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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक 

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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रबीन्द्र नारायण मिश्र

मातृभूमि (उपन्यास)- ५म खेप

मातृभूमि़

जयन्तक प्रतिभाक चर्चा त्रिकुट भवनमे होइते रहैत छल। कालीकान्त स्वयं हुनकासँ बहुत प्रभावित रहथि। शास्त्रक ज्ञानक संगे हुनका संगीतमे सेहो महारत छल। हुनकर स्वरसँ तँ लगैत छल जेना भगवती स्वयं प्रकट भए रहल छथि। सरस्वती पूजा दिन कालीकान्तक पाँजरमे बैसल हुनकर कन्या चंद्रिका तँ हुनकर गीत सुनि मंत्रमुग्ध भए गेल छलीह। तकर बाद संगीत सिखबाक बहाने चंद्रिका नित्य जयन्तलग पहुँचि जाइत छली। कालीकान्तकेँ सेहो एहिमे कोनो आपत्ति नहि रहनि अपितु हुनका सहमतिएसँ शारदाकुंज  आबि जयन्तसँ संगीत विद्या सिखैत छलीह। क्रम बहुत दिन धरि चलैत रहल । नित्य प्रतिक संपर्कसँ जयन्तक प्रति चंद्रिकाक आकर्षण बढ़ैत गेलनि। आचार्यजीकेँ तँ एहि बातक जानकारी रहनि मुद ाहुनका जयन्तपर पूर्ण विश्वास रहनि। जनैत छलाह जे जयन्त सिद्धांतक पक्का छथि मर्यादाक प्रतिकूल किछु नहि करताह। कालांतरमे जयन्तकेँ चंद्रिका त्रिकुट भवन सेहो बजाबए लगलीह। जयन्तकेँ पसिन्न नहि पड़नि मुदा हठात मनो नहि कए पाबथि।

भादवक मास छल । नदीमे बाढ़ि आबि गेल छल । लग-पास जेम्हरे देखू पानिए-पानि देखाइत छल । एहनो समयमे जयन्त ओतए नित्य साँझमे पहुँचि जाइत छलाह । एकसरमे मनन-चिंतन करैत छलाह । ओहूदिन जयन्त चंद्रिकाकेँ संगीत शिक्षा दए धारक कात बिदा रहथि। चंद्रिकाकेँ त्रिकुट भवन लए जएबाक हेतु कार तैयार छल। मुदा जयन्तक संगे जएबाक हेत ुअड़ि गेलीह।

"समय साल ठीक नहि छैक। नदीमे बाढ़ि से आएल अछि। एहन परिस्थितिमे अहाँक एमहर-ओमहर गेनाइ ठीक नहि होएत।"- जयन्त कहलखिन।

"मुदा हमरा तँ अहाँसँ फराक हेबाक मोने नहि करैत अछि।"

" कोनो नीक लक्षण नहि अछि। कहीं अहाँ परेसानीमे ने पड़ि जाइ। जँ अहाँक पिताक कान धरि बात सभ गेलनि तँ गेल घर छी। अहाँक तँ किछु नहि बिगड़त मुदा हमर तँ सत्यानाशे भए जाएत?"

"अहाँ सदरि काल एहने गप्प किएक करैत रहैत छी?हुनका सभ बात बूझल छनि। हुनका इहो बूझल छनि जे हम अहाँसँ प्रेम करैत छी।"

" तँ बड़ अनर्थ भेल। अहाँकेँ एहि बात सभक प्रचार नहि करक छल। एहिसँ अहाँकेँ सामाजिक अप्रतिष्ठा भए सकैत अछि।"

"हम सभ किछु गलत करितहुँ तखन ने? अहाँक उज्ज्वल चरित्रपर जानकी धामक कण-कणकेँ विश्वास छैक।"

"मुदा तकर माने की? लोकलाजो कोनो चीज होइत अछि। फेर हम अहाँक ेँकतेक दिन धरि संग दए सकैत छी?

"एना नहि बाजू जयन्त। अहाँकेँ साइत नहि पता अछि जे अहाँ कतेक संपन्न छी। हमर पिता तँ एक इसारापर अहाँकेँ हेतु सभ किछु करबाक हेतु प्रस्तुत छथि, निरंतर अहाँक बारेमे पुछैत रहैत छथि। आग्रह करैत रहैत छथि जे अहाँक सुख-सुविधाक ध्यान राखल जाए।"

"मुदा अहाँकेँ नहि बिसरबाक चाही जे हम एहिठाम विद्याध्ययन हेतु आएल छी। हमर शोधप्रवंधक काज अंतिम चरणमे अछि एहन हालतमे हमरा अपनध्यानकेँ केन्द्रित राखब बहुत जरूरी अछि।"

"अहाँ हमरा ठकबाक प्रयास नहि करू। हम नीकसँ जनैत छी जे केओ अहाँक ध्यानकेँ बिचलित नहि कए सकैत अछि। अहाँ स्वय ंसेहो नहि।"

"एतेक प्रशंसा सुनि कए हम तँ आओर चिंतामे पड़ि गेल छी।"

दुनू गोटे गप्पमे तल्लीन छलाह। ओमहर सूर्यास्त कखन भेल सेहो हुनका सभकेँ पता नहि चललनि। एही बीचमे चंद्रिकाक पैर ससरि कए साँपक बिहरि पर पड़ि गेलनि। चिचिआ उठलीह-

"लगैत अछि किछ ुकाटि लेलक। "

दहिना पैरक औंठा लगसँ खून बलबला कए निकलि रहल छल। जाबे-जाबे जयन्त किछु बुझितथि ताबे चंद्रिका ठामहि खसि पड़लीह। जयन्त चिचिआ उठलाह -

"दौड़ै जाउ। जुलुम भए गेल।चंद्रिकाकेँ साँप काटि लेलकनि।

लग-पासमे कतहु केओ नहि छल। बरखा से भए रहल छल। रहि-रहि कए मेघ आपसमे टकराइत भयानक गर्जना करैत छल। बिजलौंकाक प्रकाशमे फटकीमे नागबाबा देखेलखिन। हुनका देखितहि जयन्त जोर-जोरसँ चिकरए लगलाह-

"जुलुम भए गेल। चंद्रिकाकेँ साँप काटि लेलकनि।।'

जयन्तक चिकरब सुनि नागबाबा सावधान भेलाह।

" तँ जयन्तक आबाज बुझा रहल अछि। मुदा एहन बिकराल समयमे एतए की कए रहल छथि?"-से सभ सोचैत नागबाबा ओतए पहुँचलाह। ताबे कालीकान्तक दूटा आदमी सेहो चंद्रिकाकेँ तकैत ओहिठाम पहुँचल। नागबाबा चंद्रिकाकेँ देखितहि बजैत छथि-

"एकर बाँचब मोसकिल अछि। लगैत अछि नाग डसि लेलकनि अछि।"

"किछु तँ करिऔक नागबाबा।"

"हिनका नागपर्वत स्थित हमरकुटीमे लेने चलू। ओतहि किछु भए सकैत अछि।"

नागबाबाक बात सुनि जयन्त माथ पकड़ि कए बैसि गेलाह।

"बेसी सोच-बिचार करबाक समय नहि अछि। चंद्रिका लग बहुत कम समय छनि। विलंब केलासँ हिनका बँचब मोसकिल भए जाएत। तेँ हुनका शीघ्रे नाग पर्वत पर लए चलू। हमहु ओतहि चलैतछी।"- नागबाबा बजलाह।

(अनुवर्तते)

 

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