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जगदानन्द झा
'मनु'
चोनहा
(धारावाहिक मैथिली कथा )
चोनहा
एक गोट एहन स्वाभिमानी किशोरक मर्म कथा,जए अपन माय-बाप कए कनिक लापरवाही कए कारण घोर अन्हार एवं अपार दर्दक दुनियाँ मे चली गेल | मुदा अपन सहाश व् कुषार्ग वुधि कए द्वारा ओ ओहि घोर अन्हार एवं दर्दक छाया सँ बाहर निकैल,एक सुखद एवं प्रकाशमान जिवन मे चरण बधेलक |
पहिल भाग मे अपनेक लोकन्हि पढलौंह - कोना मासूम किशोर संजय कए असहाय माथक पीरा सँ नित्य सामना करय परैक | सब कए सब होएतो ओ निदान्त एसगर, कियोक ओकर इलाज अथवा कष्ट निवारण हेतु प्रयास नहि कएलथि | गाम सँ दिल्ली आएल मुदा सब कए सब ओनाहि, दिल्लीक गर्मी सँ पीरा मे आओर वृद्धि, अपार कष्ट, मुदा सब किछ असगर सहैक लेल बाध्य | अंत मे ओकरा स्वं एही बताक ज्ञान भेलैक जए ओकर आँखि बहुत खराप छैक परन्च ओकर सहायता करै कए जगह ओकरा कोना 'चोनहा' नाम सँ अलंकृत कएल गेलैक | आब आँगा ----
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भाग २
संजय कए मोन सैद्खन एहि सोच मे लागल रहै जए आब एकर कि उपाय हुवे | एक त माथक दर्द पाहिले छह-सात वर्ष सँ हरान केने,ताहि पर सँ इ आँखिक कमजोरी | चुकी आब ओकरा अपन कमजोर आँखिक ज्ञान भ गेलैक ताहि कारण सैद्खन ओकर मोन ओहि चिंता मे लागल रहैक | आब ओ कि कय सकैए, गाम सँ दिल्ली आएल तेरह-चौदह वर्षक बच्चा | नहि किछ बुझल नहि किछ ज्ञान, नहि कोनो अस्पताल देखल, नहि कोनो डाक्टरक पत्ता | माय-बाबु सँ साफ-साफ एहि बारे मे बात करे सेहो नहि, ओकर मोन मे धाख व् डर कए मिश्रित भाव एवं कनि कोनो कोन मे स्वाभिमान कए भावना सेहो |
एहि गुण-धुन, गुण-धुन मे तिन महिना आओर बीत गेलै, कोनो उपचार नहि | स्कुल मे त्रिमासिक परीक्षा भेलैक | परीक्षा-परिणाम ओकर स्तर सँ निम्न रहलै, तैयो ओकर माय-बाबुक कोनो प्रतिक्रिया नहि, जए सब वर्ग मे पहिल-दोसर आबि बला बच्चा कए एहि परीक्षा मे अनुरूप परिणाम किएक नहि एलै | उल्टा दू-चाइर टा बात आओर सुनय परलैक | एतेक कम नम्बर किएक एलै तकर जैर ताकै बला कियोक नहि | आब तs ओकर हालत इ भs गेलैक जए ओ पढय हेतु बैसअ मे कोताहि करय लगलै, किएक तs आँखि एतेक कमजोर भs गेलै जए ओकरा लेल किताब पढनाई असम्भब भेल जाई |
त्रिमासिक परीक्षाक सेहो दु महिना भs गेलै | अकस्मात कतौ सँ संजय कए, रोटरी क्लब द्वारा संचालित आँखिक अस्पतालक विज्ञापन कए पर्ची हाथ लगलै | ताहि मे सूचित कएल गेल रहै जए रोटरी क्लब, तिन ब्लोक त्रिलोक पूरी मे निः शुल्क आँखिक अस्पताल खोललक | संजय कए इ पढि बड मोन खुस भेलै | ओकर अन्हार मोन मे इजोतक एकटा आशा भेटलै | सब सँ बेसी नीक बात जए ओ अस्पताल ओकर स्कुल कए लगे आ निः शुल्क रहै |
