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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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जगदीश प्रसाद मण्डल- पंगु (उपन्यास) धारावाहिक आ दूटा लघुकथा

जगदीश प्रसाद मण्डलक

पंगु

उपन्याससँ...

8.

बीसम शदीक छठम दशकक अन्तिम समयमे, माने करीब 1958 इस्वीमे कोसी नदीमे फाटकबला पुलनेपालक सीमामे भारत सरकार बनौलक। कोसीक दुनू कात, माने उत्तरे-दच्छिने कोसी बहैए, पूबो आ पच्छिमो बान्ह सेहो बनल। कोसी पुलक संग-संग, पच्छिमी आ पूर्वी मुख्य नहर बनबैमे सेहो हाथ लगौल गेल। तैबीच 1958 इस्वीमे कोसीमे बाढ़ि आएल। ओना, बरखो बेसी भेल छेलैजइसँ कोसीक बान्ह कतेकोठाम टुटि गेल। इलाकाक फसल जे दहाएल से तँ दहेबे कएल जे गाम-गामक घरो-दुआर खसलआइनार-पोखैर सेहो भराएल-भोथाएल। तेतबे नहि, धारो जैठाम बहै छल तइसँ थोड़ेक पच्छिम घुसकल। केते गाम ओहन छल जइमे कोसीक बाढ़ि नइ अबै छल, तोहू सभ गाममे बाढ़ि आबए लगल। तैसंग ईहो भेल जे ओ बान्ह साले-साल केतौ-ने-केतौ टुटौ लगल आ ओ इलाका दहाइत रहल। कोसीक जे पूर्वी आ पच्छिमी मुख्य नहर छल, जइसँ शाखा नहर सभ बनैक योजना छेलै, ओइ सभ जमीनक सर्वेक काज सेहो हुअ लगल। माने नहर बनैक, नापी-जोखी शुरू भेल। मुदा ने अखन तक मुख्य नहरे पूर्ण रूपेण बनि सकल छल आ ने शाखा नहर सभमे हाथे लागि सकल।

बीसमी शदीक सातम दशक चढ़िते, माने 1962 इस्वीमे चीनक संग भारतक सीमा-विवाद लऽ कऽ लड़ाइ भऽ गेल। जे देशक अर्थ बेवस्थाकेँ आरो चरमरा देलक। तैसंग गाम-गाममे अफवाह पसरल जे अनेको ग्रह एकठाम भऽ गेल, जइसँ जबरदस हानि मनुखो आ मालो-जालकेँ हएत। गाम-गामक देवालयमे अष्टयाम, कीर्तन, नवाहक संग सबा मास, अढ़ाइ मासक कीर्तनक संग यज्ञ-जाप सेहो हुअ लगल। सीतापुरमे सेहो सबा मासक कीर्तन ठकुरबाड़ीमे भेल। मुदा समय बीतैत गेल कोनो तरहक दैवी प्रकोप तेहेन नहियेँ भेल।

1967 इस्वीमे जबरदस रौदी भेल। अखन तक देश अन्नक मामलामे आत्म-निर्भर नहि बनल छल। आन-आन देशसँ अन्नक आयात होइत रहइ। 1967 इस्वीक रौदी चारि सालक भेल। जइसँ केतेको पोखैरक संग इनारोक पानि सुखि गेल। जइसँ खेतीक संग पीबैक पानिक समस्या सेहो उपस्थित भऽ गेल। सीतापुरमे एकटा बड़की पोखैर अछि, जेकर पनिझाउसँ लऽ कऽ भिण्डा सहित बाबन बीघाक अछि। किंवदन्ति अछि जे ओ पोखैर दैंतक खुनल छी। गामक जे आन पोखैर आ इनार छल, ओ तँ सुखिये गेल जे ओइ बड़की पोखैरक पानि सेहो सटैक कऽ पाँच कट्ठापर चलि गेल, जइमे मात्र भरि ठेहुन पानि बँचल। तहूमे तेतेक गादि छल जे पानि तक पहुँचब कठिन छेलइ। अन्न-पानिक बेतरे केतेको मालो-जाल मरल आ लोको मरबे कएल। गाम-गामक जमीन ओहिना परती-पराँत बनि गेल। उपजा-बाड़ीक कोनो ठेकान नहि रहल। अन्तमे गामक लोक ओइ बड़की पोखैरसँ बिसाँढ़ खुनि-खुनि आनि-आनि उसैन-उसैन खा-खा कऽ प्राण बँचौलक।

सरकारक दोसर पंचवर्षीय योजनामे दरभंगा-लहेरियासरायमे अस्पताल बनल। जइसँ दुनू तरहक लाभ आमजनकेँ भेल। जहिना बिमारीक इलाजक सुविधा भेल तहिना डॉक्टरी पढ़ाइ भेने नव-नव डॉक्टरक निर्माण सेहो हुअ लगल। ओना, जइ हिसाबसँ दुनूक जरूरत छल, माने डॉक्टरो आ बिमारीक इलाजोक, तेतेक पूर्ति तँ नहियेँ भेलमुदा किछु तँ भेबे कएल।

1942 इस्वीमे जे देशक जन-आन्दोलन अंगरेजी शासनक खिलाफ उठल ओ अपन चरम सीमापर पहुँच गेल। अंगरेजी शासनक खिलाफक संग-संग अंगरेजी वस्तुक[i] सेहो वहिष्कार भेल। ओइ समय इंगलैंडक मेनचेष्टरक कपड़ा उद्योग दुनियाँमे बहुत आगू छल। भारत सन विशाल देशक विरोध भेने इंगलैंडक कपड़ा उद्योगकेँ जबरदस धक्का लगल। ठीक ओकर विपरीत देशक हथकर्घाकेँ अवसर भेटल, जइसँ गाम-गाममे सूत काटैक संग-संग कपड़ा बुनैक रोजगारकेँ नीक मौका भेटल।

जमीन्दारी उन्मूलनसँ खेतक मालगुजारी जमीन्दारक हाथसँ निकैल बिहार सरकारक हाथ आएल। अपन-अपन जमीन्दारीक चार्ज दइमे जमीन्दार सभ सेहो रंग-रंगक अरंगा लगा-लगा देरी करबे केलैन। मुदा जे भेलसे भेल, जमीनक मालगुजारी बिहार सरकारक हाथ एबे कएल। ओना, गाम-गामक सभ जमीनक मालगुजारी एकरंग नहियेँ छल, मुदा कम कि बेसी तँ छेलैहे। कम-बेसीक माने भेल जे जे जमीन ब्रह्मोत्तर, शिवोत्तर वा अन्य कोनो कारणे मालगुजारीसँ मुक्त छल, ओहू जमीनक मालगुजारी टैक्स रूपमे तँ नहि मुदा शेषरूपमे लागए लगल। ओना, ‘शेषनाम-मात्रे रूपमे छल। टैक्सक अतिरिक्त जे टैक्स लगैत रहै, शेष मात्रओतबे छल।

