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जगदीश प्रसाद मण्डल

मोड़पर (धारावाहिक उपन्यास)


तेसर पड़ाव
पिताक विचार सुनि देवनक मनमे जीवनक ओहने प्रेम जगल जेहने अपन स्वतंत्र जीवन भेटलापर जगैए। अपन कमाइपर जे करब सएह ने भेल अपन जीवनक कर्म। माता-पिताक संग बाल-बच्चाक सेवा करब सभक ऊपर अछि। किए तँ हम सभ पारिवारिक जीवन जीबैक अभ्यासी छी। विचार तँ असान अछिए सेवा करब, कहब। मुदा सेवाक जखन विराट रूप सोझाँमे अबैए तखन मनमे थरथरी अबिते अछि। ओना थरथरियो दू रंगक होइए, पहिल होइए भरक थरथरी आ दोसर होइए निर्भरक थरथरी। निर्भरक थरथरीक विकल्प यएह ने भऽ सकैए जे अपन जेते शक्ति अछि तइ अनुकूल सेवा करब। मानि लिअ जहिना युग-युगान्तरसँ गुलामी शासनक संग गुलामी बेवस्थामे परिवारक परवरिस भेल अछि, तही अनुकूल ने सभक जीवन बनल अछि। ओही सीमाक दायरामे ने अपन जीवनक संचालन करब। देवनक मनमे उठल जे बाबू कहला अछि जे जाबे तक मनुक्खकेँ अपन हाथ-पएर चलबै-जोकर साधन नइ भऽ जाइए, ताबे धरि ओकर हाथ-पएर ओहिना छटपटाइए जेना पानि बिनु माछ। एकाएक देवनक मनमे कलकत्ताक प्रति राग जगल जइसँ परिवारसँ विराग भेल। विराग जगिते देवनक मन मने-मन कहलक- 'बाबूकेँ देखा देबैन जे देवन केहेन ढहलेल-बकलेल अछि। जखन देह धुनने सभ कथुक प्राप्ति लोक करिते अछि तखन देवनो किए ने करत। कमाइले जखन घरसँ निकैल रहल छी, तखन कमा कऽ गामबला सभकेँ देखा देबैन जे देवनो सन लोक गाममे अछि।'
ओना, वैचारिक रूपमे देवन पछुआएल अछि, मुदा कलकत्ता जा कमेबाक विचार जहियासँ मनमे जगलै आ रसे-रसे बढ़ए लगलै तहियासँ जेना देवनक मन छलाँग मारि दौड़ैक कोशिश करए लगल।
प्रात: काल, माने दोसर दिन, सूर्यक दर्शन होइते देवनक मन ओहिना ललौन भऽ गेल जहिना दुरागमन दिन कनियाँकेँ होइए। भाय, मन ललौन हेबे ने करतैन, परिवार गढ़ैक भार ने कन्हापर लऽ निकैल रहल छैथ। ओना, जलेसरी माने माए, बेटाकेँ लगले बिसैर गेली जे देवन आइ घरसँ निकैल कलकत्ता जाएत। बिसरैक कारण भेलैन जे जहिना उड़न्ती सुनने छेली जे देवन कलकत्ता जाएत तहिना पतिक मुहसँ सुनि पुरन्ती सेहो भइये गेल छेलैन मुदा देवनकेँ लगमे देख बिसैर गेली। जँ मन रहितैन तँ भोरेसँ जहिना विदागरी कनियाँक भोजनक ओरियानमे माए लगि जाइ छैथ तहिना ने जलेसरियो लागि गेल रहितैथ, मुदा से नहि भेलैन। जलखै बेरमे देवन बाजल-
"माए, आइ हम चलि जेबौ।"
देवनक मुहसँ 'जाएब' सुनि जलेसरीक मन एकाएक चौंकलैन जे हाइ रे वा! देवनकेँ ते वएह जलखै देलिऐ जे सभ दिन दइ छेलिऐ..! अपन बिसरबपर जलेसरीक नजरिये ने पड़लैन। नजैर पड़ि गेलैन सोझामे बैसल देवनपर। बजली-
"से जे तोरा जाइ-के छेलह ते भोरे कहि दइतह ने?"
