वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका
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१.
धीरेन्द्र
कुमार- कथा- अहींक लेल २.
नन्द विलास राय- चौठचन्द्रक दही
कथाक
३.
सतीश
चन्द्र झा,
हमहूँ कहाँ बुझलियै
४.
बचेश्वर झा-कथा-संगति
५.जगदीश
प्रसाद मंडल-अतहतह कथा शेषांश-
१.

श्री धीरेन्द्र कुमार, निर्मली
कथा
अहींक लेल-
“धीरेन्द्र जी, अपनेक प्रति शिकाइत अछि?”- रितु बाजि चुकल छलीह। हम सहज भावे मुसकाइत छी। हमरा अहाँक शिकाइत नीक जकाँ बुझल अछि हम जनैत छी जे अहाँ कहब यएह ने, मिठाइ नै खुऔलहुँ। हम अहाँक ई शिकाइत बहुत दिन पहिनेसँ सुनैत आएल छी आ हम इहो जनैत छी जे बतक्कर बेसी छी। यएह एकटा पैघ कारण अछि जहि कारणे हमहुँ बोल्ड होइत बजैत छी- “शिकाइत कएक ढकिया एक वा चारि?”
“नै हमरा सभकेँ शिकाइत अछि”
“शिकाइत की अछि बाजू?”
“एतऽ नहि डेरापर कहब।”
“एतए कहैमे कोन अचरज अछि?”
“नै, कोनो खास नै, तैयो डेरेपर कहब।” हम स्वभाविक रूपे एहि पश्नकेँ टारैत छी।
“कोर्सेज आॅफ स्टडी भेटत।”
“नै तँ।”
“हे, यौ अम्बिका बावू कतए रखने छिऐक कोर्सेज आॅफ स्टडी?”
“अहींक कोठलीमे तँ रखने छी।” अम्बिका अहाँसँ बाजल छल। हमर प्रश्न छल- “आइ हम अहींसँ भेँट करए जाइत रही। कतए जा रहल छी अहाँ?”
“झंझारपुर।”
“कहिया अाएव?”
“सोम-मंगलकेँ।”
“ठीके छै बहुत रास गप करबाक अछि। आउ अहाँ तखनहि गप होएत।” ई गप्प बाजि हम विदा भेल रही आ अनिल अहाँ सेगे गप्प कए रहल छल। अहाँक ई गप्प मोन होएत आ हमर आग्रह अछि जे अहाँ ई गप अबस्स मोन राखब।
एकतीस मार्च उनैस सए सतहत्तरि। दिनके दस बाजि कऽ बीस मिनट भऽ रहल अछि। हम अहाँक डेरासँ बहरा कऽ सड़कपर आबि चुकल छी आ अनिर्णीत स्थितमे अपनामे मर्मान्तिक टीसकेँ भोगैत सोचैत छी कोम्हर जाउ। मन होइछ जे सिकरेट धूकी, खूब धूकी आ एकांतमे जा कऽ घूमी। हमर सौंसे देह जरि रहल अछि। सड़कपर ठाढ़ भेल एहि ठामक सड़कक संगे जुटल आत्मीयताकेँ खंडित होइत देखि रहल छी। हमरा मन भऽ अबैत अछि बरखाक ओ राति जहिया मास्टर सहाएव अपन कोठलीसँ बहरा गेल छलाह आ फाटक बन्न करैत काल हमरासँ अहाँ पूछि रहलि रही- “आइ तँ हाथ मारि लेलहुँ?” अहाँक प्रश्न छल। मन होएत ओहि साँझ नीक अछार भेल रहैक!
“कामन एररमे, प्रीपोजिशनमे नहि।” हम कहने रही आ अहाँसँ विदा लेने रही। ओहो सड़कपर हम ठाढ़ छी। आ ओहि फाटककेँ ताकि रहल छी। ओहि दिन पहिल बेर हम अपनाकेँ नहि चिन्ह सकल रही आ हमरा अपन मूहेँठ टेढ़ लागि रहल छी। लगैत छल, हमरा आगाँ धीरेन्द्र नहि, क्यो आन व्यक्ति आबि कऽ ठाढ़ भऽ गेल अछि। ओहि काल हमरा स्थितिक आभास भेल छल हमरा दू-चारि व्यक्ति हमर एहि अन्यमनस्कतापर किछु सोचि रहल अछि तेँ बिना किछु सोचने टीशन दिस विदा भऽ गेल छी।
हम नहि चाहैत छी जे हमरा एखन क्यो टोकए। हमरा अहाँ सभ एकसर जाए दियऽ। आइ हमर आस्था खंडित भऽ गेल अछि। हम अहाँसँ पूर्ण परिचित छी। अहाँकेँ मन होएत जे हम अहाँ संगे तीन मास बिता चुकल छी। अहाँकेँ इहो मन होएत जे समस्तीपुरमे एहि तरहक गप उठल छल। अहाँ उद्विग्न रही आ हमहूँ। ओहि दिन हम ओतेक संत्रस्त नहि रही, जतेक आइ ओहि दिन हम आरोपित रही दोसरासँ, मुदा आइ हम अपन भीतर उठैत धाहकेँ शांत करए लेल ‘छोटी सी बात’ फिल्म देखए गेल रही। ओहि आरोपक प्रति आक्रोशमे हम दुनू गोटे संग रही, मुदा आइ हम एकसर छी।
एक जोड़ा ताड़क गाछ रहैक। एक दिन दुनू अपना अपनामे मग्न छल। नर ताड़केँ किछु निन्न सन लागि गेल रहैक ओ अपना आँखि क्षपकबैत छल आ मुदा ताड़ रानी सरंगाक गीत गाबि सुनाओ रहलि छलीह। आगाँमे एकटा कनही ताड़ रहैक। अकस्मात ओ कनही ताड़ भभा कऽ हँसि पड़लि। मादा ताड़केँ नर ताड़पर क्रोध अएलै आ ओ ओकरे आगाँ गरियाबए लागलि। बेचारा नरताड़ चुपचाप सभ किछु सुनैत रहल। ओकर बोली अँटकि गेल रहैक। ओकरा मुँहेँठपर आन्हीसँ पहिने रहएबला तटस्थता रहैक। ओहि राति दुनूमे किछु कहा-सुनी नहि भेलैक। ओ नर-ताड़केँ खीस लहरैक जे अपन मादा ताड़क मादे बहुत किछु सनैत आएल छल मुदा आइ आँखि क्ष्पकयबाक अर्थ कनखी बूझि क्रोधक पुट देखि ओ भीतरसँ काँपि उठल छल। ओहि दिनसँ ओ नर ताड़ सुखए लागल नदीक कातमे रहितो हमहूँ सएह पीड़ा भोगि रहल छी।
हम जनैत छी, अहाँकेँ ई खिस्सा मन नहि लागत मुदा अर्थ बुझबैक, कहक तात्पर्य अबस्स बुझबैक, से हमर विश्वास अछि ओना आउ, हम एकटा आर उदाहरण अहाँकेँ दैत छी- राजा अकबरक नाम बुझल होएत। बुझल अिछ ने?....
ओ एकटा डाँरि पाड़ि देलखिन आ बिरवलसँ कहखिन- “बिरवल, इसे छोटा बनाओ?” बिरवल ओकरे आगाँ एकटा पैघ ओकरासँ डाँरि खींचि देलखिन। अकबरक प्रयोजनक पूर्ति भऽ गेलैक। ओ डाँरि अपने छोट भऽ गेलैक। आ, ओहिना अहाँ हमर नजरिमे भऽ चुकलि छी आ अहाँमे हम।
मुदा, ओहि दिन अहाँ पैघ भऽ गेल छलहुँ। लोकसँ आरोपित भेनो अहाँ अडिग रही। एकर यएह कारण छल जे हम-अहाँ ‘फ्रेक’ रही। मुदा आइ की भेल?