अगिले दिन संजय, स्कुल कए छुट्टी भेला बाद असगरे पुछैत-पुछैत आँखिक अस्पताल,तिन ब्लोक त्रिलोक पूरी पहुंच गेल | ओहिठाम ओकरा ज्ञात भेलै जए नव मारीच बास्ते पुर्जा भोरक आठ सँ एगारह बजे तक बनैत छैक | मुदा आई तs एक बाजि गेल रहै | काइल्ह भोरे आबैक निश्चय मोने-मोन करैत घर चलि आएल |
अगिला दिन भोरे संजय नहा-सुना कs स्कुल कए लेल बिदा भेल अबश्य मुदा स्कुल गेल नहि, किताबक बस्ता दु ब्लोक त्रिलोक पूरी मे अपन काका कए घर राखि कs आँखिक अस्पताल तिन ब्लोक आबि गेल | किछु महिना पाहिले तक संजयो सब दु ब्लोक त्रिलोके पूरी मे रहै छल मुदा आब गणेश नगर मे आबि गेल, जए किछु एक-डेढ़ किलोमीटर दूर छैक |
अस्पताल आबि, नव पुर्जाक लाइन मे लागि गेल, लाइन मे लागला वाद ओकरा ज्ञात भेलै जे पुर्जा बनेबाक बास्ते दु रुपया देबय परै छै | जे कि ओकरा लग नहि रहै | ओकर मोन मे किछ दुखो भेलै | स्वं कए सम्भालैत, दोसर दिन ऐबक निश्चय कय ओ ओहिठाम सँ बिदा भय गेल | काका ओहिठाम सँ स्कुल बस्ता लैत घर आबि गेल |
संजय कए स्कुल जाईकाल टिफिन बास्ते जे कहियो कs चाईर-आठ आना पाई घर सँ भेटै,( ई बात १९८५-८६ कए छै ताहि समाय मे चाईर-आठ आना कए किछो मोल रहै) ओ पाई कए संजय खए नहि,बचाकय राखय लागल, एक सप्ताह बाद ओकरा लग दु रुपया जमा भय गेलै | ठिक आठम दिन फेर ओ रोट्री क्लब द्वारा संचालित आँखिक अस्पताल पहिले जकाँ भोरे-भोरे किताब-कांपी काका कए घर राखि कs पहुंचल | पांति मे लागि, दु रुपया देला बाद नव पुर्जा बनेलक | पुर्जा बनेला बाद डॉक्टरक कक्ष मे पहुँचल | डॉक्टर-साब एकटा तेरह-चौदह वर्षक बच्चा कए असगर देखते पूछलखिन्ह-
"संगे कए अछि "
संजय चुप
डाक्टरसाब - "माय-बाबु किनको संगे नेने आउ |"
आब संजय कए बड्ड मुस्किल भेलै, मुदा ओ अपना पर काबु रखैत डॉक्टरसाब कए तत्काल उत्तर देलकैन्ह -
"बाबूजी ड्युटी गेल छथि आ माय गाम मे छथि |"
हलाँकि ओ इ बात झुठ बाजल,जए माय गाम मे छथि मुदा डॉक्टर साब ओकर उत्तर मे सत्य देखैत कहलखिन्ह -
"अपन बच्चा लेल अहाँक बाबुजी एक दिनक छुट्टी नै कय सकै छथि |"
"नहि डॉक्टर साब, हुनक नव नोकरी छैन्ह, छुट्टी क़रथिन्ह त नोकरी छुटि जेतैन |" - इहो बात संजय झूठे बाजल, जखन कि ओकर बाबुजी महिना मे पंद्रह दिन छुट्टीए पर रहैत छलखिन्ह परन्च डॉक्टर साब कए एक गोट मासुमक मुंह सँ इ बात सुनि बिश्बास आ किछु सहानभूति सेहो भय गेलैन्ह |
"कोनो बात नहि, आगु घुसैक कs बैसु |"
इ कहैत डॉक्टर साब टोर्च वा अन्य-अन्य उपकरण सँ निक जकाँ आँखिक जाँच कएला बाद बजलाह-