भावुक माइक विचार सुनि देवनक मनमे उठल जे मुँहतोर चाबुक मारब उचित नहि, बाजल-
"बिसैर गेल छेलौं, तँए नै कहलियौ।"
उपदेशक बनि जलेसरी बजली-
"एना कियो बिसरै। एहने बिसरनिहारकेँ ने लोक भुसकौल कहैए।"
उपदेशी माएकेँ देवन उत्तर देलकैन-
"माए, घर-आँगनमे कियो थोड़े भुसकौल होइए, ई तँ काज करैक जगह छी। भुसकौल होइए लोक इसकूल-कौलेजमे।"
देवनक विचार नीक जकाँ जलेसरी नहि सुनली। किए तँ मनमे नचै छेलैन जे जलखै बेरमे जे देवनकेँ भेल, से भेल मुदा कलौ खाइ बेरमे पाँचटा तड़ुआ बेटाकेँ खाइले नहि देब, एहेन अदत्त माए की हमहीं छी। अपन चूक मेटबैत जलेसरी बजली-
"बौआ, की हेतइ अपन घर छिअ। जे किछु खाइले देलियह ओ बिसैर जइहह जे माए हमरा घरसँ विदा हेबा दिन एहेन खाइले देने छल। भगवान नीक करथुन जे जहिना हँसैत घरसँ जाइ छह तहिना दुनियाँमे केतौ रहिहह, अहिना हँसैत रहिहह।"
माइक विचारकेँ असिरवाद बुझि देवन किछु ने बाजल। बाजल तँ किछु ने देवन, मुदा भूखल गाइयक बच्चा जकाँ गाए दिस माने माए दिस, जरूर तकलक। बेटाक देखबकेँ जलेसरी देवी जकाँ बिचड़ए लगली-
"बौआ, हम दुनू परानी तँ बुढ़ भेलयह। बुढ़क ठेकाने कोन.! कहियो आँखि देखब छोड़ि देत, तँ कहियो कान सुनब, मुदा परिवारक तँ तूँ से नहि भेलह। तोहीं ने अपन भार बुझि श्रवणकुमार जकाँ माता-पिताकेँ सातो धाम कन्हापर भार बना देखेबह।"
माइक बात सुनि देवनक मन भीतरे-भीतर हिल गेल, मुदा हिलबकेँ थीर केलक। हिलब माने मनक हिलब जे दू रंगक होइए, एकटा होइए नीक हिलब माने जीवनोपयोगी आ दोसर होइए अनुपयोगी। काजक बात जे मनकेँ संकल्पित करैए ओ भेल जीवनोपयोगी आ दोसर भेल कोनो अधला काजमे अपन जीवनक समयकेँ नष्ट करब जइसँ जीवन गमा हिलब। जेकर भरपाइ जीवनमे नहि भऽ पबैए जइसँ जीवन खलियाएल जकाँ रहि जाइए। एहने हिलब दोसर भेल। से तँ देवनमे छल नहि। माइयक विचारकेँ अंगीकार करैत देवन बाजल-
"माए, जखन जे मनमे नीक-अधला होउ, कहिहेँ। हमरासँ जे काज भऽ सकत हम सएह ने पुरा पेबौ, मुदा रोगक भोग जहिना सभकेँ भोगए पड़ै छै से तँ भोगए पड़तौ। कियो केकरो थोड़े बाँटि पबैए।"
अपना जनैत अपन विचारक भार देवन माएपर फेकलक, मुदा माइयो तँ माइये ने परिवारक भेली। माए बजली-
"बौआ, आब तोहूँ जुआन-जहान भेलह, कमेबह-खटेबह परिवारकेँ देखबह तखन ने अपनो मनमे बिसवास हएत। तोरो बिआह-दान हेतह। बाल-बच्चा हेतह, सभक निमरजना तोरे ने करए पड़तह।"
ओना, जलेसरी परिवेशक प्रवाहमे बाजल छेली, मुदा अपन परम्पराक जे दायित्व माता-पिताक निर्धारित भेल चलि आबि रहल अछि, ओ अछि, बेटा-बेटीक घर बसा माने बिआह-दान भेला पछाइत, अपनाकेँ बेटा-बेटीक भार वा कर्जसँ मुक्त हएब।
देवनक मनमे कलकत्ताक रंग-बिरंगक रूप नाचिये रहल छल, जइसँ मन प्रस्फुटित प्रफ्फुलित भइये रहल छल, बाजल-
"माए, जहिना कुशेसर भैया पाँचे बर्खक कमाइमे ईंटाक घर बना लेलैन आ बहिनक बिआहो कऽ लेलैन तहिना हमहूँ कमा कऽ देखा देबौ। अपना तँ बहिनक बिआह अछि नहि, तँए दस कट्ठा खेते कीनि लेब।"