एहि गपमे कोनो कमी नहि जे हम अहाँक आभारी नहि छी। एहि बीच हम अहाँक हाथे कमसँ कम सए गिलास चाह पीने हएव। अहीं रही हम ओतेक पढ़ैत रही अन्यथा ओ पढ़ाइ हमर बसक बाहरक गप्प छल। समस्तीपुर रीतू, नीतू, मीतू संगे कएक बेर चाह पीबि चुकल छी। अहाँ जनैत होएव जे एतेक भेलापर की हम कृतघ्न भऽ सकैत छी? अहाँ मोने यएह ने भऽ सकैत छी तेँ अहाँ हमरासँ ओ गप्प कहलहुँ आ हम पीबि कऽ रहि गेलहुँ। बेस, हम अहाँक गप्प मानि गेलहुँ तखैन अहाँ एहि विन्दुपर आउ की जँ हम वएह रहितहुँ तँ कि अहाँक ई उत्तर- “धीरेन्द्र जी, अहाँक प्रति शिकाइत अछि।” हम भेँट करए जैतहुँ? अनिलेकेँ शिकाइत छल तँ ताहिखन टीशनपर अहाँ सोझाँ किएक ने ओ बाजल?
आब जाहि खन हमरा ई सभ बात मन अबैत अछि, हम छटपटाए लगैत छी। हमर मोनमे रहि-रहि कऽ यएह गप्प अबैत जाइत रहैत अछि। ई गप्प जाए बेर अबैत-जाइत अछि हम अपनाकेँ दर्शकक बीच अखाढ़मे चित्त भेल पहलमान जकाँ लगैत छी। आ, नीतूक मुहेँठ हमरा आगाँ आबि जाइत अछथ्। “अनिल मुँह जबानी कहनो रहए आ चारि पेजमे पत्रो लिखने छल। हम कहने रहिऐक जे हमरासँ हुनाक गप्प नहि होइत अछि? मीतूसँ कहबनि, गप्प करए लेल।” निीतूक ई वाक्य हमर मर्मपर छेनीक चोच करैत अछि। जाए बेर चौट करैत अछि ताए बेर हमर रूप विकृत होइ चल जाइत अछि।
ओहि दिन टीशन दिस अबैत काल अशोकसँ भेँट कएने रही। हमरा अशोकोपर खीस छल। ओकरा किशोररिया आ शंकरिया आगाँ कहने रहिऐक- “सार, तोँ अाइदोकानसँ बहरा! हम तोरा की कहने रहियौ जे तोँ अनिलसँ कहने रही?” ओ बेचारा हतप्रभ छल। हम अपन ‘टेम्पर’मे अंट-संट बजैत रही। ओ हमरा संगे किरिया खएने छल जे अनिल जहिया आओत, हम ओकरासँ पुछबैक आ जहिया उनटि जाएत ओकरा पिटबै धरि अबस्स। अहाँकेँ पता होएतजे एम्हर की भेलैक। पता अछि ने? आर तँ आर, दस तारिख धरि जँ अनिल भेटि जाएत हम ओकरा पकड़ब आ नहि तँ लोहना जाएब। ओकर घर।
अाब हम की कहू? हम तँ ताकमे छी। मुदा आगाँ जे होइक हम अपन सफाइ नहि देब। आब आस्था-अनास्थाक प्रश्न अहाँपर पूरा निर्भर अिछ। अहाँकेँ जे मोन हुअए से करू। हमरा आन्तरिक पीड़ा जे भोगक अछि, भोगब।
हँ, पहिने अहाँकेँ हमरा प्रति शिकाइत छल, मुदा आब हमरा अहाँक प्रति शिकाइत अछि, शिकाइत अछि यएह जे अहाँ विश्वास कोना कएलहुँ। जँ यएह गप होइतैक। हम वएह समस्त पुरवला गप्प चन्दरदेव बाबूक मादे कहितहुँ नहि। तैयो अहाँकेँ हमरापर अविश्वास भेल तेँ हजार बेर धन्यवाद। हम ई अबस्स कहब- “कानसँ सुनल गप्पसँ जखन आस्थासँ अहाँ हटए लागू अहाँ अपन भीतर ओही अएनामे ताकू अहाँकेँ फोटो नहि भेटत जे अहाँ आगाँ बनल छल नहि चिन्हि सकब तँ अहाँक आन्दर हृदयक ओहि घावसँ ठेकि जाइत जे तखने फोँका सन उठल होएत अहाँ भरिसक कानि उठब एकर उनटा जँ अनास्थामे अएनामे ओहि मुँहेँठकेँ ताकब जे बहुत पहिनेसँ बनल अछि तखन घृणास्पद अबस्स बूझि पड़त मुदा आँखिमे डोलबैत भावकेँ देखि भीतरक दाह समाप्त भऽ जाएत।”
अहाँ भले एकरा उपदेश मानी मुदा, तथ्य यएह अछि। किन्तु- “अहाँसँ बेसी हम झरकल छी एहि आगिमे नीतूक मूहेँठ जखन आएल अछि-मूर्त्त भेल अछि जाहखन हम अपन भीतर गुरिल्ला-संघर्ष करैत रहैत छी तर्क-वितर्कक घेरामे अपन धाह दैत देहपर मर्यादाक खेल ओढ़ि बीच सड़कपर आएल छी चुप छी ओढ़ने छी अपनेसँ छक्कारैत अहाँक नास्थाक प्रश्नपर अपनाहिमे मर्माहत मर्यादाक खोलमे हमर आक्रोशसँ उठल हाथ अर्थहीन-सन नपुंसक सन डोलि गेल एहि अन्हार गलीमे जतए जे सोचैत छी जे बजैत छी ओहिमे अहाँक अनास्थाक प्रतिघ्वनि होइत अछि जे एकटा पैघ भीड़क हल्लामे परिणत भऽ जाइत अछि।”
हमर दाहकेँ अहाँ अहाँ नहि बूझि सकैत छी। ई एकरे पिणति अछि जे हम एक बजे राति धरि लीखि रहल छी। हमरा अहाँ सबहक मुहेँठ मोन पड़ैत अछि आ र्निदोष होइतो मोन पड़ैत अछि आ निर्दोष होइतो मन नहि होइत अछि जे अहाँ आगू जाइ। अहाँ की सोचैत होएब? ओ की सोचैत होएतीह एहीमे हम फँसल मर्माहतक पीड़ा भोगि रहल छी। आब हम कन्नहुँ ने अहाँ लग जाएब। अहाँसब हमरा गारि पढ़ू आ भऽ सकए तँ आगाँ पड़ने हमर मुँह नोचू। यएह अहाँ लेल सार्थक होएत। पहिने, एकतीस मार्च उन्नैस सए सतहत्तरिसँ पहिने नीतू, मीतू सीतू ‘तों’ रही, आत्मीय स्तर छल मुदा आब, किएक तँ अहाँक शिकाइत हमरा बड़ मोन पड़ैत अछि- “धीरेन्द्र जी, अहाँसँ एक शिकाइत अछि?”
“की?”
“अहाँ हमरा आ अनिल मादे की कहने रहिऐक अशोकसँ?”
“अशोक? कोन अशोक?”
“बजारक क्यो छैक?”
“अशोक साहु, नहि तँ....”
“हमरा अहाँसँ ई उम्मीद नहि छल।” अहाँक ई वाक्य हमरा मर्माहित कऽ उठल छल, हम व्यथित भऽ कहने रही- “अशोककेँ बजाबी?”
