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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

विदेह नूतन अंक गद्य

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(c)२००८-०९.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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वि  दे  ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.Read in your own script Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi

जगदीश प्रसाद मंडल-

जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।

कथा

कथा-

 

दोती विआह।

 

पचास वर्षीए प्रोफेसर उमाकान्‍त दोहरा कए विआह कइये लेलनि। कोना नहि करितथि? संयमी रहने पचास बर्खक चेहरा पेंइतीस-चालीससँ उपर नहि बुझि पड़ैत छनि। पत्‍नी कऽ मुइने घर सुनसान लगए लगलनि। ढन-ढन चौघारा कोठरी सभ करैत रहनि। अपना छोड़ि ने दोसर भैयारी आ ने कियो आन परिवारमे रहनि। दुइयेटा सन्‍तानो! जेठ बेटी प्रोफेसर पतिक संग बनारसेमे रहैत छथिन। दुरागमनक पछाति मात्र आइ धरि मात्र  तीनि बेरि माए-बापसँ भेटि करए ऐलीह। बेटो तहिना। डॉक्‍टरीक अंतिम साल, बंगलोर मेडिकल कओलेजमे पढ़ैत छथिन। सालक दुर्गापूजाटा मे गाम अबैत छथि।

 

 

      किरिण फुटितहि तीनू बकरी घरसँ निकालि बाहरक खुट्टीमे बान्‍हि, कटहरक पात आगूमे दऽ बगलमे बैसि अपने फुड़ने असकरे बैसल बैहरी बजए लगलीह- ‘‘घोर कलयुग! घोर कलयुग आबि गेल। जते दिन ई दुनियाँ चलैए, चलैए, नै तँ धरती फाटत सभ ओहिमे चलि जाएत। सुआइत लोक कहै छै जे मनुक्‍ख तते पपियाह भऽ गेल अछि जे खिआइत-खिआइत चुट्टी-पीपरी जेँका भऽ गेल। हमरा सभकेँ भगवान पाड़ लगौलनि जे एतेटा मनुक्‍ख भेलहुँ। आबक लोक थोड़े एते-एते हएत। तेहेन हएत जे लग्‍गी लगा-लगा भट्टा तोड़त।''

      ओना विआहसँ दू दिन पहिनहिसँ स्‍त्रीगणक बीच गुन-गुनी शुरु भऽ गेल छलैक मुदा कियो खुलि कऽ नहि बजैत छलीह। मुदा आइ सभक मुँह खुजि गेलनि। टोलक बीच सरकारीक तीनियेटा चापाकल अछि वाकी पाँचो अपन-अपन अंगनेमे गरौने छथि। जहिपर आन-आन नहि जाइत। तीनूमे सँ एकटाक हेडे खोलि तड़िपीबा सभ बेचि कऽ ताड़ी पीबि गेल। दोसराक फील्‍टरे फुटि गेल छैक। जहिमे पानिसँ बेसी गादिये अबैत अछि। मुदा चौराहा परहक कल बँचल अछि। मुदा ओहो कोन जनमक पाप केने अछि जे भरि दिनमे कखनो आराम नहि भेटैत छैक। चारु दिशिसँ पनिभरनी वाल्‍टी-घैल लऽ आबि-आबि चारु दिशिसँ घेरि बेरा-बेरा पानि भरैत। तेँ गप-सप करैक नीक अवसरो आ जगहो फइल।

  चिक्‍कारी मारैत मझौरावाली सोनरेवाली दिशि देखि कऽ बजलीह- ‘‘साओनक लगनक गीति अबै छनि, दीदी?''

  मुस्‍की दैत सोनरेवाली उत्तर देलखिन- ‘‘जहिना एक्‍के लोरहीसँ सिलौटपर मिरचाइयो पीसल जाइत अछि आ मिसरिओ, तहिना ने डहकनो फागुनोक लगनमे गाओल जाइत अछि आ साओनोमे गाओल जाइत।''

      दुनू गोटेक चिकारीमे गप्‍प सुनि बेलौंचावाली बजलीह- ‘‘अपना भैंसुरकेँ नहि देखै छहुन जे काठपर जाइ बिना दुइर भेलि जाइ छथुन आ तहिपर पुट्ठा खलीफा घर लऽ अनलखुन। से बड़वढ़िया। बड़ चिक्‍कन। आ प्रोफेसर भैयाकेँ अखन की भेलनिहेँ। मारे दरमहो कमाइ छथि आ उमेरे कते हेतनि। तीस-पेंतीस बर्खसँ बेसी थोड़े भेलि हेतनि।''