अखन धरि बोनिहारिन जलेसरीक मनमे सपना बनल छेलैन जे अपनो दस कट्ठा खेत होएत जइसँ परिवारक परवरिस अपना आगिये-पानियेँ निमाहि अपन जीवन शिखरपर चढ़ितौं माने किसानक जीवन पबितौं, मुदा जिनगीक अन्तिम पड़ावमे माने बुढ़ाड़ीमे जखन बेटाक मुहसँ जलेसरी सुनलैन तखन मनमे ओहने बिसवास जगलैन जेहेन भोरक सपना (कल्पना) देख कियो अपन सपना पूर्तिक दिशामे बढ़ि क्रियाशील होइ छैथ। जलेसरी बजली- "बौआ, अपना जँ ओतबो खेत-पथार होइत जइसँ सागो-पात खा गुजर करितौं माने जीवन चलैबितौं, तँ अपनो परिवारकेँ ने किसान परिवारक मानो-प्रतिष्ठा होइत आ अपनो मान-मरजादा बढ़ैत।"
देवनक मन तेना उड़ल छल जे माइक बात सुनबे ने केलक। मुदा माइयक प्रश्नक उत्तर तँ बेटाकेँ देब छल। बाजल-
"माए! ऐ हाथ-पएर सँ जे भऽ सकत, तइमे हम थोड़े बेइमानी करब जे तूँ बैमान कहमेँ। जे कमेबौ तोरा हाथ-के देबउ।"
बेटा कमाएल पाइक आशा देख जलेसरीक मनमे ओहिना आशाक आश लागि गेलैन जेना निर्वस्त्रकेँ कपड़ा दोकानमे मनमाना कपड़ा लइक अधिकार भेटैए। वृन्दावनक कदमक गाछक झूलाक आश जहिना कृष्णकेँ तहिना ब्रजवालाकेँ जे लगै छेलैन तहिना देवनक आश जलेसरीकेँ आ जलेसरीक आश देवनकेँ लागि रहल छल। सभ जनिते छी जे कृष्ण ओहने ने गोपालक छला जेहेन एकटा ओहन लोक जे गाइयक जीवन सदृश अपन जीवन धारण केने पंचामृतो दइए आ अपन पंचामृतक सिरजन करैत अपनो जीवनक दिनचर्या निमाहिते अछि। अपन भार उतारैत जलेसरी बजली-
"बौआ, मरैकाल नानी जहिना कहली तहिना हम ओकरा आँचरक-खूटमे गीरह बान्हि मनमे रखने छी। कोन दिन ले राखब। कहुना हम भेलियह ते माइये बाप ने भेलियह। अपना मुहसँ जँ अवाच निकालब आ तोरा विसा जा, तँए एहेन कि हमहीं गौ-खौक माए हएब जे तोरा अधला हुअ देबह।"
माइक बात सुनि देवनक मन मानि गेल जे माइयो अपन स्वीकृतिक विचार दए रहली अछि। देवन बाजल-
"माए, घाट-बाट जाइक अछि तँए सभ चीज तूकपर माने समयानुसार काज कर। खेला पछाइत कनी ओछाइनपर हाथ-पएर नहि मोड़ि लेब सेहो नीक हएत।"
जलेसरी बिना किछु बजने अपना काज दिस बढ़ि गेली। देवनक मनमे उठल जे पितोसँ किए ने मुँह-मिलानी करैत घरसँ निकली। ओना, जलेसरी देवन लगसँ हटि अपन भानसक ओरियानमे लागि गेली मुदा मन जेना सीकपर लटैक गेल होनि तहिना भेलैन। मनमे ई उठलैन जे जहिना अण्डा बेचनिहारकेँ अण्डाक लाभसँ बकरी कीनैक मन भेलैन जे बकरीक पोसक लाभसँ गाए कीनब। मुदा जलेसरीक मनमे से नहि उठलैन। उठबो केना करितैन? जीवनक अन्तिम पड़ावमे माने बुढ़ापामे पहुँच जलेसरी देख रहल छैथ जे एते दिन तँ अपनो दुनू परानीक देहमे हूबा छल जे रसे-रसे निच्चेँ मुहेँ ससैर रहल अछि। एकटा बेटा देवन अछि, सेहो बकलेले-ढहलेल अछि तेकर आशा केते करब। लगले फेर अपने मन कहलकैन जे किछु अछि अपन तँ आशा वएह अछि। कियो नीके अछि आकि सुन्नरे अछि, ओ अपना केते काज देत। मुइलो पछाइत मुँहमे मुखवाती वएह ने लगौत..! अभावसँ अपन जर्जर जीवन देख जलेसरीक मनमे उठलैन जे कहुना देवना एतबो कमा लिअए जे दुनू परानीकेँ माने माता-पिताकेँ मरैबेर तक भूखे पेट नइ तड़पऽ दिअए। घरे बनाएत आकि खेते कीनत आकि अपन बिआहे-दान करत, ओ तँ अपन करत, अपना ले करत। ओना, माता-पिताक सेवा सेहो अपने कर्तव्यक सीमामे अछि मुदा तेकर फलाफल तँ दोसरेकेँ ने भोगए पड़ै छै। अखन तक जइ आशासँ देवनक सेवा केलौं तइमे जे ओ जीबैत भरि रोग-वियाधि आ भूखसँ तरसऽ नहि दिअए तँ बुझब जे बेटा निमिते जे सेवा केलौं तेकर फलाफल अपनो मेवा भेटबे कएल।
