logo logo  

वि    दे    ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

विदेह नूतन अंक गद्य

India Flag Nepal Flag

 

 

(c)२००८-०९.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

(कार्यालय प्रयोग लेल)

विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान।
ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत।
नीचाँक फॉर्म भरू:-

विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता
सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):-

एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25)
दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50)
तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75)
पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125)
आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750)
हमर नाम:
हमर पता:

हमर ई-मेल:
हमर फोन/मोबाइल नं.:

 

हम Cash/MO/DD/Cheque in favour of AJAY ARTS payable at DELHI दऽ रहल छी।
वा हम राशि Account No.21360200000457 Account holder (distributor)'s name: Ajay Arts,Delhi,
Bank: Bank of Baroda, Badli branch, Delhi क खातामे पठा रहल छी।

अपन फॉर्म एहि पतापर पठाऊ:- shruti.publication@shruti-publication.com
AJAY ARTS, 4393/4A,Ist Floor,Ansari Road,DARYAGANJ,Delhi-110002 Ph.011-23288341, 09968170107,e-mail:, Website: http://www.shruti-publication.com

(ग्राहकक हस्ताक्षर)

 

 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Read in your own script Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।


१.
डा.रमानन्द झा रमण’-तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी २.-         प्रकाश चन्द्र-‘प्रयोग’ एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि

 

डा.रमानन्द झा रमण

 

तन्त्रानाथझा/ सुभद्रझा जन्मशतवार्षिकी

हम आगि आ हमरा प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रनाथ बसात।’ - सुभद्र झा

राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्रामक आगि जेना-जेना सुनगैत, पजरैत एवं लहकैत गेल, मिथिलाक संग मिथिलाक भौगोलिक

सीमासँ बाहर सांस्कृतिक मिथिलाक लोकमे अपन भाषा, साहित्य एवं संस्कृतिक विकास, प्रचार-प्रसार एवं संरक्षणक चेतना सेहो क्रमशः घनीभूत होइत रहल। एहि चेतनाक फलस्वरूप गत शताब्दीक पहिल दशक, मैथिली भाषा-साहित्यक लेल अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। सांस्कृतिक मिथिलाक प्रबुद्ध मैथिल, मैथिलीमे पत्र-पत्रिकाक सम्पादन-प्रकाशन ओही दशकमे आरम्भ कएल। एहि सन्दर्भमे विद्यावाचस्पति मधुसूदन ओझा एवं म.म.मुरलीधर झाक नाम आदरक संग स्मरण कएल जाइछ। ओही दशकमे कमसँ कम एक सोड़हि मैथिलीक अवदानी साहित्यकारक जन्म भेल। ओ सभ अपन प्रतिभा अध्ययन-अनुशीलन एवं मातृभाषा प्रेमसँ मिथिला भाषाक मानकीकरण कएल। भाषा लेल विभिन्न प्रकारक प्रतिमान स्थापित कएल। हुनका लोकनिक संघर्षशील व्यक्तित्वसँ मैथिलीक आधार सुदृढ़ भेल। सरहपाद, ज्योतिरीश्वर आ महाकवि विद्यापतिक भाषा मैथिली, राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर भाषा-कुलमे गरिमापूर्ण स्थान पाबि सकल। दोसर दिश ओ सभ अपन-अपन कारयित्राी प्रतिभासँ मैथिली-साहित्यमे उत्कृष्ट विविधवर्णी रचनाक पथार लगा देलनि। हुनका लोकनिक समस्त क्षमता आ ऊर्जा मैथिली साहित्यक संवर्धन लेल तँ छलैके, एहू लेल ओ सभ चिन्तित एवं प्रयासरत छलाह जे आबएबाला युगमे अपन मातृभाषाक प्रति लोकमे सहज अनुराग रहैक, सम्बद्धता एवं प्रतिबद्धतामे कमी नहि आबए तथा साहित्य-सर्जनाक प्रवाहक गति अवरुद्ध नहि हो। एहि हेतु ओ सभ परती-पराँतहु जोति-कोड़ि पर्याप्त भूमि तैआर कए देलनि। आइ हुनके लोकनिक दूरदर्शिता, परिश्रम एवं प्रतापसँ उपजल जजात, हमरा लोकनिक बीचक कतेको गोटे काटि आ ओसा फूससँ, खपड़ा आ खपड़ासँ कोठा पीटि रहल छथि। ओहन-ओहन महानुभावक जन्म शतवार्षिकीक आयोजन निश्चिते श्लाघ्य एवं प्रेरणास्पद अछि। स्वागत योग्य अछि। आयोजकक संगहि ओ व्यक्ति धन्यवादक पात्र छथि। जनिका मनमे ई आयोजन उचड़ल छलनि वा उचड़ैत छनि।

सर्वप्रथम हम मैथिली भाषा साहित्यक लेल अत्यन्त महत्वपूर्ण गत शताब्दीक पहिल दशकमे जनमल मैथिलीक साहित्यकार, यथा - अच्युतानन्द दत्त, ईशनाथझा, कालीकुमार दास, कांचीनाथझा किरण’, काशीकान्त मिश्र मधुप’,

गणेश्वरझा गणेश, जयनारायण झाविनीत, जीवानन्द ठाकुर, जीवनाथ झा, तन्त्रानाथ झा, दामोदरलाल दास विशारद’,

