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१.
राजदेव मंडलक
४टा कविता२. विद्यानन्द
झा (विदू)-
हमर मिथिला
राजदेव मंडलक चारिटा कविता-
1)बघनखा
कतउ नहि किछु बचल सुच्चा
जतए देखू ततए बघनखा
पत्नीक आँखिमे नोर भरल
ताहिमे सँ खसल बघनखा
कतउ नहि किछु बचल सुच्चा
रोटी तोड़ि मुँहमे लेलहुँ
पड़ल दाँत तर बघनखा
कतउ किछु बचल सुच्चा
वस्त्र झाड़ि कऽ पहिरैत काल
भट्ट दऽ खसल बघनखा
कतउ नहि किछु बचल सुच्चा
सुतल छलहुँ घरमे
आकि चारसँ चमकैत
झनाक दऽ खसल बघनखा
कतउ नहि किछो बचल सुच्चा
मित्रक बड़का कुरतामे
बटनक बदला बघनखा
कतउ नहि किछु बचल सुच्चा
वएह देखि रहल छी सर्वत्र
कि हमर आँखिए
बनि गेल बघनखा?
2) रँगक खोज-
फाटल वस्त्रकेँ सीबैत
चौन्हिया गेल चक्षु
धड़फड़ीमे गड़ि जाइत अछि
सुइया
अपनहि हाथमे
आ चाटि लैत छी
स्व रक्तकेँ
जाहिसँ लगबैत छी- अनुमान
दोसर शोणितक स्वादकेँ
बिसरि ओहि पीड़ाकेँ
पुन: लगबैत छी चेफड़ीपर चेफड़ी
बदलि गेल वस्त्रक रँग
भऽ गेल अनचिन्हार
लगैत अछि जेना
कतेको रँगक झंडा
टाँगल हो एकेठाम
तइओ चला रहल छी काज
मुदा भऽ जाइत अछि लाज
कहियोकाल- कतेको जोड़ी आँखिक
व्यंग्यात्मक तीरसँ
भऽ जाइत बिद्ध
तैं घरे मध्य नुकाएल रहब
हमरा लगैत अछि नीक
किन्तु पेटक आगि
नहि रहए दैत अछि- निचेन
अवश भऽ कऽ निकलि गेल छी
लाल रँगक खोजमे
जाहिमे रँगे देलासँ
चितकबरा खण्ड सभ
भऽ जाइत एक्के रँग
तबे टूटत
हमर हीन भावनाक जाल।
3) कंटकमय नवनीत
हमरा सम्पूर्ण शरीरमे
जनमि गेल अछि
पैघ-पैघ बिखाह काँट
लोक सभ पड़ा जाइत अछि
हमरा देखतहि
किनको नहि छूबि सकैत छी- सिनेहसँ
स्पर्श करैत छी- जिनका एकोबेर
ओ बोमिया उठैत अछि
प्रेमभाव बनि जाइत अछि- बैरीभाव
अपनहुँ एक अंग दोसरसँ
होइत अछि स्पर्श तँ
मन सिहरि उठैत अछि
कऽ लएतहुँ- आत्मघात
किन्तु सेहो नहि कऽ पाबैत छी
जिनगीक जहर
घोरि-घोरि पीबि रहल छी
बचल अछि एक अंग
निष्कंटक नवनीत सन
धुकधुककाइत छातीमे
तकरहि देखैत जीवि रहल छी
आसहिपर।
4) लाज
निरलजकेँ ने लाज पेट भरलासँ काज
देखि रहल छी मिताकेँ किरदानी
बदलि गेल ओकर चालि आर-वाणी
बरदाइससँ बाहर कऽ रहल- मनमानी
लगौलक एहेन फानी
जे लड़ि रहल छी दुनू परानी
परेमक गाछ सुखा गेल
मन पुरा दुखा गेल-
अपन लाभ अनकर हानि
की करए चाहै छल से नहि जानि
तइयो इमानदारीक पहिरने खोल
बजैत अछि नीक नीक बोल
आइ हम एकर खोलि देबै पोल
दसगोटेमे कोना ठाढ़ अछि लफंगा
कऽ देबै एखने नंगा
खिसिया कऽ बढ़लहुँ ओकरा दिश
कऽ देबै नॉंगट- ऍंड़ीसँ देबै पीस
हाय रौ तोरी ई कोन बात
सभ भऽ गेलाह एके साथ
ठिठिया कऽ सभ हँसि रहल अछि
हमरेपर व्यंग्य कसि रहल अछि
सभ बुझौलक तब असली बातकेँ जानि
सोचि विचारि लेलहुँ मानि
नहि होइत अछि नीक बेसी रिश
सोचैत देखलहुँ अपना देह दिश
गुदरी लटकल बनल छी भिखमंगा
हम तँ अपनहि छी पूरा नंगा
भीतरसँ सभटा गप्प जानि
लाजे भऽ गेलहुँ पानि-पानि।
२.
विद्यानन्द
झा (विदू)
पिताक नाम- स्व. रामशंकर झा, जन्म तिथि-20/01/1966, शैक्षणिक योग्यता-एम. ए
ग्राम-केवटा, पो.-शुभंकर पुर, जिला-मधुबनी(बिहार)
हमर मिथिला
उत्तरमे हिमराज विराजथि, दक्षिण सुरसरि गंगा
पश्चिममे बहि-बहि गंडकी, पूर्व कौशिकी-बंगा
बीच वसल छथि सुन्दर मिथिला, आउ हिनक गुणगाण करी
मिथिलाक गरिमा हम बूझी, मैथिलीक सम्मान करी॥
घर-घरमे छथि एतए गोसाओन, तुलसी हर आँगनमे
देवालय शिवालय अछि, हर गामक प्रांगनमे
छथि धन्य हमर ई मातृभूमि, लय रज-कण हिनक प्रणाम करी
मिथिलाक गरिमा हम बूझ, मैथिलक सम्मान करी॥
सीता उपजलि जाहि भूमिसँ, जनक जनिक सम्राट भेलाह
शिव-धनु राखल जाहि भूमिपर, परशुराम प्रहरी भेलाह
स्वर्गसँ सुन्दर मिथिला धाम, आउ हिनक हम मान करी
मिथिलाक गरिमा हम बूझी, मैथिलीक सम्मान करी॥
रचल स्वयंवर जाहि भूमिपर, विश्वामित्र संग शिष्य एलाह
टूटल धनु टंकार जतय भेल, परशुराम लहड़ैत एलाह
किन्तु सुनि मृदुलवाणी जंह मुनिवर, क्रोध त्यागि शीतल भेलाह
रामवरण कएलन्हि जंह सीता, आउ तिनक हम ध्यान धरी
मिथिलाक गरिमा हम बूझी, मैथिलीक सम्मान करी॥
विद्यापति के गाम ई मिथिला, शिव उगना बनि चाकर भेलाह
जंह भगवतीक अनुकम्पा सँ कालिदास विद्वान भेलाह
अछि मधुर प्रेम के सागर मिथिला, आउ एकर रस पान करी
मिथिलाक गरिमा हम बूझी, मैथिलीक सम्मान करी॥
अछि विविध विधा के गहवर मिथिला, किंतु उपेक्षित भए रहल
अछि चूक अपन या शासन के, उत्थानक मार्ग अवरूद्ध रहल
आउ एहि पर मनन करी आओर हिनकर उत्थान करी
मिथिलाक गरिमा हम बूझी मैथिलीक सम्मान करी॥
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