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१.
ओमप्रकाश
झा- किछु गजल २.
रूबी
झा
३.
शान्तिलक्ष्मी
चौधरी ४.
शिव कुमार झा
१.
ओमप्रकाश
झा
गजल
कुशल आबि देख लिअ, एतऽ सबटा आँखि नोर सँ भरल छै।
विकास कतऽ भेलै, विकासक दिस इ बाट चोर सँ भरल छै।
चिडै सभ कतौ गेल की, मोर घूमैत अछि गाम सगरो,
इ बगुला तँ पंख अछि रंगि कऽ, सभा वैह मोर सँ भरल छै।
सब नजरि पियासल छल तकैत आकाश चानक दरस केँ,
निकलतै इ चान कहिया, आसक धरा चकोर सँ भरल छै।
उजाही उठल गाम मे, नै कनै छै करेज ककरो यौ,
हमर गाम एखनहुँ खुश गीत गाबैत ठोर सँ भरल छै।
कहै छल कियो गौर वर्णक गौरवक एहन अन्हार इ,
सब दिस तँ अछि स्याह मोन जखन इ भूमि गोर सँ भरल छै।
फऊलुन(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)- ६ बेर प्रत्येक पाँति मे
गजल
कहि कऽ नै मोनक हम तँ बड्ड भेल तबाह छी बाबू।
कहब जे मोनक, अहीं बाजब हम बताह छी बाबू।
हुनकर गप हम रहलौं जे सुनैत तँ बनल नीक छलौं,
गप हुनकर हम नै सुनल, कहथि हम कटाह छी बाबू।
सदिखन रहलथि मूतैत अपने आगि सभ केँ दबने,
हम कनी डोलि गेलौं, ओ कहै अगिलाह छी बाबू।
बनल छल काँचक गिलास हुनके मोनक विचार सुनू,
इ अनघोल सगरो भेलै हम तँ टुनकाह छी बाबू।
सचक रहि गेल नै जुग, सच कहि कऽ हम छी बनल बुरबक,
गप कहल साँच तऽ अहीं कहब "ओम" धराह छी बाबू।
(ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ)--- ४ बेर
गजल
टूटि-टूटि क' हम त' जोडाइत रहै छी।
मोनक विचार सुनि पतियाइत रहै छी।
गौरवे आन्हर पडल अपने घरारी,
सदिखन मुँह उठा क' अगधाइत रहै छी।
हाट मे प्रेमक खरीद करै सब किया,
बूझि नै, आब त' हम बिकाइत रहै छी।
फहरतै झंडा हमर सब दिस हवा मे,
एहि आसेँ खूब फहराइत रहै छी।
"ओम"क कपार पर कानि क' की करत ओ,
फूसियों हम ताकि औनाइत रहै छी।
गजल
मुस्की सँ झाँपि रखने छी जरल करेज अपन।
सब सँ नुकेने छी दुख भरल करेज अपन।
दिल्लगी करै लेल चाही एकटा जीबैत करेज,
ककरा परसियै हम मरल करेज अपन।
मोहक जुन्ना मे बान्हल हम जोताईत रहै छी,
देखैत रहै छी माया मे गडल करेज अपन।
कियो देखै नै, तैं केने छी करेज केँ ताला मे बन्न,
देखबियै ककरा आब डरल करेज अपन।
कोनो गप पर नै चिहुँकै आब करेज "ओम"क,
अपने सँ हम घोंटै छी ठरल करेज अपन।
---------------- वर्ण १८ ---------------
२
रूबी झा ,
ग्राम पोस्ट
-समसा[मंसूर चक ],
जिला -बेगुसराय [बिहार
],
सम्प्रति:-गांधीनगर
[अहमदाबाद ] [गुजरात ]
'' निष्ठुर प्रियतम''
केहेन निष्ठुर जकां प्रियतम,
अपन जन के सताबय छी ,
करेय छी सिनेह अतिसय हम,
ताहि सा अहाँ क बताबय छी ,
उठे ये पीर करेजा मे किएक ,
अहाँ जनि बुझी दुखाबय छी ,
सुने छी प्रेम अहाँ अप्पन ता ,
आंजुर भरी- भरी लूटाबय छी ,
आबे ये बेर जखन हम्मर ता,
देखू किय निकुती नपाबय छी ,
नै जानि कतेक निदर्दी छी अहाँ ,
सबटा बुझितो न लजाबय छी ,
बुझै छी बात ता सबटा हम,
अहाँ हमरा की सिखाबइ छी ,
रहे ये मोन टांगल कतौ अहाँक,
आ प्रेम हमरा सां जताबइ छी ,
३.
शान्तिलक्ष्मी चौधरी
गज़ल १
अपने पुरखाक मानदानक जड़ि कोड़य मे सभ लागल छै
कियो ककरो कहै घताह कियो ककरो कहै निटट पागल छै
बाँसक बंश केँ उकनै बाँसे देखू कुढ़ैड़क पोन मे छै पैसल
फ़ाटैत मानक चद्दरि केँ सिबै सुईक पोन कियै नै तागल छै
अपने लोकक टाँग घिचैत बेंग केर बनल सभकियो खिस्सा
माय सुमैथिलीक करमे बुझाइत आइ भs गेल अभागल छै
बरदक कान्हक पालो जनु बुझाइत धीयापुता केँ बड़ भारी
छुट्टा खाइत बौआइत एनाहैत जेना अड़िया बछ्छा दागल छै
अपन लोकवेद केँ आगु करय आइ जखन दुनियाँ चेतल
हमसभ निभेर भेल तैयो सुतल, कहु के कतय जागल छै
अहंकारक धाह तापैत मैथिल जनगण छथि अगरमस्त
समाजक एहन विचित्र स्वभाव सेँ "शांतिलक्ष्मी"यो नै बागल छै
..........वर्ण २४........