बिहार सरकारक कर्मचारीक माध्यमसँ मालगुजारी असुलल जाए लगल। गामक किसान सभ जमीनक निलामीसँ बँचैक नमहर साँस लेलक।

ओना, अंगरेजक समयमे–1888 इस्वीसँ 1903 इस्वीकबीच–जमीनक सर्वे भेल छल, जइ आधारपर अखन तक जमीनक हिसाब-किताब चलैत आबि रहल छल, ओइमे अनेको रंगक ओझरी लगले जा रहल छल। माने ई जे किछु ओझरी[ii] सर्वेक पहिनेसँ आबिये रहल छल तेकर अतिरिक्तो अनेको रंगक नव-नव ओझरी उठि-उठि ठाढ़ भेल। तँए, सर्वेक जरूरत भेल।

बीसम शदीक सातम दशकमे जमीनक सर्वेक काज शुरू भेल। गाम-गाममे सर्वेक पहिल सीढ़ीक काज किश्तवार रूपमे शुरू भेल। मुदा किश्तवार करैबला कर्मचारी जे आएल ओ भीतरे-भीतर तेहेन हवा बनौलक जे गामक लोक, जमीनबला सभ ऑंखि मुइन कऽ अपन-अपन खेतक नक्शा बढ़बैले ओकरा घूस दिअ लगल। जइसँ सर्वे की हएत जे पैसाक खेल शुरू भेल, जइसँ गाम-गाममे आरो विवाद फँसि गेल।

1967 इस्वीक रौदी आमजनसँ लऽ कऽ सरकारोकेँ कृषिक लेल पानिक की जरूरत अछि, तइ दिस धियान खिंचलक। ओना, अखन धरिक किसानक संस्कारमे सिंचाइक कृत्रिम बेवस्थाक प्रति ओ आकर्षण नहि आएल छल, जेकर जरूरत छेलइ। मुदा रौदी से अनलक। ओना, कोसी नहरक चर्च किसानक कान तक जरूर पहुँच गेल छेलै मुदा ओइ रूपमे नहि, जइ रूपक खगता छेलइ। कोसीक पच्छिमी मुख्य नहर जे छल, ओकर खुनाइयो समुचित ढंगसँ नइ भेने, अखनो धरि ओहिना लटकले छल।

तैबीच विदेशी[iii] सहायतासँ स्टेट बोरिंग गाड़ैक योजना बनल। ओइ बोरिंगक ओहन पाइप आ इंजिन अछि जे हजारो बीघा खेतक सिंचाइ कइये सकैए। ओना, बोरिंग तेहेन इंजिनसँ गाड़ल जाइ छेलै जे एक्के दिनमे माने आठसँ दस घन्टामे बोरिंग गड़ा जाइत रहइ। मुदा जइ इंजिनसँ पानि निकालल जाइत ओ बिजली चालित छल। जे बिजली केतौ छेलैहे नहि, आ कनी-मनी जँ छेलैहो, से बहुत कम मात्रामे छल, जइसँ बोरिंगक इंजिन चलब कठिन छेलइ। तेकर अतिरिक्त बोरिंगक पानिक लेल नाला चाहै छल, से केतौ बनबे ने कएल। जँ केतौ-केतौ कनी-मनी बनबो कएल तँ तेहेन घटिया काज भेल जे ढहि-ढुहि गेल। एक तँ ओहुना लोक बुझैए जे सरकारी काज आ जेठुआ गरेक[iv] कोनो भरोस नहि। से भेबो कएल। दर्जनो बोरिंग गामे-गाम गड़ाएल मुदा सिंचाइ केतौ ने भेल।

सरकारोक नजैर जखन रौदीपर पड़ल तँ ओहो बोरिंग गड़बैक योजना बनौलक। बैंकक माध्यमसँ एक-तिहाइ, एक-चौथाइसब्सिडीपरबोरिंगक पाइपो आ पानि निकालैबला पम्पसेटोक बेवस्था करौलक। केतौ-केतौ गोटि-पंगरा गड़ेबो कएल, मुदा जेते जरूरत छलसे नहियेँ भेल।

1967 इस्वीमे आम चुनाव भेल। ई चारिम आम चुनाव छल। पहिल 1952 इस्वीमे, दोसर 1957 इस्वीमे, तेसर 1962 इस्वीमे भेल छेलै आ चारिम 1967 इस्वीमे।क्रमश: केन्द्रमे सरकार बनल पहिल प्रधानमंत्री पण्डित जवारलाल नेहरू, दोसर- लाल बहादुर शास्त्री, ओना, किछु दिनक लेल गुलजारीलाल नन्दा सेहो प्रधानमंत्री बनला, आ तेकर बादक प्रधानमंत्री पदपर आसिन भेली इन्दिरा गाँधी।

चारिम आम चुनावमे बिहारक शासन बदलल। ओना, केन्द्रमे काँग्रेसी शासन रहबे कएल मुदा बिहारमे काँग्रेस विराधी सरकार बनल। ओना, कएटाआनो-आनो राज्यमे काँग्रेसी सरकार बदलबे कएल। काँग्रेस छोड़ि सभ पार्टी मिलि बिहारो सरकार बनौलक। नव सरकार बनिते बिहार सरकारक 33 सूत्री कार्यक्रम बनल। मैट्रिकमे अंगरेजी विषयकेँ उठौल गेल। मैट्रिक तकक शिक्षा सेहो फ्री कएल गेल। तेकर अतिरिक्तो कार्यक्रम सभ छल मुदा सरकारमे जहिना एक दिस वामपंथी शामिल छल तहिना दोसर दिस दच्छिणपंथी सेहो रहबे कएल। दुनूक बीच तेना विवाद फँसल जे अठारह मास बीतैत-बीतैत सरकार टुटि मध्यावधि चुनाव भेल।

1971 इस्वीमे पाकिस्तानमे सेहो चुनाव भेल। ओइ चुनावमे पूर्वीयो आ पच्छिमियो पाकिस्तानक बीच लड़ाइ फँसल। पच्छिमी पाकिस्तान कश्मीर, पंजाबआराजस्थान कटि कऽ बनल छल, आ बंगालसँ कटि कऽ पूर्वी पाकिस्तान बनल रहइ। ओना, अजादीसँ पूर्व 1947 इस्वी तक भारत देश जेतेटा छल तइमे पाकिस्तान कटने कमी एबे कएल। जे एकटा देश छल ओ दूटा बनि तीन टुकड़ी भऽ गेल। ओना, 1931 इस्वीमे, अंगरेजीए शासनमेबर्मा सेहो अलग भेल, जे भारतेक पूर्वी भाग छल। पछाइत सिक्किम जे कि एकटा छोट देश छल ओ भारतमे मिलबो केबे कएल।