दुर्गाधर झा, नरेन्द्रनाथ दास विद्यालंकार’, प्रबोधनारायण चौधरी, बैद्यनाथ मिश्र यात्राी’, भुवनेश्वर सिंह भुवन’, महावीर झा वीर’, रमानाथ झा, रमाकान्त झा(नेपाल), लक्ष्मीपति सिंह, शशिनाथ चैधरी, श्रीवल्लभ झा, श्यामानन्द झा, सुरेन्द्र झा सुमन’, सुभद्र झा, हरिमोहन झा, हरिनन्दन ठाकुर सरोज आदिकेँ जे मैथिली साहित्यक खंँाम्ह छलाह, वर्तमान शताब्दीक पहिल दशकक अन्तिम वर्षमे स्मरण करब। सुधी समाजक ध्यान एहि तथ्य दिश आकृष्ट करए चाहब जे उपर्युक्त अवदानी साहित्यकारक सूचीमे अधिकांश लोक सरिसब परिसरक छथि। अथवा सरिसब परिसरसँ अन्य प्रकारेँँ सम्बद्ध छथि वा सरिसब परिसरक शिष्यत्व ग्रहण कएलापर हुनक सर्जनात्मक प्रतिभाक अंकुर प्रस्फुटित भए पल्लवित-पुष्पित भेल अछि। अपन भाषा-साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण लेल सदिखन तत्पर एहि उर्वर परिसरक समागत मातृभाषा अनुरागी एवं विज्ञजनकेँ हमर प्रणाम निवेदित अछि।

डा.सुभद्र झा (जन्म 09 जुलाइ, 1909 - देहावसान 13 मइ, 2000) लिखलनि अछि जे हम आगि आ हमरा

प्रज्ज्वलित कएनिहार तन्त्रानाथ बसात। सुभद्र झा एवं तन्त्रानाथ झा( जन्म 22 अगस्त, 1909 - देहावसान 02 मइ,1984)क पारिवारिक पृष्ठभूमि भिन्न छल, अध्ययन एवं अध्यापनक विषय भिन्न छल, स्वभावो भिन्न छलनि तथापि आगिक दाहकता बसातक गति पाबि तेहन ने ताप उत्पन्न कएलक जे पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृतिक बाटक कतेको ढ़ेङ जरि सुड्डाह भए गेल। प्रतिकूल स्वभाव एवं पृष्ठभूमिक लोकमे एहन समर्पण, निःस्वार्थ मित्र भाव एवं मिलि सामाजिक काज करबाक तत्परताक उदाहरण सर्वथा दुर्लभ अछि। डा.दुर्गानाथ झा श्रीश’ लिखल अछि जे मैथिली साहित्यक सजग प्रहरी सिनेटक सदस्य तन्त्रनाथ झा, अपन अनन्य मित्र डा. सुभद्र झाक संग मैथिलीक स्वीकृतिक सभ कार्यक संयोजन कएल करथि। ओ इहो लिखल अछि जे सुभद्र झाक चतुर-प्रयाससँ तन्त्रानाथ झा सिनेटर निर्वाचित भेल छलाह। से ठीके, जँ डेग-डेग पर डा.सुभद्र झाक सहयोग तन्त्रानाथ झाकेँ नहि भेटल रहितनि तँ विश्वविद्यालयक स्तरपर मैथिलीक मान्यताक हेतु प्रयासरत संग्रामी दलक सफल नेतृत्वक जे श्रेय

हुनका भेटि रहल छनि, से सम्भव नहि होइत। आ तखन मैथिली सूर्पनखाक हाथेँ कहिआ ने झपटा लेल गेल रहितथि।

तन्त्रानाथ झाक अवदान

तन्त्रानाथ झाक अवदानकेँ दू कोटिमे राखि सकैत छी - क.आन्दोलनात्मक एवं ख. साहित्य सर्जना द्वारा मैथिली साहित्यक संवर्धन।

तन्त्रानाथ झाक आन्दोलनात्मक काज मोटामोटी चारि प्रकारक अछि - 1. पटना विश्वविद्यालयक उच्चतर कक्षामे मैथिलीक स्वीकृति, 2. शिक्षक समुदायक लेल संघर्ष, 3. शिक्षाक क्षेत्रामे विकास कार्य- चन्द्रधारी मिथिला कालेजमे विभिन्न विषयक पढ़ाइक आरम्भ होएब तथा सरिसबमे हुनक सत् प्रयाससँ कालेजक स्थापना। तथा, 4. अखिल मैथिली साहित्य परिषदक मन्त्रीक रूपमेँ मैथिली भाषा आ साहित्यक प्रचार-प्रसार एवं संवर्धन। सामाजिक संलग्नता, सामाजिक कार्यमे रुचिक ह्रास तथा व्यक्ति केन्द्रित विचार-धाराक प्रमुखताक परिणामसँ कतेको मैथिल वा मैथिलीक प्राध्यापक आ सरकारी एवं गैर-सरकारी सेवामे छोट-पैघ ओहदापर सेवारत लोक ई कहैत-बजैत सुनल जाइत छथि जे हमर काज पढ़ाएब थिक, हमर काज लिखब थिक, हमर काज आन्दोलन करब वा मिथिला, मैथिल, मैथिली करब नहि थिक। तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा एहि विचारक नहि छलाह जे मैथिलीक अधिकारक हेतु संघर्ष, प्राप्त