  मझौरावालीक पछ लइत मुँह चमकबैत मोहनावाली बाजलि- ‘‘जानिये कऽ तँ पुरुख छुद्दर होइए। तहिमे उमाकान्‍ते जे छुद्दरपना केलनि तँ कोन जुलूम भऽ गेलइ।''

  मोहनावालीक कड़ुआइल गप सुनि बेलौंचावालीक मन जरए लगलनि। तुरुछि कऽ बजलीह- ‘‘सभ पुरुख तँ छुद्दरे होइए मुदा मौगी तँ सभटा गिरथाइने होइए। सैह ने। सत-सतटा मुनसा देखैए मौगी आ छुद्दर होइए पुरुख। हिनकेँ पुछै छिअनि जे प्रोफेसर भैयासँ नीक अपन घरबला छन्‍हि?''

      घरबलाक नाओ सुनि मोहनावाली काँख तरक घैल निच्‍चामे रखि आगू बढ़ए लगलीह। मुदा तहि बीच साठि वर्षीए झबरी दादी जोरसँ बजलीह- ‘‘मरदक कमाएल खाइ जाइ छह आ गरमी चढ़ै छह तँ कलपर झाड़ैले अबै छह। एक्‍को दिन कोइ उमा बौआ कऽ भानसो कऽ दइ छहुन आ कि एक लोटा पानियो भरि कऽ दए अबै छहुन। मुदा उल्‍लू जेँका मुँह दुसल सभकेँ होइ छह। वेचारा नोकरीपर सँ अबै छथि अपने हाथे बरतन-वासन धोए, पानि भरि भानस करए छथि से बड़बढ़ियाँ! मुदा विआह कऽ लेलनि से बड़ अधलाह।''

      झबरी दादीक गप ओते मोहनावाली नहि सुनथि जते तरे-तर बेलौंचावाली जरैत रहथि।

      छह मास पूर्व प्रोफेसर उमाकान्‍तक पत्‍नी स्‍वर्गवास भऽ गेलनि। जाधरि जीवैत छलथिन ताधरि घरक कोनो भार प्रोफेसर सहाएवकेँ नहि बुझि पड़ैत छलनि। जहिना कोसीक धार अनवरत बहैत रहैत अछि तहिना उमाकान्‍तोक परिवार अपना गतिसँ छह मास पछाति धरि चलैत छलनि। ओना दस बर्ख पछाति धरि माए-पिताक नजरिमे उमाकान्‍त बच्‍चे आ पत्‍नी कनियेँ छलथिन। घरक भार दुनूमे सँ किनकोपर नहि छलनि। सोलहो आना माइये-बाबू सम्‍हारैत छलखिन। पढ़नाइ-पढ़ौनाइ उमाकान्‍तक आ दुनू साँझ भानस केनाइ पत्‍नीक काज छलनि।