इन्दिराजीक नेतृत्वमे केन्द्र सरकार छल, ओ पूर्वी पाकिस्तानकेँ संग देलैन। ओना, चारि सालसँ जे रौदी आबि रहल छल ओ 1971 इस्वीमे सालो भरि बरखा भेने समाप्त सेहो भेल। जहिना भारत पूर्वी पाकिस्तानकेँ मदैत केलक तहिना अमेरिका पच्छिमी पाकिस्तानकेँ केलक। अमेरिका शक्तिशाली देश छेलैहे। जेकरासँ मुकाबला करब कठिन छेलइ। सोवियत संघ सेहो शैन्य-शक्तिमे शक्तिशाली भइये गेल छल। इन्दिराजी सोवियत संघसँ शैन्य-सन्धि केलैन। सोवियत संघक सहायतासँ लड़ाइ जमगर भेल। अन्तो-अन्त बंगला देश स्वतंत्र देशक रूपमे जन्म लेलक। पाकिस्तान दू टुकड़ीमे विभाजित भऽ पाकिस्तान, बंगलादेशक नाओंसँ दू देश बनि गेल।

अखन तक, माने 1971 इस्वी तकभारत जे अमेरिकासँ अन्नक[v] आयात करैत आबि रहल छल, तेकरा अमेरिका रोकि देलक। जइसँ पेटक समस्या अपना देशमे उठबे कएल। जइ सभ देशमे अमेरिका अन्नक निर्यात करै छल ओ सभ देश अमेरिकाक प्रभावमे रहै, तँए ऐगला मुँहराबनिकोनो देशसँ अन्नक आयात करब कठिन छेलैहे। सोवियत संघ सेहो अन्नक उपजमे ओतेक सशक्त नहियेँ छल जेते आन-आन शक्तिमे छल। ओना, सोवियत संघ ठण्ढ देश अछि, तहू कारणे ओइठाम अन्नक उपज कम होइ छल। खास कऽ साइबेरियाक जे भाग सोवियत संघमे छल ओइ भागमे तीन माससँ नअ मास तक जमीन बर्फमे डुमल रहै छल, जइसँ ओइठाम कृषि कार्यमे बाधा छेलैहे।

भारतमे अनेको राज्य अछि आ सभ राज्यक अपन-अपन समस्या अछि। किछु राज्य एहेन अछि जइमे बरखो कम होइ छै आ माटियो उपजाउ नहियेँ अछि। तहिना किछु राज्य एहनो अछि जैठाम अधिक बरखो भेने ओइठामक पैदावार सीमित भऽ गेल अछि। तैसंग किछु राज्यमे खाइबला अन्नक उपज तँ कम होइए मुदा तेलहन, कपास इत्यादिक उपज अधिक होइए। सभ किछु होइतो किछु राज्य एहनो तँ छेलैहे जे अपन भरण-पोषण करैत आनो-आन राज्यकेँ अन्न दइ छल। पंजाब राज्य, जैठाम माटियो ओहन उर्वर शक्तिबला नहि अछि आ बरखो कम होइ छै, मुदा ओइठाम एहेन कृत्रिम बेवस्था[vi] केने छल जइसँ अपेक्षाकृत नीक पैदावार छेलइ।

आजुक बिहारक नक्शा तँ बदैल गेल अछि मुदा जखन उत्तर बिहार आ दच्छिन बिहार छल, माने बिहार आ झारखण्ड मिला कऽ जखन एक राज्य छलतखन उत्तर बिहार जहिना धार-धुरसँ भरल छल, जइसँ दाहियो होइते अछि, तहिना दच्छिन बिहार पहाड़, खानसँ सेहो भरल छल जइसँ कृषि क्षेत्र कम रहने कृषिक पैदावार कम रहबे करए।

मिथिलांचल सहित उत्तर बिहारमे धार-धुर तँ अछिए मुदा कृत्रिम बेवस्था–नहर, बोरिंग–क तँअभाव अछिए, जइसँ ऐठामक कृषि-कार्य अनबिसवासू बनले अछि। रौदी-दाहीक खेल साले-साल चलिते अछि। जइसँ अपना ऐठाम कृषि कार्य पंगु बनल अछि। अखन धरिक जे कृषि बेवस्था अपना ऐठाम रहल ओ प्राचीन पद्धतिक अनुकूल रहल। जइसँ उपजक मात्रा निम्नसँ निम्नतर स्तरमे रहल।

देशक सोझा जखन अन्नक समस्या उठि कऽ ठाढ़ भेल तखन केन्द्रो सरकार आ राज्यो सरकारक नजैर कृषि दिस उठल। ओना, अनेको रंगक अन्नक खेती-बाड़ीक लेल अनुकूल क्षेत्र बिहार छीहे मुदा उपजाक जे रेशियो हेबा चाही से नहियेँ छल। सरकारक नजैर उठने किसानकेँ रंग-रंगक सहायताक सुविधा भेटल। पूसा, ढोली, सबौर इत्यादि जगहमे कृषि फार्म सेहो बनल, जैठाम कृषिक पढ़ाइक संग-संग अनुसन्धान सेहो हुअ लगल। जइसँ अन्नक नीक-नीक बीजक अनुसन्धान भेल, जे परम्परासँ अबैत पैदावारमे धक्का मारलक। माने डेढ़िया-दोबर-तेबर उपजाक बढ़ोत्तरी भेल। जइ खेतमे कच्ची मन कट्ठा उपजै छल, तइमे तीन-तीन, चरि-चरि पक्की मनक उपज हुअ लगल।

तैसंग कोसी नहरक लाटमे आनो-आन नहरक खुनाइ हुअ लगल जइसँ खेतक सिंचाइ होइत। बैंकक माध्यमसँ एक-तिहाइ, चौथाइ अनुदानित रूपमे बोरिंग-पम्पसेट लॉनक माध्यमसँ किसानकेँ भेटए लगल। जइसँ गाम-गाममे किछु बोरिंग भेने उपजमे किछु-ने-किछु बढ़ोत्तरी सेहो भेबे कएल। अखन धरि जइ खेतमे मात्र छाउर-गोबर देल जाइत छल, रसायनिक खादक प्रयोग नहि भेल छल, तइ सभ खेतमे रसायनिक खादक संग-संग गोबर-घास-पातसँ निर्मित जैविक खाद सेहो पड़ए लगल। तेतबे नहि, किसानकेँ जैविक खाद बनाएबो सिखौल गेल।

अखन धरि जे सरकारी विभागमे कृषि विभाग मृतप्राय छल ओइमे जान फूकल गेल। ब्लॉकमे कृषि विभागक अलग कार्यालय बनल। गाम-गाममे कृषि विभागक कर्मचारीक[vii] बहाली भेल, जेकरा माध्यमसँ गामक किसानकेँ नव तकनीकक जानकारी देल जाए लगल। ब्लॉक स्तरपर सरकारी कृषि फार्म सेहो स्थापित भेल।

सरकारी माध्यमसँ किसानकेँ खाद-बीज, कृषि-यंत्र अनुदानित दरपर कर्ज रूपमे सेहो भेटए लगल। पूसा, ढोली, सबौर फार्मक माध्यमसँ अन्नक संग तीमनो-तरकारी आ फलो-फलहरीक बीजक संग गाछ सेहो उपलब्ध करौल जाए लगल।

