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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक  गद्य

विदेह

 

मैथिली साहित्य आन्दोलन

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देवेश झा

“मैथिली पत्रिकामे अनुवाद साहित्य”

अनुवाद थिक एक भाषाक वाक्य केँ दोसर भाषामे कहब लिखब  । पहिलकेँ मूल भाषा आ दोसरकेँ लक्ष्य भाषा कहल जाइछ । अभिप्राय अछि मूल भाषाक भावकेँशत-प्रतिशत लक्ष्य भाषामे उचित शब्द सहित अंतरण करव, किन्तु समस्या होइत अछि जे सभ भाषाक प्रकृति, परम्परा, शब्द सम्पदा आ स्वभाव अपन-अपन होइत अछि । एतबहि नहि ; भाषागत नियममे से हो भिन्नता रहैत अछि । तकर मुख्य कारण अछि जे कोनो भाषाक प्रकृति, परम्परा शब्द सम्पदा आ ध्वनि ओहि स्थान विशेषक जलवायु, भौगोलिक स्थिति, वातावरण, धर्म, आचार-विचार,उच्चारण ध्वनि आदि तत्व सॅ प्रभावित रहैत अछि । तेँ मूल भाषाक शब्दक हू-ब-हू समान अर्थबला शब्द दोसर भाषामे नहि रहैत अछि । एहना स्थिति में एक भाषा दोसर भाषा सँ शब्द उधार लैत अछि । आ मूल रूपक शब्दकेँ लक्ष्य भाषा मे ओहि रूप मे प्रयुक्त करैत अछि । यथा, आंग्रेजी सँ हम लैत छी स्टेशन, कोर्ट, पेंट आदि आ हम दैत छी छौंकी, झाँझन,धोती, साड़ीआदि । यद्यपि अनुवाद जटिले कार्य अछि आ फराक सँ विवेचनीय अछि, किन्तु से हमर हिस्साक विषय नहि । तखन एतेक कहब अवश्यक जे आइ विश्व मानव एक दोसारक सम्पर्क मे बहुत तीव्र गति सँ अबि रहल अछि । तेँ एक दोसराक सामाजिक जीवन, सभ्यता,संस्कृति, आचार-विचार, रहन सहन, जीवन पध्दति सॅ परिचित होयब आवश्यक, जकर मुख्य स्रोत थिक ओतुक्का साहित्य । सामाजिक प्रतिविंब देखवाक हो तँ साहित्य बिनु देखने कचरेटा देखल जा सकैछ । तत्पर्य ई जे आजुक संदर्भ मे अनुवाद साहित्येक नहि, जीवनक अपरिहार्य अंग बनि गेल अछि । मैथिली पत्र-पत्रिका देखला सॅ ज्ञात होइत अछि जे अनुवाद साहित्य अपेक्षाकृत संतोषप्रद नहि अछि से तखन मिथिलाक जन जीवन ओ ओकर सभ्यता- संस्कृति मे अनुवादक प्रवृति रचल-बसल अछि । नेना वा अबोध सन्तान केँ बढिया पितामही, मातामही, पितामह आदिविभिन्न प्रकारक संस्कृत श्लोकक अथवा ग्रन्थक कोनो -कोनो अंश अपन भाषा मे सुनानिक संस्कार सॅ संपर्क करैत आइल छथि । किन्तु एही अनुवाद-प्रवृतिक अछै तँ पत्र-पत्रिका मे अनुवादक अल्पतासोचनीयअछि।                                                                                                                                                                                                                                                                                        भारतमे पत्रिका पदार्पणक शुभ काल थिक आठारहम शताब्दीक उत्तरार्ध जखन कम्पनी सरकारक आधिपत्य स्थापित भ गेल छल । किन्तु मैथिली पत्रकारिताक स्वर्णिम विहानक किरण प्रस्फुटिक होइछ तखन-जखन 1905 मे जयपुर सँमैथिली हित साधन नामक मासिक प्रकाशित होइछ, जाहिमे अनुवाद तँ नहि टीका अवश्य रहैत छल । पुन: दोसर शुभ मुहूर्तक क्षण अबैछ 1906 मे जखन मैथिली पत्रिकाक इतिहास मे नव संकल्प, नवचेतना अ नव दिशा ल क आयल मिथिला-मोद मैथिली साहित्यक उध्यान मे नवल बसंत, नवल मलयानिल सदृश महमह करैत आयल । एकर प्रकाशन मे विभिन्न बाधाक फलस्वरूप अवरुद्धता तॅआयलमुदा 1936 सँ पुर्नप्रकाशन प्रारम्भ भेल । मिथिला मोदक माध्यमे अनुदित ग्रन्थ सभक प्रकाशन सँ अनुवाद विधि प्राणवन्त भ उठल । एहिमे महत्वपूर्ण अछि (क) हितोपदेश (अनुवादकक नाम अंकित नहि अछि) (ख)कपाल कुण्डला (अनु॰ पं० शिवनन्दन चौधरी पुर्णिया ) (ग) श्री मदभगवतगीता( अनु० पं० त्रिलोचन झा) (घ)मुद्राराक्षस (अनु० पं० चेतनाथ झा) (ङ) उत्तर रामचरित(अनु० मुंशी रघुनन्दन दास), पं० कुशेश्वर कुमर आ बाबू भोलालाल दसक संयुक्त संपादकत्वमे मिथिला मासिकक प्रकाशन प्रारंभ भेल जे अच्युतानन्द दत्त द्वारा अनूदित महाभारतक कतिपय अंश तथा गुणवंत लाल दास द्वारा दुर्गा सप्तशतीक अंशक रूपान्तर धारावाहिक रुपे प्रकाशित कयलक / पं० छेदी झा मधुपक मेघदूत क अनुवाद प्रकाशित होबय लगल छल जे पुर्ण नहि भ सकल |

