logo logo  

वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य  

India Flag Nepal Flag

 

 

(c)२००४-१२.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Read in your own script Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

१.अंजनी कुमार वर्मा २.बलराम साह ३.उमेश पासवान ४. रामविलास साहु ५. संजीव कुमार ‘शमा’ ६. सुधीर कुमार ‘सुमन’ ७.उपेन्‍द्र नारायण ‘अनुपम’८. नारायण झा

 

अंजनी कुमार वर्मा

आत्मबल
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
संघर्ष मय जिनगी सं फराक रहब निक अछि
अहि बिगड़ल समाज सं सुनसान जंगले निक अछि
मुदा कतैक दिन धैर ?
उचितक बात पर नहि क सकैछ धनुषाकार
आत्मबल कें राखि देखू आत्म्बलक इतिहास
धनुषाकारक बाद भ जाईछ जनजागरण
क्रांतिक विकराल रूप क लैछ धारण
जगविदित अछि क्रांति केर की की होईछ परिणाम
रौद्र रूप धारण कय जखन लैछ तीर- कमान
नहि अप्पन प्राण केर भय होइछ
नहि दोसराक प्राणक मोह
तखैन देह में आबी जैत अछि
अभिमन्यु केर खून
सोइच लिय हे पथभ्रष्ट जयद्रथ
होयत कोन उपाय
कतेक दिन धैर सहन करत
दुखिया केर समुदाय
लौह-भुजा आब फड़कि रहल अछि
प्राण -प्राण लेल तड़पि रहल अछि
क्रांतिक ज्वाला भड़कि रहल अछि
आब सोचु अप्पन उपाय
नहि मानत पीड़ित समुदाय
क्रन्तिये ठीक अंत उपाय..........

  

ओजक भोज
,,,,,,,,,,,,,,,
इ आत्मीयता थिक मृगमरीचिका
जाहि पाछु आम लोक सदृश
स्थिति कें खुआ रहल छी ओजक भोज
झाँपल हाड़ भ गेल बहार
वसन तर सं द रहल अछि देखार
इ कर्तव्यक द्वार ,केयो नै पाबैछ पार
गलब अछि सहज मुदा
स्वर्ण बनब कठिन
इ सम्बन्ध अछि अनंत
इ आत्मीयता अभिन्न.....

 

 

 

समस्या
,,,,,,,,,,
आबक लोक की करत बसंतक अनुभव
की सुनत कोइलीक गीत
की घुमत पुष्प वाटिका में ,
कपार पर राखल करिया पाग कए
उघैत - उघैत बनल रहैछ बताह
नहि पाबि सकैछ थाह
नहि सुति सकैछ सुख सं
नहि बाजि सकैछ दुःख सं
गोंताह पानि में डूबल रहैछ कंठ धरि
छटपटाइत रहैछ, बऊआयत रहैछ मन
सपनहूँ में देखैछ सदिखन दुःख धंधा
घेंट में लागल फंदा ,
नहि रौदक चिंता अछि,नहि पानिक
मात्र चिंता अछि सबकें अप्पन पेटक
फंदा लागल घेंटक ....

 

वासंती गीत
'''''''''''''''''''''''''''''''''
कोइली कुहू -कुहू कुहुके हो रामा वन उपवन में
नव किसलय सँ गाछ लागल अछि
मंजरि गम -गम गमकि रहल अछि
रंग बिरंगक फुल गाछ में
प्रकृति कयल श्रृंगार हो रामा वन उपवन में ........
टिकुला सँ अछि झुकि गेल मंजरि
नेना सब हर्षित अछि घर -घर
गाछ -गाछ पर विरहिणी कोइली
कुहू -कुहू पिया कय बजाबै हो रामा वन उपवन में ....
श्वेतवसन कचनार पहिरी कय
भ्रमर आंखि केर काजर बनि कय
कामदेव क लजा रहल अछि
बढ़वय रूप हज़ार हो रामा वन उपवन में .....
महुआ गम -गम गमकि रहल अछि
नेना चहुँदिसि दौरि रहल अछि
डाली -झोरी मं अछि महुआ
गाबय चैत बहार हो रामा वन उपवन में ......