जय-जवान, जय किसानक नारा देशमे बहल। अखन धरिक जइ किसानक शकल-सूरत बिगैर गेल छल ओइ किसानमे नव उत्साह जगल, कृषि पैदावार बढ़ल, देश अन्नक मामलामे आत्म-निर्भर भेल। आत्म-निर्भर भोजनक मामलामे जरूर भेल मुदा कृषि पैदावारमे पंगुपन बनले रहल। जैठाम कृषि आधारित माने कृषि पैदावारसँ पैंतालीस प्रतिशतसँ अधिक कच्चा माल कारखानाकेँ भेटै छै, ओ उपज ठमकले रहि गेल। जइसँ कल-कारखानाक विकास बिहारमे नइ भेल।

ओना, जहिना एक दिस प्रगतिक दिशामे देशक शक्ति बढ़ल तहिना समाजक किछु लोक ओकर विरोध नहि केलैन सेहो बात नहियेँ अछि। रंग-रंगक अफवाह सभ उठबे कएल जइसँ प्रगतिमे बाधा नइ भेल सेहो नहियेँ कहल जा सकैए। अन्ध-बिसवास आ रूढ़िवादी विचार सेहो जमि कऽ विरोध करबे केलक। 

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शब्द संख्या : 1945, तिथि : 4 जून 2018

जारी....


 

[i]इंगलैंडक समानक

[ii]जमीनक बीच समस्या

[iii]चेकोस्लोवाकिया

[iv]जेठक बर्खाक मेघक

[v]गहुम, बाजरा

[vi]नहर, बोरिंग आ भखड़ा-नांगल डैमसँ सिचाइक बेवस्था

[vii]भी.एल.डब्ल्यू.क

 

जगदीश प्रसाद मण्डल

दूटा लघुकथा

गपक पियाहुल लोक

दीनबन्धु काकाकेँ आइ अगिलग्गी केसक फैसलाक तारीख छिऐन। ओना, केस पचीस साल पहिलुका छिऐन, जइसँ पैंतीस मुद्दालहमे पाँचकेँ मरि गेने तीस गोरे जीवित छैथ। काल्हि साँझेमे सभ कियो विचारि लेलैन जे सभ काज छोड़ि भिनसरे समयपर तैयार भऽ सभ कियो संगे साइकिलसँ मधुबनी चलब। सेशन कोर्टक केस छी तँए अपना सभ दिससँ कोनो नियम भंग करबाक नहि अछि, जँ कोर्टे वा मुद्दैये दिससँ कोनो गड़बड़-सड़बड़ हएत तँ ओकरा आगू फरिछा लेब। जखन विचारसँ प्रेम केने छी तखन डरैक कोन बात अछि। कोर्ट-कचहरी हुअ कि थाना-बहाना आकि कस्टडी-जहल, सभठाम जाइले तैयार छीहे।

हरे-हरे सभ कियो–माने तीसो मुद्दालह, एक जुटताक परिचय देलैन। ओना, जहिया केस भेल वा केससँ पहिने जे कारण भेल तहू समयमे सभ कियो एकजुटताक परिचय दइये देने छेलखिन मुदा पचीस साल जे बीचमे समय बीतल, तैबीच कोनो तेहेन काजे नहि भेल जइमे एकजुटताक परीक्षा होइत। एकर माने ईहो नहि जे पैंतीसो डरसँ देह-हाथ समेट लेलैन। समाजिक स्तरक जे काज छल ओ काज बीचमे चलल तँए परीक्षाक घड़ी उपस्थित नइ भेल। मुदा समाजिक बदलावक जे प्रक्रिया अछि तइमे तँ परीक्षा होइते आबि रहल अछि।

खेला-पीला पछाइत जखनदीनबन्धु काका ओछाइनपर पड़ला आ निन्द्राक आगमन हुअ लगलैन तखन चिन्त्य मनमे काल्हुक काज धियानमे जगैत एलैन। धियानमे जगिते नजैर छिटैक कौल्हुका केसपर गेलैन। उठि कऽ बैइसैत पत्नीकेँ सोर पाड़ि बजला-

कनी एम्हर आएब।

कनी एमहर आएबसुनिते प्रेमलता अकचकेली। किएक तँ दीनबन्धु काकाकेँ ओछाइनपर गेला आधा घन्टा भऽ गेल छेलैन। परिवारक लोक सभ बुझिते छैन जे जहिना काज लग पहुँचते काजमे हाथ लगा दइ छैथ तहिना ओछाइनपर पहुँचते निन्द्रासँ तन्द्रा होइत निनिया देवीक कोरामे पहुँच जाइ छैथ, तँए अधिक-सँ-अधिक पाँच मिनट समयक दूरी जागल आ सुतलक बीच हिनका लगै छैन। ओना, प्रेमलता अखन तक ओछाइनपर नहि गेल छेली किएक तँ मरदा-मरदीकेँ खुएला-पीएला पछातिये ने स्त्रीगण सभ खेबो-पीबो करै छैथ आ बरतन-बासन धोइत-उसारैत एक-सबा घन्टा बीचमे लगिये जाइ छैन। अकचकाइत प्रेमलताक मनमे भेलैन जे भरिसक किछु सपना देखलैन तँए एहेन अवाज मुहसँ निकललैन। तथापि शान्त-चीत भऽ प्रेमलता बजली-

कनी हाथ लागल अछि, अबै छी।

योजनाबद्ध ढंगसँ विचारैत दीनबन्धु काका विचारि नेने छला जे परिवार हुअ आकि समाज, अपन जवाबदेहीक जे काज अछि ओ अगुआ कऽ चलबे ने इमानदारीक परिचय दइए। पत्नीकेँ लगमे अबिते दीनबन्धु काका बजला-

दस बजेसँ कोट-कचहरी खुजैए तइसँ पहिने एक घन्टाक रस्ता सेहो टपब अछि, तँए साढ़े आठ बजे अहाँ भोजनक प्रबन्ध करि लेब। जलखै नइ करब, एकेबेर खाइये कऽ घरसँ निकलब।

ओना, प्रेमलता गपक पियाहुल लोक छैथ तँए किछु गप-सप्पकेँ आगू बढ़बैक विचारसँ केसक विषयमे खोर-चाल करब मनमे जगबे केलैन मुदा बरतन-बासनकेँ उसारब आ पतिकेँ सुतैमे बाधा उपस्थित करब विचारकेँ रोकि देलकैन। तँए, प्रेमलता एतबे बजली- बड़बढ़ियाँ।

