प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly ejournal विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.

 

महाकवि भास प्रणीत कर्णभारम् मैथिली अनुवाद

(प्रस्तावना क आगू)

 

डा. बिपिन कुमार झा

(संस्थापक आ सम्पादक- जाह्नवी संस्कृत ई-शोधपत्रिका)

 

 

 

(एहि सँ पूर्व महाकवि भास केर लिखल कर्णभारम् जे कर्णक मनोव्यथा पर लिखल गेल प्राचीनतम एकांकी अछि, संस्कृत में लिखल एहि ग्रन्थक प्रस्तावना धरि मैथिली रूपान्तर पढने रही अहाँ सब आई ओहि सं आगू)

(ततः प्रविशति भटः।)

तदनन्तर सैनिक प्रवेश करैत अछि।

भटः- भो भोः! निवेद्यतां निवेद्यतां महाराजायाङ्गेश्वराय युद्धकाल उपस्थित इति।

सैनिक-हे निवेदन करियौन्ह, निवेदन करियौन्ह महाराज अंगेश्वर सं जे युद्धक समय आबि गेल।

करितुरगरथस्थैः पार्थकेतोः पुरस्तात्

मुदितनृपतिसिंहैः सिंहनादः कृतोद्य।

त्वरितमरिनिनादैर्दुस्सहालोकवीरः

समरमधिगतार्थः प्रस्थितो नागकेतुः ।। 3 ।।

अर्जुनक ध्वजा क आगू हाथी, घोडा एवं रथ पर सावारी कय प्रसन्न चित्त ई राजा सभ सिंहनाद कय रहल छथि। शत्रुसभक सिंहनाद स दुःसह एकटा योद्धा और हाथी क ध्वजा बला ई दुर्योधन सभ गप्प बुझि कें शीघ्र युद्ध हेतु प्रस्थान कय रहल छथि।

(परिक्रम्य विलोक्य) अये अयमङ्गराजः समरपरिच्छदपरिवृतः शल्यराजेन सहस्वभवनान्निष्क्रम्येत एवाभिवर्तते।

चारू दिस घुमिके । अरे ई त अंगराज कर्ण युद्धोचित वस्त्रपहिर शल्यराजक संग अपन महल सं एम्हरे आबि रहल छथि।

भोः! किं नु खलु युद्धोत्सवप्रमुखस्य दृष्टपराक्रमस्याभूतपूर्वो हृदयपरितापः। एष हि

सुनल जाउ! जिनकर पराक्रम देखने छी एहेन युद्ध के उत्सव माननिहार के एहेन हृदयताप . ई निश्चित रूप सँ-

अत्युग्रदीप्तिविशदः समरेऽग्रगण्यः

शौर्ये च संप्रति सशोकमुपैति धीमान्।

प्राप्ते निदाघसमये घनराशिरुद्धः

सूर्यः स्वभावरुचिमानिव भाति कर्णः ।। 4 ।।

अत्यन्त प्रखर तेज सं जाज्वल्यमान युद्धस्थल में  तथा पराक्रम में  सदैव अग्रणी एवं बुद्धिमान होइतो शोकाकुल भय कर्ण ओहिना लागि रहल छथि जेना ग्रीष्म ऋतुक सूर्यक प्रभाव मेघ सं आच्छादित भेलाक कारण मन्द भय जाइत अछि।

यावदपसर्पामि।

तावत आगू बढैत छी

(निष्क्रान्तः।)

सभ चलि जाइत अछि।

(ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टः कर्णः शल्यश्च।)