इलाहाबाद सँ बाल मासिक पत्रिका बटुकके प्रकाशन श्री सुधाकांत मिश्रक संपादकत्व मे होइत छल | ऐहि बाल पत्रिका में अनुवाद साहित्य विशेष महत्व रखैत अछि | ओहि मे म०म० उमेश मिश्र द्वारा उपाख्यानमालाक नचिकेतोपाख्यान क अनुवाद रुसी कथा बरखा आयन बेगं, जवाहर लाल नेहरुक पिताक पत्र पुत्रीक नाम क अनुवाद तथा श्री रमाकांत मिश्र द्वारा रवीन्द्रनाथ टैगोरक कबूलीवाला क अनुवाद एवं टाल्सटायक कथाक अनुवाद तीनिटा बाबाजी (अनु० श्री रमाकांत राय) महत्वपूर्ण एवँ अविस्मरणीय अछि ।

                             एहिना श्री धीरेश्वर झा धीरेन्द्र क सम्पादन मे विशेश्वर साहित्यकुटीर लोहना सॅधियापुतानामक दोसर बाल मासिक पत्रिका प्रकाशित होएत अछि । मैथली पत्रिकारिता मे एकरहु स्थान अति महत्व रखैत अछि । एहि पत्रिका मे धियापुताक रुचि जगयबा लेल तथा संस्कार भरबाकउदेश्य सॅ बाल साहित्य रूप मे अनूदित रचनाक बहुलता देखबा मे अबैछ । एहिमे पंचतंत्र कथाक यथा माइक बोल’‘सूर्य उगि रहल छथि आ स्वर्ग तथा कीछुआत्मकथा,वैज्ञानिक कथा, गल्पक अनुवाद भेल अछि ।

मैथिली पत्रिकारिताक इतिहास मे नव आयाम जुड़ैत अछि तखन, जखन 1950 मे ‘वैदेही’ मासिकक प्रकाशनक श्रीगणेश होइत अछि । एहिठाम एतेक कहब आवश्यक प्रतीक होइछ जे मैथिली पत्र-पत्रिकाक प्रयोगात्मक तथा अस्तित्व स्थापना प्रक्रिया अति विकट एवं संघर्षमय होइतो विकाशोन्मुखी तँ रहल अछि । किन्तु जीविका सँ जुड़ल नहि रहवाक कारणे आ राजकीय उपेक्षापूर्ण नीतिक परिणाम स्वरूप पत्रिका सभ अल्पजीवी होइत आयल अछि । बोद्धितावादी विद्वान, साहित्यसेवी आ कीछु उत्साही मातृभाषानुरागी लोकनिक द्वारा नव-नव पत्र-पत्रिका अबैत रहल मुदा स्वजनो सँअपेक्षित सहयोग नहि भेटबाक कारणे काल कवलित होइत गेल । एहि प्रसंग पं० चंद्रनाथ मिश्र अमर जीक कथा सर्वथा समीचीन अछि जे मैथिली पत्रकरिता रूपी लत्ती मे कुम्हड़ेरक बतिया देखबा मे अबैत अछि जे आड्गुर देखौला सँ सड़ैत आबि रहल अछि (मे० पत्र का इतिहास )। बात सदर्थ अछि, मुदा एहिजड़ता केँ बहुत दूर धरि तोड़ैत अछि वैदेही मासिक पत्रिका ।