“नहि....” अहाँक उत्तर छल। हम बूझि चुकल छलहुँ जे कोनो अहाँ सभक अनिल संगे नाजाएज धंधाक गप्प छल।
हम कहने रही- “दस धरि जँ अनिल आएल हम अशोक लग अबस्स लऽ जाएब” आ हम सड़कपर आबि गेल रही।
हमर अहाँक आत्मीय आ पारिवारिक सम्बन्ध टूटि गेल। अहाँ विश्वास करू वा नहि ई अहींपर निर्भर अछि। अहाँ लेल। अहाँकेँ ई कथा भेटल तेँ हम सन्तुष्ट छी, मुदा कतेक.....?
साभार-
मिथिला मिहिर
वर्ष १७ द्वितीय आषाढ़ कृषणपक्ष १० शाके १८९९, पटना, रवि, १० जुलाइ, १९७७मे प्रकाशित कथा अहींक लेल।
२
नन्द विलास राय
शेषांश
चौठचन्द्रक दही कथाक
राति नअ बजे दिल्लीसँ मंगलक फोन आएल। घरेक बगलमे एक गोटे मोवाइल रखने अछि। ओकरे मोवाइलपर सोमनीकेँ फोन अाएल। सोमनी फोनमे मंगलसँ गप केलक। कुशल-समाचारक वाद मंगलवार कहलक- “आइ चौठचन्द्र पावनि छी, अहाँसब भरि मोन खीर, पुरी, दही खेने हएब।”
सोमनी उदास होइत बजलीह- “की भरि मन खएब, दही पौरैले क्यो एक्को फुच्ची दूध नहि देलक। पोडरक दही लए कऽ पावनि केलौं गऽ मररक खीर रान्हैले भजैत एक्के फुच्ची दूध देलक। एक फुच्ची दूधसँ केहेन खीर हएत।”
मंगल कहलक- “अहाँ मोन जुनि छोट करू, हम फगुआमे गाम अबै छी तँ एकटा नीक लगहरि गाए कीनि कऽ आनि देव। दूध खेबो करब आ बेचवो करब। दूटा पाइ हएत तँ नूनो-तेल चलत। बेटी सभ घास काटि-काटि आनि देत।” सोमनीक मन खुश भऽ गेल।
फगुआमे मंगल गाम आएल तँ सोमनीकेँ गाए कीनि देलक। गाए अधकिलौआ बार्ली डिब्बासँ छह डिब्बा भोर आ चारि डिब्बा दुपहर लगैत छल। जाबे धरि मंगल गाम रहल ताबे ओ अपने गाए दुहाए। जखन मंगल दिल्ली चलि गेल तँ सोमनीए गाए दुहए लगलीह। भोरका दूध बेचि लै आ दुपहरका दूध परिवारेमे खाए। बेटी फुलिया आ गुलबीया घास आनि-आनि कऽ खुअबै। एक दिन फुलिया लगमावाली खेतक आरिपर कनी घास काटि लेलक। तै लऽ लगमावाली फुलिया आ ओकर माए सोमनीकेँ बिखनि-बिखनि कऽ गडि़औलक। सोमनी फुलियाकेँ मारबो केलक आ लगमावालीसँ गलतीओ मानलक।
समए बीतैत देरी नै लगैत छै। आइ कुशी अमवश्या छी। पाँचम दीन चौठचन्द्र पावनि हएत। कल्हिसँ दही पौरल जाएत। सोमनी दरबज्जापर एम्की लगहैर गाए चौठीचान्द्र महराज देने छथिन। सोमनी सोचलक जे एम्की सभ बासनमे नीक जहॉंति दही पौरब। ओकरा पौर सालक सभ गप्प मन रहए जे क्यो एक्को िगलास दूध नइ देलक तँ पोडरक दही लए कऽ पावनि केलौं। मने-मन विचारलक जे हमहुँ ककरो दूध नै देबइ।
आइसँ चौठचन्द्रक दही पौरल जाएत। भोरे मुसबा लोटा नेने सोमनी एहिठाम दूध लै लए आएल। राधे कहलक- “माए गै, पौर साल अपना क्यो एक्को गिलास दूध नै देने रहौ तँइ ककरो दूध नै दे।”
सोमनी सोचलक जँ सिग्हेसर बाबा लगहरि गाए देने छथि। तँ पावनि नामपर सभकेँ किछु ने किछु दूध देबे करब। जत्ते गोटे सोमनी एहिठाम दूध ले आएल सोमनी सभकेँ दूध दऽ विदा केलक। ओकर अपन छवोटा वासन लए मात्र दू गिलास दूध बँचल। ओहो काल्हि पावनि छिऐ तँ आइ दूपहरक। सोमनी ओही दू गिलास दूधकेँ छवो वासनमे दही पौरलक।
आइ चौठचन्द्र छी भोरेसँ लोक सभ लोटा लए लए सोमनी एहिठाम दूध ले पहुँचल। लगमावालीक बेटी दूखनी सेहो अएल। फूलिया सोमनीकेँ कहलक- “माए गै, दूखनीकेँ दूध नै दही। ओकर माए कनिए घासले गिरिऔने रहौ।”
सोमनी बाजलि- “पावनिले सभकेँ दूध देबै। गारि देलक तँ कि भेल एकठाम रहलासँ तँ आहिना लड़ाइ-झगर होइत छै तँ कि ओइ बातकेँ जीनगी भरि रखने रखने रहब ओइसँ कि हएत। अनेरे टेंसन रहत।” सेामनी भोरका समूचा दूध लोककेँ दऽ देलक। ओइ दूधक ककरोसँ पाइओ नै लेलक। दुपहरका दूध दूहि कऽ एक गिलास दूध भजैत वितबाकेँ आ एक गिलास मालिक नूनू बाबू ओहिठाम पठौलक एक गिलास अपने रखलक। सॉंझमे जखन ममर लए सोमनी खीर रान्हैले बैसलीह तखने बेरमावाली आबि गेलि। ओ कहऽ लगलीह- “यै दाइ, हमरा तँ खीर रान्हैले दूधे ने भेल। जितबा अखुन्का नाओ कहने रहए। मुदा जखन बेटाकेँ दूधले पठौलिऐ तँ नै देलक। आब कथी लऽ कऽ ममरक खीर रान्हब?”