अधिकारक सुरक्षाक तथा अध्यापन वा साहित्य-सर्जना करब पृथक-पृथक वर्गक लोकक दायित्व थिकैक। ओ साहित्य-सर्जना एवं मैथिलीक आन्दोलनमे सक्रियताकेँ एक दोसरक पूरक मानैत छलाह। साहित्य-सर्जना आ जागरण-अभियानमे सक्रिय कांचीनाथ झा किरणक नाम आदरक संग एही कारणसँ लेल जाइत अछि। आ इएह कारण थिक जे सभ प्रकारक सरकारी मान्यता, सुविधा, प्रोत्साहन एवं सुरक्षाक अछैतो मैथिलीेक प्राध्यापक अथवा मैथिलीक साहित्यकारक सामाजिक स्वीकार्यता सम्प्रति ह्रासोन्मुख अछि। कोंकणीक प्रसिद्ध लेखक, अङरेजीक शिक्षक एवं संघर्षरथी डा. आर.केलकर लिखल अछि जे अपन भाषाकेँ समृद्ध करबा लेल पहिने ओ सभ साहित्य सर्जना कएल, जखन बोली कहि अपमानित कएल जाए लागल तँ भाषाविज्ञानक छात्र भए गेलाह आ जखन शत्रु सभ हुनकर भाषाकेँ समाप्त करबा लेल एवं गोवाकेँ भारतक मानचित्रसँ पोछि देबाक गम्भीर चालि चलल तँ राजनीतिज्ञ बनि गेलाह। मैथिलीकेँ उचित विश्वविद्यालयीय मान्यता लेल व्यूह रचना कएनिहार एवं साहित्य सर्जक तन्त्रानाथ झा एवं सुभद्र झा हमरा लोकनिक आदर्श पुरुष छथि। तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्वसँ प्रेरणा लेबाक थिक जे आजीविकाक विषय भिन्न रहलहुँपर मातृभाषाक सेवामे जँ मातृभाषाक प्रति अनुराग हो, तँ कोनो बाधा-व्यवधान नहि छैक। आओरो किछु उदाहरण अछि। प्रो. हरिमोहन झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि दर्शनशास्त्र मुदा लिखलनि मैथिलीमे। डा.जयकान्त मिश्र आ प्रो. उमानाथ झा पढ़लनि आ पढ़ौलनि अङरेजी, मुदा भंडार भरलनि मैथिलीक। प्रो. प्रबोधनारायण सिंह पढ़लनि आ पढ़ौलनि हिन्दी, मुदा आजीवन समर्पित रहलाह मैथिलीक लेल। सम्प्रति स्थिति एवं मानसिकता किछु भिन्न अछि। आन विषयक मैथिल प्राध्यापककेँ, अपवाद छोड़ि, मैथिली पढ़बा-लिखबामे अरुचि छनि आ अपन मातृभाषामे रचना करब अपन हीनता बुझैत छथि तँ दोसर दिश मैथिलीक कार्यक्रममे आन विषयक प्राध्यापकेँ मंचस्थ वा सक्रिय देखि मैथिलीक प्राध्यापक कन्हुआइ छथि। अर्थशास्त्रक प्राध्यापक तन्त्रानाथ झाक व्यक्तित्व आ मातृभाषा-प्रेम अनुकरणीय अछि।

तन्त्रानाथ झाक अवदान - साहित्य-सर्जना

तन्त्रानाथ झाक सर्जनात्मक प्रतिभाक दर्शन बाल्यकालहिमे होअए लागल छल। जकर पृष्ठभूमिमे निश्चिते हुनक

मातृकुलमे पाण्डित्य एवं साहित्य-सर्जनाक सुदीर्घ परम्पराक प्रभाव रहल होएतनि। मुदा, तात्कालिक प्रेरक भेल छलथिन्ह अग्रज आचार्य रमानाथ झा। ओ हुनकहि प्रेरणासँ साहित्य पत्राक लेल माइकेल मधसूदन दत्तक मेघनाद बधक आदर्शपर कीचक बधक सर्जना कएल। कोनहुँ कविक पहिल कृति उच्च कोटिक कलात्मक एवं प्रयोगशील हो, अवश्य असामान्य प्रतिभाक द्योतक थिक। तन्त्रानाथ झाक मैथिली साहित्यक सेवा गद्य एवं पद्य- दूनू क्षेत्रमे अछि। पद्य साहित्यक अन्तर्गत अछि कीचक बध एवं कृष्णचरित महाकाव्य, कविता संग्रहमे अछि मंगलपंचाशिका’, ‘नमस्या एवं कीर्ण-विकीर्ण। गद्यमे अछि एकांकी चयनिका’, किछु निबन्ध, ललित निबन्ध, संस्मरण आदि। ओ किछु कथा सेहो लिखल। बाल कथा लिखल। मिथिलाक्षरक प्रचार-प्रसार लेल अपन हाथेँ किछु कथा लिखि, तकरा लिथो कराए प्रकाशित कराओल। एकर महत्त्व कथा-दृष्टिसँ जतेक हो, मिथिलाक सांस्कृतिक सम्पदा, मिथिलाक्षरक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक दृष्टिसँ अवश्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि। ओ कीर्तिलता एवं हितोपदेशक किछु अंशक भाषा अनुवाद एवं हेमलेट,’ ‘मालती-माधव एवं रत्नावलीक गद्यमे नाट्यसार लिखि प्रकाशित कएल। एहि सभमे तन्त्रानाथ झाक विलक्षणक गद्यक दर्शन होइत अछि। हिनक अनुसंधान परक निबन्ध, जे अङरेजी वा मैथिलीमे समए-समएपर विभिन्न पत्र-पत्रिकामे छपल अद्यावधि असंकलित अछि। ओहिमे प्रमुख अछि कवि रविनाथकृत सन 1304 सालक रौदीक वर्णन, सन्तकवि रामदास, Vishnu Puri : The Maithil Vaishnav Savant, Adventures of Maithil Pandits (Sachal Mishra and Mohan Mishra)आदि। तन्त्रानाथ झाक रचना साहित्यक विशेषताक चर्चा विस्तारसँ नहि कए मात्र एक दू बिन्दुक प्रसंग सूत्रमे उल्लेख करब-

1. प्रयोगशीलता - तन्त्रानाथ झा प्रयोगशील रचनाकार छलाह। एहिसँ मैथिली साहित्य लाभान्वित भेल अछि।

साहित्यपत्रामे महाकाव्यक पारम्परिक मानदण्डक आधारपर कविशेखर बदरीनाथ झाक एकावली परिणय छपैत छल जे सामान्य पाठकक रसबोध लेल सरल नहि कहल जाएत। सम्भव थिक तन्त्रानाथ झा सामान्य पाठकक स्थिति बूझि गेल होथि। ओ ओही समय एकावली परिणयक भाषा-शिल्पक विपरीत मुक्त-वृत्त एवं सरल भाषामे कीचकबध लिखि मैथिलीक मन्दिरमे अर्पित कए मुक्त-वृत्त शिल्पक मैथिलीमे श्रीगणेश कएल। मैथिलीक पाठक समुदाय लेल कीचक बधक प्रकाशन गुमकीक बाद सिहकी सन सुखद भेल। एहिना ओ सोनेट लिखल। मैथिली कथाक क्षेत्रमे शिल्प सम्बन्धी जड़ता तोड़ने छलाह। प्रो. उमानाथ झा रेखाचित्रमे संकलित कथाक माध्यमसँ। एक सर्जनात्मक प्रतिभा सम्पन्न कल्पनाशील रचनाकार साहित्यमे आएल जड़ताकेँ तोड़बाक हेतु कथ्यवर्ग एवं शिल्पवर्गमे कोना प्रयोग करैत अछि, तकर उदाहरण थिक तन्त्रानाथ झाक विपुल साहित्य।

