प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज केर अन्तर्गत पहिल आ दोसर खेपमे छल:-

१.   कामिनीक पांच टा कविता आ ओइपर मधुकान्त झाक टिप्पणी

२.   जगदानन्द झा 'मनु'क बालकथा "माटिक बासन" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी

आब तेसर खेपमे प्रस्तुत अछि:-

३. मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी

 

 लेखकक आमंत्रित रचना आ ओइपर आमंत्रित समीक्षकक समीक्षा सीरीज- मुन्नी कामतक एकांकी "जिन्दगीक मोल" आ ओइपर गजेन्द्र ठाकुरक टिप्पणी

"जिन्दगीक मोल" विदेहमे ई-प्रकाशित भेल आ संकलित भेल विदेह:सदेह १३ (पृ. ४१२-४२०) मे, जे उपलब्ध अछि विदेह पेटारमे ऐ लिंकपर 

आब पहिने ऐ एकांकीक पुनर्पाठ करी:-

मुन्नी कामत

एकांकी- जिन्दगीक मोल

 

प्रथम-दृश्य

राम रतन- बाबू सुतल छिऐ?

भिक्खन- कि कहै छहक बउआ? जागले छिऐ, बाजऽ, बहुत परेशान लागि रहल छहक।

राम रतन- बाबू, हम बाहर कमाइ लेल जाइ के सोचि रहल छी। तोहर की विचार छऽ।

भिक्खन- नै बउआ, हम अतेक दिन तक तोरा नै कतौ जा देलियऽ। आबो नै जा देबऽ। तोरा सिवा हमरा के छै। तोहर माइ तोरा हमरा कोरामे दऽ कऽ दुनिया छोड़ि देलक। तहियासँ हमर सभ कुछ तूँ छहक। हम तोरासँ एक पल खातिर दूर नै रहि सकै छी।

राम रतन- बाबू आब हम १८ बरसक भऽ गेलिऐ। हम अपन ख्याल राखैमे सक्षम छी। हमरा बाहरक दुनियाँ देखै कऽ एगो मौका दऽ दिअ, बस एक बेर जा दिअ, फेर अहीं संगे रहब।

भिक्खन- नै, अबकी बैशाखमे तोहर बियाह करै कऽ अछि। बियाह करि लऽ, फेर तोरा जतऽ जाय कऽ मन हेतऽ जायहक।

राम रतन- बाबू आब माइनो जाउ। किछु दिनक तँ बात छै। फेर अहाँ जेना कहब हम तहिना करब।

भिक्खन- ठीक छै, अहाँक हठक आगू हमरा झुकइये पड़तै। ककरा संगे आ कतऽ जेबहक?

राम रतन- बाबू, काल्हि फुलचनमा हिमाचल जा रहल छै। हम ओकरे संगे हिमाचल जाएब।

भिक्खन- ठीक छइ, काइले जेबहक तब तँ पाइ कौरीक ओरियान करऽ पड़तै। कखुनका गाड़ीसँ जेबहक।

राम रतन- रातिक ११ बजे निर्मली सँ गाड़ी पकड़बै। आब हम जाइ छी, अपन कपड़ा-लत्ता साफ करै लऽ।

            । पटाक्षेप।

दोसर दृश्य

भिक्खन- बउआ हइए..... फूलचन एलऽ।

राम रतन- आबैय छी बाबू। कपड़ा पिनहै छी।

भिक्खन- बउआ फूलचन। तूँ तँ ओतै रहै छहक। तोरा तँ ओतौका सभ किछु कऽ पता हेतऽ।

फूलचन- हउ कक्का, तूँ चिंता नै करऽ। राम रतन हमरे संगे रहतै। ओतऽ ओकरा कोनो चीजक तकलीफ नै हेतै।

भिक्खन- तूँ तँ दवाइबला कम्पनीमे काज करै छहक नऽ! कथीक काज करै छहक?

फूलचन- हँ कक्का। दवाइयेबला कम्पनीमे छिऐ। ओइमे तँ बहुत तरहक काज होइ छै। जे काज भेटल सएह करि लेलौं।

भिक्खन- अच्छा चलऽ, ठीक छै।

राम रतन- चल फूलचन!