      पत्‍नी मुइलाक उपरान्‍त उमाकान्‍तकेँ घर-आंगन सून-मशान बुझि पड़ए लगलनि। चौघारा घरक आंगन, नमहर दरवज्‍जा तहि बीच असकरे उमाकान्‍त रहैत छथि। परिवारकेँ डूबैत देखि उमाकान्‍तक मनमे बेचैनी बढ़ए लगलनि। जहिना भूमकमक समए धरतीक संग-संग उपरक सभ किछु कँपए लगैत तहिना मनक संग-संग उमाकान्‍तक बुधि-विवेक डोलए लगलनि। हृदय चहकए मन मसकए लगलनि। मसकैत-मसकैत ऐहेन चिरक्‍का भऽ गेलनि जे उपयोग करै जोकर नहि रहलनि। अनायास धैर्यक सीमा बालुक मेड़ि जेँका ढ़हए लगलनि। ढहैत-ढहैत सहीट भऽ गेलनि। सहीट होइतहि बरखा पानि जेँका रास्‍ता बनबए लगलनि। जहिसँ नव-नव विचार जनमए लगलनि। नव-नव विचारकेँ जनमितहि आँखि उठा आगू तकलनि तँ मेला-जेँका दुनियाँ बुझि पड़लनि। सभ रंगक देखिनिहार। सभ तरहक वस्‍तुक दोकानपर एका-एकी एवो करैत आ जेवो करैत। अपन-अपन धुनिमे सभ बेहाल। दोसर दिशि देखैक ककरो समए नहि। अपने ताले सभ बेताल। जहिसँ ककरो-ककरो आँखिसँ नोरो खसैत आ कियो-कियो ठहक्‍को मारैत। अनका दिशिसँ नजरि हटा उमाकान्‍त अपना दिशि मोड़लनि तँ जिनगीक लेल संगीक जरुरत पड़लनि। मन पड़लनि पत्‍नीक मृत्‍यु। मृत्‍युक उपरान्‍त सोग परगट करैले तँ बहुतो अएलाह, मुदा कि सबहक नोरमे एक्‍के रंग वेदना रहनि? एक घटना रहितहुँ एक रंगक विचार आ वेदना कहाँ छलनि? भरिसक सभ भाँज पुरबैले आइल छलाह। मुदा प्रोफेसर हरिनारायणक नोर किछु आरो बजैत छलनि। कि हुनकर नोर पत्‍नीक प्रति छलनि वा पढ़ैत बच्‍चाक प्रति छलनि आ कि हमर विधुर जिनगीक प्रति छलनि। मनपर भार पड़लनि। भारक तर मन दबेलनि। जहिसँ सोचै-विचारैक रास्‍तो अवरुद्ध हुअए लगलनि। मुदा तरमे दबल मन कहलकनि- ‘‘समाजक लोक की कहत?'' फेरि मनमे उठलनि, की कहत समाजक लोक! जते लोक तते विचार। जहिना ताड़ीक गंधसँ ककरो उलटी होइत तँ कियो सुगंध वुझि आत्‍म-तुष्‍टि करैत अछि। बूढ़-बुढ़ानुस परम्‍परानुसार कहताह ओ यैह कहताह जे संयुक्‍त परिवारमे व्‍यक्‍ति-विश्‍ोषक वेदना परिवारक बीच हराए, फुलाएल फूल जेँका हँसैत अछि। जहिसँ अभाव कोनो वस्‍तु नहि रहि जाइत अछि। फेरि मनमे एलनि जे जहि कओलेजमे शिक्षक रुपमे छी, बेटा तुल्‍य विद्‌यार्थीकेँ जिनगीक बाट देखवै छी ओ कि कहत? मुदा कोनो घटनो तँ अनिवार्य नहि होइत आकस्‍मिको होइत। जे सबहक संग घटबे करत? घटियो सकैत अछि नहियो घटि सकैत अछि। मन ओझड़ेलनि। किछु कालक वादमे एलनि जे जे मनुष्‍य एहि धरतीपर जन्‍म लइत ओ मृत्‍यु पर्यन्‍त हँसैत जीवए जाहैत अछि। से कहाँ भऽ रहल छैक। पहिलुका जेँका परिवारो नहि रहल। असकर जीवो कठिन अछि। दोसराक जरुरत सदति काल पड़ैत अछि। भलेहीं जिनगीक क्रिया निमाहि लेब मुदा मनक व्‍यथा के सुनत। सभ ठाम ने तँ लोक कानि सकैत अछि आ ने हँसि सकैत अछि। परिवार तँ हँसै-कनैक जगहे छी। जँ से नहि भेटए तँ गुर-घाव जेँका तरे-तर सड़ैन करैत रहत। जते सड़ैन करत तते शरीरसँ गंध निकलवे करत। जाहिसँ कष्‍टो होएत आ औरुदो घटैत। जखने औरुदा घटत तखने जिनगी सिकुड़त। जते जिनगी सिकुड़त तते मृत्‍यु करीब आओत। फेरि मन ओझरा गेलनि। मन ओझराइते नजरि घुमौलनि तँ कओलेजक इतिहास विभागक प्रोफेसर हरिनारायणपर पड़लनि। हरिनारायणे बाबूटा ऐहन जिज्ञासु रहथि जनिका आँखिसँ हृदयक वेदना, पहाड़पर सँ खसैत झरनाक पानि जेँका अनघोल करैत रहनि जे बाप रे, अन्‍याय भऽ गेल।' उमाकान्‍त ठूठ गाछ सदृश्‍य भऽ गेलाह। जाहिमे फूल-फड़क संग छाहरियो अलोपित भऽ जएतनि। अपने जानटा लए कऽ पत्‍नी नहि गेलखिन। असीम वेदनाक पहाड़ सेहो माथापर पटकि रहल छथिन। सभ किछु छिड़िया जेतनि। कोना समेटि पओताह उमा भाय! की एकरे जिनगी कहबै?''