पत्नीक मुहसँ बड़बढ़ियाँसुनि अपन गोटीकेँ सहपर चलैत देख दीनबन्धु कक्काक योजना अन्तिम चरणमे पहुँच गेलैन। काजक अन्तिम साँस लैत विचारलैन जे चारि बजे भोरे ओछाइन छोड़ि पहिने संगी-साथीकेँ जना देब अछि। पछाइत अपन नित्य-कर्म दिस बढ़ैक अछि। किएक तँ सबहक अपन-अपन नित्य-कर्म अछि तइमे जेते समय लगैए ओ तँ सभकेँ लगबे करत, तँए जँ पहिने अपन नित्यकर्म दिस बढ़ब तँ हो-न-हो केकरो नीन समयपर नइ टुटइ। अन्तिम निर्णय मनमे जगिते निनियाँ देवीक लगौल टौहकीमे दीनबन्धु काका फँसि गेला।

जहिना सुतैक अन्तिम बेलामे चारि बजे भोरे उठैक बेल दीनबन्धु काका रोपि लेलैन तहिना चारि बजे ऑंखि खुजि गेलैन। ऑंखि खुजिते घड़ीपर नजैर दिअ लगलैथ कि देवाल घड़ीक घन्टी टनटनाए लगल। जेकरा गनि दीनबन्धु काका जखन धड़ीपर नजैर खिरौलैन तँ ठीक चारि बजि रहल छल। ओछाइनसँ उठिते अपना संग तीसक जमानतदारक संग एक साथ कचहरीमे उपस्थित हेबाक छेलैन। मनमे कने शंका जगलैन जे अपना देवाल घड़ी अछि तँए समयक गवाही बनि गेल, मुदा जेकरा घड़ी नइ होइ ओ तँ सुतले रहि जाएत। जखने एक गोरेकेँ बिलम हएत तखने तीसो बिलमबे करत। से नै तँ दोसरो-तेसरोकेँ उठा दिऐ जे ओहो सभ उठि कऽ अपन-अपन काजमे लगि जाएत।

मनमे काज अबिते काजक रूपकेँ निहारए लगला। अपना छोड़ि उनतीस आदमी अछि जेकरा घरे-घर सबहक ऐठाम जा-जा कऽ जगाएब अछि, ऐमे जँ पँच-पँचो मिनट समय लागत तखन तँ पाँच मिनट कम अढ़ाइ घन्टा समय लगि जाएत! तहूमे कोट-कचहरीक काज छी, बिनु पाइये चलत नहि, जँ कहीं केकरो पाइक ओरियान नहि भेल होइ तखन तँ आरो काजमे काज जनमिये जाएत किने, जइसँ आरो बेसी समयक नोकसान हएत। अढ़ाइ घन्टा समय निकलला पछाइत जँ अपने अपन नित्य-कर्म दिस बढ़ब तखन तँ अपने सभसँ पछुआ जाएब। यएह ने विपरीत परिणामक विपरीत क्रिया भेल, से नै तँ काजकेँ सघन रूपमे करैक अछि। सघन रूप भेल, एक गोरेकेँ उठेलौं, उठला पछाइत दू गोरे भेलौं, दुनू गोरे दू गोरेकेँ उठौला पछाइ चारू गोरे चारि दिस भऽ गेलौं। जइसँ आठ भऽ जाएब, आठसँ सोलह भऽ जाएब, जइसँ पनरह-बीस मिनटमे सभ जगि जाएत। दस बजे कचहरीमे हाजिर हेबाक अछि तइ बीचक जे काज अछि ओइमे जँ एक-एको मिनटक बचत करैत चलब तँ पनरह-बीस मिनट पुरिये जाएत।

घरसँ जे सोचि दीनबन्धु काका निकलला, रस्तामे तइ सोचमे अशोच जगलैन। अशोच ई जगलैन जे कोट-कचहरीक काज छी, मधुबनी पहुँचते पहिने मुंशियो आ वकीलो साहैबसँ भेँट करब अछि, पछाइत कोर्ट-ऑफिसक सेहो पता लगाएब अछि जे बन्द रहत कि खुजल रहत। खुजलोमे जज साहैब उपस्थित हेता कि नहिइत्यादि-इत्यादि अनेको काज दीनबन्धु कक्काक नजैरपर आबि गेलैन। सभ जुति-भाँति लगबैत घरपर अबैत-अबैत आठ बजि गेलैन। माने चारि घन्टा समय बीत गेलैन। ओना, अपन नित्यो-कर्मो आ चाहो-ताहो रस्ते-रस्ते पार-घाट लगि गेल छेलैन।

घरपर अबिते दीनबन्धु काकाकेँ नहाइसँ पहिने विचार उठलैन जे गामक चौहद्दी ने बान्हि लेलौंमुदाघरक की हाल अछि सेहो तँ जानबे अछि। ऑंगन पहुँच, पत्नीकेँ अछप्पे पुछलखिन-

भानसक की हाल अछि?”

तरकारी कटैकाल प्रेमलताकेँ बामा हाथक ऑंगुरमे थोड़ेक कटि गेल छेलैन तँए मन पीड़ासँ पीड़ाएल रहैन। बजली-

हाल की रहत, बेहाल अछि!”

पत्नीक तामसकेँ दीनबन्धु काका आँकि नहि सकला। ऑंकबो असान नहियेँ छेलैन, किएक तँ दरबज्जा दिसक मुहसँ ऑंगन प्रवेश केने छला आ ऑंगन दिसक रस्ता दिस घुमि प्रेमलता मुड़ी गोंति बैस कटल ऑंगुरकेँ दहिना हाथक ऑंगुरसँ दाबि कऽ पकड़ने छेली। ओना, पत्नीक मुहसँ सुनल बेहालशब्दक दोसर माने दीनबन्धु कक्काक मनमे उठि गेल छेलैन जे भरिसक कोनो कारणे भानसमे गड़बड़ भेल अछि। सहटैत दीनबन्धु काका पत्नी दिस बढ़ला। ओना, कक्काक मनमे तेहेन उमकी उठि गेल रहैन जे जहिना कोनो प्रेमी अपन प्रेमिकाकेँ सात अरब लोकमे सभसँ नीक रूप देखैए तहिना आनन्दसँ आन्दोलन कएल आन्दोलनीक तेहेन रूप पकैड़ नेने छेलैन जे दुनियाँक कोनो दोसर समस्या आकि दोसर काज हवा जकाँ उड़ियाइत बुझि पड़ै छेलैन। आध लग्गा हटलेसँ देखलैन जे पत्नी बामा हाथक कटल ऑंगुरकेँ दहिना हाथक ऑंगुरसँ कसि कऽ दाबि खून रोकने छैथ। धरतीपर पसरल खून, ऑंचरसँ ऑंगुर दाबि कऽ पकड़ने प्रेमलताकेँ बिजलोका जकाँ बिजकल मुँह देख एकाएक दीनबन्धु कक्काक मनमे विचारयुद्ध ठाढ़ भऽ गेलैन। एक दिस अपन जिनगीक ओ समय जे सेशन केसक जजमेन्टक दिन छी, एहिठाम भाग्यक पलटा-पलटी हएत तँए कोर्टमे उपस्थिति भऽ डटैक लेल तैयार रहबअछि आदोसर दिस पत्नीक कटल ऑंगुरक इलाज नइ कराएब तँ हो-न-हो लोहासँ कटल छैन, कहींएक बिमारीमे दोसर बिमारी ने ठाढ़ भऽ जाए..!