भिक्खन- बउआ सभ किछु ठीकसँ लऽ लेलहक नऽ? आ सभ िदन हमरा फोन करैत रहिअ। बाहर जाए छहक, गाड़ी-घोड़ा देख कऽ चलइहक।

राम रतन- ठीक छै बाबू, अहाँ चिंता बिलकुल नै करू। अपन ख्याल रखब। समय-समयपर खाना खाइत रहब आ बेसी काज नै करब। हम जल्दी घुइम-फिर कऽ आबि रहल छी।

सबहक प्रस्थान!

                              ।पटाक्षेप।

तेसर दृश्य

(हिमाचल पहुँच कऽ)

राम रतन- फूलचन, आइ गामसँ एला छऽ दिन भऽ गेलैए। तूँ तँ काम पर चलि जाइ छऽ आ हमरा असगर पहाड़ जकाँ समय लगै यऽ। हमरो कतउ काज लगा दे नऽ।

फूलचन- अच्छा ठीक छै। काल्हि हम अपन मालिकसँ तोरा लऽ बात करबउ।

दोसर दिन

फूलचन- राम रतन, काल्हिसँ तूँहो चलियहन हमरा संगे। ८ हजार मासिक तनखुआ पर हम तोरा लऽ बात केलियौहँ, मंजूर छउ नऽ। मन लगा कऽ काज करबही तँ अओर तनखुआ बढ़ेतउ।

राम रतन- ई तँ हमरा लऽ बहुत खुशीक बात अछि। अखने हम बाबूकेँ ई शुभ समाचार दै छी।

पटाक्षेप।

चारिम दृश्य

कम्पनीक कैनटिंगमे बैठ राम रतन आ फूलचन खाना खाइत गप्प करैत अछि।

राम रतन- फूलचन अतऽ कोन काज होइ छै। हमरा सँ आइ कोनो काज नै करेनकैए। डॉक्टरबला कोट पहिरने एगो आदमी एलै आ हमरा एगो गोली खिया कऽ चलि गेलै। कुछो समझमे नै आबै छै, उ हमरा कथीक दवाइ देलकैए। ओतऽ चारि-पाँच गरऽ अओर छेलै, सभकेँ वएह दवाइ देलकैए।

फूलचन- अतऽ अलग-अलग बिमारीक दवाइ बनै छै, ओकरे जाँच खातिर कम्पनी किछु लोककेँ नौकरी पर रखै छै, जइमे सँ एगो तुहो छी।

राम रतन- ओइ दवाइसँ कोनो हानि तँ नै होइ छै?

फूलचन- नै! अगर हेबे करतै तँ अतऽ डॉक्टरक आ दवाइयक कोनो कमी छै? जे खर्चा ओकर इलाजमे लगतै सभ कम्पनी देतै। हमहूँ तँ कतेक साल तक यएह काज केलिऐ, कहाँ किछु भेलै।

एक आदमी- फूलचन, राम रतनकेँ पठाउ, डॉक्टर साहेब बजेने छै।

फूलचन- जी। (रामरतनसँ) जो देखहीं की कहै छउ।

राम रतन डॉक्टरक चेम्बरमे जाइत अछि।

राम रतन- साहेब अहाँ बजेलौं।

डॉक्टर- ई दवाइ खा लिअ आ एतऽ पड़ि रहू, किछु इन्जेक्सन लगेबाक अछि।

दवाइ खा कऽ राम रतन सुइ लइ लऽ मेज पर लेट जाइए!

२ घंटा बाद

डॉक्टर- राम रतन ओ राम रतन उठू।

डॉक्टर राम रतनकेँ हिलाबैत अछि आ फेर नब्ज देखऽ लागैत अछि!

डॉक्टर- ई की, ई तँ मरि गेल। कियो अछि, डॉक्टर खुरानाकेँ बजाउ।

डॉक्टर खुराना- की भेल?

डॉक्टर- सर, एकरा देखू, की भऽ गेलै, नब्ज नै चलै छै।

डॉक्टर खुराना- ओह नो! ई मरि गेल। कोन दवाई देलौं एकरा?

डॉक्टर-सर ई तीनू।

डॉक्टर खुराना- की अहाँ पागल छी? एक साथ एतेक दवाइ, सेहो पहिले बेरमे। पहिने अहाँ एकरा नींदक गोली खुएलौं, तकर बाद एतेक पावरक दू-दू इन्जेक्सन दऽ देलौं?

डॉक्टर-सर आब की हएत?