2. तन्त्रानाथ झाक साहित्यमे समाजमे व्याप्त कुरीति, आडम्बर, अन्धविश्वासपर प्रहार अछि। एहि प्रहारक शिल्प

व्यंग्यात्मक अछि। ई समस्त साहित्यमे सहज सुलभ अछि। तन्त्रानाथ झाक व्यंग्यक प्रसंग सोमदेवक लिखब समीचीन अछि:

मेना-कोकिल, बगरामे जेना तेज अछि बाझ।

व्यंग्यधारसँ पिजा चोँच छथि से तहिना कवि माँझ।4

3. नारी सशक्तीकरण - एही सरिसब गामक सुआसिन चित्रलेखा देवी5 लिखल अछि जे तन्त्रानाथ झा अनेको पोथी

तथा गीत कविता लिखि केँ मैथिल समाजकेँ उठौलनि। तन्त्रानाथ झाक रचनात्मक व्यक्तित्वक प्रसंग एक महिलाक मन्तव्यमे ओहि समाजक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक विचार आ सामाजिक स्तरपर हिनक अवदान प्रतिघ्वनित अछि। नारीक सशक्तीकरणक प्रसंग तन्त्रानाथ झाक दृष्टिक उदाहरण भेटैत अछि द्रुपद-सुताक चरित्रांकनमे। कीचकक व्यवहारसँ आतंकित द्रुपद-सुता विचारैत अछि -

अबला, भीरु,

की हम द्रुपद-राजकुल पाओल जन्म,

अबला भीरु कहाबए ? क्षत्रिय-केतु पाण्डु-बधू भए,

अबला भीरु कहाए मरब’6

एहि पृष्ठभूमिमे द्रौपदीक आत्मबल जगैत छैक -शाद्र्दूली की कखनहु पाबए त्रास?’ तखन आत्मबलसँ

अभिभूत भए गुम्हरैत अछि -

अनल-शिखा-आलिंगन-शील विमूढ़, क्षुद्र पतंग समान होएत जरि भस्म।

तन्त्रानाथ झा मानैत छथि जे स्त्राीगण हमरा लोकनिक संस्कृति ओ सभ्यताक हेतु रक्षणविधान’ काज कएलनि ओ कए रहल छथि। सम्प्रति स्त्री-शिक्षाक प्रसार द्रुत गतिएँ भए रहल अछि जे सामाजिक कल्याणक दृष्टिसँ आवश्यक थिक। कोनो समाज अर्धांशकेँ अशिक्षाक अन्धकार मध्य राखि उन्नतिपथपर अग्रसर नहि भए सकैत अछि।7

डा. सुुभद्र झा

सुभद्र झा अपन अनन्य मित्र तन्त्रनाथ झा जकाँ सौभाग्यशाली नहि छलाह। अन्यथा हुनकहु प्रकाशित-अप्रकाशित

साहित्य आजुक पाठकक लेल सुलभ भए गेल रहैत। हमरा जनैत एकर तीनटा प्रमुख कारण अछि -

1. भाषा-साहित्यक अध्ययन-अध्यापनमे कठिन भाषा विज्ञान सुभद्र झाक कार्य-क्षेत्र छल। दुर्योग एहन जे बिहारक

कोनो विश्वविद्यालयमे स्वतन्त्रा भाषा विज्ञानक विभाग अद्यावधि नहि अछि। एहन कठिन विषय के पढ़त आ पढ़ाओत?

एक भाषा वैज्ञानिकक शिष्यत्व के ग्रहण करत? जँ शिष्ये नहि तँ गुरुक वैदुष्यक प्रचार-प्रसार, स्थापनाक खंडन-मंडन एवं साहित्यक संकलन-प्रकाशन कोना होएत? ओ स्वयं लिखने छथि जे हम आगि छी। आगिक प्रयोजन तँ सभकेँ होइत छैक, मुदा पकबाक डरसँ केओ छूबैत नहि अछि, देह-हाथ सेदि कात भए जाइत अछि।

2. सुभद्र झा भाषाविद छलाह, शास्त्र-मर्मज्ञ छलाह। देश-विदेशमे एक भाषाशास्त्रीक रूपमे आदर आ सम्मान

छलनि। मुदा ओ कविता, कथा, नाटक, एकांकी, उपन्यास आदि नहि लिखल। मंचपर जाए अपन हास्य-व्यंग्यक माध्यमसँ लोकक मनोरंजन नहि कएल। विद्वत्जनक बीच आदरक पात्र सुभद्र झा सामान्य पाठकक लोकप्रिय रचनाकार होइतथि कोना? तथा,

3. सुभद्रझा सन कीर्तिपुरुषक संतानमे हुनक कृतिक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसारक प्रति अभिरुचिक अभाव अछि।

एहिसँ हिनक प्रकाशित रचना दुर्लभ भए गेल। अप्रकाशित प्रकाशमे नहि आबि सकल अछि।

सुुभद्र झाक कृृति:

संस्कृत, हिन्दी, अङरेजी, फ्रेंच एवं जर्मन भाषाक ज्ञाता सुभद्र झाक पहिल रचना कोन थिक आ से कहिआ छपल