सोमनी अपनाले जे दूध रखने रहए ओहिमेसँ अधा दूध बेरमावालीकेँ देलक। साँझमे सोमनी चौठीचाँद महराजकेँ हाथ उठबैत कहलीह- “हे चौठीचाँद महराज, हमरा दरबज्जापर एहिना देने रहु तँ हम सभकेँ पावनि लए दूध दैत रहब।”
३
सतीश
चन्द्र झा,
राम जानकी नगर,
मधुबनी
हमहूँ कहाँ बुझलियै-
चान! चान! हे यै चान ! सुतले रहब। केबार खोलू ने । हम कुसुम छी। हर्ष खुशी मे डूबल स्वर कान मे पड़िते निन्न खुजि गेल। भोरक किछु हेरायल सपना फेर सँ हेरा गेल..आ हम उठि क’ बैसि गेलहुँ। आँखि मलि क’ दुनू हाथ कें जोरि दर्शन करिते केवार खोलय दौड़ि गेलहुँ। की बात छौ ? एते भोरे ..? प्रश्न पूरा नहि भेल मुदा ओ बाजल दीदी ..आइ हमर वियाह अछि।राति मे बाबू कतौ सँ ठीक कएने अयलै। पाँचमा पास छैक आ दिल्ली मे कोनो काज सेहो करैत छैक। आँहा अवश्य आयब। नहि जानि ओ की की बाजि रहल छल,मुदा हम त ओकर पहिल शब्द ’वियाह’ सुनि ततेक ओझरा गेलहुँ जे किछु आओर नहि पूछि सकलियै आ ओ दौड़ल चलि गेल। .. हँसैत ..एकटा अबोध हँसी . निर्विकार चेहरा ..। मुदा हम! हमर चेहरा तनावपूर्ण। लागल जेना हृदय मे किछु गरम चीज सन्हिया गेल हो आ हमर संपूर्ण रक्त मे एकटा अपरिचित झुनझुन्नी बनि क’ दौड़ि रहल हो .सरपट.. अति तिव्र गति सँ। अचानक शरीरक बोझ उठाबय मे पैर असमर्थ भ’ गेल आ हम धम्म सँ धरती पर बैसि गेल रही।. सुन्न भेल.. मुदा भीतर लट्टू जेकाँ किछु नचैत रहल .. नचैत रहल .. अविराम । नहि जानि कखनो क’ एकटा आश्चर्य एतेक भयभीत कियै क’ दैत छैक .एकर उतर ने तहिया भेटल ने आइ धरि बुझबा मे आयल। मोनक किछु बात कें अभिव्यक्तिक माध्यम एखनो नहि छैक। शब्द त’ किन्नहँु नहि। हँ आँखिक नोर कखनो क’ हृदय मे चुभैत कोनो भावना कें बुझि जाइत छैक।
गाम घरक जीवन। छल-प्रपंच सँ बंचित समतल धरती जेंकाँ समटल आचरण जतय छोट-छोट सपना देखि ओकरे परिपूर्ण करबा लेल छटपटाइत आत्मा। ओही श्वच्छ परिवेश मे हम आ हमर कुसुम संगी बनि क’ एखन धरि रहैत छलहुँ। ओ हमर हरबाहक बेटी छल। छोट लोकक बेटी, मुदा तखन ई बात नहि बुझलियै जखन पहिल बेर ओकरा अपन आँगन मे देखि हाथ पकड़ने दौड़ि गेल छलहुँ दलान पर। नेनपन कहाँ बुझि पबै छै जाति पाति आ उच्च निचक बात। ई त’ उमर बढ़ला सँ समाजक व्यवस्था आ मोनक अहं मे लोक भसिया जाइत अछि। मुदा दोस्ती त’ मोनक एक्टा मिठ्ठ संबंध छै एकरा समाज आ परिवार सँ की मतलब। एक बएस के कतौ दू टा अबोध एक दोसर के अँाखि के पढ़ि लेलक आ बन्हि गेल एकटा शब्दहीन संबंध मे।
आई फेर नहि जानि कियैक जीवन कें बीतल संपूर्ण हवा बसात मोन मे प्रचंड बिरर्रो उठा देने छल आ हम ओइ मे एकटा छोट फतिंगा जेकाँ उड़ियाइत अपन अस्तित्व कें बचावय मे संघर्षरत छी। यैह त’ जीवन छै- सतत संघर्ष आ अपन अस्तित्वक रक्षा। मुदा कहाँ भेल अस्तित्वक रक्षा। आलोक सँ वियाह भेलाक बाद लागल जेना जीवनक संपूर्ण सपना मुर्त रूप ल’ लेत। स्नेहक संबंध प्राण मे एकटा नव स्फूर्तिक संचार करैत छैक। विचारक धरातल पर पति-पत्नी एक दोसर के सम्मान दैत छैक। मुदा वियाहक दू मासक बादे सभकिछु उल्टा लागय लागल। प्रेमक निर्वाध गति सँ बहैत शीतल जल मे दुर्गंध आबि गेलैक। आलोकक अहं मे अपन अस्तित्व कत’ हेरायल जे एखनो धरि नहि भेटल। पिताक एक मात्र संतान छलहुँ हम। स्नेहक कतौ कमी नहि अनुभव भेल।शिक्षाक मर्यादा सदैव जीवन कें बान्हि क’ रखलक। घरक संस्कार जाति समाज के कठोर बंधन कहियो स्वतंत्रता नहि द’ सकल जे अपन पती सँ विद्रोह क’ सकी आ अपन जीवनक ठमकल दुर्गंधित पानि कें समुद्र मे बहा क’ निर्मल क’ली। आइ बुझाइत अछि जे शिक्षा आरो कमजोरे करैत छैक। लोक की कहत? सम्मान कें रक्षा कोना हैत? समाज मे लोक की की बाजत? सभटा बिचार मोन मे उठिते हम अपना कें बहुत कमजोर अनुभव करय लगैत छी और अपन संपूर्ण व्यथा कें सहर्ष स्वीकार करैत आकाश मे नुकायल देवता सँ मृत्युक वरदान मंगैत प्रतिदिन अपन बान्हल दिनचर्या मे लागि जाइत छी। कमजोर नारिक कमजोर विचार। शिक्षित नारी आ एते कमजोर आत्मविश्वास। जखन क’ ई विचार अबैत अछि त’ मोनक कारी वेदना स्वेत मुखमंडल पर ततेक ने अपन रेखा चित्र खिंचि दैत अछि जे ओकरा भरब असंभव भ’ जाइत अछि।
मोनक आँखि सँ फेर किछु देखैत छी त’ लगैत अछि जे हमर कुशुम कहाँ कमजोर छल। दशमी मे पढ़ैत-पढ़ैत वियाह भेल रहैक। वियाहक बाद एक दू बेर सासुर सेहो गेल। ओकर घरवाला दारू पीबि क’ ओकरा संग बहुत मारि पीट करैत छलैक। एक दिन ओकर सूतल स्वाभिमान जागि गेलैक आ ओकरा छोड़ि देलक। ओ अपन विगत के संपूर्ण पसरल स्याही पर उज्जर पिठार सँ फेर कोबर लीखि लेलक। जीवनक निर्णय लेबा मे ओ कतौ कमजोर नहि पड़ल। फेर सँ ओ अपन दोसर पतिक संग प्रेम करैत दुनियाँक टेढ़ मेढ़ बाट पर चलि पड़ल। एक दिन हमरो कहलक दीदी अहाँ एतेक कष्ट उठा क’ कोना अपन पतिक संग निर्वाह क’ लैत छी। ओना त’ अहाँ हमरा सँ बेसी पढ़ल लीखल छी। नीक संस्कार अछि। स्वयं कमा क’ खा सकैत छी। तखन कियै?’’ तू नहि बुझबिही’’! ओ चुप भ गेल। मुदा हमहूँ कहाँ बुझलियै ? ओ त कम पढ़ल छल। छोट जाति .. ताहू पर गरीब ..। मुदा हम त पढ़ल लिखल उच्च जाति ..पैघ लोक ..नीक संस्कार! लेकिन कहाँ बुझि सकलियै एकर कारण ? की एकर कारण संस्कार छैक? अथवा सुशिक्षा? पता नहि कोना बुझबै एकर रहस्य ।