अपन आशाक फल देख जलेसरीक मनमे मातृत्व शक्ति जगि गेलैन। जइसँ विचार उठलैन जे भगवान देवनाकेँ सुमति देथुन जे जाबे ओकरा कमाइक लूरि नीक जकाँ नहि भेल अछि से पहिने सीख लिअए। जखने काज करैक लूरि भऽ जेतै तखने ने ओ लूरि ओकरा हाथ पकैड़ करेबो करतै। काजे ने राज छी, राजे ने काज छी। जखन ओकरा कमाइक लूरि भऽ जेतै तखन ओकरा ओइ जोकर अपन बुधियो ने भऽ जेतइ। जखन से भऽ जेतै तखन ओ अपन बुधि-विवेकसँ विचार करत जे बेटा तँ तखन ने बेटा जखन ओ बेटा-धर्मक पालन करत। जखने से करए लगत तखने ने अपन विवेको कहतै जे जाबे जीबैक साधन नहि छल ताबे बाहर जाइक खगता छल मुदा जखन से भऽ गेल तखन ओकर व्यय धरमोचित्त नहि करब तँ ओकरो माने साधनकेँ ने पापोचित्त उपयोग हएत। दुनियाँक कतौक बासी किए ने होइ आ केतौसँ केतौ बास किए ने करी, मुदा जखन जीवनक (मनुक्खक जीवनक) बीच बास करए लगब, तखन वएह ने अपन बासभूमि मातृभूमि रूपमे सेहो लतरत-चतरत। मन बहलबैक खियाल अलग छी, मुदा तँए सही क्रिया नहि छी सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। कहैले अपना सभ तँ कहिते छी जे सुख-दुखमे सभ संग छी, मुदा दुख केना सुख बनत माने दुखक संचरण सुखमे जे हएत, तइ बीचक जे प्रक्रिया अछि तइमे के केतए छी, सेहो ने देखए पड़त। ओना, सभ जनिते छी जे जे जन्म लेलक से मरबे करत। तहूमे मनुक्खक जिनगीए केतेटा अछि। तहूमे केते कालक गारंटी अछि? क्षणोमे क्षणाक तँ होइते अछि। एकटा भौतिक विज्ञानकेँ जँ ताकए निकलब तँ दमाइन जकाँ पन्ना-मे-पन्ना आ सिर-मे-सिर तेते भेटत जे सही सलामत दमाइन उखाड़ि देवउठौन पाबैनमे डाल-डाली साजि लेब, बाल-बोधक खेल थोड़े छी। ई मानि लेब जे भौतिक विज्ञानक पूर्व पीठ अध्यात्म विज्ञान छी जेकरा जीवन विज्ञान सेहो कहै छिऐ, मुदा ओ लगले थोड़े बुझिमे अबैए। खाएर जे आबए मुदा जलेसरीक मनमे एते तँ खुशी उठिये गेलैन अछि जे बेवहारिक जीवनमे नारी माने बेटी, तीन तरहक सहयोगीक जीवनक संग जीवन बितबैए। माने भेल माता-पिताक बीच जन्मसँ लऽ कऽ जाबे बिआह-दान नहि भेल रहल। बिआह-दानक पछाइत माता-पिताक रूपमे सासु-ससुरकेँ पबै छैथ आ सहयोगीक रूपमे पतिकेँ। ओना, अरबो-अरब लोकमे अरबो-अरब जीवनक संग अरबो-अरब रूप-विधान सेहो अछिए मुदा अखन से नहि। अखन एतबे जे साधारण दृष्टिये जे जीवन चलि रहल अछि, बस तेतबे।
माता-पिताक बीचक जे बेटीक जीवन अछि ओ सेवा रूपमे भावक अछि जइसँ जे अभिभावकक बेवहार बनल अबैए, माने बेटीक जीवनमे जे अभिभावकक बेवहार रहैए, सासुर एला पछाइत ओइमे अनेको दिशा दिस परिवारक बेवहार अबिते अछि। माने किछु एहेन परिवार अछि जइमे पुतोहुकेँ बेटी सदृश बुझि-मानि माता-पिता माने सासु-ससुर अपन ओहन आचरण बना चलै छैथ जइसँ परिवारमे बेटा-पुतोहुक बीच प्रेम बढ़ने विवाद कम अछि। मुदा दोसर तरहक जे परिवार अछि, माने ओहन परिवार जइमे बेटाकेँ तँ अपन रक्त-बीज बुझि एक तरहक बेवहार रखनौं छैथ मुदा पुतोहुकेँ आन बीज रूप बुझि तइ रूपमे नहि बुझै छैथ, जइसँ परिवारक गहींर-सँ-गहींर दोखपूर्ण वातारणक सेहो सृजन होइते अछि। ओना, बहुसंख्य परिवार गाम-समाजक एहेन अछि, जइमे माता-पिता अपना खुशीसँ बेटा-पुतोहुक सम्बन्ध तोड़ि भीन-भीनौज भऽ जीवन भरिक अपन