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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

विदेह नूतन अंक पद्य    

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(ग्राहकक हस्ताक्षर)

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका B R E A K the Language Barrier - Read in your own script Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

 

गंगेश गुंजन:

जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित ।

 

राधा १७म खेप

एना  किएक बेशी अनुभव आब अनचिन्हार लगइये 

एना किएक लोको सब, सखि पर्यंत बुझाइत रहैए आन 

कौखन तं ई घरो-आँगन,टोलक सब गाछ-बृक्ष 

बाट-घाट,गाय गोरू फूल पात, इनार |

सब किछु अनुभव होइत अछि दूर दूरस्तक बस्तु, तेहल्ला |

कौखन क' कोना बुझाय लागलय आन गाम आब अपनहिं ई गाम |

बेशी लोक देखितहिं करय लागैत बुझाय उपहास 

एना कोना मोन हमर बन्हा गेलय अपनहि लाचारिक ठाठ?

मामूली मूक मालजाल जकां नियतिक सोझां मे निहुरल 

जीवित अछि देह-प्राण यद्यपि ई तैयो बुझाय लागय निष्प्राण |

कौखन तं सबटा जे एखनहिं छल सोझां मे प्रत्यक्ष अर्थवान 

सौंसे घर एक संग मिझा गेल डिबिया जकां अकस्मात भ' जाइछ 

अन्हार सबटा व्यर्थ |

सब अनुभव तकर गतिविधि बेकार 

से व्यर्थ मन-भार क' दैत अछि नवे तरह सं व्याकुल 

सबटा सब तरहक जतबा जे बुधि अपन लगा-लगा 

थाकि जाइत अछि  इच्छा|

सबटा जे अनसोहांत, अनिच्छित-अनपेक्षित परिस्थिति 

सब मे सं किछु ने किछु अंकुराय लगैत बुझाय लगइये दैत पेंपी,

एक क्षण-दू क्षण जतबा धरि संभव ध्यान देब -

से लगले ओ सबटा अंकुर सब  

अपन अपन दुपत्ति-तिनपत्ती बनि 

माटि पर पनगैत सघन जीवन स्पंदित वनस्पति भ

हरियर-हरियर लहलहाईत  बुझाय लागैत अछि  I

सौंसे परिवेशक एहि एहि मनक सबटा व्यर्थ बोध ,

स्वयं सेहो जेना अपना स्वभावें अंकुराय लगैत अछि -

देखितहिं देखैत बन' लागय अन्न,फल-फूलक से छोट-पैघ गाछ

रमनगर, सभ टा अपना -अपना रंगक आशाक  हरियरीक आभास 

सद्यः अभिभूत करैत, ' दैतछि देखबा लेल बाध्य |

देखबा लेल माने ओकर परिचर्या -सेवा ....

 

अनायास तकैत छी घैल पानि,

सभ कें पटब' मे लगैत छी|

सभ कें जल पिया-पिया जखन होइ छी तृप्त तखन 

अपनहु देब' लगैत अछि कंठ मे त्रास

पियासक उत्कट इच्छा ...

अहा ! कंठगत होइत एको आंजुर ज'ल !..

हा कृष्ण !

कत' छथि ?

मुदा जँ पीयब तं श्रीकृष्णेक हाथें.

खाहे छुटि ने जाओ ई प्राण .

देखिअनि आखिर कहिया धरि नहि लैत छथि हमर कुशल-समाचार

कहिया धरि सहैत रहैत छथि- हमर पियास