हम एम0ए0 पास क’ क’ नौकरी करबा लेल पिता जी सँ अनुमति चाहैत छलहुँ लेकिन ओ कहलथि जे हम अहाँक विवाह लेल चिन्तित छी। एकटा पिता के सबसँ पैघ बोझ पुत्रीक कन्यादान होइत छैक तैं ओ एहि सँ मुक्त होयबा लेल जतय ततय प्रयत्नशील रहैथ। हमर सहमति त’ एकटा मात्र हुनका लेल स्नेहक अभिव्यक्ति छल जाहि मे कर्तव्यक एकटा निर्वहन सेहो छलैक। हम अपन सहमति स्नेहक प्रतिदान स्वरूप द देलियन्हि। गाम सँ किछु दूर एकटा धनाढ्य पढ़ल लिखल परिवारक एकलौता पुत्र आलोक संग हमर वियाह भ गेल। दान दहेजक मांग नहि सुनि हमर पिता कें लगलन्हि जे आजुक युग मे निश्चय ओ लोकनि भगवान छथि मुदा किछु दिनक बाद ज्ञात भेल जे ओहि भगवानक संपूर्ण आत्मा कलुषित छल। धनाढ्य आ सुशिक्षित नींव मे सौसे दिबार लागि गेल छल आ ओही दिबारक मजबूती लेल हमरा वलिदान देबाक छल। आलोक कें एकटा आओर वियाह भ’ चुकल छलन्हि। संभवतः पाच छः साल पूर्वहिं मुदा संतान नहि होयबाक कारणे अपन वंश आ अहंकारक गाछ के आगाँ बढ़ाबय लेल एकटा सुशिला कन्याक खोज रहन्हि। तखन हमरे संग प्रपंच भेल। जीवनक एक एकटा नुका क’ पौती मे राखल हमर सुन्दर कल्पना हेरा गेल। आ हेरा गेल हमर संपूर्ण अस्तित्व जकर रक्षा करब हमर बसक बात नहि रहल। एकटा हारल मनुक्ख। मात्र बच्चा पैदा करबा लेल आनल गेन छल । इच्छा वा अनिच्छा किछु कतौ नहि । अपन घर नहि । अपन किछु सपना नहि। विद्रोह करबा लेल हिम्मति नहि एकदम कमजोर ..हम ..चान। मुदा हमर संगी कुसुम .. अपन जीवनक उतार चढ़ाव मे अपन अस्तित्व एखनो धरि बचौने ..खुब होसगर आ ठोस कुशुम।
४

बचेश्वर झा- निर्मली, सुपौल।
कथा
संगति
प्राय: जीवनक आरंभसँ आइ धरि अनेक प्रकारक लोकक संगति पाप्त भेल अछि। संगतिक कारणे कटु-मुधु दुनू तरहक अनुभव भेल, मुदा एहनो अनुभव भेल जे जीवन पर्यन्त मोन रहत।
हम जाहि मोहल्लामे रहैत छलहुँ ओहि बगलमे कोशीक सरकारी काँलोनी छल। सरकारी सेवक लोकनि ओहिमे रहैत छलाह। पड़ोसियाक कारणे हेम-क्षेम नीके छल। खास कऽ अमीन सहाएवसँ वेशी आपकता रहए किएक तँ ओ एकान्तवासी जीवन वितौनिहार रहथि। आन्तरिक खीचाव बुझू अमीन सहाएबक संगति सायं प्रात: लागू छल। अमीन सहाएव कंजूशक शिरोमणि रहथि। सोलह आना दरमाहा बचएबाक चेष्टा करथि। एक साँझ किछु बना एक पाबि लथि अन्यथा अधिकांश राति चूड़-फक्की करथि कहबाक तात्पर्य एक-आध मुट्ठी चूड़ा फाँकि कए रहि जाथि। ई रहस्य बड़ थोड़ लोक जनैत छलन्हि। अपन एहि कमजोरीकेँ ओ गप्पक आवरणसँ अनभिज्ञ लोककेँ लखे नहि देथि। यएह कारण छल जे सम्पूर्ण क्वाटरमे एकसरे रहैत छलाह दोसरकेँ संग राखव वा रहए देब मान्य नहि छलन्हि।
कार्यरतलोक अमीन सहाएवसँ फराक रहबाक प्रयास करथि किएक तँ केहनो अगुताएल लोक अमीन सहाएवक गपौढ़ामे लटपटा जाइत छलाह। हमहूँ जखन उदास आ कार्य रहित अपनाकेँ पबैत छलहुँ तखने हुनका अह्लादपूर्ण आबाजमे टोकैत रहियन्हि आ ओहो भाव बूझि मनलग्गू गप कहए लागथि। टेंसगर चाह हुनके मुँहसँ सूनल अछि। सायं-प्रात: चाह एक कप हुनका पिआयब आ चाह चलिसाक पाठ हमरा सभकेँ अभ्यास बनि गेल छल।
संयोगवश! एक मास्टर सहाएव कतहुसँ ओहि मोहल्लामे एलाह। हुनका डेराक प्रयोजन भेलन्हि। बगएवानि तँ खटाशे सन रहनि, मुदा विद्या विभूषण रहथि। मोहल्लाक लोक नेनाक हेतु उपयुक्त बूझि मास्टर सहाएव हेतु डेराक ताकमे घुमथि। मास्टरो सहाएव एकसरे रहथि तेँ आपकताक आकर्षक तँ नहि, मुदा विवशताक बन्धनमे आवि संग रहए पड़लनि।
किछु दिनक पश्चात् एक दोसरकेँ रूमेट कहए लगलाह। जखन दुनूमे सहबासक सिनेह बढ़लनि तँ मास्टर सहाएव स्वयं पाकी होएबाक प्रस्ताव रखलनि। अमीन सहाएव भविष्यक लाभ सोचि कऽ तैयार भऽ गेलाह। शुरूमे तँ पाक काज दुनू मिलि कऽ करथि। बादमे मास्टर सहाएव भानस बनाएब अमीने सहाएवपर छोड़ देलखिन। मास्टर सहाएव ठीक भानसक समए पूजाक आसन पकड़ि लथि। एहि बीच ज्याै अमीन सहाएव किछु पूछथि तँ मास्टर सहाबक हूँ!, हूँक शब्द अमीन सहाएबक लेल अंकूशक काज करनि। मोने मोन गुम्हरि कऽ अमीन सहाएव रहि जाथि। एहि बीचमे जौं केओ अपरिचित लोक आबि जाथि तँ मास्टर सहाएवक पूजका अवधि बढ़ि जाइत रहनि संगहि मन्त्रोचार जोड़-जोड़सँ करए लागथि। आगाँक परसल अन्न गर्गट भऽ जाइन्ह अमीन सहाएवकेँ पित्त लहरि जाइन। तखन ओ अर्दर बाजए लागथि। आडम्वरी पूजाक अन्त कऽ मास्टर सहाएव हे! हे! मे अमीन सहाएवक क्रोधकेँ पीवि जाथि। मास्टर सहाएवमे अमोध सहन शक्ति सेहो छलनि। अमीन सहाएवक गन्जन आ मोहल्लाक लोकक वाककेँ अँगेज नेने छलाह।
मास्टर सहाएवमे और तँ जे गुण दोष रहनि, मुदा किछु एहनो गुण छलनि जे पैध दुगुर्ण कहल जा सकैछ। मास्टर सहाएव डेरामे दिनो कऽ अर्ध्द दिगम्वर रहैत छलाह आ राति कऽ पूर्ण दिगम्वरे। नवमे तँ अमीन सहाएव सकोच करथिन, जखन ई गति विधि मास्टर सहाएवक नहि बदललनि तँ अमीन सहाएव रूमेट ई ठीक नहि कहि चेतबैत रहथिन। अमीन सहाएव चूल्हि फूकैत आ भानस करैत अपन स्वछन्द जीवनमे परतंत्रक अनुभव करए लगलाह। आब ओहो पाक काजसँ उचहि गेलाह। रूमेटक आलोचना-प्रत्यालोचना हुनक मुख्य विषए भऽ गेलनि। मोहल्ला लोकक प्रति आक्रोश रहबे करनि। एक दिन विक्षिप्त मुद्रा देखि हम हुनकासँ सिनेह पूर्वक कहलिएनि- “हम एकसरे रहैत छलहुँ सएह ठीक, संगतिक प्रभावसँ संतप्त भऽ गेल छी।”