 

 

दुई गोट भूख
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
खसि गेलैक-ए आँखिक पानि
आब लोक चौबटिया पर बेच दैछ
अप्पन अस्तित्व ,
खोलि दैछ नीबी-बंध
कियैक तs पेटक होम कुंड मs
देबय परैछ आहुति ...
बढ्ले जा रहल अछि दिनानुदिन
अनंत दिशा में वासना केर भूख
वासनाक भूखल किनी लेछ
रोटीक लेल छटपटाइत लोकक अस्तित्व
लोक में आब कोन वृत्ति आबि गेल अछि
दानवी , पाशविक आ की कोनो तेसर ......
एकर वर्गीकरण करब अछि असंभव
दुवs भुखक सम्बन्ध भs गेल अछि
अन्योन्याश्रय .....

 

बलराम साह

जन्‍म- 21/11/1973

पि‍ताक नाओं श्री जीबछ साह, गाम- नौआबाखर, पत्रालय- हटनी, भाया- घोघरडीहा, जि‍ला- मधुबनी (बि‍हार)

संप्रति‍- अधि‍वक्‍ता, जि‍ला न्‍यायलय, मधुबनी

सांसद प्रति‍नि‍धि‍, झंझारपुर।

 

कवि‍ता-

 

आकि‍ नीन टूटि‍ गेल-

 

काजक थाकल

वि‍चारक मारल

आ चि‍न्‍ताक टूटल

ओछाइनपर रही पड़ल

आँखि‍ लागि‍ गेल

देखलौं एकटा सपना

आकि‍ नीन टूटि‍ गेल।

 

सपना छल वि‍चि‍त्र

देखलौं जे गामक रधि‍या

जे अछि‍ दैवक मारल मसोमात

ओकरा भेटलै इन्‍दि‍रा आवास

ओहो बि‍ना घूसकेँ

आकि‍ तखने हमर नीन टूटि‍ गेल।

 

गाममे भेलै मारि‍

चलल लाठी आ फरसा

भेलै लठम-लठ

जाति‍-जाति‍क एकता

बैसल एकटा पंचैती

और हाकि‍म-दरोगा मि‍लि‍

सबटा झगड़ा मेटा देल

आकि‍ हमर नीन टूटि‍ गेल।

 

जखन नीनमे नि‍नवासले रही

पढ़ल-लि‍खल बेटा

करैत छथि‍ बापक सेवा

पढ़ल पुतोहू करैत रहथि‍

सासुक उत्‍कृष्‍ट सेवा

भाय-भायमे छल मि‍लानी

जाबत देखतौ आगू की भेल

ताबत हमर नीन टूटि‍ गेल।

 

गामक बेटी पढ़लक-लि‍खलक

गरीबीसँ लादि‍ लेलक बी.ए.क डि‍ग्री

बगलक गामक मास्‍टर साहेबक

बेटा सेहो बनल हाकि‍म

आ बि‍ना दहेजक दुनूक

वि‍याह भऽ गेल

आकि‍ ताबत हमर नीन टूटि‍ गेल।

 

यौ समाज की होएत

हमर सपना साँच कहि‍यो

कि‍एक तँ हमर नीन टूटि‍ गेल।

 

उमेश पासवान

गेलहे घर छी

 