''आँखि बड्ड कमजोर अछि,तिन दिन आबए परत, दु दिन आँखि मे दबाई परत आ तेसर दिन चश्मा कए नम्बर भेटत |"
इ कहैत डॉक्टर साब ओकर पुर्जा पर किछ-किछ लिखैत, पुर्जा पेपर वेट कए निचा दबा, पनः कहलखिन्ह-
"जाउ बाहर बैस रहु, सिस्टर आँखि मे दबाई देती, दबाई लेला बाद करीब एक घंटा एहिठाम बैसब, सिस्टर कए कहला बाद घर जाएब हाँ! काईल्ह परसु दु दिन आओर अबश्य आएब |"
"ठिक छै "- कहैत संजय उठि बाहर आबि बेंच पर बैस रहल |
किछु छन बाद सिस्टर संजय कए आँखि मे ड्रॉप दैत- "आँखि मुनि बैसल रहब"
ओकरा तs आँखि मे दबाई परिते, आँखि एतेक दुखए लगलै जेकर हिसाब नहि, मुदा सहास केने चुपचाप आँखि मुन्ने बैसल रहल | लेकिन पंद्रह-बीस मिनट कए बाद बुझेलै जए माथ एकदम शांत स्थिर भs गेल होय | किछु समाय बाद सिस्टर आबि एक बेर फेर सँ संजय कए आँखिक जाँच कएलाबाद ओकर दुनु आँखि मे दु-दु बूंद दबाई दैत पहिले जकाँ आँखि मुनि कय बैसअ कए निर्देश दैत चैल गएलि | एहि बेर पाहिले सँ किछु कम आँखि दुखेलै |
करीब आधा घंटा बाद सिस्टर आबि संजय कए आँखिक जाँच करैत कहलखिन्ह-
"ठिक छैक, आब जाउ काईल्ह भोरे आठ बजे आएब |"
"अच्छा !"- कहैत संजय उठि बिदा भय गेल, पुनः अपन काका ओइठाम सँ बस्ता लेलक आ अपन घर आबि गेल |
अगिला दिन संजय फेर सँ अस्पताल गेल, डाक्टर साब फेर सँ ओकर आँखिक जाँच कएलखिन्ह आ पाहिले दिन जकाँ सिस्टर सँ आँखि मे दबाई दिया कs आबि गेल |
तेसर दिन अस्पताल मे डॉक्टर साब संजय कए आँखिक भिन्न-भिन्न तरह कए लेंश सँ जाँच कएला बाद चश्माक नम्बर बना एकटा पुर्जा पर लिख पुर्जा ओकर हाथ मे दैत कहलखिन्ह -
"इ अहाँक चश्माक नम्बर अछि, माइनस तिन जए की एहि उर्म मे बहुत अधिक अछि आ अहाँक आँखिक खराबिक गति एखन बहुत अधिक अछि | ताहि हेतु आइये जा कय चश्मा बनबा लेब, आ सैदखन पहिरब | आ हाँ, एक बात आओर जए छ महिना बाद आबि फेर सँ आँखिक जाँच करबा लेब, जाहि सँ इ ज्ञात चलत की आँखिक खराबिक गति कम भेलैक स्थिर भेलैक वा बढी रहल अछि |"
"अच्छा जाई छी " - अपन दुनु हाथ जोरि संजय डॉक्टर साब सँ आज्ञा लेलक |
"ठिक छै जाउ "- डॉक्टर साब |
संजय घर चलि आएल, मुदा ओकर मोन मे एकटा नब द्वन्द मचय लगलैक |
चश्मा !
-"चश्मा कतए बनतै? कतय चश्मा कए दुकान छैक? कम सँ कम डेढ़ -दु सय रुपैया मे चश्मा बनत, इ डेढ-दु सय रुपैया कतए सँ आएत?"
आओर आन-आन प्रश्न सब ओकर मस्तिश्य मे एक कए बाद एक -एक समुद्र कए हिलकोर जेकाँ आबै जाई |
"की करू ? कोना करू ? की बबुजी कए कहिदियैन, जए चश्मा कए नम्बर अन्लौंहें, चश्म बनबा दिय, नहि-नहि कोना कहबनि ? की कहबनि ? नहि कहबनि त चश्मा कतए सँ आएत ? चश्मा किनैलेल रुपैया कतए सँ आएत ? की करु नहि करू ?"
