प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

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रबीन्द्र नारायण मिश्र

मातृभूमि (उपन्यास)- १५म खेप

 

साँझमे सुधाकर चारू लठैतक संगे पाठशाला लग पहुँचलाह । पाठशाला तँ ओ नामेक छल । फूसक बनल ओकर चार खसबा हेतु उद्यत छल । कतेको सालसँ ओकर देख-रेख नहि होइत छल । पुस्तकालयक स्थानपर तरकारी रोपल छल । सजमनि,कदीमा,रामझिमनी ,टमाटर,कोबी सभ तरहक तरकारीक समावेस केने छलाह । सुधाकरक सालभरि तरकारी ओहिठामसँ उपजि जाइत छलनि । कागजी नेबोक गाछ ततेक झमटगर छल  जे सौंसे साल नेबो अपनो खाइत छलाह आ हाटपर बेचितो छलाह। कोनपर टाभनेबोक गाछमे बड़का-बड़का टाभनेबो फड़ल छल । असलमे जहिआसँ जयन्त गाम अएलाह आ ओहि पाठशाला लग रहए लगलाह तहिएसँ सुधाकर परेसान छलाह । हुनका मोनमे तरह-तरहक बातसभ घुमए लगलनि ।

"केहन बढ़िआँ जानकीधाममे पढ़ैत-लिखैत छलहुँ । एहिठाम की राखल छैक जे अनेरे अपसियाँत भेल छी।"-सुधाकर बजैत छथि ।

जयन्तसँ जेठ छलखिन सुधाकर । दुनूक पिता सहोदरे भाए रहथि । जयन्तकेँ गामसँ चलि गेलाक बाद पाठशालाक जमीनपर सोलहो आना हक सुधाकरक कायम भए गेल रहनि । एहिमे आब जयन्त एतेक दिनक बाद आबि कए बाधा करथि से हुनका कोना नीक लगितनि?

सुधाकरक व्यवहारसँ जयन्तकेँ ततेक कष्ट भेलनि  जे ओ गुम्म पड़ि गेलाह । तखनसँ पेटकुनिआ देने पड़ल रहथि । बिना किछु खेने-पीने सौंसे दिन बीति गेल । तकर कोनो चिंता सुधाकरकेँ नहि भेलनि । ओ तँ पाठशालाक जगह पर अपन कब्जा कायम रखबाक हेतु व्यग्र रहथि । सुधाकरक बाजब सुनि जयन्त छगुंतामे रहथि । बकर-बकर हुनका देखैत रहि गेलाह । ताबतेमे पानि होबए लगलैक । पाठशालाक घर तँ बुझू खसले छल । कोनपर नान्हिटा चार बाँचल छल जाहिमे कैकटा सोंगर लागल छल जाहिसँ ओ कहुना कए लटकल  छल। तकरे तरमे जयन्त आइ एकमाससँ पड़ल छलाह । एकहु बेर सुधाकर हाल-चाल लेबए नहि अएलाह। ई सुनिओ कए जे हुनका आँखिमे समस्या छनि ओ हटल-हटल रहलाह । मुदा जखन पाठशाला हेतु बैसार भेल तँ ओ समस्त पुरषार्थसँ प्रकटे नहि भेलाह,अपन लठैतक सहयोगसँ बैसारमे हड़बिड़रो मचा देलाह ।

जयन्त सपनोमे नहि सोचि सकल रहथि  जे हुनकर पैतृक स्थानमे बनल पाठशाला पुनर्निर्माण करबाक हुनक प्रयासमे सभसँ पैघ  बाधक हुनके पितिऔत सुधाकर भए जेताह । मुदा स्वार्थमे लोक आन्हर भए जाइत अछि । फेर जखन अनकर संपत्ति भोगबाक आदति पड़ि जाउक तँ ओहिपरसँ बेदखल होएब बहुत कष्टकारी भए जाइत अछि । जयन्तक पिताक हिस्सामे पाठशालाक अतिरिक्त पाठशालासँ सटले मात्र पाँच कठ्ठा जमीन रहनि । ओहीसँ ओ सालभरि गुजर करैत छलाह । कहिओ ककरोसँ किछु याचना करब हुनक स्वभावमे नहि छल । सुधाकर पाठशाला आ लगीचक जमीन कतेको सालसँ कब्जा कए लेने रहथि । पाठशालाक जगहपर एकदिस माल-जाल बान्हल करथि । खाली जगहमे तिमन-तरकारी उपजाबथि । मुदा सुधाकरकेँ आब बड़का चिंता भए गेल रहनि । "कहुना कए जयन्तक झंझट खतम होअए तँ चैन होइ।"-सुधाकर सोचल करथि ।

सुधाकरके लठैतक संगे आएल देखि जयन्तकेँ किछु नहि फुराइनि । ओ अबाक भेल चार दिस देखैत रहि गेलाह ।

"आइ नौ-छऔ कइए लेब । एही पार की ओही पार । विद्वान छथि तँ अपना घरमे । हमरा ताहिसँ की मतलब? पढ़ि -लिखि कए नव-नव झंझट बेसाहि रहल छथि । ई कोन नीक बात भेलैक?"-सुधाकर मोने-मोन सोचथि । जखन जयन्त किछु नहि बजलाह तँ सुधाकर तमसाइत बड़बड़ाइत चलि गेलाह-

"कान खोलि कए सुनि लएह । ई संपत्ति हमर अछि । बाबा मरैत काल साफ कए गेल रहथि जे ई सभटा चीज-वस्तु सुधाकरकेँ हेतनि । स्टाम्पपेपरपर सभटा  लिखि गेल छथि । ताहिपर जे तूँ अनुचित प्रयास करबह से नहि चलतह।"- से कहि सुधाकर लठैतसभक संगे बाहर भए गेलाह ।

जयन्त टुकुर-टुकुर देखैत रहलाह । सुधाकर अपन लठैत सभक संगे आगू बढ़ि गेलाह ।

"अहाँ कही तँ एकरा एकहि बेरमे धारक पार फेकि आबी।"-एकटा लठैत बाजल ।

"एकर सही इलाज तँ हमरा लग अछि ।-दोसर लठैत बाजल।

"हमरा तँ होइए जे भोर होइत-होइत ओ अपने साफ भए जाएत । ककरो किछु करबाक काज नहि पड़त ।" -तेसर लठैत बाजल ।

"से की?"

" देखैत नहि छहक । ई चार कखनो खसि सकैत छैक । जयन्तकेँ लेने-देने साफ ।" -चारिम लठैत बाजल ।

"तूँ सभ सभदिन मूर्खे रहि गेलह । हमरा जयन्तसँ की मतलब अछि । जीबए-मरए, जतए जाए । हमर चीज-बस्तुपर सँ हटि जाए । बेसी लफरासँ कोन मतलब?"-सुधाकर बजलाह ।

एहिना गप्प-सप्प करैत ओसभ चलि गेलाह । जाइत-जाइत अपन-अपन लाठी जोर-जोरसँ पटकैत जयन्त दिस आँखि तरेरैत पाठशालाक चारक एकटा सोंगर हटा देलक ।

कहुना कए लटकल ओ चार आओर एकहाथ आगू ससरि  गेल । बीचक फाँकसँ पानि झहर-झहर खसए लागल । जयन्त अखनो ओही चार तर बैसल रहथि । दोसर कोनो उपाय नहि छल।

 चारसँ खसैत बरखाक पानिसँ सौंसे देह भिजि रहल छल ।
 

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