जौं अखार महि‍नामे

बुढ़ बरद, पजरामे दरद

पंजाबमे मरद अछि‍ तँ समझू

हे गेलहे घर छी।

घर लग बलान

चोर संग मि‍लान

घनक गान अछि‍ तँ समझू

हे गेलहे घर छी।

दूध लग बि‍लाइ

बच्‍चा लग सलाइ

अप्‍पन काज करैमे ढि‍लाइ तँ समझू

हे गेलहे घर छी।

डराइबर अनारी

एड्स बेमारी

दोकानमे खाइ छी उधारी तँ समझू

हे गेहले घर छी।

मैट्रीकमे फेल

जवानीमे जेल

बुढ़ाढीमे केलौं मेल तँ समझू

हे गेलहे घर छी।

चाहक चुस्‍की

लड़कीक मुस्‍की

दारू आ वि‍स्‍कीक फेरीमे परलूँ तँ समझू

हे गेलहे घर छी।

बन्‍दूकक नाल

माछक चाल

सैरक गाल देखि‍ कऽ कुदब तँ समझू

हे गेलहे घर छी।

भैयारीमे झगरा

घरवाली अछि‍ तगरा

ससूर अछि‍ लबरा तँ समझू

हे गेलहे घर छी।

बाप कंजूस

कोठीमे लागल मुस

नोकरीमे देलौं घूस तँ समझू

हे गेलहे घर छी।

कपड़ापर पड़ल मोबि‍ल

कपारमे फरल ढील

टॉगमे गरल कि‍ल तँ समझू

हे गेलहे घर छी।

रामविलास साहु

धरतीक सुख

 

ऋृतुराज वसंत

धरतीपर पहुँचल

सोलह श्रृंगार करैत

दुलहि‍न सन सजल धरती

पगलाएल भौंरा नाचि‍-नाचि‍

करए मधुपान अवि‍राम

चि‍ड़ै चहकए कोइली कुहकए

करए आगमन मदन रति‍

सुआगतमे वसंत अभि‍नंदन करए

आएल अति‍थि‍क मधुपान करबए

स्‍वर्गसँ उतरि‍ धरतीपर

परी सभ मि‍लि‍ सुआगत गीत गबए

देखि‍ देवगण गुणगान करए

सबहक दि‍ल ललचाइ छलैक

बेर-बेर धरतीपर मेहमान बनैत

एहन सुन्‍दर नै छै देवलोक

धरतीक सुख स्‍वर्गसँ सुन्‍दर

जे सुख मनुककेँ मि‍लै छै धरतीपर

देवाेकेँ नै नसीब होइत स्‍वर्गमे

धन्‍य अछि‍ ओ पावन धरती

बेर-बेर वसंतक बहार मि‍लए

फूल-मंजर झुकि‍-झुकि‍

सभकेँ अभि‍नंदन करए।

 

साओनक राित

 

झर-झर बरसै बदरि‍या हो रामा

एबकी सवनमा

बि‍जुरी चमकै मेघ गरजै

थर-थर कापए वदनमा हो रामा

झर-झर बरसै बदरि‍या हो रामा

एबकी सवनमा।

पि‍या ि‍नरमोहि‍या बड़ नि‍रदैया

जानए ने कोनो मरमुआ हो रामा

झर-झर बरसै बदरि‍या हो रामा

एबकी सवनमा।

सओनक अन्‍हरि‍या चमकै बि‍जुरि‍या

पानि‍क बुन्नसँ भि‍जै वदनमा

भीजल तन राति‍ काटब कोना

झर-झर बरसै वदरि‍या हो रामा

एबकी सवनमा।

भीजल बदनमा चढ़ल यौवनमा

सि‍हकए पवनमा तरपाबए सजनमा

झर-झर बरसै बदरि‍या हो रामा

एबकी सवनमा।

चढ़ल यौवन दरि‍या सन उमरल

 

पि‍या बि‍नु तरसै नयनमा हो रामा

 

झर-झर बरसै वदरि‍या हो रामा

 

एबकी सवनमा।

 

 

संजीव कुमार ‘शमा’

क्रांति‍ दीप

 

आउ क्रांति‍वीर बनि‍ मि‍थि‍लाकेँ बचेबाक लेल

जड़ाउ क्रांति‍ दीप जतए भूमि‍ अछि‍ रहबाक लेल।

ि‍ल-ति‍ल समैकेँ पकड़ि‍ जे हाथसँ नै ससरए

एकताक ठोसगर मापदंड अपन एतए नै फूटए

 मैथि‍लीक प्रचार, जन-जनकेँ जगेबाक लेल..्

 बड्ड भेल! आब कते काल धरि‍ बेइज्‍जत होइत रहब,

 माँ मि‍थि‍लाकेँ आजाद कराएब से संकल्‍प दोहराबैत रहब,

 चलू चलल फि‍रङ्गी चालि‍केँ, मि‍टेबाक लेल...