तकर जनतब तँ हमरा नहि अछि। मुदा, हमरा जे हिनक प्रकाशित पहिल रचना देखबाक अवसर भेटल अछि से थिक मिथिला मिहिरक एकसँ बेसी अंकमे प्रकाशित मैथिली भाषाक उत्त्पति’8 विषयक लेख। एहि लेखमे जाहि प्रकारेँ विभिन्न विद्वानक मतक खंडन-मंडनक उपरान्त अपन मत स्थापित कएल अछि, सुभद्र झाक गम्भीर अध्ययनक द्योतक थिक। दोसर थिक मैथिलीमे संख्यावाचक शब्द ओ विशेषण’9। इहो थिक ओही मूल-गोत्रक। एहिसँ ई स्पष्ट अछि जे सुभद्र झाक प्रिय विषय भाषा विज्ञानक अध्ययन छल आ मैथिलीक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण करब हुनक इष्ट छलनि The Formation of The Maithili Language क अनुसार ओ सर्वप्रथम पटना कालेजक डा.ए.बनर्जी शास्त्रीक निर्देशनमे काज आरम्भ कएल। मुदा समाप्त भेलनि डा.सुनीति कुमार चटर्जीक निर्देशनमे।10

सुभद्र झाक रचना दू प्रकारक अछि। पहिल कोटिमे अछि मैथिली भाषा सम्बन्धी अङरेजीमे लिखित साहित्य। एहि

कोटिमे अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अछि The Formation of The Maithili Language11 The Songs of

Vidyapati.12 The Formation of The Maithili Language हिनक शोध प्रबन्ध थिक जाहिपर पटना

विश्वविद्यालयमे डी.लिट क उपाधि भेटल छलनि तथा The Songs of Vidyapati नेपाल स्रोतक आधारपर विद्यापतिक 262 गीतक संग्रह थिक। एहिमे विद्यापति गीतक भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण एवं गीतक अङरेजी अनुवाद अछि। दोसर कोटिमे अबैत अछि मैथिलीमे सम्पादित एवं लिखित पोथी सभ। विद्यापति-गीतसंग्रह’मे विद्यापतिक 370 गीत अछि। एहि संग्रहक भूमिका लेखक छथि प्रो.आनन्द मिश्र। विदेश यात्रा वर्णनक दू टा पोथी प्रवास जीवन’(1950) एवं यात्रा प्रकरण शतक’(1981) छनि। ओ 27 अगस्त,1946 ई केँ दू वर्षक लेल पटना विश्वविद्यालक अनुदानपर तथा महाराज कामेश्वर सिंहसँ प्राप्त आर्थिक सहयोगसँ उच्च शिक्षा हेतु फ्रांस गेल छलाह। ओतए ओ अर्थवेदक पैप्लाद, आधुनिक भाषा विज्ञान तथा ध्वनि विज्ञानक विशेष अध्ययन कएल।13 ओही यात्राक विलक्षणक वर्णन एहि दूनू पोथीमे अछि। नातिक पत्राक उत्तर पत्रात्मक शैलीमे कहि सकैत छी जमाहिर लालक Discovery of Indiaक शैलीमे लिखित पोथी थिक। ओ अनेको जर्मन आ फ्रेंचमे लिखित पोथीक अनुवाद हिन्दी आ अङरेजीमे कएने छथि।14 जे जर्मन आ फ्रेंचमे हिनक असाधारण अधिकार देखबैत अछि। मुदा हिनक एहि

विद्वता एवं ज्ञानराशिक फलसँ मैथिली वंचित रहि गेल।

सुुभद्र झाक महत्व:

1. यद्यपि सुभद्र झाक पूर्वहु किछु विदेशी आ किछु भारतीय भाषाविद मैथिली भाषाक अध्ययन प्रस्तुत कएने छलाह।

मुदा, पहिल व्यक्ति भाषाविद डा.सुभद्र झा भेलाह जे एतेक गम्भीरता एवं विस्तारसँ मिथिला भाषाक विश्लेषण कएल जाहिसँ विश्व-भाषाक मानचित्रपर मैथिलीकेँ प्रतिष्ठापित होएबामे भाषावैज्ञानिक आधार भेटल।

2. विद्यापति गीतक भाषा शास्त्राीय विवेचन एवं गीतक अनुवाद अङरेजीमे कए विद्यापति गीतक महत्वकेँ सर्वप्रथम

अन्तरराष्ट्रीय पाठकक समक्ष आनल।

3. मैथिलीक विदेश यात्रा साहित्यक पहिल लेखक छथि सुभद्र झा। सुभद्र झासँ पूर्वहु कतोक मैथिली विदेश यात्रा कएने छल होएताह। पूर्वक अपेक्षा बेसी लोक देश विदेश भ्रमण, उच्च शिक्षा वा आजीविका हेतु जाइत अछि, मुदा डा.जगदीशचन्द्र झाकेँ छोड़ि यात्राक क्रममे प्राप्त अनुभवकेँ मैथिलीमे लिपिबद्ध कए अपन मातृभाषाक यात्रा साहित्यक संवर्धन कएनिहार कम लोक छथि। आ सेहो एतेक सूक्ष्मता एवं व्यापक रूपसँ।

4. ‘नातिक पत्रक उत्तरमे एक इतिहासकार जकाँ, किन्तु सरल भाषा एवं नव ढ़ंगें ओ मैथिलीक स्वीकृति हेतु कएल

गेल आन्दोलन एवं विभिन्न समस्या आदिपर अपन विचार निर्भीकता एवं स्पष्टताक संग प्रस्तुत कएल अछि। एकरा जँ भाषा-आन्दोलनक विचार प्रधान इतिहासक पोथी कही, तँ अत्युक्ति नहि होएत।

5. डा.सुभद्रझा राष्ट्रीय भावना एवं मिथिला, मैथिल एवं मैथिलीक प्रेमसँ ओतप्रोत छलाह। हिनक एहि रूपक दर्शन

प्रवास जीवन एवं यात्राप्रकरण शतकसँ होइत अछि। पेरिसमे हिनक वस्त्राभरण देखि दर्शक सभ डा. एस.राधाकृष्णनक समक्षहिमे हिनकहि डा. एस.राधाकृष्णन् बूझि आकर्षित भए गेल छलाह।15

6. प्राच्य विद्याक गम्भीर वेत्ता, भाषाविज्ञानक प्रकाण्ड पण्डित, भाषाविद, सफल अनुवादक, सहजता आ सरलताक