सभ रीति-नीति तियागि दइते छैथ। खाएर गामो-गामक आ गामो-घरक अपन-अपन लीला अछिए आ सभ अपन-अपन लीलाक लीलाधर छीहे, कियो अपन-अपन जीवन लीला पसाइर वृन्दावनक कृष्ण जकाँ रास रचैत रहथु। जलेसरीकेँ तइ सभसँ कोन मतलब छैन। लोककेँ मरैत देखै छथिन तँ जलेसरीकेँ अपनो मनमे होइ छैन जे जहिना सभ मरैए तहिना अपनो मरब। ई थोड़े बुझै छैथ जे केकर मृत्यु केहेन भेल? सोझे प्राण तियागकेँ मृत्यु बुझै छैथ। लगले फेर ईहो आशा माने जीवनक आशा, सेहो देखलासँ माने जीवितकेँ देखलासँ, जागिये जाइ छैन जे जान-प्राण पेब जखन जिनगी पेलौं तखन मरब किए। जइसँ मृत्युक डर मनसँ हटिये जाइ छैन आ सोझामे जे दुनियाँ देखै छैथ तइमे अपन आस-बास-चास तकैत जिनगी दिस बढ़ए लगै छैथ। तखन ई आशा, माने जिनगीक आशा, ओहिना जीब जाइ छैन जेना कहियो मरबे ने करब। जहिना सभ जीबैए तहिना हमहूँ जीबे करब। बेचारी जलेसरी बुझियो केना पेबती जे जीवनक मृत्यु सिर्फ चेतन शक्ति हटि चेतन शून्य बनबे टा मृत्यु नहि छी। ई तँ पंचभौतिक शरीरक क्रियाक बीचक भेल। जे अखन तक आँखि ताकि दुनियोँ देखै छिऐ, कानसँ किछु सुनितो छी आ हाथ-पएर लारि-चारि भूखो-पियास मेटबै छी।
शरीरक संग मनुक्खमे आत्माक बास सेहो अछिए। जेकर अपन दुनियोँक रंग आ रीति-नीति सेहो छइहे। जेकरा पकैड़ मनुख अपन मानवीय जीवनक सार्थकताकेँ पकड़ै छैथ। आँखि बन्न केलाक पछातियो दुनियाँ देखै छैथ आ कान बन्न केलोपर सभ किछु सुनै छैथ। खाएर जे छैथ, तइ सभसँ जलेसरीकेँ कोन मतलब छैन। मतलब एतबे छैन जे आइ देवन घरसँ निकैल परदेश जा रहल अछि, केतए रहत, की खाएत-पीअत आ केना सुतत-बैठत.? ऐठाम आबि जलेसरीक मन हारिकऽ हहरए लगै छैन। मुदा लगले मन ईहो कहै छैन जे देवन किछु छी, केहनो बकलेल-ढहलेल किए ने अछि मुदा छी तँ अपने कोखिक सन्तान ने..! ओकरा जँ कोनो तरहक मने वा देहेमे चोट-कचोट लगतै आ देहक रूइयाँ तड़पतै तँ ओइसँ की अपन मन नहि तड़पत.? ऐठाम अबैत-अबैत जलेसरीक मन देवनक ओइ आश भरल जीवन लग पहुँच गेलैन, जे अखन तक सुतल छेलैन। जलेसरीक मनमे उठलैन जे औझुके दिनक भोजन (खाएब) देवनकेँ गामो मोन पाड़ने रहत। जखने गाम मनमे औत तखने ने मातो-पिता आ सरो-समाज मोन रहतै। तँए आइ देवनकेँ ओहन खेनाइ ओइ रूपेँ खुआएब जे सभ दिन मोन रहतै। मोने टा नहि रहतै, कलकत्तामे रंग-रंगक मिठाइ तँ देखत मुदा रंग-रंगक तड़ुआ-बघड़ुआ मिथिला जकाँ थोड़े देखत। जँ से रहैत तँ एकोटा रोहु कलकत्ताबला अनको खाए दइत। गुण अछि जे तड़ुआक महिरमे ने बुझैए।
देवन अपन विचारक अनुकूल सोझे पिता लग पहुँचल। पिताक हाथ तँ काजमे लागल छेलैन मुदा मनमे देवनक जीवनक गति तेना नाचि रहल छेलैन जे विचार घनघना रहल छेलैन। ओना, अभ्यस्त जीवन रहने धनुषधारीक काज तँ अपना ढंगेँ चलि रहल छेलैन, मुदा चेतनशून्य जकाँ चलै छेलैन। माने ई जे मन केतौ छेलैन माने देवनक जीवन देख रहल छेलैन आ दैनिक क्रिया, दिन-दिनक काज, हाथ कऽ रहल छेलैन। अभ्यासो तँ अभ्यास छीहे। जखने अभ्यास बनैए तखने अभ्यासी जीवन बनैत अभ्यस्त बनियेँ जाइए। जखने अभ्यस्त कर्म समयक संग पकैड़ आगू बढ़ैत चलैए तखने ने ओ भेल समयक गतिक संग गति पकैड़ गतिशील जीवन बनि चलब।