ओकर बाद जेना पहिने कहल गेल, ओहि अनुरूप कर्ण आ शल्य प्रवेश करैत छथि।

कर्णः- मा तावन्मम शरमार्गलक्षभूताः

संप्राप्ताः क्षितिपतयः सजीवशेषाः।

कर्तव्यं रणशिरसि प्रियं कुरुणां

द्रष्टव्यो यदि स भवेद्धनञ्जयो मे ।। 5 ।।

शल्यराज! यत्रासावर्जुनस्तत्रैव चोद्यतां मम रथः ।।

कर्ण- नीक होयत कि आय जीवित ई राजा महाराजा हमर बाण के रास्ता में नहिं आबथि। अतः युद्धस्थल में अर्जुन के देखला सं हमरा कौरवक अभीष्ट कार्य पूरा करब ।

 

शल्यराज! यत्रासावर्जुनस्तत्रैव चोद्यतां मम रथः ।।

हे शल्यराज! जतय ओ अर्जुन अछि ओतय हम रथ लऽ क चलू।

शल्यः- बाढम्। (चोदयति)

शल्य- नीक गप्प (रथ आगू लय जाइत छथि।

(अनुवर्तते)

 

 

(पाठक सुविधा लेल पहिल भाग सेहो नीचाँमे देल जा रहल अछि- सम्पादक)

 

महाकवि भास- कर्णभारम्


अनुवादकर्ता एवं ग्रन्थ परिचय:- अनुवादक बिपिन कुमार झा, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, मानित विश्वविद्यालय, श्री सदाशिव परिसर पुरी, ओडिशा केर साहित्य विभागमे अध्यापनरत छथि। संस्कृत केर प्रमुख ग्रन्थक अनुवाद मैथिलीमे करब अनुवादकक सहज रुचि मात्र छन्हि। यदि अनुवाद केर कोनो अंश समुचित नहि लालगए तँ अवश्य सूचित करी। एतय प्राप्त श्लोकक भावानुवाद गद्येमे देल गेल अछि । ई ग्रन्थ चौखम्भा पब्लिशर्स, वाराणसीसँ प्राप्त कएल जा सकैत अछि। 'कर्णभारम्' महाकवि भास रचित एकटा एकांकी अछि। जतय कर्णक उदात्त चित्रण कएल गेल अछि।

नाटकक पात्र केर परिचय
पुरुष पात्र

कर्ण- कौरव केर सेनापति (अङ्गदेश केर राजा)।

शल्य- कर्ण केर सारथी (मद्र देश केर राजा)।

भट- सिपाही

इन्द्र- ब्राह्मणरूपधारी इन्द्र

देवदूत- इन्द्रक ब्राह्मणरूपधारी दूत।

(नान्दीपाठक अन्त मे सूत्रधारक प्रवेश।)
 

सूत्रधार-

जाहि भगवान विष्णुक नरसिंह अवतारक शरीर के देखि के नर-नारी, राक्षस, देवतालोकनि और पाताललोक सेहो आश्चर्य मे पडि गेलाह। जे अपन वज्रक समान कठोर नहक अग्रभाग सँऽ दैत्यराज हिरण्यकश्यप केर छाती विदीर्ण कयलथि। एहेन राक्षसी सेनाक विनाश करयबला भगवान श्रीधर अहाँ सभ कें कल्याण करथु।।१॥


एहि तरहें हम अपने सभ कें सूचित करैत छी जे (घूमि कें आ कान द कें सुनैक अभिनय करैत) अरे ! सूचना देबा मे व्यस्त हमरा ई कोन तरहक आवाज सुनाई दरहल अछि। ठीक! देखियै तऽ!

(नेपथ्य मे)

महाराज अङ्गराज कर्ण सँ निवेदन कयल जाय; निवेदन कयल जाय।

सूत्रधार- ठीक अछि। बुझि गेलहुँ।

भयंकर लडाई शुरू भय गेला पर; व्याकुल आ हाथ जोडैत परिचारक, दुर्योधनक आज्ञा सँ कर्ण के समाद दय रहल अछि॥२॥

(सब चलि जाइत अछि।)

॥प्रस्तावना खत्म भेल॥


 

रचनापर अपन मंतव्य editorial.staff.videha@gmail.com पर पठाउ।