डॉक्टर खुराना- हमरा सभ ऐठाम तँ ई रोजक बात अछि। एकर परिवारबलाकेँ मुआवजा दऽ कऽ चुप करा दियौ, आ हँ जखन सभ चलि जाए तखन बॉडी बाहर निकालब। ता तक एकर मरबाक खबर ऐ चहरदिवारीसँ बाहर नै एबाक चाही, बुझि गेलौं।

रातिक ९ बजे

फूलचन- सर, राम रतन कतऽ अछि, ओकर छुट्टी नै भेल?

डॉक्टर- आइ एम सॉरी फूलचन, राम रतन आब ऐ दुनियाँमे नै रहल। हमरा एकर अफसोस अछि। ओकर परिवारबलाकेँ कम्पनी एक लाख रूपैया मुआवजाक तौरपर देत। हम ओकरा नै बचा पेलौं।

फूलचन मने-मन सोचैत अछि

-आब हम की जबाब देब कक्काकेँ। केना कहब कि ओकर जिअइ कऽ सहारा छिन गेल। केना जिथिन ओ, हे भगवान, एना केना भऽ गेल।

पटाक्षेप!

अंतिम-दृश्य

फूलचन- हेल्लो.. कक्का, तूँ जेना छहक तहिना अखने गाड़ी पकड़ि लए। राम रतन बहुत जोर बीमार छऽ।

भिक्खन- बउआ, एक बेर हमरा राम रतन सँ बात करा दए। की भेलैए हमर बाबूकेँ। हम तँ देखनइयो नै छिऐ हिमाचल तँ केना एबऽ।

फूलचन- कक्का, हमर छोटका भाइ तोरा लऽ कऽ एतऽ। ओ अखने तोरा घर आबि रहल छऽ, तूँ बस जल्दी आबि जा।

भिक्खन- हम अबै छिअ बउआ, तूँ हमरा बउआक ख्याल रखियहक।

फूलचन- ठीक छै, आब फोन रखै छिअ।

कहैत-कहैत फूलचन कानऽ लगैत अछि

दोसर दिन हिमाचल पहुँच कऽ

भिक्खन-बउआ........बउआ राम रतन कतऽ छहक?

फूलचन- कक्का पहिले अहाँ किछो खा लिअ। राम रतन ठीक यऽ।

भिक्खन- पहिले हम अपना बेटाकेँ देखब तब किछो मुँहमे लेब।

फूलचन भिक्खनक गला पकड़ि कानऽ लगैए आ सभ किछु बता दइए।

भिक्खन- फूलचन, हमरा बेटाक जीवनक सौदा तूँ ८ हजार मे केलहक। तूँ सभ किछु जानै छेलहक, तइयो ओइ मौतक मुँहमे हमरा बेटाकेँ धकेल देलहक। तूँ हमर सभ किछु लऽ लेलहक, हमरा निष्प्राण बना देलहक। हमर बेटाक मौतपर हमरा १ लाखक भीख तोहर कम्पनी देतऽ, उ ओकरे मुँह पर फेक दिहक। हमरा नै चाही कोनो भीख। आइ हमर बेटा मरल, काल्हि ककरो अओरक बेटा मरत। आखिर ई मौतक खेल किए खेलल जाइए? जे दवाइक परीक्षण जानवरक ऊपर करबाक चाही ओकरा भोला-भाला गरीब मनुष्यक ऊपर करैत अछि। कि अकरा रोकै लेल कोनो कानून नै अछि?

एक घार रूदनक संगे पटाक्षेप

  

एकांकीक विवेचना

पहिने बता दी जे आब दवाइक प्रयोग लेल बजारमे एबासँ पहिने ओकर प्रभाव आ दुष्प्रभाव केर जाँच लेल मनुक्खकेँ वेक्टर बनेबापर भारत सरकार प्रतिबन्ध लगा देने अछि, मुन्नी कामत सन-सन बहुत रास लोक ऐ लेल धन्यवादक पात्र छथि। जेना हमर उपन्यास "सहस्रशीर्षाक" नायक मोहन गबैय्या सन-सन बहुत लोक सूचनाक अधिकार दियेलन्हि, मुदा किछु लोक असगरे तकर क्रेडिट लेबाक लेल अपस्याँत छथि, किछु तेहने सन।

