बुच्‍ची बाबू बजला-

"सात बजे भोरेमे चलब। किएक तँ आठ बजेमे ट्रेन छइ। तीन-चारि किलो मिटर स्टेशन दूरो छइ।"

रधिया भोरे उठि सभ काज कऽ जलखै बना धिया-पुताकेँ खाइले दऽ बजली-

"तूँ सभ जल्‍दीसँ खो, आइ कनी पहिनहिये तोरा सभकेँ स्कूल पहुँचा दइ छियौ, तखन‍ बुच्‍ची बाबूक समान पहुँचबैले टीशन जाएब।"

    एम्‍हर बुच्‍ची बाबू तैयार भऽ रधियाक बाट तकै छला। पाँच मिनट पछाइत‍ रधिया पहुँचली। बुच्‍ची बाबू तमसाइत बजला-

"रधिया, तोरा कहने छेलियौ साते बजै चलैले, देरी भऽ गेल। ट्रेन छुटि जाएत। तोरा कोनो चिन्ता नहि।"

रधिया बजली-

"अपने तमसाउ नहि। धीरे-धीरे बढ़ू हम समान लेने लफरल पिट्ठेपर आबि रहल छी। कनी धिया-पुताकेँ स्कूल पहुँचबैमे देरी लागि गेल।"

बुच्‍ची बाबू-

"पहिले समान पहुँचा दइतैं, हमरा ट्रेन छुटि जाइत। एक दिन तोहर बेटा-बेटी स्कूल नै जेतौ तँ की हेतइ। एक्के दिन कोनो पढ़ि कऽ कलक्टर बनि जेतौ?"

रधिया मोने-मन सोचए लगली, कहै छिऐन आगू बढ़ैले से उठिये ने होइ छैन‍। हम तँ लफरल हिनकासँ पहिनहि पहुँच जाएब। ट्रेन थोड़े छुटतैन‍। अपने बेगरते आन्‍हर छैथ‍। अनेरे गछलौं।


 

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