एक दिन मास्टर सहाएव देह उजागर करबाक हेतु टाँनिक अनलनि जाहिमे चारि अना अलकोहल लिखल छलैक। हम कहलिएनि अमीन एहिमे सँ आध कप जौं मास्टर दितथि तँ मोन बुलन्द भऽ जाइत। कहैत-कहैत हम शीशीसँ चारि चम्मच करीब ढारि मुँहमे दऽ देलिएनि, एहिपर मास्टर सहाएव गिद्ध जकाँ झपट्टा मारि टाँनिकक शीशी लऽ क्रोधाभिभूत भऽ गेलाह। दू बर्षक अन्तरालमे प्रथम बेर एहन तामस देखल। मास्टर सहाएव सम्पूर्ण शीशी पीवि गेलाह। मध्य रातिमे जखन खौंत फेकि दलकनि तखन ओ चेतना हीन भऽ फर्शपर ओंघरनिया देमए लगलाह। अमीन सहाएव पूर्ण चिन्तित भऽ हमरा लग दौड़ल एलाह। हमहूँ ओतए गेलहुँ। नतीजा भेल जे चारि बजे भोरमे जाऽ कए मास्टरकेँ चैन भेलनि तखने हमरो लोकनि चैन भेलहुँ। बादमे मास्टरकेँ पूछलोत्तर जबाब भेटल जे अपने सभ चखैत-चखैत पीबि लितहुँ तेँ हम सभटा एके बेरमे पीवि लेल। अस्तु! आगाँ पूछबाक साहस नहि भेल।
एक दिन मास्टर सहाएवक दिगम्बर अवस्थाक निवार्णाथ हम हुनका पलंगक तरमे जाऽ कऽ बैसि गेलहुँ। अमीन सहाएव हमर सहयोगी रहथि। लालटेमक प्रकाश मन्द कऽ जखन मास्टर सहाएव ओछाइनपर लम्वायमान भेलाह। निन्न आएले छलनि तखन हम पलंगक भीतरसँ खट्-खट् अावाज कएल आ ममीन सहाएव कागज सभकेँ फर-फरा देलथिन। हम सभ चूपे रही कि मास्टर सहाएव चोर-चोर बजलाह। हमहूँ सभ संग दऽ देलिएनि। ओ फानि कऽ बाहर भेलाह जोर-जोरसँ चारक हल्ला कएलनि, मोहल्लाक नर नारी चाेर शब्द सुिन अमीन सहाएवक डेरा दिशि दौड़ गेल। मास्टर सहाएव ताबत कालधरि वेसुधिये रहथि जखन अनेको हथबत्तीक इजोत हुनाकपर एक संग पड़ल तखन मास्टर सहाएव संकोचसँ गर्हित भऽ बैसि गेलाह। सभ हुनका लू-लू थू-थू करए लगलनि। अन्तमे अपन तोलिया फेकि हुनका दिगम्बर रूपकेँ श्वेताम्वरमे परिणत कएल।
ओहि रातिक घटनाक बाद मास्टर सहाएव पुन: नहि मोहल्लाक भीतर देखल गेलाह। मुदा हुनक चर्चा सबतरि अनेको दिन तक होइत रहल। अमीन सहाएव एहि संगतिसँ मुक्त भऽ फेर पुरना बाटक बटोही भऽ गेलाह। हमरा प्रति हुनक निष्ठा भऽ गेलनि किएक तँ हम आश्वासनकेँ पूरा कऽ देलिएनि। संगतिक संकटसँ मुक्त भऽ गेलाह।
५
जगदीश
प्रसाद मंडल-
अतहतह कथा शेषांश-
गाँजा मंचसँ जोड़िरा शुरू भेल- “एक दिस खेले कृष्ण कन्हैया, एक दिस राधा जोड़ी हो।” तँ दोसर ताड़ीक मंचसँ महराइ धुन- “किसकी मैया बाधिन जनमे जो रूदल पर फेरे हाथ।” तेसर मंचसँ बोल डान्स (ट्युष्टि) स्टेज मचमचबैत।
सात बजेक समए। चौकपर गदमिशान हुअए लगल। रविशंकर चाह पीबैले अबैत रहथि कि दस लग्गी पाछुएसँ चौकक मस्ती देखलनि। गाछक निच्चाँमे ठाढ़ भ? गेलइ जे सौंसे गाम नाचि-गाबि रहल अछि। मुदा लगले जना पवन सुत िकछु कहि देलकनि। मुस्की दैत भुटुकि लालक चाहक दोकान सोझे पहुँचलाह। रविशंकर भुटुकि लालकेँ पुछलखिन- “भुटुकि भाय, बड़ देखै छियह कि बात छिऐ?”
“पहिने चाह पीवू ने। गप कतौ पड़ाएल जाइ छै। निचेनसँ चाहो पीवू आ गप्पो सुनू।”
“कनियो तँ इशारोमे कहह।”
“एतबे बुझि लिअ जे खच्चरपुर बलाकेँ मुता-मुता भरेलौं।”
भुटुकि लालक बात सुनि रविशंकर अचंभित भऽ गेलाह जे आखिर बात कि छिऐ? तहि बीच झामलाल कहए लगलनि- “भाय, मास दिनक कमाइक फल छी। जड़ियेसँ कहि दइ छी। तेंइतीसम दिनक गप छी। एक लाल रूपैयाक पार्टीक काज कऽ कए आइले रही। बारहसँ उपर दिन चढ़ि गेल रहए। कपड़ा खोलि कलपर बाल्टी-लोटा रखि लताम गाछक निच्चाँ ठाढ़ भऽ उपर िहयासैत रही। तहिकाल हिरदे काका दछिनवरिया बाधसँ अवैत रहथि। नजरि पड़िते कहलिएन- ‘काका, गोड़ लगै छी। बड़ रौद छै कनी ठंढ़ा लिअ।’ जहिना कहलिएनि तहिना ओहो लतामेक गाछ लग आबि गेलाह। लताम देखलाहा आँखि हिरदे काका मुँहक सुरखी देखि मुँहसँ निकलल- ‘काका, एना हकोपरास किअए छी।’ सुखल मुँहक मुस्की दैत बजलाह- ‘नै बौआ, नै कोनो। रौदमे सँ एलौंहेँ ने।”
“दूटा लताम खाउ?”
“नै बौआ, नै खाएव।”
“दूटा अंगने नेने जाउ।”
अंगनाक नाओ सुनि औटोमेटिक बम जकाँ कखन छाती फाँटि गेलनि, से नइ बुझलौं। मुदा आँखिसँ टघरैत नोर गालपर चमकए लगलनि। मन गरमाएले रहए। कहलिएनि- “काका, जहिना परिवारमे भैया, काका, बाबा, होइए तहिना ने समाजोमे होइए। विरान किअए बुझै छी। अहाँ सबहक असिरवादसँ कमाइयोक आ दस गोटेकेँ चिन्हैइयोक लुरि भऽ गेल। बाजू अहाँ किअए एते पीड़ित छी जँ उठैबला हएत तँ जरूर....।”
नोर पोछैत काका बजलाह- “बौआ, देखैइयेटा लेल बुझि पड़ै छिअह जे मनुक्ख छिअह। मुदा से नइ, मुइल मनुक्ख छी। अपनो परिवारक रक्छा करै जोकर नइ छी। तहन तँ देखा-देखी आँखि तकै छी।”
“खुलि कऽ बाजू, काका?”
“बौआ, अइ जुगमे हमसब महापापी छी, िकएक तँ भगवान पाँचटा बेटी दऽ देलनि। चारिटाक तँ कोनो धरानी खेत बेचि-बेचि पार लगेलौं। सात बीघाक किसान मात्र पनरह कट्ठापर आबि गेल छी। तेहेन हवा-पानि देखै छी जे ओहूसँ पाँचमक पार लागत कि नै।”
हृदए काकाक बात सुिन अवाक भऽ गेलौं। जना बकार बन्न भऽ गेल। छाती असथिर करैत पुछलिएनि- “कक्का कते खर्च हएत?”