ओना, जाबे तक देवन माइक संग गप-सप्प करै छल ताबे तकक बोलो-वाणी आ विचारोक जे रूतबा छल ओ पिता दिस मुड़ि रसे-रसे रसाइत रस बनि रिसए लगलै। अखन धरिक पिताक सिनेहक स्वरूप देवनक मनकेँ तेना मथि देलकै जे भयावह रूप बनि देखते देवनकेँ मनमे बघजर जकाँ लागिये गेल। जइसँ कोनो तरहक किछु विचार मुहसँ निकलबे ने कएल।
देवनक मनकेँ जहिना अपन बघधल विचार पकैड़ नेने छल, जइसँ बकार बन्न छेलै, तहिना धनुषधारीकेँ सेहो देवनपर नजैर पड़िते बधजल जकाँ मनमे कुदए लगलैन। धनुषधारीक बधजलक कारणसँ अपने मनमे ग्लानि उठए लगलैन जइसँ अपना ऊपर तामसो उठैन आ भयावह रूप देख डरो होइन। ग्लानिसँ गलित होइत मन कहलकैन, 'की अपने अखनो तक अपन सीमा बुझि सकलौं अछि। एकटा बेटा अछि सेहो गाम-घर छोड़ि कलकत्ता जा रहल अछि। नहि जाएत तँ खाएत की आ जीवन केना चलतै। तहूमे तेहेन बकलेल-ढहलेल अछि जे बिआहो-दान हेतइ की नहि हेतइ। अखन अपने दुनू परानी जीबै छी तँ कहुना-के संग मिलि जीवन बीता लइ छी। मुदा जखन परोछ हएत तखन केना जीवन चलत।'
धनुषधारीक मन विचारसँ तेना घेरा गेल छेलैन जे अपनहि बेकाबू बनि गेल छेलैन, तँए मुहसँ कोनो विचार निकालब, उचित-अनुचितक बीच फँसि गेल छेलैन। तैबीच मनमे ईहो भय होनि जे जइ देवनकेँ गामक लोक बकलेल-ढहलेल बुझैए ओ केना कलकत्ता सन शहर-बाजारमे रहि पौत। तेते गाड़ी-सवारी चलैए जे बुधियारोकेँ जान बँचब कठिन रहैए, देवन तँ सहजे देवन छी..! आगू बढ़ि अपने मन कहलकैन माने धनुषधारीक मन कहलकैन- जखन देवन कलकत्ता पहुँच जाएत तखन चिट्ठी पठबैले सेहो कहि देबै आ ईहो कहि देबै जे सप्ताहमे नहि तँ पखो-पख जरूर चिट्ठी लिखए।
एकाएक धनुषधारीक धियान अपन वंशपर तड़ैप ओइठाम पहुँच गेलैन जैठामसँ अपन जीवनक बात मोन पड़लैन। अपन पैछला पीढ़ी माने बाबासँ ऊपर, बिनु देखल छेलैन, तँए जहिना मनमे जगलैन तहिना बिलीन भऽ हेरा गेल छेलैन। जहिना कोनो सुनल देवेस्थान आकि तीर्थेस्थान मनसँ हेरा जाइए माने बिसैर जाइ छी, मुदा आँखिक देखल ता-जिनगी थोड़े हेराइए, ओ तँ छठियारीक दूध जकाँ मृत्युक सीमा धरि मोन रहैए। जखन धनुषधारी पाँच बर्खक भेला तखन बाबाक संग पितो आ दादीक संग माइयोकेँ संगे-संग खेतक आड़िपर जा खेलाइ छला आ सभ कियो काज करै छला। ओही जीवनमे बाबो आ दादियोक मृत्यु देखलौं। पछाइत पिताक संग अपनो ओहिना जीवन बितबए लगलौं जहिना बाबाक संग पिताकेँ बीतल छेलैन। आइयो ओहिना पेट-बोनिया बनि जीवन जीब रहल छी। अहीठाम सँ ने देवन परिवारक रूखिकेँ मोड़ए चाहैए। खगतो छइहे। तइले ते जेतए-जेतए परिवार घुड़ैछ गेल अछि तेतए-तेतए बिनु मोड़ देने काजो चलब तँ कठिन अछिए। एकाएक धनुषधारीक मनमे जगलैन जे किए ने आइ देवनेसँ सभ किछु पुछि अपन हिसाब माने पिताक दायित्वक हिसाब, फड़िछबैत चली। जिनगी की छी आ एकर मुक्ति केना हएत? यएह ने जे नहि हमर बंकियौत दुनियाँपर रहल आ ने दुनियाँक हमरा ऊपर रहलै। जहिना खाली हाथ आएल छी तहिना सिकन्दर जकाँ दुनू हाथ झुलबैत चलि जाएब। तइले किए केकरो लटपटीमे लटपटाएल जिनगीक हिसाब राखब। धनुषधारी बजला-
"बौआ, कलकत्ता जेबे करबहक?"
धरती दिस गड़ल देवन अपन नजैर (आँखि) उठा अकास दिस ताकि बाजल-
"बाबू, कुशेसर भैयाकेँ कहि देलिऐन, ओहो लऽ जाइले तैयार भेला। तखन?"
धनुषधारी-
"तोरा बुते काज कोन कएल हेतह?"
