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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

विदेह नूतन अंक पद्य

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(c)२००४-१०.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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१.मृदुला प्रधान- कविता २. उमेश मंडलक ३ टा कवि‍ता

 

मृदुला प्रधान

कविता

मिथिलाक माटीमे,

मधु -श्रावानिक,

हास- परिहास एवं मिठास,

घोरैत- घोरैत,

कखन एही भाषा मे 

लिखै लगलों,

बूझिये नईं पड़ल,

बूझिये नईं पड़ल......

घर-गृहस्थिक मथ-भुक्की मे

दही- चुड़ा-बैगनक भार सँ

प्रभावित ,

जमबैत,कुटैत,तौलैत,

कोन बेर 

कागज़-कलम,

माथ पर सवार

भऽ गेल .

समदाउनिक गीत 

सुनि कऽ ,

विद्यापतिक कविता 

पढि कऽ,

खवासक अनुपस्थिति मे 

चुल्हा पजाड़ी कऽ,

अदौड़ी,तिलौडी,दनौड़ी,

पाड़ि कऽ,

कखन कविता पाड़य लगलों,

बूझिए  नईं पड़ल.........

सावन-भादोक

झींसी सँ नुका कऽ,

नेना- भुटका के कोर मे,

बैसा कऽ,

गोनू झाक गप्प सँ

सभकेँ हंसा कऽ,

पितारिया कजरौटा मे काजर,

सेका कऽ ,

कखन कविता सेकय लगलों,

बूझिए नईं पड़ल............

भिनसरहे भानस-भात

पसाइ कऽ,

तीमन-तरकारिक कठौती ,

सजाइ कऽ,

अंगना-ओसारा-चबूतरा,

बहारि कऽ,

गमगम घीउ मे,

सोहारी छानि कऽ,

कखन कविता छानए लगलों,

बूझिए नईं पड़ल..........

मूल बात ई

जे एही भाषाक,

विदुषि त नहिंए छी

किन्तु

घोर-मठ्ठा करैत-करैत,

अनचोक्के,

'ई-विदेह' सँ परिचय,

भऽ गेल,

लोकक उद्गार

चमत्कारिक साबित भेल,

आ देखिते-देखिते,

मिथिलाक पैघ समाजक

कोन मे,

हमरो

प्रविष्टि भऽ गेल

 

 

उमेश मंडलक ३ टा कवि‍ता-

 

बाधा-

 

वि‍दा भेल मंगला पूभर

कान्‍हमे टँगने अछि‍ साइकि‍ल बाउलपर

कहुना कऽ लगि‍चेलक

लटपटाइत पहुँचल

धारक कछेरमे

 

बि‍नु पानि‍क अछि‍ धार

चक-चक करैत अछि‍ बाउल चारूकात

नाउ नहि‍ बाउल देखि‍ भेलै

मंगलाकेँ थोड़े होश एलै

अपन छूछ जेबीपर भरोस भेलै

आब टपैमे कोनो नइ हएत बाधा

पहुँचबे करब सरायगढ़क ओइपार

मुदा,

मंगला लटकि‍ गेल घाटपर

नजरि‍ दौड़ौलक अपन कोनो लाटपर

 

अपन जेबीमे देने हाथ

तकैए चारू कात

आब की करबै हौ बाप

ई तँ लेबे करतै घाटी

जेना लगैए एकरा उठल छै आँति‍

सुखलौ घाटक लेतै खेबाइ

नै देबै तँ देत ई रबारि‍

 

सएह भेल मंगला घुरि‍ गेल

पछि‍मे मुड़ि‍ गेल।

 

भोगी

नाँच करए बानर

चाउर खाए बबाजी

बीचमे तैं अछि‍ सरोकारी

वि‍कासक नाओपर भऽ रहल अछि‍ नाँच

मानसि‍कता, मानसि‍कता, मानसि‍कता

पसरल अछि‍ चारूकात

 

नीक बात

कि‍एक नै हुअए वि‍कास

बि‍क रहल अछि‍ चारूकात

ब्‍लड प्रेशर आ डायबि‍टीजक गोली

संगे-संग

तैयो बबे बनल छथि‍ ति‍यागी

भरि‍ जीवन भोजन केलनि‍ बैसारी

परसँ दवाइयोकेँ बढ़ौलनि‍ बेपारी

भोग करैत-करैत भेल छथि‍ अघोर

तइपरसँ रटना लगेने छथि‍ ताबड़तोर

स्‍वर्ग जाए चाहैत छथि‍ सोरफोर

हमरा बीचमे हुअए कोनो नै बाधा

हम सबदि‍न रहलौं मधुशाला

बनलै तँ अछि‍ वि‍चारशाला

जइमे लटकल अछि‍ बड़का ताला।

 

कवि‍ता

 

हम नइ बि‍सरब

अपन सनातनकेँ

नहि‍ बि‍सरक चाही अहुँकेँ

दोस बनब आि‍क दि‍याद

आि‍क करब खाली हाल-चाल

सबाल भए गेल अछि‍ तैयार

     अहाँ नै बुझै छि‍ऐ

     बनि‍ जाउ दि‍याद

     पाँति‍ राखू चारि‍ याद

     नै यौ दि‍याद अहाँ करू कि‍छु रि‍याज

     यौ दोस आहाँ आनू अपन होश

     कए लि‍अ स्‍वीकार

     हे यौ दि‍याद

हि‍या जूडि़ पड़ल

दि‍याद सुनि‍ पड़ल

फाँट बीचमे आबि‍ टूटि‍ पड़ल

हट, हट, हट नै तँ घसक

     फाँट करए कि‍लोल

     दुनू अपन ठाम बेहोश

     मुदा,

     तैयार भेल दुनू सोर-फोर

     कल्‍याण-ले नहि‍

     अपन-अपन फाँट-लए


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