ई एकांकी एक अंक आ पाँच दृश्यक अछि। एकांकीक नायक राम रतन १८ बर्खक होइते देरी हिमाचल बिदा होइ छथि। हिमाचल प्रदेश आ उत्तराखण्डमे बहुत रास दवाइ केर कम्पनी छै, जे भारत सरकारक टैक्समे छूट केर लाभ लेबा लेल एतऽ खुजल अछि। राम रतन बियाह करबा लेल तैयार नै होइत अछि आ आठ हजार टाकामे जे नोकरी ओकरा भेटै छै से अछि दवाइक प्रयोग लेल बजारमे एबासँ पहिने ओकर प्रभाव आ दुष्प्रभाव केर जाँच लेल वेक्टर बनब। ओकरा शंका छै मुदा फूलचन कहै छै जे ओहो पहिने यएह करैत छल।  ओकर मृत्यु होइ छै, डॉक्टर खुरानाक सम्वाद सिद्ध करैत अछि जे एहेन बहुत रास मृत्यु पहिनहियो भेल छै, एक लाख टका अनुकम्पामे दऽ मामिला खतम कऽ देल जायत। भिक्खनकेँ लाख टका नै चाही, ओ कहै छथि- "जे दवाइक परीक्षण जानवरक ऊपर करबाक चाही ओकरा भोला-भाला गरीब मनुष्यक ऊपर करैत अछि। कि अकरा रोकै लेल कोनो कानून नै अछि?"

तँ भिक्खनकेँ हमर उत्तर अछि जे भारत सरकार कानून बना देलक अछि अहाँक लाख टका केँ ठोकर मारब सरकारकेँ मजबूर केलक, आब वेक्टर जानवर बनत मनुक्ख नै, आ सेहो सुरक्षाक संग,  ईहो मांग पूर्ण भेल। हम अपन नोकरीक कार्यपालनमे सेहो एकटा एहेन केस पकड़ने रही जइमे नामी हॉस्पीटल सभ सेहो संलग्न रहथि। मुदा भिक्खनकेँ हम ई किए कहि रहल छी। ओ तँ मुन्नी कामतक एकांकीक एकटा पात्र छथि, काल्पनिक पात्र। झूठ, भिक्खन तँ नाम छथि, हम बहुत रास भिक्खनकेँ देखने छी आ बहुत रास राम रतनकेँ सेहो, मुदा मूलधाराक नाटककार नहिये "बिसाँढ़" खेने छथि नहिये राम रतन देखने छथि तँ मलंगिया जी "बुझता है कि नहींं"मे अपन प्रतिभाक इतिश्री कऽ लेलन्हि, जँ हमर "छुतहा घैल"क आलोचनापर ओ ध्यान दइतथि तँ एतेक प्रतिभा तँ हुनकामे छलन्हि जे अइ दस सालमे हुनको भिक्खन भेटि जइतन्हि। मलंगिया जी केँ व्यंग्य आ जातिवादी आक्षेपक अन्तर दस साल बादो बुझऽ मे नै आयल छन्हि आ हमर समालोचनाक बाद मलंगिया जीक परिवार आ जातिवादी रंगमंचक लोक जे काण्ड केने रहथि से तँ विदेहमे अभिलेखित अछिये।

एकांकीक विवेचना- समाजशास्त्रीय पक्ष

तँ भिक्खन कोरा धोती परम्पराक छथि- ओ अगड़ो भऽ सकै छथि आ पिछड़ो। मलंगिया जी जकाँ मुन्नी कामतकेँ ओकड़ा राड़ बा पिछड़ा कहबाक खगताक अनुभव नै भेलन्हि। किए? किएक तँ हुनकामे प्रतिभा छन्हि, ओ कला-एकांकीकेँ लोक देखिते नै अछि, पढ़िते नै अछि- बाजि कऽ अपन कमीकेँ नुकबै नै छथि, हुनका बुझल छन्हि जे कला-एकांकी सेहो लोकप्रिय हएत जँ ओइमे कथानक हेतै। से ओ एहेन कथानक अनलन्हि।