प्रतिमूर्ति, सदिखन अनुसंधानरत शोध-निर्देशक, विद्वानक बीच विद्वान एवं सामान्यक बीच सामान्य, निरअहंकारी डा.सुभद्र झा मिथिलाक सारस्वत परम्पराक एक एहन विभूति छथि जनिक नामहिसँ मैथिल समाज अपनाकेँ गौरवान्वित अनुभव करैत अछि।

अन्तमे कहए चाहब जे आन्दोलनी भाषाविद साहित्यकार डा. सुभद्र झा कविता, कथा, उपन्यास आदि लिखि

मैथिलीक लोकप्रिय लेखक वा मंचासीन भए श्रोता-दर्शकक आकर्षणक केन्द्र भनहि नहि भेल होथि। मुदा, राष्ट्रीय

अन्तरराष्ट्रीय स्तरपर विज्ञजनक बीच जतेक ओ पढ़ल जाइत छथि वा उद्घृत होइत छथि, से किनसाइते मैथिलीक महानसँ महान लेखककेँ सौभाग्य भेल होनि वा होएतनि। ई मात्र डा.सुभद्र झा थिकाह जे मैथिलीक भाषा-वैज्ञानिक विश्लेषण, भाषा विज्ञान सम्मत तथ्यक आधारपर विस्तारसँ कएल एंव मिथिला भाषाक विशेषतासँ लोककेँ परिचित कराओल। मैथिली भारोपीय कुलक एक स्वतन्त्र भाषा थिक, ताहि प्रसंग पर्याप्त सामग्री एवं तर्क विश्व समुदायक समक्ष राखल। आ बेर पड़लापर एक नीतिकुशल कूटनीतिज्ञ जकाँ प्रतिकूलहुँ केँ अनुकूल बनाए पटना विश्वविद्यालयमे मैथिलीक स्वीकृति हेतु लोकक सङोर कए अपन मातृभाषा मैथिलीक हित-साधनमे सहायक भेलाह।

 

1. तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ,1980, पृ.सं.84

2. तन्त्रानाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, 1980, पृ.सं. 12, डा.दुर्गानाथ झा श्रीश

3. Our language was the symbol of our identity and we took to writing in this language so as to serve in its progress.When

our language was insulted as being only a dialect, we turned to be students of linguistics.When finally our enemies

made serious attempts to wipe out the language and very place of origin, Goa from the political map of India, then we

turned to be politicians. -Planning for the Survival of Konkani. - Dr.R. Kelkar, Goals and Strategies of Development of

Indian Languages,1998, CIIL Mysore./2

.............................

४.सोमदेव- तन्त्रनाथ झा अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ.सं.१४५

5. चित्रालेखा देवी, अवोधनाथ, 2008 पृ. सं. 5

6. कीचक बध, चारिम सर्ग, तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, पृ.सं. 68,

7. तन्त्रानाथ झा अनुपम कृति, 2004, झा, पृ.सं. 525, 8. मिथिला मिहिर, 06 नवम्बर, 1936

9. भारती,अप्रैल, 1937.

10. The Formation of The Maithili Language, Preface, Luzac & Company , Ltd, London,1958

11. The Formation of the Maithili language is a brilliant contribution to scientific analysis of the Maithili language, which

is spoken by about 2 crores people of Nepal and India. This Maithili language has been the literary vehicle of the

Vaisnava poets of Bengal, Assam and Orissa and has inspired the poets of Bengal from Chandidasa upto Rabindranath

Tagore. Maithili is from political point of view to be included in the dialects of Hindi, while linguistically it stands in

between Bengali and Hindi and is different from both especially on account of each verb forms. It has its own structural

form, although it is an Indo-Aryan language, its special features make it different from each of the literary modern

Indian languages.- Luzac & Company , Ltd, London,1958- www. Vedicbooks.net

12. The Songs of Vidyapti, 1954, Motilal Banarsi Dass, Vanarasi



14.(i).Grammar of the Prakrit Language by R.Pischal - Translator- Subhadra Jha, (ii).History of Indian Literature by

M.Winternitz- Transator- Subhadra Jha- Bhartiya Sahitya ka Itihas, (iii).The Abhidharmakosa of Vasubandu Chapter I

& II with commentary Annoted and rendered into French from Chinese - translated into English by Subhadra Jha -

K.P.Jayaswal, Patna, 4. A Descriptive Catologue of The Sanskrit Manuscripts-338 pages, 5. A Descriprtive Catologue

of The Sanskrit Manuscripts-362 pages etc.

@5

 

15. यात्रा प्रकरण शतक, 1981, मैथिली अकादमी, पृ.सं.62 - श्रीराधाकृष्णन्के ँविशुद्ध साहेबी ठाठमे बैसल देखल, ओ माथ पर मुरेट्ठा सेहो

नहि बन्हने रहथि। प्रदर्शनी देखि जाहि बड़कीटा बेंचक एक छोरपर राधाकृष्णन् बैसल रहथि तकर दोसर छोरपर हम आ मनकूर बैसि गेलहुँ।

हम मिरजइ आ धोतीमे रही। ते ,ँ जे आगन्तुक राधाकृष्णन् के ँ चिन्हैत रहन्हि से हुनका लग जाए भारत, भारतक सभ्यता आदिक विषयक

चर्चा हुनकासँ करए आ जे हुनका नहि चिन्हैत रहैन्हि, से हमरे वेष-भूषाक आधार पर हमरे राधाकृष्णन् बूझि ओहि प्रसंग चर्चा करए। परिणाम

ई भेलैक जे हुनका लग सात वा आठ व्यक्ति मात्रा रहलैन्हि मुदा हमरा तीन दिशासँ पचासक अन्दाज लोक घेरि लेल। आ हमहुँ ककरो भान

नहि होअए दिऐक जे हम राधाकृष्णन् नहि छी।

16. Bachcha Thakur- Subhadra Jha - 'Close to nature, people till his very last - 'A vibrant intellectual in the midst of

intellectuals, an ordinary man in the midst of the ordinary , a Maithil Brahmin in the midst of of his castemen, a

casteless figure in the midst of the men of the cross-sections of the society, a progressive in the midst of progressives,

a leftist in the midst of rightists, Dr.Jha epitomised the vast vistas of divergent crosss-currents in him with oceanic calm

and poise.' - The Indian Nation, Patna, 22 May, 2000.