जहिना कुशेसरक मुहेँ सुनने छल तहिना देवन बाजल-
"जखन दुनियाँक आने मनुख जकाँ अपनो जन्म भेल अछि तखन दुनियाँमे कोन काज एहेन मनुक्खक अछि जे अपना बुते नहि हएत।"
देवनक बात धनुषधारी बुझि गेला जे बिनु बुधिक सुगो जखन सीताराम, सीताराम राधेश्याम, राधेश्याम करिते अछि, चिट्ठी-पत्तरी सेहो एक राज्य-सँ-दोसर राज्य उघिते अछि तखन देवनो ओही कुशेसरक सिखौलहा सुग्गा जकाँ बाजि रहल अछि। मन मानि गेलैन माने धनुषधारीक मन मानि गेलैन जे देवन कलकत्ता जेबे करत। धनुषधारी बजला-
"बौआ, जखन गाम छोड़ि जाइ छह, तखन सबेर-सकाल गामक सीमा छोड़ि आन गामक सीमा पकैड़ लएह। जएह अपन गाम वा परिवारक सीमा छी, सएह ने दोसर गामो आ दोसर परिवारोक सीमा भेल।"
कलकत्ता जेबाक एक-एक बातक जनतबकेँ माने काजक बातकेँ देवन अखियासय लगल। अखन धरिक जे समग्रता, परिवार वा समाजक प्रति, देवनमे जे किछु आबि रहल छल, ओ समटा एकाग्रक (कलकत्ता जेबाक विचार) बाट पकैड़ नेने छल। पिता लगसँ उठि देवन माए लग आबि बाजल-
"माए, अखन बहुत काज बाँकी अछि तँए पहिने खाइले दऽ दे। ने तँ काजक धुमसाहीमे जखन पड़ि जाएब तखन खेनाइये बिसैर जाएब।"
जलेसरीक अपनो मन मानियेँ रहल छेलैन जे किछु क्षण ले देवन घरबैया अछि, ने ते ओ आब बहरबइये भेल किने। अखुनका खेनाइ बेटा जकाँ अपना सोझामे खुआएब मुदा रौतुका थोड़े खुआ पएब।
अपन रूटिंगक हिसाबे देवन घरपर सँ विदा भऽ गेल। जहिना मनुखदेवा चढ़ने लोकक हाथो-पएर बिनबिना लगै छै आ बुधियो-विचार झुनझुना लगिते छै, तहिना देवनोक भइये गेल छल। काज आ मजदूरी मनसँ हटि देवनक मन ओइठाम अँटैक गेल छल, जैठाम अपने सन भाइ भाइयक दशा रहितो माने कुशेसरक जीवन पाँचे बर्खमे एते काज कऽ लेलक पारिवारिक काज, जइसँ जहिना माए-बाबू चैनसँ रहै छैन, तहिना ने अपनो माए-बाबू छैथ।
नीक-बेजा सोचैक दौड़मे देवनक रास्ता कटि गेल। देवनकेँ देखते कुशेसरक मनमे खुशीक लहरि उठि गेल। एकटा संगी जँ भेट जाए तँ दुनियाँक भ्रमण वास्को डि गामा जकाँ कइये सकै छी। कुशेसर बाजल-
"बढ़ियाँ केलह जे समयसँ पहिने चलि एलह।"


 

-जगदीश प्रसाद मण्डलजीक जन्म मधुबनी जिलाक बेरमा गाममे 5 जुलाई 1947 इस्वीमे भेलैन। मण्डलजी हिन्दी एवं राजनीति शास्त्रमे एम.ए.क अहर्ता पाबि जीवि‍कोपार्जन हेतु कृषि कार्यमे संलग्न भऽ रूचि पूर्वक समाज सेवामे लागि गेला। समाजमे व्याप्त रूढ़िवादी एवं सामन्ती व्यवहार सामाजिक विकासमे हिनका वाधक बुझि पड़लैन। फलत: जमीन्दार, सामन्तक संग गाममे पुरजोर लड़ाइ ठाढ़ भऽ गेलैन। फलत: मण्डलजी अपन जीवनक अधिकांश समय केस-मोकदमा, जहल यात्रादिमे व्यतीत केलाह। 2001 इस्वीक पछाइत साहित्य लेखन-क्षेत्रमे एला। 2008 इस्वीसँ विभिन्न पत्र-पत्रिकादिमे हिनक रचना प्रकाशित हुअ लगलैन। गीत, काव्य, नाटक, एकांकी, कथा, उपन्यास इत्यादि साहित्यक मौलिक विधामे हिनक अनवरत लेखन अद्वितीय सिद्ध भऽ रहलैन अछि। अखन धरि दर्जन भरि नाटक/एकांकी, पाँच साएसँ ऊपर गीत/काव्य, उन्नैस गोट उपन्यास आ साढ़े आठसाए कथा-कहानीक संग किछु महत्वपूर्ण विषयक शोधालेख आदिक पुस्तकाकार, साएसँ ऊपर ग्रन्थमे प्रकाशित छैन।