संजय किछु निश्चय नहि कय सकल | एहि सब बिषय मे सोचैत -सोचैत ओकर आँखि लागि गेलै ओ सुइत रहल | करीब तिन बजए बेरुपहर ओकर निन्द खुजलै | उठल, मुंह-हाथ धो भोजन केलक परन्च ओकर मष्टिश्य मे चश्माक द्वन्द मचले रहै | ओ कतौ किच्छो करए मुदा ओकर दिमाग चश्मेक बारे मे सोचैत रहै | गुनधुन-गुनधुन करैत अंत मे ओ एकगोट योजना कए अंतर्गत निश्चय केलक जए साँझुपहर बबुजी कए कहि देतनि, आ कोनो दोसर उपाई ओकरा नहि भेटलैक | आ शायद इ बहुत उचित उपाई रहै |
साँझुपहर ओकर बबुजी नोकरी सँ एलखिन्ह | गर्मीक महिना रहै, हाथ-पएड धोला बाद, बाहर अँगना मे खाट पर बैसला | जलपान इत्यादि कएला बाद इम्हर-उम्हर कए गप्प-सप्प होबए लगलैक | संजय सेहो जेबी मे चश्माक नम्बर बला पुर्जा लेने हुनके लग जा बैस रहल | संजय कए मोन आबो गुनधुन-गुनधुन करै, कहियौन्ह की नहि | अंत मे ओ हाँ कए निर्णय केलक आ अपन सम्पूर्ण हिम्मत कए जमा करैत, जेबी सँ पुर्जा निकालि कs बाबुजी कए दय देलकैन्ह |
"की छै ?" - हलाँकि ओकर बाबुजी पढ़ल-लिखल छथिन्ह,पुर्जा पर सबटा लिखल रहै, अस्पतालक नाम-पत्ता ,मारीच कए नाम उम्र,डॉक्टरक नाम, चश्माक नम्बर वा जरी करै कए तारीख,मुदा तैयो बाबुजी पुर्जा कए पढैत पुछलखिन्ह |
"चश्मा कए नम्बर |" - संजय अपन माथ कए निचा झुकोने डराएत धीरे सँ बाजल |
"ककर"- बाबुजी पुर्जा पढैत बात कए अन्ठाबैत पुछलखिन्ह |
"हमर" - संजय अपन सेफ कए गरदैन सँ निचा घोतैत आगु बाजल -"आई स्कुल मे डॉक्टर आएल रहैक ओ सब बच्चा कए आँखिक जाँच केलकै,
हमरो जाँच केलक, हमर आँखि खराप छै कहलक चश्मा पहिरअ परतै |"
हलाँ की संजय इ सब बात झुठ बाजल, मुदा ओ पिता छथि , पढ़ल -लिखल छथि, डोक्टरक पुर्जा हुनक हाथ मे छनि, ओ पढि सकै छलाह जए इ पुर्जा रोटरी क्लब द्वारा संचालित आँखिक अस्पताल त्रिलोकपूरी तिन ब्लोक कए छै | मुदा कखन, जाहिखन अपन बच्चा वा बच्चाक स्वास्थ्यक प्रति कोनो रूचि रहितैन | हुनका जेना संजय कए बात पर बिश्बास भय गेलैन्ह | बिश्बासो भएलैन्ह त कम सँ कम इ तs ज्ञात भएलैन्ह जए हुनक बच्चा कए आँखि खराप छैन | आबो कोनो नीक डॉक्टर सँ कतौ अपने सँ देखा दियैक वा डॉक्टर देखने छै तs चश्मा बनबा दियै | कनि मोन मे किछो दोसर रंग हेबाक चाहि | एकदम सँ बैसल-बैसायल किनको इ ज्ञात होइन जए हुनक बच्चाक आँखि खराप छै, एकर प्रमाणिकता कए एकटा विशेषज्ञ डॉक्टरक लिखल पुर्जा हुनक हाथ मे छनि | एहि तरहक पित्ता कए मोन मे जरुर किछो भाव हेतैन्ह - आश्चर्य कए, विश्मय कए, दुख कए, तत्पर्यता कए, मुदा नहि, संजय कए बाबुजी कए ऊपर कोनो तरहक प्रभाब नहि , धनसन |
हँसैत संजय सँ कहै छथिन्ह - "डॉक्टर सब एनाहीं कहैत छै, एहि उम्र मे कतौह आँखि खराप होई |"
तै पर संजयक माय कहितो छथिन्ह -"हाँ यौ, एकर आँखि चोनाह लगै छै |"
बाबुजी- "अच्छा देखियौ, इम्हर आ " एकर बाद अपन एकटा आँगुर देखबैत -"इ कएटा आँगुर छै "
संजय-"एकटा "
ऐ बेर दूटा आँगुर देखा कs बाबुजी -"इ कएटा आँगुर छै "
"दूटा"- संजय धीरे सँ बाजल |
"सब ठिक छै, अच्छा कोनो बात नहि,चश्मों बनबा देबौ "- कहैत बाबुजी पुर्जा जेबी मे राखि लेला
तकर बाद इम्हर-उम्हर कए गप्प -सप्प होइत बात ख़त्म |