वैदेही मे अनुवाद विधा केँ जाहि प्रमुखताक संग स्थान देल गेल ओ अनुकरणीय अछि । सर्वप्रथम बंगला साहित्यक पुरोधा शरतचंद्र चटर्जी रचित रमेर-सुमति (बंगला उपन्यासक अनुवाद) एवं1856क कथा विशेषांक मे ठाकुर पाठक चोधरी द्वारा क्रमिक रूसी कथाक अनुवाद बंगलाक शेफाली तथा हिन्दी कथा ठाकुरक कूपक अनुवाद मैथिली पत्रिकारिता जगत मे विशेषता आनि गोरवान्वित कायलक।

                       वैदेही मसिक अपन पचास-बावन बर्खक दीर्घ यात्रा मे मैथिली पत्र-पत्रिका साहित्यक इतिहास मे जे विशिष्ट आ महत्वपूर्ण योगदान कयलक अछि तकर लेखा-जोखा थोड़ में संभव नहि किन्तु, एतेक तँ कहले जा सकैछ जे ई मैथिली साहित्यक विभिन्न विधाक संगहि अनुवाद साहित्यक केँ अभिन्न अँगन रूप मे समायोजित करैत आयल अछि । यथा 1966 क नवम्बर-दिसम्बरक संयुक्ताँक अनुवाद विशेषांक थिक । एहिमे काव्य मर्मज्ञ नेपाल नरेश महाराज महेंद्र रचित नेपाली काव्य संग्रह “उसैकोलागी” क अनुवाद श्री अनन्त बिहारी दास इन्दुजी कयने छथि । अनुवाद शीर्षक थिक “तोरे लागी” सम्पूर्ण संयुक्तांक अनुदित काव्यक अछि ।

                              प्रो० आनन्द मिश्रक संपादन मे अभियान मासिक पत्रिकाक प्रकाशन होयब प्रारंम्भ भेल जाहि मे गोर्कीक शाल्टमार्ग क अनुवाद श्री हंसराजजिक सशक्त लेखनी सँ कयल गेल अछि जे मैथिली साहित्यक भंडार केँ समृद्ध करबा मे अमूल्य योगदान कयलक ।

भरती भक्तक संपादन मे बहुचर्चित मैथिली मासिक सोनामाटि क आठ अंक में फ्रेंच कथाक (अनुवादक श्री मायानन्द मिश्र), बंगलाक दु गोट कथाक (अनुवादक श्री भद्रनाथ ओ श्री ब्रज किशोर ठाकुर) खलील जिब्रानक एक कथाक (अनुवादक श्री भद्रनाथ), नागालैंडक लोक कथाक (अनुवादक श्री गणेश शंकर खर्गा) एवं जीमकार्वेट लिखित शिकार कथा “रुद्र प्रयागक नरभक्षी चीताक (अनुवादिका मधुमिता) अनुवाद भेल अछि । शिवाकान्त पाठकक संपादन मे प्रकाशित बागमती मासिक मे ऋग्वेदक दान सूक्त, समाज सूक्त आदिक अनुवाद पं० सुरेन्द्र झा सुमन द्वरा कयल गेल ।

                                  कलकत्ता सँ प्रकाशित मिथिला दर्शन मे हिन्दीक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदीक निबंध साहित्य क अनुवाद उग्रकान्त  झा उग्र द्वारा भेल अछि । मिथिला दर्शन मे अनुवाद कथा विशेषांक क प्रकाशन सेहो कैल गेल अछि । यध्यपी मिथिला दर्शन मे कीछु और अनुवाद कार्य भेल अछि । मुदा से खोजे कयला सँ उपलब्ध भ सकत ।