बिमारीमे बिमारी जगने जहिना पत्नीकेँ मरैक सम्भावना दीनबन्धु काकाकेँ बुझि पड़लैन तहिना कोर्टमे अनुपस्थित भेने अपनो मृत्यु नजैरपर एबे केलैन। कोर्टसँ लऽ कऽ बाहर तकक लोक कहबे करत जे जाबे ओ अपराधी नहि अछि ताबे कोर्टसँ नुकाएल किए..?

दीनबन्धु कक्काक मन ओझरीमे ओझराए लगलैन। मुदा लगले मनमे निर्णित विचार जगलैन। पहिल, जीवन तखन ने जिनगी। अखन अपन मृत्युक परवाह करब आकि अनकर? एक तँ ओहुना जँ परवाह-परवाहक अन्तर काजक वजनसँ नापल जाइए...।

नव ऊर्जाक संग दीनबन्धु काका विचारकेँ रोकि बजला- 

केना ऑंगुर कटल?”

प्रेमलता बजली-

तरकारी-ले बैगन बनबै छेलिऐतहीकाल नवटोलवाली कनियाँ धड़फड़ाएल आबि बाजल।

समयक संकीर्णताकेँ देखैत दीनबन्धु काका बिच्चेमे बजला-

की बाजल?”

बाजल जे झंझारपुर लग एन.एच.पर एकटा चरि-चकिया गाड़ी उनैट गेलै तइमे एकटा खूब मोटगर-डटगर मौगी चक्का-तरमे मुँह बाबि मरि गेल।

पत्नीक बात सुनि दीनबन्धु कक्काक मन मानि गेलैन जे पत्नीक मन उछैट कऽ ओमहर चलि गेल हेतैन जइसँ बैगनक संग-संग अपनो ऑंगुर काटि लेली। बजला-

बैगन काटैकाल ने ऑंगुर कटल। तइसँ पहिलुका विहीत तैयार भेल अछि किने?”

मुड़ी डोलबैत प्रेमलता बजली- हँ, भात-दालि तँ बनि गेल मुदा तरकारी नइ बनल।

मने-मन दीनबन्धु काकाकेँ काम-चलाउ संतोख भइये गेलैन। बिहुसैत बजला- अहाँ सन सन जँ गपक पियाहुल लोक[i] रहत तँ लोकक[ii] उपकार सभ दिन होइते रहतैन।

बजैक क्रममे दीनबन्धु काका बाजि तँ गेला मुदा लगले मन बिचड़ैत विचार देलकैन जे समाजक बीच कर्मक जिनगीक संग गपोक जिनगी बनि गेल अछि। काज आ गपक बीच नमहर दूरी बनि गेल अछि। जे बनब सोभाविको अछि। जहिना एक छोरपर महिला दिन-राति अपन दुख-धन्धाक पाछू बेहाल अछि तहिना दोसर छोरपर ईहो तँ अछिए जे महिला जगतमे की ओहन महिला नइ छैथ जिनका जिनगीक हर काजक लेल नोकर-चाकर नहि छैन। तखन तँ प्रेमलता ओहन छैथ जिनका बीच-बिचाउमे देख सकै छी।

प्रेमलता बजली- आब की करब?”

दीनबन्धु काका बजला- किछु ने करब। सभ काज रस्तासँ होइ छै, रस्तासँ करब। संगी कऽ दइ छी, डॉक्टर ऐठाम जा कऽ पहिने पट्टी बन्हबा दवाइ लऽ लिअ। हम अपनेसँ परोसि कऽ खा लेब।

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शब्द संख्या : 1420, तिथि : 13 जुलाई 2018
 

 

 

उदय-प्रलय

विदेशसँ पी.एच-डी.क डिग्री पाबि धरणीधर गाम पहुँचला। गाममे पएर दइते गामक बात मन पड़ए लगलैन- यएह गाम छी, जैठाम सात पुस्तसँ बास अछि आ आगूओ केतेक दिन धरि बसले रहब। मुदा लगले समाजिक परिवेश सोझामे आबि धमकलैन। धमकलैन ई जे जहिना अपन जन्म ऐ सुखपुरमे भेलतहिनाबच्चामे पालन-पोषण सेहो भेलपछाइत गामेक स्कूलमे शिक्षा पेबा लेल पिताजी नाओं लिखा देलैन। दस बर्ख धरि गामक स्कूलमे पढ़ि पड़ोसी गामक हाइ स्कूलमे नाओं लिखेलौं आ हाइ स्कूल टपला पछाइत दरभंगा कौलेजमे नाओं लिखा एम.ए. पास केलौं। पढ़ैक अपन जिज्ञासा आ परिवारक सहयोग पेब विदेशसँ विशेषज्ञताक डिग्री सेहो उपार्जित केलौं। डॉक्टर वा आन प्रोफेसर जकाँ तँ नहियेँ भेल जे किछु दिन नोकरी केला पछाइत विदेश गेलौं। नोकरी करैसँ पहिने विदेशसँ डिग्री हाँसिल केलौं, आब नोकरी करब।

आब नोकरी करबवाणीमे अबैत-अबैत धरणीधरक अपनो जिनगीक बानि उबानिसँ सुबानि हुअ लगलैन। उबानि-सुबानिक बीच बाटपर धरणीधरक मन ठमकए लगलैन। एक दिस पूर्वक सात पुस्तसँ गाममे बासभूमि रहल आ आगूक तँ निश्चित ठेकानो नहियेँ अछि जे केतेक दिन रहत। निश्चित ठेकान ऐ दुआरे नहि जे समाजिक परिवेश एहेन बनि गेल अछि जे पढ़लो-लिखल आ बिनु पढ़लो-लिखल लोक अपन बाप-दादाक जन्मभूमि छोड़ि-छोड़ि अनतए बसए लगला अछि, तँए गाम उपैट गेल सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। अखनो ओहन गाम अछिए जे अनेको पुस्तसँ बास करैत अनेको परिवारक वंश आबियो रहल अछि आ आगूओ केतेक पुस्त धरि बसबे करत...।

एकाएक धरणीधरक विचारक व्यारमे लपट उठलैन। लपट ई उठलैन जे गाम छोड़ि जे कियो बहराइ छैथ तेकर हजारो कारण अछि, से अखन नहि, अखन एतबे जे जे अपन गामकेँ चीन्हि गामसँ बहराइ छैथ वा बिना चीन्हने गामसँ बहराइ छैथ। जँ गाम चीन्हि बहरेता तँ गामो जरूर चीन्हतैन आ जँ गामकेँ बिनु चीन्हने जे बहराइत हेता, तँ हुनका संग गामे किए चीन्हि-पहचीन्ह रखतैन?