 बजा देने छथि‍ बैजूबाबू वि‍जयक बि‍गुल, भीषण हंुकार जकाँ,

 मचि‍ गेल अछि‍ शोर चहुँदि‍श, स्‍वतंत्रताक पुकार जकाँ

 आगूमे जे ठाढ़ अछि‍ पहाड़, चलू खसेबाक लेल

 डरपोक बनि‍ कतेक काल धरि‍ डरल रहब

 आब कहि‍आ भट्ठीक आगि‍ जकाँ धधकब

 धधकल छथि‍ शमा मि‍थि‍लांचलक दीप जड़ेबाक लेल।

 

सुधीर कुमार ‘सुमन’

पि‍ता- श्री सत्‍यदेव ‘सुमन’

गाम- लकसेना

पोस्‍ट– महि‍न्‍दवार

भाया- तुलापतगंज

जि‍ला- मधुबनी

(बि‍हार)

 

 

कवि‍ता-

समए

 

समैकेँ सदि‍खन धि‍यानमे राखि‍

जि‍नगीकेँ धरतीसँ जोड़ि‍

लुच्‍चा–लौफरक बातमे ने आबी

अपन बीतल बात पसारैत

समाजक मर्यादाक मान बचाबी

अपन चि‍न्‍ताकेँ चि‍न्‍ता ने मानि‍

मैथि‍ल-संस्‍कृति‍क मान बचाबी

साँझ पड़ैत ठंढ़ अबैत

लोक ि‍नहाड़ए अपन बाटकेँ

वि‍द्वान, वि‍दुषी मैथि‍ली भाषी

अपन चमतकार ि‍नखाड़ए

देखाबए ठंढ़ा पानि‍

आजुक दि‍न सपना भरल छै

हँसी-हँसीमे समए बीतल छै

समए पकड़ि‍ आगू बढ़ू

भैया सभ अपन सपनाकेँ

साकार करै छै।

 

उपेन्‍द्र नारायण ‘अनुपम’

गाम- भुतहा, भाया- नरहि‍या

थाना- लौकही, जि‍ला- मधुबनी

 

संप्रति‍- व्‍याख्‍याता (मनोवि‍ज्ञान वि‍भाग), अशर्फी दास साहु समाज इण्‍टर महि‍ला महावि‍द्यालय- ि‍नर्मली, सुपौल 

 

कवि‍ता-

दुख हम्‍मर

 

कतेक आब दुख सहब

ककरा ई बात कहब

घर-घरमे अछि‍ झगड़ा

सभकेँ सभसँ अछि‍ रगड़ा।

 

झगड़ा तँ हटत नै

रगड़ा तँ मिटत नै

मि‍टत नै आश

बेचरा होएत नि‍राश

आशक आब डोर टूटल

नि‍राशासँ ठोर सुखल

छूटल अपन साम-दाम

बाबू गि‍ड़ल धराक-धड़ाम

पहि‍ले बड़का गाछ गि‍ड़ैत अछि‍

तब कहीं छोटका पात उड़ैत अछि‍

उड़ि‍ जाइत अछि‍ सभ तृण

एक दि‍न दुनि‍याँसँ होएब भि‍न्न।

 

सुखक जननी दुखे होइत अछि‍

दुखक बादे सुख अबैत अछि‍

दुख जाएत, सुख आएत जरूर-जरूर

एक दि‍न कहब।

 

दुखसँ नै घबराबउ

दुखसँ खूब टकराउ

दुखसँ पाबू पार

गुड़ गंजन बादे मि‍श्री जेना तैयार

ओहने सवव, और की कहब।

 

अनुपम-सुशीला ई बेथा सुना कऽ

जन-जन तक अपन वणी पहुँचा कऽ

उहो लेत एक दि‍न दम

ई बात नै अछि‍ कम।

 

 

घी कनी

 

ई कनी घी

ओही लेल केलौं ने की-की

साँझ-भीनसर-भोर

बड्ड लगेलौं जोर

मटकुरी, रेही लाबि‍ कऽ

पीढ़ीपर बैस कऽ

मथए लगलौं जोर।

 

पसेना आएल, मथा गेल छालही

जमा भऽ गेल मक्‍खन-मट्ठा-घोड़

आनि‍ कराही आॅच दि‍अए लगलौं

खशीसँ नेना भेल वि‍भोर।

 

