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वि दे ह 

प्रथमे मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृतामे्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

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(c)२००४-१४.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नामे नहि अछि ततय संपादकाधीन।

 

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जगदानन्द झा मनु’- ग्राम पोस्ट हरिपुर डीहटोल, मधुबनी 

दूटा विहनि कथा

 

१.      मनुखक जीवन 

बौआ पैघ भए कऽ अहाँ की बनब ?”

मनुख।

नेनाक एहि उत्तरपर चारूकात ठहाका पसरि गेल। मनुख ! मनुख तँ हम सभ छीहे, मनुख बनक बेगरता की ? मुदा नेनाक आखर मनुखहमर हृदयमे तऽर धरि धसि गेल। की आइ काल्हि हम मनुख, मनुख रहि गेलहुँ ?

हमर सभक भीतर मनुखताक कोनो अवशेष एखनो बचल अछि ?

मनुख की ? खाली मनुखक कोखिसँ जन्म लेने भऽ गेलहुँ ?

जन्म लेलहुँ, नम्हर भेलहुँ, ब्याहदान भेल, दू चारिटा बच्चा जनमेलहुँ, ओकर लालन-पालन केलहुँ, बुढ़ भेलहुँ, मरि गेलहुँ, इहो जीवन कोनो मनुखक जीवन भेलै। आइ मरलहुँ काल्हि दुनियाँ तँ दुनियाँ १३ दिन बाद अप्पनो बिसरि गेल। मनुख जीवन तँ ओ भेल जेकर मृत्यु नहि हुए। मृत्यु देहक होइ छैक, कमसँ कम नामक मृत्यु तँ नहि होइ, नाम जीबैत रहै, ओ भेल मनुखक जीवन।

           

२.      बाबीक पिआर

बेरुपहरकेँ चारि बाजि रहल छल। ओ दुनू भोरेसँ एहि गप्पपर चर्चा कए रहल छल कि हमर जनम दिनपर हमरा की उपहार देल जेए। नी० कोनो डिपार्टमेंट स्टोरसँ एकटा रिस्ट वाच देख कए आएल छल जेकर दाम अठारह सए रुपैया छल। मुदा ओकरा दुनू लग मात्र बारह सए रुपैया छलै। ओ दुनू हमरा नहि कहलक जे ओ हमरा ओहे रिस्ट वाच देबअ चाहैत अछि। बस हमरा एतबे कहलक जे ओकरा छह सए रुपैया चाही।

किएक।

ई सरपराईज छैक, बस ई बुझि लिअ जे अहाँक जनमदिनक उपहार आनैक अछि।

की आनब।

इहे तँ सरपराईज छै, ओ तँ अहाँ देखे कऽ बुझब।

अच्छा ! की लेबैक अछि ई छोरु, ई कहुँ अहाँ दुनू अप्पन-अप्पन जनम दिनक की उपहार लेब।

किछु नहि।

तहन तँ हमहूँ अहाँ सभसँ किछु नहि लेब, नहि तँ पहिले ई कहू जे अहाँ दुनूकेँ अप्पन-अप्पन जनम दिनपर की लेबैक मोन होइए।

माए बाबूक संगे बाबीक पिआर।

मने।

मने बाबीकेँ गामसँ एहिठाम नेने आबू अओर हमरा सभकेँ किछु नहि चाही।

 

 

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