 

-         प्रकाश चन्द्र

‘प्रयोग’ एकांकीक रंगमंचीय दृष्टि

 

 

 

मैथिली नाट्य जगत मे ‘प्रयोग’ एकटा सशक्त एकांकी अछि, जाहि मे मात्र तीनटा पात्र नवीन मिसर, अमृत आ श्रुति छथि । ई तीनू गोटे कोनो नाट्य संस्थाक नाट्यकार / निर्देशक / अभिनेता / अभिनेत्री कोनो नाटक करबाक युक्ति मे लागल छथि । नाटककार या निर्देशक (जे कहि लियनु) नवीन अपन एहि दुनू पात्र के प्रेमक मादे किछु प्रयोग करबाक लेल कहैत छथि । तीनू पात्र प्रेमक विभिन्न आयमक कतेको प्रयोग करैत छथि । अंतत: ई प्रेम हिनका सबहक नाटकीय जीवन स’ निकलि व्यक्तिगत जीवन स’ नीक जेना ओझरा जाइत छथि । किछु ओहिना जेना विजय तेंडुलकरक चर्चित नाटक ‘खामोश अदालत जारी है’ मे घटैत अछि जे सभपात्र ग्रीन रूम मे किछु ओहिना अदालतक स्वांग रचैत छथि आ ओ धीरे धीरे ततेक ने बढ़ि जाइत अछि जे सभ पात्रक व्यक्तिगत जीवन सामने आबि जाइत छै । खैर !

 

एहि एकांकी मे नाटककार नचिकेता जी सेहो नवीनक माध्यमे स्वयं बजैत बुझाइत छथि । एक ठाम नावीनक संवाद छनि : “आइ-काल्हि जेहन नाटक होइत अछि ओ लोक घर जाक’ सपनेक संग बहा दैत अछि । एकर कोनो प्रक्रिया मोन नहि रहैत छैक । तेँ कोनो स्थायी वस्तु नहि द’ पबैत अछि आजुक नाटक । नाट्यकार लोकनि किछु टाइपमे बन्हा गेल छथि । अपन-अपन शिविरक । मुदा, ओ बात कहबाक लेल लिखैत छथि । केओ लाल छथि तँ केओ पीयर, केओ पूर्वी हावाक शौखीन छथि तँ केओ पश्चिमि हावाक । मुदा नवीन प्रयोग हुनका लोकनिक नाटकमे किन्नहुँ नहि भेटत ।” नवीन नामक एहि पात्रक कथन के आगू बढ़बैत लेखक कहैत छथिन “हमरा मोनमे भेल जे एकटा ओहन नाटक लिखी जाहि सँ नाटकक व्याकरणक सूते कटि जाए ।” – आ से एहि ‘प्रयोग’ मे भेबे कयल अछि । ‘प्रयोग’ नामक ई एकांकी ओहिना भ’ गेल जेना उड़ैत गुड्डीक तागा टुटि गेल हो । ओ क’ त’ जाएत से कोनो थाहे नै रहैत छै । ‘प्रयोग’ एकांकी स’ की भेलै, एकर कथ्य स्थापित भेलै, अभिनेता-अभिनेत्री स्थापित भेलाह, प्रकाश संयोजन स्थापित भेल, मंच व्यवस्था स्थापित भेल वा कि नै भेल से देखब जरूरी अछि ।

 

ओना आइ-काल्हि एहन प्रथा खूब चलल अछि जे कोनो एकटा शव्द वा परिस्थिति के पकड़िक सभ अभिनेता मंच पर अपन परिकल्पना स’ कथा के आगू बढ़्बैत छथि । तय मात्र एतबे रहैत अछि जे ई क्रिया कतबा समय तक होयत, आधा घंटा, एक घंटा वा जतेक हो । मुदा, एकरा सम्पूर्ण नाटकक संज्ञा नहि देल जा सकैत अछि । हँ, ई क्रिया कोनो अभिनेता अभिनेत्रीक प्रशिक्षणक रचना प्रक्रियाक लेल उत्तम भ’ सकैत अछि । एहि स’ हुनक निर्णयक क्षमता बढ़तनि, हुनका भीतर अपना आप मे विश्वास जगतनि, ओ अपन सहकर्मीक लेल कोना सहायक भ’ सकताह से अनुभव हेतनि, एकटा कथा के दोसर कथा सँ कोना जोड़ताह आदि आदि ।

 

‘प्रयोग’ मे तीनटा दृश्य राखल गेल अछि । पहिल दृश्यक अंत तक पात्र नवीन यैहटा कहि पबैत छथि जे ओ एहि प्रयोग मे की करताह । तय होएत अछि जे नाटक विषय वस्तु भेल – प्रेम आ कथाक रूप रेखा मे पहिने मिलन ओकर बाद विरह आ अंत मे फेरो मिलन । एहि स’ इहो एही दृश्य मे दर्शक के जानकारी द’ देल जाइत छनि जे नाटक सुखांत अछि । एहि स’ इहो अनुमान लगाओल जा सकै छै जे दर्शक वाकि प्रेक्षक केँ जे कोनो उत्सुक्ता हेतनि एहि प्रयोग के ल’ क’ ओ निश्चित आधा भ’ गेल हेतनि । आब ओ मात्र उपर्युक्त रूप रेखाक प्रक्रिया देखबा लेल रहताह । मुदा एहन कोनो स्थिति नहि अबैत छै । अंत एकटा प्रेमिकाक हत्या स’ होइत अछि ।

 