गज़ल २
पेट मे भल खड़ नै हिनका मुदा सिंघ मे तेल छै
माय कहै बौआ हमर नुनुआगर, बुरलेल छै
जीटजाट फ़ीटफ़ाट, मारय सीटल बिछान सन
मारल कंघी लटुरिया जुल्फ़ मे गमकै फुलेल छै
जेहने चढ़ल पंथ बौआ तेहने होइन्ह संगति
तीन खेप मैटरिक फेल दोस, फेलो मे फलेल छै
लभ लिखल फ़ोनटेन लभे उकारल कुंजी-झावा
लभ घसल तरहैत तँ कामदेवक गुलेल छै
तीर तरकस सँ लैस बोआ चलला शिकार पर
कान्ह पर हाथ देनय संगबै भजारी टंडेल छै
अंगना घरक नुनुआ छथि सड़क पर उचक्का
भरल चालि ढ़ालि मे अवरपनीक अटखेल छै
"शांतिलक्ष्मी" देखय छत पर षोडषीक काकचेष्ट
बाट ठाढ़ बौआक आंखि मे बकोध्यानक झमेल छै
.........वर्ण १९........
गजल ३
छाति तानि ठाढ़ सैनिक दुश्मनक तोप बरसाबैत अंगोरा
लहास घिसियावैत कुत्ता पढ़ि कवैती शेर केँ कहै भगोरा
सात कोनटाक मरचट्टा बदलै कोन-कोन रंगक नै झन्डा
बलिदानीक सारा लागल पाथर केँ की बुझतै ओ लिकलोढा
सौ मुनसाक संग जे खेलकरी राति-दिन खेलावै रसलीला
सून बाट चलैत छौड़ी केँ कहलकै गे बज्जर खसतौ तोरा
जँ बातक नहि ठीक तँ बापोक नहि ठीक के छै सत्ते कहवी
उनटा-पुनटा गप्पक सतखेल करै ई कुर्सीक चटकोरा
नौ सौ मुस खाय केँ बिलाय साधु नाहैत चानन ठोप लगौने
सुसुम खुन चाटय सुंघसुंघ करै ई लाकर आदमखोरा
"शांतिलक्ष्मी" माथ धयनै बैसल देख रहलै हेँ सभटा छिछा
लोकतंत्रक अस्मिता लुटय बेकल कोना देसक कुलबोरा
............वर्ण २३...........
४
शिवकुमार झा
‘टिल्लू’
कविता-
क्षणप्रभा
सभ दिस सर्द
कियो नै बेपर्द
देह सिहकल रेह ठिठुरल
पोखरि-इनार ठमकल
पूस रमकल
श्याम असर्ध शीतक बीच
ट्क-ट्क धएने आश
कखन भरत मोनक पियास
कबदबैत चम्पा मुस्कैत पलाश
सूर्यमुखीक दशा देखि
ओकरासँ किअए करैत छी सिनेह
जे कुन्तीकेँ ठकि लेलक
ओकर कौमार्य नष्ट कऽ देलक
आइ आगिक ढेपपर
के करत विश्वास?
झॉपू मर्यादा बचाउ गेह
भावक आगाँ प्राप्ति कोन मोजर
एतबेमे मघ उड़ि गेल
शीत लुप्त भेल
क्षणप्रभा बनि रविक अर्चिस
सूर्यमुखीक,
कोमल कोंपरमे समागेल
ज्योतिपुंजकेँ आदित्यक चरण मानि-
सूर्यमुखी अपन सेंथुमे
भस्मीभूत कऽ लेलीह
अखण्ड सौभाग्यवतीक आशीषक संग
किरण ससरल
कली फूल बनि पसरल
हम तँ उभय लिंगी छी
नै रहितौं तैयो करितियनि
सुरूजसँ प्रेम......
सभ किअए दैत छी हुनकापर दोख
ने डूमैत छथि ने उगैत छथि
सभ पिण्ड घूमि-
हुनकापर डूमि जएबाक
कलंक लगबैत अछि-
जखन अपनामे दृढ़ता नै
तँ दोसरपर दोष केहेन?
बिनु बजौने सभ लग अबैत छथि
आठो याम जरैत छथि
कुन्ती सभ जनैत किअए
कएली वरण-
ज्योजिपुंजकेँ बान्हब
ककरासँ भेल संभव?
आदित्य सिनेहक तापस
लगले तप्पत, लगले विद्रूप
कोना भेला छलिया?
सिनेहक अर्थ सुधि प्रभंजन
नै स्पर्श
एकर नै अवसान
नै उत्कर्ष...
क्षणप्रभा जकरापर खसल
ओ जरल ओ मरल
मुदा! सिनेहक क्षणप्रभा
वासना मात्र नै-
शाश्वत स्पंदन...
जकरामे केलक प्रवेश
ओकरा रोम-रोम शेष-अशेष
एकर भंगिमा वएह कहत
जकरामे संवेदना रहत....।
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