“बौआ, गरथाह बात कन्ना बाजब।” आँखिक नोर पौछैत पुन: बजलाह- “बौआ, ई पाँचम बेटी तत्ते दुलारू अछि जे हृदएमे सटल अछि। एक तँ कोड़ि-पच्छू बेटी तइपर सँ माइयक तते सिनेही जे सुग्गा जकाँ किछु बाजत। जेठकीकेँ दादिये पोसलकै। कहियो ओकरा कोरा कऽ नै लेलिऐ। जखन टेल्हुक भेल तखनसँ संगे मेला-तेला लऽ जाए लगलिऐ। छोटकी बेटी माइयक तेहेन दुलारू बेटी अछि जे साइयोसँ उपरे नाओ रखने छथिन।”
“कक्का, छोड़ू ई सब। अपन बहीन बुझि विआह पार लगा देब। जेहने जेठकी बेटीक परिवार अछि तेहने परिवार भजिआउ। खर्चक चिन्ता जुनि करब। ई पहिल दिनक गप छी।”
ओना तँ गामे-गाम अतहतह होइते अछि मुदा खच्चरपुर बलाकेँ तँ कोनो सीमे-नाङरि नै छै। अइ साल पाँचटा िवआहमे अभरल। तते दोस-महीम भऽ गेल अछि जे एकटा विआहक खर्च नौत पुराइमे होइए। तइले नइ कोनो। दस सेरे नइ नितराइ दस सगे नितराइ। पाँचो विआहमे ओकरा सबहक खच्चरपनी देखिलिऐ से एँड़िसँ टिकासन तक लेसि देने अछि। मुदा कोनो विआहमे कोनो समाज (बरिआती-घरवारी) तँ नइ छलौं तेँ आँत-मसोसि कऽ रहि गेलौं। गर चढ़ा खच्चरपुरेमे कथा ठीक केलहुँ। कक्कोकेँ पसिन भेलनि। लेन-देन तँइ भऽ गेल। समए बना ओहू गामक समाज आ अपनो समाजक बैसार केलौं। बैसारेमे बजलौं- “अखन धरिक काज दुनू घरबारीक छलनि मुदा, आब समाजक भऽ गेल। चाहै छी जे आन गाम जकाँ थूका-थूकी वियाहमे नइ हुअए। तेँ किछु समस्या अछि जहिपर अखने विचार विमर्श भऽ जाए। (1) वियाह पद्धतिक अनुकूल हुअए आकि जयमाला कऽ हुअए। (2) पलाउक चलनि भऽ गेल से मखानक खीर खाएव कि पलाउ? (3) खेला-पीला उत्तर लगले विदा भऽ जाएव आकि आराम कऽ कए?”
प्रश्न सुिन चुप्पी पसरल। जहिना चुल्हिमे खोरनासँ जारन घुसकाएल जाइ छै तहिना घुसकौलौं- “कन्यागत समाजक कन्हापर भार देने छथिन तेँ समाज चाहै छथि जे आन-आन गाम जकाँ बरियाती घरवारीकेँ। निच्चाँ देखबए चाहैत आ घरवारी बरियातीकेँ। जहिसँ जहिना खेतमे कोनो चीजक बीआ छीटल जाइत अछि तहिना हम सभ झगड़ाक बीआ समाजमे छीटि देने छी। जे दुखद बात छी। नै चाहब जे समाजमे एना हुअए। वियाह सृष्टिक सृजनक प्रक्रियाक अंग छी तेँ एहि संग छेड़-छाड़ अनुचित। अपने लोकनि जे कहि देब ओहि अनुकूल वियाह हएत। घमरथन शुरू भेल। घमरथनक कारण भेल किछु देखौआ काज आ किछु चोरौआ। मुदा सुमति एलनि, कहलनि, जे लड़का-लड़कीक विआह सामाजिक पद्धतिक अनुकूल हुअए। ई भार अहाँपर रहल। जहिना कोनो काजक प्रक्रिया होइ छै तहिना भोजनक प्रक्रियाक अंग अरामो छी। जानल बाज अछि जे नियमित भोजनसँ भिन्न भोजन बरियातीमे होइ छै, तेँ आराम आरो जरूरी अछि। प्रात: काल नअ बजेमे चाह-पान खा असिरवाद दैत आपस हएब। बरियातिये जकाँ गाड़ियो सवारीक ओरियान चाही, मुदा मिसतिरिआइ बरियातीक रहतनि। पलाउ आ खीर खेनिहार दुनू रहताह। बाजा-बूजीक बेवसथा घरवारीक। नै चाहब जे रस्ता-बातमे अनगौआँ सभसँ झंझट हुअए। मोटा-मोटी यएह बुझू जे सएक धतपत बरियाती रहताह। जिनका लेल अहाँ दू-ठाम बेबसथा करब। अहुँ सभ बुझिते छिऐ आ हमहुँ सभ बुझिते छिऐ। एक भागक जे बरियाती रहताह हुनका लेल जहिना भाेजनक वृहत् बेबस्था रहत तहिना अरामोक हेबाक चाही। ई नइ जे मधमन्नी जहल जकाँ मूड़ी-पाएर दुनूक पतियानी लगि जाए। पुछलिएनि- ‘जखन दरबाजापर पहुँचबै तखन कोन रूपे शुरू करबै?’ कहलनि- ‘जे सभ भाँग खेनिहार छथि ओ सभ घरेपर भाँग खेता आ रस्ते-बाटमे कतौ झाड़ा-झपटा करताह। पानि परसबसँ शुरू करब एम्हर बरियातीक सनो-मान शुरू हएत आ ओम्हर आंगनमे वियाहक प्रक्रिया शुरू हएत। आठ बजे दरबज्जापर पहुँच जाएव। दस बजेमे खुआ-पीआ कऽ आराम करए छोड़ देब।’ हँसैत सभ निर्णए कऽ लेलनि। विदा भेलौं।”
रस्तामे झगड़ाक जड़ि ताकए लगलौं। एते तँ विसवास रहबे करए जे जहिना चोर फँसबैले सिपाही घेराबंदी करैत अछि तहिना जाल तँ लगबै पड़त। मन पड़ल दोसक गप। दोस कहने रहथि जे अपना सभ कारोवारी छी तेँ कोट-कचहरीसँ सदति काल बचैक रहैक चाही। नहि तँ अनेरे ओझरा जाएव कारोवार कारोवारे रहि जाएत। मुदा उखरिमे मूड़ी देलौं तँ मुसराक डर केने काज चलत। तहन तँ जहाँ धरि संभव हएत तहाँ धरि बँचब। अखनो समाजमे कहाँ कियो खुलि कऽ ताड़ी-दारू करै छथि। चोरनुकबा जरूर करै छथि। मुदा कि हुनका सभकेँ अपना आँखिमे लाज नहि छन्हि? जरूर छन्हि। मुदा जे होउ, जिनगी भरि जहलेमे किअए नै रहए पड़ै मुदा खच्चरपुर बला सभकेँ सिखाएब जरूर। तेहेन कऽ नाङरि सुररबै जे इलाकामे मुँह उठाएब मुसकिल भऽ जेतनि। दसटा बदमास बेसीसँ बेसी गाममे हएत पचासटा आनि कऽ रखि देवइ। मुदा सिखेबै जरूर।