नाटकक दोसर दृश्यमे अमृत आ श्रुतिक बीच प्रेम के केन्द्र मे राखि संवाद शुरु होएत छनि । मुदा पहिने तय कयल गेल रूप रेखाक क्रम बाधित होइत अछि आ अकस्मात निर्देशक नवीन प्रवेश करैत छथि । एहि तरहे दोसर दृश्यक अंत तक निर्देशक नवीन मिसरक अनुसार नाटक शुरू भेले नहि रहैत अछि । ओ फेर स’ प्रयोग आरम्भ करबाक आदेश दैत छथि ।

 

आब नाटकक तेसर यानी अंतिम दृश्य शुरू होइत अछि । एहि दृश्यमे तीनू पात्र पर हुनकर सभहक व्यक्तिगत जीवन बेसी प्रभाव मे आबि जाइत छनि । श्रुति अत्यधिक आवेशित भ’ जाइत छथि । अमृत सेहो अपना आ श्रुतिक बीच नवीन के बाधा रूप मे बूझैत छथि आ हुनका पर अन्हार मे हमला क’ दैत छथि । एक बेर फेर श्रुति अमृत पर आवेशित होइत छथि । अमृत पर कतेको तरहक आरोप लगबैत छथि । अमृत स’ सहन नहि होइत छनि आ ओ श्रुतिक गरदनि दबाक’ हत्या क’ दैत छथि । आब शुरू मे निर्देशक नवीन जीक संवाद कतेक कारगर भेलन्हि आ ओ प्रेक्षक पर कतेक प्रभावी भेल, नाटक देखला बाद दर्शक ‘प्रयोग’ के आने नाटक जेना सपना मे बहा देलन्हि , एकर कोनो प्रक्रिया मोन रखलाह कि नै रखलाह से अंवेषणक विषय थिक ।

 

एकांकी मे पात्रक संख्या सेहो तदनुसारे अछि ; ने बेसी आ ने कम, तीनटा । गम्भीरता स’ देखल जाय त’ नाटकक पात्र नवीन मिसर दू तरहे मंच पर अबैत छथि – पहिल त’ निर्देशक रूप मे (जिनकर सोच अछि प्रेम ल’ क’ किछु प्रयोग करबाक) आ दोसर प्रेम के ल’ क’ चलि रहल प्रयोग मे एकटा पात्रक रूप मे सेहो । पहिल दृश्य मे जे स्थापना निर्देशक नवीन मिसर करैत छथि ओ अंत मे जाक’ कोनो निष्कर्ष पर नहि ल’ जा पबैत छथि, ने प्रेक्षक के आ ने अपना आप के । पात्र अमृत हरदम अपने मे छथि । ओ पूरा नाटक मे अपन व्यक्तिगत जीवन जिबैत छथि । अंतिम दृश्यक परिणिति सेहो हुनक व्यक्तिगते होइत अछि तेँ ई पात्र नीक जेना स्थापित होएत छथि । श्रुति नामक महिला पात्र मंच पर निर्देशक नवीन मिसरक निर्देशानुसार चलैत छथि मुदा अपन पिछला आ वर्तमान व्यक्तिगत जीवन दुनू के मंच पर अनैत छथि । ओ ‘कि करू...  कि नै करू’ के स्थिति मे किछु निर्णय नै ल’ पबैत छथि । लेखक श्रुति केँ एकटा अस्थिर पात्र गढ़ने छथि । परिणाम होइत अछि जे एकांकीक अंत तक जाइत जाइत हिनकर हत्या भ’ जाइत छन्हि । एहि तरहेँ ‘प्रयोग’ मे तीनटा पात्र छथि जाहि मे नवीन मिसर छोड़ि दुनू पात्र नीक जेना स्थापित होइत छथि ।       

 

नाटक मे मंच परिकल्पना संग प्रकाश प्ररिकल्पना सेहो लेखक अपना हिसाबे केने छथि । जाहि मे मंच के तीन हिस्सा मे बाँटल गेल अछि आ समयानुसार ओकर प्रयोग सेहो कयल गेल छै । एक कात एकटा कुर्सी अछि आ एकटा काठक बक्सा सेहो उनटल छै , बीच मे सीढ़ीक तीनटा चरण आ एकटा काठक फ्रेम आ दोसर कात मे फूल-पात युक्त एकटा ठाढ़ि लटकल अछि । एहिना प्रकाशक सेहो तीन का क्षेत्र बनाओल गेल छैक एकटा मे कुर्सी+बक्सा+सीढ़ी अछि । दोसर मे सीढ़ी आ मंचक सामनेक हिस्सा । तेसर मे सीढ़ी आ ठाढ़ि अछि । एहि तरहक प्रयोग मैथिली नाटकक लेल पहिल नै अछि तखन एहि एकांकीक मंचनक सन्दर्भ मे ई अति महत्वपूर्ण सुझाव अछि कोनो निर्देशक लेल । एहि मे कोनो शक नहि जे नाटककार नचिकेताजी नाटकक लगभग सभ विधा मे नीक हस्तक्षेप रखैत छथि ।    

 

एहि तरहेँ निष्कर्ष यैह जे ई ‘प्रयोग’ एकांकी मात्र एकटा विचार बनि क’ रहि लेल अछि मैथिली रंगमंचक लेल । ओना नाटक मे द्वन्दक प्रयोग खूब नीक जेना बनल रहैत अछि । नाटक अपन ग्राफ के शुरू स’ बरकरार रखैत अछि । रंगमंचीय दृष्टि स’ ‘प्रयोग’ एकांकीक कथ्य स’ बेसी ओकर मंच परिकल्पना आ प्रकाश परिकल्पना बेसी महत्वपूर्ण अछि । ओना ‘प्रयोग’क मादे हमर ई विचार मात्र एकर एकटा पाठक रूपे राखल जाय । हँ ! एकर प्रस्तुति देखला वा मंचित केला बाद किछु आरो सार्थक तथ्य निकलि सकैत अछि । तखन ई निश्चित जे मैथिली नाट्य साहित्य मे ई अपना तरहक पहिल कृति मानल जयबाक चही, जे रंगमंच स’ जूड़ल प्राय: सभ रंगकर्मी केँ किछु सोचबाक लेल प्रेरित करैत अछि ।