...ऐठाम आबि धरणीधरक वैचारिक व्यारक लपट सेहो लपटए लगलैन। ओना, धरणीधरक सोभावो अन्वेषी बनि गेल छैन। मुदा अन्वेषियोक तँ अपन संसार छै, आगूमे जे संसार ठाढ़ अछि तोहूसँ किछु लइ छैथ आ अपन जे संसार[iii] निरमै छैन तोहूसँ उपार्जित करै छैथ...। दुनू संसारक बीचक क्षितिजपर लटकल धरणीधर ने ऊपर चढ़ि रहल छला आ ने निच्चेँ उतरल होइन। एक दिस गाम-समाजक विराट रूप, जे रूप यशोदा मैंयाकेँ कृष्ण अपन बालपनेमे देखौने रहथिन आ दोसर ओ विराट रूप जे महाज्ञानी-महापण्डितक संग दुर्योधनक दरबारमे देखौने छेलैथ, दुनूक बीचक जे हजारो योजनक दूरी अछि तइ दलदलमे धरणीधर फँसि गेला।

ओना, अनजान सुनजान महाकल्याण सेहो होइते अछि मुदा ओ जीवन-मृत्युक बीचक बाट छी किने तँए, थोड़ेक कठिन, थोड़ेक उकड़ू आ थोड़ेक भारीक संग जबदाहो अछिए। गाम दिस उनैट कऽ जखन धरणीधर देखए लगला तँ बुझि पड़लैन जे नवतुरिया छौड़ा सभसँ जँ किछु बुझए चाहब आ पुछबै तँ ओकरा बकछुहुल लगतै। तेकर कारणो अछि। आजुक जे नवसृजन भऽ रहल अछि ओ ठीक विपरीत दिशामे अछि, जइसँ ओ लगले कहत जे फल्लॉं गुरुआइ करए चाहैए। ओना, एकर दोसरो पक्ष अछि, जँ अहाँ परिवारसँ समाज धरिक बच्चाक बीच बालपन रूपमे रमि किछु पुछबै तँ ओ एहनो बहुत बात सोझामे रखि दइए जेकर नाँगैर पकैड़ अहाँ नेंगरियबैत ओकर मुँह धरिक परिचय पेब सकै छी। ओना, उम्रक कारणे वा उदित ज्ञानक कारणे धरणीधर ने आगू सोझ[iv] बाट देख रहल छला आ ने मनविचार पाछू सहैट रहल छेलैन। हराएल-भोथियाएल बाटपर ठाढ़ बटोही जकाँ धरणीधर चारू दिस चकोना भऽ भऽ देखए लगला। मुदा केम्हर मुहेँ बढ़ब से निश्चय कइये ने पाबि रहला अछि। ओना, धरणीधरक मनक बीच स्पष्ट रूपमे विचार जगि चुकल छेलैन जे जहिना कोनो भूमिक[v] लेल मनुखक खगता अछि तहिना मनुखोक लेल भूमिक खगता सेहो अछिए। ओना, खाली मनुखे मात्रकेँ नहि, आनो-आनो जीव-जन्तुक लेल भूमिक खगता अछिए। मुदा ओकरा ने चिन्तन शक्ति छै आ ने सोचन क्रिया...।

इतिहासक विद्यार्थी रहने धरणीधरकेँ एतेक तँ मनमे छैन्हे जे केना-केना राज-पाटक छीना-झपटी दुनियाँमे होइत आबि रहल अछि आ कोन-कोन रूप[vi]क देश दुनियाँमे बनल-बसल अछि। मुदा किए अछि आ किए भेल से बुझिये ने पेब रहल छला। खाएर.., अन्वेषी मन धरणीधरक बनियेँ गेल छेलैन तँए देखल संग मन किछु दूर बिनु-देखलोक आगू दिस दौड़िये जाइ छेलैन। मुदा जेतएसँ सुनसान बुझि पड़ैन तेतए-सँ घुमि जाइ छला। आगू दिस जखन नजैर उठैन तँ देख पड़ैन जे दुनियाँक जननिहार विशेषज्ञ रहितो अपन गाम-घरक इतिहास जनिते ने छी। ओना, एहेन दुर्भाग्य मिथिलावासीकेँ शुरूहेसँ रहलैन जे अध्यात्मिक रूपमे मिथिलाक परिचय भेलैन मुदा वैज्ञानिक रूपमे नहि भेलैन अछि जइसँ ज्ञान रहितो सज्ञानसँ दूर छथिए। किएक तँ ज्ञानक पाछू विज्ञान अबैए आ विज्ञानक पाछू सज्ञान अबैए...। लगले मन पिघैल कऽ मोमबत भऽ गेलैन। मोमबत होइते धरणीधरक मन बिचड़ए लगलैन- अखन तक विद्यार्थीक जिनगी रहल, एक अध्येताक रूपमे गुजैर रहल छी, जँ केतौ प्रोफेसर भेल रहितौं तखन किछु पदक मदो रहैत मुदा से तँ अछि नहि। किए ने अपन गामेक बुढ़-पुरानसँ अपन गामक इतिहासक पता लगाबी। ज्ञाने तँ एहेन गुण छी जे केकरोसँ कियो छिपबैत नहि अछि। ई दीगर भेल जे ज्ञानोमे क्षलज्ञान कहियौ आकि चोरज्ञान आकि बलज्ञान सेहो अछिए जे एक-दोसरकेँ छलितो अछि, चोरोबितो अछिआछीनतो अछिए।  मुदा जैठाम तीनू संगे अछि, तैठाम तँ थोड़ेक भरिगर भइये जाइए। अन्वेशी सोभाव रहने धरणीधरकेँनिर्णय करैमे सिर-संकोच नहि होइन। निर्णय कऽ लेला जे गाममे ने कियो दोस छैथ आ ने दुश्मन, सभ गौंऑं भेला तँए किनको ऐठाम जा कऽ पुछब (बुझब) सँ हिचकब नहि। सभठाम जाएब आ सभसँ गामक पुरान गति-विधिसँ लऽ कऽ आजुक गति-विधि तक जानैक कोशिश करब। जेतेक भेटत तेतेक अपन अनुसंधान भेल जे नहि भेटत ओ ऐगला पीढ़ी-ले रहत।

दोसर दिन धरणीधर गामक जे सभसँ बुढ़ बड़गद बाबा छला तिनका ऐठाम पहुँचला। बड़गद बाबा एक जोड़ बकरी लऽ कऽ चरबैत रहैथ। अपने बड़क गाछक निच्चॉंक छाहैरमे बैसल आ बकरी बाधमे चरैत रहैन।

धरणीधर पहुँचते बजला-

बाबा, अहींसँ किछु बुझैक अछि?”