आठ बजे गामक सीमामे बरियाती प्रवेश कऽ गेल हमहूँ सभ साकांच रही। दरबज्जापर पहुँचते स्वागतक संग बैसारक कार्यक्रम शुरू भेल। दाय-माय वरकेँ अरिआति आंगन लऽ गेलीह। बरियातीक बीच प्लेटमे फ्राइ कएल मखान पहुँच गेलनि। दुनू समाजक (बरिआती-घरवारी) बीच मखानक मिठासक संग गप-सप्प शुरू भेल। गाममे कते सार्वजनिक स्थल...., कोन-कोन शिक्षण-संस्थान...., अस्पतालक की स्थिति...., गाममे कते किसान परिवार....., कते नोकरिहारा....., जोतसीम जमीन कत्ते...., बोरिंगक संख्या कत्ते....., खेतीसँ अलग कारोवारी परिवार कत्ते....., कते परिवार गामसँ पलायन कऽ रहला अछि कते दोखतरीपर आबि-आबि बैसि रहला अछि....। बड़ी जुमा कऽ महावीर जी लंकासँ आम फेकने रहथि से ने तँ खास भेलि अछि। मुदा किछु गोटेक मन लगलनि। भाँगक मातल मनमे उठए लगलनि जे मखानोक लाबा पानिये पीवि भेल। ओ तँ अपने जिनगी भरि पानियेमे रहल अछि तँ तइसँ नीक जे दू घोंट बेसिये कऽ पानि पीवि लेब। बिना मुंगबे मन थोड़े मानत। पेटेटा भरने नै ने होइ छै, मनो ने भरक चाही। मुदा फेरि मनमे उठनि जे अखन कोनो उसरि गेल।
अंगनाक ओसारपर बैसि हिरदय काका आँखि खिरा-खिरा तकैत तँ देखैत पाँचो बेटीक सिनेह। जेठकी बहीन माइयक पीठिपर अंगनाक चीज-बौसकेँ घर रखैत तँ घरसँ निकालि आंगनमे रखैत। मझिली तँ चारू बहीनिक लेधे-गोधक आइ-पाइमे भिनसरसँ अखैन धरि लागल अछि। सझिलियेकेँ की कहबै, बेचारीकेँ अखैन धरि लागल अछि। सझिलियेकेँ की कहबै, बेचारीकेँ लगले हाथमे नीपौन देखै छी तँ लगले सिनुर-पिठार। चारिमकेँ तँ गीतिहारियेक आगू-पाछू करैत-करैत नाको-दम भेल छै। घुमैत नजरि हिरदय कक्काक बेटी-जमाएपर गेलनि। ओना देखिये कऽ केने रहथि ते देखैक ओ रूप नहि देखैक रूप रहनि मौलाइल गाछक पोनगल ससारिमे खिलैत फूल देखि। हारल मनुष्यक जीत। जे कहियो कन्यादानकेँ उच्च कोटिक श्रेणीमे गनल जाइत छल ओ आइ समाजमे बेटियाह वंश बुझि वियाहसँ वंचित भऽ रहला अछि। वाह रे हमर समाज।
हम अपना काजक पाछू तबाह। पच्चीसो काजकर्तापर मलेटरीक नजरि। तीन कदम आगू तँ एक कदम पाछु भऽ सावधान। ओना अगुआएल-पछुआएल बरियाती समयेपर प्रवेश कऽ गेल छलाह मुदा, समाज दरबज्जापर जहाँ-तहाँ छिड़िआएल। दू-चारि मिलि-मिलि अड्डा जमौने। जहि पाछु एक-एक काजकर्ता लागल। ताड़ी जकाँ तँ इंग्लीसक गोष्ठी नमहर नहि होइत। रंग-विरंगक पीनिहार रंग-विरंगक वस्तु।
साढ़े नअ बजे बरियाती भोजन कऽ ओछाइन पकड़ि लेखा-जोखा करए लगलाह। हराएल-बरियातीक खोज शुरू भेल। साढ़े दस बजे घरवारी बरयाती बीच समझौता भेल जे जते समए आगू बढ़ि ओहिसँ पैछलाकेँ छोड़ि भोजने हुअए। सएह भेल। मुदा कमाल भऽ गेल। भोजन शुरू भेल पेशाव करैले उठब शुरू भेल। पेशाब खोलैबला दवाइ पानिमे मिला टीपि-टापि कऽ दस गोटेकेँ पीया देल गेल। एक गोटेकेँ देखि छोड़ि देलौं, दोसरोकेँ छोड़ि देलौं। मुदा जहिना चुट्टीक धारी चलैत तहिना जखन शुरू भेल कि बुढ़हा झामलाल सबहक बीच जा कहलिएनि जे अखन धरि घरबैया समाजसँ कोनो तिरोट भेल हुअए से कहूँ? एक्के-दुइये पान-सात गोटे उपदेश दैत बजलाह- “अखन जे हवा-बिहाड़ि उठि गेल अछि तहिमे अहाँ लोकनिकेँ धन्यवाद दैत छी। हमहूँ सभ यएह गप करै छलौं गणेश जीक भक्त सभने छेनाक मिठाइ खाए मुदा ओ तँ अखने लड़ूए खाइ छथि। जुग बढ़ि गेने लोको उधिया जाएत। जे सुआद खाजा-मूंगवाक अछि ओ डिब्बाबला रसगुल्लाक हएत। ओ तँ भाँज पुराएव छी। कहलिएनि- ‘जाधरि अपने लोकनि ऐठाम छी ताधरिक नीक-अधलाहक जबावदेह घरवारी हेताह मुदा, अहाँ सभ जे उकठ करब, तहन.....।’ की भेल, की भेल? दोसर वरियातीक सबहक छिछा-बीछा चलि कऽ देखियनु? वामा करे जे पड़ि जे जाँघ कुड़ियबैत रहथि से उठले ने होइन। मुदा कासपरक दहीक ढकार फुर्ती आनि देलकनि सभ कियो उठि दोसर पंडलमे पहुँचलाह तँ देखलनि जे एना किअए रेलवे स्टेशनक टिकट खिरकी जकाँ दुनू दिसक पाँती लागल अछि। मुदा से दसे-बारहे गोरेकेँ देखै छी। खेवा-पीबामे जँ किछु गड़वड़ी रहितए तँ होइतै। सेहो ने देखै छी। एक-दोसरसँ आँखि मिला प्रश्न पुछैत तँ मूड़ी डोला जबाव भेटनि। मुदा किछुओ दोस जाबे ककरो नै अछि ताबे एना भऽ किअए रहल अछि। अान ठाम कहाँ भेल। मुदा सोझे माने बिना आधारे कोनो बात मानियो लेब तँ उचित-नहिये। आमपर फेकल गोला जकाँ जे लागियो सकैए आ हुसियो सकैए। इम्हर आराम करैले सेहो मन कछमछाइन। दोहरौिलएनि- ‘जँ अपने लोकनि समाजक सीमा रेखा तोड़ि घिनबए चाहब तँ समाजोकेँ ई अधिकार बनै छै जे सीमाक सिपाही जकाँ अपन मातृ भूमिक रक्छा करए। कबछुआ जकाँ भकभका कऽ तँ लगलनि मुदा, घिनबैक कारण बुझबे ने करथि। खिसिया कऽ एकगोटे बजलाह- ‘कोन-कहाँ बोतल पीवि-पीवि बरयाती औताह आ सभ किछु (समाजिक गुण)केँ खेने-पीने चलि जेताह। एको क्षण ई सभ जीबै नै देताह।’ कहि छोटका भाएकेँ कहलखिन- “बौआ, जिनका जे मन फुड़तन से करताह। अपन इज्जत-आबरू अपना हाथमे लऽ चलह। एक्के-दुइये ससरि-ससरि घरमुँहा हुअए लगलाह।