      जेतना शून्‍य उमाकान्‍त दुनियाँक बजारमे हेरा गेलाह। चारु दिशक बाट बन्‍न बुझि पड़ए लगलनि। किमहर जाएब? रस्‍ते नहि। कि ओ खरहोरिक ओहन गाड़ल कड़चीक सदृश्‍य भऽ गेलाह जाहिसँ कोनो क्रिया नहि भेनहुँ आन ओगरवाह बुझैत अछि। अनायास मनमे जगलनि जे दुनियाँमे कियो अप्‍पन नहि। जाधरि आँखि तकै छी ताधरि दुनियों अछि नहि तँ ओहो नहि अछि। अपनहि करनीसँ कियो दुनियाँकेँ सुन्‍दर बनबैत अछि आ कियो अधलाह। आगू जीवैक लेल संगीक जरुरत सभकेँ होइत छैक। आनक अपेक्षा हरिनारायण बाबू लग बुझि पड़ै छथि। अखने हुनका ऐठाम जाए अपन मनक बात कहबनि।

      उमाकान्‍तकेँ देखितहि दुनू हाथसँ दुनू बाँहि पकड़ि हरिनारायण अरिआति कऽ अपन कोठरीमे वैसाए पत्‍नीकेँ पानि नेने अबए कहलखिन। वामा हाथमे लोटा दहिना हाथमे पानिसँ भरल चमकैत स्‍टीलक गिलास उमाकान्‍त दिशि बढ़ौलखिन। पत्‍नी विहीन उमाकान्‍त नजरि निच्‍चा केने शोभाक -हरिनारायणक पत्‍नी- हाथसँ गिलास लऽ पानि पीबए लगलाह। मुदा दू घोंटक बाद पानि कंठसँ निच्‍चा धसबे ने करनि। दोसर गिलास भरैक लेल शोभा बामा हाथक लोटा दहिना हाथमे लइत उमाकान्‍तपर नजरि गारने। ने उमाकान्‍त मुँहसँ गिलास हटबैत आ ने पानि पीबैत। उमाकान्‍तक व्‍यथा हरिनारायण बुझि गेलखिन। शोभा हाथक लोटा अपना हाथमे लइत कहलखिन- ‘‘अहाँ चाह बनौने आउ। भायकेँ हम पानि पीया दइत छिअनि।'' चाह बनबैले शोभा कीचेनरुम चलि गेलीह।

  मुँहमे गिलास सटल उमाकान्‍तक मनमे अबए लगलनि। जँ कहयो हरिबाबू हमरा ऐठाम जएताह तँ किनका चाह बनबैले कहबनि। उमाकान्‍त कऽ विचारमे डूबल देखि हरिनारायण कहलखिन- ‘‘भाय, अपनेसँ हम छोट छी मुदा एकरा धृष्‍टता नहि बुझि दिलक धड़कन बुझू। अपने बेसी दुनियाँ देखलिऐक मुदा.......''

  चौंकि कऽ उमाकान्‍त पुछलखिन- ‘‘मुदा की?''

      आइसँ पहिने मनुष्‍य जते असुरक्षित जिनगी बितबैत छल ओहिमे बहुत कमी आएल अछि। सोलहन्‍नी सुरक्षित तँ नहि मुदा पहिलुका अपेक्षा सुरक्षित भेलि अछि। ओना खतरा पहिनेसँ अधिक भऽ गेल अछि मुदा बदलल रुपमे। पहिलुका रुपमे सुरक्षित भेलि अछि। जहिसँ जिनगीक नमती सेहो बढ़ि रहल अछि। ओना पूर्वज शतायु कऽ सही औरुदा बुझै छथिन। मुदा इहो बुझिनिहार तँ छथि जे चालीस कऽ घपचालीस बुझैत छथि। ओहो ओहिना नहि बुझैत छथि। अखनो चालीस वर्खसँ उपर कते गोटे छथि जे पूर्ण स्‍वस्‍थ छथि। मुदा किछु वर्ख पूर्व धरि अस्‍सी वर्खसँ उपर गोटि-पङरा पहुँचैत छलाह ओ आब अधासँ बेसी पहुँचए लगलथि अछि। तेँ, मोटा-मोटी नब्‍बे कऽ अधार बना हरिनारायण उमाकान्‍तकेँ पुछलखिन- ‘‘अपनेक आयु कतेक अछि?''