ओना, पहिने बकरी चरबाह बड़गद बाबाकेँ अनसोंहाँत लगलैन जे हमरा सन बुड़िवानसँ एकटा नवजुगक बुधियार लोक की पुछत..! मुदा अपन उमेरक लेहाज करैत बड़गद बाबा बजला-

बाउ, बकरी चरवाह सन लोककेँ बुइधिक ओकाइतिये केते रहै छै जे किछु पुछब, मुदा जएह रहै छै ओइसँ जँ दोसरकेँ उपकार हएत तँ ऐसँ पैघ कीर्तिये की हएत आ दाने की हएत।

धरणीधर बजला-

बाबा, अहाँ तँ अस्सी बर्खसँ ऊपर चढ़ि गेल छी, तँए अस्सी बर्खक दिन-रातिक घटना तँ गामक देखल-सुनल अछिए।

बड़गद बाबा बजला-

बौआ, जेते देखलौं आ जेते गुणलौं ओते जँ मन रखितौं से ओहन चौरगर बुइधिक बखारी थोड़े अछि। मुदा तैयो नइ सोलह अना तँ सोलह पाइयो बरबैर नइ अछिसेहो नहियेँ कहल जा सकैए।

धरणीधर-

आब तँ उमेरक हिसाबसँ ऐसँ भारी, माने बकरी चरवाहिसँ भारी काजो नहियेँ कएल हएत, तखन तँ जीवन-ले किछु करब आवश्यक अछिए।

धरणीधरक विचारमे जेना बड़गद बाबाकेँ अमृत भेट गेल होनि तहिना मन तिरपित[vii] भेलैन। बिहुसैत बजला-

बौआ, अहाँ नव पीढ़ीक लोक छी, अखन दुनियाँमे पएरे रखलौं अछि, नीक जकाँ भरिसक रोपाएलो हएत कि नहि से तँ हमरा नइ बुझल अछि।

बड़गद बाबाक विचारमे धरणीधरकेँ की भेटलैन से तँ असल धरणीधरे बुझता, मुदा मुँहक रोहानी कहए लगलैन जे जेना सजमनिक सिर भेट गेल होइन। लंकामे राम-रावणक लड़ाइमे मेघनादक वाणे जखन लक्ष्मण मुरछेला तखन जीबैक लेल मात्र सिर सजमनियेक खगता पड़ल रहैन, जे हनुमान सुमेर पर्वत उठा कऽ आनि पुरौलकैन। पएर रोपैक बात सुनि धरणीधर बजला-

बाबा, पएर रोपैसँ पहिने जगह-जमीन चाही किनेआतेकरो पहिने चीन्हब तखन ने ओइपर अजमा कऽ पएर रोपब।

ओना, धरणीधर जइ रूपे बुझए चाहै छला तइ रूपे तँ बड़गद बाबा नइ बुझा सकै छेलैन, मुदा एते तँ मनुखक सोभावमे रहिते अछि जे दस-पाँच छोड़िसैंकड़ामेनबे-पनचानबेटा ओहन लोक तँ छथिए जे प्रश्न बुझैथ वा नइ बुझैथ मुदा किछु-ने-किछु जवाब देबे करता, भलेँ ओ प्रश्नक उत्तर होउ वा नइ होउ, प्रश्नसँ मेल खाउ वा नइ खाउ...। मुदा एते तँ धरणीधरक अन्वेशी सोभाव मानियेँ गेल छेलैन जे जँ कोनो विचारक छाहोँ-छूँह देख लेब तँ ओइसँ अनुमान कइये सकै छी जे पहाड़क छॉंह छी आकि गाछ-बिरीछक, तँए धरणीधरक मन प्रमुदित भइये गेल छेलैन।

बड़गद बाबा बजला- 

बौआ, आइ दस बर्खसँ बकरी चरवाहि करै छीजइसँ दुनू परानीक दुनू साँझक बुतातक जोगार भऽ जाइए।ओना, बेटा-पुतोहु सेहो अछि मुदा ओकरा तँ अपने तेतेक डारि-पात भऽ गेल छै जे दिन-राति हेरान रहैए। बाल-बच्चा अवोध छै, ओ कियाँने गेल जे उपार्जन केकरा कहै छै आ एकर की खगता लोककेँ छै, मुदा हमर तँ धॉंगल जिनगी अछितँए बातकेँ बुझै छी।

बड़गद बाबाक कर्मठता सुनि धरणीधर बजला-

बाबा, ईहो तँ लोक कहै छै जे बड़ रे बालकएक समानामाने जहिना बच्चा तहिना वृद्ध दुनू एके रंग भेला।

बड़गद बाबा बजला-

बाउ, एके मुहेँ लोक केकरो गारियो पढ़ैए आ केकरो आसिरवचन सेहो दइए, मुदा दुनू एक थोड़े भेल। बच्चा जिनगी (मनुखक) पूर्व पक्ष भेल, वृद्ध उत्तर पक्ष भेल, तँए दुनूकेँ एक थोड़े मानल जा सकैए।

धरणीधर बजला-

बाबा, बकरी चरवाहिसँ पहिने की करै छेलिऐ?”

मुस्की दैत बड़गद बाबा बजला-

महराइ गबै छेलौं। भरि-भरि राति अपने ढोलको बजबी आ महराइयसँ लोककेँ जगेबो करिऐ, मुदा गाम दिस जखन नजैर उठा तकै छीतँ अपनासँ पुरान[viii] कहाँ केकरो देखै छिऐ। अखन जेतेक लोक गाममे अछि, ओकर जनम हमरा आगूमे भेल छइ।

धरणीधर बजला-

अपन मन केहेन कहैए?”

बड़गद बाबा-

मन की कहत, जिनगी जीबैमे कहियो अभाव भेल जे मन किछु कहत आकि उपराग देत। उपरागक भागी तँ ओ अछिजे परजीवी अछि, वा जे अनका भरोसे जीबैए।

बड़गद बाबाक बात सुनि धरणीधरकेँ जेना मन प्रस्फुटित भऽ गेलैन तहिना सोलहन्नी मुस्कान दैत बजला- वाह!”

वाहसुनि बड़गद बाबा फुटि पड़ला-

गामक माटि-पानिक उदय-प्रलय केना भेल आ केना होइए, गामक उदय-प्रलय केना होइए, मनुखक उदय-प्रलय केना भेल आ केना भऽ रहल अछि। तहिना दुनियोँक उदय-प्रलय केहेन अछि आ केहेन हएत, एते बात बुझैक ने खगता अछि वाउ आ ने बुझिये पएब। तखन तँ..?”

धरणीधरक मन जेना भरि गेल होनि तहिना बजला-

बाबा, चाह पीबैक बेर भऽ गेल अछि, अखन जाइ छी।

बड़गद बाबा-

बाउ, नव पीढ़ीक कर्ता-धर्ता अहीं सभ छी, हमरो सभपर धियान राखब।

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शब्द संख्या : 1574, तिथि : 15 जुलाई 2018


 

[i]पत्नी

[ii]पतिक

[iii]सोचन क्रिया

[iv]स्पष्ट

[v]जन्मभूमिसँ लऽ कऽ बासभूमि माने देशक

[vi]भौगौलिक

[vii]तृप्ति

[viii]उमेरक हिसाबसँ, उमेरगर

 

रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।