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वि दे ह 

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य  

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(c)२००४-१२.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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१.डाॅ. शि‍व कुमार प्रसाद २.सत्यनारायण झा ३.जवाहर लाल कश्यप ४.किशन कारीगर

 

डाॅ. शि‍व कुमार प्रसाद

वरीय व्‍याख्‍याता

हि‍न्‍दी वि‍भाग

ि‍नर्मली काॅलेज, ि‍नर्मली

जन्‍म- 12/ 11/ 1956

गाम+पोस्‍ट- सि‍मरा

भाया- झंझारपुर

जि‍ला- मधुबनी

(बि‍हार)

 

ि‍नर्मलीक ि‍नर्मलतामे

 

ि‍नर्मलीक ि‍नर्मलतामे

मनक मलाल सभ मेटा रहल अछि‍।

शि‍क्षाक ऐ महापंकमे

गामक जि‍नगी लेटा रहल अछि‍।

कैंचा-पैसा जोरि‍-जोरि‍ कऽ

माए-बाप सभ पठा रहल अछि‍।

कोचि‍ंग, वि‍द्यालय, काओलेजमे

एक-एक जन आइ लुटा रहल अछि‍।

गामक जि‍नगी..............।

 

के पठाओत ककरा लग जा कऽ

नेना भुटका पढ़ि‍ रहल अछि‍।

नै दू सुधि‍ बुइध केकरो छैक

अपने झंझट ओझराएल अछि‍।

गामक जि‍नगी....।

दौगैत-दौगैत चटि‍या सभटा

पढ़बैत-पढ़बैत बड़का सर सभ

अपन-अपन भाॅजमे सभकोइ

डॉरहि‍ छुबए लेल अपसि‍याँत अछि‍।

गामक जि‍नगी लेटा रहल अछि‍।

मनक मलाल सभ मेटा रहल अछि‍।

 

2 तैं कि‍छु ने कि‍छु लि‍खैत जाउ

 

लि‍खैत-लि‍खैत लि‍खि‍ये देबै

मैथि‍लीक उपकारी हेबै

तैं कि‍छु-ने-कि‍छु नि‍त लि‍खैत जउ।

छपैत-छपैत छैपि‍ये जेबै

एकदि‍न लेखक बनि‍ए जेबै

मंच आर इनामो भेटत

तैं कि‍छु-ने-कि‍छु लि‍खते जाउ।

 

मौलि‍कता ककरा कहैत छी

कि‍नकामे मौलि‍कता देखल

सभ कि‍यो एक्के बात लि‍खैत छथि‍

सबहक नीयत साफ देखैत अछि‍

तैं कि‍छु-ने-कि‍छु लि‍खते जाउ।

नीर-क्षीर वि‍वेक कि‍नका छन्‍हि‍

लि‍खि‍नि‍हारमे हंस के छथि‍

पूर्जा-पूर्जी जोड़ि‍-तोड़ि‍ कऽ

कि‍छु-ने-कि‍छु अहाँ घसैत जाउ

 

तैं कि‍छु-ने-कि‍छु लि‍खैत जाउ।

 

 २.

 

सत्यनारायण झा

 

