प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

विदेह नूतन अंक
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राज किशोर मिश्र, रिटायर्ड चीफ जेनरल मैनेजर (ई), बी.एस.एन.एल.(मुख्यालय), दिल्ली,गाम- अरेर डीह, पो. अरेर हाट, मधुबनी

कहक' अहि

दुः खक' बादरि जाहि म न मे,
उठैत रहैत अछि घुमड़ि -घुमड़ि ,
ओ मेघ तरल भ' नयन सँ
बनि नोर खसैत अछि झहरि -झहरि ।

पानि भरल सरो वर मे,
कहाँ भिजैत अछि पुड़ैनिक' पात,
बिनु भिजने अन्हार सँ,
इजोत बहराइत अछि , बनि परात।

छल क' निमंत्रण-पत्र पर,
हर शब्द अछि षडयंत्र,
आ', 'निवेदन' क्रूर विपत्ति के
लिखल हाथ सँ पत्र।

अंधविश्वास जे पसरल अछि ,
अछि, ईहो एक तरहक अपराध,
भ' जाइ एकर देहावसान ,
आ, सब मिलि कए दिऐ सराध।

अनकर विपत्ति के देखि कए,
होइत अछि मोन हर्षित जिनकर,
मद्दति पेबाक अधिकार नहि ,
दुः ख आबए जखन, हुनकर सिर पर।

नहि समान होइत अछि , सभदिन
अलग-अलग छै ढंग,
श्रृंग, रसातल आ समतल,
जगहेक सभ अछि रंग।

मानल जाइत अछि शिष्टाचार,
कोनो सभ्यता के राजदूत,
प्रथमहि सुन्दर परिचय सँ,
भविष्य -छवि , होइत अछि मजबूत।

औपचारिकता आवश्यक,
मुदा, रहैछ यथार्थ सँ दूर,
हँसब, घुघनो लटकल मे,
करइ छै इएह, मजबूर।

ढोंग पसारैत अछि भाभट,
बनि क' खूब, गड़ार,
भाभंसो किछु ने होइत छै,
आ, अंत मे होइछ देखार।

अजबारि लेथि ओ मोन के,
जिनका मे भरल अछि डाह,
नहि त' करतन्हि , धधकि -धधकि ,
अपनहि सर्वस्व सुड्डाह।

इतिहास प्रमाण लए ठाढ़ अछि ,
बुझबए लेल ई बा त,
अन्हेरक 'जिनगी नहि रहलै,
बढ़ि क' राति सँ प्रात।

जाधरि , रहैत अछि इजो त,
नहि आबि सकैत, अछि अन्हा र,
मुदा, इजोत जखन चाहए,
अन्हार के क' दैछ, बहार।

अपनैती सँ जीतल जाइछ मोन,
जीतल ने जाइछ बरजोरी ,
मोम घमैत अछि पाबि धा ह,
नहि घमत, कतबो खखोरी ।

नहि जनैत छी , भवि ष्य-को ख मे,
अछि एकछाहे, फूल कि काँट,
मुदा , प्रकृतिक नियम इएह अछि ,
अगबे दुः ख ने, पड़ै छै फाँट।

मृत्यु -लोक मे कीर्ति टा ,
कएने अछि अमृत -पान,
माटि क' घट, फुटि जाइत अछि ,
मुदा , कीर्ति ने जाइछ मसान।

दुःख के द्वारा देल निमंत्रण,
की करतइ कि ओ स्वीकार?
मुदा , कुमति , जिनकर पोसल,
जा दैछ,विपत्ति , हकार।

सज्जनता -व्यवहा र -पत्र,
अछि शि ष्टा चा र-मो सि सँ लि खल।
सुवि चा रक, उपका रक आखर,
मो ती सन, ओहि पर अछि नि खरल।

सत्य -खेत मे उपजल, सुख के
दा ना मे अछि नैति कता -स्वा द,
हि तैषी आओर सदा मुदि तकर,
कल्या णका री , नि र्वि वा द।

आएल जखन अन्हर -बि हा रि ,
पकड़ि लेलहुँ हम धैर्यक खा म्ह,
नचि ते आपस गेल, मुदा हम
भेलहुँ ने टस-मस, अपन ठा म।

वि ना श, शां ति क दला न पर
आएल,कए क' वि ध्वंस,
शां ति कहलि -'अएलहुँ बजबए ,
जखन भेलहुँ नि र्वंश '?

बएन पठौ लथि जे घर -घर मे,
अपना पनक' ओ आशी र्वा द,
बढ़ि गेलैन्हि मां गल्य हुनक घर,
भेलैन्ह ने कहि ओ, को नो हरमा द।

जि नकर करतब -कवच ओहन,
जे, हो इछ अदि नता -घा त, बेका र,
बदलब जनैत छथि भा ग क रेघा ,
लि खलो जँ दुर्दि न, हुनक कपा र।

मनो रथ ककर ने हो इत छै?
सदि खन रहए सुख संग,
पर, छुच्छे सुख भेटलै ककरो ?
सूर्यो छथि , ग्रहण सँ तंग।

इजो त सँ टुटि जा इत अछि ,
अन्हा रक नमहर अहंका र,
प्रभा -परि धि मे हा रल तम पर,
इजो त क' हो इत अछि जयजयका र।

नभ-जलक वि षम बटबा रा सँ,
उठल मेघ पर, नमहर वि वा द,
कतहु भूमि सुखा एल अछि
रौ दी कतहु, कतहु आबा द ।

भू पर सुखला हा मरुभूमि ,
ई त' मेघ लेल अछि खि धां स,
अल्प -सीं चल, व्यंग्य, आ
जत 'पूर्ण वृष्टि , से त' यशां श।


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