  आयु सुनि उमाकान्‍त बिस्‍मित भऽ गेलाह। हृदय बमकैत रहनि मुदा मुँहसँ बोली निकलबे नहि करनि। किछु काल बिलमि कहलखिन- ‘‘पचास बर्ख।''

  पचास बर्ख सुनि हरिनारायण उछलि कऽ बजलाह- ‘‘अधासँ किछु अधिक भेलि अछि मुदा अधा तँ बाकिये अछि। अधाक लेल.......।''

      नमहर साँस छोड़ि, उमाकान्‍त आँखि उठा कखनो हरिनारायणपर दथि तँ लगले नजरि निच्‍चा कऽ धरती देखए लगथि। मुस्‍कुराइत हरिनारायण कहलखिन- ‘‘अपने दोसर विआह कए लेल जाउ। जरुरी नहि जे सभ औरत कुल्‍टे होइत अछि। ऐहनो औरतक कमी नहि जनिकामे मानवीय संवेदना गंगाक धार जेँका सदिखन उमड़ैत रहैत छन्‍हि। नारीक पहिल गुण मातृत्‍व थिक। जेकरा प्रबल बनेवाक लेल पुरुषक सहयोग जरुरी अछि। जखने अनुकूल परिस्‍थिति नारीक प्रति बनत तखने दुनियाँक रंग-रुप बदलल-बदलल बुझि पड़त।''

      चाह पीबि, विदा होइत उमाकान्‍त कहलखिन- ‘‘अहाँक विचारसँ सहमत छी मुदा काजक भार अहाँपर।''

      दुनू गोटे -उमाकान्‍त आ हरिनारायण- दू गामक। मुदा कोसे भरिक दूरी दुनूक बीच छन्‍हि।

      अपने गामक पच्‍चीस बरखक यशोदियाक संतप्‍त जिनगी हरिनारायणक सोझमे छन्‍हि। सोलह बर्खक देहरिपर जखन यशोदिया पहुँचलि अट्ठारह बर्खक गुणेश्‍वर फूलक सुगंध कऽ भौरा जेँका झपटि लेलक। जिनगीक हरियर-हरियर प्रलोभन देवाक संकल्‍प करैत, लोक-लाजसँ बँचैक लेल, गाम छोड़ि दिल्‍ली चल गेल। मुदा दिल्‍लीक सड़कपर जखन दिन-राति गुजारैत तखन यशोदिया कऽ छोड़ि गुणेश्‍वर निपत्ता भऽ गेल असकर यशोदिया वौआए लगलीह। हारि-थाकि यशोदिया एकटा कोठीक शरणमे गेलि। आठ वर्खक पशुवत जिनगी यशोदियाकेँ बदलैक लेल बाध्‍य केलक। नव बाट ताकए लागलि। अपना कऽ मृत्‍यु बुझि एक राति सभ किछु छोड़ि पड़ा कऽ गाम आबि गेलि। गाम आबि हरिनारायणक पाएर पकड़ि ताधरि कनैत रहलि जाधरि ओ बाँहि पकड़ि मनुक्‍खक जिनगी जीवैक भरोस नहि देलखिन।

      हरिनारायण परिवारमे यशोदिया रहए लगलीह। यशोदियाक मनमे तँ चैन आबि गेल मुदा हरिनारायणक बेचैनी बढ़ए लगलनि। समए पाबि, विलटैत दू जिनगीकेँ जोड़ि एक परिवारकेँ लहलहाइत देखलनि। मनमे खुशी एलनि।

      अखन धरि उमाकान्‍त यशोदियाकेँ प्रोफेसर हरिनारायणक बहीन बुझैत छलाह। यशोदियाक असली परिचए नहि छलनि तेँ मनमे खुशी रहनि जे सभ्‍य परिवारक लड़की घरमे औतीह। जहिसँ पहिलुके जेँका फेरि परिवार अपन पटरीपर आबि आगू मुँहे ससरए लगत।

      दिन -लग्‍न- बेरागन छोड़ि हरिनारायण उमाकान्‍तकेँ पुछलखिन- ‘‘अखन तँ विआहक समए नहि अछि तखन.....।''

  ‘‘एक दिन पहाड़ लगि रहल अछि। विआहक जे कोनो बंधन अछि ओ काँच सूतसँ बान्‍हल जाइत अछि। जहिसँ सदिखन टूट-फाट होइत रहैत अछि। तेँ दुनूक -पुरुष-नारी- हृदयक योगसँ हेवाक चाही?''

  हरिनारायणक प्रश्‍नसँ उमाकान्‍त गुम्‍म भऽ कहलखिन- ‘‘समए आ परिस्‍थितिकेँ देखैत.....।''

      उमाकान्‍त यशोदियाक बीच साओने मासमे विआह भऽ गेल।