बात एलै-गेलै समय बितैत रहलै, संजय कए स्कूलक छमाही परीक्षा सेहो ख़त्म भय गेलै, ओकर आँखिक कमजोरिक गति लगातार बढ़ैत रहलै, चश्मा कए नम्बरों अनला महिना सँ उपर भय गेलै मुदा अखन तक ओकर चश्मा नहि बनलै | संजय कए छोटका मामा सेहो गणेश नगर मे संजय कए घर सँ किछुए दूर पर रहै छलखिन्ह | हुनका किछु समान कए खरीदारीक बास्ते सदर बाज़ार जाई कए रहैन | समान किछु बेसी लेबय कए रहैन, ताहि हेतु ओ संजय कए सेहो अपन संगे टेल्हू मे संग कय लेलखिन्ह |
मामा-भगिना दुनु गणेश नगर सँ लाल किला बला बस पकैर, लाल किला कए बस स्टेंड पर उतैर गेला | ओहि ठाम सँ पएरे सदर बाज़ार हेतु चांदनी चौक - खाडिबाबली कए रस्ते बिदा भs गेला | लाल किला कए दिस सँ चांदनी चौक रोड पर किछुए दुकान पार कएला बाद दाहिना हाथ कs एकटा सिनेमा घर परलै आ ओकर तेसरे दुकान, चश्मा कए दुकान रहै | संजय कए नजैर ओहि दुकान पर पैर गेलै | ओ ओहि दुकान कए देख लेलकै, देख की लेलकै ओकर नक्शा अपन मानस-पटल पर उताइर लेलक | चलैत-चलैत संजय कए मस्तिश्य मे एकटा नव विचारक मंथन होबय लगलै -
"चश्मा दुकान तs देख लेलौंह,एहिठाम हम असगरो आबि सकै छी, आबि कs चश्मा बनबा सकै छी | रैह गेलै पाईयक बात, हम अपने पाई जमा करब, तिन महिना मे होएतै, चारि महिना मे होएतै, कहुना कs दु सय रुपैया जमा करब | तकरा बाद एहिठाम आबि कs चश्मा बनबालेब | कि जखन बाबुजी नै बनबा देला तs अपनों तs बनाबी | कियो कान-बात नै दैछथि, काल्हि आन्हर भय जाएब तs - - - नहि-नहि हम जमा करब, दु सय रुपैया जमा करब, अबश्य जमा करब |"
चलैत-चलैत अपने भीतर हराएल संजय, कखन मामा संगे-संगे सदर बाज़ार पहुँच गेल ओ किछु नहि बुझलक, आ नहि ओकरा कोनो रस्ता यादि रहलै, यादि रहलै त मात्र अपन घर सँ चश्मा दुकान तक कए रस्ता |
आब की छलैक, आब तs संजय कए एक गोट नव राह भेट गेलै | जतय कतौ कोनो बाबत,दस -बीस पाई,चारि-आठ आना, एक-दु रुपैया,जए जतय हाथ आबै,एकटा डिब्बा मे जमा केने गेल सब सँ नुका कय छुपा कय माय-बाबु सब सँ |
भेटै कतय ? दोसरा तेसरा दिन पर घरे सँ स्कुल कए टिफिन बास्ते चारि-आठ आना पाई | किएक तs ओकर भोरका स्कुल रहैक आ माय ओतेक भोरे किछु बना कs टिफिन बास्ते देथिन से नहि पार लगैन ताहि हेतु दोसरा-तेसरा दिन पर नगदे चारि-आठ आना वा एक-दु रुपैया जए जहिया भेलै ओकरा भेट जाई | मुदा संजय ओई पाई कए खाई मे खर्च नहि करए | ओ मासूम बच्चा अपन भबिष्य हेतु, अपन वर्तमानक मोन कए मारि सैह कs रहि जए |
कखनो कs कोनो पित्तियो आ मामा लोकिन सेहो किछु पाई-कौरी धिया-पुता कए कोनो बिशेष अबसर पर दय देथिन्ह, मुदा संजय ओई पाई कए खर्च नहि कय कs चश्मा हेतु राखि लए | पाबैन-तिहार जेना दशहरा, रामलीला देखै लेल, मेला घुमै लेल, दिवालीक फत्तक्का किनैक लेल, आन-आन पाबैन-तिहार कए अबसर पर संजय कए जए पाई घर सँ भेटै; सबटा अपन मोन कए मारि चश्मा कए लेल राखि लए | - - - - - -
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आँगाक भाग -अगिला अंक मे | पढनाई नहि विसरि, ओकर आँखिक कमजोरिक कि भेलै ? की ओ अपन चश्माक पाई जमा कय पेलक ? की ओकर चश्मा बैन पेलैक ? एक मांसुम किशोर, एक अनचिन्हार शहर मे कोना,सफलता पेलक, व असफलताक गुमनामी कए अन्हार मे हरा गेल ?
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