देसिलबयना मासिक मे श्यामलदास गुप्तक बंगला नाटक क इसाइ हाइनेकक एक गाही जर्मन कविताक अनुवादक श्री रामलोचन ठाकुर छथि । मैथिली मासिक माटिपानि, मासिक कर्णामृत मासिक देसकोस तथा त्रैमासिक आरंभ आदिक मैथिली पत्रिकाक इतिहास मे महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि, मुदा एही सभ मे अनुदित रचनाक संख्या बड़ थोड़ अछि । अंत मे मैथिलीक सर्वाधिक नियमित बहुप्रशंसित आ सर्वप्रिय जाहि पत्रिकाक विवरण प्रस्तुत क रहल छी ओकर नाम थिक मिथिला-मिहिर। मैथिली पत्रकारितक मेरुदंड मानल जाइछ मिथिला मिहिरकेँ। पत्रकारिताक रूप मे सर्वोच्च नामधारी मिथिला मिहिरकेँ एहि साहित्यिक अनुष्ठानमे सर्वप्रमुख मानैत विभिन्न दृष्टि सँअंतिम स्थान पर राखल गेल अछि ।

                                पहिनहि कहल अछि जे मैथिली पत्र -पत्रिका मे अनूदित रचनाक स्थिति संतोषप्रद नहि अछि | तकर प्रमुखकारण अछि पत्र-पत्रिका अल्पजीवनक फलस्वरूप बरमहल अवरुद्धता | सोच आ परिकल्पनाक स्वरूप साकार नहि भ सकल | तथापि अनुवाद होईत रहल अछि |

प्रश्न उठेत अछि जे ई अनुवाद सभ मूल भाषासं प्रत्यक्ष अनुवाद भेल अछि वा  अप्रत्यक्ष रुपे दोसर भाषासं ?

                                एकर खुलासा होयबाक चाहैत छल जे नहि भेल अछि । तेँ अनूदित साहित्यिक कृतिकेँ देखब आ ओकर गुणवत्ता केँ परखब तेँ और कठिन । तकर हेतु ई जे मूल भाषासँ लक्ष्य भाषाक मिलानक उपरान्त सँ संभव होयत । मुदा स्थिति ई अछि जे अधिकांश अनुवाद मूल सँ नहि, अपितु माध्यमे भाषा सँ भेल अछि । मैथिली पत्र-पत्रिकामे अनुदिश साहित्यक पक्ष दुर्बल रहबाक सभसँ महत्वपूर्ण कारण अछि जे एको व्यक्ति ने त भावसायिक अनुवाद केने छथि आ ने एकोटा अनुवाद पत्रिकाक फारक सँ व्यवस्थे अछि । प्रश्न इहो अछि जे अनुवाद कार्यकेँ के ओ अपन केरियर बनाबथि तँ कोना? जीविका सँ बिना जोड़ने श्रमक फलीभूत होयबाक संभावना कम| इएह कारण अछि जे मैथिली मे ने अनुवाद पत्रिका अछि आ ने कोनो पत्र पत्रिका अनुवाद साहित्यक लेल स्थायी स्तम्भ रखने अछि । मैथिलीक साहित्यकार लोकनिक भावावेश, रुचि आ मातृभाषाक सेवा भाव सँ स्वान्त: सुखाय अनुवाद कृतिक प्रणयन होइत अछि । पत्र-पत्रिकाक प्रकाशक संपादक जखन मन भेलनि, ओकरा छापि देलनि मैथिली मे विशेष रूपेँ पत्र-पत्रिका मे सोद्येश्य अनुवाद कार्य होयबाक चाही  जे नहि भ रहल अछि । आजुक युग मे अनुवाद-कार्य  एकटा मिशन थिक । दुनिया केँ जनबाक-परखबाक सभ सँ पैघ माध्यम थिक । आजुक बहुत लोक अनुवाद पर जिबैत अछि । एकटा बात और अनुवाद कार्यक जे आर्थिक पक्ष छै, ताहि लेल बाजार चाही, मुदा सँ अछि नहि । बाजारक अभाव अनुवादक अभाव, पत्र-पत्रिका मे अनुवादक अभाव सभ एक दोसरा पर निर्भर अछि । मैथिली पत्र-पत्रिका मे बेसी वा कम जे कीछु अनुवाद कार्य भेल अछि से तँ भिन्न बात थिक, किन्तु एतबाक तँ स्पष्ट परिलक्षित होइत अछि जे अनुवाद विशेषत: साहित्य सँ सम्बधिंत अछि । एतेक तँ अवश्ये जे मैथिली पत्र-पत्रिका मे अनुवाद साहित्यक स्थिति विकासोन्मुखी अछि । अवश्यकता छैक एकर गतिशीलता बढ़यवाक।

देवेश झा

                                                                                एन० डी० कॉलेज रामबाग ,पूर्णिया

                                                                                                प्राध्यापक (मैथिली विभाग )

                                                                                               

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