गंगाकात मे---

ओ भेट भेल छली हमरा, गंगाकात मे |

रामनामी ओढ़नी ओढ़ने,फुलडाली हाथ मे नेने,

तुलसी माला गर मे धेने ,धवल शुभ्रा वस्त्र पहिरने ,

ओ जाइत छली ,गंगाजल लाबय,गंगाकात मे ,

ओ भेट भेल छली हमरा ,गंगाकात मे |

मांग उजरल सिउथ उज्जर ,लहठी टुटल ,अबला सन ,

सन्यासिनीक रूप ,दुखक मूर्ति बनल ,

ओ जाइत छली गंगाजल लाबय ,गंगा कात मे,

ओ भेट भेल छली हमरा, गंगा कात मे ||

मृग नयनी छली ,पिक बयनी छली ,

गज गामिनी छली ,चित चोरनी छली ,

कतेक मनोहारणी छली ,कतेक मनोभावनी छली

रूपक रानी छली ,मोहनीये नहि ,अद्भुत छली ,

से भेट भेल छली हमरा गंगाकात मे ,

ओ जाइत छली गंगाजल लाबय ,गंगाकात मे |||

हुनक आभा देखि सूर्य उगैत छल ,

हुनक गंध सं लोक गमकैत छल ,

हुनक मादकता देखि लोक हँसइत छल ,

से आइ बनल छनि एहन दशा ,

देखि मोन मे उठल ब्यथा ,

एहन दशा मे भेट भेल छली ,ओ हमरा ,

गंगाजल    लाबय गेल छली ओ गंगा कात मे ,

भेट भेल छली ओ गंगा कात मे||||

हुनक दुःख देखि हृदय सुन्न भेल ,

हुनक कांति देखि मोन खिन भेल ,

पाथर सन कठोर ई संसार ,

तेहने कठोर ओ रचनाकार ,

तैं ओ अपन अरमान बहाबय ,

नहू नहू जाइत छली ,ओ गंगाकात मे

ओ भेट भेल छली हमरा ,      गंगाकात मे |||||

जवाहर लाल कश्यप

अन्ना जी गेलथि चुप

अन्ना जी गेलथि चुप

 आशा के जे एक किरण छल   

ओहो कतहु गेल गुम 

राजनीति के दाव पेंच देख    

निकालय खुब अनका मे मीन मेख    

अप्पन दामन कियौ नहि देखय         

जाहि मे अछि हजरो छेद          

 निकलैत सुरज डुबि गेल       

गेल आब अन्हार कुप्प

 अन्ना जी गेलथि चुप

 

किशन कारीगर

 

चाह पीबू।

        (हास्य कविता)

 

हरबड़ी मे जुनि ठोर पकाउ यौ नेता जी

दिल्लीक कुर्सी भेटल सूखचेन स अहाँ बैसू

आउ हम बेना डोला दैत छी

फूकी फूकी अहाँ गरम-गरम चाह पीबू।।

 

भूखे मरि रहल अछि जनता मरअ दियौअ ओकरा

नहि कोनो चिन्ता अहाँ के कोन अछि बेगरता

संसद के कुर्सी पर बैसल अराम अहाँ करू

करिक्का रूपैया स बैंक बैलेंस अहाँ भरू।।

 

मूर्ती बनबै स रथ यात्रा करै लेल पाई अछि

मुदा रोटी रोजगार हेतू एक्को टा पाई नहि अछि

फुसयाँहीक चुनावी घोषणा पर घोषणा टा करू

कुर्सी भेटल त घोटाला पर महाघोटाला टा करू।।

 

बाजि गेल चुनावी पीपही

राजनैतिक गठजोड़ जल्दी अहाँ करू

जुनि पछुआउ सियासी कुर्सी अहाँ ताकू

फेर पाँच साल जनता के बेकूफ बनाएल करू।।

 

दुनियाक सभ स नमहर लोकतंत्र

बनि गेल वोट बैंकक भेड़तंत्र

सम्प्रदायिकता के आगि मे जनता के झरकाउ

कुर्सी हथियाबै लेल रचू कोनो नबका षड्यंत्र।।

 

पहिने कुर्सी फेर मंत्रालय कोना भेटत

सभटा छल प्रपंच अखने अहाँ करू

हे यौ लोकप्रिय भलमानुष जनप्रतिनिधी

संसदो मे अहाँ खूम मुक्कम मुक्की करू।।

 

कुर्सीक खातिर देशक संसाधन बेचलहुँ

बाँचल खूचल सेहो एक दिन अहाँ बेचू

जनता भूखे मरि गेल ओ बिलैटि गेल

मुदा साले साल राजनैतिक रोटी अहाँ सेकू।।

 

मँहगाइ भूखमरी कोनो समाधान ने कराउ

कृषि मंत्रालय मे राखल अन्न अहाँ सड़ाउ

संसद के कैंटीन में सरकारी सब्सिडी लगाउ

चिकन कोरमा शाही पनीर भरिपेट अहाँ खाउ।।

 

घोटाला पर महाघोटाल सभ केलहुँ

तइयो ने पेट अहाँ के भरल

मिठ बोली बाजि जनता के ठकलहुँ

एक्को दिन भूखले पेट होएत अहाँ के रहल

 

कतेको लोक भूखले मरि गेल बेकार भेल अछि किएक

संसद भवन स एक दिन बाहर निकलि अहाँ त देखू

की भा परैत छैक एक्के दिन मे बुझिए जेबैए

बिना किछ खेन्ने एक दिन भूखले रहि के अहाँ देखू।।

 

मुदा कोनो चिन्ता नहि आब कुर्सी भेटिए गेल

संसद भवन मे सूखचेन स अहाँ बैसू

कारीगर बेना डोला दैत अछि

फूकी फूकी  अहाँ गरम-गरम चाह पीबू।।

 

 

 

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।