आब आउ ऐ एकांकीक भाषाक समाजशास्त्रीय विश्लेषणपर आ तुलना करू अइ एकांकीक भाषा आ मलंगिया जीक छोटका लोकक लेल गढ़ल गेल कृत्रिम-भाषापर। मुन्नी कामत कोनो धुआ-धोती धारीक प्रवेश अपन एकांकीमे नै हुअय दैत छथि, हुनका बुझल छन्हि जे ई ट्रेजेडी छिऐ, जँ धुआ-धोतीक आगमन हेतै आ भाषाक एकरङाह रूप आ एकांकीक सत्यानाश दुनू संगे हएत। से ओ सतर्क छथि। मुदा मलंगियाजी तँ निशाँमे छथि, दुनियाँ आगू बढ़ि गेलै मुदा ओ आ हुनकर जातिवादी रङमंचक निर्देशकक नजरिमे दु-रङागह भाषा आवश्यक, आ से नाटकक आवश्यकताकेँ ध्यानमे रखैत (जेना बाङ्ला आदि भाषाक लेखक करै छथि) नै  वरन् हँसी उड़बैले आ आक्षेप लगबैले, नै तँ जातिवादी दर्शक थोपड़ी पाड़त केना? मलंगिया जी आ जातिवादी रंगमंच अखनो समालोचनाकेँ रचनात्मक रूपमे लिअय, मुन्नी कामतक ऐ रचनाकेँ बेर-बेर पढ़य आ ऐ मे देल भाषायी समाजशास्त्रक स्वरूपकेँ चिन्हय आ ओकर अनुकरण करय, तदनुसार अपनामे सुधार करय तँ विदेह ओकर स्वागत करत।

एकांकीक भाषायी विश्लेषण

भिक्खन बजै छथि- "नै, अबकी बैशाखमे तोहर बियाह करै कऽ अछि। बियाह करि लऽ, फेर तोरा जतऽ जाय कऽ मन हेतऽ जायहक।"

"अबकी बैशाखमे"- ऐ प्रयोगमे अहाँकेँ कनियो समस्या भेल? नै भेल, मुदा जँ ई जातिवादी रंगमंचक टटका संग्रहकेँ देखी (आधुनिक मैथिली नाट्य सञ्चयन- सङ्कलन-सम्पादन रमानन्द झा 'रमण' जे ऐ लिंक पर ४६५ भा.रु. मे उपलब्ध अछि) तँ यएह प्रयोग एना हएत-

धुआ धोतीधारीक प्रवेश- "की हौ भुक्खन, बेटा हिमाचल कमाइले जाइ छह, रौ रामरतन, ओतहिये कोनो मेमसँ बिया नै कऽ लिहेँ।"

भिक्खन- "नै, अबकी बैशाखमे रामरतन के बियाह करै कऽ अछि।"

आब भिक्खन वएह गप जे मुन्नी कामतक कलमसँ प्रवाहयुक्त रहै, से छोटहा लोकक लेल प्रयुक्त अहाँकेँ लागत, आ सेहो नाटककार द्वारा सायास, नाटककार देखार हेता, आ मैथिलीक अपमान हएत। मुन्नी कामत सन लेखक से नै हेमऽ देतीह। मुदा जातिवादी रंगमंच मिझेबासँ पहिने अपन समस्त दुष्टताक संग साहित्य अकादेमीक लाखक लाख टकाक असाइनमेण्टक सहयोगसँ "आधुनिक मैथिली नाट्य सञ्चयन" क रूपमे आयल अछि, अइ ४६५ भारतीय रुपयाक पोथीमे चालिसो पाइक सामिग्री नै छै, आ नव युवाकेँ ई आर कट्टर बनाओत, हुनका पतो नै चलतन्हि जे ऐ लेल भाषाक कोन समाजशास्त्रक एतऽ प्रयोग कएल गेल अछि। मुदा एकटा संतोष अछि जे चन्द्रनाथ मिश्र 'अमर' लिखने रहथि जे साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित मैथिली पोथी गोदामेमे सड़ि जाइए। से जेना बुद्ध, दुष्ट गामक लोककेँ एक्के ठाम रहबाक आ सज्जन गामक लोककेँ पसरबाक वरदान देने रहथि से हमहूँ ऐ जातिवादी नाट्य सञ्चनकेँ गोदामे मे रहबाक आ कतहु नै पसरबाक कामना करैत छी।

एकांकीक कमजोर पक्ष

जेना उपन्यासक प्लॉट होइ छै तहिना नाटकोक प्लॉट होइ छै। एकांकी तँ बीहनि कथे भेल, विविध भारतीक "हवा-महल" कार्यक्रमक झलकी सन। से आशा करैत छी जे मुन्नी कामत बा समानान्तर धाराक अन्य रचनाकार कमसँ कम चारि अङ्कक नाटक ऐ बा एहने आन विषय पर लिखता। मुन्नी कामत लग एतेक सनगर विषय वस्तु छन्हि, भाषाक समाजशास्त्री स्वरूपक ज्ञान छन्हि तँ हुनकासँ तँ ई सम्भव अछिये।

 

 

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