ऑच बढ़ल कराही कड़कल

मक्‍खन होअए लगलै थोड़

घी बना बेचि‍ कऽ लाएब

चूड़ी-साया-साड़ी

घी बनल कराही उतड़ल

वि‍चार आएल छल बेजोड़।

 

कराही उतड़ल, मन छल छनगर

कराही चटकल घी बहल

रहि‍ गेल दारही थोड़।

 

फुसुर-फुसुर भेल

आबए लगल लोक

धूर केहेन छथि‍न अभागलनी

कोनो घी बनबैपर मन छलनि‍ थोड़े

मन छलनि‍ गाछपर

तन हुनक खाटपर

घीक कोनो नै कसूर

भेल घी हरा गेल

छाती पीटैत रहि‍ गेलि‍

दुलहि‍नि‍या भोरे-भोर।

 

अनुपम-सुशीला घी खातीर

नयनसँ बहबए लगलै नोर

ई दीन-कथा घी गरीबक

पसरि‍ गेल चाहुँ ओर।

 

परदेसि‍या प्रि‍यतम

 

तँू चनचल छेँ, रौ मन

चि‍त्त लऽ गेल हम्‍मर चोर

सावन केर जब अइहेँ महि‍ना

आँखि‍सँ बहए नोर

तँू छलि‍या परदेशी बालम

टुकुर-टुकुर तकैत भेल

साँझ-सँ-भोर।

 

भादव केर जब अइहेँ महि‍ना

असगर लागए डर

बि‍नु बालम केर नीक नै लगए

कनैत-कनैत भऽ गेल रति‍-सँ-भोर।

 

बेंग टर्र-टर्र, झि‍ंगुर झुन-झुन

अंगनामे नाचए मोर

बि‍नु साजन केर खि‍लत कोना कलि‍याँ

बीतल जवानी फूलबा ने कोर।

 

अनुपम-सुशीला कहए

केहेन परदेशि‍या गै प्रीति‍

कहि‍यो-ने-कहि‍यो तँ मि‍ल जाएत

अप्‍पन मक्खन चोर।

नारायण झा

जन्‍म- 05/07/1980

गाम-पोस्‍ट, रहुआ संग्राम

प्रखण्‍ड- मधेपुर

जि‍ला- मधुबनी

बि‍हार- 847408

 

शैक्षणि‍क एवं प्रशैक्षणि‍क योग्‍यता-

बी.कॉम (प्रति‍ष्‍ठा)

बी.एड

एम.कॉम (अध्‍ययनरत)

कार्यरत- प्रखंड शि‍क्षकक रूपमे वर्ष 2003 ईं.सँ

रा.म. वि‍द्यालय रहुआ-संग्राम।

रूचि‍- लेखन आ नव गपसँ अवगत भेनाइ।

 

सरकार

 

पर्चा-पर्चा पसरल चर्चा

ऐ सरकारक वि‍कासक चर्चा।

अखबारक सुरखी जाइत अछि‍ समेटल

माटि‍पर देखब तँ कि‍छु नै भेटल।

शि‍लान्‍यास-पर-शि‍लान्‍यास होइत सभ दि‍ने

देखल जाइत अछि‍ अखबारमे हुनका दोगे-कोने।

नाम-यश समटि‍ रि‍कार्ड बनबैत छथि‍

योजनाक राशि‍पर नॉच करैत छथि‍।

नूतन प्रयोगक वि‍ख्‍यात सरकार

सभ दि‍न नव योजनाक हुअए वि‍चार।

ठेका प्रणालीक छथि‍ महानायक

फुसि‍याँ देखबैत वि‍कासक स्‍वप्‍न भयानक।

वि‍जली वि‍गड़ल, पानि‍ पछड़ल

शि‍क्षा अछि‍ समुचे दरकल।

डकैती, महगाइ आओर भष्‍टाचार

दि‍नो-दि‍न बढ़ैत ई दुराचार।

वि‍कासक सपना होइत तखन साकार।

आकाससँ उतड़ि‍, जमीनसँ देखि‍ आकार।

 

पर्चा-पर्चा पसरल चर्चा

 

ऐ सरकारक वि‍कासक चर्चा।

 

 

 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।