मिथिला-मैथिलीक विकासमे श्री जगदीश प्रसाद मण्डलजीक योगदान अविस्मरणीय छैन। ई अपन सतत क्रियाशीलता ओ रचना धर्मिताक लेल विभिन्न संस्थासभक द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत होइत रहला अछि, यथा- विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'गामक जिनगी' लघु कथा संग्रह लेल 'विदेह सम्मान- 2011', 'गामक जिनगी व समग्र योगदान हेतु साहित्य अकादेमी द्वारा- 'टैगोर लिटिरेचर एवार्ड- 2011', मिथिला मैथिलीक उन्नयन लेल साक्षर दरभंगा द्वारा- 'वैदेह सम्‍मान- 2012', विदेह सम्पादक मण्डल द्वारा 'नै धारैए' उपन्यास लेल 'विदेह बाल साहित्य पुरस्कार- 2014', साहित्यमे समग्र योदान लेल एस.एन.एस. ग्लोबल सेमिनरी द्वारा 'कौशिकी साहित्य सम्मान- 2015', मिथिला-मैथिलीक विकास लेल सतत क्रियाशील रहबाक हेतु अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा- 'वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' सम्मान- 2016', रचना धर्मिताक क्षेत्रमे अमूल्य योगदान हेतु ज्योत्स्ना-मण्डल द्वारा- 'कौमुदी सम्मान- 2017', मिथिला-मैथिलीक संग अन्य उत्कृष्ट सेवा लेल अखिल भारतीय मिथिला संघ द्वारा 'स्व. बाबू साहेव चौधरी सम्मान- 2018', चेतना समिति, पटनाक प्रसिद्ध 'यात्री चेतना पुरस्कार- 2020', मैथिली साहित्यक अहर्निश सेवा आ सृजन हेतु मिथिला सांस्कृतिक समन्वय समिति, गुवाहाटी-असम द्वारा 'राजकमल चौधरी साहित्य सम्मान- 2020', भारत सरकार द्वारा 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार- 2021' तथा साहित्य ओ संस्कृतिमे महत्वपूर्ण अवदान लेल अमर शहीद रामफल मंडल विचार मंच द्वारा 'अमर शहीद रामफल मंडल राष्ट्रीय पुरस्कार- 2022'

रचना संसार : 1. इन्द्रधनुषी अकास, 2. राति-दिन, 3. तीन जेठ एगारहम माघ, 4. सरिता, 5. गीतांजलि, 6. सुखाएल पोखरि‍क जाइठ, 7. सतबेध, 8. चुनौती, 9. रहसा चौरी, 10. कामधेनु, 11. मन मथन, 12. अकास गंगा - कविता संग्रह। 13. पंचवटी- एकांकी संचयन। 14. मिथिलाक बेटी, 15. कम्प्रोमाइज, 16. झमेलिया बिआह, 17. रत्नाकर डकैत, 18. स्वयंवर- नाटक। 19. मौलाइल गाछक फूल, 20. उत्थान-पतन, 21. जिनगीक जीत, 22. जीवन-मरण, 23. जीवन संघर्ष, 24. नै धाड़ैए, 25. बड़की बहिन, 26. भादवक आठ अन्हार, 27. सधवा-विधवा, 28. ठूठ गाछ, 29. इज्जत गमा इज्जत बँचेलौं, 30. लहसन, 31. पंगु, 32. आमक गाछी, 33. सुचिता, 34. मोड़पर, 35. संकल्प, 36. अन्तिम क्षण, 37. कुण्ठा- उपन्यास। 38. पयस्विनी- प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना। 39. कल्याणी, 40. सतमाए, 41. समझौता, 42. तामक तमघैल, 43. बीरांगना- एकांकी। 44. तरेगन, 45. बजन्ता-बुझन्ता- बीहैन कथा संग्रह। 46. शंभुदास, 47. रटनी खढ़- दीर्घ कथा संग्रह। 48. गामक जिनगी, 49. अर्द्धांगिनी, 50. सतभैंया पोखैर, 51. गामक शकल-सूरत, 52. अपन मन अपन धन, 53. समरथाइक भूत, 54. अप्‍पन-बीरान, 55. बाल गोपाल, 56. भकमोड़, 57. उलबा चाउर, 58. पतझाड़, 59. गढ़ैनगर हाथ, 60. लजबि‍जी, 61. उकड़ू समय, 62. मधुमाछी, 63. पसेनाक धरम, 64. गुड़ा-खुद्दीक रोटी, 65. फलहार, 66. खसैत गाछ, 67. एगच्छा आमक गाछ, 68. शुभचिन्तक, 69. गाछपर सँ खसला, 70. डभियाएल गाम, 71. गुलेती दास, 72. मुड़ियाएल घर, 73. बीरांगना, 74. स्मृति शेष, 75. बेटीक पैरुख, 76. क्रान्तियोग, 77. त्रिकालदर्शी, 78. पैंतीस साल पछुआ गेलौं, 79. दोहरी हाक, 80. सुभिमानी जिनगी, 81. देखल दिन, 82. गपक पियाहुल लोक, 83. दिवालीक दीप, 84. अप्पन गाम, 85. खिलतोड़ भूमि, 86. चितवनक शिकार, 87. चौरस खेतक चौरस उपज, 88. समयसँ पहिने चेत किसान, 89. भौक, 90. गामक आशा टुटि गेल, 91. पसेनाक मोल, 92. कृषियोग, 93. हारल चेहरा जीतल रूप, 94. रहै जोकर परिवार, 95. कर्ताक रंग कर्मक संग, 96. गामक सूरत बदैल गेल, 97. अन्तिम परीक्षा, 98. घरक खर्च, 99. नीक ठकान ठकेलौं, 100. जीवनक कर्म जीवनक मर्म, 101. संचरण, 102. भरि मन काज, 103. आएल आशा चलि गेल, 104. जीवन दान तथा 105. अप्पन साती- लघु कथा संग्रह।

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